Friday, 31 October 2014

गिरगिट का सपना / मोहन राकेश


एक गिरगिट था। अच्‍छा, मोटा-ताजा। काफी हरे जंगल में रहता था। रहने के लिए एक घने पेड़ के नीचे अच्‍छी-सी जगह बना रखी थी उसने। खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। आसपास जीव-जन्‍तु बहुत मिल जाते थे। फिर भी वह उदास रहता था। उसका ख्‍याल था कि उसे कुछ और होना चाहिए था। और हर चीज, हर जीव का अपना एक रंग था। पर उसका अपना कोई एक रंग था ही नहीं। थोड़ी देर पहले नीले थे, अब हरे हो गए। हरे से बैंगनी। बैंगनी से कत्‍थई। कत्‍थई से स्‍याह। यह भी कोई जिन्‍दगी थी! यह ठीक था कि इससे बचाव बहुत होता था। हर देखनेवाले को धोखा दिया जा सकता था। खतरे के वक्‍त जान बचाई जा सकती थी। शिकार की सुविधा भी इसी से थी। पर यह भी क्‍या कि अपनी कोई एक पहचान ही नहीं! सुबह उठे, तो कच्‍चे भुट्टे की तरह पीले और रात को सोए तो भुने शकरकन्‍द की तरह काले! हर दो घण्‍टे में खुद अपने ही लिए अजनबी!
उसे अपने सिवा हर एक से ईर्ष्‍या होती थी। पास के बिल में एक साँप था। ऐसा बढ़िया लहरिया था उसकी खाल पर कि देखकर मजा आ जाता था! आसपास के सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाते थे। वह खुद भी उसे देखते ही दुम दबाकर भागता था। या मिट्टी के रंग में मिट्टी होकर पड़ रहता था। उसका ज्‍यादातर मन यही करता था कि वह गिरगिट न होकर साँप होता, तो कितना अच्‍छा था! जब मन आया, पेट के बल रेंग लिए। जब मन आया, कुण्‍डली मारी और फन उठाकर सीधे हो गए।
एक रात जब वह सोया, तो उसे ठीक से नींद नहीं आई। दो-चार कीड़े ज्‍यादा निगल लेने से बदहजमी हो गई थी। नींद लाने के लिए वह कई तरह से सीधा-उलटा हुआ, पर नींद नहीं आई। आँखों को धोखा देने के लिए उसने रंग भी कई बदल लिए, पर कोई फायदा नहीं हुआ। हलकी-सी ऊँघ आती, पर फिर वही बेचैनी। आखिर वह पास की झाड़ी में जाकर नींद लाने की एक पत्‍ती निगल आया। उस पत्‍ती की सिफारिश उसके एक और गिरगिट दोस्‍त ने की थी। पत्‍ती खाने की देर थी कि उसका सिर भारी होने लगा। लगने लगा कि उसका शरीर जमीन के अन्‍दर धँसता जा रहा है। थोड़ी ही देर में उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे जिन्‍दा जमीन में गाड़ दिया हो। वह बहुत घबराया। यह उसने क्‍या किया कि दूसरे गिरगिट के कहने में आकर ख्‍याहमख्‍याह वह पत्‍ती खा ली। अब अगर वह जिन्‍दगी - भर जमीन के अन्‍दर ही दफन रहा तो?
वह अपने को झटककर बाहर निकलने के लिए जोर लगाने लगा। पहले तो उसे कामयाबी हासिल नहीं हुई। पर फिर लगा कि ऊपर जमीन पोली हो गई है और वह बाहर निकल आया है। ज्‍यों ही उसका सिर बाहर निकला और बाहर की हवा अन्‍दर गई, उसने एक और ही अजूबा देखा। उसका सिर गिरगिट के सिर जैसा ना होकर साँप के सिर जैसा था। वह पूरा जमीन से बाहर आ गया, पर साँप की तरह बल खाकर चलता हुआ। अपने शरीर पर नजर डाली, तो वही लहरिया नजर आया जो उसे पास वाले साँप के बदन पर था। उसने कुण्‍डली मारने की कोशिश की, तो कुण्‍डली लग गई। फन उठाना चाहा तो, फन उठ गया। वह हैरान भी हुआ और खुश भी। उसकी कामना पूरी हो गई थी। वह साँप बन गया था।
साँप बने हुए उसने आसपास के माहौल को देखा। सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाए हुए थे। यहाँ तक कि सामने के पेड़ का गिरगिट भी डर के मारे जल्‍दी-जल्‍दी रंग बदल रहा था। वह रेंगता हुआ उस इलाके से दूसरे इलाके की तरफ बढ़ गया। नीचे से जो पत्‍थर-काँटे चुभे, उनकी उसने परवाह नहीं की। नया-नया साँप बना था, सो इन सब चीजों को नजर-अन्‍दाज किया जा सकता था। पर थोड़ी दूर जाते-जाते सामने से एक नेवला उसे दबोचने के लिए लपका, तो उसने सतर्क होकर फन उठा लिया।
