Friday, 6 December 2013

इस्लाम अक्सर खतरे में क्यों!


विभूति नारायण राय

भारत के संदर्भ में जब सांप्रदायिकता, कठमुल्लापन या साम्प्रदायिक फासीवाद की बात होती है तब अक्सर हमारे निशाने पर सिर्फ हिंदू सांप्रदायिकता होती है. खासतौर से मार्क्सवादी विमर्श के दौरान ,अक्सर मुस्लिम सांप्रदायिकता को भुला दिया जाता है या फिर उसे कम करके आँका जाता है .राजेन्द्र जी अक्सर दलित ,पिछडा या स्त्री विमर्श के दौरान हिन्दू मिथकों , वर्ण व्यवस्था और हिन्दू समाज की आंतरिक संरचना की कुरूपताओं पर हमला करतें रहतें हैं .उनसे शायद यह उम्मीद की जा रही थी कि वे इस्लामी कट्टरता पर हमला करके अपने को हिन्दुत्ववादियों के पाले में पाए जाने का जोखिम न लेना चाहें , इसलिए उनके इस संपादकीय से कुछ लोगों को आश्चर्य या निराशा हुई ,पर मुझे लगता है कि इस संपादकीय में बहुत से ऐसे मुद्दे उठाये गयें हैं जो गंभीर विमर्श की मांग करतें हैं .
इस्लाम को लेकर मेरे मन में जो शंकाएं हैं उन पर आने के पहले एक बात साफ कर ली जाये . यह सही है कि जब हम सांप्रदायिकता पर हमला बोलें तो हमें हिंदू और मुस्लिम दोनों सांप्रदायिकताओं को निशाना बनाना चाहिये , लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिये कि भारत के संदर्भ मे हिंदू सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है .हिंदू सांप्रदायिकता बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता है .वह राज्य की मशीनरी पर कब्जा कर सकती है और फासिज्म की तरफ हमें ढकेल सकती है.हाल में गुजरात में एक प्रयोग हुआ ही है , हिंदुत्व की शक्तियाँ पूरे देश में इस प्रयोग को दोहराने की धमकी दे रहीं हैं. इसके बरखिलाफ मुस्लिम कठमुल्लापन काफी आत्मघाती है.यह अपने समुदाय को ही अधिक नुकसान पहुँचाता है .इसकी मारक शक्ति अपने अनुयायियों को पिछडेपन और जहालत की भूल- भुलैया में ढकेल देती है तथा हिंदू सांप्रदायिकता को फलने फूलने के लिए यह खाद का काम करती है .
इस्लाम दुनियाँ के दूसरे धर्मो से कई अर्थों में भिन्न है .अकेला धर्म है जो उम्मा की बात करता है .इसका मतलब है यह राष्ट्र राज्यों की सीमाओं को नकारते हुए एक अतर्राष्ट्रीय इस्लामी विरादरी की कल्पना करता है .दार्शनिक धरातल पर ही सही पर इस्लाम दुनिया को दो भागों में विभक्त करता है . इस्लाम पर यकीन रखने वालों और इस्लाम पर यकीन न रखने वालों की है. ऌस्लाम पर यकीन रखने वाले एक कौम है यह हास्यास्पद विश्वास विश्व इतिहास में हर युग और हर भूखण्ड में गलत साबित हुआ है.भाषा ,खानदान,परंपरा,भूगोल,अर्थशास्त्र-बहुत सारे कारण हैं जिन्होंने मुसलमानों को भी उसी तरह बाँट रखा है जिस तरह ईसाइयों ,बौद्धों , हिंदुओं या यहूदियों को अलग- अलग राष्ट्र राज्यों में विभक्त कर रखा है. मुस्लिम शासक और साधारण जन भी उसी तरह आपस में लडतें रहतें आयें हैं जिस तरह दूसरे धर्मो को मानने वाले शासक और सामान्य जन,पर दर्शन के रूप में इस्लाम के जनम के बाद से ही यह विचार कि मुसलमान एक अलग राष्ट्र है हमेशा मुस्लिम उम्मा को उद्वेलित करता रहा है .यह बात अलग है कि कभी कम,कभी ज्यादा.भारत के संदर्भ में यह याद रखना चाहिये कि पाकिस्तान तभी बन पाया जब पृथकतावादी मुस्लिम नेतृत्व मुसलमानों की बडी संख्या को यह विश्वास दिलाने मे सफल हो गया कि मुसलमान एक अलग राष्ट्र है और वे हिंदू राष्ट्र के साथ नहीं रह सकते.यह बात अलग है कि केवल इस्लाम एक अलग राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता था और बंगाली राष्ट्रीयता,पंजाबी या बलूचिस्तानी राष्ट्रीयताओं के साथ ज्यादा दिन न्हीं चल सकी और इस्लामी राष्ट्रीयता के नाम पर बना देश 25 वर्षों में ही टूट गया.जो हिस्सा पाकिस्तान के नाम पर बचा भी है उसमें मुस्लिम राष्ट्रीयता से अधिक पंजाबी राष्ट्रीयता है .
इस्लामी उम्मा की इस चाह ने ही दुनियाँ भर के मुस्लिम राष्ट्रों को धर्म के नाम पर एक संगठन बनाने के लिये प्रेरित किया है .आर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्रीज या ओ. आई. सी. संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद सबसे अधिक देशों की सदस्यता वाला संघटन है. विश्व के दूसरे बडे धर्मो ने क्यों नहीं उन देशों का संगठन बनाने का प्रयास किया जहाँ उनके मानने वाले बहुमत में थे ? ईसाई, हिंदू, या बौद्ध ऐसे अन्य धमे हैं जिनके अनुयायी एक से अधिक देशों में रहतें हैं पर हम कभी ऐसा गंभीर प्रयास नहीं पाते जिसके द्वारा ईसाई राष्ट्र या बौद्ध राष्ट्रों का संगठनबनाने का सपना देखा गया हो .यहां यह भी ध्यान रखना चाहिये कि ओ• आई• सी. में केवल अनुदार या धर्मान्ध मुस्लिम राष्ट्र ही नहीं शरीक हैं बल्कि बहुत से उदार ,प्रगतिशील राष्ट्र और आधुनिक जीवन दृष्टि में विश्वास रखने वाले मुस्लिम राष्ट्र भी उसके सदस्य हैं.सउदी अरब ,कुवैत,नाइजीरिया और सूडान के बगल में जब हम तुर्की मलेशिया और मिश्र को बैठे पातें हैं तब हमें उस तर्क को समझने में आसानी होती है जो उम्मा के दर्शन के रूप में इस्लाम के अवचेतन का अभिन्न अम्ग है.यही कारण है कि सैय्यद शहाबुद्दीन जब मुसलमानों की जिंदगी को लेकर एक पत्रिका निकालने की सोचतें हैं तो उनके दिमाग में मुस्लिम इंडिया नाम आता है,इंडियन मुस्लिम नहीं.यह स्वाभाविक है कि क्योंकि वे मुसलमान इंडियन हैं यह प्रसंगवश है, उनकी असली पहचान मुस्लिम है जो उन्हें मुस्लिम उम्मा का अंग बनाती है .अफगानिस्तान या ईराक में अमेरिकी ज्यादतियों की प्रतिकि्र्रया विश्व में दो तरह से होती है.विरोध का एक स्वर साम्राज्यवाद विरोधी मनुष्यता का होता है जो हमलावरों और पीडितों के धर्म की परवाह किये बिना अमरीकी बमबारी की भर्त्सना करता है.इसमें ईसाई,हिंदू, बौद्ध,यहूदी और उदार मुसलमान सभी होतें हैं पर विरोध का दूसरा स्वर सिर्फ इसलिए सुनाई देता है क्योंकि पीडित मुसलमान है,भले ही हमले के पीछे कोई ईसाई चिन्ता न हो.अगर पीडित गैर मुस्लिम दुनियाँ हो तो यह स्वर गायब हो जाता है. यह स्वर धर्मांन्ध मुस्लिम उम्मा का है.चेचन्या ,कश्मीर,हर्जेगोविना,अफगानिस्तान,ईराक हर जगह इसे ऐसा लगता है कि पीडितों के साथ ज्यादतियाँ सिर्फ इसलिए हो रहीं हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं .दुर्भाग्य से मुस्लिम विश्व में यह स्वर ज्यादा जोर से सुनाई देता है. इस्लाम अक्सर खतरे में रहता है.दुनियाँ में कोई दूसरा धर्म इतनी आसानी से खतरे में नहीं पडता. यह स्थिति शायद इसलिए है कि इस्लाम में आंतरिक लोकतंत्र सबसे कम है.कोई भी दूसरा धर्म अपने बेसिक्स या बुनियादी आस्थाओं को इतनी मजबूती से अपने सीने से नहीं चिपकाए रहता है कि उनके बारे में बहस मुबाहिसे के लिए तैयार ही नहीं हो .अल्लाह एक है,मोहम्मद उसके पैगम्बर हैं औरआखिरी पैगम्बर हैं तथा कुरान उनके ऊपर नाजिल हुई ईश्वरीय किताब है _ये कुछ ऐसे बुनियादी आस्थाएं हैं जिनके बारे में इस्लाम किसी बहस के लिए तैयार नहीं है .इनमें से किसी एक के बारे में कोई शंका होते ही इस्लाम खतरे में पडने लगता है.दूसरे धर्मो की भी बुनियादी आस्थाएँ हो सकतीं हैं पर वे उन पर बौद्धिक विमर्श से डरते नहीं .पोप औरचर्च की लाख कोशिश के बावजूद डारविन को बडे र्ऌसाई समाज ने मान्यता दी और आज भी ईसाई घरों मे पैदा होने वाले ही बाइबिल और ईसा से जुडी पुराण कथाओं की पुनर्व्याख्याओं में लगे हुए हैं .डरा हुआ समुदाय ही वैचारिक मुठभेडों से बचने की कोशिश करता है.तर्क की अनुपस्थिति से आप तर्कातीत बन जातें हैं.इसे समझने के लिये भारत के संदर्भ में ब्राह्यणों के प्रयास का अध्ययन दिलचस्प होगा.इस्लाम का भारत में आगमन बुद्ध के बाद पहली बडी सामाजिक परिघटना थी जिसने समानता और बन्धुत्व की ताजी बयार भारतीय समाज में बहाई थी .ब्राह्यण किसी भी तर्क से वर्ण व्यवस्था या कर्मकांडों को सही नहीं ठहरा सकते थे इसलिए उन्होंने इस्लाम के साथ हमेशा वैचारिक मुठभेडों से बचने की कोशिश की.उन्होंने मुसलमानों को म्लेच्छ घोषित कर दिया जिनसे विमर्श तो दूर उनको छूने मात्र से धर्म भ्रष्ट और अशुद्ध होने का खतरा था .यही प्रयास अट्ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में समुद्र यात्राओं के संदर्भ में भी हुआ . ब्राह्यण जानता था कि यदि दुनियाँ के किसी दूसरे हिस्से में जाकर यह कहेगा कि वह श्रेष्ठ है क्योंकि वह ब्राह्यण परिवार में पैदा हुआ है तो लोग उसे किसी अजूबे की तरह कौतूहल से देखेंगे इसलिये उसने ज्यादा आसान रास्ते की तरह यह प्रयास किया कि देशवासी समुद्र पार ही न करें.इस तरह तर्क के अभाव को तर्कातीत बना कर पूरा करने का प्रयास किया गया.इस्लाम में शुरूआती चार खलीफाओं के बाद भिन्न आस्थाओं से मुठभेड से बचने की प्रवृति अधिक रही है .शायद यही कारण है कि इस्लाम इतना छुई- मुई है और जरा सी चुनौती से वह खतरे में पड ज़ाता है .
यह भी बिना किसी कारण नहीं है कि धर्मयुद्ध का आह्वान हमारे समय में सिर्फ मुसलमानों की तरफ से उठता है. यह कहा जा सकता है कि विश्व के मुसलमानों की बहुत छोटी संख्या ही जेहाद जैसी अव्यवहारिक कल्पना लोक में जीती है और जेहाद को भी नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की जाती है.कई मुस्लिम विद्वान यह मानतें हैं कि जेहाद का संबंध बाहरी भौतिक जगत से नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धि और बुराइयों पर विजय से है.पर इन सबके बावजूद यह एक तथ्य है कि जेहाद का सबसे अधिक समझा जाने वाला अर्थ मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए गैर-इस्लामी हुकूमतों को उखाड फ़ेंकने और अल्लाह की हुकूमत कायम करने का प्रयास ही है.यही अर्थ है जो चेचन्या से अफगानिस्तान और फिलिस्तीन से काश्मीर तक दुनियाँ भर के मुसलमान जेहादियों को आकर्षित करता है.हमें नहीं भूलना चाहिए कि बुश ने अफगानिस्तान पर हमले से पहले कुछ ईसाई प्रतीकों का सहारा लेने की कोशिश की थी.आपरेशन इनफाइनाइट जस्टिस का नाम बदलने पर बुश को अमरिकी जनता की विपरीत प्रतिक्रिया ने ही मजबूर किया था.बुश चाहता भी तो अमेरिकी अभियान को क्रूसेड में तब्दील नहीं कर सकता था.बुश तो क्या अब कोई ईसाई नेता अब क्रूसेड की बात नहीं कर सकता.पर मुसलिम उलेमा ,राजनेताओं और सामान्यजन के लिए जेहाद अभी भी एक हासिल किया जा सकने वाला सपना है और अभी भी एक ऐसी इच्छा है जिसके लिए हर साल हजारों लाखों मुसलमान अपनी जान दे देतें हैं.
मैं अपनी बात इस तथ्य की तरफ आकर्षित कर समाप्त करूंगा कि धर्मनिरपेक्षता की लडाई नीति के आधार पर नहीं विश्वास के आधार पर लडी ज़ानी चाहिए.यह दुनियाँ भर के मुसलमानों की समस्या है कि वे जब अल्पसंख्यक होतें हैं तब धर्म के सबसे बडे अलमबरदार होतें हैं लेकिन जैसे ही किसी खित्ते में बहुसंख्यक हो जातें हैं इस्लामी हुकूमत कायम करना उनकी प्राथमिकता हो जाती है.वे अपनी हुकूमतों में अल्पसंख्यकों को वही सारे अधिकार नहीं देना चाहते जो अल्पसंख्यक के रूप में खुद के लिए चाहतें हैं .तुर्की , मिस्र या इंडोनेशिया जैसे समाज कुछ अपवाद जरूर हैं लेकिन वहाँ भी इस्लामी कट्टरपंथियों का प्रयास यही है कि वे राज्य मशीनरी पर कब्जा करके सरकारों को इस्लामी शरिआ की अपनी समझ के अनुसार चलने पर मजबूर कर सके .हमारे देश के संदर्भ में यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण है .यह एक खुला सच है कि भारत में हिंदू और मुस्लिम कट्टरता एक दूसरे के लिए खाद और पानी का काम करतें हैं.दोनों एक दूसरे को फलने फूलने में मदद करतीं हैं.मैंने शुरू में ही इस तथ्य को रेखांकित किया था कि हिंदू सांप्रदायिकता भारत के संदर्भ में ज्यादा खतरनाक है क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता में यह सामर्थ्य है कि वह राज्य की मशीनरी पर कब्जा कर सकती है .एक फासिस्ट हिंदू राज्य बनने से भारत को बचाने के लिए आवश्यक है कि दोनो समुदायों की सांप्रदायिकता से समान रूप से लडा जाये. सांप्रदायिकता के एक स्वरूप पर हमला बोलने और दूसरे की अनदेखी करने से काम नहीं चलेगा.इस मामले में प्रगतिशील हिंदुओं और मुसलमानों को साथ -साथ मिलकर संघर्ष करना पडेग़ा . भारत के मुसलमानों को बढ चढ क़र यह मांग करनी पडेग़ी कि केवल भारत के सेक्यूलर होने से काम नहीं चलेगा, पाकिस्तान, बांग्लादेश और सूडान को भी सेक्यूलर होना पडेग़ा.इक्कीसवीं शताब्दी में धर्माधारित राज्य से बडी मूर्खतापूर्ण और कोई अवधारणा नहीं है. धर्मनिरपेक्षता की लंबी लडाई पूरे मनुष्य जाति के लिए महत्वपूर्ण है और इसे मैटर ऑफ पालिसी नीतिगत मामले के तौर पर नहीं मैटर ऑफ प्रिंसिपुल के तौर पर ही लडा जा सकता है. 
ज्यादा हिन्दू होने की कोशिश
सुदूर अनजान भूभागों की यात्रायें मुझे हमेशा आकर्षित करतीं रही हैं .नई जगहों को देखना, नये-नये लोगों से खान-पान, रहन-सहन और जीवन चर्या के पूरे वैविध्य के साथ मिलना और अनदेखे अपरिचित द्वीपों में नये मित्र बनाना मुझे सदा से प्रिय रहा है.इसलिये हर यात्रा मेरे लिये विशिष्ट अर्थ रखती है पर योरोप की पहली यात्रा कई तरह से यादगार बन गयी . हांलाकि यात्रा काफी छोटी थी,पन्द्रह बीस दिनों मेंआप किसी जीवन पद्धति को समझने का भ्रम नहीं पाल सकते,पर एक खुले समाज को समझने के लिये, अगर आपकी आंखों पर पूर्वाग्रह की बहुत मोटी पट्टी न बंधी हो ,इतना समय कम भी नहीं था .मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है कि योरोपीय समाज को लेकर मेरे मन में बहुत से पूर्वाग्रह थे .औसत भारतीय की तरह मैं मानता था कि योरोपीय समाज पूरी तरह से यांत्रिक और सुखवादी है. परिवार जैसी संस्था का कोई मतलब नहीं है .लोग अपने में मस्त हैं और अपने लिये जीतें हैं. उनके बरक्स भारतीय संस्कृति परमार्थ और अध्यात्म वादी है.परिवार हमारी बहुत पवित्र संस्था है . और हम तो जीते ही दूसरों के लिये हैं .बहुत सी बातें थीं जो इस यात्रा की शुरूआत में मेरे मन में गहरे पैठी थीं .मुझे यह स्वीकार करने में भी कोई हिचक नहीं है कि मुझे अपनी बहुत सी धारणाओं में संशोधन करना पडा.इन सबके बारे मे कभी विस्तार से लिखूंगा.
यहां इस लेख में मैं सिर्फ एक छोटी सी मुठभेड क़ा जिक्र करना चाहता हूं जो हिन्दू कठमुल्लों से बरमिंघम में हुयी थी.
बरमिंघम में बहुत दिलचस्प अनुभव हुआ.वहां प्रवासी भारतीयों की एक संस्था है गीतांजली बहुभाषी समाज.बहराइच के मूल निवासी कृष्ण कुमार जी ने वर्षों पहले इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इन्डिया में कैंसर से जूझ रही किशोरी की कविताएँ पढक़र उसके नाम से गीतांजली बहुभाषी समाज की स्थापना की थी और धीरे धीरे पिछले एक दशक में यह बरमिंघम में रहने वाले , अलग अलग भाषायें बोलने वाले भारतीयों की साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रतिनिधि संस्था बन गयी है. गीतांजली बहुभाषी समाज ने हमें निमंत्रित किया था .दोपहर बाद हमारा कार्यक्रम था और देर रात तक हमें लन्दन वापस लौटना था. भारत के काउंसलेट जनरल में कार्यक्रम था .एक बडे से हाल में 300 से कुछ अधिक स्त्री पुरूष इकट्ठे थे . भारत की सभी बडी भाषाओं का प्रतिनीधित्व था. उपस्थित लोगों में ज्यादातर डाक्टर , वकील या चार्टड एकाउण्टेंट जैसे पेशों के लोग थे ,पहली या दूसरी पीढी क़े प्रवासी भारतीय थे जिन्होंने अपने हाड तोड पहली परिश्रम और लगन से ब्रितानी समाज में अपनी एक हैसियत बनायी थी.
ब्रिटेन की स्वास्थ्य या शिक्षा जैसी सेवायें भारतीयों के बल पर टिकी हुयीं हैं -यह कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी .मौजूदा लोगों में ज्यादातर ने ब्रितानी नागरिकता ले ली थी, कुछ तो पैदायशी अँग्रेज थे.
