चारो तरफ विक्षिप्तता का माहौल, लंपट युवा नवरात्र पूजा में व्यस्त, लंपट-धनधान्य संपन्न साहित्यकार आपसी चापलूसियों में, लंपट पत्रकार धन-मीडिया की जयजयकार में, बुजुर्ग लंपट हर जगह स्त्री-रचनाकारों की गोलबंदी में, लंपट छात्र मोदी के जयकारों में, धनी किसान जात-पांत की खेती-बाड़ी में, लंपट दलित मायावती की मोह-माया में, कम्युनिस्टनुमा फिकरेबाज-धोखेबाज पूंजी की दलाली में आकंठ डूबे हुए....अंधे समय की अंधी दौड़, फिर भी उम्मीद रखनी चाहिए कि हरतरह की खराबियों का हमेशा अंतिम अध्याय भी लिखा जाता रहा है, इस गंदे जयकारों का अंत भी वे युवा जरूर करेंगे, जो भगत सिंह जैसे शहीदों की कुर्बानियों को अपना जीवन-दर्शन मानते हैं, जो आम आदमी के लिए बेहतर दुनिया के सपने देखते हैं, जिन्हें मनुष्यता से अथाह प्यार है, वही कालजयी होंगे, वे ही हमारे अपने हैं.. (27-28 सिंतंबर की रात पैदा हुए थे शहीद भगत सिंह, जिन्हें अंग्रेजों ने हुसैनीवाला में टुकड़े-टुकड़े कर फेक दिया..)
Thursday, 25 September 2014
नाटक 'बुर्क़ ऑफ़' : तुम हवा में उड़ती फिरोगी तो पति के लिए खाना कौन बनाएगा
"तुम एस्ट्रोनॉट बनकर क्या करोगी. औरतें एस्ट्रोनॉट नहीं बनतीं. तुम हवा में उड़ती फिरोगी तो पति के लिए खाना कौन बनाएगा" कहने को तो ये लंदन में हुए नाटक 'बुर्क़ ऑफ़' की शुरुआती लाइनें हैं लेकिन बहुत से परिवारों की शायद यही हक़ीक़त है. कम से कम नादिया मंज़ूर की ज़िंदगी की असलियत तो यही है..असल ज़िंदगी पर आधारित इस नाटक में नादिया ने अपनी ज़िंदगी से जुड़े 21 किरदार ख़ुद निभाएँ हैं. नादिया का जन्म ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के परिवार में हुआ जहाँ उन्हें लड़कों से बात करने, मनपसंद कपड़े पहनने, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी नहीं थी. ब्रिटेन में पली बढ़ी नादिया की सोच पश्चिमी शैली में ढली थी जबकि पाकिस्तान से आया परिवार पारंपरिक सोच वाला था जहाँ हर फ़ैसला पुरुष लेता है. ज़िंदगी की इसी जद्दोजहद को नादिया ने कॉमेडी के ज़रिए नाटक में उतारा है.
नाटक के बारे में नादिया कहती हैं, "मैं बचपन में समझ नहीं पाती थी कि मैं कौन हूँ. मेरी इंग्लिश सहेलियाँ जब मुझसे बताती थीं कि वो अपनी अम्मी से हर तरह की बातें करती हैं तो मुझे लगता था कि मैं क्यों नहीं कर सकती." नादिया का कहना है, "मुझे जो ज़िंदगी चाहिए थी वो मैं झूठ बोल कर परिवार के बाहर जी रही थी क्योंकि मैं अपने फ़ैसले ख़ुद नहीं ले सकती थी. जब पिता को पता चला कि मैं अंग्रेज़ लड़के से शादी करना चाहती हूँ तो उन्होंने कहा कि ऐसे में परिवार से मेरा कोई रिश्ता नहीं बचेगा. मैं ख़ुद से झूठ बोल कर थक गई थी और एक दिन घर से भागकर न्यूयॉर्क चली गई. ज़िंदगी के बारे में लिखना शुरु किया और ये नाटक बन गया." डेढ़ घंटे के प्ले में नादिया पाकिस्तानी समाज के साथ-साथ अपने परिवार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकती, फिर वो उनके पिता और भाई ही क्यों न हो- पिता जो बेटी के खाने तक पर टोकता है कि मोटी हो गई तो शादी कौन करेगा और भाई कट्टरपंथी विचारधारा की ओर जा चुका है.