उस नेवले की शायद पड़ोस के साँप से पुरानी लड़ाई थी। साँप बने गिरगिट का मन हुआ‍ कि वह जल्‍दी से रंग बदले ले, पर अब रंग कैसे बदल सकता था? अपनी लहरिया खाल की सारी खूबसूरती उस वक्‍त उसे एक शिकंजे की तरह लगी। नेवला फुदकता हुआ बहुत पास आ गया था। उसकी आँखें एक चुनौती के साथ चमक रही थीं। गिरगिट आखिर था तो गिरगिट ही। वह सामना करने की जगह एक पेड़ के पीछे जा छिपा। उसकी आँखों में नेवले का रंग और आकार बसा था। कितना अच्‍छा होता अगर वह साँप न बनकर नेवला बन गया होता!
तभी उसका सिर फिर भारी होने लगा। नींद की पत्‍ती अपना रंग दिखा रही थी। थोड़ी देर में उसने पाया कि जिस्‍म में हवा भर जाने सह वह काफी फूल गया है। ऊपर तो गरदन निकल आई है और पीछे को झबरैली पूँछ। जब वह अपने को झटककर आगे बढ़ा, तो लहरिया साँप एक नेवले में बदल चुका था।
उसने आसपास नजर दौड़ाना शुरू किया कि अब कोई साँप नजर आए, तो उसे वह लपक ले। पर साँप वहाँ कोई था ही नहीं। कोई साँप निकलकर आए, इसके लिए उसने ऐसे ही उछलना-कूदना शूरू किया। कभी झाड़ियों में जाता, कभी बाहर आता। कभी सिर से जमीन को खोदने की कोशिश करता। एक बार जो वह जोर-से उछला तो पेड़ की टहनी पर टँग गया। टहनी का काँटा जिस्‍म में ऐसे गड़ गया कि न अब उछलने बने, न नीचे आते। आखिर जब बहुत परेशान हो गया, तो वह मनाने लगा कि क्‍यों उसने नेवला बनना चाहा। इससे तो अच्‍छा था कि पेड़ की टहनी बन गया होता। तब न रेंगने की जरूरत पड़ती, न उछलने-कूदने की। बस अपनी जगह उगे हैं और आराम से हवा में हिल रहे हैं।
नींद का एक और झोंका आया और उसने पाया कि सचमुच अब वह नेवला नहीं रहा, पेड़ की टहनी बन गया है। उसका मन मस्‍ती से भर गया। नीचे की जमीन से अब उसे कोई वास्‍ता नहीं था। वह जिन्‍दगी भर ऊपर ही ऊपर झूलता रह सकता था। उसे यह भी लगा जैसे उसके अन्‍दर से कुछ पत्तियाँ फूटने वाली हों। उसने सोचा कि अगर उसमें फूल भी निकलेगा, तो उसका क्‍या रंग होता? और क्‍या वह अपनी मर्जी से फूल का रंग बदल सकेगा?
पर तभी दो-तीन कौवे उस पर आ बैठे। एक न उस पर बीट कर दी, दूसरे ने उसे चोंच से कुरेदना शुरू किया। उसे बहुत तकलीफ हुई। उसे फिर अपनी गलती के लिए पश्‍चाताप हुआ। अगर वह टहनी की जगह कौवा बना होता तो कितना अच्‍छा था! जब चाहो, जिस टहनी पर जा बैठो, और जब चाहो, हवा में उड़ान भरने लगो!
अभी वह सोच ही रहा था कि कौवे उड़ खड़े हुए। पर उसने हैरान होकर देखा कि कौवों के साथ वह भी उसी तरह उड़ खड़ा हुआ है। अब जमीन के साथ-साथ आसमान भी उसके नीचे था। और वह ऊपर-ऊपर उड़ा जा रहा था। उसके पंख बहुत चमकीले थे। जब चाहो उन्‍हें झपकाने लगो, जब चाहे सीधे कर लो। उसने आसमान में कई चक्‍कर लगाए और खूब काँय-काँय की। पर तभी नजर पड़ी, नीचे खड़े कुछ लड़कों पर जो गुलेल हाथ में लिए उसे निशाना बना रहे थे। पास उड़ता हुआ एक कौवा निशाना बनकर नीचे गिर चुका था। उसने डरकर आँखें मूँद लीं। मन ही मन सोचा कि कितना अच्‍छा होता अगर वह कौवा न बनकर गिरगिट ही बना रहता।
पर जब काफी देर बाद भी गुलेल का पत्‍थर उसे नहीं लगा, तो उसने आँखें खोल लीं। वह अपनी उसी जगह पर था जहाँ सोया था। पंख-वंख अब गायब हो गए थे और वह वही गिरगिट का गिरगिट था। वही चूहे-चमगादड़ आसपास मण्‍डरा रहे थे और साँप अपने बिल से बाहर आ रहा था। उसने जल्‍दी से रंग बदला और दौड़कर उस गिरगिट की तलाश में हो लिया जिसने उसे नींद की पत्‍ती खाने की सलाह दी थी। मन में शुक्र भी मनाया कि अच्‍छा है वह गिरगिट की जगह और कुछ नहीं हुआ, वरना कैसे उस गलत सलाह देने वाले गिरगिट को गिरगिटी भाषा में मजा चखा पाता!

