Tuesday, 12 November 2013

लैम्प


व्सेवोलोद इवानोव की आत्मकथात्मक कहानी

काफ़ी समय पहले की बात है – 1914 की लड़ाई तब शुरू भी नहीं हुई थी| साइबेरिया में इर्तिश नदी के किनारे बसे पाव्लोदार शहर में एक छापेखाने में मुझे टाइपसैटर का काम मिल गया था| ज़िंदगी में दूसरी बार मुझे पगार मिली थी| मैं समझ रहा था कि यह बहुत महत्वपूर्ण घटना है| खास तौर पर इसलिए कि पहली तनख्वाह की मुझे कुछ याद नहीं थी कि कहां, कैसे वह पैसे खर्च किए| मैं सोचने लग गया| इतना महान दिन है यह, अपने पांवों पर ज़िंदगी का पहला कदम भर रहा हूं – ऐसा दिन ज़रूर मनाना चाहिए| पर कैसे? मेहमानों को बुलाऊं? सारे शहर में कुछ गिने-चुने लोगों को ही मैं जानता था| ये नौ रूबल किसी महान काम में लगा दूं? कैसे? कहां है यह महान ध्येय? अपने लिए कोई कपड़ा-लत्ता खरीद लूं? सो, रविवार सुबह-सुबह मैं बाज़ार चल दिया|... पाव्लोदार में बाज़ार इतना बड़ा है कि लगता है कि अकेला यह कस्बा ही सारी दुनिया से व्यापार करने निकल पड़ा है| दुकानों के दरवाज़े खुले हैं, एक दुकान से दूसरी को बढ़ता जाता हूं मैं| कोई तो जाना-पहचाना चेहरा नज़र आ जाए, पर नहीं – कोई नहीं दिख रहा| दिन शुरू ही हुआ है| अचानक देखता हूं: चाय की दुकान के पास दीवार से टेक लगाए, ज़मीन पर पांव फैलाए एक आदमी बैठा है – बदन पर फटे-पुराने कपड़े, पांवों में जूता नहीं, कोई घुमंतू लफंगा लगता है| उसके बगल में रखा है एक लैम्प – पुराने तांबे के लाल से रंग का, न उसमें बत्ती है, न चिमनी, जाने कब से उसे किसी ने साफ़ भी नहीं किया है| वह इत्मीनान से सांस ले रहा है, लगता है उसकी आंख लग गई है| नहीं, देर करना ठीक नहीं – कोई लैम्प उठाकर चलता बनेगा| मैं उसका कंधा झकझोड़ता हूं: “ऐ, भैय्या!” वह आंखें खोलता है| लगता है, अभी झाड़ लगाएगा| पर वह बोलता है: “हं-हां दे दूंगा| कोई सौदा-वौदा नहीं करूंगा| ले लेना|” मैं हैरान-परेशान: क्या करूंगा इस पुराने लैम्प का? घर तो अपना है नहीं, आखिर सामान रखने के लिए घर चाहिए, और कुछ नहीं तो अपना एक नुक्कड़ ही हो, जिसे कुछ सजाकर इंसान वहां अपने घर का सा आराम महसूस करे| मेरे मन में उठते सवाल ज़बान पर आएं इससे पहले ही वह घुमंतू बोलता है: “अरे, मुन्ना! कोई मामूली लैम्प नहीं है, जादुई लैम्प है, जादुई| “जादुई?” “और नहीं तो क्या! किताबों में पढ़ा तो होगा?” किताबें तो मैंने बहुत पढ़ी हैं – पुराने ज़माने के किस्से भी, सफरनामे भी, पहेलियों भरे, रहस्यमय देश भारत की कहानियां भी| हां, कुछ याद तो आ रहा है... अरे हां, सिंदबाद के किस्सों में ही तो आता है जादुई लैम्प का – अलादीन के चिराग का किस्सा! मन में सोचो क्या चाहते हो, मन्नत मांगो और लैम्प को रगड़ो! “बेच रहे हो?” “लो, करो बात! देख तो ज़रा - ताम्बा ही कित्ता लगा है इसमें, ऊपर से जादू और! फिर कारीगरी भी कोई मामूली नहीं! गिन ज़रा, कित्ते का हिसाब बैठता है?... इत्ते तो पैसे भी न होंगे!” एक आंख मींचकर वह मेरी ओर देख रहा है कि करे मुझसे सौदा या कोई दूसरा गाहक खोजे| “थोड़ी देर के लिए दे सकता हूं| बस एक घंटे के लिए!” “कित्ते लगेंगे एक घंटे के?”मेरी आवाज़ कांप रही है| अब मुझे पक्का पता है कि मैं बेकार ही नहीं आया इस बाज़ार में, कि मैं सारी उम्र इस लैम्प का ही सपना देखता आया हूं| अरे, घंटे भर की क्या ज़रूरत है, भला?! मेरे लिए तो पांच मिनट ही बहुत हैं! पर अपने सपने की खातिर पैसे काफ़ी पड़ेंगे कि नहीं? जेब में रखी पगार को मैं टटोलता हूं| “कित्ते?” “जित्ते हैं! मुन्ना! जो तमाशे के लिए नहीं, सचमुच में यह लैम्प पाना चाहता है न, वह तो जो है सब दे देगा, भले ही हज़ार रूबल क्यों न हों!” मैं सारी पगार उसकी ओर बढ़ा देता हूं| वह घुमंतू फिर से मुझे घूरता है, खुशी से मुस्कराता है और ज़मीन से