Tuesday, 30 July 2013

अज्ञात व्यक्ति के नाम मैक्सिम गोर्की का पत्र



रूपसिंह चंदेल

आपको पत्र भेजने के तुरन्त बाद 'तोल्स्तोय के पलायन' की सूचना का तार प्राप्त हुआ। और जैसा कि आप जानते हैं मैं आपको पुनः लिख रहा हूं, जबकि अभी भी मैं आपके साथ मानसिक जुड़ाव अनुभव कर रहा हूं।
निःसंदेह मैं जो कुछ भी कहने की इच्छा अनुभव कर रहा हूं वह इस समाचार से संबन्धित है जो अस्तव्यस्त कर देने वाला, संभवतः डरावना और कठोर है। आप मुझे क्षमा करेंगे। मैं ऐसा अनुभव करता हूं कि किसी ने गले से मुझे दबोच लिया है और मेरा गला घोंट रहा है।
उन्होंने मुझसे बहुत अधिक और बहुत लंबी बातें की थीं। जब मैं क्रीमिया में गास्परा में रहता था, प्रायः उनसे मिलने जाता, और उन्हें भी मेरे यहां आना प्रिय था।उनकी पुस्तकें मैं गंभीरतापूर्वक ध्यान और प्रेम के साथ पढ़ता था, अतः मुझे लगता है कि उनके विषय में मैं जो कुछ भी सोचता हूं वह कहने का मुझे अधिकार है। जैसा कि मैं जानता हूं और दूसरे भी जानते हैं कि बहुत अधिक प्रतिभाशाली कहे जाने की पात्रता रखने वाला, बहुत अधिक जटिल और अंतर्विरोधी, और हर प्रकार से महान--हर प्रकार से-- कभी कोई व्यक्ति नहीं होता। वह विशिष्ट और व्यापक दोनों ही अर्थों में महान हैं, इसप्रकार कि जिसे शब्दों में व्यक्त करना नितांत असंभव है। उनमें कुछ ऐसा है कि जो मुझमें इस इच्छा को भड़काता है कि चीखकर सभी को कहूं-- देखो, हमारे ग्रह में कितना अद्भुत व्यक्ति रह रहा है! जिस निमित्त वह हैं, ऐसे ही कहें, पूर्णरूप से एक मनुष्य के रूप में--सही अर्थों में एक व्यक्ति के रूप में, उन्हें अंगीकार करो।
लेकिन काउण्ट लेव निकोलाएविच के जीवन को 'संत जैसे पिता लेव के जीवन' में परिवर्तित करने के उनके हठीले और निरंकुश प्रयास को मैंने सदैव अस्वीकार किया है। आप जानते हैं, वह बर्दाश्त करने तक काम करते रहे हैं। उन्होंने येव्गेनी सोलाव्योव और सुलर से कहा कि उन्हें इसे न रोक पाने का कितना अफसोस है। लेकिन सुस्पष्ट रूप से--मैं दोहराता हूं--अपने मत का वजन बढ़ाने, अपने उपदेश को अत्यंत सम्मोहक बनाने, अपने दुख भोग द्वारा लोगों की दृष्टि में संत दिखने और उसे उन्हें स्वीकार करने के लिए विवश करने--उन्हें विवश करने, आप समझे, का एक हठीला उद्देश्य है उनका। इस विषय में वह जानते हैं कि उनके उपदेश पर्याप्त विश्वासोत्पादक नहीं हैं। जब उनकी डायरियां प्रकाशित होगीं आपको संदेहवाद के उनके द्वारा अपने स्वयं पर प्रयोग किए गए कुछ अच्छे नमूने मिलेंगे। वह जानते हैं कि “यंत्रणा और दुख भोगने वाले लगभग निरपवादरूप से निरंकुश और तानाशाह होते हैं”--वह सब कुछ जानते हैं। और फिर भी वह कहते हैं--”यदि मैंने अपने विचारों के लिए कष्ट उठाया तो वे बिल्कुल भिन्न प्रभाव स्थापित करेंगे।”
उन्होंने सदैव और सर्वत्र दूसरी दुनिया में अमरत्व का स्तुतिगान किया, लेकिन उनकी रुचि इसी दुनिया में अमरत्व प्राप्त करने में होगी। एक राष्ट्रीय लेखक वास्तविक अनुभव को व्यक्त करता है। वह अपनी आत्मा से राष्ट्र के समस्त बुरे स्वरूपों, हमारे इतिहास की यंत्रणाओं द्वारा दी गई समस्त विकृतियों को प्रस्तुत करता है। उनमें सभी कुछ राष्ट्रीय है, और उनके सम्पूर्ण उपदेश मात्र प्रतिक्रिया, और पुनरुद्भव हैं, जिनसे हमने पीछा छुड़ाना और पार पाना प्रारंभ कर दिया है। याद करें 1905 में लिखे उनके पत्र, “बौद्धिक, राज्य और जनता”--कितनी अप्रिय, विद्वेषपूर्ण चीज थी वह! आद्योपांत उसमें मतभेद रखनेवालों के लिए विद्वेषपूर्णता खोजी जा सकती है, “मैंने आपसे ऐसा ही कहा!” उनके शब्दों के आधार पर उस समय मैंने उन्हें उत्तर दिया दिया था कि वह “बहुत पहले ही रूसी लोगों के विषय में और उनके नाम में बोलने का अधिकार खो बैठे थे।” मेरा पत्र कठोर था और मैंने उसे भेजा नहीं था।
लेव निकोलाएविच में बहुत कुछ ऐसा है जो मेरी भावनाओं में घृणा जैसा उत्पन्न करता है, बहुत कुछ ऐसा जो एक भारी बोझ की भांति मेरी आत्मा पर रखा है। उनका अत्यधिक फूला हुआ अहम एक निरर्थक तथ्य है, लगभग असामान्य, उसमें बोगेतर स्व्यातोगोर जैसा कुछ है, जिसका वजन पृथ्वी संभाल नहीं सकी। हां, वह महान हैं। मैं गंभीरतापूर्वक स्वीकार करता हूं कि वह जो कुछ भी बोलते हैं, उसके अतिरिक्त बहुत कुछ ऐसा है जिस पर वह चुप रहते हैं--यहां तक कि अपनी डायरियों में भी--और उनके विषय में शायद वह कभी नहीं कहेंगे। यह 'कुछ' यदा-कदा, अस्थाई रूप से उनकी बातचीत में प्रकट हुआ है, और उसके संकेत उनकी उन दो डायरियों में मिलते हैं जो उन्होंने मुझे और सुलेर्जित्स्की को दिया था।
सारी जिन्दगी वह मृत्यु से भयभीत रहे और उससे घृणा किया। सारी जिन्दगी वह अर्जमास दुर्भिक्ष की काली छाया से भूताविष्ट रहे। पूरी दुनिया की आंखें उन पर टिकी हुई थीं। सजीव स्पंदित धागे चीन, भारत, अमेरिका तक फैले हुए थे। उनकी आत्मा सभी लोगों और सभी समय उपलब्ध थी। प्रकृति अपने नियम में कुछ अपवाद उत्पन्न कर उन्हें अर्पित क्यों नहीं करती--और मनुष्यों में केवल उन्हें शारीरिक अमरता प्रदान करती? वह एक नए रंगरूट की भांति अज्ञात बैरक के बारे में सोचकर भयभीत और निराश हैं। मुझे याद है गास्परा में स्वस्थ होने के बाद लेव शेस्तोव का 'गुड एण्ड एविल इन दि टीचिग्सं ऑफ नीत्से एण्ड काउण्ट तोल्स्तोय” (Good and Evil in the Teachings of Nietzshe and Count Tolstoy) पढ़कर वह ए.पी. चेखव की टिप्पणी के उत्तर में बोले थे, “पुस्तक पसंद नहीं।” फिर बोले :
“और मैंने उसे मनोरंजक पाया। कृत्रिम ढंग से लिखित, लेकिन बुरी नहीं, दिलचस्प। तुम जानते हो मुझे दोषदर्शी पसंद हैं, यदि वे निष्कपट हैं। उन्होंने कहीं कहा: सत्य आवश्यक नहीं है। और वह बिल्कुल सही हैं--उनके लिए सत्य क्या है? कुछ भी हो वह मर जाएगें।”

धीरे-धीरे हंसते हुए उल्लसित हो वह आगे बोले:

“एक बार एक व्यक्ति ने सोचना सीखा, और उसके विचार अपनी मृत्यु के विचार से बंधे हुए थे। सभी दार्शनिक ऐसे ही होते हैं। और सत्य का लाभ क्या जब मृत्यु आना सुनिश्चित है!”

उन्होंने आगे व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य सभी के लिए समान है-- “ईश्वर का प्रेम”, लेकिन वह विषय पर उदासीनतापूर्वक और उकताहटपूर्वक बोले। लंच के बाद बराम्दे मे उन्होंने पुनः पूस्तक उठा ली और उस स्थान को खोजकर जहां लेखक ने कहा था, “तोल्स्तोय, दॉस्तोएव्स्की और नीत्शे उनके उत्तर के बिना जीवित नहीं रह सकते और कुछ भी नहीं के बजाय उनके लिए कोई भी उत्तर अच्छा होगा।”

“कैसा निर्भीक हज्जाम”,”उन्होंने सीधे कहा,'मैं अपने साथ विश्वासघात करूं, जिसका अर्थ है कि मैं दूसरों को भी धोखा दूं। स्पष्टतया यही निष्कर्ष है--।”

सुलर ने पूछा, “लेकिन हज्जाम क्यों?”

“हां, “विचारमग्न होते हुए उन्होंने कहा, “मेरे मस्तिष्क में यह अभी आया कि वह एक फैशनेबुल छैला है, और मुझे गांव में उसके किसान अंकल के विवाह के समय मास्को से आए एक हज्जाम की याद आई। आश्चर्यजनक आचरण था उसका। वह लांसर (इंग्लैंड का एक नृत्य) कर सकता था, और इसलिए सभी की उपेक्षा की थी उसने।”

यह बातचीत मैंने शब्दशः प्रस्तुत की है। मुझे याद है कि यह बहुत अलग ढंग की थी। मैंने इसे लिख लिया था, क्योंकि जो कुछ मुझे प्रभावित करता है लिख लेता हूं। सुलर ने और मैंने बहुत से नोट्स तैयार किए थे, लेकिन अर्जमास के रास्ते सुलर ने अपने नोट्स खो दिए, जहां वह मुझे मिलने आया था--वह बहुत ही लापरवाह है, तथापि वह लेव निकोलाएविच को स्त्रियोचित ढंग से प्रेम करता है। उनके प्रति उसका व्यवहार कुछ विलक्षण, प्रायः विनीत होता है। मैंने भी अपने नोट्स कहीं रख दिए थे और वह मुझे नहीं मिले। शायद वे रूस में हैं। मैंने बहुत निकट से तोल्स्तोय को देखा, जिन्हें मैंने सदैव चाहा और अपनी मृत्यु के दिन तक चाहता रहूंगा, क्योंकि वह सजीव आस्था वाले सच्चे व्यक्ति हैं।

कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता कि जैसे यह प्रतिभाशाली व्यक्ति मृत्यु से खेल रहा है, उसके साथ चोंचलेबाजी कर रहा है। किसी प्रकार उससे कुछ बेहतर हासिल करने का प्रयत्न कर रहा है।

'मैं तुमसे भयभीत नहीं हूं। मैं तुमसे प्रेम करता हूं। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं।' और पूरे समय उनकी छोटी, तीक्ष्ण आंखें चारों ओर देख रही हैं-- तुम किसके समान हो? और वहां तुम्हारे पीछे क्या है? क्या तुम मुझे पूरी तरह नष्ट कर देना चाहती हो--अथवा मेरे लिए कुछ छोड़ दोगी?”

उनके शब्द: “मैं प्रसन्न हूं, अत्यधिक प्रसन्न हूं, बहुत अधिक प्रसन्न हूं!” आश्चर्यजनक प्रभाव छोड़ते हैं।और उसके तरंत बाद: “ओह, फिर दुख भोग।” मुझे एक क्षण के लिए भी आशंका नहीं हुई कि जब वह बीमार थे, वह अपने को कैदखाने में, निर्वासन में, एक शब्द में शहीदी ताज स्वीकार कर, ईमानदारी से प्रसन्न थे। क्या वह ऐसा अनुभव करते थे कि प्राणोत्सर्ग किसी प्रकार मृत्यु को उचित सिद्ध करेगा, उसे और अधिक बोधगम्य, बाह्य और औपचारिक दृष्टिकोण से सहज स्वीकार्य बनाएगा। मुझे विश्वास है कि वह कभी प्रसन्न नहीं थे--उन्होंने न तो “पुस्तकों के कलाकौशल” में, “न घोड़े की पीठ पर”, “न औरत की बाहों में” सांसारिक स्वर्ग का परमानंद प्राप्त किया। इसके लिए उनकी बुद्धि तर्कणापरक थी, और वह जीवन और जगत को भी समझते थे। उनके कुछ और शब्द:

“खलीफा अब्द-एर-रहमान के पास चौदह खुशी के दिन थे, और मैं नहीं मानता कि मेरे पास कभी इतने अधिक थे। और यह सब इसलिए कि मैं कभी सक्रिय नहीं रहा--सक्रिय कैसे रहा जाए,मुझे नहीं मालूम--अपने लिए, अपनी अंतरात्मा के लिए,लेकिन सदैव अर्थ के लिए, दूसरों के लिए जिया।”

जब हम लौट रहे थे, चेखव ने कहा, “मैं विश्वास नहीं करता कि वह कभी खुश नहीं रहे।” मैं मानता हूं। वह नहीं रहे। लेकिन यह सच नहीं कि वह “अर्थ के लिए” जिए। उन्होंने सदैव दूसरों को दिया, जैसे कि अपना अतिरिक्त (बचत) भिखारियों को दिया। चीजों का पालन करना उन्हें प्रिय था--पढना, टहलना, सब्जियों पर जीवित रहना, मुझिकों को प्यार करना और लेव तोल्स्तोय के विवेकपूर्ण और अमोघत्व पर विश्वास करना---।”

नेपल्स से कुछ पत्रकार आए हैं--एक रोम से आया है। उन्होंने मुझसे पूछा कि तोल्सतोय के 'पलायन' के विषय में मैं क्या सोचता हूं--वे उसे तोल्स्तोय का 'पलायन' कहते हैं। मैंने उनसे बात करने से इंकार कर दिया। निश्चित ही आप समझ लें कि मेरी आत्मा में भयानक हलचल है--मैं तोल्स्तोय को संत में परिवर्तित होता नहीं देखना चाहता। उन्हें पातकी ही रहने दें---पुश्किन ओर उनसे महान और प्रिय हमारे लिए कुछ नहीं है---।

.........

