Sunday, 5 January 2014

भोजपुरी को रौंद रहे बाजार के बहेलिये


फिल्मों और फूहड़-शर्मनाक गीत-गानों से भोजपुरी की भाषायी पहचान और साहित्यिक संपन्ना को पिछले एक दशक से जिस तरह रौंदा-नोंचा जा रहा है, अकल्पनीय लगता है। पीड़ा होती है। यह अपसांस्कृतिक हमला जैसे मां की दुर्दशा मां के बोल-बचन, ममत्व की मिठास पर लगता है। भोजपुरी भाषा, साहित्य, बोलचाल, लोकजीवन ऐसा है नहीं, जैसा कि अश्लील नृत्य-गायकी से शोहरत और पैसा बटोरने वाले आज के कुख्यात लोक गायकों, फिल्मी लुच्चों-लफंगों ने बना दिया है। राष्ट्रीय पटल पर भोजपुरी की बदनामी के लिए जो चार-पांच नामवर चेहरे जिम्मेदार हैं, वह चाहे जितना चालू मीडिया की सुर्खियों में हों, उनका नाम भी लेने लायक नहीं रह गया है। इन बाजार के बहेलियों ने भोजपुरी की समूची पहचान को छिन्न-भिन्न-सा कर देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे में पुनरावृत्ति ही सही, भोजपुरी की अस्मिता और इतिहास को एक बार पुनः जानने-बताने का मन करता है।
भोजपुरी मुख्य रुप से पश्चिम बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी झारखण्ड में बोली जाती है। भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार दुनिया के कोने-कोने में सूरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो, फिजी, मारिसस आदि देशों तक हैं। यह हिन्दी की उपभाषा-बोली है। इसकी शब्दावलियां मुख्यतः संस्कृत और हिन्दी पर निर्भर रही हैं। इसने उर्दू से भी शब्द ग्रहण किये हैं। भारत में लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व में भोजपुरी जानने वालों की संख्या पांच करोड़ बतायी गयी है। क्षेत्रविस्तार और भाषा की दृष्टि से भोजपुरी अपनी बहनों मैथिली और मगही में सबसे बड़ी है। भोजपुरी भाषा का नामकरण बिहार राज्य के आरा (शाहाबाद) जिले में स्थित भोजपुर गाँव के नाम पर हुआ है। पूर्ववर्ती आरा जिले के बक्सर सब-डिविजन में भोजपुर नाम का एक बड़ा परगना है जिसमें 'नवका भोजपुर' और 'पुरनका भोजपुर' दो गाँव हैं। मध्य काल में इस स्थान को मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा था। इसी कारण इसके पास बोली जाने वाली भाषा का नाम 'भोजपुरी' पड़ गया। भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं सदी से शुरू होता है। 'आदर्श भोजपुरी', जिसे डॉ0 ग्रियर्सन ने स्टैंडर्ड भोजपुरी कहा है, बिहार के आरा और उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर जिले के पूर्वी भाग, घाघरा एवं गंडक के दोआब में बोली जाती है। 'पश्चिमी भोजपुरी' जौनपुर, आजमगढ़, बनारस, गाजीपुर के पश्चिमी भाग और मिर्जापुर में बोली जाती है। आदर्श भोजपुरी और पश्चिमी भोजपुरी में बहुत अधिक अन्तर है। मधेसी तिरहुत की मैथिली बोली और गोरखपुर की भोजपुरी के बीचवाले स्थानों में बोली जाती है, अत: इसका नाम मधेसी पड़ गया है। यह बोली चंपारण जिले में बोली जाती और प्राय: 'कैथी' लिपि में लिखी जाती है। 'थारू' लोग नेपाल की तराई में रहते हैं। ये बहराइच से चंपारण जिले तक पाए जाते हैं और भोजपुरी बोलते हैं। यह विशेष उल्लेखनीय बात है कि गोंडा और बहराइच जिले के थारू लोग भोजपुरी बोलते हैं जबकि वहाँ की भाषा पूर्वी हिन्दी (अवधी) है।
भोजपुरी प्रदेश के निवासियों को अपनी भाषा से बड़ा प्रेम है। अनेक पत्रपत्रिकाएँ तथा ग्रन्थ इसमें प्रकाशित होते रहे हैं तथा भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मेलन, वाराणसी इसके प्रचार में संलग्न है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन समय-समय पर आंदोलनात्म, रचनात्मक और बैद्धिक तीन स्तरों पर भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में निरंतर जुटा हुआ है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन से ग्रन्थ के साथ-साथ त्रैमासिक 'समकालीन भोजपुरी साहित्य' पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन, भारत ही नहीं ग्लोबल स्तर पर भी भोजपुरी भाषा और साहित्य को सहेजने और इसके प्रचार-प्रसार में लगा हुआ है। देवरिया (यूपी), दिल्ली, मुंबई, कोलकता, पोर्ट लुईस (मारीशस), सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और अमेरिका में इसकी शाखाएं हैं।