पिछले कुछ दिनों में प्रवासी भारतीयों से जो बात चीत हुयी थी उससे एक बात पूरी तरह समझ में आ गयी थी .देश छोडने या कई बार पहला मौका मिलते ही भारतीय नागरिकता छोडने वाले कहीं बहुत गहरे भारतीय बने रहने की छटपटाहट से ग्रस्त थे. यह एक ऐसी भावना थी जिसे भाषा में वर्णन करना थोडा मुश्किल है पर यह थी बडी ज़बरदस्त .लोग देश में व्याप्त भ््राष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण से चिंतित थे और विकास की धीमी गति उनके मन में आक्रोश पैदा कर रही थी. वे भारत को दुनियां का सबसे शक्तिशाली देश देखना चाहते थे.इन सबके बीच एक दिलचस्प बात यह थी कि वे मुख्य भूमि से दूर पहुँच कर ज्यादा हिन्दू हो गये थे.यह अनुभव मुझे कुछ वर्ष पहले उषा प्रियम्वदा से बात करके भी हुआ था. वे दिल्ली आयी हुयीं थीं और निर्मला जैन के यहाँ एक डिनर में उनकी बातें सुनकर मुझे और मेरे जैसे कई लोगों को लगा था कि वे विश्व हिन्दू परिषद के किसी कार्यकर्ता की तरह बातें कर रहीं थीं .बरमिंघम पहुँचने के पहले लंदन में बहुत से प्रवासी भारतीयों से बातें करके ऐसा ही लगा .
उस दोपहर को हमें सुनने के लिये भारतीय वाणिज्य दूतावास में जो लोग आये उनके साहित्य से वैसे ही सरोकार थे जैसे भारत में उनके जैसे पेशेवर वर्गों के लोगों की होते हैं .कार्यक्रम शुरू होने के पहले हमारी वहाँ के लोगों से जो बातचीत हुयी उससे समझ में आ गया कि अपनी भाषा के समकालीन लेखन से उनमे से अधिकांश का कोई परिचय नहीं था. लंदन की ही तरह वहां के ज्यादातर लोग नरेन्द्र कोहली को हिन्दी के सबसे बडे उपन्यासकार और केसरीनाथ त्रिपाठी को हिन्दी के सबसे महत्वपूर्ण कवि के रूप में जानते थे . वाणिज्य दूतावास के उस बडे से हाल की आलमारियों में वैद्य गुरूदत्त, गुलशन नन्दा और नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों की भरमार थी. छह वर्षों के भाजपा शासन के दौरान जब अटल बिहारी वाजपेयी एक बडे क़वि के रूप में स्थापित हो रहे थे ,इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि देश से भाँति - भाँति के कीर्तनिये ,कथावाचक और हस्तरेखा विशेषज्ञ हिन्दी के साहित्यकार के रूप में लन्दन तथा बरमिंघम जैसे शहरों में थोक की मात्रा में आ जा रहे थे .यही लोग प्रवासी भारतीयों के लिये हिन्दी की मुख्य धारा के लेखक थे .
कार्यक्रम शुरू होने के पहले ही मैने कालिया जी से तय कर लिया कि हम लोग इस कार्यक्रम में बहुत गहरे नहीं फंसेंगे. इस तरह के कार्यक्रमों की जो औपचारिकतायें हैं उन्हें पूरा कर निकल भागेंगे.शुरूआत तो ठीक ठाक हुयी पर बाद में चलकर हम फंस गये .
उन्नींसवीं शताब्दी की शुरूआत में अँग््रोजी के एक लेखक ने व्हाइटमैन्स बर्डन की बात कही थी .उसके अनुसार एक औसत गोरा अपने सर पर एक बोझ लिये फिरता है .यह बोझ है कालों को सभ्य बनाना . अँग्रेज सिर्फ हिन्दुस्तान में लूटपाट के इरादे से नहीं आये थे बल्कि वे भारत को सभ्य भी बना रहे थे .कुछ कुछ ऐसा ही बोझ बहुत से प्रवासी भारतीयों के सर पर भी लदा मिला.वे भारतीय संस्कृति और भारत की छवि के बारे में चिंतित रहतें हैं .कई तो अपने को भारत का गैर सरकारी राजदूत मानतें हैं.सरसरी तौर पर देखें तो यह स्थिति अच्छी है पर थोडा गहरे जाने पर इसमे बडे झोल नजर आने लगतें हैं.
पिछले कुछ वर्षों में उच्च वर्ण के मध्यवर्गीय हिन्दू के मन में साम्प्रदायिकता का जहर बहुत तेजी से फैला है .80 और 90 के दशकों में विश्व हिन्दू परिषद ने बहुत योजनाबद्ध और आक्रामक तरीके से रामजन्मभूमि आंदोलन चलाया था . इस आंदोलन ने हिन्दू मानस को कहीं बहुत गहरे छुआ है.इसका असर डाक्टर, वकील , अध्यापक , किरानी जैसे वर्गों पर पडा और स्वतंत्रता संग््रााम में हरावल दस्तों में रहने वाले पेशेवर वर्ग भी बुरी तरह से साम्प्रदायिकता के शिकार हुये. विदेशों मे जाने वाले भारतीयों का अगर वर्गीय विश्लेषण किया जाय तो यह बहुत साफ दिखायी देता है कि मध्यपूर्व को छोड क़र नौकरी की तलाश में जाने वालों में अधिकतर डाक्टर, इन्जीनियर,चार्टड अकाउन्टेन्ट जैसे पेशों से जुडे लोग थे.दलित जातियों में शिक्षा की कमी के कारण स्वाभाविक था कि ऊंची जातियों के लोग ही इस रूप में बाहर गये. व्यापार के सिलसिले में जो गुजराती ,मारवाडी वगैरह गये वो भी इन्हीं मे से थे.दूसरी तीसरी पीढी क़े इन भूतपूर्व हिन्दुस्तानियों में अभी भी वर्णचेतना लुप्त नहीं हुयी है और इतिहास खास तौर से भारत के मध्यकाल को लेकर उनके मन में कमोबेश वही पूर्वाग्रह है जो उनके वर्ग और वर्ण के औसत हिन्दुओं में भारत में है.रामजन्मभूमि आंदोलन ने ,भौगोलिक दूरी के बावजूद, उन्हें भी गहरे अर्थो मे प्रभावित किया है.
इस बीच एक और गंभीर बात हुयी है.राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आनुषंागिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से समुद्रपार अपनी जडें ग़हरी की है .ब्रिटेन ,कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका संभवत: उनके प्रभावमंडल के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं .इन राष्ट्रों में उपस्थिति के कई अर्थ हैं. ओपीनियन मेकिंग के साथ साथ चन्दा उगाही के ये सबसे बडे स्रोत हैं. यदि कभी रामजन्म भूमि मंदिर के नाम पर एकत्र चंदे का सार्वजनिक आडिट संभव हो सका तो हमें इस सूचना के लिये तैयार रहना चाहिये कि इस धनराशि का बहुत बडा हिस्सा इन तीन देशों में रहने वाले प्रवासी भारतियों से इकट्ठा हुआ है.ये प्रवासी भारतीय जिस भारतीय छवि की रक्षा के लिये आकुल दिखायी देतें हैं वह काफी हद तक भारतीय संस्कृति जैसी अबूझ एब्स्ट्रेक्ट किस्म की चीज है.उच्च वर्णो की श्रेष्ठता पर आधारित यह एक ऐसी स्थिति है जहां उदारता,सहिष्णुता ,सद्भाव और समानता जैसे भाव सर्वत्र उपस्थित हैं.संघ परिवार की भाषा में इसे सामाजिक समरसता कहतें हैं .जैसे ही दलित,पिछडे,या स्त्रियां अपने लिये स्पेस की मांग करने लगतें हैं या वर्णाश्रमी पाखंड की चमडी हल्की सी छील देतें हैं और उसके नीचे अन्याय अमानुषिकता और अतार्किकता के बजबजाते पंक जल को हिलोरने की कोशिश करतें हैं संघ परिवार के व्याख्याकारों को सोशल इन्जीनियरिंग और सामाजिक समरसता की याद आने लगती है.ब्राह्यण संस्कृति के आधार कर्मकांड ,पुनर्जन्म, भाग्यवाद या वर्णाश्रम की कोई भी विवेक सम्मत व्याख्या उन्हें भारतीय संस्कृति के लिये खतरा लगती है .कुछ कुछ ऐसी ही भावना प्रवासी भारतियों के मन में भारत की छवि को लेकर है.दुनियां में और कोई न माने लेकिन भारतीय संस्कृति को ब्राह्यण व्याख्याकारों की तरह वे मानतें हैं कि भारत एक महान सभ्यता है और उसकी महानता का उत्स उदारता में है .वे प्रयत्न पूर्वक अपने पश्चिमी सहयात्रियों के बीच इस छवि को सजाने संवारने में लगे रहतें हैं.इसलिये अगर कोई ,खास तौर से भारत से आया हुआ व्यक्ति,ऐसी बात कहे जिससे यह महान छवि खंडित हो तो उन्हें बुरा लगता है और उनमें से कई को बल पूर्वक ऐसे वक्ता को चुप कराने में भी संकोच नहीं होगा . मेरे साथ भी बर्मिघंम की उस शाम ऐसा ही कुछ हुआ.
कार्यक्रम औपचारिक तरीके से शुरू हुआ.मेरा उपन्यास तबादला इन्दू शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित हुआ था और यह कार्यक्रम उसी सम्मान की श्रृंखला में था अत: स्वाभाविक था कि मेरे और उपन्यास के बारे में फर्ज अदायगी के तौर पर आयोजकों ने कुछ अच्छी बातें कहीं .कुछ बातें संस्था के बारे में कहीं गयीं .मुझे पता था कि वहां उपस्थित लोगों मे से आठ दस लोगों ने ही तबादला पढा है और उनसे भी कम ने मेरी कोई दूसरी रचना पढी है.रवीन्द्र कालिया के गालिब छुटी शराब के अलबत्ता कुछ ज्यादा प्रशंसक थे पर उनकी संख्या भी दहाई में मुश्किल से पहुंचती थी.जाहिर था इस उपस्थिति के सामने बोलने में कोई बहुत उत्साह नहीं हो सकता था.कालिया जी ने थोडा बहुत बोलकर अपना पिण्ड छुडाया और फिर मुझे माइक थमा दिया .
मैंने अपनी रचना प्रक्रिया और उपन्यास के बारे में कुछ कहा और चार छह सवालों के जवाब दिये.एक प्रश्न ऐसा था जिसके उत्तर से देश की छवि सुरक्षित रखने वालों के लिये संकट पैदा हो गया .सवाल गुजरात को लेकर था.गुजरात कुछ ही दिनों पूर्व होकर चुका था. केन्द्र की सत्ता पार्टी ,जो गुजरात के दंगों में राज्य सरकार को राजधर्म निभाने का उपदेश जरूर दे रही थी पर उसकी ओर से कभी ऐसी इच्छा शक्ति का प्रर्दशन नहीं हुआ जो विश्वास पैदा कर सके, हालिया चुनावों में सत्ताच्युत हुयी थी .इस परिप्रेक्ष्य में गुजरात पर कोई भी प्रश्न या उसका उत्तर बेचैनी पैदा करने वाला हो सकता था.मेरे सामने एक विकल्प यह था कि मैं चतुराई के साथ अपने को बचा लूं और गोल मोल जवाब देकर अपना पिण्ड छुडा लूं.लेकिन यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं थी .देश के बहुत से दूसरे लोगों की तरह गुजरात मेरा भी दु:स्वप्न था.
गुजरात की घटनाओं पर मेरा दुख दो तरह का है .एक तो हिन्दू के रूप मे मैं इस बात से शर्मिन्दा हूं कि हिन्दुओं ने अपने पडाेसी मुसलमानों को नृशंसतम तरीकों से मारा था. दूसरी तकलीफ एक पुलिस अधिकारी की है.पुलिस ने एक क्रूर और पक्षपाती राज्य की हरकतों में बिना किसी प्रतिरोध के सहयोग किया.संविधान तथा कानून की पुलिस से जो अपेक्षा है उसके एकदम खिलाफ गुजरात पुलिस ने अल्पसंख्यकों की सम्पत्ति एवं जीवन के विनाश पर उतारू उन्मादी हिन्दुओं की भीड क़ो रोकने की जगह उनकी मदद की .यही दोनो बातें मैने उस सभा में कही. मेरा मानना था कि गुजरात आजादी के बाद सांप्रदायिक हिंसा का सबसे बुरा उदाहरण है क्योंकि इसके पहले कभी भी राज्य इतनी बेशर्मी से अपने नागरिकों के एक वर्ग के संहार में लिप्त नहीं हुआ था.
मेरे संक्षिप्त से वक्तव्य से सुनने वालों मे से कुछ आहत लगे.यह बाद में समझ आया कि ये लोग वे थे जो था तो विश्व हिन्दू परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता थे या पिछले कुछ वर्षों में विहिप के योजनाबद्ध प्रचार के शिकार बने थे .यही वे लोग थे जो भारत की छवि बचाये रखने का बोझ अपने कांधों पर लिये घूमते हैं .इस छवि को पश्चिमी समाज मे चमकाने के लिये आवश्यक है कि भारतीय खास तौर से हिन्दू जीवन पद्धति को उदार तथा सहिष्णु जीवन पद्धति के रूप में पेश किया जाय.गुजरात जैसी घटनाओं का जिक्र आने से यह मिथ टूट सकता है, इसलिये इन लोगों का पूरा प्रयास रहता है कि ऐसी चीजों का उल्लेख ही न हो और अगर हो तो इस तरह से कि क्रूरता को वैध ठहराया जा सके .मसलन गुजरात में मुसलमानो का नरसंहार गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया था या फिर ऐसा ही कुछ और.
श्रोताओं के इस वर्ग को लगा कि मुझ जैसे दुष्ट की वजह से उनके द्वारा बडे ज़तन से तराशी गयी छवि खण्डित होने को है.हाल में एक तरह से तूफान बरपा हो गया.अलग अलग कोनों और कतारों में बैठे लोग एक साथ खडे होकर चिल्लाने लगे.प्रश्न सत्र भाषण सत्र में तब्दील हो गया .हर प्रश्न पूछने वाला उत्तर भी स्वयं दे रहा था .पूरे विस्फोट का लुब्बोलुवाब यह था कि इतिहास की मुझे कोई समझ नहीं है .हिन्दू लगातार पिटता रहा है और अगर पहली बार गुजरात में उसने पिटाई की है तो हम इस पर शर्मिन्दा नहीं होना चाहिये .मुसलमान ,जो स्वभाव से ही क्रूर और धोखेबाज होता है , हमेशा से हिन्दू पूजा स्थलों को तोडता रहा है, ने हिन्दू स्त्रियों की इज्जत लूटी है और पूरा भारतीय इतिहास उसकी ज्यादतियों से भरा है.भारत के एक औसत हिन्दुत्व कार्यकर्ता की तरह इतिहास उनके लिये तर्क या विवेक से परे मिथ,आस्था और भावुकता का घालमेल था.उनमें से कुछ ने तो यहां तक कहा कि वे मोदी पर गर्व करतें हैं जिसने हिन्दुओं को तन कर चलना सिखाया है.दर्शकों के इस वर्ग ने वाचिक प्रतिरोध को शारीरिक अभिव्यक्ति देने की भी कोशिश की .आयोजकों ने बीच बचाव कर उन्हें रोका.
मैंने विरोधी श्रोताओं को सम्बोधित करते हुये एक निवेदन किया .मैने कहा कि एक भारतवासी के तौर पर मैं कृतज्ञ हूं कि वे देश की छवि को लेकर इतने चिंतित रहतें हैं .मैने इस बात के लिये भी उन्हें धन्यवाद दिया कि उनमें से बहुत से लोग देश में अपने मूल निवास को गांवों शहरों में शिक्षा या स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ निवेश भी करतें हैं . ये सारे उपकार एक तरफ और भयंकर क्षति दूसरी तरफ. वे एक ऐसी संस्था के आर्थिक सम्बल बने हुये हैं जो पिछले कई वर्षों से हमारे देश में दंगा फसाद की जड बनी हुयी है.मैने उनसे अनुरोध किया कि वे रामजन्मभूमि आंदोलन को चंदा देना बंद कर दें .इस आंदोलन के चलते हजारों लोग मारे जा चुकें हैं और अरबों रूपयों की सम्पत्ति का नुकसान हो चुका है .जैसे लोक कथा के राक्षस की जान तोते में बसती थी उसी उसी तरह विहिप की जीवन रेखा चंदे से गतिशील रहती है.वे चंदा देना बंद कर दें तो विहिप की राष्ट्र विरोधी गतिविधियां मंद पड ज़ायेंगी और देश को हिंसा और घृणा की राजनीति से काफी हद तक मुक्ति मिल जायेगी . जाहिर था कि मेरा यह निवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता था और न ही मेरे पास यह जानने का कोई जरिया है कि वहां उपस्थित श्रोताओं में से अगली बार विहिप को चंदा देने से पहले किसी के मन में कोई उलझन पैदा हुयी या नहीं.
बर्मिंघम के उस कार्यक्रम से मैं सही सलामत निकल तो आया पर मन में एक अवसाद बना रहेगा .यह बहुत स्पष्ट समझ में आ गया कि धार्मिक उन्माद का खतरा हमारी मुख्य भूमि से निकलकर प्रवासी भारतीयों तक पहुंच गया है.
वर्णाश्रमी असभ्यता
सभ्यता दुनिया की हर भाषा में , मनुष्य को सभ्य बनाने की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया और उससे हासिल होने वाले नतीजों के लिये प्रयुक्त होने वाले शब्द हैं .यह सभ्य होना क्या है? क्या कोई ऐसी प्रविधि है जिससे एक काल , धर्म, नस्ल, लिंग , भूगोल निरपेक्ष परिभाषा गढी ज़ा सकती है ? कुछ ऐसे गुण हो सकतें हैं क्या, जिन्हें धारण करने वाला मनुष्य चाहे वह जिस देश काल का हो सभ्य कहला सकता है ? सभ्यता की यह यात्रा बडी लम्बी होती है .एक दो वर्षों में नहीं बल्कि सैकडों वर्षों में धरती के किसी खास भू भाग में रहने वाले लोग ऐसी जीवन पद्धति विकसित कर पातें हैं जिनमें कुछ कुछ मात्रा में वे सब गुण होतें हैं जो उन्हें सभ्य बनातें हैं .
मनुष्य को सभ्य बनाने वाले मूल्यों में कुछ काल सापेक्ष होतें हैं .इतिहास के एक कालखण्ड में कोई विचार बडा क्रान्तिकारी लगता है पर समय के साथ उसकी धार कुंद हो जाती है और वह अपर्याप्त लगने लगता है .मोहम्मद साहब ने कहा कि गुलामों के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए .अपने समय में यह बडी सीख थी .पर आज अगर मोहम्मद होते तो इसकी जगह यह कहते कि गुलामी अमानवीय प्रथा है, इसे बने रहने का कोई हक नहीं है .इस उदाहरण से अब्राहम लिंकन मोहम्मद से बडे नहीं हो जाते . जिस समय अबा्रहम लिंकन ने गुलामी उन्मूलन का संघर्ष छेडा था तब तक मनुष्यता अपने विकास के क्रम में उस बिन्दु तक पहुंच चुकी थी जहां गुलामी के पक्ष में कोई विचार चाहे वह किसी भी दर्शन ,धर्म या अर्थतंत्र से खाद हासिल करता हो, वैध नहीं हो सकता था. मोहम्मद का विचार अपने समय से आगे था और लिंकन का अपने समय की जरूरतों के अनुकूल. यह उदाहरण सिर्फ इसलिये दे रहां हूं कि मैं यह बात थोडा बेहतर ढंग से कह सकूं कि ज्यादातर मूल्य और संस्थायें समय सापेक्ष होतीं हैं .इसी के साथ साथ हमें यह भी याद रखना होगा कि कुछ मूल्य काल को अतिक्रमित कर जातें हैं .ये बुनियादी मूल्य हैं जो मनुष्य को सभ्य बनातें हैं .यही वे मूल्य हैं जिनके बल पर सभ्यतायें निर्मित होतीं हैं .प्रेम ,दया, भाई चारा और एक दूसरे को मदद करने की भावना कुछ ऐसे मूल्य हैं जो हर काल, हर धर्म, हर नस्ल में प्रासंगिक बने रहे .