नाटक में सेक्स जैसे विषयों पर पाकिस्तानी समाज के रवैये पर भी नादिया ने सवाल उठाए--जहाँ वे चुटकी लेते हुए कहती हैं, "पाकिस्तानी समाज में सेक्स की कोई जगह नहीं है. दरअसल पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं". पूरे नाटक में नादिया के निशाने पर सबसे ज़्यादा रहते हैं उनके अब्बू जिनकी बेहद निगेटिव, रूढ़ीवादी छवि पेश की गई है. नाटक की ख़ासियत है कि आख़िर में नादिया ने स्टेज पर अपने पिता को बुलाया जो दर्शक दीर्घा में बैठकर नाटक देख रहे थे. नादिया कहती हैं कि जब न्यूयॉर्क में उन्होंने नाटक किया था तो उनके पिता नाटक देखने आए और पिता का नज़रिया पूरी तरह बदल गया. नादिया के पिता ने बताया कि आज वे अपनी बेटी के सबसे बड़े समर्थक हैं. नादिया की मंशा नाटक को भारत और पाकिस्तान ले जाने की है और नाटक से आगे बढ़कर औरतों के हक़ को बड़ा मुद्दा बनाने की भी. (बीबीसी हिंदी से साभार)
नाटक के बारे में नादिया कहती हैं, "मैं बचपन में समझ नहीं पाती थी कि मैं कौन हूँ. मेरी इंग्लिश सहेलियाँ जब मुझसे बताती थीं कि वो अपनी अम्मी से हर तरह की बातें करती हैं तो मुझे लगता था कि मैं क्यों नहीं कर सकती." नादिया का कहना है, "मुझे जो ज़िंदगी चाहिए थी वो मैं झूठ बोल कर परिवार के बाहर जी रही थी क्योंकि मैं अपने फ़ैसले ख़ुद नहीं ले सकती थी. जब पिता को पता चला कि मैं अंग्रेज़ लड़के से शादी करना चाहती हूँ तो उन्होंने कहा कि ऐसे में परिवार से मेरा कोई रिश्ता नहीं बचेगा. मैं ख़ुद से झूठ बोल कर थक गई थी और एक दिन घर से भागकर न्यूयॉर्क चली गई. ज़िंदगी के बारे में लिखना शुरु किया और ये नाटक बन गया." डेढ़ घंटे के प्ले में नादिया पाकिस्तानी समाज के साथ-साथ अपने परिवार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकती, फिर वो उनके पिता और भाई ही क्यों न हो- पिता जो बेटी के खाने तक पर टोकता है कि मोटी हो गई तो शादी कौन करेगा और भाई कट्टरपंथी विचारधारा की ओर जा चुका है.
नाटक में सेक्स जैसे विषयों पर पाकिस्तानी समाज के रवैये पर भी नादिया ने सवाल उठाए--जहाँ वे चुटकी लेते हुए कहती हैं, "पाकिस्तानी समाज में सेक्स की कोई जगह नहीं है. दरअसल पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं". पूरे नाटक में नादिया के निशाने पर सबसे ज़्यादा रहते हैं उनके अब्बू जिनकी बेहद निगेटिव, रूढ़ीवादी छवि पेश की गई है. नाटक की ख़ासियत है कि आख़िर में नादिया ने स्टेज पर अपने पिता को बुलाया जो दर्शक दीर्घा में बैठकर नाटक देख रहे थे. नादिया कहती हैं कि जब न्यूयॉर्क में उन्होंने नाटक किया था तो उनके पिता नाटक देखने आए और पिता का नज़रिया पूरी तरह बदल गया. नादिया के पिता ने बताया कि आज वे अपनी बेटी के सबसे बड़े समर्थक हैं. नादिया की मंशा नाटक को भारत और पाकिस्तान ले जाने की है और नाटक से आगे बढ़कर औरतों के हक़ को बड़ा मुद्दा बनाने की भी. (बीबीसी हिंदी से साभार)
Wednesday, 24 September 2014
तुम स्वतंत्र हो / नाजिम हिकमत
तुम प्यार करते हो देश को, सबसे करीबी, सबसे क़ीमती चीज़ के समान लेकिन एक दिन, वे उसे बेच देंगे, उदाहरण के लिए अमेरिका को, साथ में तुम्हें भी, तुम्हारी महान आज़ादी समेत सैनिक अड्डा बन जाने के लिए तुम स्वतंत्र हो...