पं.रामचंद्र शुक्ल, डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी, अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद, कथाकार विवेकी राय, ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय, भिखारी ठाकुर, धूमिल, मोती बीए, जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता, गोरख पांडेय, भोलानाथ गहमरी, बाबू रघुबीरनारायन, महेन्द्र शास्त्री, मनोरंजन बाबू, दण्डिस्वामी विमलानन्द, परीक्षण मिश्र, पाण्डे नर्मदेश्वर सहाय, डा॰ रामविचार पाण्डेय, प्रसिद्धनारायण सिंह, अवधेन्द्र नारायण, जगदीश ओझा 'सुन्दर', प्रभुनाथ मिश्र, चन्द्रशेखर मिश्र, रामजियावन दास 'बावला', अनिरुद्ध, अर्जुन सिंह, 'अशान्त', सतीश्वर सहाय 'सतीश', सुन्दर जी, रामनाथ पाठक 'प्रणयी', रामदेव द्विवेदी 'अलमस्त', मनोज भावुक, 'अनुरागी', राही, तारकेश्वर 'राही', कमला प्रसाद 'बिप्र', अविनाशचन्द्र 'विद्यार्थी', मधुकर सिंह, दूधनाथ शर्मा, कुंज बिहारी 'कुंज', सत्यनारायण सौरभ, रामबृक्ष राय 'विधुर', रामबचन शास्त्री 'अँजोर', सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी, जैसे अनगिनत रचनाकार, मंगल पांडे, वीर कुंवर सिंह जैसे स्वातंत्र्य योद्धा, प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अभिनेता नजीर हुसैन, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, मनोज वाजपेयी और राजनीतिक क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, बाबू जगजीवन राम, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार इसी माटी की देन रहे हैं। 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबों', भिखारी ठाकुर की ‘विदेशिया', 'लागी नाही घूटे रामा', 'नइहर छूटल जाय', 'हमार संसार', 'बलमा बडा नादान', 'सीता मइया', 'सइयां से अइसे मिलनवा', 'भौजी', 'गंगा' आदि प्रमुख भोजपुरी फिल्में रही हैं। मोती बीए भोजपुरी के प्रथम फिल्म गीतकार माने जाते हैं।
डॉ. उदय नरायन तिवारी कहते हैं कि ‘भोजपुरी में सबसे बड़ी कमी इसमें प्रकाशित उच्च श्रेणी के साहित्य का अभाव है। भोजपुरियों को अपनी भाषा के प्रति इतना अनुराग होने पर भी यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इस भाषा की श्रीवृद्धि नही हुई है और प्राचीन काल में भी इसकी बहनें, बंगाली, मैथिली, कौशली के मुकाबले में इसमें साहित्य रचना विशेष नहीं हुई है।’
मयंक मुरारी लिखते हैं- 'भोजपुरी लोक साहित्य ग्राम्यता के साथ जीवन के मर्म को बखूबी समेटे हुए है, जिसकी मौलिकता और विश्वसनीयता अटूट है। भोजपुरी लोक साहित्य व गीतों का क्षेत्र काफी विस्तृत है, जिसमें इतिहास, संस्कृति से लेकर जनजीवन के सभी पहलूओं का समावेश है। उत्तर भारतीय इन लोकगीतों में जैतसारी, कीर्तन, निर्गुण, पूर्वी, भरथरी, आल्हा, डोमकच, जट-जटनी आदि लोक धुनों में लोक की जिंदगी थिरकती है। बालक के जन्म पर महिलाओं द्वारा सोहर गायन का रिवाज है। उत्तर भारत में ‘पवरिया ’ का घर-घर जाकर प्रसन्नता व्यक्त करने की परिपाटी है। अपवाद ही सही अब भी नानी-दादी की कविता, कहानी,लोरियांे के ताल एवं नाद पर बच्चों की नींद आती है। विवाह में तो हरेक अनुष्ठान के लिए अलग-अलग गीतों का परिचलन है। अब भी भोजपुरी इलाकों में वर्षा में कजरी, फागुन में फाग और गरमी में चईता की धून पर सरकते जीवन का दिग्दर्शन किया जा सकता है।'
भोजपुरी के भगीरथ भिखारी ठाकुर पर जगदीशचंद्र माथुर कहते हैं- 'अनेक व्यक्तियों को बड़े लोगों के हस्ताक्षर जमा करने का शौक बचपन से ही लग जाता है और कुछ तो नेताओं, अभिनेताओं, कवियों, खेल के विजेताओं इत्यादि को अपनी दस्तखत बही की पकड़ में लाकर ऐसे ही आहृलाद का अनुभव करते हैं जैसे बाज अपने शिकार को पंजे में पकड़ लेने पर। इसीलिये अंग्रेजी में इस शौक को 'ऑटोग्राफ हंटिंग' कहा जाता है। यह शौक मुझ पर कभी हावी नहीं हो पाया। पर अब एक बार-केवल एक बार मैंने एक व्यक्ति से ऑटोग्राफ मांगा, वह व्यक्ति थे भिखारी ठाकुर।..... भिखारी ठाकुर से जब मैंने उनके हस्ताक्षर की मांग की थी, तब उन्होंने मुझसे साफ कहा था- ' हमको लिखना कहां आता है? बस थोड़ी बहुत दस्तखती कर लेते हैं।' मैं ने कहा- बस, यही चाहिए।'