इन्हीं सारे मूल्यों से मिलकर एक ऐसा मूल्य बनता है जो मेरे विचार से किसी सभ्यता को सही अर्थों में सभ्य बनाता है. यह मूल्य है अपने बीच में अपने कमजोर सदस्यों के लिये स्थान छोडना .अंग्रेजी में जिसे स्पेस कहेंगे वह प्रदान करना.कमजोरी शारीरिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक या लैंगिक किसी भी रूप की हो सकती है .यह स्पेस देने की स्थिति किसी भी जीवन पद्धति में एक लम्बे अभ्यास के बाद आती है और काफी हद तक सांस्कृतिक, धार्मिक ,भौगोलिक और सामाजिक परम्पराओं की उपज होती है.यह समुदाय की भाषा और विभिन्न सदस्यों के अन्तर्सम्बन्धों में एक स्वतःस्फूर्त और अदृश्य संचालक की तरह मौजूद रहती है.
इस पूरे फार्मूलेशन को समझने के लिये हमें वर्णाश्रम धर्म पर आधारित ब्राह्यण जीवन पद्धति को देखना होगा. वर्णव्यवस्था दुनिया की सबसे विशिष्ट और सबसे घृणित व्यवस्था है जिसने कई हजार वर्षों तक एक बडे समाज को संचालित किया है .विशिष्ट इस अर्थ में कि इसमें मुक्ति के रास्ते निहित नहीं हैं .इसके अतिरिक्त मानव जाति के इतिहास में जो मनुष्य विरोधी संस्थायें निर्मित हुयीं उनमे हमेशा मुक्ति की गुंजायश रही .दास प्रथा, नस्ल और रंग भेद अथवा लैंगिक असमानता जैसी स्थितियों में पीडित के पास हमेशा अपनी स्थिति सुधारने का एक विकल्प रहता था पर वर्ण व्यवस्था इतनी ठस और अपरिवर्तनीय है कि उससे छुटकारा पाना लगभग असंभव है .अमानवीयता में इसकी तुलना गुलामी प्रथा से कर सकतें हैं .दोनो संस्थायें हृदयहीन और क्रूर हैं .दोनो समाज के अनगिनत जुल्मों ज्यादती की तकलीफदेह गाथा हैं.फर्क सिर्फ इतना है कि गुलाम अपनी बेडियां तोड सकता था.पूरा मध्यकाल ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जिनमें गुलाम अपने स्वामी राजा को खुश कर उसका उत्तराधिकारी बन बैठा . वर्ण व्यवस्था में यह संभव नहीं था कि शूद्र ब्राह्यण की बेटी से शादी करके ब्राह्यण हो जाय या किसी युद्ध में शौर्य का प्रदर्शन करके क्षत्रिय बन सके .वर्णव्यवस्था के प्रशंसक किसी ऐसे काल्पनिक युग का जिक्र करतें हैं जिसमें कर्मणा जातियों का निर्धारण होता था .ऐसे किसी समय के ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं जिसमें कर्म के आधार पर किसी को जाति मिलती थी . यदि कर्म के आधार पर जातियां बंटतीं तो वर्णव्यवस्था की जरूरत ही नहीं रह जाती . एक मजेदार उदाहरण बाल्मीकि का दिया जाता है .यदि इन लोगों का तर्क सही माना जाय तो बाल्मीकि जाति के आधुनिक संस्करणों मे मेहतर थे और अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर ब्राह्यण कर्म करने लगे. यह हास्यास्पद उल्लेख इस तथ्य को भूल जाता है कि बाल्मीकि रचित रामायण शूद्र विरोधी उद्धरणों और व्यवस्थाओं से भरी हुयी है .क्या यह तर्क संगत और मानने योग्य है कि एक शूद्र ने अपने ही वर्णों को नीचा दिखाने वाला ग्रन्थ रचा हो?
यह वर्ण व्यवस्था हमें किस तरह से एक सभ्य समाज बनने से रोकती है इसे समझना जरूरी है.इस व्यवस्था के तहत जो संस्थायें बनी उन्होंने कई तरह हमें प्रभावित किया .इसने सबसे पहले तो इसने हमें अपने बीच के अधिसंख्य लोगों को पशुओं से भी बदतर मानने के लिये प्रेरित किया.समाज का बहुलांश शूद्र है. जो शूद्र नहीं है उनकी भी आधी संख्या स््रत्रियों की है .वर्णव्यवस्था इन सभी को मनुष्य के नीचे की योनि का मानती है .इस का सबसे तकलीफदेह पहलू यह है कि इस पूरी घृणित स्थिति को एक दैवीय दार्शनिक वैधता हासिल है .वेद , पुराण ,महाभारत और रामायण जैसी धार्मिक पुस्तकें और उनमें निहित पुनर्जन्म तथा भाग्यवाद जैसे दर्शन इस व्यवस्था को ठस और अपरिवर्तनीय बनाता है.इसी की वजह से शूद्र के पास ब्राह्यण होने का कोई विकल्प नहीं है.वर्णव्यवस्था की दूसरी दिक्कत है कि यह शारीरिक श्रम को हेय मानती है .पूरी दुनियां में शायद ब्राह्यण परम्परा ही एक अकेली परम्परा है जो भीख मांगने को महिमा मण्डित करती है .आर्थिक और पारम्परिक रूप से पिछडे समाजों में भीख मांगने को कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया. वर्ण व्थवस्था नें शारीरिक श्रम को तुच्छ बताया और दास शूद्रों की विशाल फौज ने यह सम्भव किया कि वे बैठकर खाने वालों के स्वामित्व वाले खेतों में अनाज पैदा करें और उन्हें खिलाते रहें .ऊंची जातियों के लिये हल का मूठ छूना भी पाप का भागी बनना था. ब्राह्यणों ने तो और भी रोचक तरीके से अपने पेट पालने की व्यवस्था की .वह न सिर्फ भीख मांगने में लज्जित नहीं होते थे बल्कि भीख लेकर देने वाले पर एहसान भी करते थे -उसका लोक परलोक सुधारते थे .
वर्ण व्यवस्था की तीसरी समस्या इसमें अन्तर्निहित शिक्षा विरोध है .हम शायद विश्व के सबसे बडे शिक्षा विरोधी समाज रहें हैं. मोहम्मद ने अपने अनुयायियों से कहा था कि शिक्षा हासिल करने के लिये जरूरत पडे तो चीन भी जाओ. उस दौर में अरब से चीन जाना कितना दुष्कर था इसका उल्लेख करना जरूरी नहीं है. वर्णाश्रमी परम्परा अपने बीच के अधिसंख्य लोगों को बलपूर्वक शिक्षा से वंचित करती है.गौतम बुद्ध के प्रभाव ने जरूर एक काल विशेष में शिक्षा को सार्वजनिक बनाने का प्रयास किया पर जैसे ही ब्राह्यणों का वर्चस्व पुर्नस्थापित हुआ उन्होने वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करने वाले सबसे बडे लौकिक शिक्षा केन्द्रों - तक्षशिला और नालंदा को बर्बरता से नष्ट कर दिया और इन विश्वविद्यालयों के विशाल पुस्तकालयों को आग के हवाले कर दिया.इसलिये कोई आश्चर्य नहीं है कि अपने ही बीच के मनुष्यों को पशुवत् मानने वाला, शारीरिक श्रम में अनास्था रखने वाला और शिक्षा विरोधी समाज दुनिया को कोई बडा विचार नहीं दे पाया.
मैंने ऊपर निवेदन किया है कि कोई समाज सभ्य है या नहीं इसे जांचने के लिये हमें यह देखना चाहिये कि वह अपने बीच के कमजोर लोगों के लिये कितना स्पेस छोडता है .वर्ण व्यवस्था का जिक्र मैंने इसलिये किया है कि यह हमारी पूरी जीवन पद्धति को संचालित करती है .समुदाय के एक सदस्य का दूसरे से कैसा रिश्ता हो ,खान पान और कपडे क़ैसे हों ,उठने बैठने , विवाह , उत्तराधिकार , रोजगार - गरज यह कि जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसका संचालन वर्णव्यवस्था द्वारा बनाये गये नियम न करतें हों . इसलिये अगर यह तय करना है कि सनातनी हिन्दू जीवन दृष्टि सभ्य समाज का निर्माण करती है या नहीं तो हमें यह जांचना होगा कि इसे संचालित करने वाली संस्था वर्ण व्यवस्था हाशिये पर पहुंचे लोगों के साथ कैसा व्यवहर करती है ? इस कसौटी पर कसने पर सनातनी हिन्दू समाज का प्रदर्शन बहुत निराशाजनक दिखायी देता है.दुर्बल के प्रति यह बहुत क्रूर है . दुर्बलता किसी भी तरह की हो सकती है - जाति की दुर्बलता तो सबसे भयानक है .शूद्र के घर पैदा हुआ तो मनुष्य भी नहीं है, इससे इतर भी अगर कोई शारीरिक रूप से विकलांग है , आर्थिक रूप से दरिद्र है या फिर स्त्री -सबके लिये इस समाज में भयानक घृणा है .यह घृणा पूरे व्यवहार में परिलक्षित होती है .भाषा -जो हमारे दबे हुये मनोभावों को भी बखूबी अभिव्यक्त करती है , इन सबसे हर कदम पर नफरत करती दिखती है.
देश के जिन भागों पर वर्ण व्यवस्था की जकडन जितनी मजबूत थी उनकी भाषा उतनी ही अधिक क्रूर और दुर्बल विरोधी है.हिब्दी का उदाहरण लें तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी .दलितों और स्त्री को लेकर तमाम गालियां हैं .चमार स्वाभाविक रूप से चोर है इसलिये चोरी चमारी है .भाषा के बडे क़वि तुलसी दास कह ही गयें हैं कि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी , सकल ताडना के अधिकारी. भाषा सामाजिक संरचना की तरह ही बहुस्तरीय है .जिस तरह समाज में जातियों के बैठने का आसन उनके वर्ण के अनुसार निर्धारित है उसी तरह आसन ग्रहण करने के लिये बैठ , बैठो या बैठिये शब्द भाषा में हैं जो व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक हैसियत के मुताबिक इस्तेमाल किये जातें हैं .मुझे नहीं लगता कि दुनियां की किसी भी भाषा में त्रिस्तरीय सम्बोधन उपलब्ध हैं .आप, तुम और तू सिर्फ सम्बोधन नहीं है बल्कि सम्बोधित को उसकी औकात का अहसास कराने वाले दंश भी हैं.
भाषा में निहित यह तिरस्कार सिर्फ वर्ण या लिंग पर आधारित कमजोर के लिये ही नहीं है .शारीरिक अथवा मानसिक रूप से विकलांग बार-बार इस भाषिक कोडे से पीटे जातें रहें हैं . अंधे, काने , लूले, लंगडे , क़ोढी या कूुबडे क़े लिये हमारी भाषा में भयानक घृणा भरी है. भाषा की घृणा समाज के अंदर मौजूद घृणा का प्रतिबिम्ब है .हमारा समाज इन अक्षम लोगों से कैसा व्यवहार करता है यह उसमें प्रचलित लोकाोक्तियों और समाज के सक्षम सदस्यों द्वारा उनके साथ किये जाने वाले व्यवहार से स्पष्ट है .शारीरिक विकलांगता सहानुभूति का विषय न होकर मजाक उडाने या तिरस्कृत करने का माध्यम है.मांगलिक कार्यक्रमों में इनकी उपस्थिति अशुभ मानी जाती है. यह दृश्य बहुत आम है जब आप किसी विवाह के अवसर पर काने या कोढी क़ो दुरदुराकर भगाये जाते देख सकतें हैं.बच्चों के परीक्षा देने के लिये घर से निकलने पर अगर कोई शारीरिक विकलांग सामने पड ज़ाय तो बच्चे को वापस बुला कर अशुभ टाला जाता है. इसी तरह किसी पागल पर पत्थर बरसाते बच्चे दिखायी दें या उसे घेर कर उसका मजाक उडाते हुये लोग दिखें तो हमें बहुत आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्यों कि वर्णाश्रम धर्म पर आधारित जीवन मूल्य हमें सिर्फ कमजोर से घृणा करना ही सिखा सकतें हैं उनसे सहानुभूति करने या उनकी सेवा करने का जज्बा नहीं पैदा कर सकते .
अपने बीच के कमजोरों के प्रति हम कैसा व्यवहार करतें हैं इसका सबसे बडा उदाहरण सडक़ों पर चलने वाला ट्रैफिक है. जो जितना ताकतवर है सडक़ पर उसका उतना ही ज्यादा अधिकार है. ट्रक वाला सबको रगेदता हुआ जा सकता है , कार वाला उससे तो डरता है पर दो पहिया वाहन या पैदल चलने वालों के लिये उसके मन में कोई दया नहीं है .पश्चिमी समाज को हम हमेशा यांत्रिक और मानवीय मूल्यों से (अपने मुकाबले )वंचित समाज मानतें हैं .पर वहां एक ऐसा दृश्य दिखायी देता है जो हमारी सडक़ों पर कभी नहीं दिखेगा. चौराहों पर यातायात के सिग्नल वाले खंभों पर बटन लगे हैं जिनका इस्तेमाल पैदल चलने वाले करतें हैं .अगर आप को सडक़ पार करनी है तो आप बटन दबा दें और चारों तरफ से आने वाली गाडियां रूक जायेंगीं , आप सडक़ पार कर लें और फिर यातायात चालू हो जायेगा. हम जैसे हिन्दुस्तानियों से यह गलती हो सकती है कि हम ट्रैफिक लाइट को नजरअंदाज कर खतरनाक तरीके से सडक़ पार करने की कोशिश करें पर वाहन चालक हमें सडक़ पर उतरते देखकर फौरन अपना वाहन रोक देंगे और हमें पहले सडक़ पार करने का इशारा करेंगे .मैं कई बार ऐसे अनुभवों से गुजरा हूं जब भारत में या तो कोई वाहन वाला मुझे कुचल डालता या फिर अंधा या उल्लू जैसे सम्बोधनों से नवाजता.इसी तरह एक और दृश्य मुझे यात्राओं में चकित करता रहा है .ट्रेनों या बसों में किसी अंधे , बूढे या महिला के प्रवेश करते ही लोग आदतन खडे हो जातें हैं और उसके लिये जगह खाली कर देतें हैं .हमारे इस महान जगद्गुरू देश में तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती .
मैं कई बार सोचता हूं कि पश्चिम, जिसने लोगों को गुलाम बनाया, अपने उपनिवेशों में जमकर लूट पाट की और आज भी दुनियां में नवउपनिवेशवादी अधिनायकवाद का परचम लहरा रहा है ; वियतनाम, लैटिन अमेरिका या इराक जिसकी ज्यादतियों के शिकाार रहें हैं , वह कैसे अपने समाज में कमजोरों के लिये इतना स्पेस छोडता है ? वाह्य सम्बन्धों में निहायत ही खुदगर्ज और क्रूर समाज क्या अपने आंतरिक व्यवहार में इस कदर उदार हो सकता है ? पर यह है . यह उदारता डंडे के बल पर नहीं आती. इसके लिये एक लंबे अनुशासन की जरूरत होती है .सैकडों वर्षों के जीवन अनुभव इसके पीछे होतें हैं.
कोई भी समाज कई चरणों में आंतरिक सभ्यता हासिल करता है .इनमें सबसे बडी भूमिका किताबों की होती है .इनसे प्रभावित होने वाले लोग इनमें से कुछ को आसमानी मानतें हैं. अर्थात् ये दैवीय हैं और इसलिये अपरिवर्तनीय. आंतरिक सभ्यता के सोपान वही समाज तेजी से चढता है जो इन आसमानी किताबों की दुनियावी जानकारियों और जरूरतों के मुताबिक नये भाष्य करता रहता है .पश्चिम का ईसाई समाज इस मामले में दूसरों से आगे रहा है . क्रुसेड और चर्च के आधिपात्य वाले मध्ययुग में ही इसने बहुत सी स्वीकृत स्थापनाओं को चुनौतियां देनी शुरू कर दीं थीं. चर्च के कमजोर पडते जाने और पश्चिम के विशाल ईसाई समाज की आंतरिक उदारता की यात्रा साथ साथ चली है और यह कहना ज्यादा उचित होगा कि दोनो ने एक दूसरे की मदद ही की है.गुलामी और रंगभेद जैसी दो घृणित संस्थाओं से इस समाज ने आंतरिक उदारता की इसी जध्दोजहद के चलते छुटकारा पाया है.
भारतीय समाज को आंतरिक सभ्यता हासिल करने के लिये वर्णव्यवस्था से छुटकारा पाना बेहद जरूरी है .यह भी एक दिलचस्प अध्ययन का विषय हो सकता है कि हम इस गन्दी संस्था से निजात क्यों नहीं हासिल कर सके ? हमारे लिये तो यह दूसरे धर्मावलम्बी समाजों के मुकाबले ज्यादा आसान होना चाहिये था.हमारी कोई किताब उस अर्थ में दैवीय नहीं है जिस अर्थ में दूसरे धर्मों की किताबें हैं.वेदों को भी बहुत बाद में अपौरूषेय कहा गया .कम से कम वर्ण व्यवस्था को एक विधान के रूप में स्थापित करने वाली मनुस्मृति या लोक में स्वीकृत कराने वाली रामचरित मानस जैसी पुस्तकों को तो कोई भी दैवीय नहीं कहता .यदि कोई पुस्तक आसमान से नहीं उतरी है तो वह अपरिवर्तनीय भी नहीं होगी .काल की आवश्यकताओं के अनुसार उसमें संशोधन या उसके भाष्य हो सकतें हैं .फिर क्यों नहीं हमारे अन्दर स्वयं ऐसी इच्छा शक्ति पैदा हुयी कि हम इसी गंदी व्यवस्था को खुद ही उखाड फ़ेंकते ? हमने हमेशा इसके खिलाफ जाने वाले विचार को कुचलने का प्रयास किया. गौतम बुद्ध ने मनुष्यों के समानता की बात की पर ब्राह्यण हृन्हें लील गये .इस्लाम ने समानता पर आधारित जाति विहीन समाज का दर्शन सामने रखा.आपसी मारकाट में फंसे भारतीय समाज के लिये यह तो संभव नहीं हुआ कि वह उन्हें हजम कर ले पर ब्राह्यणों ने उनसे तर्क करने से ही इन्कार कर दिया . कमजोर दार्शनिक भावभूमि पर खडे वर्णाश्रम समर्थकों को उनसे वैचारिक मुठभेड क़रने से आसान यह लगा कि उन्हें म्लेच्छ घोषित कर उनसे किसी तरह का संवाद से ही बचा जाय. फ्रांसीसी , पुर्तगालियों या अंग्रेज शासकों के आते आते यह स्थिति हो गयी कि संवाद से बचा नहीं जा सकता था और एक बार जब विरोधी दर्शन से मुठभेड शुरू हुयी तब यह कोई आश्चर्य नहीं था कि जन्माधारित श्रेष्ठता का मूर्खतापूर्ण दर्शन कुछ ही दशकों में भहराकर ढह गया.एक बार शिक्षा को सार्वजनीन किया गया तो संस्कृति की शूद्र व्याख्या हमारे सामने आयी और उसने ब्राह्यण वर्चस्ववादिता को चुनौती देना शुरू कर दिया.
आज स्थिति यह है कि शूद्र व्याख्या ने ब्राह्यण वर्चस्व को कमजोर तो किया है पर पूरी तरह से समाप्त नहीं कर पायी है. कई हजार वर्षों की जीने की आदत इतनी जल्दी खत्म भी नहीं होगी .ब्राह्यण विकृतियां इतनी गहरे पैठीं हुयीं हैं कि वह शासक शूद्रों के मन में ब्राह्यण बनने की ललक पैदा कर देती है.वह भी उन्हीं कर्मकाण्डों में लिप्त हो जाता है जिनमें ब्राह्यण लिप्त रहा है .साफ है कि अगर हम एक सभ्य समाज बनना चाहतें हैं तो हमें वर्णाश्रम धर्म को नष्ट करना पडेग़ा .बिना जातियों पर आधारित श्रेष्ठता के सिद्धान्त को नष्ट किये हम सभ्य नहीं हो सकते .