कला, युद्ध और फासीवाद / वाल्टर बेंजामिन

आधुनिक समाज में सर्वहारा वर्ग का बढ़ना और जनता का बढ़ना, दोनों एक ही प्रक्रिया के दो पहलू हैं। फासीवाद की कोशिश यही होती है कि जनता जिस संपत्ति ढाँचे को खत्‍म करने के लिए संघर्ष करती है, उसे बगैर कोई नुकसान पहुँचाते हुए उसी जनता में से नया श्रमजीवी वर्ग खड़ा किया जाए। फासीवाद को जनता के अधिकार दिलाने से नहीं, केवल उन्‍हें अपने विचार अभिव्‍यक्‍त करने का मौका देने से मतलब है। जनता को संपत्ति से नाता बदलने का अधिकार है; फासीवाद संपत्ति सँभालने के लिए उनके सामने सफाई पेश करना चाहता है। राजनीति में सौंदर्यबोधी तत्‍वों का आगमन इस फासीवाद का ही परिणाम है। एक तरफ जनता की उपेक्षा की जाती है उन्‍हें घुटने टेकने को विवश किया जाता है, तो दूसरी ओर कर्मकांडी मूल्‍यों को तय कर उनके उल्‍लंघन का मसला चलाया जाता है।
इस सौंदर्यबोध राजनीति का अंतिम लक्ष्‍य एक ही है - युद्ध... युद्ध और केवल युद्ध ही परंपरागत संपत्ति प्रणाली का सम्‍मान करते हुए एक बड़े स्‍तर पर जन आंदोलन का लक्ष्‍य निर्धारित कर सकता है। यह तकनीकी फार्मूला कुछ इस तरह है - केवल युद्ध के द्वारा ही यह संभव है कि वर्तमान सभी तकनीकी संसाधनों को जुटाया जाए और संपत्ति की वर्तमान व्‍यवस्‍था भी ज्‍यों की त्‍यों बनी रहे। यहाँ इथोपियन उपनिवेशीय युद्ध के घोषणा पत्र में मेरीनेती का विचार देना अप्रासंगिक न होगा -
''हम भविष्‍यवादी लोग सत्‍ताइस सालों से युद्ध को सौंदर्य विरोधी होने का खिताब देने का विरोध करते रहे हैं... हम तो कहते हैं.... युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह गैस मास्‍क, मेगाफोन, फ्लेम थ्रोवर और छोटे टेंकों जैसी मशीनों पर मानव का प्रभुत्‍व स्‍थापित करता है। युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह मानव शरीर के ठोस धातु में बदलने के स्वप्‍न की शुरुआत करता है। युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह बंदूक की गोली, गोलाबारी, युद्धविराम, इज व सड़न का सम्मिलित स्‍वर संगीत है। युद्ध सुंदर है रेखागणित के कोणों से निर्मित उड़ानों की तरह क्‍योंकि यह नए वास्‍तुशिल्‍प रचता है - बड़े टेंकों की तरह जलते गाँवों से सर्पिलाकार ऊपर उठते धुएँ की तरह... और इसी तरह की तमाम चीजें यह रचता है। भविष्‍यवाद के कवि और कलाकार!... युद्ध सौंदर्यबोध के इन सिद्धांतों को याद रखना ताकि नए साहित्‍य और नई चित्रकला के प्रति तुम्‍हारे संघर्ष को उनके द्वारा रोशनी मिल सके।''