उठ खड़ा होता है| मेरी पगार वह अपनी जेब में डाल लेता है और बड़े ठाठ से पास के ढाबे को चल देता है| रास्ते में थम जाता है, सिर घुमाकर लैम्प की ओर इशारा करता है, जो अभी तक धूल में ही पड़ा हुआ है| “छोरे, लैम्प तो उठा ले| जल्दी कर| तेरा घंटा शुरू हो चुका है|” घुमंतू इत्मीनान से कदम भरता चला जाता है, मैं लपककर लैम्प उठाता हूं और कसकर छाती से लगा लेता हूं| दिमाग में ख्यालों के घोड़े दौड़ने लगते हैं| क्या मांगूं? क्या? अजीब बात है! इतनी सारी इच्छाएं हैं कि समझ में नहीं आता किससे शुरू करूं! कपड़ा-लत्ता या खाना मांगना तो बेवकूफी ही है – जादू की ताकत ऐसी बातों पर खर्च करने में तो कोई तुक ही नहीं! अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदने के लिए तो मेरे पास पैसे थे ही| और भी कमा लूंगा| और फिर मुझे ज़्यादा कुछ चाहिए भी नहीं| सेहत मांगूं? पर मैं तो हट्टा-कट्टा हूं, जवान हूं, अभी अठारह साल का तो हुआ हूं| मांगूं तो क्या मांगूं? अचानक मेरी पीठ पीछे कदमों की आहट होती है| कोई मेरे कंधे पर हाथ रख देता है| मेरे नथुनों में शराब और तले आलुओं की गंध भर जाती है| डगमगाते पांवों पर घुमंतू मेरे बगल में आ खड़ा होता है| “बस, मुन्ना! निकल गया बख्त! फुर्ती से काम करना सीखो, मुन्ना!” अरे, सच में एक घंटा बीत गया? वह घुमंतू मेरे हाथों से लैम्प ले लेता है, बगल में समेटता है, पर जाता नहीं, वहीं खड़ा रहता है| मन में खास उम्मीद के बिना मैं दबी आवाज़ में उससे कहता हूं: “सोच लिया मैंने| बस एक मिनट को लैम्प दे दो, एक बार रगड़ लूं...” वह उलाहना भरे गंभीर स्वर में कहता है: “अरे, मुन्ना, ज़बान टूटी तो फिर कहां का जादू रहा? यह तो धोखा होगा, जादू नहीं...” मुझे ख्याल आया: जिन्न से यह मांगने के लिए कि वह मुझे एक युग से दूसरे में पहुंचा दे क्या थोड़ी तकलीफ नहीं उठाई जा सकती... माना मेरा कवि मन मुझे कल्पना में राजा भी बना सकता है और मज़दूर भी, दास भी, सिपाही भी और विद्वान भी| लेकिन क्या मैं खुद वह युग चुन सकता हूं जिस में से मानो दूरबीन की तरह मैं सभी युगों को देख और समझ पाऊं| यह कैसे मान लिया जाए कि जिस युग में मैं हूं वह वही युग है जिसकी मुझे आस थी| बुझे मन से सिर झुकाए मैं खड़ा हूं, सोच रहा हूं: सारी पगार बेकार गंवा दी| पैसों का अफ़सोस नहीं| पर कब मैं बड़ा होऊंगा, कुछ अक़ल सीखूंगा? उस घुमंतू ने मेरे मन की बात मानो सुन ली, बोला: “तू बेकार में दुखी हो रहा है कि लैम्प को रगड़ नहीं पाया| बात यह है कि जब मैं उस बस्ती से गुज़र रहा था जहां तू रहता था तो तेरी मां ने यह लैम्प देखा था| तब तू पैदा भी नहीं हुआ था| कौन जाने उसने तब यह लैम्प छू लिया हो और यह मन्नत मांगी हो कि तू उस युग में ही पैदा हो जिसकी तुझे तमन्ना है|” चूंकि उसने मेरे मन की बात भांप ली थी इसलिए मैं मान गया कि मेरे सामने जादुई लैम्प ही था, कि मेरी मां ने ही उसे छूकर जिन्न को बुलाया था| मेरी मां व्यवहारकुशल भले ही नहीं थी, पर फैसला करने में ज़रा नहीं हिचकिचाती थी| मैं इसलिए यह कह रहा हूं कि अगर वह व्यवहारकुशल होती, यानी उसे मेरी खुशहाली का ख्याल होता तो शायद मेरे लिए कोई दूसरा युग चुनती| पर वह जानती थी कि लोगों की सच्ची खुशी इस संसार की चीज़ों से, इस दुनिया में माली खुशहाली से नहीं मिलती| इसीलिए उसने मेरे लिए वह युग चुना जिसमें, मेरे पाठको, हम और आप रह रहे हैं| मुझे इससे कोई गिला नहीं है, हालांकि मैं जो लिखता हूं वह अक्सर छपता नहीं है| ये कहानियां भी शायद ही मेरे जीते-जी छपें| बात यह है कि छापेखाने बने ही अभी कोई बहुत समय नहीं हुआ, इसलिए यह उम्मीद करना कि जो कुछ तुम लिखोगे वह हर हालत में छपेगा और छपना चाहिए – नासमझी ही है| इंसान के लिए, आदमजात के लिए और चिंताएं कम नहीं हैं... 