Saturday, 4 January 2014

छछनी छछन्न करे, टाटी-बेड़ा बन्न करे

काकी की कहावत-1

जब हम कोई सही बात कहते हैं, उसका भी एक गलत पक्ष होता है (सोचने वालो के लिए)। 'पुरुष-अर्थी' समाज में 'तिरिया चरित्र' का अर्थ नहीं समझाया जाता है। काका गांव में किसी भी ऐसे किस्सा-कहानी पर ये कहावत छाप देते थे- 'छछनी छछन्न करे, टाटी-बेड़ा बन्न करे' (कि ऐसी है नहीं, दिखाने की कोशिश कर रही है)। उस समय हम सुनते ही हंस देते थे। आज समझ में आता है कि काका पूरी औरत जात की हंसी उड़ाते थे। 'पुरुष-अर्थी' समाज की पुरानी आदत है। जो किसी लायक नहीं, वह भी औरतों, मेहनतकश जातियों और समुदायों के प्रति अनादर व्यक्त करके ही अपने को आदरणीय दिखाने की कोशिश करता है। अरे, तुलसीदास तक इस लपेटे में आ गए तो औरों की क्या कहें। स्त्रियों, पंजाबी समाज, यादवों और दलितों पर सबसे ज्याादा कहावतें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं।
इस समय 'छछनी छछन्न करे, टाटी-बेड़ा बन्न करे', का अर्थ राजनीतिक दलों पर सबसे सटीक बैठता है। मतदाताओं की आंख में धूल झोकने के लिए टाटी-बेड़ा (परदेदारी) कर वे कितनी तरह से छछन्न (नखरें) करती हैं...उनके नेता जोकरों की तरह कभी तलवार लेकर, कभी टोपी, कभी नोटो की माला पहन कर, कभी पटेल की मूर्ति बनाने के लिए गांव-गांव से लोहा बटोरने का अभियान चलाकर, कभी जनता का ही पैसा जनता को देते हुए मनरेगा-मनरेगा चिल्लाकर तो  कभी मेट्रो में सफर कर जनता को भरमाने की कोशिश करते हैं.....छछनी छछन्न करे, टाटी-बेड़ा बन्न करे!

Sunday, 29 December 2013

नया साल

हरिशंकर परसाई

साधो, बीता साल गुजर गया और नया साल शुरू हो गया। नए साल के शुरू में शुभकामना देने की परंपरा है। मैं तुम्हें शुभकामना देने में हिचकता हूँ। बात यह है साधो कि कोई शुभकामना अब कारगर नहीं होती। मान लो कि मैं कहूँ कि ईश्वर नया वर्ष तुम्हारे लिए सुखदायी करें तो तुम्हें दुख देनेवाले ईश्वर से ही लड़ने लगेंगे। ये कहेंगे, देखते हैं, तुम्हें ईश्वर कैसे सुख देता है। साधो, कुछ लोग ईश्वर से भी बड़े हो गए हैं। ईश्वर तुम्हें सुख देने की योजना बनाता है, तो ये लोग उसे काटकर दुख देने की योजना बना लेते हैं।
साधो, मैं कैसे कहूँ कि यह वर्ष तुम्हें सुख दे। सुख देनेवाला न वर्ष है, न मैं हूँ और न ईश्वर है। सुख और दुख देनेवाले दूसरे हैं। मैं कहूँ कि तुम्हें सुख हो। ईश्वर भी मेरी बात मानकर अच्छी फसल दे! मगर फसल आते ही व्यापारी अनाज दबा दें और कीमतें बढ़ा दें तो तुम्हें सुख नहीं होगा। इसलिए तुम्हारे सुख की कामना व्यर्थ है।
साधो, तुम्हें याद होगा कि नए साल के आरंभ में भी मैंने तुम्हें शुभकामना दी थी। मगर पूरा साल तुम्हारे लिए दुख में बीता। हर महीने कीमतें बढ़ती गईं। तुम चीख-पुकार करते थे तो सरकार व्यापारियों को धमकी दे देती थी। ज्यादा शोर मचाओ तो दो-चार व्यापारी गिरफ्तार कर लेते हैं। अब तो तुम्हारा पेट भर गया होगा। साधो, वह पता नहीं कौन-सा आर्थिक नियम है कि ज्यों-ज्यों व्यापारी गिरफ्तार होते गए, त्यों-त्यों कीमतें बढ़ती गईं। मुझे तो ऐसा लगता है, मुनाफाखोर को गिरफ्तार करना एक पाप है। इसी पाप के कारण कीमतें बढ़ीं।
साधो, मेरी कामना अक्सर उल्टी हो जाती है। पिछले साल एक सरकारी कर्मचारी के लिए मैंने सुख की कामना की थी। नतीजा यह हुआ कि वह घूस खाने लगा। उसे मेरी इच्छा पूरी करनी थी और घूस खाए बिना कोई सरकारी कर्मचारी सुखी हो नहीं सकता। साधो, साल-भर तो वह सुखी रहा मगर दिसंबर में गिरफ्तार हो गया। एक विद्यार्थी से मैंने कहा था कि नया वर्ष सुखमय हो, तो उसने फर्स्ट क्लास पाने के लिए परीक्षा में नकल कर ली। एक नेता से मैंने कह दिया था कि इस वर्ष आपका जीवन सुखमय हो, तो वह संस्था का पैसा खा गया।
साधो, एक ईमानदार व्यापारी से मैंने कहा था कि नया वर्ष सुखमय हो तो वह उसी दिन से मुनाफाखोरी करने लगा। एक पत्रकार के लिए मैंने शुभकामना व्यक्त की तो वह ब्लैकमेलिंग करने लगा। एक लेखक से मैंने कह दिया कि नया वर्ष तुम्हारे लिए सुखदायी हो तो वह लिखना छोड़कर रेडियो पर नौकर हो गया। एक पहलवान से मैंने कह दिया कि बहादुर तुम्हारा नया साल सुखमय हो तो वह जुए का फड़ चलाने लगा। एक अध्यापक को मैंने शुभकामना दी तो वह पैसे लेकर लड़कों को पास कराने लगा। एक नवयुवती के लिए सुख कामना की तो वह अपने प्रेमी के साथ भाग गई। एक एम.एल.ए. के लिए मैंने शुभकामना व्यक्त कर दी तो वह पुलिस से मिलकर घूस खाने लगा।
साधो, मुझे तुम्हें नए वर्ष की शुभकामना देने में इसीलिए डर लगता है। एक तो ईमानदार आदमी को सुख देना किसी के वश की बात नहीं हैं। ईश्वर तक के नहीं। मेरे कह देने से कुछ नहीं होगा। अगर मेरी शुभकामना सही होना ही है, तो तुम साधुपन छोड़कर न जाने क्या-क्या करने लगेंगे। तुम गाँजा-शराब का चोर-व्यापार करने लगोगे। आश्रम में गाँजा पिलाओगे और जुआ खिलाओगे। लड़कियाँ भगाकर बेचोगे। तुम चोरी करने लगोगे। तुम कोई संस्था खोलकर चंदा खाने लगोगे। साधो, सीधे रास्ते से इस व्यवस्था में कोई सुखी नहीं होता। तुम टेढ़े रास्ते अपनाकर सुखी होने लगोगे। साधो, इसी डर से मैं तुम्हें नए वर्ष के लिए कोई शुभकामना नहीं देता। कहीं तुम सुखी होने की कोशिश मत करने लगना।