लेव तोल्स्तोय की मृत्यु हो गयी।

एक टेलीग्राम आया, जिसमें घिसे-पिटे शब्दों में कहा गया है--वह मर गए।

मेरे हृदय पर यह आघात था। पीड़ा और दुख से मैं रोया। अर्द्ध पागल अवस्था में मैं उनके चित्र देखने लगा, जैसा मैंने उन्हें जाना था, जैसा उन्हें देखा था, उनके विषय में बातचीत करने की वेदनापूर्ण इच्छा हुई। मैंने ताबूत में उनकी कल्पना की मानो सरित प्रवाह के बिस्तर पर शांत एक पत्थर रखा हो। निसंदेह अपनी भ्रामक मुस्कान--पूर्णरूप से निर्लिप्त--शांतिपूर्वक उनकी सफेद दाढ़ी में छुपी हुई है। और अंततः उनके हाथ शांतिपूर्वक मुड़े हुए हैं--उन्होंने अपने दुस्साध्य कार्य सम्पन्न कर लिए हैं।

मुझे उनकी उत्सुक आंखें--जो सभी चीजों को आर-पार देख लेती थीं--और उनकी उंगलियां, जो हवा में सदैव कुछ प्रतिरूपण करती रहती थीं, उनकी बातचीत, उनका हंसी-मजाक, उनके परम प्रिय किसानी शब्द, और उनकी अनूठी अस्पष्ट आवाज याद हैं।

एक बार मैंने उन्हें इस प्रकार देखा जैसा किसी ने कभी नहीं देखा होगा। मैं गास्परा के समुद्र तट पर टहल रहा था और ठीक युसुपोव जागीर के बाहर, चट्टानों के बीच अचानक मैंने उनके छोटे दुबले शरीर को सिलवटदार भूरे सूट और मुचड़ी हैट में देखा। वह वहां बैठे हुए थे। ठोढ़ी हाथ पर टेक रखी थी और उनकी दाढ़ी के भूरे बाल उनकी उंगलियों के बीच छितराए हुए थे। वह समुद्र की ओर देख रहे थे, जबकि उनके पैरों पर हरिताभ तरंगिकाएं (लघु लहरें) विनम्रतापूर्वक और स्नेहमयभाव से आलोड़ित थीं, मानो उस वृद्ध प्रतिभाशाली व्यक्ति को अपनी कहानी सुना रही थीं। वह एक चमकदार दिन था, चट्टानों पर बादलों की छायाएं रेंग रही थीं, इसलिए वृद्ध व्यक्ति और चट्टानें बारी-बारी से चमकती और छाया में छुप जाती थीं। चट्टानें, विशाल थीं और उनमें गहरी दरारें थीं। उनमें समुद्री शैवाल की तीखी गंध व्यप्त थी। वहां एक दिन पहले समुद्र किनारे से टकराने वाली बड़ी लहरें आयी थीं। और वह मानो कोई प्राचीन चट्टान थे जो अकस्मात सभी चीजों के आदि और प्रयोजन को जानते हुए जीवित रूप में आ उपस्थित हुए थे और इस बात से आश्चर्ययकित थे कि पृथ्वी पर पत्थरों और घास का, समुद्र में जल का, और मनुष्य और सम्पूर्ण संसार का--चट्टानों से लेकर सूर्य तक का कब और कैसा अंत होगा। समुद्र उनकी आत्मा के एक हिस्से की भांति था, और वह सब जो उनके चारों ओर था, उनका ही हिस्सा था। और अचानक एक उत्तेजित क्षण में मैंने अनुभव किया कि वह, हाथ ऊपर हिलाते हुए उठने जा रहे थे। इससे समुद्र निश्चल, भावशून्य हो जाएगा, चट्टानें हिलने-डुलने और चीखने लगेंगी, सभी चीजों को अपनी आवाज मिल जाएगी और वे अपनी वाणी में स्वयं उनके विषय में, उनके सामने बोलने लगेंगे। उस क्षण मैंने जो अनुभव किया शब्दों में व्यक्त करना कठिन है--मेरी आत्मा में आनंदातिरेक और दहल था, और फिर सब कुछ सुखद विचारों में पिघल गया था।

“मैं इस संसार में अनाथ नहीं हूं जब तक यह व्यक्ति इसमें वास कर रहा है। ”

फिर, सावधानीपूर्वक, मैं इस प्रकार वापस मुड़ा कि पैरों के नीचे रोड़े न खडखड़ाएं और उनके चिन्तन में खलल न पड़े। लेकिन अब मैं अनुभव करता हूं कि मैं अनाथ हो गया हूं। लिखते हुए मेरे आंसू बह रहे हैं--इससे पहले कभी मैं इस प्रकार विषण्ण होकर, इतनी हताशा, इतने दुख से नहीं रोया। मैं यह भी नहीं जानता कि मैं उन्हें प्यार करता था, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि उनके लिए मैंने प्रेम अनुभव किया या घृणा? उन्होंने सदैव मेरी आत्मा में विपुल, अजीब अशांत भाव आलोड़ित किया। वह बहुत प्रभावशाली होते थे जब, दबंग ढंग से अपने पैरों के तलवों को रगड़ते हुए दरवाजे के पीछे से या एक गोल कोने से अचानक प्रकट होकर संसार की सतह पर निरंतर चलने वाले एक अभ्यस्त व्यक्ति की भांति छोटे, हल्के, तेज कदमों से आगे बढ़ते थे। उनके अंगूठे उनकी बेल्ट में ठुंसे होते थे। वह एक क्षण के लिए रुकते और अपने चारों और कुछ खोजती-सी दृष्टि से देखते।

बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने उन्हें प्रसन्नता प्रदान करने का प्रयास किया, लेकिन मैंने नहीं देखा कि कोई अच्छे प्रकार से यह कर पाया। अपने साधारण विषयों पर कभी-कभार ही मुझसे बात करते थे--व्यापक क्षमाशीलता, पड़ोसियों के लिए प्रेम, नया टेस्टामेण्ट और बौद्धिज्म-- स्पष्टतया प्रारंभ से ही मैंने महसूस किया कि वह सब--मेरी पसंद की नहीं हैं। लेकिन मैंने गहराई से इन सबकी कद्र की।

जब वह प्रसन्न होते, वह सौम्य, व्यावहारिक, सहृदय और सज्जन हो जाते, और तब उनकी बात मनोहर, सहजतापूर्ण और शालीन होती थी, लेकिन कभी-कभी उन्हें सुनना पर्याप्त अप्रिय होता था। महिलाओं के विषय में वह जिस ढंग से बातें करते मुझे कभी पसंद नहीं आया--इस विषय में वह एक 'सामान्य व्यक्ति की भांति बहुत अधिक बोलते थे, और उनके शब्दों से कुछ अस्वाभाविक, कुछ अगंभीर ध्वनि निकलती थी, और नितांत वैयक्तिक भी। यह वैसा ही था मानो कभी किसी द्वारा आहत किए गए थे और न ही अपनी चोट को भूले थे और न ही उसे क्षमा किया था। उनसे पहली मुलाकात की शाम वह मुझे अपनी स्टडी में ले गए थे--यह खामोव्निकी—में हुई थी--मुझे अपने सामने बैठाया और 'वारेन्का ओलेसोवा' और 'ट्विण्टी सिक्स मेन एण्ड वन गर्ल' पर बात करने लगे। उन्होंने जिस अशिष्टता और निष्ठुरता से मुझसे यह मनवाने का प्रयास किया कि “एक स्वस्थ युवती की लज्जाशीलनता अस्वाभाविक है” मैं उनकी आवाज से खिन्न, और पूरी तरह क्षुब्ध हो उठा था।

“यदि लड़की पन्द्रह वर्ष की हो गई है तब वह चाहती है कि कोई उसे चूमे और खींचे।” उन्होंने कहा, “उसका मस्तिष्क उससे झिझकता है जिसे न वह जानता है, न समझता है, और उसे ही लोग शुचिता और लज्जा कहते हैं? लेकिन उसका शरीर, उसके मस्तिष्क के बावजूद, पहले से ही जानता है कि यह अनिवार्य और तर्कसंगत है और इस स्वभावगत धर्म की प्रतिपूर्ति की पहले से ही मांग करता है। तुम्हारी वारेन्का ओलेसोवा स्वस्थ चित्रित की गयी है, लेकिन उसकी भावनाएं आरक्तक प्राणी की हैं, जो कि गलत है।”

उसके बाद वह 'ट्वेण्टी सिक्स' की लड़की के बारे में सरलता के साथ एक के बाद दूसरी अश्लीलता प्रकट करते हुए बोले जो मुझे क्रूर लगा और जिसने मुझे खिजा भी दिया। इसके बाद मैंने महसूस किया कि उन्होंने केवल वे ही 'निषिद्ध' शब्द प्रयुक्त किए थे जिन्हें उन्होंने सही और सारगर्भित पाया था, लेकिन उस समय उनके बोलने का ढंग अप्रिय लगा था। अचानक मेरे जीवन , मेरी स्टडीज और मेरे पढ़ने को लेकर वह बहुत स्नेही और गंभीर हो गए थे।

“जैसा लोग कहते हैं, क्या तुम सच में उतना पढ़ते हो? कोरेन्को क्या एक संगीतकार है?”

“मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं नहीं जानता।”

“तुम नहीं जानते? तुम्हे उनकी कहानियां पसंद हैं?”

“बहुत अधिक।”

“वैषम्यता के कारण। वह एक कवि हैं, और तुम्हारे आस-पास कवि जैसा कुछ नहीं है। तुमने वालमैन (Waltmann) को पढ़ा?”

“हां।”

“एक अच्छे लेखक, क्या वह नहीं हैं? सुस्पष्ट, सटीक और कभी अतिरंजन न करने वाले। कभी-कभी वह गोगोल से बेहतर लगते हैं। वह बॉल्जाक को जानते हैं। तुम जानते हो, गोगोल ने मर्लिन्स्की का अनुकरण किया है?”

जब मैंने कहा कि गोगोल संभवतः हॉफमैन (Hoffmann), स्टर्न (Sterne ), और शायद डिकेंस से प्रभावित थे, उन्होंने मुझ पर एक दृष्टि डाली और पूछा:

“तुमने यह कहां पढ़ा? तुमने पढ़ा नहीं है? यह सही नहीं है। मैं नहीं समझता कि गोगोल ने डिकेंस को पढ़ा था। लेकिन तुमने सच में बहुत पढ़ा है--अपना खयाल रखो--यह खतरनाक है। कोल्त्सोव ने इस तरह अपने को तबाह कर लिया था।”

जब उन्होंने मानसिकरूप से मुझे अनुपस्थित देखा मेरे चारों ओर अपनी बाहें डाल दीं और मुझे यह कहते हुए चूमा:

“तुम वास्तव में एक मुज़िक हो। लेखकों के मध्य तुम्हें संघर्ष करना होगा, लेकिन किसी बाधा से तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए। सदैव वही कहो जो सोचते हो, कभी मत सोचो यदि कभी वह कुछ कठोर हो। बुद्धिमान लोग उसे समझ लेंगे।”

इस पहली मुलाकात ने मुझपर दोहरा प्रभाव डाला--तोल्स्तोय से मिलकर मैं प्रसन्न और गौरवान्वित था, लेकिन उनकी बातचीत प्रति-परीक्षण जैसी थी, और मैंने महसूस किया कि मैं 'दि कज्जाक', 'खोल्स्तमर (Kholstomer) और 'वार एण्ड पीस' के लेखक से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से मिला था, जिसने मुझपर कृपा की थी, और मुझसे सामान्य ढंग से सड़क छाप भाषा का प्रयोग करते हुए बातचीत करना आवश्यक समझा था, और इसने मेरी धारणा को अस्त-व्यस्त कर दिया था--धारणा जिसका मैं आदी हो गया था, और जो मुझे प्रिय थी।

अगली बार मैं उनसे यास्नाया पोल्याना में मिला। वह एक अच्छी फुहार वाला उदास दिन था, और उन्होंने भारी ओवर कोट, ऊंचे चमड़े के जूते, और नियमित पहनने वाले जलसह जूते पहन रखे थे और मुझे भुर्ज के छोटे वृक्षों , जिन्हें नियमित काटा जाता था, की ओर टहलने के लिए साथ ले गए थे। वह जवानों जैसी फुरती से गड्ढों और कीचड़ को फांद जाते थे। पेड़ों की शाखाओं से पानी की बूंदें उनके सिर पर टपक रही थीं। पूरे समय वह मुझे विस्तृत विवरण सुनाते रहे कि किस प्रकार शेन्शिन; (Shenshin)(फेत- अनुवादक) ने उन्हें उसी स्थान पर शॉपेनहावर (Schopenhauer) के विषय में समझाया था। और उन्होंने भुर्ज के कोमल कौशेय तने को प्यार से सहलाया था।