Monday, 11 November 2013

'आज जैसे हालात में ही पैदा हुए थे हिटलर'



हमारे पास देश और अंधी सियासत को देखने समझने का चश्मा नहीं है तो बीबीसी हिंदी डॉट कॉम में प्रकाशित प्रोफ़ेसर असमर बेग की यह टिप्पणी अवश्य पढ़ लेनी चाहिए। सब साफ साफ समझ में आजाएगा....


भारत में प्रजातंत्र आए 50 वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन अभी भारतीय जनता की सोच पूरी तरह से प्रजातांत्रिक नहीं हो पाई है. प्रजातंत्र में राजनीतिक दल ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हीं के बीच में राजनीतिक शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा होती है. लेकिन हम अब भी किसी ऐसे व्यक्तित्व की तलाश में रहते हैं जो राजनीतिक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान कर सके. राजनीतिक दलों के लीडर भी धीरे-धीरे निरंकुश प्रजातंत्रवादी हो गए हैं और वे अपने दल में किसी भी लीडर का क़द ऊपर नहीं उठने देते ताकि वह कभी भी उनके लिए एक चुनौती बनकर न उभरे. राजनीतिक दलों के पास भी आम तौर पर कोई ठोस राजनीतिक एजेंडा नहीं होता है और उसके अभाव में उनके पास किसी करिश्माई राजनेता को बढ़ावा देने के अलावा कोई चारा नहीं होता है. कभी-कभी किसी नेता में कुछ करिश्माई तत्व होते हैं और कभी-कभी उनके अभाव में उसके व्यक्तित्व में ज़बरदस्ती वो तत्व पैदा करने या दिखाने की कोशिश की जाती है. मुद्दों के अभाव में राजनेता ख़ुद ब ख़ुद महत्वपूर्ण हो जाते हैं. कुछ नेताओं के आभामंडल में कई बार मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाता है. इस प्रक्रिया में मीडिया की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. इन नेताओं को जोर शोर से पेश कर मीडिया का काम आसान हो जाता है. उन्हें मुद्दों की तलाश नहीं करनी पड़ती, न ही उनकी समझ पैदा करनी पड़ती है बल्कि उनकी पूरी ख़बरें नेताओं के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती हैं. इस प्रकार की ख़बरें बनाना भी आसान है और जनता जो इन ख़बरों को देखती और पढ़ती है, उसके लिए भी यह काफ़ी रोचक होती हैं. जब मीडिया का हमारे जीवन पर इस कदर नियंत्रण नहीं था, उस समय भारतीय राजनीति में इतना व्यक्तित्व वाद नहीं था. परन्तु आज मीडिया के इस दौर में लगभग सभी राजनीतिक दल पर्सनेलिटी कल्ट यानी अवतारवाद के शिकार हैं. आजकल जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उन पर जो भी चर्चाएं हो रही हैं वो सभी वहां के नेताओं के आस-पास घूम रहीं हैं. ऐसा नहीं है कि उन राज्यों में मुद्दे नहीं हैं लेकिन उनमें किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है. जो विपक्षी दल हैं वे भी नहीं चाहते कि राजनीतिक क्षेत्र में वास्तविक मुद्दों की चर्चा हो बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक खेल छद्म मुद्दों के मैदान में हो. यह सभी राजनीतिक दलों के हित में है. इस अवतारवाद की शुरुआत भारत में जवाहर लाल नेहरू से होती है, बाद में इंदिरा गांधी ने इसको बहुत बढ़ावा दिया और इसे एक कला का रूप दे दिया. उनके चाटुकारों ने तो यहां तक कह दिया, “इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा है.” इंदिरा गांधी के दौर में उनका व्यक्तित्व भी कांग्रेस पार्टी पर छाया हुआ था. आज के दौर में इसका उदाहरण राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी हैं. कांग्रेस में भले ही कितने बड़े और ऊंचे क़दम वाले राजनेता हों लेकिन राहुल गांधी के सामने किसी और का क़द ऊंचा नहीं होने दिया जा सकता. किसी चुनावी जीत में उनकी कोई भूमिका हो या न हो लेकिन पार्टी के सभी लोग उसका श्रेय कांग्रेस उपाध्यक्ष को देते हैं. आज कांग्रेस जो भी करती है उसका श्रेय राहुल गांधी को मिलता है और बीजेपी जो भी करती है उसका श्रेय नरेंद्र मोदी को दिया जाता है. साफ है कि आज राजनीतिक दलों के नेताओं का क़द अपने दल से ऊँचा हो गया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने इतना अच्छा काम किया है कि परन्तु उन्होंने अपने दल की अपेक्षा अपने क़द को इस प्रकार प्रचारित किया है कि उनके दल को उनके व्यक्तित्व से पहचाना जाता है. उनकी पार्टी जो कुछ भी करती है वह हर कार्य का श्रेय खुद ही ले लेते हैं और इस प्रकार पार्टी को या उसके किसी सदस्य को किसी कार्य का श्रेय नहीं मिलता. अतः उनकी पहचान पार्टी या उसके किसी भी नेता से अधिक उजागर हो जाती है. इस प्रकार का अवतारवाद किसी भी प्रजातंत्र के लिए अच्छा नहीं है. आने वाले समय में यह क्या रूप ले सकता है, उसकी मिसाल क्लिक करें नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व की जिस प्रकार से बेचा गया है, उसमें मिलती है. कांग्रेस और भाजपा के अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियों में भी नेताओं को मुद्दों से बड़ा बना दिया जाता है
मोदी ने जिस प्रकार मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने व्यक्तित्व को बेचने में किया है वह एक शोध का विषय है. अभी हाल में गुजरात के गठन के 50 वर्ष पूरे होने पर वहां की राजधानी में एक समारोह आयोजित किया गया. वहां अगर कोई व्यक्ति दूसरे ग्रह से पहुंच जाता तो उसे ऐसा प्रतीत होता कि भारत वर्ष के प्रजातांत्रिक इतिहास में सबसे बड़े नेता नरेन्द्र मोदी रहे हैं और महात्मा गांधी और सरदार पटेल उनकी अपेक्षा बहुत छोटे कद के नेता गुज़रे हैं. यह उसी प्रकार की राजनीति है जो प्रजातंत्र को फासीवाद की ओर ले जाती है. इसी प्रकार के अवतारवाद की स्थापना जर्मनी में हिटलर ने और इटली में मुसोलिनी ने की थी. हमें इस प्रकार के अवतारवाद से सावधान रहना चाहिए क्योंकि जब किसी व्यक्तित्व का जादू हमारे मस्तिष्क पर छा जाता है तो उस समय हमारी सोचने समझने की शक्ति शिथिल पड़ जाती है और हम उस व्यक्तित्व के दास बन जाते हैं और हमें वही दिखाई और सुनाई देता है जो वह व्यक्ति दिखाना चाहता है. जर्मनी और इटली का इतिहास बताता है कि इस प्रकार की सोच हमारे लिए कितनी हानिकारक हो सकती है. (बीबीसी हिंदी से साभार)