Saturday, 21 December 2013

नया साल

अमृत राय

कहने की जरूरत नहीं। नया साल मुबारक, पुराने का मुँह काला। यही दुनिया का कायदा है। और कैसे न हो। जरा मिलाकर देखो दोनों को। यह देखो नया साल, गुलाबी-गुलाबी, और वह रहा तुम्हारा पुराना साल, चीकट, मटमैला।
नया साल झबरे-झबरे बालों वाला ऊँची नसल का नन्हा-मुन्ना प्यारा-सा प
पी है जिसे बरबस, गोद में उठा लेने को जी चाहता है, ऊन के गोले जैसा गरम, गुदगुदा। और वह पुराना साल खुजली का मारा, लीबर बहाता, मरियल, बूढ़ा, लावारिस कुत्ता जो हर घर से दुरदुराया जाता है। नया साल हरी-भरी दूब की वीथी है जिस पर अगल-बगल, रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों की लताओं ने मंडप-सा तान रखा है, और पुराना साल कीचड़ और काई से ढँका हुआ वह ऊबड़-खाबड़ कंकरीला रास्ता जिसे अब पीछे मुड़कर ताकते डर लगता है। नया साल एक अनजाने सुख की सिहरन है, पुराना साल भोगे हुए कष्टों की एक कड़ी। कितना बुरा था पुराना साल। ढंग का खाना न ढंग का कपड़ा। कीमतें आसमान से बात करती हुई। रहने को मकान नहीं, दस-दस कुनबे बेशर्मी की चादर ओढ़कर एक जरा-सी कोठरी में जिंदगी के दिन गुजार रहे हैं। क्या था पुराने साल में जिसे चाव से कोई याद करे। अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ, उसकी अरथी निकल गई। कोई उसके लिए दो आँसू गिरानेवाला नहीं है।
आज नये साल की शाम है। अब तो हम नये साल की पौ फटते देखेंगे - बड़े हुलास से आगे बढ़कर उसका स्वागत करेंगे और किसी बहुत मनभाते मेहमान की तरह आँखों में आँखें डालकर, प्यार से हाथ पकड़कर उसे कमरे के भीतर ले आएँगे जहाँ इतने सारे लोग उसकी अगवानी में आँखें बिछाए बैठे हैं। और आँखें ही नहीं, दस्तरखान भी, जिस पर, साथ बैठकर पीने के लिए एक से एक नायाब शराबें चुनीं हुई हैं और एक से एक सुस्वादु मेवों से भरपूर केक और पेस्ट्रियाँ।
कमरा रंग-बिरंगे कागज की बंदनवारों और नये साल की हमारी रंग-बिरंगी आकांक्षाओं और संकल्पों के जैसे रंग-बिरंगी गुब्बारों से सजाया गया है। रेडियो पर बहुत अच्छा पाश्चात्य संगीत आ रहा है। हम गलबहियाँ डाले नाचेंगे-गाएँगे, धूम मचाएँगे - कुछ होश में और बहुत कुछ मदहोश, अलमस्त। नये साल का जनम हो रहा है।
नया साल वह फीनिक्स पक्षी है जो हर साल पुराने की खाक पर नया जनम लेता है। उसके माँ-बाप की फैमिली प्लैनिंग इतनी पक्की है कि हमें ठीक-ठीक पता रहता है कि कब, किस रोज और किस घड़ी में उसका जनम होगा। जभी तो दुनिया भर के करोड़ों लोग उत्सव के सब साज-सामान से लैस उसको हाथों-हाथ लेने के लिए बैठते हैं। सोना गुनाह है उस वक्त। सोते में जो कभी नया साल आ गया तो समझो तुम्हारी तकदीर भी सो गई पूरे एक साल के लिए, किस तरह फिर इस दलिद्दर से तुम्हारा छुटकारा नहीं।
इसलिए तो कोई सोता नहीं। देखिए कुछ को कैसे नींद के झोंके आ रहे हैं, आँखें डूबी जा रही हैं, मुँह फाड़-फाड़कर जम्हाइयाँ ले रहे हैं, लेकिन मजाल है कि सो जाएँ। सिगरेट और कॉफी से, व्हिस्की की चुस्की से, ब्रिज और रमी से, इसके-उसके स्कैंडल की मनमोहक चर्चा से और घिसे-पिटे चुटकुलों पर चौगुने जोर से हँस-हँसकर नींद को भगाया जा रहा है। ज्यों-ज्यों घड़ी का काँटा आधी रात यानी ग्यारह बजकर साठ मिनट की तरफ बढ़ रहा है। त्यों-त्यों नाच और गाने की लय तेजतर होती जा रही है।