तुम खर्च करते हो अपनी आंखों का शऊर, अपने हाथों की जगमगाती मेहनत,और गूँधते हो आटा दर्जनों रोटियों के लिए काफी
मगर ख़ुद एक भी कौर नहीं चख पाते;
तुम स्वतंत्र हो दूसरों के वास्ते खटने के लिए
अमीरों को और अमीर बनाने के लिए तुम स्वतंत्र हो......
जन्म लेते ही तुम्हारे चारों ओर वे गाड़ देते हैं झूठ कातने वाली तकलियाँ
जो जीवनभर के लिए लपेट देती हैं तुम्हें झूठों के जाल में
अपनी महान स्वतंत्रता के साथ सिर पर हाथ धरे
सोचते हो तुम ज़मीर की आज़ादी के लिए तुम स्वतंत्र हो......
तुम्हारा सिर झुका हुआ मानो आधा कटा हो गर्दन से,
लुंज-पुंज लटकती हैं बाँहें, यहाँ-वहाँ भटकते हो तुम
बेरोज़गार रहने की आज़ादी के साथ तुम स्वतंत्र हो......
तुम दावा कर सकते हो कि तुम नहीं हो
महज़ एक औज़ार, एक संख्या या एक कड़ी
बल्कि एक जीता-जागता इंसान, वे फौरन हथकड़ियाँ जड़ देंगे
तुम्हारी कलाइयों पर, गिरफ्तार होने, जेल जाने
या फिर फाँसी चढ़ जाने के लिए तुम स्वतंत्र हो......
नहीं है तुम्हारे जीवन में लोहे, काठ या टाट का भी परदा;
स्वतंत्रता का वरण करने की कोई ज़रूरत नहीं,
तुम तो हो ही स्वतंत्र, मगर तारों की छाँह के नीचे
इस किस्म की स्वतंत्रता कचोटती है....
खड़हर खड़ा अकेला / जयप्रकाश त्रिपाठी
तरह-तरह की सार्थक-निरर्थकताएं. कुछ लोग यूं ही जिए जा रहे हैं. कुछ लोग यूं लिखे जा रहे हैं. कुछ लोग बस यूं कुछ-न-कुछ पढ़ते रहते हैं. कुछ लोग यूं ही विश्व पुस्तक मेले तक में पहुंच जाएंगे और जो किताब दिख जाए, खरीद लेंगे. इन निरर्थकताओं में तो भी कुछ-न-कुछ सार्थकता झलकती है. होती भी है.
कुछ लोग ऐसे मिले, जिन्हें कोई रोग-व्याधि नहीं, बस यूं बाबा रामदेव को सराहने में जुटे हुए हैं रात दिन. जैसे चाटुकार और चापलूस अपनी पार्टियों के नेताओं को अनायास सराहते रहते हैं. कुछ लोगों को बेवजह ठिस्स-ठिस्स हंसने की आदत होती है और कइयों को इसी तरह मुस्कुराने की. जैसे कालेज के बड़े बाबू प्रिंसिपल साहब को देखकर दबे होंठ चपरासियों को हंसने के लिए प्रेरित करते रहते हैं.