देह से दबी स्त्री

ृमृणाल वल्लरी

अभी तक हमारे जेहन में पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार की उस भारत यात्रा की यादें ताजा हैं, जब भारतीय मीडिया ने उन्हें खूबसूरती, तन पर पहने कपड़ों, गहनों और उनके पर्स तक ही समेट दिया था. इसके पहले किसी विदेशी महिला नेता के कपड़ों पर मीडिया ने ऐसी हाय-तौबा नहीं मचाई थी. लेकिन हिना एक औरत हैं और वह भी सामाजिक सौंदर्यबोध के हिसाब से बेहद खूबसूरत.
तो मर्दों के वर्चस्व वाले भारत-पाकिस्तान की राजनीति में किन्हीं खास समीकरणों से आई महिला के साथ मीडिया का ऐसा सुलूक करना तो स्वाभाविक था. खैर, हिना के बाद अपने परिधान के कारण एक और महिला नेता भारतीय मीडिया की सुर्खियों में आईं और वे हैं आस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड.
जूलिया गिलार्ड राजघाट पर गांधी समाधि से लौटते वक्त ऊंची एड़ी वाले जूतों के कारण फिसल कर गिर गईं. लेकिन उसके तत्काल बाद जूलिया ने जो बात कही, वह हमें सोचने पर मजबूर करता है. अखबार ‘हेराल्ड सन’ ने जूलिया के हवाले से लिखा- ‘मेरी चप्पल की ‘हील’ घास में उलझ गई थी.’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘पुरुष जहां सपाट तल्ले वाले जूते पहनते हैं, वहीं महिलाओं के लिए संकोच में हील पहनना पेशेवर दुविधा होती है. अगर आप ऊंची एड़ी वाले जूते पहनें तो नरम घास में ये चिपक सकते हैं और जब आप अपना पैर ऊपर उठाते हैं तो जूता नहीं उठता. और फिर ऐसा ही होता है जैसा आपने देखा.’
गिलार्ड ने बूट पहनने के सुझावों को दरकिनार करते हुए कहा कि स्कर्ट के साथ बूट पहनने से आस्ट्रेलिया में फैशन संबंधी आलोचनाएं होने लगेंगी. इससे पहले जनवरी में भी कैनबरा में आस्ट्रेलिया दिवस पर हुए दंगे से दूर ले जाए जाते वक्त गिलार्ड का एक जूता खो गया था. पिछले चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने अपना जूता खो दिया था.
एक विकसित और आधुनिक देश की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड को इससे पहले भी अपने शारीरिक गठन को लेकर असहज कर देने वाली टिप्पणियों का सामना करना पड़ा है. एक समारोह में एक वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से उन्हें कहा- ‘माफ कीजिएगा आपका पिछवाड़ा काफी बड़ा है.’
आखिर एक सशक्त महिला नेता के लिए किसी पुरुष को सार्वजनिक तौर पर ऐसी कुंठा जाहिर करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह वही मानसिकता नहीं है जो किसी भी महिला को उसके शरीर में समेटने और सीमित रखने को मजबूर करती है? और वे कौन-सी वजहें हैं जिसके कारण एक देश की सशक्त प्रधानमंत्री ‘‘फैशन पुलिस’’ से डर रही है. जिस नेता के इशारे पर उसका देश और वहां का सैन्य बल चलता है, वह समाज के ठेकेदार ‘फैशन पुलिस’ के सामने इस कदर लाचार क्यों है?
पश्चिमी देशों में ‘फैशन पुलिस’ का यह खौफ विकासशील देशों में ज्यादा मुखर दिखता है. ग्यारह महीने पहले मां बनी ऐश्वर्य राय के पीछे ‘फैशन पुलिस’ का नया-नया जन्मा तबका पीछे पड़ गया था. नई मां को अपने और अपने शिशु के स्वास्थ्य का कितना खयाल रखना होता है, यह सभी को मालूम है. लेकिन भारतीय मीडिया एक जच्चा को सिर्फ एक फैशनपरस्त देह मानता है और उस देह पर चर्बी आ जाने के लिए उसकी अशालीन आलोचना करने में लग गया था.
हाल ही में शिल्पा शेट्टी से जब एक पत्रकार ने मां बनने के बाद उनके बढ़ते वजन पर ही लगातार सवाल किए तो उन्होंने झल्ला कर कहा कि अब वे कभी भी पहले जैसा शरीर हासिल नहीं कर पाएंगी.
ऐश्वर्य और शिल्पा ने ‘फैशन पुलिस’ के इस रवैए को लेकर दुख भी जताया. लेकिन सच यह है कि ऐश्वर्य और शिल्पा सरीखी कलाकारों ने अपने कॅरियर का आधार ही देह बनाया. खुद को ‘फैशन आइकॉन’ कह कर अपनी कीमत बढ़ाई. इसलिए इनके कॅरियर का आधार, यानी शरीर का ढांचा ‘बिगड़ते’ ही इन्हें इनके बाजार से बाहर करने की तैयारी शुरू गई. यों भी, इस बुनियाद पर टिका आधार इसी तरह दरकता है.
इस पेज थ्री की बेरहमी की शिकार कभी पेज थ्री की अगुआ रहीं शोभा डे भी हो चुकी हैं. शोभा डे ने फिल्म ‘आई हेट लव स्टोरी’ में अभिनेत्री सोनम कपूर के अभिनय की आलोचना की. फिल्म के निर्देशक और सोनम के दोस्त पुनीत मल्होत्रा को यह बात नागवार गुजरी. उन्होंने ट्विटर पर शोभा डे को ‘मेनोपॉज’ से गुजर रही सूखी पत्ती कहा.
शोभा डे के लिए अपने दोस्त की अपमानजनक टिप्पणी की हौसलाअफजाई करते हुए सोनम ने उसे रीट्वीट किया. क्या सोनम को इस बात का अहसास नहीं था कि कुछ सालों बाद वे भी इस दौर से गुजरेंगी? लेकिन इस ‘फैशन पुलिस’ ने देह की सुविधा के साथ भावनाओं को कुचलना भी तो सिखाया है!
ग्लैमर की दुनिया से बाहर की बात करें तो चाहे यूरोप हो या एशिया, हर संस्कृति में परंपरागत से लेकर अति आधुनिक होने तक महिलाओं के लिए ऐसे वस्त्र क्यों तैयार किए जाते हैं, जो महिलाओं को महज ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में परोसते हैं, वह भारत की साड़ी हो या पश्चिम की स्कर्ट.
आखिर ऐसा क्यों है कि पुरुषों के कपड़े ऐसे बनाए गए हैं, जिसमें सामान्य तौर पर उनके चेहरे और हाथ के अलावा कुछ नहीं दिखता और महिलाओं के कपड़े ऐसे क्यों बनाए जाते हैं जो सीधे उनकी शारीरिक, और खासतौर पर कमर और सीने की बनावट पर ही ध्यान खींचे.
आम तौर पर एक्जक्यूटिव क्लास की नौकरियों में भी पुरुष की वर्दी तो सूट-बूट-टाई की होती है, लेकिन महिलाओं को ड्रेस कोड के नाम पर स्कर्ट और ऊंची एड़ी जूते आदि के असुविधाजनक, लेकिन फैशनेबल पोशाकों से लैस होना पड़ता है. कुदरती तौर पर दो बराबर के व्यक्ति में इस तरह के वस्त्र-विभाजन के पीछे कौन-सी वजह होगी, जिसमें एक का व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और दूसरे का शरीर?
इसी तरह महंगे आधुनिक स्कूलों में लड़कियों की घुटनों से ऊपर तक चढ़े स्कर्ट जैसी वर्दी तैयार की जाती है, जिससे वे स्कूल के मैदान में सामान्य उछल-कूद भी नहीं मचा सकें. और वे ऐसा करने की कोशिश करें, तो वह दूसरों को तुष्ट करने का जरिया बने.
हालांकि अब महानगरों के बहुत से स्कूल अपनी वर्दी को जेंडर न्यूट्रल बनाने की कोशिश में हैं, मगर ऐसे स्कूल बहुत कम हैं. देह आधारित सामाजिक दृष्टि की दुनिया में दुकान चलाने के लिए आकर्षण के टोटकों का शोषण तो लाजिमी बनता है!
आधुनिक समाज में फैशन शो और पेज थ्री पार्टी की धूम मची रहती है. इन्हीं के साथ फैशन की दुनिया से एक जुमला उछल कर आया है ‘मालफंक्शन’ का. यानी मॉडल, हीरोईन या सोशलाइट के कपड़ों का ऐसे कट-फट जाना या गिर जाना, जिसके कारण उनके वे अंग कैमरे में कैद हो जाएं जिन्हें ढकने के लिए आम महिलाएं कपड़े पहनती हैं.
लेकिन मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि ‘मालफंक्शन’ के इस आधुनिक चलन की एक खासियत यह क्यों है कि यह सिर्फ महिलाओं के शरीर के साथ ही होता है? यानी महिलाओं के ही कपड़े इतने ‘नाजुक’ और असुविधाजनक बनाए जाते हैं कि अगर शरीर स्वभावगत सुविधा की मुद्रा में आना चाहता है तो ये कपड़े धोखा दे देते हैं और उस महिला को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है.
यह ‘मालफंक्शन’ पुरुषों के साथ होता है या नहीं, यह पता नहीं, क्योंकि हम इस तरह मीडिया में उन्हें शर्मिंदा होते हुए शायद ही देखते हैं. हों भी क्यों? शर्म आखिर स्त्रियों का गहना है, इसलिए शर्मिंदा होने की ठेकेदारी स्त्रियों को उठानी होगी!
अगर किसी दफ्तर में कोई पुरुष हाफ पैंट, बरमूडा या कैपरी पहन कर आ जाए तो यह अनुशासन के खिलाफ होता है. सब उसे ऐसी नजरों से घूरते हैं, जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो. उसका यह तर्क बिल्कुल नहीं सुना जाएगा कि उसे बहुत गर्मी लग रही थी या शरीर की किसी परेशानी से आराम पाने के लिए उसने ऐसा किया या फिर यह चलन में है.
वहीं अगर कोई महिला छोटे स्कर्ट पहन कर आधी टांगों का प्रदर्शन करते हुए ऑफिस पहुंचती है तो उसे आधुनिक और वेल ड्रेस्ड समझा जाता है. अपने घर में बीवी या बेटी को सात परदे में रखने वाले सहकर्मी उस महिला की तारीफ करते नहीं थकते. पुरुष का टांगें दिखाना अभद्र और बुरा है और किसी महिला का टांगें दिखाना या शरीर प्रदर्शन में अपना व्यक्तित्व देखना आधुनिकता का प्रतीक! अजीब विकृत मानसिकता है. इस दोहरेपन की साजिश को समझना क्या इतना मुश्किल है?
स्त्री और पुरुष अगर बराबर है तो उनके लिए तैयार परिधानों में शारीरिक संरचना को ढकने-दिखाने के पैमाने कहां से आए? ‘अपनी पसंद’ के कपड़े पहनने की आजादी का सिरा किस गुलामी से जुड़ता है, क्या हमारा ध्यान इस पर कभी जा पाता है?
वस्त्रों के बंटवारे के इस ढांचे के आधार में ही गड़बड़ी है. एक तरफ परदे में ढक-तोप कर तो दूसरी ओर आधुनिकता के नाम पर निर्वस्त्र कर, व्यवस्था ने स्त्री को सिर्फ देह ही बनाया है. इस मामले में पहल तो महिलाओं को ही करनी पड़ेगी. ‘फैशन पुलिस’ के आतंक के खिलाफ महिलाओं को ही आवाज उठानी होगी.
क्या हम यह अंदाजा लगा सकने में सक्षम नहीं है कि हमारी अपनी बड़ी होती बेटियां महज एक फैशन के पैमानों में फिट होने वाली देह बन कर न रह जाएं? अकेले देह पर आधारित व्यक्तित्व देह आधारित मानसिकता भी तैयार करेगा. और इसका शिकार आखिर स्त्री को ही होना है. इसलिए स्त्री का देह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि उनका ‘व्यक्ति’ होना जरूरी है.