और लो, यहाँ-वहाँ सब तरफ बारह के घंटे बजने लगे। नये साल का जनम हो गया। देखो-देखो कैसा प्यारा-सा बच्चा है, मक्खन जैसे हाथ-पाँव, गुलाब की पंखुरियों जैसे होंठ, कैसी अजनबी-सी भोली-भाली आँखें, किसी मीठे नश्तर की तरह उतरा जाता है दिल में। दुनिया की सर्दी-गर्मी का अभी उसे कुछ पता नहीं, अभी तो उसकी आँखों में वही हरम का बाग झूल रहा है, नंदनकानन, जहाँ आम की बौर से लदी हुई बेसुध अमराइयों में बारहोमास कोयल बोलती है। देखने वाले की आँखें जुड़ाती है।
पर मैं अपनी उल्टी तबीयत को क्या करूँ, मैं तो उस गरीब भिखमंगे की बात सोच रहा हूँ जिसे हमने अभी-अभी बगैर कफन के दफनाया है, जो अभी-अभी बुझे हुए कोयले की तरह, चूसी हुई गंडेरी की तरह, दूर उस कोने में फेंक दिया गया है, उस तह-पर-तह राख की ढेरी पर जिसका नाम समय है।
घूमने दो समय का पहिया, तुम्हारा, आज का यह नया चहेता भी वहीं पहुँचेगा, मुर्दा बरसों के उसी कब्रिस्तान में। सोचो तो कितने कृतघ्न हैं हम - एक दिन जिसको सिर माथे पर लिए फिरे, काम निकल जाने पर उसी को गर्दनियाकर बाहर कर दिया। मिल तो गया जो कुछ मिलता था, अब काहे की ठकुरसुहाती! ठकुरसुहाती हमेशा उगते सूरज की होती है, ढलता सूरज तो ढलता सूरज है।
रूप-रस-गंध का कितना कुछ दिया उसने। उसी सेतु पर होकर तुम यहाँ तक आए, अपने को तिरोहित करके उसने इस नये वर्ष को तुम्हारे लिए संभव बनाया, पकाया, तुम्हें प्रौढ़ता दो एक वर्ष के जीवन-अनुभव से, उसकी इतनी अवमानना क्यों इस अंत समय? कल जो मेहमान आ रहा है उसके स्वागत-सत्कार के लिए क्या यह जरूरी है कि घर के बड़े-बूढ़े को धकियाकर कहीं से सबसे अलग एक भूसे की कोठरी में बंद कर दिया जाए। एक अजनबी के वास्ते (भले ही वह जरी और कमखाब पहनकर आया हो) एक पुराने दोस्त की तरफ से यह बेरुखी (सिर्फ इसलिए कि उसके कपड़े मैले हैं) - यह कहाँ का इन्साफ या कहाँ की समझदारी है? अभी तो सामान भी नहीं खुला तुम्हारे इस नये दोस्त का, क्या पता उसके अंदर क्या है तब फिर काहे को उसे इतना सिर चढ़ाते हो? जो कहीं धोखा दिया उसने, तब? थोड़ा शंकित रहना ही अच्छा है ऐसे अजनबी से। बहुत-बहुत जरूरी है यह हाथ भर की दूरी। हमारे घर आए हो, अच्छी बात है। हम तुम्हारे साथ भलमंसी से पेश आएँगे, अपने बराबर में कुर्सी पर बिठाएँगे, नाम-गाम पूछेंगे, पूछेंगे कौन ठाकुर हो, किधर गाँव में तुम्हारे घर है, ओले-पाले सूखे बूढ़े की बातें करेंगे, तश्तरी में रखकर पान-सुपारी भी पेश करेंगे, मगर बस पान-सुपारी, दिल नहीं अपना। इतना संयम जरूरी है। समझदारी इसी में है।
होगी जहाँ होगी। आदमी में तो नहीं है। वहीं पर तो असल पेंच है। किसी घोंघाबसंत ने कहीं पर लिखा है कि आदमी सबसे समझदार जानवर है। बिल्कुल गलत बात है। पढ़ा-लिखा होगा, ज्ञानी होगा, समझदार नहीं है। दूसरे तमाम जानवर, यानी कि कीड़े-मकोड़े तक, उससे ज्यादा समझदार होते हैं। कभी अपने किसी शिकारी दोस्त से पूछिएगा, शेर कब और क्यों आदमखोर हो जाता है। इसलिए कि आदमी सबसे आसान चारा है। इसलिए कि अपनी उस घायल या टूटी हुई हालत में वह दूसरे किसी जानवर का शिकार नहीं कर सकता, सब आदमी से ज्यादा चौकन्ने होते हैं और खटका पाते ही भाग निकलते हैं। असल नासमझ, भुग्गा, गावदुम आदमी है।