Thursday, 7 November 2013

'सुई-नश्तर' के पाठकों की तलाश


जयप्रकाश त्रिपाठी

डमरू ने किताब लिख तो ली, छपवा भी ली, अब लोग उसे पढ़ेंगे कैसे, और उसके महान विचारों का पूरे दिग-दिगंत में हाहाकार कैसे मचेगा, इसी फेर में दुबला होते-होते सूख कर कांटा हुआ जा रहा है।
डमरू प्रसिद्ध होना चाहता है। प्रसिद्धि की भूख ने उसके रोजमर्रा की इतनी ऐसी तैसी कर रखी है कि चिंता से चश्मे का नंबर भी दुबरा गया। जेब में पैसा नहीं कि दूसरा नंबर ले ले।
पिछले कई वर्षों से वह फरवरी की सूखी सर्दियों में दिल्ली के पुस्तक मेले जरूर हो आता है। पिता रेलवे में अधिकारी थे। तुकबंदी करते थे। बचपन में उसे कविता का शोौक लगा गए।
धूमिल के मोचीराम को पढ़ने के बाद डमरू ने पहली कविता लिखी- सुई। दूसरी कविता का शीर्षक रखा- पत्ती (ब्लेड)। नश्तर लिख ही रहा था कि रात भर के जगे-अलसाये पिता की नजर पड़ गई उस पर। अच्छा, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कविताई हो रही है!
उसके कुछ माह बाद डमरू गांव-जवार के ठेठे मुहावरे जुटाने लगा। अच्छा-खासा संग्रह हो गया तैयार। आखिरी के पन्नों पर सुई-नश्तर वाली कविताएं भी। एक कवि-कुल-गुरू का शरणागत हुआ। आशीर्वाद के साथ आज्ञा मिली कि बस चटपट इसे छपा ही डालो।
अब छपाई के पैसे कहां से आएंगे! मम्मी का शरणागत हुआ। वात्सल्य प्रलाप के बाद वह भी जुगाड़ हो गया। टीटी पापा सप्ताह भर में एक सैकड़ा यात्रियों को मूस लाए। छप गई किताब।
इन दिनो डमरू को 'मुहावरेदार सुई-नश्तर' के पाठकों की बड़ी बेसब्री से तलाश है!

Wednesday, 6 November 2013

उस फोटो को देखा तो ऐसा लगा


मधुमेह का मारा मैं आज सुबह मॉर्निंग वॉक की कठदौड़ से लौटा तो घर में अखबार की एक फोटो पर आंख ठहर गई। ठहर क्या चिपक-सी गई। टकटकी लगाए रहा देर तक। खामख्वाह। बात क्या थी कि यहां कुछ लिखा नहीं जा रहा लेकिन इस हवाई दोस्त मंडली में उस सच को साझा कर लेने को जी बहुत जोर मार रहा है। जैसे गले में कुछ अटक गया हो या कलेजे का पत्थर हल्का कर लेने की बेताबी...