मैंने कुछ पंक्तियां हाल में पढ़ीं--

“मशरूम अधिक नहीं हैं, बल्कि सब निस्सार है,
क्या मशरूम की आर्द्र गंध से सुगन्धित--।
अच्छी है, बहुत अच्छी तरह अवलोकित।”

अचानक एक खरगोश हमारे पैरों के पास चीखने लगा। एल.एन. उत्तेजित हो तेजी से उछले। उनके गाल लाल हो गए और वह ऊंचे स्वर में लिहो! लिहो! चीख उठे। फिर वर्णनातीत मुस्कान के साथ उन्होंने मेरी ओर देखा और समझदार और मानवोचित हंसी हंसे। उस क्षण वह श्लाघ्य थे।

दूसरी बार, पार्क में, उन्होंने बाज को एक पशु अहाते पर मंडराते, उसके चक्कर काटते, और फिर आसमान में अचल लटके हुए देखा। उसके पंख हल्के-हल्के हिल रहे थे, मानो वह इस अनिश्चय में था कि अभी झपट्टा मारे या कुछ देर प्रतीक्षा करे। एल.एन. तुरंत चौकन्ना हो गए। उन्होंने अपनी आंखें अपनी गदोली से ठांप लीं और आशंकित हो फुसफुसाने लगे।

“बदमाश हमारे मुर्गी के बच्चों के पीछे पड़ा है। देखो-देखो--अब--ओह”, वह भयभीत थे। “संभवतः कोचवान वहां है--हमें कोचवान को बुलाना चाहिए--। ”

और उन्होंने उसे पुकारा। जब वह चीखे, बाज डरा और उड़ गया।

एल.एन. ने आह भरी और स्पष्टतः अपने को फटकारते से बोले--

“मुझे चीखना नहीं चाहिए था--हर हालत में वह बहुत दूर चला गया होगा---।”

एक बार तिफ्लिस के विषय में बात करते हुए मैंने वी.वी. फ्लेरोव्स्की - बेर्वी का जिक्र किया--

“तुम उन्हें जानते थे?” एल.एन. ने सोत्सुक हो पूछा, “उनके विषय में कुछ बाताओ।”

मैंने बताना प्रारंभ किया कि फ्लेरोव्स्की दुबले-पतले, लंबी दाढ़ी और बड़ी आंखों वाले लंबे व्यक्ति थे। पाल के कपड़े के वस्त्र पहनते थे। उनकी बेल्ट से लाल शराब में उबले चावलों का छोटा बैग लटकता रहता था और विशाल कैनवस का छाता लेकर चलते थे। वह मेरे साथ काकेशस के पार के पहाड़ी रास्तों में घूमते थे, जहां एक बार, एक संकरे रास्ते में हम एक सांड़ से टकरा गए थे। उस बदमिजाज जानवर को खुले छाते से धमकाते हुए हम किसी प्रकार बच निकले थे। पीछे हमें रसातल में गिरने का पूरे समय जोखिम बना रहा था। अचानक मैंने एल.एन. की आंखों में आंसू और घबड़ाहट देखी थी।

“कोई बात नहीं, जारी रखो, जारी रखो! यह केवल एक अच्छे व्यक्ति के विषय में सुनने के कारण था। वह कितने दिलचस्प व्यक्ति रहे होगें। मैंने उनके विषय में अभी इसी प्रकार की कल्पना की थी। वह दूसरे व्यक्तियों जैसे नहीं थे। वह बहुत परिपक्व, उग्र विचारधारा वाले लेखकों में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। उन्होंने ए.बी.सी. में अत्यन्त कुशलतापूर्वक यह प्रतिपादित किया कि हमारी संपूर्ण सभ्यता बर्बर है, जबकि संस्कृति जनजातियों का मामला है , कमजोरों का मामला, न कि शक्तिशालियों का।”

“उदाहरण के लिए, कोई फ्लेरोव्स्की के सिद्धांत के साथ योरोप के इतिहास में नोरमैन्स से मिलान कैसे कर सकता है?”

“ओह, नोरमैन्स, वह बिल्कुल भिन्न है।”

यदि उनके पास कोई उत्तर तैयार न होता, वह कहते, “वह भिन्न है।”

मैंने सदैव अनुभव किया कि एल.एन. साहित्य पर चर्चा करना पसंद नहीं करते थे, और मैं नहीं समझता कि मैं गलत सोच रहा था, लेकिन किसी लेखक के व्यक्तित्व में वह अत्यधिक रुचि दिखाते थे। मैंने प्रायः उनके प्रश्न सुने: “तुम उन्हें जानते हो? वह किस तरह के हैं? वह कहां पैदा हुए थे?” और उनका विचार विनिमय सदैव प्रायः व्यक्ति पर बहुत खास दृष्टिकोण प्रकट करता था।

वी.जी. कोरोलेन्को के विषय में विचारशील होते हुए उन्होंने कहा:

“वह एक उक्रेनी हैं और इसीलिए वह हमारी जिन्दगी को हमारी अपेक्षा कहीं बहुत बेहतर और बहुत स्पष्टता से देखने में समर्थ हैं।”

चेखव, जिन्हें वह अंतःकरण से प्रेम करते थे:

“उनके व्यवसाय ने उन्हें बरबाद कर दिया। यदि वह डाक्टर न होते तब वह और अधिक अच्छा लिखते।”

एक युवा लेखक के विषय में उन्होंने कहा: “वह अंग्रजों जैसा खेलता है, और मास्को के लोग उस जैसे अच्छे नहीं हैं।”

एक से अधिक बार उन्होंने मुझसे कहा: “तुम एक काल्पनिक कथा लेखक हो। तुम्हारी कुवाल्दा (Kuvaldas ) और दूसरे सभी विशुद्ध रूप से काल्पनिक हैं। ”

मैंने टिप्पणी की कि कुवाल्दा को जीवन से लिया है।

“बताओ कि तुम उससे कहां मिले थे।”

वह कजान के 'जस्टिस ऑफ दि पीस ' कोलोन्ताएव के कार्यालय के दृश्य से बहुत प्रसन्न हुए, जहां मैं कुवाल्दा नाम से चित्रित व्यक्ति से मिला था।

“अभिजातवर्गीय। अभिजातवर्गीय! वह यही है!” उन्होंने हंसते और अपनी आंखें पोंछते हुए कहा। “लेकिन कैसा मनोहर-मनोरंजक व्यक्ति है। तुम लिखने से कहीं बेहतर ढंग से कहानी कहते हो। तुम एक काल्पनिक कथा लेखक हो, तुम जानते हो--एक अन्वेषक, तुम्हे यह स्वीकार करना चाहिए।”

मैंने कहा कि सभी लेखकों ने कुछ हद तक अन्वेषण किया है। अपने जीवन में जिन लोगों को वे पसंद करते थे उन्हें प्रस्तुत किया। मैंने यह भी कहा, मैं सक्रिय लोगों को पसंद करता हूं जो अपनी पूरी शक्ति, यहां तक कि हिंसा से , जीवन में बुराई का विरोध करने की आकांक्षा रखते हैं।

“लेकिन हिंसा स्वयं में मुख्य बुराई है!” मेरी बांह पकड़कर वह चीखे।

मुझे अपनी कोहनी से हल्के से टहोका देते हुए वह मंद-मंद मुस्कराए, “इससे बहुत-बहुत खतरनाक निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। तुम सच्चे समाजवादी नहीं हो। तुम एक कल्पना प्रधान व्यक्ति हो, ओर रोमानी व्यक्ति किचिंत राजतंत्रवादी होते हैं, जैसा कि सदैव होता रहा है।”

“विकटर ह्यूगो के विषय में क्या कहते हैं?”

“विक्टर ह्यूगो भिन्न है। मैं उसे पसंद नहीं करता। वह एक शोर मचाने वाला व्यक्ति है।”

वह प्रायः मुझसे पूछते कि मैं क्या पढ़ रहा हूं, और निरंतर वह मुझे मेरी पुस्तकों की खराब पसंद को जानकर झिड़कते थे।

“गिब्सन कोस्तोमारोव की अपेक्षा बदतर थे। तुम्हे मॉम को पढ़ना चाहिए। वह महा उबाऊ हैं, लेकिन वह बहुत ठोस हैं।”

जब उन्हें ज्ञात हुआ कि पहली जो पुस्तक मैंने पढ़ी वह ले फेरेस ज़िम्गानो (Les Freres Zemganno ) थी, वह पूर्णरूप से क्रोधाविष्ट हो उठे थे।

“तुमने--एक पूर्खतापूर्ण उपन्यास! इसीसे तुम तबाह हुए। तीन फ्रेंच लेखक---स्टेण्डल (Stendhal)] बाल्जॉक, और फ्लॉबर्ट--तुम मोंपासा को भी जोड़ सकते हो, लेकिन चेखव बेहतर हैं। गान्कर्ट केवल विदूषक हैं। वे गंभीर होने का अभिनय करते हैं। उन्होंने उन जैसे अन्वेषकों द्वारा लिखी पुस्तकों से ही जीवन को जाना है और वे उस सबको गंभीरता से लेते हैं, लेकिन किसी को उनके लेखन की आवश्यकता नहीं है।”

मैं उनसे सहमत नहीं था, और इसने एल.एन. को क्षुब्ध कर दिया। वह प्रतिवाद पर खड़े नहीं रह सके और उनके तर्क आश्यर्चजनकरूप से दुराग्रही थे।

“अपकर्ष जैसा कुछ नहीं होता।” वह बोले, “यह सब इटैलियन लाम्ब्रोसो (Italian Lombroso) के अन्वेषण हैं। यहूदी नॉर्दो (Jew Nordau) ने उसे तोते की तरह दोहराया। इटली धूर्त और तिकड़मियों का देश है--केवल अरेटिनो (Aretinos), कसनोवा (Casanovas) कैग्लिओस्ट्रस (Cagliostros) जैसे लोग वहां पैदा हुए।”

“गैरी-बॉल्डी के विषय में आपके विचार?”

“वह राजनीति है, वह भिन्न है!”

जब रूस के सौदागर परिवारों के इतिहास से एक के बाद दूसरे तथ्य प्रस्तुत किए, उन्होंने उत्तर दिया:

“यह सत्य नहीं है। यह सब चतुराई से लिखी गई पुस्तकों में प्राप्त होता है- - “ मैंने उन्हें अपने परिचित सौदागर परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी बतायी ---विशिष्ट बेरहमी के साथ हुए उनके अपक्षय की कहानी।

उत्तेजना में मेरी बांह पकड़कर उन्होंने कहा:

“वह सही है! वह मैं जानता हूं--तूला में दो ऐसे परिवार हैं। इसलिए तुम्हें उस विषय पर लिखना चाहिए। संक्षेप में--एक बड़ा उपन्यास। तुमने समझा मेरा मतलब क्या है? उसे करने का यही तरीका है।”

और उनकी आंखें उत्सुकता से चमक उठीं।

“उसका कुछ नहीं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति अपने पूरे परिवार के लिए प्रार्थना करने हेतु सन्यासी हो जाता है--यह अद्भुत है। वही वास्तविक जीवन है। तुम पाप करो और मैं तुम्हारे पापों से उद्धार के लिए जाता हूं। और दूसरा--उकताऊ लोभी--वह भी सच है। उसके लिए, पियो, और जानवर और विलासी बन जाओ, और सभी को प्रेम करो, और अचानक हत्या करो-- यह सब कितना अच्छा है! इसीलिए तुम चोरों और आवारागर्दों के बीच हीरो खोजने के बजाय उस विषय पर लिखना चाहते हो।”

वह प्रायः मेरी कहानियों में अतिरंजनाओं की चर्चा करते, लेकिन एक बार 'डेड सोल' के दूसरे भाग पर बोलते हुए, उन्होंने स्वभाविक रूप से मुस्कराते हुए कहा:

“हम सभी पहले दर्जे के कल्पित कथाकार हैं, मैं भी हूं। कभी-कभी कोई लिखना प्रारंभ करता है, और फिर अचानक वह किसी चरित्र को कमजोर अनुभव करता है और उसे विशेष महत्व देने लगता है अथवा, दूसरे को हल्का करने लगता है, जिससे तुलना में पहला निराशाजनक प्रतीत न हो।”

और उसी समय, एक निर्णायक की दृढ़ और गंभीर आवाज में बोले :

“और इसीलिए मैं कहता हूं, कला झूठ, धोखा, निरंकुश चीज है, जो मानवता के लिए घातक है। वास्तविक जीवन जैसा है तुम उसे उसीप्रकार नहीं लिखते , लेकिन जीवन के प्रति तुम्हारे अपने विचार, तुम स्वयं जीवन के प्रति क्या सोचते हो--वह लिखते हो। किसीके यह जान लेने से क्या होगा कि मैं टावर , अथवा समुद्र, अथवा तातार को कैसे देखता हूं? कौन जानना चाहता है। उसका उपयोग क्या है?”