एक पत्रकार हैं. उन्हें ट्रैफिक पुलिस वालों के साथ चौराहे पर खड़े होकर वहां से गुजरने वालों की आंखों में आंखों घुसेड़ने की लत है. अपने शहर में एक दरोगा जी हैं. हफ्ते में एक बार जरूर मौका निकालकर कप्तान साहब के मझले बेटे को (जो एसपी का सबसे मुंहलगा है) टॉफी-समोसा खिला आते हैं. अब वह बर्गर-पिज्जा की डिमांड करने लगा है. तब से दरोगा जी भी मोटी मछलियां नाधने लगे हैं.
एक कविजी हैं. पोखर के किनारे उनकी जर्जर कोठी है. उसमें एक खिड़की है. बगल में तख्त डालकर पोखर की तरफ मुंह किए जनाब वहीं दिनरात कवियाते रहते हैं. माथे से टकलू हैं. खिड़की की जाली से ही पता चल जाता है कि कोई महाकाव्य मकान के उस सिरे पर दमक रहा है. जब चिंतन-मनन करते-करते थक जाते हैं, सामने मोहल्ले की सड़क पर निकल आते हैं. आने-जाने वालों को व्यंग्यभरे काव्यात्मक अंदाज में निहारते रहते हैं. नमस्कार करते-कराते रहते हैं. जब वहां से भी थक जाते हैं, आगे नुक्कड़ पर पहुंच जाते हैं. देखते ही जूठन चाय वाला समझ जाता है कि विषखोपड़ा ग्राहकों का भेजा फ्राइ करने आ रही है.
वाकया ही कुछ ऐसा है. चाय की यह दुकान किसी जमाने में पूरे शहर में मशहूर थी. कवि जी ने एक दिन अपने पिछलग्गू नवोदित कवि से कहा कि इस चाय वाले रुपई को कविता करना सिखाओ. लिखने लगा तो फिर यहां मुफ्त की चाय की जुगाड़ बन जाएगी. सो, मिशन सफल रहा. वाकई चाय वाला कवि हो गया. दुकान पर ग्राहक झख मार रहे होते और वह हिसाब-किताब वाली कापी में कविताएं लिखता रहता. वहां दिन रात कविगोष्ठियां होती रहतीं. एक दिन ऐसी नौबत आई कि उसे दुकान बेंच कर भाग खड़ा होना पड़ा था. तब से यह नया चायवाला दुकान थामे हुए है. कवि जी को देखते ही उसे पुराने दुकानदार रुपई के दुर्दिन याद आ जाते हैं.
आखिरकार दुकान बेंचकर भाग खड़ा हुआ बेचारा, अब खड़हर खड़ा अकेला ।
जमाने के सताए हुए कुछ ऐसे लोग भी मिलते रहते हैं, जो आजकल सोशल मीडिया में हींक-छींक रहे हैं. जब देखा कि गुरू यहां तो मामला जोरदार चल निकला है, कलम-डायरी छोड़कर किसी के भी खेत में चरस-गांजा बो दे रहे हैं. जय हो..!
कुछ लोग ऐसे मिले, जिन्हें कोई रोग-व्याधि नहीं, बस यूं बाबा रामदेव को सराहने में जुटे हुए हैं रात दिन. जैसे चाटुकार और चापलूस अपनी पार्टियों के नेताओं को अनायास सराहते रहते हैं. कुछ लोगों को बेवजह ठिस्स-ठिस्स हंसने की आदत होती है और कइयों को इसी तरह मुस्कुराने की. जैसे कालेज के बड़े बाबू प्रिंसिपल साहब को देखकर दबे होंठ चपरासियों को हंसने के लिए प्रेरित करते रहते हैं.
एक पत्रकार हैं. उन्हें ट्रैफिक पुलिस वालों के साथ चौराहे पर खड़े होकर वहां से गुजरने वालों की आंखों में आंखों घुसेड़ने की लत है. अपने शहर में एक दरोगा जी हैं. हफ्ते में एक बार जरूर मौका निकालकर कप्तान साहब के मझले बेटे को (जो एसपी का सबसे मुंहलगा है) टॉफी-समोसा खिला आते हैं. अब वह बर्गर-पिज्जा की डिमांड करने लगा है. तब से दरोगा जी भी मोटी मछलियां नाधने लगे हैं.