छोड़िए जंगल की दुनिया को, अपनी रोज की दुनिया में आइए। कुत्ता, बिल्ली, बंदर, चील, कौआ, गिलहरी, साही, गौरेया खटमल, मक्खी, मच्छर- आप मार सकते हैं इसमें से एक को भी? कुत्ता जब देखो चौके में घुसा रहता है। बिल्ली रोज दूध पी जाती है। बंदर आए दिन कपड़े चींथता है। चील हाथ से जलेबी का दोना झपट ले जाती है। कौए को और कुछ नहीं मिलता तो आटे की लोई ही ले उड़ता है। गिलहरी एक अमरूद नहीं बचने देती और न एक दाना मटर का। साही आलुओं का प्रेमी है, एक-एक को खोद कर चाट जाता है। गौरेया, नन्ही-सी जान मगर वह भी ऐसा ऊधम जोते रहती है कि अनाज को धूप दिखाना मुहाल है। क्या-क्या उपाय न किए होंगे इनको पकड़ने के, मगर सब बेकार। बंदरों से और कोई उपाय न चला (उन तक पहुँच सके ऐसा जादुई डंडा अब तक तो ईजाद हुआ नहीं।) तो सोचा पत्थर मारो। सो बंदरों का तो बाल भी बाँका न हुआ, घर के बस शीशे फूट गए। इधर कुछ महीनों से एक काना कुत्ता बहुत लहटा हुआ है। सब सब करके हार गए मगर वह अपनी आदत नहीं छोडता। एक दिन मैंने अपने को बहुत लज्जित किया, ललकारा और एक मोटा-सा चैला लेकर घात में बैठ गया, आज इसी से बच्चू कि टँगड़ी न तोड़ो तो मेरा नाम नहीं। कनवा आया और अपने समय से ही आया, और ऐसा तककर चैला फेंका कि आज दिन से हमारा बुड्ढा जमादार लल्लू अपनी टँगड़ी लिए घर बैठा है और हम अपने हाथों गुसलखाना भी पोंछ रहे हैं।
हमारे एक बड़े भाई साहब शिकारी हैं। साहियों का उत्पात देखकर (आलू का आधा खेत खोद डाला कमबख्तों ने) उनको हम पर बड़ी दया आई और उन्होंने हमको इस संकट से उबारने का बीड़ा उठाया। दिन भर दो आदमी लगे रहे। खेत के आसपास बड़ी-सी एक खाई खोदी गई, और रात को भाई साहब घर भर में अँधेरा करके टार्च-बंदूक लेकर साही का शिकार करने बैठे। परम आश्वस्त कि साही के पाप का घड़ा भर गया और अब उसके विनाश की घड़ी आ गई, हम सब सोते चले गए। सबेरे जैसे ही आँख खुली हम लोग साही का मातम करने खाई की ओर भागे - और क्या देखा कि भाई साहब कीचड़ में सने कराहते बेदम पड़े थे। वह पूछना भी ठीक नहीं लगा कि यह सब क्या हुआ और साही कहाँ गई, लाद-फाँदकर उनको घर में लाए और हफ्तों उनकी सेंक-बाँध चलती रही। तब से मुझको बराबर लगता रहा है कि हो न हो जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है - वाली कहावत जरूर किसी साही की बनाई हुई है, यानी कि अगर कोई साही भी लिख-पढ़ सकता है।
अब कहिए, अलापेंगे आदमी की समझदारी का राग? मगर नहीं, देखता हूँ कि अब भी आपकी आँखों में थोड़ी-सी विश्वास की चमक बाकी है। चलिए, छोड़िए इन घरेलू जानवरों को, कीडों-मकोडों पर आइए। खटमल को क्या कहिएगा जो करोड़ आदमियों की नींद हराम किए हुए है, जैसी कि हिटलर ने भी क्या की होगी, मगर मारने चलिए तो हाथ नहीं आता, देखते-देखते नजर से ओझल हो जाता है कि जैसे कोई सिद्धि हो उसके पास, और जो आपने कभी भूले से उसको पा भी लिया और पनही जमा भी दी तो सौ में निन्यानबे बार मरता नहीं, बस, नाटक किए प्राणायाम साधे पड़ा रहता है और आप जरा-सा अनुचित्ते हुए कि वह आपको साफ बुत्ता देकर अपनी राह लगा!
और मच्छर? उसका तो कुछ कहना ही नहीं। एक भी जो घुस पाया मच्छरदानी में तो समझिए कि भोर हो गई। सारी रात आप उठकर बैठेंगे, कभी दियासलाई और कभी चोरबत्ती जलाएँगे, रातभर फटाफट की आवाजें आएँगी मगर मच्छर एक भी हाथ न आएगा। पूरा छापेमार है वह, कि जैसे कहीं से ट्रेनिंग लेकर आया हो, और वह भी अभिमन्यु जैसी कच्ची अधूरी ट्रेनिंग नहीं कि आप दुश्मन के चक्रव्यूह में घुस गए मगर निकलने का ढंग नहीं आता। मच्छर माँ के पेट में पूरी ट्रेनिंग लेकर आता है। आप सात नहीं सत्तर महारथी खड़े कर दीजिए, मच्छर को आप मनमानी करने से नहीं रोक सकते। जहाँ चाहेगा जाएगा, जो चाहेगा करेगा, और शत्रुसेना को ध्वस्त और विपर्यस्त करके जब जिधर निकलना चाहेगा निकल जाएगा। आप एक बार हवा को भी रोक सकते हो, मच्छर को नहीं रोक सकते। यह आकस्मिक बात नहीं है कि हमारी