एक बार उन्होंने कहा:

“मई के अंत में मैं कीव के एक मुख्य मार्ग में टहल रहा था। धरती स्वर्ग थी, आकाश बादलों से रहित था, चिड़ियां चहचहा रही थीं, मधुमक्खियां भिनभिना रही थीं और मेरे चारों ओर सब कुछ आनंदमय था, मानवोचित--शानदार। मेरे आंसू निकल आए मानो मैं स्वयं एक मधुमक्खी था और दुनिया भर में प्यारे फूलों पर मडरा रहा था और मानों ईश्वर मेरी आत्मा के अतिनिकट था। अचानक मैंने क्या देखा? सड़क के किनारे झाड़ियों के नीचे, दो यात्री, एक पुरुष और एक स्त्री, एक-दूसरे पर हाथ-पैर चिमटाकर चढ़े हुए लेटे थे। दोनों व्यभिचारी, गंदे, बूढ़े, कीड़ो की भांति कुलबुला, फुसफुसा और कुड़बड़ा रहे थे। सूर्य निर्दयतापूर्वक उनके अनावृत्त विवर्ण पैरों पर रोशनी डाल रहा था। ओह, ईश्वर, सौन्दर्य के सृजनकर्ता--क्या तुम स्वयं पर लज्जित नहीं? मैंने बहुत बुरा अनुभव किया--।”

बोलते समय उनकी आंखों के भाव बहुत विशिष्ट प्रकार से बदल रहे थे, कभी वे बचकानी विषादपूर्ण होतीं, कभी उनमें एक कठोर शुष्क चमक दिखती। उनके होंठ फड़कते और मूंछे खड़ी होतीं। जब उन्होंने बोलना समाप्त किया उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से रूमाल निकाला और जोरदार ढंग से अपने चेहरे को रगड़ा, हालांकि वह सूखा हुआ था।

एक दिन मैं ड्यूल्बर से अई.टोडोर तक निचली सड़क के समानान्तर सड़क पर उनके साथ टहल रहा था। एक युवक की भांति लंबे हल्के डग भरते हुए और अधिक उत्तेजना प्रकट करते हुए उन्होंने कही:

“आत्मा की अपेक्षा शरीर को सुप्रशिक्षित होना चाहिए। जहां कहीं भी आत्मा उसे भेजे उसे जाना चाहिए। और हमारी ओर देखो। शरीर विलासी और चंचल है, और आत्मा दयनीय निस्सहायता के साथ उसका अनुकरण करती है।”

उन्होंने ठीक हृदय के ऊपर अपनी छाती को जबर्दस्ती रगड़ा, अपनी भौंहे उठायीं, और ध्यानपूर्वक कहना जारी रखा:

“मास्को में सुखारेव टावर के निकट--यह शरद ऋतु की बात है,एक बार मैंने शराब में धुत्त एक युवती को देखा। वह एक गटर में पड़ी हुई थी। गंदे पानी की धार उससे एक गज दूर ठीक उसकी गर्दन और पीठ के नीचे टपक रही थी, और वहां वह ठण्डे पानी में कुड़बुड़ती, हिलती-डुलती, छटपटाती, लनगभग भीगी हुई, उठने में असमर्थ पड़ी हुई थी।”

वह कांपे, क्षण भर के लिए आंखें बंद कीं, सिर हिलाया और धीमे स्वर में बोले--

“यहां बैठते हैं। एक धुत्त स्त्री की अपेक्षा कुछ भी अधिक भयानक, अधिक घृणित नहीं होता। मैं जाकर उठने में उसकी सहायता करना चाहता था, लेकिन कर नहीं सका। मैंने अपने को उससे पीछे हटा लिया था। वह पूरी तरह गंदी और गीली थी। उसे छूने के बाद एक महीने तक आप अपने हाथ साफ करने में असमर्थ रहते--दारुण! और उसके निकट किनारे के पत्थर पर एक भूरी आंखों, सुन्दर बालों वाला छोटा लड़का गालों पर आंसू बहाता, सूं-सूं करता और असहाय-सा चीखता हुआ बैठा था।”

“मा--म-S-S-S-उठो--।”

“हर बार जब तब वह अपनी बाहें उठाती, फुफकारती, अपना सिर उठाती, और पुनः--कीचड़ में उसे गिरा देती।”

वह चुप हो गए और फिर, अपने चारों ओर देख घबड़ाए हुए लगभग फुसफुसाते हुए दोहराने लगे।

“घृण्य, घुण्य! तुमने बहुत-सी नशे में धुत्त स्त्रियां देखी होंगी? तुमने देखी हैं न--ओह, ईश्वर! उस विषय पर मत लिखना, तुम्हें नहीं लिखना चाहिए।”

“क्यों नहीं?”

मेरी आंखों में देखते हुए मुस्कराते हुए उन्होंने दोहराया:

“क्यों नहीं?”

फिर वह चिन्तनशील हो धीमे स्वर में बोले:

“मुझे मालूम नहीं। यह यूं ही कि मुझे---पाशविकता के विषय में लिखना शर्मनाक प्रतीत होता है। लेकिन अंततः-- क्यों नहीं? किसी को सभी विषयों पर लिखना चाहिए---।”

उनकी आंखों में आंसू छलक आए। उन्होंने उन्हें पोंछ डाला और पूरे समय मुस्कराते हुए अपनी रूमाल की ओर देखते रहे, तभी आंसू उनकी झुर्रियों पर पुनः टपक पड़े थे।

“मैं रो रहा हूं” वह बोले, “मैं एक बूढ़ा व्यक्ति हूं, जब मैं किसी भयानक चीज के विषय में सोचता हूं वह मेरे हृदय को कंपा देती है।”

फिर मुझे हल्के-से टहोका देते हुए--” सब कुछ अपरिवर्तित रहेगा, और तुम इससे अधिक दुखपूर्वक रोओगे जितना मैं इस समय रो रहा हूं, और अधिक आंसू टपकाओगे, जैसा कि किसानों की स्त्रियां करती हैं---लेकिन सभी विषयों पर लिखना चाहिए, सभी पर, अथवा सुन्दर बालों वाला छोटा लड़का आहत होगा, वह तम्हारी भर्त्सना करेगा---।”

उन्होंने पूरी तरह से अपने को हिलाया और खुशामदी ढंग से बोले:

“आओ, कुछ कहो, तुम बहुत अच्छे वक्ता हो। बच्चे के विषय में, अपने विषय में। यह विश्वास करना कठिन है कि कभी तुम भी बच्चे थे, तुम भी--- ऐसे विलक्षण व्यक्ति। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम बड़े ही जन्मे थे। तुम्हारे विचारों में बहुत कुछ बचकाना, अपरिपक्व है, और फिर भी तुम जीवन के बारे में बहुत कुछ जानते हो---तुम्हें और अधिक जानने की आवश्यकता नहीं है। आओ, मुझे कुछ सुनाओ---।”

और वह देवदारु वृक्ष की बाहर निकली जड़ पर, धूसर देवदारु के छेद से निकल रही चीटियों की घबड़ाहट और गतिविधियों को देखते हुए आराम से बैठ गए थे।

सड़क पर वह द्रुत, त्वरित चाल से एक अनुभवी भूपर्यटक की भांति चलते थे। उनकी उत्सुक आंखों से देखने, मापने, पर्यवेक्षण और तुलना करने से पत्थर ही नहीं, विचार भी बच नहीं पाते थे। और वह अपने अविच्छिन्न जीवंत विचारों को अपने चारों ओर बिखेरते रहते थे। उन्होंने सुलर से कहा:

“सुलर, तुम कभी नहीं पढ़ते, यह बहुत खराब है। यह दम्भ है, और यहां गोर्की बहुत पढ़ते हैं, और यह भी गलत है।--यह उसमें आत्मविश्वास की कमी प्रकट करता है। निश्चित ही मेरे सोचने का ढंग मेरे लिए अच्छा है, यद्यपि गोर्की सोचते हैं कि उनके लिए यह गलत है, और तुम बिल्कुल नहीं सोचते। तुम किसी चीज को पकड़कर दबोच लेने के लिए केवल आंखें झपकाते और देखते हो और तुम उन चीजों को पकड़ लेते हो जिनका तुम्हारे लिए कोई अर्थ नहीं--प्रायः तुमने वही किया है। तुम पकड़ लेते हो चिपका लेते हो, और जिस चीज को तुमने चिपकाया हुआ होता है वह जब तुमसे अलग होकर गिरने लगती है, तुम उससे अलग हो जाते हो। चेखव की एक बहुत अच्छी कहानी है--'दि डार्लिगं'--निश्चय ही उसमें वर्णित स्त्री तुम्हें पसंद है!”

“किस रूप में?” सुलर हंसा।

“तुम सदैव प्रेम के लिए तैयार रहते हो, लेकिन तुम नहीं जानते कि चयन कैसे करना है, और तुम उस छोटी-सी बात पर अपनी ऊर्जा नष्ट कर देते हो। ”

“क्या सभी को वह पसंद नहीं है?”

“सभी को?” मंद-मंद मुस्कराते हुए एल.एन. बोले, “नहीं--नहीं--सभी को नहीं। ” और अचानक उन्होंने मुझ पर प्रहार शुरू कर दिया:

“तुम ईश्वर में विश्वास क्यों नहीं करते?”

“मुझे विश्वास नहीं है, एल.एन.।”

“यह सही नहीं है। स्वभाव से तुम आस्तिक हो। ईश्वर के बिना तुम आगे नहीं बढ़ सकते। जल्दी ही तुम यह अनुभव करने लगोगे। तुम इसलिए विश्वास नहीं करते क्योंकि तुम दुराग्रही हो, और क्योंकि तुम खीजे हुए हो। संसार में ऐसे रास्ते नहीं बनते जैसा तुम चाहोगे। कुछ लोग अपने संकोच के कारण नास्तिक होते हैं। कभी-कभी नौजवान ऐसे होते हैं। वे किसी स्त्री की आराधना करते हैं, लेकिन उसे प्रकट होना बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्हें गलत समझे जाने का भय होता है, और इसके अतिरिक्त उनमें साहस भी नहीं होता। विश्वास के लिए प्रेम की भांति, साहस, और निर्भीकता की अपेक्षा होती है। तुम्हें स्वयं से कहना चाहिए, 'तुम विश्वास करते हो' और सब कुछ ठीक हो जाएगा और जैसा तुम चाहते हो सब वैसा ही प्रतीत होगा। सभी कुछ स्वयं तुम्हें स्पष्ट हो जाएगा, तुम्हें आकर्षित करेगा। बहुत कुछ है जिसे तुम प्रेम करते हो, उदाहरण के लिए, विश्वास प्रेम का केवल तीव्रीकरण है। तुम्हें और अधिक प्रेम करना चाहिए और प्रेम विश्वास में परिवर्तित हो जाएगा। संसार में स्त्री के लिए अच्छा है कि पुरुष उसे प्रेम करें, और संसार में सभी अच्छी स्त्री को प्रेम करें और एक तुम हो---वही विश्वास! विश्वास न करने वाला कभी प्रेम नहीं कर सकता। वह आज एक के साथ प्रेम में पड़ता है, और एक वर्ष बाद दूसरे के साथ--। ऐसे व्यक्ति की आत्मा आवारागर्द होती है, वह निर्जीव है, और यह सही नहीं है। तुम एक आस्तिक के रूप में जन्में हो ओर अपनी प्रकृति के विरुद्ध जाने का प्रयास उचित नहीं है। तुम सदैव कहते हो---सौन्दर्य। और सौन्दर्य है क्या? सर्वोच्च और सर्वाधिक परिपूर्ण है--ईश्वर।”

इससे पहले इन विषयों पर उन्होंने मुझसे बहुत कम बात की थी, और विषय का महत्व, उसकी अतार्किकता ने मेरी अनभिज्ञता को प्रभावित किया और मैं अभिभूत हो उठा था। मैंने कुछ नहीं कहा। वह सोफे पर बैठे थे। उन्होंने अपने पैर अपने नीचे कर लिए। उनकी दाढ़ी पर एक उल्लसित मुस्कान खिल उठी और मेरी ओर एक उंगली हिलाते हुए वह बोले:

“तुम जानते हो, तुम कुछ नहीं कहकर उससे भाग नहीं सकते।”

और मैंने, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, उन पर चुपचाप एक सरसरी दृष्टि डाली और स्वयं से कहा:

“यह व्यक्ति ईश्वर की भांति है।”

यूडित और ऐस्तैर


 जिग़मोन्द मोरित्स

हम लोग निर्धन थे।
भिखारियों से भी बढक़र गरीब।
खानदानी लोगो का गरीब हो जाना, इससे बढक़र बोझ है कोई?
एक छोटे से गांव में जाकर समेट लिया था अपने आपको, जहां एक टुकडा भी जमीन का हमारा न था और भीनी सुगंध देने वाले पेड भी दु:ख का ही आभास दिलाते थे। सिर्फ हमारी यादों में बसे थे, हमारे पेड-पौधे, मवेशी, अस्तबल, और बडे-बडे ख़ंभों वाला महल जैसा घर, तीसा नदी के किनारे। जगत के दूसरे कोने में जाकर बस गये थे अपनी गरीबी को छुपाने के ख्याल से। फिर भी ऐसी जगह आ पहुँचे, जहां रिश्तेदार निकल आये। पिताजी ने सोचा, रिश्तेदार होना तो अच्छा ही है, जरूरत पडने पर कभी काम आ सकते है। लोग भी अच्छे है। परन्तु श्राप था रिश्तेदारों का होना।