इस घोषणा-पत्र में साफगोई का गुण है। इस प्रतिपादन को द्वंद्ववाद में मानने वालों द्वारा मंजूर किए जाने की दरकार है। इनके लिए आज के युद्ध का सौंदर्यबोध इस प्रकार है : यदि उत्‍पादक शक्तियों के स्‍वाभाविक इस्‍तेमाल में संपत्ति प्रणाली से बाधा पहुँचती है, तो गति और ऊर्जा संसाधन बढ़ाने में तकनीकी साधनों की वृद्धि एक अस्‍वाभाविक इस्‍तेमाल पर जोर देगी और युद्ध में यही होता है। युद्ध से होने वाली तबाही इस बात का सबूत है कि समाज टेक्‍नॉलॉजी को एक साधन के रूप में स्‍वीकार करने लायक परिपक्‍व नहीं हुआ है और टेक्‍नॉलॉजी समाज की बुनियादी ताकतों के साथ चलने लायक विकसित भी नहीं हुई है। साम्राज्‍यवादी युद्ध की खौफनाक विशेषताएँ हमारे उत्‍पादन के विपुल साधनों और उनके अपर्याप्‍त प्रयोग के बीच की विसंगति को बयान करती है : - दूसरे शब्‍दों में बेरोजगारी और बाजार की कमी को दर्शाती है। साम्राज्‍यवादी युद्ध टेक्‍नॉलॉजी का एक विद्रोही रूप है जो ''मानवीय पदार्थ'' के रूप में अपनी खुराक जुटाता है क्‍योंकि टेक्‍नॉलॉजी को समाज ने उसका नैसर्गिक पदार्थ मुहैया नहीं कराया है। बाढ़ से भरी नदियों का पानी खाइयों में भेजने के बजाय समाज मनुष्‍यों की फौज को खाई में धकेल देता है, वह हवाई जहाजों से बीज गिराने की बजाए शहरों पर बम गिराता है और गैस युद्ध कौशल के जरिए एक नई तरह से युगांत होता है।
मेरिनेत्‍ती स्‍वीकार करते हैं कि हमारी ऐंद्रिक तुष्टि को टेक्‍नॉलॉजी ने बदल दिया है और युद्ध इस ऐंद्रिक परितोष के लिए जरूरी सौंदर्यबोध जुटाता है। यह कला का उपभोक्‍ताकरण है। होमेर के समय में मनुष्‍य ओलिंपियन देवताओं के चिंतन मनन का एक विषय था, आज वह स्‍वयं के लिए एक विषय है। इसका अपने आपसे बेगानापन इस हद तक पहुँच गया है कि वह अपने ही विनाश का अनुभव दूसरों की निगाहों से पाए गए कलात्‍मक आनंद की तरह ले रहा है। ये उस राजनीति की हालात है जिसे फासीवाद सौंदर्यबोध बता रहा है। साम्‍यवाद इसका प्रत्‍युत्‍तर कला के राजनीतिकरण द्वारा दे रहा है।
(अनुवाद - शशांक दुबे)