एक कविजी हैं. पोखर के किनारे उनकी जर्जर कोठी है. उसमें एक खिड़की है. बगल में तख्त डालकर पोखर की तरफ मुंह किए जनाब वहीं दिनरात कवियाते रहते हैं. माथे से टकलू हैं. खिड़की की जाली से ही पता चल जाता है कि कोई महाकाव्य मकान के उस सिरे पर दमक रहा है. जब चिंतन-मनन करते-करते थक जाते हैं, सामने मोहल्ले की सड़क पर निकल आते हैं. आने-जाने वालों को व्यंग्यभरे काव्यात्मक अंदाज में निहारते रहते हैं. नमस्कार करते-कराते रहते हैं. जब वहां से भी थक जाते हैं, आगे नुक्कड़ पर पहुंच जाते हैं. देखते ही जूठन चाय वाला समझ जाता है कि विषखोपड़ा ग्राहकों का भेजा फ्राइ करने आ रही है.
वाकया ही कुछ ऐसा है. चाय की यह दुकान किसी जमाने में पूरे शहर में मशहूर थी. कवि जी ने एक दिन अपने पिछलग्गू नवोदित कवि से कहा कि इस चाय वाले रुपई को कविता करना सिखाओ. लिखने लगा तो फिर यहां मुफ्त की चाय की जुगाड़ बन जाएगी. सो, मिशन सफल रहा. वाकई चाय वाला कवि हो गया. दुकान पर ग्राहक झख मार रहे होते और वह हिसाब-किताब वाली कापी में कविताएं लिखता रहता. वहां दिन रात कविगोष्ठियां होती रहतीं. एक दिन ऐसी नौबत आई कि उसे दुकान बेंच कर भाग खड़ा होना पड़ा था. तब से यह नया चायवाला दुकान थामे हुए है. कवि जी को देखते ही उसे पुराने दुकानदार रुपई के दुर्दिन याद आ जाते हैं.
आखिरकार दुकान बेंचकर भाग खड़ा हुआ बेचारा, अब खड़हर खड़ा अकेला ।
जमाने के सताए हुए कुछ ऐसे लोग भी मिलते रहते हैं, जो आजकल सोशल मीडिया में हींक-छींक रहे हैं. जब देखा कि गुरू यहां तो मामला जोरदार चल निकला है, कलम-डायरी छोड़कर किसी के भी खेत में चरस-गांजा बो दे रहे हैं. जय हो..!
मीडिया संस्थानों को प्रियंका गांधी का कानूनी नोटिस
प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक साप्ताहिक अखबार और कुछ अन्य मीडिया संस्थानों को उनके द्वारा प्रकाशित उस खबर के लिए कानूनी नोटिस भेजे हैं जिसमें कहा गया है कि वह और उनके पति अपने बेटे को राहुल गांधी को गोद दे रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि प्रियंका ने अपने बेटे की 'मानहानि' के लिए आपराधिक और दिवानी कार्रवाई की चेतावनी दी और कहा है कि वह अपने परिवार के बारे में झूठे आरोपों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने को प्रतिबद्ध हैं। अखबार की खबर में कांग्रेस के शीर्ष स्तर पर व्याप्त अटकल के बारे में बताया गया है कि राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका के बेटे रेहान को गोद ले रहे हैं ताकि उसका उपनाम गांधी हो सके।