यह संबंधी गांव की सीमा पर रहते थे सबसे बडे मकान में, जो काफी फ़ैला हुआ था और अपनी संकीर्ण खिडक़ियों से बाहर की दुनिया को देखता था। हमारे विशालकाय पुराने महल के मुकाबले में कहां था यह मकान! पर कैसी कडवी, दिल को दुखाने वालीर् ईष्या जगाता था हमारे मन में। विन्सै चाचा, दोहरी ठोडी, सख्त हाथों और बडी घनी भौंहो वाले हमारे रिश्तेदार थे और हमें नौकरों की तरह रखने की व्यर्थ कोशिश कर चुके थे। नाराज थे कि पिताजी ने उनके साथ किसी तरह के गैरकानूनी काम करने से इंकार कर दिया था। जलते भी थे, क्योंकि उनके दादा के समय से ही उनका संबंध हमारे पुराने नवाबी खानदान से अलग हो गया था, जबकि हमारे खानदानी हिस्से में नवाबियत देर तक चलती रही थी। यह बात और है कि अब हम एक पकी नाशपाती की तरह जमीन पर गिर पडे थे और धूल में मिल गए थे।

और अब औरतों के बारे में बताता हूं। मेरी मां का नाम यूडित था शिमोनकौय यूडित । उनकी नानी बडी ज़मींदार घराने की लडक़ी थी,जिनका संबंध संसार के मशहूर खानदानों तक जाकर जुडता था। और विन्सै चाचा (जो एक तरह से माली ही थे) की पत्नी चितकै ऐस्तैर थी,जिनके पिता औलफल्द (हंगरी का वह भाग जहां के घोडे मशहूर है) में किसी सईस के यहां मुनीम का काम करते थे और ऐसा भी कहा जाता था कि वह काम कम, दोनों हाथों से लूटते ज्यादा थे।

दोनों औरतें ऐसी थी, मानो तेज छुरियां। मेरी मां कभी शिकायत नहीं करती थी। एकदम जड सी हो गई थी और बिना आह भरे अपनी जिंदगी का बोझ ढो रही थै। लेिकन गांव में इसकी चर्चा थी कि मां के लकीरों वाले मखमली बक्से के अंदर पुराने छोटे-छोटे फूलों की कढाई वाले स्कर्ट, कीमती सिल्क और इसी तरह की पुरानी बेशकीमती चीजें अब भी उनके बीते हुए दिनों की याद बनाए रखने के लिए रखी गई है।शायद इसमें कुछ सच भी होगा, पर थोडा सा। मेरे पिता घर आते थे, कभी गालियां बकते हुए, कभी हंसते हुए, कभी उम्मीद लगाए हुए। हर व्यक्ति पर भरोसा कर लेते थे और हए एक से धोखा खाते थे। कई बार मां और पिताजी में काफी झगडा होता था।

मां ने अपने आप को अपने मे ही समेट लिया था, इसलिए शायद मैं एक शर्मीला डरपोक बालक बन गया था, जिसे मां और संसार के बीच बिचौलिया बनन पडता था। लोगों से डरता था, किसी के सामने आते ही यूं बाहर निकलता था जैसे कोई घोंघा, जो ज़रा सी हरकत होते ही वापस अपने खोल में सिमट आने को तैयार हो। फिर भी मुझे बाहर जाना ही पडता था लोगो के बीच। मैं अपने परिवार का प्रतिनिधि जो था गांव के सामने। मेरे पिता तो अधिकतर घर पर होते नहीं थे और मां! वो तो घर के आंगन तक पैर नहीं रखती थी, जब तक बिल्कुल ही जरूरी नहीं हो जाता था। केवल मैं घर से बाहर निकलता था - स्कूल के लिए, दुकान की ओर और दूध के लिए।

दूध, हमारी छोटी सी जिंदगी की सबसे बडी क़मी। और कई मुसीबतों के बीच जिन पर हमें उलझन होती थी, यह मेरे लिए सबसे अधिक दु:ख का कारण था। मुझे दूध बहुत पसंद था और हमारे पास गाय नहीं थी। गांव में दूध मिलता नहीं था, कभी-कभी पैसे से भी नहीं, क्योंकि दूध तो बडे बाजारों में शहरों में बेचने वाली चीज थी। और पूरे गांव वालों के बीच लाइन में खडा होकर दूध खरीदने का विचार यूं भी दिल दहलाने के लिए काफी था। हां अगर मां अधिक बोलने वाली होती और पडोस की औरतों की चटपटी, बेबुनियाद बातों को सुन सकती थी तो दूध के लिए मुझे नहीं जाना पडता। दूधवालियां घर पर ही पहुंचा जाती। पर ऐसा संभव नहीं था। और इसके लिए मुझे अहंकार भी था मां पर,क्योंकि वे चाहे गरीब थीं ; पर सुंदर और अभिमानी थी।

क्रि्रसमस की एक शाम इस दूध के कारण हमारे साथ एक बडा हादसा हुआ। मैं पूरे गांव का चक्कर लगा आया था, अपने हाथों में सफेद भूरे पैसे पकडे ड़रते हुए। हे भगवान् कहीं से एक गिलास दूध मिल जाये। पर हर तरफ लोग त्योहार के कारण खुले दिल से खर्च कर रहे थे। मेरे सामने बडे-बडे पतीलों में, तीन पैरों वाले मिट्टी के बर्तनों में दूध की खरीद-फरोख्त हो रही थी, पर मेरे मांगने पर तेज आंखो वाली पैसे की लालची गांव की औरतें अपना हाथ झाड देती और अपनी कमर पर कोहनियां जमाकर खडी हो जाती थी और दुखडा रोने लगती थी, '' बेटा है नहीं। दे नहीं सकते। दूध जमा करना है। त्योहार आने वाला है। पकवान बनाने है, बडे बाजार में बेचने जाना है, वहां दूध के अच्छे पैसे मिल जायेंगे।

थका हुआ बुडबुडाता हुआ घर पहुंचा, ''नहीं मिला, कोई नहीं देता।'' मां की बर्डीबडी क़ाली आंखे और बडी हो गई, बस यूं चमकी। वे न बोली,न उन्होने आह भरी, न उनके आंसू निकले। मगर मैं दुबक कर ऐसे बैठ गया, मानो एक छोटा चूहा, ऐसा महसूस कर रहा हो, मानो अभी बिजली गिरेगी। मां भी पकवान बनाना चाहती थी, मैदा दूध से गूंधना था, पर बोली कुछ नहीं। पानी का बर्तन लाई और पानी से ही गूंधने लगी। मैं पलक झपकाये बगैर देखता रहा। बाहर अंधेरा तेजी से बढ रहा था। जैसे ही मां ने मैदा सानना शुरू किया, मेरे दिमाग में एक बहुत साहसी विचार पनपा,

'' मां!'' मां ने मेरी तरफ आंख उठाई, मैने अपना विचार उनके सामने रखा,'' मैं ऐस्तैर चाची के यहां जाऊं।''

मां ने पलक भी न झपकाई, हालांकि मैने बहुत बडी बात कह दी थी। अगर इस वक्त अलमारी पर चमकती हुई पीतल से मढी बाइबल अपने-आप अचानक उडक़र मेरे सर से टकरा जाती तो भी मैं इतना हैरान नहीं होताऐस्तैर चाची से हमने कभी कुछ नहीं मांगा था, चाहे भूख से हम मर ही क्यूं न रहे हो। उनके पास छ: गायें थी और हमारे घर में तीन-तीन दिन तक एक चम्मच दूध भी नहीं होता था। रोज आलू का सूप बनाकर पी लेते थे। अब तक मेरा दिल थोडे से दूध के लिए टूट ही चुका था। खिडक़ियों पर बर्फ चमकने लगी थी, सूर्य की किरणें भूरे रंग की हो चुकी थी। मां गूंधती रही, गूंधती रही, फिर अचानक बोली, ''जा।'' मैने सोचा शायद मैने ठीक से नहीं सुना हैं। एक क्षण को रुका,फिर मेज पर से पैसे उठाये और पकड क़र तेजी से भागा। फिर एक बार दरवाजे पर ठिठका, रुका, मां की ओर फिर से मुडक़र देखा,''जाऊं?''
'' जा।''

पूरे रास्ते मेरा दिल धडक़ता रहा, कहीं कुत्ते न पकड लें। कितना घबराता था मैं उनसे। मगर रास्ते-भर इतने खूंखार कुत्तों से सामना नहीं हुआ, जितना रिश्तेदारों के अहाते में। एक नौकरानी सामने से आई और उसने मुझे कुत्तों से बचाया।

'' ऐस्तैर चाची कहां है?''

भडक़ीले कपडे पहने वो नौकरानी शायद कुछ उदास सी थी और कुछ गुस्सा भी, ''उधर हैं पशुओं के बाडे क़ी ओर,'' गुर्राकर बोली, मानो अपने कुत्तों की तरह अपने पैने दांत मुझमें गडाना चाहती हो। मैं सहमा सा, धीरे-धीरे, आधा ध्यान कुत्तों की ओर लगाए बाडे क़ी तरफ बढा। पैरों को यूं दबाकर रखता हुआ कि पत्ते तक के खडक़ने की आवाज न सुनाई दे पैरों तले। बाडे क़े दरवाजे पर गहरा कोहरा छाया हुआ था। अचानक मैं रुक गया, मानो बर्फ क़ा छोटा का पुतला बनकर रह गया हूं। बाडे में से अजीब सी आवाजें आ रही थी।

'' छोडो मुझे।'' ऐस्तैर चाची की आवाज सुनाई दी,पर ऐसे जैसे चिल्लाना चाह रही हों।कुछ झगडा सा सुनाई दिया। फिर कोई तख्त या कोई चारा रखने के लकडी क़े बक्से की चिरमिराने की आवाज सुनाई दी।
'' बदमाश!'' ऐस्तैर चाची हांफते हुए बोली,'' सुअर, बदमाश!''

कोई मर्दानी हंसी सुनाई दी, हलके से हिनहिनाते हुए। मैं पहचानता था यह आवाज। उनके ड्राइवर की थी, फैरी पाल की, जिनके बारे में मैंने सुना था कि वो चाची की नौकरानी की वजह से यहां काम करने लगा था।

'' क्या चाहते हो?'' फुर्सफुसाकर चाची बोली।
'' आओ ना!'' पाल बोला। फिर शांति हो गई।

मैं ऐसे खडा रहा, मानो एक प्रतिमा। एक जडी हुई, अजीब सी, एक छोटी सी बाल प्रतिमा, पर मुझे इस बातचीत का एक शब्द भी समझ में न आया।

'' जाने दो।'' फुसफुसाकर फिर से चाची बोली।
'' आओ, अगर नहीं आई तो मैं बाडा जला दूंगा। मुझे पागल न बनाओ....जब प्यास जगायी है तो बुझाओ भी तो।''

बाडे में हलचल हुई और चाची तेजी से बाहर दौडी। ज़ब उन्होने डरते हुए, फटी-फटी आंखे लिए दरवाजे पर कदम रखा तो फौरन उनकी निगाह मुझ पर पडी। समझीं कि मैने सब कुछ देख, सुन और समझ लिया। इससे वे बेहद डर गई।

'' क्या चाहिए?'' मेरी ओर कातिलाना नजर डालती हुई बोली।
'' मेरी मममां ने।'' मै हकलाते हुए बोला,'' आपको सलाम भेजा है और एक जग दूध आपसे लाने को कहा है।''
'' नहीं है।'' वो चिल्लायी।

लगा जैसे मैं लडख़डा गिर जाऊंगा। इसके साथ ही वो घर की तरफ बढ ग़ई। मेरे दिमाग में एक अक्ल की बात कौंधी, ''पैसे से ले लेना चाहता हूं।'' मै चिल्लाया, जिससे मैं खुद भी अचंभित हो गया।
वे फिर मुडी, ज़ैसे एक दांत गडाने वाले कुत्ते से अपने आप को बचाने की कोशिश में आदमी।'' जब कह दिया न, नहीं है।'' और कहकर आगे बढ ग़ई। उसके बाद फिर से मेरी ओर देखा, ''मुझे तीन तंदूर भरकर दूध की रोटियां बनानी है।''

मुझे अपनी पीठ के पास किसी के जोर से ठट्ठा लगाने की आवाज सुनाई दी। फैरी पाल मेरे पीछे खडा था और मुझे अब ऐस्तैर चाची पर इतना क्रोध नहीं आ रहा था जितना उस जानवर पर। मैं उबलता हुआ घर लौटा। दरवाजे पर देर तक खडा रहा, जब तक दरवाजा खोलने की हिम्मत मुझमें नहीं आ गई। मां ने तेल की लालटेन जला ली थी। इस गांव में शीशे की लालटेन इस्तेमाल करते थे घरों में भी, जैसी अस्तबलों में की जाती है। मै अच्छी तरह जानता था कि लालटेन में तेल नहीं है और न अब शीशी में बचा है। मैने पैसे मेज पर रख दिए और बडबडाया,'' वे नहीं दे सकती, उनके पास है नहीं।''

मां सीधी खडी हो गई, सख्त बन गई। मैं प्रतीक्षा में था कि अब चिल्लायेगी, फटकारेंगी, पर कुछ न बोली, कुछ भी न बोली। माथे पर पसीना अच्छे से पोछा और बस कहा,'' ठीक है।''

उदास बोझिल शाम थी। हम दोनो में से कोई कुछ नहीं बोला। मैं एकटक लालटेन की बत्ती को ताकता जा रहा था, लंबे धुएं की लकीर को,बुझती हुए लौ को और सोच रहा था कितना तेल खाती है यह लालटेन, कि फिर से एक बूंद भी तेल नहीं बचा है बोतल में। यह भी सोच रहा था कि क्रिसमस पर तो कम-से-कम पिताजी घर आ जाते, त्योहार के लिए। पर उनके लिए अच्छा ही है कि न आयें, क्योंकि उनको हमारी यह भारी गरीबी देखनी अच्छी नहीं लगेगी। वे तो जब जाते है तो बडे आदमियों के साथ ही बैठते है, क्योंकि व्यापार का जुगाड ऐसे ही लोगो के साथ बन सकता है, पर ऐसा दिखता है कि उनके साथ भी अब नहीं होगे। बिना पैसे खर्च किये पैदल घर के लिए चल दिए होंगे।