फोटो के पीछे क्या है। जितना फूहड़ और विद्रूप, उससे हजारगुना ज्यादा डरावना स्मृतियों का एक गंदा झोका। फोटो मंत्री का। ये मंत्री केंद्र में है या किसी प्रदेश में, भेद खोलना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना जान लीजिए कि उसके चेहरे और वस्त्र की शालीनता-सुघरता देख कर रोंगटे खड़े हो गए। फोटो को बड़े गौर से घूरा। बार-बार चित्र के नीचे लिखा परिचय पढ़ा। उसी झटके में वह पूरी खबर पढ़ गया।

स्कूल के दिनो में हमारे घर गांव क्या, पूरे जिले में तीन बड़े डाकुओं का आतंक हुआ करता था। उनमें एक डाकू मेरी मौसी के गांव शिवरामपुर का निवासी था। दीना नाम था उसका। पूरे गांव की महिलाएं सोने-चांदी से लदी-फदी उसकी बीवी के पांव छुआ करती थीं। मौसी ने बताया था कि ये दीना डाकू की मेहरारू (बीवी) है। दीना डाकू के प्रशंसकों में मेरी मौसी का परिवार भी शामिल था। प्रशंसा इसलिए कि दीना शिवरामपुर समेत आसपास के गांवों में चोरी-डकैती नहीं पड़ने देता था। पुलिस भी किसी परेशान नहीं करती थी। बस, अपने गांव-जवार पर यही दीना की बहुत बड़ी नियामत थी।

दीना शरीर से जितना हट्टा-कट्टा, लंब-तड़ंग, उतना खूबसूरत। बोलचाल में मिठबोलवा। किसी से अकड़ के, ऊल-जुलूल नहीं बोलता था। गांव के हर बड़े बुजुर्ग के पांव छूता था। आज के राजनेताओं की तरह यह सब करना दीना की रणनीति का एक हिस्सा था क्योंकि लोगों का विश्वास जीत कर वह बड़े आराम से अपने घर-गांव में छिपा रहता था। पुलिस लाख कोशिश कर भी बगल के घर में छिपे दीना के बारे में भनक नहीं ले पाती थी।

उन्हीं तीन खूंख्वार डकैतों में से एक के वंशज की ये फोटो। लंबे समय तक जेल में गुजारे इसने भी। मैंने इसे कभी देखा नहीं था। फोटो ने चिंतित कर दिया। क्या दिन आ गये इस देश की राजनीति के। फोटो में अफसर उसके पीछे-पीछे फाइलें लिए दौड़े जा रहे थे। वह राहुल सांस्कृत्यायन की तरह गंभीर मुद्रा में अपनी वैसी ही सौम्यता से अफसरों को कृतकृत्य कर रहा था, जैसे मौसी के गांव को दीना.......

वंशावली खोलो तो कइयों की ऐसी ही पता चलेगी। कौन खोले बिल्ली के गले की घंटी। कविता-सविता लिख कर काम चल जा रहा है अपुन का। खामख्वाह आफत गले कौन लगाए....जयसियाराम! जयरामजीकी!

Monday, 4 November 2013

उन्हे नहीं सुहाते 'पछताते, पथ पर आते लोग'

जयप्रकाश त्रिपाठी


ये जो है न फेसबुक....जो रोज यहां आते हैं प्रायः, टिके रह जाते हैं घंटों। दिन-दिन भर। अपने आसपास से मुक्त। विचरते हुए-से। कई एक रचते हैं। खेलने वाले भी। अनेकशः सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए पल-दो-पल की। अथवा उनमें से कई-एक किसी-न-किसी व्यावसायिक मकसद से भी। कई एक उपस्थितियां छिपे एजेंडे वाली। कई छिछोरेबाजी के लिए। शोहदे भी।

लेकिन वे सबसे ज्यादा, जो अपने दर्द साझा करते हैं यहां। अपने आसपास, अपने रोजमर्रा के चित्र खींचते हुए। कविताएं, कहानियां, वक्तव्य, अनुभवों की सौगात उलीचते हुए। यहां आने का उद्देश्य उलझा हुआ नहीं होता है उनका। कुछ-एक पंक्तियों पर नजर पड़ते ही वे खींच लेते हैं हमे अपने निकट। बहुत पास तक।

जैसे सुबह कभी शहर की सड़कों से गुजरते हुए खाली ठेले लिए सब्जी मंडी की ओर तेज रफ्तार से जाते हुए लोग दिख जाते हैं। कई-एक दूध के लिए हाथ में खाली डिब्बे लटकाए। बच्चे को स्कूल ले जाने वाली बस का इंतजार करते। दुकान खोलते हुए। और बगल की सड़क पर झाड़ुओं से धूल के बवंडर बरसाते हुए भी।