उस किताब से बहुत प्यार था मंडेला को

नेल्सन मंडेला जिस कविता को बहुत संभालकर रखते थे और बारबार पढ़ते थे, चुनौती और मुश्किल के हर पल में, उसका नाम इन्विक्टस है. लैटिन शब्द इन्विक्टस का अर्थ अपराजेय है. इन्विक्टस विक्टोरियन युग की 1875 में प्रकाशित कविता है. इसे ब्रिटिश कवि विलियम अर्नेस्ट हेनली ने लिखी थी. इन्विक्टस इस फ़िल्म का नाम भी है, जो मंडेला पर बनी थी. इसमें वे राष्ट्रपति बनने के बाद अपने देश की रग्बी टीम को जीतने के लिए प्रेरित करते हैं. इस फ़िल्म के ज्यादातर सदस्य श्वेत हैं. उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है. नरक के अंधेरे की तरह घुप काले में, जिस रात ने मुझे लपेट कर रखा है, शुक्रगुज़ार हूं उस जो भी ईश्वर का, अपनी अपराजेय आत्मा के लिए, परिस्थियों के शिकंजे में फंसे होने के, बाद भी मेरे चेहरे पर न शिकन है, और न कोई ज़ोर से कराह, वक़्त के अंधाधुंध प्रहारों से, मेरा सर खून से सना तो है, पर झुका नहीं, क्रूरता और आंसुओं की इस जगह के पार, मौत के गहराते सायों के बाद भी, और साल-दर-साल की यंत्रणाएं, पाती हैं, और पाएंगी मुझे निर्भीक, इससे फ़र्क नहीं कि दरवाज़ा कितना संकरा है, और मेरे खिलाफ़ सज़ाओं की फ़ेहरिस्त कितनी लम्बी, मैं हूं अपनी नियति का मालिक, मैं हूं, अपनी आत्मा का महानायक। (रचनाकारः विलियम अर्नेस्ट हेनली, 1849–1903) 

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

तत्याना
सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।
एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था।
अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।
बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं।
उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है।
स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।
इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।
फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।
उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।
सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।
पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.
सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।
यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।
बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।
गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।
अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।
सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.
बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।
यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।
1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।
फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।
बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।
राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।
1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।
जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।
यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।
अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।
छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।
जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ‘ग़दर: एक प्रेम कथा‘ है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।
दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।
कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।
आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।
खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!
अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।
हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।
फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।
मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!
अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।
इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।
गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।
फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।
चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।
यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।
मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।
निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।
सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।
अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।
अरुंधती राय एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