Thursday, 30 October 2014

हम औरतें / वीरेन डंगवाल

रक्त से भरा तसला है,
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में
हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई प्रेतात्माएँ
हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं
दरवाज़ा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं
हम हैं इच्छा-मृग,
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो चौकड़ियाँ
मार लेने दो हमें कमबख्तो !

एक पूर्णकालिक लेखक का अवसान

वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार रॉबिन शॉ पुष्प नहीं रहे। आजीवन स्वतंत्र लेखक रहे रॉबिन शॉ पुष्प की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें उपन्यास, कहानियां, कविताएं, लेख, नाटक और बाल साहित्य आदि शामिल है। अन्याय को क्षमा, दुल्हन बाजार जैसे उपन्यास, अग्निकुंड, घर कहां भाग गया कहानी संग्रह और फणीश्वर नाथ रेणु पर लिखी संस्मरण पुस्तक सोने की कलम वाला हिरामन उनकी चर्चित कृतियां हैं। उनकी पत्नी गीता पुष्प शॉ भी ख्यात लेखिका हैं। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को आज तीन बजे पटना के पीरमुहानी स्थित कब्रिस्तान में होगा।

'दैनिक हिंदुस्तान' में हृषिकेश सुलभ लिखते हैं -

' हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कथाकार और उपन्यासकार रॉबिन शॉ पुष्प का अवसान साहित्य की, एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वह उस पीढ़ी के लेखक थे, जिसने साहित्य को मनसा, वाचा कर्मणा जिया। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, बाल साहित्य, संस्मण से लेकर साहित्य की लगभग तमाम विधाओं में लिखा। वह पूर्णकालिक लेखक थे। उनकी पहली कहानी 1957 में धर्मयुग में छपी। तब से वह अनवरत लिखते रहे। लेकिन आज उनकी यात्रा सदा के लिए थम गई।

' पटना से बाहर हूं। मोतीहारी के पास एक गांव में। कुआं के जगत की मुंड़ेर पर बैठा एक युवा सेमल के कांटेदार तने को एकटक निहार रहा हूं। सामने कई तरह के वृक्षों का सघन विस्तार है। सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं। कल सांझ असंख्य लोगों ने विदा और आज सुबह ही स्वागत किया है जिनका, वे विदा हो रहे हैं। खिन्न, उदास मन जाते सूर्य को निहार रहा हूं। भीतर कुछ टूट रहा है। जलते बांस की तरह चटख रहा है कुछ मेरी आत्मा के अतल में! कि अचानक एक मित्र का फोन आता है। पुष्पजी नहीं रहे।