और वे भी तो! सुन्नर-मुन्नर कुत्तों की चेन थामे आम आदमियों पर हिकारत से नजर डाल कर स्वयं की महानता से खामख्वाह अभिभूत-आह्लादित होते हुए। उनके जैसों के पास महानता की सीढ़ियां, कई-कई तरह के पायदान ऊपर तक जाने के लिए। उनके घरों से अक्सर हार्ट अटैक की खबरें आती हैं। मौत भी उन्हें ज्यादा परेशान नहीं करती है।

नाली-कचरे की गुड़-मुड़र में अधजगी कुतिया की तरह पसरी हुईं सुबह की सड़कों से कई एक जन अपनी बोल-भाषा में बतियाते हुए दिख जाते हैं। जैसे कि क्यों आ गये हों वे यहां। क्योकि इधर के कचरे के ढेरों में भी मामूली हाथ-पैर चलाकर ज्यादा-कुछ मिल जाता होगा। उनमें कई एक के पास अपनी लकड़ी की गड़ारियों वाली ठेल होती हैं। एक ठेल पर उसकी अपाहिज स्त्री भी उठंगी हुई, कचरे के ढेर पर पॉलीथिन की एक-एक थैली खंगालते सिर्फ अपने पति को बड़े गौर से देखती हुई। एकटक, टुकर-टुकर।

जिनके हाथ में झबरीले कुत्ते की चेन हो। लगता है, उनके मन में शायद इस तरह के प्रश्न भी सुबह-सुबह जरूर कौंधते होंगे कि ऐसे कचरे वाले लोग इस सुंदर दुनिया में क्यों रहना चाहते हैं। इनके नहीं होने पर दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी।इन्हें नहीं होना चाहिए। हों-न-हों, क्या फर्क पड़ता है। जीयें या मरें। छीईईईई...

ऐसा सोचने वालों के बारे में शायद उनके ऊपरी पायदान पर बैठे लोग भी इसी तरह के प्रश्न टीपते-टकटोरते रहते होंगे। वे लोग, जिनके नौकर कुत्ते की चेन थामे दिख जाते हैं । वे खुद नहीं।

वे बेचारे से।

नहीं पता कि हर किसी की चेन किसी-न-किसी की अंगुलियों में भिंची हुई। किसी न किसी की अक्ल तक फंसी-घुसी हुई रहती है।

जिन्हें कि ' दो टूक कलेजे को करते, पछताते, पथ पर आते' लोग रत्ती भर नहीं सुहाते हैं।

सचमुच दुनिया को जानवरों के बाड़े में तब्दील कर देने के लिए उनकी भी बेहूदा मशक्कत उनसे ऊपर के लोगों के लिए कितने काम की रहती होगी!

नहीं?