तुम चुप रहो गुलमोहर

चण्डीदत्त शुक्ल की कहानी
एकांत का धूसर रंग हो, चाहे मिलन की चटख रंगोली। खुशी मन में ही पैदा होती है, वहीं खत्म भी हो जाती है। हर दिन को होली बनाने की चाहत में फाल्गुनी ने वर्जित फल चख तो लिया, लेकिन वह भूल गई थी कि हम अकेले भी अपने अंदर होते हैं और पूर्ण भी खुद से ही। कोई तनहाई दूसरों के सहारे खत्म नहीं होती...
आसमान के गाल लाल थे। ऐन टमाटर की माफ़िक। होली का हफ्ता शुरू हो चुका था, सो धरती से अंबर तक, हर तरफ रंगों की बारात सजी थी, लेकिन हैरत की बात – सर्दी अब भी हवा की नसों में तैरती हुई। ठंड ने बादलों को थप्पड़ मार-मारकर पूरे आसमान को सुर्ख कर दिया था। सारी रात जागने के बाद चांद कराह रहा था। दर्द के मारे उसके पैरों की नसें नीली पड़ गई थीं। उसकी विनती पर ही सरपट भागते, सूरज के रथ के आगे जुते घोड़े यकायक ठहर गए। उनके पैरों की नाल यूं झनकी कि फाल्गुनी की आंखों से पलकों ने कुट्टी कर दी। उसने `आह कह अंगड़ाई ली और करवट बदली। निगाहें लाल थीं। कम सोने और ज्यादा जागने की वजह से। रात का लंबा वक्फा आंख की राह से गुजरकर आगे बढ़ा था।
बगल में लेटा निहार अब भी निढाल था, सुध-बुध खोए हुए। नींद में शायद ख्वाब जाग रहे थे। तभी तो सांस-दर-सांस नींद में दाखिल हुआ वह मुस्कुराता जा रहा था। फाल्गुनी ने टहोका – `सूरज के घोड़े आसमान के बीचोबीच ठहरे हुए हैं और तुम हो कि घोड़े बेचकर सोते ही जा रहे हो। उठो, भोर हो गई है। मुझे झटपट तैयार होकर दफ्तर के लिए निकलना है।‘
वह खिलखिलाई। उसके जूड़े में सजी चमेली के दो फूल मेज पर बिखर गए। महक बिखरते फूल... सफेद... कमरे में गुनगुना अंधेरा था और फूल जुगनुओं की मानिंद रोशनी के हरकारे बने थे।
`ऊं... सोने दो न... आज कौन-सा दफ्तर? अब तो छुट्टी हो गई है न होली की। निहार कुनमुनाया। फाल्गुनी गुर्राई - `अभी आठ दिन बाकी हैं जनाब।‘ हालांकि चिल्लाते ही उसे हंसी आ गई। थोड़ा-सा तरस और ज़रा-सी झुंझलाहट, एकसाथ। वो है ही ऐसी। प्यार करते वक्त भी तनी रहती है। निहार अक्सर टोकता - `हिटलर की तरह अकड़ी क्यों रहती हो? कभी झुक भी जाया करो।‘ फाल्गुनी के पास एक ही जवाब होता - `तुम मर्दों ने हम औरतों को इसी प्यार के नाम पर हमेशा ठगा है। झूठ-मूठ का प्रेम और बदले में कब्जा कर लेते हो हमारी सच्ची निष्ठा। अब ये दांव न चलेगा। हम आज की औरत हैं। प्यार और गुलामी में फर्क समझती हैं।‘
निहार खिलखिलाता - `अच्छा जानम, नहीं समझना तो न समझो। हमें गुलाम ही बना लो।‘ फाल्गुनी फिर भी अड़ी रहती - `ये सब दांव हैं तुम लोगों के। निहार अब तंज कसता, लेकिन धीरे से - `बड़ा एक्सपीरिएंस है तुम्हें।‘ फाल्गुनी छिल जाती, लेकिन करती भी क्या। सोचती - `भगवान ने इन्हीं बंदरों से जोड़ी लगाई है। जैसे भी हैं, इनसे अपने हिस्से का प्यार तो हम औरतों को वसूल करना ही है।‘
यूं भी, निहार से मिलने के बाद ही उसकी ज़िंदगी के सारे रंग लौट आए थे। हर दिन होली जैसा होता। खुशी की बौछार से नहाया हुआ। वह चिबुक पर चूमता और फाल्गुनी की आंखें मुंद जातीं। हर तरफ शोर गूंजता – होली है...होली है। ऐन सितंबर के महीने में भी `छपाक’ कर गुदगुदी का गुब्बारा फूटता, ठीक दिल के बीचोबीच।
ये कैसी कहानी है। क्या है इसका ओर और छोर। सच बात। नहीं है कोई कोर-किनारा, लेकिन चौंकने की बारी अब आपकी है। निहार और फाल्गुनी पति-पत्नी नहीं हैं, वे प्रेमी-प्रेमिका भी नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे को बेस्ट फ्रेंड बताते हैं। नाइट शिफ्ट के बहाने निहार फाल्गुनी के फ्लैट में अक्सर आकर ठहर जाता है – न सही, दो-चार कैजुअल लीव! वह शादीशुदा है। फाल्गुनी जानती है, फिर भी उसके घर के दरवाजे निहार के लिए खुले रहते हैं। ये उनके बीच एक गुप्त समझौते की तरह है। दोनों जानते हैं कि उन्हें एक-दूसरे से क्या चाहिए। साफ-साफ इसका हिसाब किसी के पास नहीं। देह? नहीं, बहुत छोटी-सी चीज हैं ये तो। फिर पैसा? दोनों कमाते भी ठीकठाक हैं। फिर क्या है, जिसकी तलाश में वे मिलते हैं। अक्सर, चोरी-छुपे नहीं, बेधड़क। जवाब तलाशना बाकी है। फाल्गुनी बुदबुदाती है – निहार मेरे खोए रंग लौटाकर लाया है तो निहार के पास भी जवाब है – अरे, कुछ नहीं. वी आर जस्ट फ्रेंड्स। नथिंग स्पेशल।
फाल्गुनी के लिए निहार का साथ एक वर्जित फल की तरह है। यूं, वह स्वेच्छाचारी नहीं है। इतनी आधुनिक भी नहीं। देह उसके लिए वर्जना का बड़ा अध्याय रही है एक समय तक, लेकिन अब नहीं। वह जानती है कि इसी के लिए सब उसके आसपास मंडराते हैं तो वह क्यों न, अपनी पसंद का पुरुष चुने। हां, `बेस्ट फ्रेंड्स’ का गढ़ा जवाब वह भी अक्सर बुदबुदाती रहती है। न जाने क्यों। मन में उमड़ता एक गुलाबी रंग उसके लिए सबसे बड़ा है। हर दिन को होली बना लेने का ज्वार...।
ऑटो स्टैंड की ओर बढ़ती हुई फाल्गुनी सोच रही थी - सब कुछ तो है उसके पास। निहार भी, भले ही किसी के हिस्से से मांगा हुआ ही सही, फिर वो उदास क्यों है। आठ दिन बाद होली है। उसका पसंदीदा त्योहार। क्या खूब हुल्लड़ करती थी वो होली पर। सहेलियों की टोली निकलती तो मोहल्ले में तूफान आ जाता। मां बड़बड़ाती - `देखना, एक दिन नाक कटवाएगी आपकी लाडली’ और पापा कान में तेल डाले गुटका रामायण पढ़ते रहते। फाल्गुनी सहेलियों के संग मुंडेर लांघती, छत-दर-छत फलांगती कहां-कहां न हो आती। एक-एक सहेली को रंग से सराबोर करने के बाद जब वे थक जातीं तो सब की सब बॉलकनी में इकट्ठा हो राह आते-जाते लोगों पर रंग भरे गुब्बारे फेंकतीं। दोपहर बाद गुलाल का दौर चलता और देर शाम जब फाल्गुनी नहाती तो छींकते-छींकते दोहरी हो जाती। मां तब भी बड़बड़ातीं - `देखो कलमुंही को। बांस की तरह हो गई है, लेकिन लाज-शर्म रत्ती की नहीं है।‘
ऐसा था क्या? नहीं... फाल्गुनी तो छुईमुई के पौधे की तरह थी... तब से अब तक वैसी की वैसी है, लेकिन पांच-पांच दिन तक जींस पहने, रात-बेरात भटकने वाली फाल्गुनी ऊपर से तो एकदम बिंदास, बेखौफ़, बेखटक नज़र आती है। कुछ तो है, जो वो उदास रहती है। होली का त्योहार उसके सीने में पूरा का पूरा समंदर पैदा कर देता। वह खिलखिलाती, चिल्लाती, निहार को मजबूर कर देती कि वो कोई भी बहाना बनाकर उसके पास आए। निहार आता तो उसे दबोचकर लाल-पीला-नीला-गुलाबी कर देती। उसे अच्छा लगता था, एक तरफ सीडी प्लेयर पर गाना बजता रहे - लौंगा-इलायची का बीड़ा लगाया, खाए गोरी का यार, बलम तरसे, रंग बरसे... और दूसरी तरफ वह स्केच पेन से निहार के क्लीन-शेव्ड चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ बनाती रहे। कुछ न मिलता तो उसकी सफेद शर्ट पर इंक पॉट उड़ेल देती।
निहार छटपटाता उसकी पकड़ से छूटने के लिए और वह उसे पीटती, धौल-धप्पे लगाती...लेकिन जैसे ही वह अपने घर जाने की बात करता, वही पुरानी जमी उदासी जैसे हरी हो जाती और उसके सीने में उगा समंदर सिमटने लगता।
वैसी ही उदासी, जैसी काफी कम उम्र से थी। हाईस्कूल से। कैसी है ये गांठ – फाल्गुनी कभी टोह नहीं लगा पाई। मुंहबोली बहन जैसी दोस्त मंजू से उसने पूछा भी था – `पता नहीं क्यों मैं उदास रहती हूं? खूब खिलखिलाकर हंसने के ऐन बाद हो जाने वाली उदास? क्या करूं? कुछ तो सोल्यूशन बताओ।‘
मंजू मुस्कुराई थी। चुटकी भर बोली - `किसी से जी भरकर प्यार कर लो। सब ठीक हो जाएगा। इस उम्र में ऐसा होता है।‘
फाल्गुनी उसे क्या बताती, प्यार तो वह तभी कर बैठी थी, जब नवीं में थी। पूरे एक साल पहले। अपने मास्टर जी से। एक बार रात भर जागकर मास्टर जी को चिट्ठी भी लिखी और उसमें पूड़ी पैक करके स्कूल ले गई थी। लंच टाइम में मास्टर जी को टिफिन पकड़ाते वक्त मनुहार की थी – `सर! आपके लिए खास दाल की कचौरी बनाई है। प्लीज़, आप खाइएगा ज़रूर।‘
इंटरवल के बाद मास्टर जी ने उसे खाली टिफिन लौटाते हुए ताकीद की थी – `फाल्गुनी, बच्चे, थैंक यू, लेकिन ये वक्त पढ़ाई में मन लगाने का है।‘ वह दिन था और अब, फाल्गुनी की उदासी और बढ़ गई थी। उसके बाद कितने ही दिन गुजरते गए। त्योहार आते रहे। होली भी आई और बेरंग गुजर गई। फाल्गुनी ने पढ़ाई पूरी की। हॉस्टल की बेस्वाद रातें, शामें और दोपहरियां उसके दिल पर पत्थर बनकर लदी रहतीं, लेकिन वो जीती गई, एक-एक दिन। न, बोझ बनाकर भी नहीं। उसके तन-बदन में एक उमंग और उदास धुन का अजीब-सा मेल हरदम बना रहता था। नौकरी में आने के तुरंत बाद निहार से मुलाकात हुई और दोनों कब एक-दूसरे की ज़िंदगी में अतिक्रमण कर बैठे, वे खुद भी नहीं जानते। हां, निहार से मिलना उसकी ज़िंदगी में रंग लौटा लाया था। उसे तो यही लगता था और निहार भी कहता – तुम मेरी लाइफ में बहुत लकी साबित हुई हो।
धचके के साथ ऑटो रुका और विचारों की रेलगाड़ी पटरी से उतर गई। फाल्गुनी ने मीटर देखा। चौवालीस रुपए हुए थे। वह ड्राइवर को पचास रुपए का नोट देकर, `कीप द चेंज’ कहते हुए आगे बढ़ गई। फाइलों का ढेर निपटाते हुए कब दोपहर के डेढ़ बज गए, पता ही नहीं चला। चपरासी ने केबिन का दरवाज़ा खोलकर कहा – `मैम! लंच के लिए जाएंगी क्या?’  वह अनमने अंदाज में टिफिन निकालकर उठने ही वाली थी, तभी एक महिला स्वर उसके कानों से टकराया – `मैं अंदर आ जाऊं फाल्गुनी?’
वह चौंकी। कौन है ये महिला, जो उसका नाम लेकर इतने अनौपचारिक ढंग से पुकार रही है। फाल्गुनी बोली – `यस, कम इन।‘ लंबे जूड़े में फूल सजाए, साड़ी पहने एक मध्यवय महिला ने अंदर केबिन के अंदर कदम रखे – `हाय! मैं सुजाता हूं। सुजाता ठाकुर।‘
-         हाय! सुजाता?
-         जी, सुजाता ठाकुर, पोएट। आप फेसबुक पर अक्सर कमेंट्स करती रहती हैं मेरी कविताओं पर।
-         हम्म्म... जी, लेकिन आप यहां, आज, यकायक?
-         ये तो आप जानती ही हैं कि मैं इसी शहर में रहती हूं, लेकिन मैं एक और परिचय दे दूं...।
फाल्गुनी की उत्सुकता चरम पर थी। वह बोली – हां...।
- मैं निहार की पत्नी हूं... नहीं, नहीं, घबराइए नहीं। मैं जानती हूं कि उसने आपको मेरे बारे में कुछ भी नहीं बताया होगा, पर मुझे सब पता है। मैं उसका पर्स खाली करते समय आपकी फोटोग्राफ देख चुकी हूं। बाकी, आपका सारा परिचय तो एफबी पर है ही।
फाल्गुनी कुछ बोल न पाई। सुजाता उसके सामने बैठी थी और फाल्गुनी की आंखों के आगे अतीत टिमटिमाने लगा था। निहार ने यहीं, इसी दफ्तर में लंच टाइम में कॉफी के लिए इन्वाइट किया था। कितना केयरिंग एप्रोच था उसका। बाद के दिनों में उसने बताया था कि उसकी पत्नी कम पढ़ी-लिखी, एक देहाती महिला है। और ये भी – मेरी फैंटेसीज कुछ और हैं...। यू नो...!
न जाने कब से प्रेम की, साथ की तलाश में भटक रही फाल्गुनी को निहार गुलमोहर के पेड़ की तरह लगा। वही गुलमोहर का पेड़, जहां पहली बार मास्टर जी की कड़वी सलाह के बाद वह चुपचाप रोई थी। उसकी आंखों में काली-मिर्च का पावडर जैसे किसी ने डाल दिया था....और तब भी, जब एक बार होली के ही दिन, जीजाजी ने उसके कुर्ते पर पान की पीक फेंक दी थी। गुलमोहर के पेड़ ने दोनों दिन उसे संभाल लिया था। अपनी डालियों में। खुशबूदार भरोसे के साथ।
होली के दिन फाल्गुनी तब भी हंसती थी... एक उदास हंसी, लेकिन जब से निहार उसे मिला था, वो सारी नैतिकता भुलाकर उसके साथ बिंदास घूमने लगी थी। रातों के वक्त, दोपहरियों में भी कभी-कभार। उसने अपने मन में सोचा था – निहार को ही कहां किसी का साथ मिला है। अगर मैं और वो एक-दूसरे के साथ कुछ लम्हा ही खुश रह सकते हैं तो इसमें क्या बुराई है?
पिछले तीन साल से निहार और फाल्गुनी इसी अनियतकालिक रिलेशनशिप में थे। एक-दूसरे के बारे में बेहद संक्षिप्त जानकारियों और महीने में तीन-चार मुलाकातों, नाइट स्टे के सिवा उन दोनों के पास कुछ भी नहीं था... लेकिन गुलमोहर का पेड़ हर रात फाल्गुनी के सीने में आकर खिल उठता, पूरी ताकत के साथ, खुशबुए फैलाता हुआ। जिस रात निहार घर आता, फाल्गुनी रंगों में सनी रहती। कभी कभी ब्लेड से अंगूठा काटकर तिलक लगाने की नौटंकी करती तो कभी बेसन घोलकर अपने सिर में डाल लेती और चिल्लाती – होली आई है। आई है होली...।
`निहार तुम्हारे पास केवल सेक्सुअल फेवर के लिए आता है... तुम्हारी तलाश भी वही होगी शायद?’
सुजाता को आप से तुम संबोधन पर आने में देर नहीं लगी थी और अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद फाल्गुनी थर्रा उठी थी। किसी अज्ञात भय से। धीमी आवाज़ में उसने बस इतना कहा – नहीं, वो मेरा बेस्ट फ्रेंड है।
-         मैं व्यंग्य नहीं कर रही हूं, लेकिन रातें साथ बिताने वाले बेस्ट फ्रेंड नहीं, सिर्फ बेड पार्टनर होते हैं फाल्गुनी।
-          मैम, आप जो भी समझें, सच जो भी हो, लेकिन मुझे निहार का साथ अच्छा लगता है।
फाल्गुनी की आवाज़ में मजबूती थी, कांपती हुई ही सही। सुजाता ने कहा –मैंने होली पर जो कविता लिखी थी... उस पर तुम्हारा कमेंट मुझे अब भी याद है। सब के सब रंग धूसर क्यों लगते हैं, यही पूछा था न तुमने और उछाह के साथ बता गई थीं, कोई प्रेम में हो तो कुछ भी बेनूर नहीं लगता। अब जान पाई हूं कि वो सब के सब रंग तुम्हें निहार से मिल रहे हैं। उस निहार से, जो अपनी पत्नी और बच्चों का भी नहीं हुआ। हम सबके अंदर एक एकांत होता है फाल्गुनी, लेकिन वह न तो उधार के प्रेम से पूरा होता है, न ही धोखे से रचे-बसे ढोंग से।
फाल्गुनी क्या कहती, कैसे बताती। कैसे निहार उससे खूब मिलता रहा हर दिन जोर-शोर से और चुपचाप उसकी रगों से होके गुज़र गया था। वह भी तो चुपचाप उसके साथ चलती गई थी, लेकिन नियति यही थी कि ये सफर खाली साबित होना था। बिना मंजिल का सफर!
-         आप क्या कहना चाहती हैं?  क्या आप निहार पर अपने हक़ को लेकर मुझसे झगड़ने आई हैं?
-         नहीं, मैं तो निहार को तलाक देने वाली हूं। महज इसलिए नहीं कि उसका तुमसे अफेयर है। अब मुझे उस पर यकीन नहीं रह गया है, केवल इसीलिए। तुम चाहो तो उसके साथ रहो, लेकिन एक बात कहूंगी – एकांत अपने अंदर होते हैं। खुद ही खत्म भी किए जाते हैं। इनमें कोई दाखिल तो हो सकता है, लेकिन वह और अकेलापन ही लेकर आता है... कोई हल कभी नहीं होता, किसी और के पास।
बस, कहानी यहीं खत्म होती है। आप ये अंत नकार देंगे। शायद, लेखक को कोसें भी, लेकिन मजबूरी है, कहानी इसके आगे बढ़ेगी भी तो क्या? होली के आठ दिन पहले फाल्गुनी की रंगों की तलाश अधूरी रह गई है... रात में वह बड़बड़ाती है – कब है होली, कब है होली। होली के दिन वह हंसेगी भी... फिर उदास होगी, लेकिन अब जान चुकी है – प्रेम यूं ही नहीं मिल जाता, महज देह मिलती है, वह भी प्रेम के ढोंग के साथ। फाल्गुनी ने फ्लैट भी बदल दिया है। निहार कहां गया, पता नहीं। अब कभी उसके ख्वाबों में गुलमोहर का पेड़ दाखिल होता है, तो वह चिल्ला पड़ती है – चुपचाप रहो गुलमोहर। उसके सीने में समंदर नहीं जागता, हां... कंप्यूटर के वॉल पेपर पर जरूर समंदर की तलहटी की तसवीर है। जाने तो क्या नाम है उस समुद्र का... शायद, अरैबियन सी!