भाषा में मच्छर की तुक का एक और शब्द मिलता है अच्छर जिसको हमारे यहाँ ब्रह्म कहा गया है। वैसी ही अनंत उसकी महिमा है। घर की जाने कितनी जली हुई मच्छरदानियाँ उसके अदम्य शौर्य की कहानी कह रही है - और अंत उस नैश - महाभारत का सदा यही हुआ है कि मैं हारकर, मच्छरदानी के भीतर चादर मुँह से ओढ़कर सो गया हूँ, जितना उस परमप्रतापी मच्छर से बचने के लिए उतना ही अपने मुँह की शर्म छिपाने के लिए। जभी तो मैं कहता हूँ, और कुछ झूठ नहीं कहता, खुद अपने मन को टटोलकर देखिए, समझदारी में आदमी मच्छर के संग तो क्या, पासंग में भी नहीं बैठता।
रही मक्खी सो उसको तो आदमी की नाक से खास मुहब्बत है। सारी दुनिया छोड़कर वह जब बैठेगी तब आदमी की नाक पर - शायद उसके दर्प को चूर्ण करने के लिए ही, क्योंकि आदमी को सबसे ज्यादा घमंड अपनी नाक का ही होता है, कोई बात मन के खिलाफ हुई नहीं कि उसकी नाक सबसे पहले कटती है। लिहाजा मक्खी जब बैठेगी तब ताककर वहीं उसकी उसी नाक पर। अपने हाथ मारा, उड़ गई। आप कुछ करने लगे, फिर आ बैठी। आपने फिर हाथ मारा, फिर उड़ गई। आप फिर कुछ करने लगे, वह फिर आ बैठी। यही मक्खी का ढंग है, जैसा कि एक सच्चे ग्रही का होना चाहिए। हिंसा का लेश नहीं उसमें, न काटे और न डंक मारे। बस आकर बैठ जाती है इस पर भी अगर किसी को आपत्ति हो तो यह उसका अन्याय है। अच्छी धाँधली है, दो घड़ी किसी को बैठने भी न देंगे। क्या लेती हूँ किसी का, चुपचाप बैठी ही तो रहती हूँ। उसमें भी आपकी नाक कटी जाती है तो फिर ठीक है, हो जाए एक बार निपटारा कि यह खेत किसका है।
और बिगुल बज गया। लड़ाई शुरू हो गई। अब आप हैं कि हाथ चलाए जा रहे हैं, पैर पटके जा रहे हैं, सर झटके जा रहे हैं मगर मक्खी है कि आपको दम नहीं लेने देती। फिर आप पनचक्की की तरह दोनों हाथ फटकारने लगते हैं, और मक्खी बदस्तूर अपना काम किए जाती है। यहाँ तक कि अब आपके दिमाग की नसें फटने लगी हैं, आप पागल हुए जा रहे हैं, आपको लग रहा है कि इस जीने से तो मर जाना अच्छा है, और आप छुरी उठा लेते हैं कि उस नाक का ही सफाया कर दें, मगर फिर कुछ सोचकर आप रुक जाते हैं और भाग निकलते हैं, और मक्खी इतने पर भी आपका पीछा नहीं छोड़ती। आखिरकार मैदान उसी के हाथ रहता है। मानवजाति के सारे इतिहास में आज तक आदमी-मक्खी संग्राम में कभी आदमी की जीत नहीं हुई। जो लोग निठल्लेबाजी को मक्खी मारना कहते हैं उन्होंने शायद कभी मक्खी मारी नहीं वर्ना ऐसी निठल्लेबाजी की बात न करते। मक्खी मारने से बढ़कर पौरुष या पराक्रम दूसरा नहीं है।
सौ बात की एक बात, आदमी से बढ़कर लाचार और नासमझ जानवर सारी सृष्टि में दूसरा नहीं है, और यह भी उसकी नासमझी का ही एक प्रमाण है कि वह अपने एक पुराने दोस्त को धता बताकर एक अज्ञातकुलशील अजनबी के गले में इस तरह बाँह डालकर पागलों जैसा नाचता फिरता है। साल बीतते न बीतते उसे अपने भूल का पता चलने लगता है लेकिन तब तक एक और नया साल उधर चौखट पर खड़ा होता है।
मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि आदमी वर्तमान में जीता है। काश कि ऐसा होता। मगर कहाँ? सच तो यह है कि आदमी कभी वर्तमान में नहीं जीता, जो कुछ जीता-मरता है सब भविष्य में। इसलिए तो सब उसे वर्तमान संवत्सर की बिदाई का सहृदय आयोजन करना चाहिए तब वह एक अजन्मे और तुरंत के जन्मे शिशु के स्वागत में इस तरह मतवाला होकर पिपिहरी बजाता घूमता है और सो भी आज के इस जमाने में जबकि सब जानते हैं कि हर नया बच्चा मुसीबतों की एक नयी गठरी लेकर घर में आता है।