नबीला एक दो दिनों में गांव लौट जाएगी


ब्रजेश उपाध्याय

इस हफ़्ते अमरीका ने दो नए चेहरे देखे. एक वो चेहरा जो अपने दफ़्तर में बैठ कर हज़ारों मील दूर छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाता है और दूसरा वो चेहरा जो अनजाने में उसका शिकार बनता है. एक था मानसिक रूप से टूट चुके ब्रैंडन ब्रायंट का चेहरा जो ड्रोन ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे, दूसरा ज़िंदगी और उम्मीद से भरपूर नबीला का चेहरा. नौ साल की नबीला. मासूम, ख़ूबसूरत, नीली आंखें, सर पर रखे दुपट्टे के छोर को उंगलियों में लपेटती, कभी मुस्कराती, कभी बोर होकर उबासी लेती, कभी टेबल पर रखे कागज़ पर लकीरें खींचतीं नबीला. उत्तरी वज़ीरिस्तान से आई इस बच्ची ने एक साल पहले ड्रोन हमलों में अपनी दादी को खो दिया, ख़ुद भी घायल हुई लेकिन ज़िंदा बच गई. जब अमरीकी कांग्रेस के कुल पांच मेंबर और दुनियाभर की मीडिया के सामने नबीला अपनी कहानी पश्तो भाषा में सुना रही थी तो अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद कर रही महिला का गला भर आया, आंखें नम हो गईं. वहां बैठी कुछ और महिलाओं की भी आंखें नम थीं. एक ने कहा, "मैं भगवान से मनाती हूं कि तुम्हें फिर कभी ड्रोन की आवाज़ न सुनाई दे." वहां बैठा मैं एकटक नबीला को देख रहा था. अचानक से उनकी नज़र मुझ पर गई और जिस तरह से छोटे बच्चे कभी-कभी किसी अनजाने चेहरे को देखकर मुस्करा देते हैं, वैसे ही मुस्करा दीं. कांग्रेस में काम करने वाली एक महिला ने उसके सामने आईसक्रीम के दो कप लाकर रखे. पहले वो झिझकी, फिर एक चम्मच से चखा और फिर से वही मुस्कान. मैं तबतक उसके बिल्कुल पास खड़ा था, पूछा... "अच्छी हैं आईसक्रीम? उसने कुछ नहीं कहा. सर झुकाकर खाती रही." ये पहली बार था जब वो अपने गांव से निकली थी और सीधा वाशिंगटन पहुंची. मैने उसके भाई ज़ुबैर से पूछा, "नबीला को यहां कैसा लगा? जवाब था, 'ये बेहद खुश है. कहती है सड़कें कितनी चौड़ी हैं, लोग कितने प्यार से मिलते हैं." यही सड़कें उन दफ़्तरों तक भी जाती हैं जहां बैठकर कुछ लोग नबीला की दुनिया मे छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाते हैं. ब्रैंडन ब्रायंट ड्रोन ऑपरेटर का काम करते थे. ख़तरनाक चरमपंथी हों या बेगुनाह लोग, अपने कंप्यूटर पर दिख रही जीती-जागती तस्वीरों को मांस के लोथड़ों में बदलता देखना उन्हें अंदर से कहीं तोड़ चुका है. वो मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मैं जब अफ़गानिस्तान में एक मकान पर निशाना लगा रहा था तो कोई भागता हुआ नज़र आया. मुझे लगा कि कोई छोटा बच्चा है. एक और विशेषज्ञ की सलाह ली तो उसने कहा कि बच्चा नहीं कुत्ता है. हमला हुआ... मलबे की रिपोर्ट में न तो बच्चे का ज़िक्र था, न कुत्ते का." ब्रायंट ने नौकरी छोड़ दी है. उनके साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया. दूर से ही सही, किसी की जान लेना आसान काम नहीं होता. बल्कि कांग्रेस के एक सदस्य के शब्दों में "कौन जिएगा, कौन मरेगा, इसका फ़ैसला हम कर रहे होते हैं... जबकि ये फ़ैसला भगवान का होना चाहिए." इन दोनों चेहरों ने अमरीका की उलझन बढ़ा दी है. अबतक यहां एक ही सोच हावी रही है कि ये वो इलाका है जहां से तालिबान और अल क़ायदा दुनिया पर हमला करने की तैयारी करते हैं और ड्रोन से बेहतर कोई हथियार नहीं है इन्हें काबू में लाने के लिए. नबीला और ब्रैंडन ब्रायंट के चेहरों ने उस सोच पर सवाल उठाए हैं. अब यहां ये बहस भी हो रही है कि जो ख़तरनाक चरमपंथी कहे जाते हैं उन्हें बिना किसी सुनवाई के मौत की सज़ा देना क्या सही है? दूसरी तरफ़ ये सवाल ये भी उठते हैं कि अगर चरमपंथी बेगुनाहों को मारने में नहीं हिचकते तो उन्हें सभ्य समाज की सहूलियतें क्यों मिलें? नबीला एक दो दिनों में वापस अपने गांव पहुंच जाएगी. ब्रैंडन ब्रायंट अभी कुछ दिन डॉक्टरों के चक्कर लगाएंगे. इसी हफ़्ते फिर से एक ड्रोन हमला हुआ है. पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां कह रही है कि कुछ बड़े चरमपंथी मारे गए हैं. पाकिस्तान ने अपनी सीमा के अंदर हुए हमले के लिए अमरीका की एक बार फिर से आलोचना की है. (बीबीसी से साभार)