मर्दवाद बड़ी चुनौती : वीर भारत तलवार

सन् 1970 के दशक में जो मथुरा रेप केस का फैसला हुआ, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि लड़की चरित्रहीन थी और उसका बलात्कार नहीं हुआ। इस फैसले के विरोध में 18 जनवरी 1980 को बंबई के कई संगठन सड़कों पर आए और उन्होंने मिल कर ‘फोरम अगेन्स्ट रेप’ नामक एक फोरम बनाया और उसके माध्यम से धीरे-धीरे पूरे देश में आंदोलन फैल गया। 8 मार्च को दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास सभी जगह रेप के खिलाफ आंदोलन हुए। इसके साथ ही उसका एक कल्चरल विंग भी था जिसमें स्टडी-ग्रुप वगैरह भी थे और ये रेप के खिलाफ जो फोरम बना, जो इनके सदस्य थे, वे पीड़ित महिलाओं, जिनके साथ रेप हुआ था, उनके पास जाकर उनकी काउन्सलिन्ग करते थे। इस प्रकार उसे एक जन-अभियान का रूप दिया गया था।
आज जो जन-आंदोलन चल रहा है उसमें एक बड़ा और महत्वपूर्ण फर्क है। 1980 में जो आंदोलन बंबई से शुरू हुआ वह मुख्य रूप से महिला-संगठन का आंदोलन था। कुल मिलकर लगभग 150 सक्रिय महिलाएं सामने आई थीं और उन्होंने इस आंदोलन को चलाया था। लेकिन इस बार जो आंदोलन हुआ है यह सिर्फ महिला संगठनों द्वारा संचालित नहीं है, बल्कि महिला संगठन बहुत कम हैं इसमें। यह आंदोलन जिस बड़े पैमाने पर फैला उसका एक बहुत बड़ा कारण हिंदुस्तान की एक बड़ी वामपंथी राजनीतिक पार्टी, उसका एक बड़ा स्त्री संगठन एपवा (APWA) और उसका एक बड़ा विद्यार्थी संगठन आइसा (AISA) है। ये संगठन अगर नहीं होते तो यह आंदोलन आज देशव्यापी रूप नहीं ले पाता। जनाक्रोश को एक संगठित और व्यापक रूप देने के लिए एक राजनीतिक संगठन कितना जरूरी है, यह आज बहुत महत्वपूर्ण है। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि आज देश में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो इस तरह के आंदोलन को फैलाना चाहता हो, सिवाय इसको भुनाने के। यह एकमात्र संगठन था (AIPWA और AISA), जिसने जनाक्रोश को देखते हुए उसके मूल्यों के लिए इस लड़ाई को फैलाया।
दूसरी बात मैं यह कहना चाहूँगा कि भारत में बदलाव लाने के लिए जो आंदोलन हैं, वह कहाँ से शुरू हो सकते हैं? हिंदुस्तान की सारी राजनीतिक व्यवस्था, जो political class है, जो सिर्फ चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना चाहते हैं, उनकी सीमाएं आज बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट हो चुकी हैं। अन्ना हज़ारे का आंदोलन, एक ऐसा आंदोलन था जो बड़ी संभावनाओं के लिए हुआ था, हालांकि उसकी कई सीमाएं भी थीं। वह सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ था इसलिए किसी भी राजनीतिक दल ने उसका समर्थन नहीं किया। मैं समझता हूँ कि वामपंथियों को उस आंदोलन को उसकी सीमाओं से मुक्त करके, उसकी अंतर्निहित संभावनाओं का अपने ढंग से विकास करना चाहिए था क्योंकि एक पूरा जनांदोलन बनने की असीम शक्ति उस आंदोलन में थी। दुर्भाग्य से हिंदुस्तान का वामपंथी आंदोलन इस काम से चूक गया। वे भी चूक गए जो आज इस आंदोलन को उठा रहे है, लेकिन यह अच्छी बात है कि आज जो आंदोलन हुआ, वामपंथी संगठन इस काम से नहीं चुके और उसने इस सवाल को उठाया।
एक महत्वपूर्ण दृष्टि से यह सांस्कृतिक आंदोलन है। किसी देश में बदलाव का आंदोलन कहाँ से शुरू होगा यह कहा नहीं जा सकता है। आप सब जानते हैं कि चीनी क्रान्ति का आंदोलन भी 4 मई के एक सांस्कृतिक आंदोलन से ही शुरू हुआ था और संयोग से वहाँ के विद्यार्थियों ने ही 1919 ई. में किया था। मैं वर्तमान आंदोलन के एक सांस्कृतिक रूप को ज्यादा देख पा रहा हूँ। यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है जिसने हमारे देश में जेंडर (Gender) के सवाल को व्यापक पैमाने पर उठाया है। इस सांस्कृतिक आंदोलन के उभरने के साथ-साथ दुश्मन भी तैयार गया है। दो खेमें इस आंदोलन के बाद उभर कर आए हैं। इस आंदोलन के विरोधी खेमों के प्रतिनिधियों ने, चाहे वो शंकरचार्य हों, मोहन भागवत हों या राजनीतिक दलों के नेता भी हों, उन लोगों ने भी अपनी बातें कही हैं। स्त्रियों की लक्ष्मण रेखा खींची है और बताया है कि स्त्रियाँ भी दोषी हैं। महत्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा कहे जाने के बाद भी इस विरोधी खेमे की आवाज़ कमजोर सी लगी है। पर मैं आपसे कहना चाहूँगा कि दुश्मन को आप कमजोर न समझिएगा। उसके पीछे बहुत बड़ी ताकत है जनता की पिछड़ी हुई चेतना, जनता की सोयी सोई हुई चेतना, जिन सवालों पर जनता को कभी सचेत नहीं किया गया है। वह पिछड़ी हुई चेतना ही इन लोगों की सबसे बड़ी ताकत है, उसी के बल पर ये लोग खड़े हैं। ये जो हमारी संस्कृति की प्रथाएँ हैं, हमारी धार्मिक मान-मर्यादाएं हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं, ये सब इनकी ताकत हैं। अगर आप इनके खिलाफ लड़ने की हिम्मत रखते हैं तो आपको ये समझकर चलना चाहिए कि दुश्मन बहुत शक्तिशाली है। सामाजिक रूढ़िवाद उसका मुख्य आधार है और इस लड़ाई को अगर हम आगे ले जाएँगे तो निश्चित रूप से समाज में एक ध्रुवीकरण पैदा होगा- इन मूल्यों के खिलाफ और इन मूल्यों के पक्ष में। और, इस तरह इस सांस्कृतिक लड़ाई के दो मुख्य ध्रुव होंगे। एक ओर हिंदुस्तान का युवा-वर्ग होगा और दूसरी ओर हिंदुस्तान की सामंती शक्तियाँ, पुरोहितवाद, सांप्रदायिक और फ़ासिस्ट ताक़तें होंगी और उस लड़ाई के लिए मैं समझता हूँ कि मानसिक रूप से उन लोगों को तैयार होना चाहिए जो इस जनांदोलन में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
आज इस देश में सांस्कृतिक लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण हो गई है, खासकर मौजूदा भूमंडलीकरण और बाजारवाद के कारण। ये जो पिछले 10-15 सालों में रेप की संख्या इतनी बढ़ी है उसका एक बहुत बड़ा कारण भूमंडलीकरण और बाजारवाद का माहौल है और उसे उदारीकरण की नीतियों से बढ़ावा मिला है। आज देश में लुटेरी और भ्रष्ट जितनी ताकते हैं, सबको खुली छूट मिली हुई है। आप कुछ भी कर लीजिये कुछ नहीं होगा। कानून की भूमिका सिमटकर लुटेरों की रक्षा करने और उनके खिलाफ जनसंघर्ष उठाने वालों का दमन करने तक ही सीमित रह गई है। इसके अलावा आज देश में कानून की कोई व्यवस्था और भूमिका नहीं रह गई है। लेकिन सांस्कृतिक लड़ाई लड़ने के लिए उसके बदलने तक का इंतजार नहीं करना चाहिए। यह जो एक मार्क्सवादी बहस चलती रहती है कि आधार के ऊपर ही ये चीजें खड़ी हैं और आधार बदलेगा तभी ये बदलेंगी, यह एक बीती हुई बात है। बुनियादी आधार बदलने तक कोई सांस्कृतिक लड़ाई रुकती नहीं है। माओत्से तुंग से किसी ने पूछा था कि चीन में समाजवाद तो आ गया, स्त्री-पुरुष समानता कब कायम होगी? माओत्से तुंग ने कहा था- तीन-चार सौ साल लगेंगे। यह समाजवादी क्रांति के उस सबसे बड़े नेता का कहना था। उन्होंने कोई झूठा आश्वासन नहीं दिया, कोई सब्जबाग नहीं दिखाया, कोई झूठा सपना नहीं दिखाया। समाजवाद आ जाने के बाद भी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बदलाव आने में 3-4 सौ साल लगेंगे चीन में, क्योंकि बदलना इतना आसान नहीं होता है कि बुनियादी आधार बदला तो संस्कृति भी बदल गई। इसलिए संस्कृति की लड़ाई हमेशा चलनी चाहिए, बुनियादी आधार बदलने का इंतजार नहीं किया जा सकता है। ये जो सांस्कृतिक लड़ाई का सवाल है, स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में भी ये सवाल उठे थे देश में। रानाडे वैगरह का यही मुख्य विरोध था कि समाज सुधार होने चाहिए, स्त्रियों की दशा में सुधार होना चाहिए, तो तिलक ने कहा- नहीं, पहले अंग्रेजों को भगाओ, पहले हमारा देश आज़ाद हो। हम अंग्रेज़ी क़ानूनों से स्त्रियों की दशा में सुधार नहीं चाहते। हम आज़ाद होंगे तो हम सारी चीजों का सुधार करेंगे। हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई से बाहर हुआ किसानों का आंदोलन, जमींदारी प्रथा के खिलाफ आंदोलन, स्त्रियों का आंदोलन। इसलिए बाहर हुआ क्योंकि आज़ादी की लड़ाई इन सवालों को नहीं उठा रही थी। ये सवाल आज़ादी की लड़ाई दौरान भी रहे कि सांस्कृतिक बदलाव की लड़ाई भी साथ-साथ शुरू होनी चाहिए या नहीं? समाजवाद के बारे में भी यह बात सही है। आधार और बुनियादी बदलाव की बहुत बात की जाती है पर लेनिन के इस कथन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है कि- बहुत सारे सुधार हैं जिनके लिए हमें क्रांति से पहले संघर्ष करने होंगे, कई सुधार क्रांति के बाद भी जारी रखने होंगे, कुछ ही सुधार हैं जो सिर्फ क्रान्ति के बाद शुरू किए जा सकते हैं। उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से देखा कि बहुत से सुधार आंदोलनों के लिए क्रान्ति तक रुकने की जरूरत नहीं है।
सौभाग्य से 1980 के आस-पास जब हम जेएनयू आए तो देश में स्त्री-आंदोलन का माहौल था, स्त्रीवादी साहित्य पढ़ा जाता था। आज कितने लोग स्त्रीवादी साहित्य पढ़ते हैं, मैं नहीं जानता हूँ। लेकिन 1980 के दशक में एक बहुत महत्वपूर्ण किताब आई थी।  Sheila Rowbotham की किताब थी- Beyond The Fragments. Sheila Rowbotham एक ब्रिटिश वामपंथी नारीवादी थीं और उन्होंने एक बड़ी बात महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि ‘स्त्री-पुरुष संबंध कैसे होंगे समाजवाद के बाद, अगर हमारी इस बारे में कोई अवधारणा है तो उस अवधारणा को साकार करने का प्रयत्त्न समाजवाद आने के बाद ही नहीं होगा, आज से होना चाहिए। समाजवाद को लाने के लिए जो संगठन हैं, जो कम्यूनिस्ट पार्टी है या और भी जो संगठन हैं, उन संगठनों के भीतर सबसे पहले उस स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को साकार करो जो तुम समाजवाद के बाद कायम करना चाहते हो। अगर ये नहीं करते हो तो तुम्हारी उन अवधारणाओं की बात झूठी है।’ जो रूप आप कायम करना चाहते हैं उसका प्रारूप हमें पहले दिखाओ। उसे पहले अपने संगठन के अंदर प्रयोग करके दिखाओ जहां तुम्हें पूरी स्वतन्त्रता है। यह Prefigurative Movement यूरोपियन वामपंथी नारीवाद की एक बड़ी महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह बात मुझे बड़ी अच्छी लगती है कि आज उस पारिभाषिक नाम का इस्तेमाल किए बिना, लोग इस अवधारणा की बहुत सी बातों के प्रति सचेत हो रहे हैं। यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है।
आज इस आंदोलन ने जिन सांस्कृतिक सवालों को जन्म दिया है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, स्त्री के प्रति हमारे नजरिए का। इसी प्रकार ये दो खेमे बने हैं इस सांस्कृतिक लड़ाई में, जहां एक तरफ सारी सांप्रदायिकतावादी, फ़ासिस्ट, पुरोहित, सामंतवादी, ब्राह्मणवादी ताक़तें खड़ी हैं और दूसरी तरफ जनवादी आंदोलन से जुड़े हुए वामपंथी, स्त्रीवादी लोग खड़े हैं, तो इन दोनों ताकतों की लड़ाई के बीच जो एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हुआ है वो है स्त्री के प्रति नजरिए का। पुरोहितपंथी, ब्राह्मणवादी ताक़तें कहती हैं कि स्त्रियों को संरक्षण देने की जरूरत है। वो ये तो नहीं कह सकते कि बलात्कार उचित है, वो कहते हैं कि स्त्रियों को संरक्षण, सुरक्षा देने की जरूरत है। इसीलिए वो अपील करते हैं कि ‘स्त्रियों बाहर मत जाओ। घर में रहो। हम पुरुष लोग हैं, घर में तुम्हें सुरक्षा मिलेगी। तुम बाहर जाकर अपनी सुरक्षा को खतरे में डालती हो?’ यह हमारी संस्कृति का एक बुनियादी सवाल है जो आज उठके खड़ा हुआ है- स्त्री को संरक्षण चाहिए, सुरक्षा चाहिए या आज़ादी चाहिए। स्त्री कहाँ सुरक्षित है, घर में या बाहर में? वे कहते हैं, हमारी सरकार कहती है कि बाहर स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं। हम पुलिस वगैरह का इंतजाम कर रहे हैं तब तक आप बाहर कम निकलिए और रात को तो बिलकुल मत निकलिए। ये जो एक सवाल खड़ा है- क्या वाकई स्त्रियाँ घर में सुरक्षित हैं? बहू के पेट में यदि बच्चा आया है तो उसकी जांच कराई जाती है। और अगर भ्रूण में लड़की है तो उसकी हत्या कर दी जाती है। लड़की को आप घर में पैदा नहीं होने देते और आप कहते हैं कि घर में लड़कियां सुरक्षित हैं। अगर वह पैदा हो गई तो पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई, खाना-पीना सब में लड़कों के साथ उससे भेदभाव किया जाता है। घरेलू हिंसा के खिलाफ वो कहीं जाकर कुछ बोल नहीं सकती है। उसी परिवार में पति बलात्कार करता है, उस बलात्कार की कहीं कोई सुनवाई नहीं है, उसको बलात्कार माना ही नहीं जाता है। घर में बाहर के मुक़ाबले कहीं ज्यादा हिंसा होती है स्त्रियों पर, यह एक सच्चाई है। बाहर के मुक़ाबले घर में स्त्री ज्यादा असहाय है। बाहर उस पर हिंसा हो तो कुछ लोगों को मालूम हो, पुलिस-थाना हो, कुछ आवाज़ उठे। घर में? घर में तो आप सवाल ही नहीं कर सकते है। पति-पत्नी के बीच की बात है, आप कौन हैं बीच में आने वाले? ये एक बंधा हुआ जवाब है। घर में स्त्री बहुत असहाय है अपने ऊपर होने वाली हिंसा के खिलाफ। समाज के सामने हमें इस बात को बार-बार दोहराना पड़ेगा कि स्त्रियाँ घर में और भी ज्यादा असुरक्षित हैं।
यह जो घर है वह एक प्रकार से पुरुष का उपनिवेश है जिसमें वह बाहरी हस्तक्षेप बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करता है और यह उपनिवेश आज से नहीं है, ब्रिटिश भारत में भी यही था। आप 19वीं सदी को याद कीजिये जिसमें स्त्री सुधार के आंदोलन चले थे और सुधारकों ने ब्रिटिश सरकार से कानून बनाने के लिए कहा था। बचपन में ही शादी हो जाती थी तो सुधारकों ने कहा कि 12 वर्ष तक लड़की के साथ intercourse नहीं होना चाहिए। अतः सरकार से कहकर यह कानून बनवाया गया। इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन हुआ था। क्यों? इसीलिए कि स्त्री का मामला पुरुषों का अपना उपनिवेश है। उनके घर में सरकार दखल नहीं दे सकती है। राष्ट्रवादियों ने कहा- अंग्रेज़ सरकार और चाहे जो कानून बनाए, लेकिन हमारे घर की अंदर की चीजों में दखल नहीं दे सकती है। उनके बारे में कानून नहीं बना सकती है। ये अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ लड़ने वाले बहुतों ने कहा। घर हमारा उपनिवेश है। तुम भारत पर कानून चलाओ लेकिन हमारे घर के बाहर। हिन्दी के बड़े-बड़े लेखक प्रताप नारायण मिश्र वैगरह सब इसके खिलाफ थे। किसी ने इसका समर्थन नहीं किया। घर के बारे में जो नजरिया रहा है इसको चुनौती देना, इसको बदल डालना हमारी संस्कृति का एक बड़ा सवाल है। स्त्री की आज़ादी की सुरक्षा, सबकी आज़ादी की सुरक्षा एक सही सवाल है। झूठे सवालों से छुटकारा पाना बहुत जरूरी है। मुक्तिबोध ने कहा था कि-
कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में
सभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमाएँ
गिरकर तोड़ देता हूँ हथौड़े से
कि वे सब प्रश्न कृत्रिम और
उत्तर और भी छलमय
समस्या एक-
मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में
सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषण मुक्त कब होंगे?”
सही सवाल को सामने रखिए और झूठे सवाल को खारिज कीजिए। स्त्री की सुरक्षा एक झूठा सवाल है। सबकी आज़ादी की सुरक्षा एक सही सवाल है। और इसी पर विचार किया जाना चाहिए।
मित्रो! इस आंदोलन को आप इसी रूप में हमेशा नहीं चला सकते। आप रोज-रोज जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर जाकर रैलियाँ नहीं कर सकते। तो आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस आंदोलन को हम कैसे जिंदा रखें? एक आंदोलन को लंबे समय तक जिंदा रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है- विचारधारा। विचारधारात्मक संघर्ष ही इस आंदोलन को लंबे समय तक जीवित रख सकता है। इस विचारधारात्मक संघर्ष को आज हमें चलाने की जरूरत है। उन मूल्यों के लिए हमें यह संघर्ष चलाने की जरूरत है जिन्हें हम इस समाज में लाना चाहते हैं, जो हमारे लक्ष्य हैं और ये संघर्ष बहुत सारे रूपों में बहुत सारे मंचों से चलता है। ये संघर्ष साहित्य के मंच से चलेगा। ये संघर्ष वैचारिक गोष्ठियों, सेमीनारों, व्याख्यानों, कला, चित्रों, फिल्मों, गीत, संगीत, नाटक आदि के माध्यम से चलेगा। ये सारे सृजनात्मक रूप हैं विचारधारात्मक संघर्ष को चलाने के लिए। अगर हम इस आंदोलन से पैदा हुए सवालों को और इस आंदोलन को जिंदा रखना चाहते हैं तो हमें विभिन्न विचारधारात्मक रूपों में, विभिन्न सृजनात्मक रूपों में उन मूल्यों की लड़ाई को लड़ना होगा। जहां तक हिन्दी साहित्य की बात है तो उसके उपन्यास, कविता, कहानी आदि में जो स्त्री की नई छवि उभर रही है वह महत्वपूर्ण है। एक ताकतवर स्त्री की छवि। लेकिन हिन्दी साहित्य में जो स्त्री-विमर्श नाम का एक विमर्श चलता है, वह बड़ा ही दरिद्रतापूर्ण विमर्श है। इन सवालों पर हमें उनसे आगे जाने की जरूरत है। मैं आपको एक दूसरा उदाहरण देता हूँ। महाराष्ट्र को आप देखिए कि किस प्रकार सृजनात्मक रूप से वो हमेशा विचारधारात्मक लड़ाई को चलाते रहते हैं। एक और उदाहरण दूँ आपको। सावित्री बाई फुले। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले इस देश में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का पहला आधुनिक उदाहरण हैं। उनके बारे में आपको और भी जानना चाहिए। सावित्री बाई फुले के अंदर जिस प्रकार की चेतना थी, उस चेतना को झेलम परांजपे ने ओडिसी नृत्य के कार्यक्रमों द्वारा अभिव्यक्ति दी। सावित्री बाई फुले की स्त्रीवादी कविताओं को आधार बनाकर नृत्य की कई प्रस्तुतियाँ दीं। महाराष्ट्र में एक संगठन है MAVA (Men against violence against women)। स्त्रियों पर होने वाली हिंसा के विरोधी पुरुषों का संगठन। यह पुरुषों का संगठन है। फोरम अगेन्स्ट रेप में जैसे महिलाएं महिलाओं की counseling करती थीं, उसी प्रकार MAVA के सदस्य उन पुरुषों की counseling करते हैं, जो महिलाओं पर किसी भी प्रकार की हिंसा करते हैं, उनमें चेतना जागते हैं। मुझे नहीं लगता ऐसा कोई दूसरा संगठन होगा। इस प्रकार के सृजनात्मक प्रयासों का हिन्दी क्षेत्र में नितांत अभाव है।
जेएनयू में एक प्रतिध्वनि नाम का संगठन हुआ करता था जो क्रांतिकारी गाने गाया करता था। आज स्त्रियों के सवाल पर गाने वालों का कोई ग्रुप क्यों नहीं बन रहा है? क्यों नहीं स्त्रियों के सवाल पर हमारे इतने प्रतिभाशाली विद्यार्थी गीत लिख रहे हैं? इतनी अच्छी आवाज़ वाले क्यों नहीं गीत गा रहे हैं? इस तरह की सभाओं में हम क्यों नहीं स्त्रीवादी गीत गा सकते हैं? जो लोग चित्र बनाते हैं, स्त्रियों के सवाल पर चित्र बना सकते हैं, जो कवितायें करते हैं, कविता लिख सकते हैं, जो लोग फिल्म बनाते हैं, वो स्त्रियों के सवाल पर फिल्म बना सकते हैं। पचासों सृजनात्मक रूप हैं, जिनके माध्यम से हमें इन मूल्यों के लिए विचारधारात्मक संघर्ष को जारी रखना है। आज हम सबके सामने एक बड़ा सवाल है संस्कृति का, युवा वर्ग के सामने और खासकर युवकों के सामने। स्त्री विमर्श बहुत हुआ अब पुरुष विमर्श की जरूरत है। ज़्यादातर पुरुषों को ही समझने-समझाने की जरूरत है। स्त्री विमर्श का भी अपना महत्व है, उसे खारिज नहीं करना है लेकिन अगर व्यंग्य में भी कहें तो पुरुष विमर्श क्या है, इसे समझ लेना चाहिए। एक बहुत बड़ा सवाल है कि हम अपनी पितृसत्तात्मक मानसिकता को कैसे बदलें? ये युवा वर्ग के सामने, लड़कियों के सामने और लड़कों के सामने भी बड़ा सवाल है। मैं बिलकुल व्यावहारिक और सृजनात्मक रूप से आपके सामने ये प्रश्न कर रहा हूँ। आप सोचकर देखिए अपने व्यवहार में, अपने दृष्टिकोण में, अपने परिवार और दूसरे लोगों के रवैये में पितृसत्तात्मक मानसिकता जो हमें बचपन से अपने घर-परिवार से मिली है, समाज से मिली है, और अपने राज्य से मिलती है लगातार, इसे हम कैसे बदलेंगे?
हर युवती-युवक के सामने ये सवाल है कि जिन जीवन-मूल्यों के लिए हम लड़ रहे हैं, जेंडर-इक्यूलिटी के मूल्यों के लिए हम अपने जीवन में उसको कैसे उतारें? इसका जवाब मुझे नहीं देना है, आप लोगों को देना है। और, जवाब नहीं देना है, इसको साकार जीना है। यहाँ साहित्य के विद्यार्थी बैठे हैं। हमारी भाषा इतनी जेंडर-बायस्ड है कि कहना पड़ता है कि कमियाँ मुझमें भी हैं। मैं कई बार आदमी शब्द का प्रयोग मनुष्य के लिए करता हूँ। आदमीनामा लिखा नज़ीर अकबराबादी ने, वह पुरुषों के लिए है। हम गलत कहते हैं जब हम सबको आदमी कहते हैं। हमारी भाषा इतनी जेंडर-बायस्ड है, इसके बारे में हमें सोचना चाहिए। साहित्य के विद्यार्थियों को इस पर सोचना चाहिए कि हम किस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं, स्त्रियों के बारे में कितने अपशब्द हम कहते हैं। माँ-बहन की गालियों का ही सवाल नहीं है साली, ससुरा, ससुरी। मुझे क्लास में पढ़ाते हुए याद आया कि ये ससुरा, ये साला-साली इसीलिए गाली है। ये सब अत्यंत फूहड़ शब्द ही नहीं अच्छे समझे जाने वाले मुहावरेदार शब्दों में भी ये जेंडर-बायस्ड भाषा काम करती है। जैसा कि बहुत सी स्त्रियों ने कहना शुरू भी किया है यह एक प्रकार का Language Rape है। ये भाषाई बलात्कार है। हम इस प्रकार की भाषा से, इस मानसिकता से कैसे मुक्त होंगे यह महत्वपूर्ण सवाल है।
और अंत में मैं कहना चाहूँगा कि इस आंदोलन को चलाने के लिए, किसी भी आंदोलन को चलाने के लिए उसके जो मूल्य होते हैं वे मूल्य, उसके आदर्श, उसकी जो मांगें हैं, ये किसी न किसी नारे में कॉन्संट्रेट होनी चाहिए। नारे प्रतिनिधित्व करते हैं उन समस्त मांगों का, उन समस्त मूल्यों का, उस सारी चेतना का जिसके लिए हम लड़ रहे हैं। हमें कुछ ऐसे नारे विकसित करने चाहिए जो कि इस विचारधारात्मक संघर्ष को आगे भी ले जाने में बने रहें। वो एक क्रेटेरिया बन जाएँगे लोगों को जाँचने का कि आप इस नारे के साथ हैं अथवा नहीं। आप इस सारे मामले में विश्वास करते हैं या नहीं। तो समस्त चेतना, मूल्यों और संघर्ष को नापने और साथ होने का एक क्रेटेरिया बन जाता है। तो एक नारा जो जेएनयू के छात्रों ने पहले से ही दे रखा है। मुझे बहुत सही लगता है, और वो है- ‘बेखौफ़ आज़ादी’। इस सांस्कृतिक लड़ाई का सबसे प्रमुख नारा ‘बेखौफ़ आज़ादी’ होना चाहिए। ये नारा बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस सांस्कृतिक लड़ाई के जो तार राजनीति, प्रशासन, कानून, राज्य आदि से जुड़े हुए हैं, उस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ये नारा समेटता है। बेखौफ़ आज़ादी सिर्फ संस्कृति का सवाल नहीं है, बेखौफ़ राजनीति, लोकतन्त्र का, राज्य का, कानून का, पुलिस का, प्रशासन का हरेक से जुड़ा सवाल है। इसीलिए बेखौफ़ आज़ादी एक सही नारा है इस सांस्कृतिक लड़ाई का। इसके अलावा मैंने और भी नारे खोजने की कोशिश की, आप भी प्रयत्न करें। एक नारा जो मुझे ज्यादा व्यापक लगा और सही भी। मैं कहूँगा कि इस सांस्कृतिक लड़ाई से इस नारे को भी जोड़ा जाए और वो नारा है- Women’s Right is Human Right. स्त्री के अधिकारों का सवाल मानव अधिकारों का सवाल है।ये बात जो कभी दलितों के लिए अंबेडकर ने कही थी। । आज स्त्रियों के साथ होने वाले हर व्यवहार के लिए ये बात लागू है कि स्त्री अधिकार असल में मानव अधिकार हैं। इस नारे का महत्व यह है कि ये जो स्त्री-पुरुष वाला विभाजन है, एक तो प्राकृतिक विभाजन है। कोई स्त्री है, कोई पुरुष है।  लेकिन इस सवाल का मतलब शारीरिक रूप से नहीं है। इसके ऊपर जो हमारी सामाजिक निर्मिति है, ये स्त्री है और ये स्त्रीत्व होता है, ये पुरुष है और ये पुरुषत्व है। इस विभाजन को जड़-मूल से उखाड फेंकने की जरूरत है। ये स्त्री और पुरुष का विभाजन झूठा विभाजन है। बंग्ला में एक गीत है, गीत की पंक्तिया है ‘तुमी देखो नारी-पुरुष, आमी देखी शुद्धई मानुष’। तुम स्त्री और पुरुष मानकर देखते हो, मैं तो सब जगह मनुष्य को देखता हूँ। अतः ये स्त्री के अधिकार नहीं, स्त्री का सवाल है, मानवता का अधिकार है वो, मानवता का सवाल है वो। हमें पूरी मानवता के रूप में उनको उठाने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े लोग जिन्होंने मर्दवाद को चुनौती दी है। मर्दवाद से जब तक आप छुटकारा नहीं पायेंगे, आप इसी सड़ी-गली संस्कृति से छुटकारा नहीं पा सकते हैं। मर्द होना अलग बात है, मर्दवाद दूसरी बात है। ये मर्दवाद, ये पुरुषत्व, क्या चीज है ये पुरुषत्व ? ‘Boys don’t cry’ लड़के रोते नहीं,  हममें से कोई ऐसा नहीं होगा जिसने बचपन से ये बात न सुनी हो, अपने मां-बाप से, भाई-बहनों से, दोस्तों से- अए लड़का होके रोता है? छिः लड़के नहीं रोते। लड़कियों की तरह रोने बैठ गया। ये क्या बात है? ये कितनी घृणित चेतना है। हमें घृणा होनी चाहिए ऐसे सवालों से, ऐसे वाक्यों से और ऐसे मूल्यों से। मनुष्य रोता है। लड़का और लड़की नहीं रोते हैं। ऐसे सारे मुहावरे, ऐसी सारी भाषा, ऐसे सारे मूल्य जिसमें स्त्री और पुरुष का विभाजन किया गया है, फेंक देने लायक है। वो झूठे हैं, उनको खारिज कर देना चाहिए, ऐसी तमाम चीजों को। हजारी प्रसाद द्विवेदी मर्दवाद के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने ESCAPE में मर्दवाद को दिखाया। उन्होंने दिखाया कि ये जो लोग संन्यास ले लेते हैं ये मर्दवादी धारणा है। ये जो वैराग्य है और ये जो ऐशो-आराम, भोग-विलास है ये सब मर्दवादी धारणाएं हैं। ये जो सेनाएं खड़ी की जाती हैं, बड़े-बड़े मठ खड़े किए जाते हैं, और बड़ा राज्य का काम-धाम चलता है। ये सब मर्दवादी धारणाएं हैं। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में उनकी इन मान्यताओं को मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ। लेकिन हजारी प्रसाद द्विवेदी जो इन बातों में मर्दवाद देख सके, वो आज भी हम नहीं देख पाते हैं। द्विवेदी जी कहते हैं कि ‘स्त्री की सफलता पुरुष को बांधने में है लेकिन उसकी सार्थकता पुरुष को मुक्त करने में है‘। ये सफलता और सार्थकता अपनी जगह पे है, लेकिन ये क्या चीज है?  क्यों स्त्री की सफलता ? अगर सफलता और सार्थकता है भी तो सिर्फ स्त्री की क्यों? पुरुष की क्यों नहीं ? हम अगर सफलता और सार्थकताओं में विश्वास करते है तो हमें कहना चाहिए कि मनुष्य की सफलता दूसरे को बांधने में है, लेकिन उसकी सार्थकता दूसरे को मुक्त करने मे हैं। ये मनुष्य का सवाल है। स्त्री ओर पुरुष का जहां भी सवाल उठाया जाएगा आप समझिए कि वो एक झूठा सवाल है और हमें उसका विरोध करना चाहिए। मर्दवाद पुरुषों और लड़कों के लिए एक बड़ा मूल्य बना हुआ है। जिसको Macho Man के द्वारा दिखाया जाता है. इसका असर बच्चों पर, खासकर बहुत साधारण लड़कियों पर, जिनकी चेतना सोई है, वो ऐसे मर्दवादी पुरुषों और लड़कों को बड़ा हीरो मानती हैं। ये मर्दवाद जो आदर्श बना हुआ है समाज में, हमारी सांस्कृतिक लड़ाई के लिए जरूरी है कि हम इस आदर्श को एक गर्हित मूल्य में बदल दें। मर्दवाद एक गर्हित मूल्य है। हर मर्द को इससे छुटकारा पाना चाहिए। हर स्त्री को भी इससे छुटकारा पाना चाहिए। मर्दवाद कोई वांछनीय चीज नहीं है, नितांत अवांछनीय चीज है। सावरकर जो मोहन भागवत वगैरह के पितामह हैं, जिनका उत्तराधिकार इन्हें मिला है, उस वीर सावरकर ने Six Glorious Epochs of Indian History (भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम अध्याय) किताब लिखी उसमें एक जगह उन्होंने शिवाजी के बारे में लिखा है कि ‘शिवाजी ने मुसलमानों पर आक्रमण करके उन्हें मार भगाया और उनकी स्त्रियों को बंदी बना लिया तो शिवाजी ने उन स्त्रियों को बिना बलात्कार किए छोड़ दिया, ये बहुत बड़ी गलती की शिवाजी ने। शिवाजी अपने पुरुषत्व का परिचय नहीं दे पाए।‘ आपने पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ देखी होगी उसमें वो एक लड़की से शादी करता है और उसे लाहौर से रेगिस्तान के किसी इलाके में ले जाता है। लड़का पढ़ा-लिखा है और वो लड़की तो और भी विदेशों में रह चुकी है। वो लड़की की इच्छा का ख्याल रखते हुए उससे शारीरिक संबंध नहीं बनाता है। तब मौलवी लोग कहते हैं कि ‘अरे मर्द बन मर्द, जा उसके साथ सो के आ’। इन्हीं कामों के लिए मर्दानगी रह गई है? यही मर्दानगी है? अखबार (जनसत्ता) मे मैंने एक विज्ञापन देखा, दिल्ली पुलिस का- ‘औरतों को छेड़ना कोई मर्दानगी की बात नहीं हैं’। सही लिखा। लेकिन इसके बाद नीचे और एक चीज लिखी है- ‘उनकी रक्षा करना ही मर्दानगी है‘। मै कहता हूँ इस मर्दवाद पर लानत भेजनी चाहिए। यह एक गर्हित मूल्य है और इससे छुटकारा पाना हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक लड़ाई है और इस चेतना को विभिन्न सृजनात्मक रूपों, विभिन्न कलात्मक रूपों में अभिव्यक्त करना चाहिए। तो ये दो नारे- Women’s Right is Human’s Right और ‘बेखौफ़ आज़ादी’,  ये दो ऐसे नारे हैं जो इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
एक और बहुत बड़ी चुनौती जो इस आंदोलन के विकास में है जो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि इस आंदोलन को छोटे शहरों में ले जाने की जरूरत है, कस्बों में और देहाती इलाकों में ले जाने की जरूरत है। आप जेएनयू में कुछ कर सकते हैं, दिल्ली में भी कर सकते है, लेकिन खुरजा में जाकर करना, भोपाल में जाकर करना, भागलपुर में जाकर करना या जौनपुर में, वहां जाकर करना जहां इनके सांमती संस्कार चलते हैं, जहां स्त्रियां कुछ नहीं कर पाती हैं, लडकियों को बुरी तरह से छेड़ दिया जाता है और तब भी नज़र नीची करके चली जाएंगी, वरना घरवाले भी लड़की की ही पिटाई करेंगे कि तू इधर-उधर क्यों देख रही थी, वहां इन आंदोलनों को, इस चेतना को, इन मूल्यों को ले जाने की ज्यादा जरूरत है. अगर सिर्फ चुनाव जीतना हमारा मकसद नहीं है तो इस आंदोलनों को छोटे शहरों में, कालेजों में, गांवों में वहां के लड़के-लड़कियों के बीच हम कैसे ले जाएं,  अगर हम इसको जिंदा रखना चाहते हैं तो यह भी एक महत्वपूर्ण काम है। (जेएनयू छात्रसंघ द्वारा आयोजित एक सभा में 23 जनवरी 2013 को दिया गया व्याख्यान)