जल्दी ही मैं लेट गया। उस वक्त भी कुछ दिमाग में नहीं आया, सिवाय इस तरह के गंभीर बडे लोगो वाले विचारों के। रात गहरी हो चुकी थी,जब किसी ने खिडक़ी जोर से खटखटायी।

'' यूडित, यूडित!'' हमें सुनाई दिया।
'' ऐस्तैर!'' मां चिल्लाई,'' तुम हो क्या?''
'' मै हूं। भगवान के लिए अंदर आने दो।''

मां ने उसको अंदर आने दिया। मैं पलंग पर सहमा सा लेटा रहा। ठंड खाता रहा। एक माचिस के जलने की आवाज सी आई पर वो जली नहीं। चाची डरी हुई आवाज में फुसफुसाने लगी,'' अरे मत जलाओ, अगर मेरी मौत नहीं चाहती। मेरे लिए पलंग ले आओ। मेरा वक्त आ गया है।''

मां ने पिताजी का पलंग बिछा दिया, चाची उसपर लेट गई। उन्ही कपडों में। केवल एक दफा अचानक चिल्ला पडी, ''हाय मुझे छुओ मत, दर्द होता है। मैं बुरी तरह से घायल हूं।'' रोते-रोते उछलकर बैठ गई,'' मुझे पीटा, बुरी तरह से पीटा। तुम्हारे अलावा और किसी के पास जाती तो इस बात का पूरे गांव में ढिंढ़ोरा पिट जाता।''

मैने आंख फाडक़र देखना चाहा, पर कुछ भी नहीं दिखा। लगा मां वहां है ही नहीं। कोई आवाज नहीं हो रही रही थी।
धीमे-धीमे सिसकती रही चाची,'' मैं, मैं पगली बेवकूफ! रंगे हाथों पकडी ग़ई।'' दांत पीसकर बोली,'' ऐसा मारा मुझे कि बाहर आंगन में गिरी।एक घंटे तक वहीं ठंड में पडी रही। जाती भी कहां। दरवाजा तो उसने बंद कर लिया था। केवल तुम्हारे पास आ सकती थी। अगर कहीं और जाती तो मेरा अंत हो जाता। तुम्हारे अलावा कोई भी मेरा हाल सब जगह सुना देता।'' कराहती रही, सिसकती रही, और रोती रही,'' मैं जानती थी तुम्हारे पति घर पर नहीं है और इसके अलावा तुम तो वैसे भी जानती ही हो।''
'' मैं?'' मां बोली।
'' बताया नहीं बच्चे ने?''

मै शायद चक्कर खाकर पलंग से गिर ही जाता।

मां बोली, उस रौबीली शांत आवाज में, जिससे मैं भी कांपता था और पिताजी भी घबरा जाते थे, '' मेरा बच्चा ऐसी बातें नहीं करता।''

ऐस्तैर चाची एकदम शांत हो गई। उसके आगे एक शब्द नहीं बोली, न रोयी न सिसकी। मां लेट गई और मैं जो उसके पैरों पर लेटा था ऐसा महसूस कर रहा था, मानो वह बर्फ सी ठंडी थी।

सुबह जब मैं सोकर उठा सब कुछ तरतीब से लगा था। तंदूर गर्म हो चुका था। मां काम में लगी थी। मैने कपडे पहने और नाश्ते का इंतजार करने लगा। इसी समय ऐस्तैर चाची की नौकरानी अंदर आई। बडी चहक रही थी। वैसी गुस्सैल और खूंखार नहीं थी जैसे पिछली शाम को।मुस्कराते हुए बोली,'' मेरी मालकिन ने एक मटका दूध भेजा है। शाम को जितना दूध दुआ गया सब यही है। केवल ऊपर की क्रीम निकाली है जो पेस्ट्री बनाने में इस्तेमाल करनी है हमें।''
'' ठीक है सूजन, अपनी मालकिन से मेरा धन्यवाद कहना....और रुको, उनके लिए यह कान के बुंदे लेती जाओ, यादगार के लिए पहन ले।''

मां ने मखमली बक्सा खोला और उसमें से सबसे खूबसूरत बुंदे निकालकर दे दिये। मैं दूध को शायद सबसे कीमती समझता था। क्योंकि जिस प्रकार सूजन बुंदो को देखकर विभोर हो रही थी, उसी दिलीखुशी के साथ मैं उस शक्तिशाली मटके को देख रहा था। इंतजार में था कि फिर से एक बार नाश्ते में दूध पीऊंगा। पर मां ने वो मटका उठाया और शांति से, आराम से, उसे बर्तन धोने वाली जगह पर उडेलना शुरू कर दिया।हमारे पास जो इकलौता भालू था शायद उसके लिए। मेरा रंग फीका पड ग़या और भयानक डर से मेरा खून सुखा दिया मानो। मां ने मेरी तरफ देखा। चौंक गई और हाथ एक क्षण को ढीला पड ग़या। दूध को उंडेलने की गति मध्दम पड ग़ई। अंत में लम्बी सी आह भरी। जैसे उनके हृदय को चोट सी लगी। दु:ख भरे खूबसूरत चेहरे पर एक आंसू ढुलक आया।

बोली, ''ला बेटे अपना कप मुझे दे दे।''

गँजहों के गाँव का लोकतंत्र


श्रीलाल शुक्ल

तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गाँव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गाँव-सभा थी और गाँववाले उसे गाँव-सभा ही बनाए रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन एरियावाली दर से ज्यादा टैक्स न देना पड़े। इस गाँव-सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुंदरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलखाने गए थे, न जेलखाने। गँजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण, प्रधान बनने के पहले तक, वे सर्वप्रिय थे। बाहर से अफसरों के आने पर गाँववाले उनको एक प्रकार से तश्तरी रख कर उनके सामने पेश करते थे। और कभी-कभी कह भी देते थे कि साहेब, शहर में जो लोग चुन कर जाते हैं उन्हें तो तुमने हजार बार देखा होगा, अब एक बार यहाँ का भी माल देखते जाओ।

गाँव-सभा के चुनाव जनवरी के महीने में होने थे और नवंबर लग चुका था। सवाल यह था कि इस बार किस को प्रधान बनाया जाए? पिछले चुनावों में वैद्य जी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि गाँव-सभा के काम को वे निहायत जलील काम मानते थे। और वह एक तरह से जलील था भी, क्योंकि गाँव-सभाओं के अफसर बड़े टुटपुँजिया क़िस्म के अफसर थे। न उनके पास पुलिस का डंडा था, न तहसीलदार का रुतबा, और उनसे रोज-रोज अपने काम का मुआयना करने में आदमी की इज्जत गिर जाती थी। प्रधान को गाँव-सभा की जमीन-जायदाद के लिए मुकदमे करने पड़ते थे और शहर के इजलास में वकीलों और हाकिमों का उनके साथ वैसा भी सलूक न था जो एक चोर का दूसरे चोर के साथ होता है। मुकदमेबाजी में दुनिया-भर की दुश्मनी लेनी पड़ती थी और मुसीबत के वक़्त पुलिसवाले सिर्फ मुस्करा देते थे उन्हें मोटे अक्षरों में 'परधान जी' कह कर थाने के बाहर का भूगोल समझाने लगते थे।

पर इधर कुछ दिनों से वैद्य जी की रुचि गाँव-सभा में भी दिखने लगी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का एक भाषण किसी अखबार में पढ़ लिया था। उस भाषण में बताया गया था कि गाँवों का उद्धार स्कूल, सहकारी समिति और गाँव-पंचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वैद्य जी को लगा कि वे अभी तक गाँव का उद्धार सिर्फ कोऑपरेटिव यूनियन और कॉलिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ में गाँव-पंचायत तो है ही नहीं। 'आह!' उन्होंने सोचा होगा, 'तभी शिवपालगंज का ठीक से उद्धार नहीं हो रहा है। यही तो मैं कहूँ कि क्या बात है?'

रुचि लेते ही कई बातें सामने आईं। यह कि रामाधीन के भाई ने गाँव-सभा को चौपट कर दिया है। गाँव की बंजर जमीन पर लोगों ने मनमाने कब्जे कर लिए हैं और निश्चय ही प्रधान ने रिश्वत ली है। गाँव-पंचायत के पास रुपया नहीं है और निश्चय ही प्रधान ने गबन किया है। गाँव के भीतर बहुत गंदगी जमा हो गई है और प्रधान निश्चय ही सुअर का बच्चा है। थानेवालों ने प्रधान की शिकायत पर कई लोगों का चालान किया है जिससे सिर्फ यही नतीजा निकलता है कि वह अब पुलिस का दलाल हो गया है। प्रधान को बंदूक का लाइसेंस मिल गया है जो निश्चय ही डकैतियों के लिए उधार जाती है और पिछले साल गाँव में बजरंगी का कत्ल हुआ था, तो बूझो कि क्यों हुआ था?

भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबा कर ऊपर से पानी पी लिया जाए तो अच्छा-खासा नशा आ जाएगा, पर यहाँ नशेबाजी सस्ती है। आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकंद दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाए। भंग को इतना पीसा जाए कि लोढ़ा और सिल चिपक कर एक हो जाएँ, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ में छंद सुनाए जाएँ और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बना कर उसे सामूहिक रूप दिया जाए।

सनीचर का काम वैद्य जी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, 'सनीचर!' सनीचर ने फुँफकार कर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्य जी ने कहा, 'भंग का काम किसी और को दे दो और यहाँ अंदर आ जाओ।'

जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, 'किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौंडे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च-जैसा पीस कर रख देंगे।' पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धो कर अपने अंडरवियर के पीछे पोंछ लिए और वैद्य जी के पास आ कर खड़ा हो गया।

तख्त पर वैद्य जी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसक कर बोले, 'बैठ जाइए सनीचरजी!'

इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यहाँ हुआ कि उसने टूटे हुए दाँत बाहर निकाल कर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिए। वह बेवकूफ-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, 'अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठाल कर मुझे नरक में न डालिए।'

बद्री पहलवान हँसे। बोले, 'स्साले! गँजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे?' फिर आवाज बदल कर बोले, 'बैठ जाओ उधर।'

वैद्य जी ने शाश्वत सत्य कहनेवाली शैली में कहा, 'इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदास जी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?'

सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया और बड़प्पन के साथ बोला, 'अब पहलवान को ज्यादा जलील न करो महाराज। अभी इनकी उमर ही क्या है? वक़्त पर सब समझ जाएँगे।'

वैद्य जी ने कहा, 'तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो जो कहना है।'

उन्होंने अवधी में कहना शुरू किया, 'कहै का कौनि बात है? आप लोग सब जनतै ही।' फिर अपने को खड़ीबोली की सूली पर चढ़ा कर बोले, 'गाँव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहाँ का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेंबर भी होता है - एक तरह से मेरा भी अफ़सर।'

वैद्य जी ने अकस्मात कहा, 'सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गाँव-सभा का प्रधान तुम्हें बनाएँगे।'

सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिए - पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित, उपेक्षित कार्यकर्ता के पास किसी मेडिकल असोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाए तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को क़बू में करके उसने कहा, 'अरे नहीं महाराज, मुझ-जैसे नालायक को आपने इस लायक समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज्जत के काबिल नहीं हूँ।'

सनीचर को अचंभा हुआ कि अचानक वह कितनी बढ़िया उर्दू छाँट गया है। पर बद्री पहलवान ने कहा, 'अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बाँधे रख।'

इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कंधा थपथपा कर उसने कहा, 'लायक-नालायक की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक हो पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हें जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलनेवाले?'

पहलवान ने कहा, 'लौंडे तुम्हें दिन-रात बेवकूफ बनाते रहते हैं। तब तुम क्या करते हो? यही न कि चुपचाप बेवकूफ बन जाते हो?'

प्रिंसिपल साहब ने पढ़े-लिखे आदमी की तरह समझाते हुए कहा, 'हाँ भाई, प्रजातंत्र है। इसमें तो सब जगह इसी तरह होता है।' सनीचर को जोश दिलाते हुए वे बोले, 'शाबाश, सनीचर, हो जाओ तैयार!' यह कह कर उन्होंने 'चढ़ जा बेटा सूली पर' वाले अंदाज से सनीचर की ओर देखा। उसका सिर हिलना बंद हो गया था।

प्रिंसिपल ने आखिरी धक्का दिया, 'प्रधान कोई गबड़ू-घुसड़ू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बंद कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आ कर उसके दरवाजे बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। कागज पर जरा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह ले कर चलते हैं। सब की कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?'

रंगनाथ को ये बातें आदर्शवाद से कुछ गिरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने कहा, 'तुम तो मास्टर साहब, प्रधान को पूरा डाकू बनाए दे रहे हो।'

'हें-हें-हें' कह कर प्रिंसिपल ने ऐसा प्रकट किया जैसे वे जान-बूझ कर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हों। यह उनका ढंग था, जिसके द्वारा बेवकूफी करते-करते वे अपने श्रोताओं को यह भी जता देते थे कि मैं अपनी बेवकूफी से परिचित हूँ और इसलिए बेवकूफ नहीं हूँ।

'हें-हें-हें, रंगनाथ बाबू! आपने भी क्या सोच लिया? मैं तो मौजूदा प्रधान की बातें बता रहा था।'

रंगनाथ ने प्रिंसिपल को गौर से देखा। यह आदमी अपनी बेवकूफी को भी अपने दुश्मन के ऊपर ठोंक कर उसे बदनाम कर रहा है। समझदारी के हथियार से तो अपने विरोधियों को सभी मारते हैं, पर यहाँ बेवकूफी के हथियार से विरोधी को उखाड़ा जा रहा है। थोड़ी देर के लिए खन्ना मास्टर और उनके साथियों के बारे में वह निराश हो गया। उसने समझ लिया कि प्रिंसिपल का मुक़ाबला करने के लिए कुछ और मँजे हुए खिलाड़ी की जरूरत है। सनिचर कह रहा था, 'पर बद्री भैया, इतने बड़े-बड़े हाकिम प्रधान के दरवाज़े पर आते हैं ... अपना तो कोई दरवाजा ही नहीं है; देख तो रहे हो वह टुटहा छप्पर!'