अमरीकी जासूसों के निशाने पर पूरी दुनिया


रूसी संसद के निचले सदन, राजकीय दूमा की अंतर्राष्ट्रीय संबंध समिती के अध्यक्ष अलेक्सेय पुश्कोव ने अपने ट्विटर माइक्रोब्लॉग में लिखा है कि अमरीका ने पूरी दुनिया में जासूसी करने के लिए एक अभूतपूर्व संजाल स्थापित किया हुआ है। पुश्कोव के शब्दों में, अमरीकी खुफिया सेवा के उप-प्रमुख जेम्स क्लेप्पर ने खुद माना है कि अमरीकी ख़ुफिया संजाल पूरी दुनिया में जासूसी का सबसे बड़ा संजाल है। अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी में 35 हज़ार लोग काम करते हैं और इसका वार्षिक बजट 11 अरब डॉलर है। इस बीच जर्मन गृह मंत्रालय की राय में, जासूसी कांड के सिलसिले में एक गवाह के रूप में एडवर्ड स्नोडेन से मास्को में पूछताछ की जा सकती है। यह बात जर्मन गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार इस पूर्व अमरीकी जासूस को जर्मनी में शरण देने के पक्ष में नहीं है। जर्मन नेताओं के बीच इस मुद्दे पर ज़ोरदार बहस जारी है। उदाहरण के लिए, जर्मनी की वामपंथी पार्टी के एक नेता बर्न्ड रिक्सिंगर ने कहा है कि जर्मन सरकार को चाहिए कि वह एडवर्ड स्नोडेन को अपने वहाँ बुलाकर उससे पूछताछ करे। एक अन्य जानकारी के मुताबिक गूगल कम्पनी के प्रबन्धकों ने अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी की हरकतों की शिकायत की है। कम्पनी की प्रबन्ध परिषद के अध्यक्ष एरिक श्मिट ने समाचार-पत्र वॉल स्ट्रीट जरनल को यह जानकारी दी।  विगत अक्तूबर के अन्त में अमरीकी गुप्तचर संगठनों के पूर्व एजेन्ट एडवर्ड स्नोडेन द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों से यह जानकारी मिली थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी 'मसकुलर' के कोडनाम से एक प्रोग्राम चला रही है और इण्टरनेट कम्पनियों गूगल और याहू के सर्वरों से सूचनाओं को रिकार्ड कर रही है। 'मसकुलर' नामक यह प्रोग्राम राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी को लाखों-करोड़ों ई०मेल सन्देशों को रिकार्ड करने की सम्भावना देता है। गूगल और याहू ने कहा है कि उन्होंने अमरीकी गुप्तचर कम्पनियों को ई०मेल सन्देश रिकार्ड करने की इजाज़त नहीं दी थी। एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन को अमेरिका ने माफ करने से इनकार किया है. व्हाइट हाउस के सलाहकार डैन फीफर ने कहा स्नोडेन ने कानून का उल्लंघन किया है और उनके प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. पिछले हफ्ते जर्मनी की ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले की स्नोडेन से मुलाकात के बाद अमेरिकी संसद के प्रमुख सदस्यों, खुफिया मामलों की समिति के सदस्यों और व्हाइट हाउस सलाहकार डैन फीफर ने इस बारे में बातचीत की. अमेरिकी न्यूज चैनल से बात करते हुए फीफर ने कहा, "स्नोडेन को अमेरिका वापस आना होगा और कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा." अमेरिकी सांसद डायेन फींस्टीन ने भी कहा है कि स्नोडेन ने नरमी का वह मौका गंवा दिया. उन्होंने कहा, "अगर वह फोन उठाकर व्हाइट हाउस की खुफिया मामलों की समिति से कहते कि मेरे पास कुछ ऐसी जानकारी है जो आपके लिए महत्वपूर्ण है, तो उनके पास मौका हो सकता था." फींस्टीन ने आगे कहा, "ऐसे में हम उनसे मिलते और इस जानकारी पर गौर करते. लेकिन वैसा हुआ नहीं और उन्होंने राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचाया है." वह मानती हैं कि स्नोडेन पर मुकदमा चलना ही चाहिए. अमेरिका में सरकार के खिलाफ जासूसी के आरोप झेल रहे एडवर्ड स्नोडेन को अगस्त में रूस में शरण मिली. अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के नेता माइक रॉजर्स ने भी कहा कि स्नोडेन को आरोपों से मुक्ति देने की कोई वजह नहीं दिखती. रॉजर ने कहा, "अगर वह वापस आकर इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार हों कि उन्होंने सरकारी जानकारी की चोरी की और उसका दुरुपयोग किया, तो मैं उनसे बातचीत के लिए तैयार हूं." साथ ही उन्होंने कहा स्नोडेन ने जो किया है उसकी उन्हें जिम्मेदारी लेनी होगी. इस बातचीत में वह बता सकते हैं कि उन्होंने जो किया वह क्यों किया.  एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के फोन पर एनएसए की जासूसी की खबरों के बाद से यूरोप में अमेरिका के खिलाफ नाराजगी और बढ़ गई. एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की और बर्लिन आकर एनएसए के खिलाफ गवाही देने का न्यौता दिया था. फींस्टीन ने उनकी इस मुलाकात पर भी सवाल उठाए और कहा कि जहां तक सहयोगी राष्ट्रों की आपसी बात है, उनके निजी फोन की जासूसी करना, खासकर नेताओं की, यह एक जासूसी हरकत से ज्यादा राजनीतिक जिम्मेदारी है. उन्होंने यह भी कहा, "हमें इस मामले को ध्यान से देखने की जरूरत है, और कुछ अपवाद को छोड़ राष्ट्रपति वह कर रहे हैं." एक दूसरे इंटरव्यू में अमेरिकी केंद्रीय खुफिया समिति और एनएसए के पूर्व प्रमुख माइकल हेडेन ने कहा कि जासूसी के पूरे मामले में जर्मनी के लिए ज्यादा खराब स्थिति है. उन्होंने कहा, "मैं चांसलर के लिए शर्मिंदगी का अनुमान लगा सकता हूं. इस मामले ने उनके लिए खराब राजनीतिक स्थिति पैदा की है." जर्मन ग्रीन पार्टी के श्ट्रोएबेले ने स्नोडेन से मिलकर उन्हें आश्वासन दिया कि उनके हकों का सम्मान किया जाएगा. मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि अगर स्नोडेन बर्लिन ना भी आ सके तो उस हाल में जर्मनी से वकीलों को बयान दर्ज करने के लिए रूस भेजा जा सकता है. अमेरिका पहले ही स्नोडेन के पासपोर्ट को अमान्य कर चुका है और जर्मनी समेत कई अन्य देशों से स्नोडेन को अमेरिका वापस भेजने के लिए भी कहा गया है. स्नोडेन ने कहा था कि वह जर्मन संसद में अमेरिकी जासूसी के बारे में गवाही देने के लिए भी तैयार है, बशर्ते उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए. अमेरिका को लिखे अपने खत में स्नोडेन ने उन पर लगे आरोपों से उन्हें मुक्त करने की मांग की थी. साथ ही स्नोडेन ने यह भी लिखा था, "जो लोग सच बोल रहे हैं वह अपराध नहीं कर रहे."