Thursday, 5 December 2013

जिनको झुक कर दुनिया करे सलाम

 भारत में दलित आंदोलन के योद्धा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का आज निर्वाण दिवस है।
आज की मनहूस सुबह एक और उदासी से भर गई।
यद्यपि अंदेशा महीनो से था, जब नेल्सन मंडेला दोबारा अस्पताल में भरती कराये गये थे लेकिन अंतिम सत्य की तरह ऐसी कोई भी सूचना अकस्मात प्रकट होने पर हिम्मत डगमगा देती है। नेल्सन मंडेला नहीं रहे।
रंगभेदी शासकों की जेल में सत्ताईस साल काटने के बाद वह जब अपने वतनपरस्तों के बीच लौटे तो सजदे में मानो पूरी दुनिया ही झुक गई थी।
वर्ष 1964 में जेल जाने के बाद वह पूरी दुनिया में नस्लभेद (‘एपरथाइड’) विरोधी योद्धा के रूप में उभरे थे। जब 1994 में मंडेला देश के राष्ट्रपति बने, नस्लभेद समाप्त हो चुका था।
अपने देश के पहले काले राष्ट्रपति का पद संभालते हुए उन्होंने कई अन्य आंदोलनों को रफ्तार दी थी।
उन्हें 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
आज दुनिया से उनके अंतिम रूप से विदा हो जाने के बाद कई-कई स्मृतियां कौंध जाती हैं।
जिन्हें मनुष्यों की दुनिया अपना जननायक मानती थी, अमरीका और ब्रिटेन सहित कई देशों की सरकारें और राजनेता उन्हें कभी दुनिया का सबसे खतरनाक आदमी करार देते रहे थे।
अमरीका ने 1991 में अपनी सरकारी लिस्ट से मंडेला का नाम आतंकवादियों की लिस्ट से हटाया था।
पचहत्तर साल की उम्र में, जबकि राष्ट्रपति नहीं थे, वर्ष 1993 में भारत आए थे मंडेला। विनी साथ नहीं थीं। कैद से छूटने के बाद। गांधी की स्मृतियां ताजा करने। वहां गए थे, जहां गांधी को गोली मारी गई थी।
1970 के दशक में आक्रामक ‘अश्वेत चेतना आंदोलन’ के उदय और इस आंदोलन के संस्थापकों में से छात्र कार्यकर्ता स्टीव बिको की हिरासत में मौत ने मंडेला को झकझोर दिया था।