बद्री पहलवान हमेशा से सनीचर से अधिक बातें करने में अपनी तौहीन समझते थे। उन्हें संदेह हुआ कि आज मौका पा कर यहाँ मुँह लगा जा रहा है। इसलिए वे उठ कर खड़े हो गए। कमर से गिरती हुई लुंगी को चारों ओर से लपेटते हुए बोले, 'घबराओ नहीं। एक दियासलाई तुम्हारे टुटहे छप्पर में भी लगाए देता हूँ। यह चिंता अभी दूर हुई जाती है।'

कह कर वे घर के अंदर चले गए। यह मजाक था, ऐसा समझ कर पहले प्रिंसिपल साहब हँसे, फिर सनीचर भी हँसा। रंगनाथ की समझ में आते-आते बात दूसरी ओर चली गई थी। वैद्य जी ने कहा, 'क्यों? मेरा स्थान तो है ही। आनंद से यहाँ बैठे रहना। सभी अधिकारियों का यहीं से स्वागत करना। कुछ दिन बाद पक्का पंचायतघर बन जायेगा तो उसी में जा कर रहना। वहीं से गाँव-सभा की सेवा करना।'

सनीचर ने फिर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े। सिर्फ़ यही कहा, 'मुझे क्या करना है? सारी दुनिया यही कहेगी कि आप लोगों के होते हुए शिवपालगंज में एक निठल्ले को ...'

प्रिंसिपल ने अपनी चिर-परिचित 'हें-हें-हें' और अवधी का प्रयोग करते हुए कहा, 'फिर बहकने लगे आप सनीचर जी! हमारे इधर राजापर की गाँव-सभा में वहाँ के बाबू साहब ने अपने हलवाहे को प्रधान बनाया है। कोई बड़ा आदमी इस धकापेल में खुद कहाँ पड़ता है।'

प्रिंसिपल साहब बिना किसी कुंठा के कहते रहे, 'और मैनेजर साहब, उसी हलवाहे ने सभापति बन कर रंग बाँध दिया। किस्सा मशहूर है कि एक बार तहसील में जलसा हुआ। डिप्टी साहब आए थे। सभी प्रधान बैठे थे। उन्हें फर्श पर दरी बिछा कर बैठाया गया था। डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठे थे। तभी हलवाहेराम ने कहा कि यह कहाँ का न्याय है कि हमें बुला कर फर्श पर बैठाया जाए और डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठें। डिप्टी साहब भी नए लौंडे थे। ऐंठ गए। फिर तो दोनों तरफ़ इज्जत का मामला पड़ गया। प्रधान लोग हलवाहेराम के साथ हो ग। 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगने लगे। डिप्टी साहब वहीं कुर्सी दबाए 'शांति-शांति' चिल्लाते रहे। पर कहाँ की शांति और कहाँ की शकुंतला? प्रधानों ने सभा में बैठने से इनकार कर दिया और राजापुर का हलवाहा तहसीली क्षेत्र का नेता बन बैठा। दूसरे ही दिन तीन पार्टियों ने अर्जी भेजी कि हमारे मेंबर बन जाओ पर बाबू साहब ने मना कर दिया कि खबरदार, अभी कुछ नहीं। हम जब जिस पार्टी को बताएँ, उसी के मेंबर बन जाना।'

सनीचर के कानों में 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लग रहे थे। उसकी कल्पना में एक नग-धड़ंग अंडरवियरधारी आदमी के पीछे सौ-दो सौ आदमी बाँह उठा-उठा कर चीख रहे थे। वैद्य जी बोले, 'यह अशिष्टता थी। मैं प्रधान होता तो उठ कर चला आता। फिर दो मास बाद अपनी गाँव-सभा में उत्सव करता। डिप्टी साहब को भी आमंत्रित करता। उन्हें फर्श पर बैठाल देता। उसके बाद स्वयं कुर्सी पर बैठ कर व्याख्य़ान देते हुए कहता कि 'बंधुओ! मुझे कुर्सी पर बैठने में स्वाभाविक कष्ट है, पर अतिथि-सत्कार का यह नियम डिप्टी साहब ने अमुक तिथि को हमें तहसील में बुला कर सिखाया था। अत: उनकी शिक्षा के आधार पर मुझे इस असुविधा को स्वीकार करना पड़ा है।' कह कर वैद्य जी आत्मतोष के साथ ठठा कर हँसे। रंगनाथ का समर्थन पाने के लिए बोले, 'क्यों बेटा, यही उचित होता न?'

रंगनाथ ने कहा, 'ठीक है। मुझे भी यह तरकीब लोमड़ी और सारस की कथा में समझाई गई थी।'

वैद्य जी ने सनीचर से कहा, 'तो ठीक है। जाओ देखो, कहीं सचमुच ही तो उस मूर्ख ने भंग को हल्दी-जैसा नहीं पीस दिया है। जाओ, तुम्हारा हाथ लगे बिना रंग नहीं आता।'

बद्री पहलवान मुस्करा कर दरवाजे पर से बोला, 'जाओ साले, फिर वही भंग घोंटो!'

अर्द्धांगिनी एक महात्मा की




वह थी 18 वर्ष की मासूम युवती और वह था 34 वर्ष का जवान मर्द, न जाने कितने नारी ह्रदयों को अब तक वशीभूत कर चुका था| युवती थी सोफिया बेर्स और पुरुष लेव तोल्स्तोय| इस दंपति के निजी जीवन की समाज में जितनी चर्चा रही उतनी रूस के सारे इतिहास में शायद और किसी दंपति की नहीं रही| इतनी अटकलें लगाई गईं, इतनी अफवाहें उड़ाई गईं उनके बारे में| उनके संबंधों के हर पहलू को, हर छोटी से छोटी बात को पूरी बारीकी से देखा, कुरेदा और उघाडा गया|

काउंट लेव तोल्स्तोय का जन्म उनकी पुश्तैनी जागीर ‘यास्नया पोल्याना’ {धौला मैदान} में 28 अगस्त 1828 को हुआ| उनके पूर्वज रूस के कई उच्च संभ्रांत वंशों के थे| उनके माता-पिता का विवाह प्रेम-विवाह नहीं था, लेकिन उनके दाम्पत्य संबंध बड़े सौहार्दपूर्ण और सुकोमल थे| इस पारिवारिक सुख की छाया में ही शिशु लेव का बचपन बीता, हालांकि मातृ-सुख से वह अल्पायु में ही वंचित हो गए थे| डेढ़ वर्ष के ही थे जब माता का देहांत हो गया| बुआओं ने उन्हें पाला-पोसा, उन्हींने बालक को पारिवारिक सुख की बातें सुनाईं| तभी लेव के मन में एक आदर्श अर्द्धांगिनी का बिम्ब बन गया था| वह अगर किसी से प्रेम करेंगे तो केवल ऐसी आदर्श नारी से, विवाह करेंगे तो ऐसी आदर्श नारी से| लेकिन जीवन में आदर्श खोज पाना कोई आसान काम नहीं, इसीलिए जवानी में कितने ही प्रेम के रिश्ते बने-टूटे|

सोफिया बेर्स का जन्म एक कुलीन परिवार में हुआ, जहां आठ संतानें थीं| बेर्स परिवार सादगी की, बल्कि यह कहना चाहिए कि गरीबी की ज़िंदगी जी रहा था| तोल्स्तोय उनके कुलपिता को जानते थे| एक बार मास्को जाने का अवसर बना तो बेर्स परिवार से भी मिलने गए| अपनी डायरी में उन्होंने इस परिवार के सादे रहन-सहन के अलावा इस बात का भी ज़िक्र किया कि उनकी बच्ची “बड़ी प्यारी है”| साल भर बाद बेर्स परिवार ‘यास्नया पोल्याना’ में ठहरा| अब चौंतीस वर्षीय लेव तोलस्तोय ने देखा कि सोफिया “प्यारी बच्ची” नहीं, अनुपम युवती है, जिसे देखकर दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है|.. दिन ढले दोनों छज्जे पर खड़े बातें करते रहे| सोफिया तो संकोच के मारे कुछ बोल ही नहीं पा रही थी, पर लेव ने धीरे-धीरे उसका यह संकोच दूर कर दिया और फिर देर तक उसकी बातें सुनते रहे| विदा होते समय कहा: “कितनी सरल हैं आप, कितना उजला मन है आपका!”

बेर्स परिवार मास्को के पास अपनी कोठी में लौट गया| तोल्स्तोय सोफिया से विछोह अधिक दिन नहीं सह पाए| वह उनके घर चले गए| यहां संध्या समय बाल-नृत्य का आयोजन हुआ| कितनी गरिमा थी सोफिया के नृत्य में, कितनी कमनीय लग रही थी वह! तोल्स्तोय बार-बार अपने से कह रहे थे, “नहीं, यह तो अभी बच्ची ही है!” लेकिन उसकी कमनीयता मन को हरती जा रही थी, उसका नशा प्रतिपल सिर को चढता जा रहा था| कालांतर में उन्होंने ‘युद्ध और शांति’ उपन्यास में अपनी इन भावनाओं का वर्णन किया –

उस प्रसंग में, जब प्रिंस आंद्रेई बोल्कोंसकी नताशा रोस्तोवा के साथ बाल-नृत्य करता है और उस पर मोहित हो जाता है|

शीघ्र ही वह दिन भी आ गया जब तोल्स्तोय ने निश्चय किया कि जिसने उनका मन हरा है उसे अपने मन की सारी बात बता देनी चाहिए| सोफिया के नाम एक लंबा पत्र उन्होंने लिखा, जिसमें उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा और साथ ही बारम्बार यह अनुरोध किया कि अगर उनके मन में ज़रा सा भी संदेह है, असमंजस है तो साफ़ इनकार कर दें| सोफिया पत्र लेकर अपने कमरे में चली गईं| भयानक मानसिक तनाव में बीते ये पल – लगता था यह प्रतीक्षा कभी खत्म ही नहीं होगी| आखिर सोफिया नीचे आईं, तोल्स्तोय के पास गईं और मौन हामी भर दी| तोल्स्तोय के जीवन में यह परम सुख का क्षण था| “इससे पहले कभी भी मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था कि मैं पत्नी के साथ अपने भावी जीवन की कल्पना करूं और मन इतना शांत हो, सब कुछ इतना स्पष्ट लगे और इतना सुखद भी,” उन्होंने अपनी डायरी में लिखा| अब बस एक बात और बची थी: तोल्स्तोय का यह मानना था कि विवाह की वेदी पर पाँव धरने से पहले वर-वधू के बीच एक दूसरे से कोई भेद नहीं रहना चाहिए| मासूम सोनिया का मन तो कोरा कागज था, उसका सारा जीवन एक खुली किताब था, किंतु तोल्स्तोय के चौंतीस वर्ष न जाने कितने भेद समेटे हुए थे|

तोल्स्तोय ने अपनी सारी डायरियां, जिनमें वह सदा अपने सारे भावावेग उतारते आए थे, अपनी मंगेतर को पढ़ने को दे दीं| सोनिया (सोफिया को ही रूस में घर पर सोनिया कहते हैं) इन्हें पढकर सकते में आ गईं| मां से लंबी बातचीत के बाद वह इस सदमे से उबर पाईं| भावी दामाद की इस कारस्तानी से उन्हें भी ठेस पहुंची थी, परंतु बेटी को उन्होंने समझाया कि इस उम्र का जो भी पुरुष होगा उसका अपना अतीत तो रहा ही होगा| फर्क बस इतना है कि ज़्यादातर पुरुष अपनी भावी पत्नियों को ये सारी बातें नहीं बताते| सोनिया को अपने पर, अपने प्रेम पर पूरा विश्वास था, सो उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने भावी पति को क्षमा कर सकती हैं| अब उधर तोल्स्तोय के मन में फिर से यह सवाल उठने लगा कि क्या उन दोनों का निर्णय सही है| ऐन विवाह वाले दिन सुबह-सुबह सोनिया से बोले: “सोच लीजिए, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका मन इस विवाह को न मानता हो?” बेचारी सोनिया फूट-फूटकर रो पड़ी| आंसू भरी आँखे लिए ही वह विवाह की वेदी पर पहुंची| उसी दिन शाम को नव-दम्पति ‘यास्नया पोल्याना’ चले गए| इस प्रकार उनका विवाहित जीवन आरंभ हुआ|