' बहुत दिनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। हां, फोन पर कभी-कभार बातें होती रहीं, पर यह सिलसिला भी इन दिनों बन्द ही था। अपने को कोस रहा हूं। स्वार्थी..कृतघ्न! आज का काम कल पर टालकर समय से मुंह चुरा कर जीने की अपनी आदत पर स्यापा कर रहा हूं! अचानक उनकी छवि कौंधती है। अंगुलियों में फंसी सिगरेट ,मुट्ठी बांध कर लम्बा कश और बेफिक्री के आलम में सिगरेट का धुआं। वे सन् 1976 के दिन थे। प्रेमचंद के बड़े सुपुत्र श्रीपत राय की पत्रिका ‘‘कहानी‘‘ में मेरी एक छोटी-सी कहानी छपी थी और उनसे आकाशवाणी पटना में मुलाकात हो गई। यह पता चलते कि उस कहानी का लेखक मैं हूं, उन्होंने मेरे कांधे पर अपना हाथ रखा था। उनकी हथेली का वो स्पर्श आज तक जिन्दा है, एक भरोसे की तरह। वे मुझसे मेरे बारे में पूछते रहे थे। मैं प्रतीक्षा में था कि शायद कहानी के बारे में कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं कहा उन्होंने। हमने साथ चाय पी। वे मुझे दुनिया की श्रेष्ठ कहानियों के बारे में बताते रहे। मैंने अब तक क्या-क्या पढ़ा है और अब मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए पूछते और बताते रहे। मैं उन्हें निहारता रहा़..उनकी लम्बी ज़ुल्फों को अपनी उत्सुक नजरों से टेरता रहा। उनकी सिगरेट पीने की अदा और आत्मीयता भरी बातों पर मुग्ध होता रहा। विदा के समय़..चलते हुए उन्होंने शायद मात्र एक छोटे से वाक्य में मेरी कहानी की प्रशंसा की और घर आने का निमंत्रण दिया। अगले ही दिन मैं सब्जीबाग स्थित उनके घर पर था। मैं एक लेखक के घर में था, जिसकी कई कहानियां पढ़ चुका था़...रेडियों पर जिसके नाटक सुन चुका था, धर्मयुग और सारिका जैसी ख्यात पत्रिकाओं में जिसकी तस्वीरें और कहानियां लगातार देखता-पढ़ता रहता था,....जिसकी आंखों पर चढ़े काले चश्में के भीतर छुपी अनन्त कथाओं की दुनिया मेरे लिए कौतूहल का विषय थी! ...चाय आई। बेहद सुघड़ ढंग से व्यवस्थित कमरे में बैठे थे हमदोनों। कहीं कोई अतिरेक नहीं,...प्रदर्शनप्रियता नहीं। मेरी हर उत्सुकता के प्रति सम्मान-भाव और मेरी हर जिज्ञासा के लिए आत्मीय लहजे में समाधान।

' वह जो थोड़ी देर पहले मेरी आत्मा के अतल में जो चटख रहा था, अब भी चटख रहा है।.... यादों की कौंध के साथ। ....अमली के प्रकाशित होते ही एक पोस्टकार्ड, जिसमें आशीष और शुभकामनाएँ और जल्दी मिलने का निमंत्रण था, मिला। ....मैं पहुँचा। मैंने कहा, मैं आपकी तरह आत्मीय कथाएँ लिखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, अपनी तरह लिखो। ज्यादा से ज्यादा पाठकों का भरोसा अर्जित करो।....वे जीवन भर अपनी तरह ही लिखते रहे। उन्होंने बदलते दौर के ट्रेंड की फिक्र किए बग़ैर अपनी भाषा की संवेदना, शिल्प के हुनर और कथ्य की बहुस्तरीयता को बरक़रार रखा। वे अपनी कथाओं को रचते हुए एक छोर पर कथ्य के अंतर्द्वंद्वों के लिए बेहद निर्मम होते थे तो दूसरे छोर पर इतने आत्मीय कि पाठक उनकी बाँह पकड़ चलता था।.... वे पाठकों के सहचर बने रहे। उन्होंने कभी आलोचना की दुरभिसंधियों की चिन्ता नहीं की और न ही उसका मुखापेक्षी बने।
 '....सूरज जा चुका है। क्षितिज की गोद में।.... मैं वसंत की उस दोपहर को याद कर रहा हूँ....सन् 1985 की दोपहर को, जब अपने द्वारा सम्पादित ‘बिहार के युवा हिन्दी कथाकार‘ पुस्तक की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘‘लेखक का काम केवल लिखना नहीं, अपने समय की युवा पगघ्वनियों की आहट को सुनना भी होता है!‘‘....मेरी यादें आत्मीयता के इस दुर्भिक्ष-काल में जीते हुए आदमी की यादें हैं। ....मैं जल्दी से जल्दी उन्हें एक बार फिर से पूरा का पूरा पढ़ना चाहता हूँ। नमन!'