Wednesday, 18 December 2013

कोई एक घर टूटने के बहाने......

जयप्रकाश त्रिपाठी

बशीर बद्र को सुन रहा था कि 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'। बस, ये ही पांच-सात शब्द मन में अटक गए। आगे की 'घर जलाने' वाली पंक्ति भूल कर मन इसी पेंच में कस गया कि कोई कैसे घर बनाता है, घर क्या सिर्फ दो-चार चुनिंदा दीवारों का नाम होता है, जब हम शहर बदलते हैं, नये ठिकाने पर होते हैं, पुराना ठिकाना छोड़ चुके होते हैं, शहर के किस्सी भी हिस्से में घूम-फिर कर मन वहीं क्यों लौट-लौट जाता है, अपने घरौंदे के बाहर का सब कुछ अजनबी या पराया क्यों बना रह जाता है?

जैसेकि हम पहले से इतने टूटे हुए, बिखरे हुए, अपने में सिमटे-दुबके हुए रहने के आदती हो चुके होते हैं कि चौखट के बाहर का कुछ भी चौखट के भीतर जैसा नहीं लग पाता है। हमारे एहसास में तब खलल पड़ता है, जब चौखट के भीतर कुछ टूटता है, जरा-सा भी। बाहर जितना भी ज्यादा टूट-फूट रहा हो, अंदर के तर्क ओढ़ कर हमारा मन उस कोलाहल से आगे भाग लेता है.......

इसलिए मुझे बशीर बद्र की पंक्ति  'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'...सिर्फ 'मकान' के सेंस में नहीं लगती, उसके ढेर सारे अर्थ खुलने लगते हैं मेरे अंदर। अतीत में कितना-कुछ टूटता-बिखरता गया, वे कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे तोड़ा-बिखेरा, बार-बार मैं खुद भी क्यों टूट जाया किया, क्या जाने-अनजाने मुझसे भी कहीं कुछ किसी के हिस्से का टूट-फूट गया.....

और आज भी अक्सर टूट लेता हूं अपने मन की दीवारों के अंदर, क्यों? कैसे-कैसे बिखर लेता हूं अनायास....कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वह मेरे बारे में वैसा क्यों सोचता है, मेरे मन की दीवारों के अंदर अब कहकहे क्यों नहीं गूंजते, टूट गईं क्या ये दीवारें, उन विचारों के बवंडर क्यों नहीं उमड़ते, जिनमें समाया हुआ कभी हवा के संग संग दूर-दूर तक उड़ता चला जाता था, किताबें होती थीं, अलग-अलग जिंदगियों की मेले होते थे, यात्राओं और शब्दों की जादूगरी में किसी के भी पीछे ये घर अपनी जड़ें पीछे छोड़ कर भागने लगता था !

 ये घर अब इतने सन्नाटे में क्यों है, चौखट के बाहर का सब कुछ फिर से इतना अजनबी क्यों हो लिया, किसने तोड़ दिया है इन दीवारों को, इन जैसे ढेर सारे सवालों के सिरे से जब भी मैं 'घर' को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश करता हूं, बाहर का सब टूटा-फूटा नजर आता है, जो छतें सही-सलामत दिख-जान पड़ती है, घूर-खंगाल कर उससे में प्रायः उदास हो लेता हूं.... जब उधर से भी उन्मुक्त हंसी कीबरसातें नहीं हुआ करतीं, न गीतों में कोई निराला या आवारा मसीहा आश्वस्त कर रहा होता है....

शायद टूटने का अर्थ छूटना भी होता होगा.....