प्रियंका ने इसे मनगढ़ंत दुर्भावनापूर्ण सोच बताकर खारिज करते हुए नोटिस में कहा है, 'यह कहना कि कोई अभिभावक अपने बच्चे को स्वेच्छा से किसी और को दे देगा मानो कि वह भावहीन वस्तु है, यह अपने आप में बहुत खराब बात है। इसे किसी तरह की वंशवाद की राजनीतिक आकांक्षा के इरादे से जोड़ना तो और भी ज्यादा दुखद है।' प्रियंका ने इस खबर पर भी कड़ी आपत्ति जताई है कि उनके बेटे के स्कूल प्रवेश फॉर्म में उसके अभिभावक का नाम राहुल गांधी है। प्रियंका ने पिछले दिनों कांग्रेस में अपनी बड़ी भूमिका को लेकर चल रही अटकलों को भी पुरजोर तरीके से खारिज किया था। उन्होंने इस तरह की खबरों को निराधार अफवाह बताकर खारिज कर दिया था।
प्रियंका ने इसे मनगढ़ंत दुर्भावनापूर्ण सोच बताकर खारिज करते हुए नोटिस में कहा है, 'यह कहना कि कोई अभिभावक अपने बच्चे को स्वेच्छा से किसी और को दे देगा मानो कि वह भावहीन वस्तु है, यह अपने आप में बहुत खराब बात है। इसे किसी तरह की वंशवाद की राजनीतिक आकांक्षा के इरादे से जोड़ना तो और भी ज्यादा दुखद है।' प्रियंका ने इस खबर पर भी कड़ी आपत्ति जताई है कि उनके बेटे के स्कूल प्रवेश फॉर्म में उसके अभिभावक का नाम राहुल गांधी है। प्रियंका ने पिछले दिनों कांग्रेस में अपनी बड़ी भूमिका को लेकर चल रही अटकलों को भी पुरजोर तरीके से खारिज किया था। उन्होंने इस तरह की खबरों को निराधार अफवाह बताकर खारिज कर दिया था।
अस्सी देशों ने सुना मीनाक्षी का ‘साउंड ऑफ इंडिया शो’
देश की नंवर-1 आरजे मीनाक्षी के साउंड ऑफ इंडिया शो को ब्रिटेन और अमेरिका समेत 80 देशों के स्रोताओं ने सुना। ज्यूरिख में 5 सितंबर को मीनाक्षी ने अपने इस शो को प्रस्तुत किया। इस शो को रूस, लंदन अमेरिका, यूएई और सिंगापुर समेत 80 देशों में प्रसारित किया गया। इस शो में भारत के सभी राज्यों के फोक सांग्स और कल्चर के बारे में बताया गया। इसके साथ ही बॉलीवुड के गाने भी शो के दौरान सुनवाए गए। ये सारी जानकारी खुद मीनाक्षी ने ज्यूरीख से लौटने के बाद दी। स्विटजरलैंड के ज्यूरीख में आयोजित इंटरनेशनल रेडियो फेस्टिवल में हिस्सा लेकर देश की नंबर-1 आरजे मीनाक्षी स्वदेश लौट आई हैं। इंटरनेशनल रेडियो फेस्टिवल (आईआरफ) ने 94.3 माय एफएम की चंडीगढ़ की आरजे मीनाक्षी को देश का नंबर-1 आरजे चुना है। वे 3 सितंबर को ही इस फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए ज्यूरिख गई थीं। अगले ही दिन वहां वे दुनिया के 70 देशों से आए कई आरजे से मिली। मीनाक्षी 70 देशों से आए आरजे से मिलकर उनके रेडियो के बारे जानकारी हांसिल की और उन्हें भी माय एफएम के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार माय एफएम मनोरंजन के साथ ही देश-दुनिया के बारे में लोगों को अपडेट रखता है। इस दौरान जाने माने आरजे टोनी प्रिंस ने अपनी टीवी डॉक्यूमेंट्री के लिए मीनाक्षी का इंटरव्यू भी लिया। वहीं 6 सितंबर को मीनाक्षी ने ‘चेंजेस फेस ऑफ रेडियो’ विषय पर आयोजित ग्रुप डिस्कशन में भाग लिया। इस डिस्कशन में यही निष्कर्ष निकला कि लोगों को जोड़ने या उनका मनोरंजन करने की जो ताकत रेडियो में है वो किसी और मीडिया में नहीं है। (समाचार4मीडिया से साभार)
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