Wednesday, 29 October 2014

भूख / जावेद अख़्तर

आँख खुल मेरी गई हो गया मैं फिर ज़िन्दा
पेट के अन्धेरो से ज़हन के धुन्धलको तक
एक साँप के जैसा रेंगता खयाल आया
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
एक अजीब खामोशी से भरा हुआ कमरा कैसा खाली-खाली है
मेज़ जगह पर रखी है कुर्सी जगह पर रखी है फर्श जगह पर रखी है
अपनी जगह पर ये छत अपनी जगह दीवारे
मुझसे बेताल्लुक सब, सब मेरे तमाशाई है
सामने की खिड़्की से तीज़ धूप की किरने आ रही है बिस्तर पर
चुभ रही है चेहरे में इस कदर नुकीली है
जैसे रिश्तेदारो के तंज़ मेरी गुर्बत पर
आँख खुल गई मेरी आज खोखला हूँ मै
सिर्फ खोल बाकी है
आज मेरे बिस्तर पर लेटा है मेरा ढाँचा
अपनी मुर्दा आँखो से देखता है कमरे को एक सर्द सन्नाटा
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
दोपहर की गर्मी में बेरादा कदमों से एक सड़क पर चलता हूँ
तंग सी सड़क पर है दौनो सिम पर दुकाने
खाली-खाली आँखो से हर दुकान का तख्ता
सिर्फ देख सकता हूँ अब पढ़ नहीं जाता
लोग आते-जाते है पास से गुज़रते है
सब है जैसे बेचेहरा
दूर की सदाए है आ रही है दूर 

अए शैख़-ओ-ब्रह्मन सुनते हो क्या अह्ल-ए-बसीरत कहते हैं गर्दों ने कितनी बुलंदी से उन क़ौमों को दे पटका है


सूची में राजनेताओं और बड़े उद्योगपतियों के नाम नहीं

सूत्रों के मुताबिक कालाधन संबंधी सौंपी गई 627 विदेशी खाताधारकों की सूची में राजनेताओं और बड़े उद्योगपतियों के नाम नहीं है। इन 627 में से पचास फीसद भारतीय और पचास फीसद एनआरआई हैं। इनमें से केवल 350 खातों की ही जांच होगी। लिस्ट में दिए गए ज्यादातर खाते वर्ष 2006 से पहले के हैं और इन्हें 1999-2004-05 के दौरान रिकॉर्ड किया गया था। इन खातों में पांच से लेकर 10 करोड़ तक की राशि जमा है। यदि सरकार इन खातों को फ्रीज कर देती है तो भी इनमें लगभग न के बराबर पैसा बचेगा, क्योंकि खाताधारकों को पहले ही ऐसी कार्रवाई की जानकारी थी।
एसआईटी आम जनता से संपर्क करेगी। इसके तहत वह ईमेल के जरिए लोगों से कालेधन की जानकारी मांगेगी। एसआईटी सूत्रों के मुताबिक कई लोग इस मामले में जानकारी देना चाहते हैं लेकिन वे अपनी पहचान नहीं बताना चाहते। इसी वजह से एसआईटी यह कदम उठाएगी। जानकारी लेने के लिए एसआईटी ईमेल आईडी जारी करेगा। एसआईटी की गुरूवार को होने वाली बैठक में यह फैसला लिया जा सकता है।