उन दिनों तोल्स्तोय ने अपनी डायरी में लिखा: “पारिवारिक जीवन के इस नए सुखद वातावरण में ऐसा डूबा हूं कि जीवन का अर्थ क्या है इस शाश्वत प्रश्न की ओर अब ध्यान ही नहीं जाता”| अंततः, नव-दम्पति की पहली संतान हुई – बेटा सेर्गेई| इसके साल भर बाद युवा काउंटेस ने बेटी तत्याना को जन्म दिया और उसके डेढ़ साल बाद बेटे इल्या को| फिर तो उनके दस और संतानें हुईं| तेरह बच्चों में से पांच छोटी उम्र में ही गुज़र गए| इनमें से तीन तो एक के बाद एक गुज़रे| उनके इस दुख में पति ने उनका पूरा साथ दिया, इसी की बदौलत इतना भारी सदमा भी सोनिया ने सह लिया| दाम्पत्य जीवन के पहले बीस वर्षों में लेव और सोनिया का एक दूसरे से प्रेम इतना गहरा था कि “दो जिस्म एक जान” की बात उन पर पूरी तरह लागू होती थी| वे मानो एक-दूसरे में खो गए थे| सोनिया के लिए पति का साथ क्या मायने रखता था, इसका अनुमान हम उनके पत्र की इन पंक्तियों से लगा सकते हैं: “तुम्हारे बिना मुझे बस वही अच्छा लगता है जो तुम्हें अच्छा लगता है| अक्सर मैं भ्रम में पड़ जाती हूं कि यह मुझे खुद को अच्छा लगता है या सिर्फ इसलिए पसंद है कि तुम्हें अच्छा लगता है”|

अपने बच्चों के लालन-पालन का सारा काम सोफिया खुद ही करती थीं – कोई आया कभी उनके घर में नहीं थी| खुद ही वह बच्चों के लिए कपडे सीती थीं, खुद ही उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाती थीं, संगीत की शिक्षा देती थीं| यही नहीं, पति के लेखन-कार्य में भी पूरी मदद करती थीं| तोल्स्तोय की लिखावट को अकेली वही समझ पाती थीं – सारी पांडुलिपियों की साफ नक़ल तैयार करती थीं|

दाम्पत्य जीवन के अठारह वर्ष पूरे हो चके थे; तोल्स्तोय ने ‘आन्ना करेनिना’ उपन्यास पूरा कर लिया था – इन्हीं दिनों उनके मन पर एक आध्यात्मिक संकट घिर आया| उनका जीवन भरा-पूरा था, लेकिन मन में संतोष नहीं था; एक लेखक के नाते उनके नाम की तूती बज रही थी पर मन में इससे कहीं कोई खुशी नहीं थी| उधर सोफिया ने दाम्पत्य जीवन के ये सारे वर्ष ‘यास्नया पोल्याना’ में ही बिता दिए थे – घर-गृहस्थी और बाल-बच्चों को समेटते हुए| एक बार भी विदेश नहीं गईं, भद्र-समाज के मनोरंजन, बाल-नृत्य संध्याओं में जाना और थियेटर देखना क्या होता है – यह सब वह भूल ही गई थीं; सुंदर-सजीले परिधान, नए-नए वस्त्र और पोशाकें – इन सब का तो उन्हें कभी ख्याल तक नहीं आया| देहाती जीवन के लिए जो सुविधाजनक और आरामदेह हों – वही सीधे-सादे वस्त्र वह पहनती आई थीं| तोल्स्तोय का यह मानना था कि एक अच्छी पत्नी को “भद्र-समाज” की इस तड़क-भड़क की कतई कोई आवश्यकता नहीं है|

सोफिया ने कभी पति को निराश नहीं होने दिया, हालांकि शहर में जन्मी और पली स्त्री के लिए गांव का जीवन बेगाना और नीरस था| इस पर जब तोल्स्तोय जीवन में कोई दूसरे मूल्य ढूँढने लगे, यह खोजने लगे कि जीवन की सार्थकता किस बात में है, तो उनकी पत्नी के लिए इससे बड़ी ठेस की बात कोई नहीं हो सकती थी, क्योंकि इसका अर्थ यह था कि उन्होंने जो कुर्बानियां कीं उन सब की कद्र करना तो दूर, उन्हें अब निरर्थक और अनावश्यक मानकर त्यागा जा रहा था, मानो वह सब कोई भूल थी, भ्रम था|..

उधर तोल्स्तोय के मन को चैन नहीं था| उन्हें यही लगता था कि उनका जीवन एकदम निरर्थक है| इस अहसास से प्रायः मन की व्यथा असहनीय हो उठती थी, यहाँ तक कि लगता बस यह जीवन त्यागकर ही सदा-सदा के लिए इस व्यथा से छुटकारा मिलेगा| बड़ी मुश्किल से वह ऐसे क्षणों में अपने को संभालते| जीवन के अर्थ की खोज में वह धर्म की शरण में भी गए परंतु वहाँ भी उत्तर नहीं पा सके| तब वह स्वयं अपने दार्शनिक विचारों की रूप-रेखा बनाने लगे : “इस संसार में हर मनुष्य ईश्वर की इच्छा से जन्म लेता है| ईश्वर ने मनुष्य को ऐसे रचा है कि वह चाहे तो अपनी आत्मा को अधोगर्त में पहुंचा सकता है और चाहे तो उसे उबार सकता है| इस जीवन में मनुष्य का कर्तव्य यही है कि वह अपनी आत्मा को उबारे: आत्मा को उबारने के लिए यह ज़रूरी है कि मनुष्य ईश्वर की इच्छा के अनुसार जिए और ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीने का अर्थ है यह है कि मनुष्य लौकिक सुखों का त्याग करे. परिश्रमी, विनम्र, सहनशील, और दयालु बने”|

घर-गृहस्थी के बोझ ने अर्द्धांगिनी के लिए एक पल ऐसा नहीं छोड़ा था जिसमें वह पति के मन में हो रहे मंथन को अनुभव कर पाती, उनके इन नए विचारों को सुन और समझ पाती| बच्चों की बात अलग थी| उनके लिए तो पिता देव-तुल्य थे| वही उनकी नई शिक्षा के पहले अनुयायी बने|

अपनी रौ में बहना तोल्स्तोय का स्वभाव ही था| बस इसी रौ में कई बार वह सहज बुद्धि की हद पार कर जाते थे| कभी कहते कि सादे जन-जीवन के लिए जिन बातों की कोई ज़रूरत नहीं है, जैसे कि संगीत और विदेशी भाषाएं, वे सब बच्चों को सिखाने की कोई ज़रूरत नहीं| कभी यह ठान लेते कि वह अपनी सारी जायदाद से इनकार कर देंगे, या फिर अपनी रचनाओं की रायल्टी पाने से इनकार की बातें करने लगते| इस पर उनकी अर्द्धांगिनी को, एक गृहिणी को ही अपनी गृहस्थी की, अपनी संतानों के रहन-सहन की रक्षा के लिए आगे आना पड़ता| पहले तो इन सवालों पर बहसें होती रहीं, फिर नौबत झगड़ों की आने लगी| पति-पत्नी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे थे, इस बात से बेखबर कि यह दूरी उन्हें कितना कष्ट देगी|

सोफिया के अगली संतान होने ही वाली थी, जब पति-पत्नी में फिर से झगडा हो गया| तोल्स्तोय पत्नी को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वह क्यों अपने को मानवजाति के प्रति दोषी मानते हैं| पत्नी के लिए इससे बड़ी चोट और क्या हो सकती थी – मानवजाति के सामने तो अपने दोष को महसूस करते हैं, लेकिन पत्नी के प्रति दोष को कभी भी नहीं| लगता था, तोल्स्तोय परिवार में पहले जैसा अमन-चैन कभी नहीं लौटेगा| तभी उनके चार साल के बेटे अलेक्सेई की मृत्यु हो गई| पति-पत्नी पूरी तरह एक दूसरे का सहारा बने, इतने समीप आ गए कि तोल्स्तोय ने इस मृत्यु को ईश्वर का “वरदान” ही माना| “इस मृत्यु ने हम सब को प्रेम के बंधन में पहले से भी अधिक कसकर बाँध दिया है,” उन्होंने अपनी डायरी में लिखा|

सोफिया 44 वर्ष की थीं जब उन्होंने अपनी आखिरी संतान को जन्म दिया| सभी घर-परिवार वालों ने अपने संस्मरणों में लिखा कि बालक इवान बहुत ही प्यारा था, सब का मन मोह लेता था, नन्ही उम्र में ही दूसरों के मनोभावों को अच्छी तरह समझता था, बड़ा ही कोमलहृदय था| सात साल का भी नहीं हुआ था कि स्कारलेट ज्वर ने उसकी जान ले ली| मां पर तो दुख का पहाड़ टूट पड़ा| घरवालों को डर लगने लगा कि वह पागल हो जाएंगी| इस दुख से पति-पत्नी उबर नहीं पाए| ऊपर से सोफिया के मन में यह वहम बैठ गया कि उनके पति अब उन्हें नहीं चाहते| बेटे इवान की मृत्यु के बाद सोफिया ने बगावत कर दी|

उन्होंने अपने लिए नए-नए फैशन के वस्त्र खरीद लिए| अक्सर मास्को जाने लगीं – कभी कोई कंसर्ट सुनने, तो कभी थियेटर में नाटक देखने| तोल्स्तोय परिवार के मित्र, संगीतकार और पियानोवादक अलेक्सांद्र तनेयेव से संगीत के पाठ लेने लगीं| तनेयेव की संगत और उनके संगीत से उन्हें सांत्वना मिलती थी| परंतु फिर धीरे-धीरे सबको यह दिखने लगा कि वह तनेयेव पर फ़िदा हो गई हैं| वह बावन वर्ष की थीं, उनके बच्चों को यह देखकर शर्म आती थी कि मां इस तरह नौजवान औरतों के जैसे वस्त्र पहनती है और पराये मर्द की संगत में इतना समय बिताती है| तोल्स्तोय भी ईर्ष्या की आग में तड़प रहे थे, कई बार उनके मन में पत्नी से पूर्ण संबंध-विच्छेद का विचार आया और कभी तो आत्म-हत्या तक का|

एक तनेयेव ही थे, जिन्हें इस बात का कोई अहसास ही नहीं था कि उनके इर्द-गिर्द क्या हो रहा है, और यही शायद सोफिया के लिए सबसे बड़ी त्रासदी थी| तनेयेव तो यही सोचते थे कि वह दुख की घड़ी में अपनी परिचिता को कुछ आसरा दे रहे हैं|.. बरसों बाद सोफिया जब मृत्यु-शय्या पर थीं तो उन्होंने अपनी बेटी तत्याना से कहा था: “अठारह वर्ष की थी जब मेरा विवाह हुआ, और जीवन भर अकेले अपने पति से ही मैंने प्यार किया”|

परंतुतोल्स्तोय पर क्या गुज़र रही थी? वह सत्य की खोज के रास्ते पर अपने विचारों में, चिंतन-मनन में गहरे ही गहरे उतरते जा रहे थे| इस रास्ते पर वह अकेले ही थे, पत्नी से बातचीत अब बहुत कम ही होती थी| जीवन के बंधे-बंधाए ढर्रे को त्याग कर वह किसी नए रास्ते पर, जीवन के सत्य-पथ पर निकल पड़ना चाहते थे| संन्यासी जीवन उन्हें आकर्षित करने लगा था, उन्हें लगता था कि यही सच्चे आस्थावान का जीवन-पथ है| उम्र अपना असर दिखा रही थी – शरीर दुर्बल हो रहा था, बीमारियां घेरने लगी थीं| पत्नी के मन में एक और भय घर कर गया था – कहीं उन्हें ऐसी नारी के रूप में न याद किया जाए जिसने पति का साथ नहीं निभाया, लोग उनकी तुलना सुकरात की बदमिजाज बीवी से न करने लगें| हर वक्त उन्हें यही भय सताता रहता था, दूसरों से बातचीत में और अपनी डायरी में बार-बार इसी का ज़िक्र करती थीं| साथ ही सिर पर एक और अजीब धुन सवार हो गई – तोल्स्तोय अब अपनी डायरियां उनसे छिपाने लगे थे, सो सोफिया इसी कोशिश में लगी रहती थीं कि किसी तरह पति की डायरी उनके हाथ लग जाए और पति ने उनके बारे में जो कुछ भी “गलत” बातें लिखी हैं उन सब को काट दें|

अगर वह डायरी न ढूँढ पातीं, तोपति के आगे हाथ जोड़तीं, आंसू बहाते हुए अनुरोध करतीं कि उन्होंने गुस्से में आकर जो कुछ उल्टा-सीधा लिखा है वह सब काट दें|

तोल्स्तोय भली-भांति समझते थे कि भले ही अब वे दोनों एक दूसरे को बिलकुल नहीं समझ पाते तो भी उनकी पत्नी सोफिया ने उनके लिए बहुत कुछ किया है और अब भी कर रही हैं, किंतु उनके लिए यह “बहुत कुछ” अब पर्याप्त नहीं था| आखिर वह घड़ी भी आ गई जब तोल्स्तोय ने फैसला किया कि वह अब यास्नया पोल्याना में एक दिन भी और नहीं रह सकते| 27-28 अक्टूबर 1910 की रात को पति-पत्नी में आखिरी बार झगड़ा हुआ| आधी रात को सोफिया उठकर पति के कमरे में गईं – उनकी नब्ज़ देखने| पत्नी की इस “चौकीदारी” पर तोल्स्तोय गुस्से से आग बबूला हो उठे: “न दिन को, न रात को चैन है – मैं ज़रा सा हिलूं-डुलूं तो, मेरे मुंह से कोई आवाज़ निकले तो - हर गति की, हर शब्द की इसे खबर चाहिए, उस पर नियंत्रण चाहिए| फिर से कदमों की आहट आई...हौले से दरवाज़ा खुला... नहीं, मुझसे और नहीं लेटा जाता, बस आखिरी फैसला कर लिया मैंने|”

यास्नया पोल्याना छोड़कर जाते समय 82-वर्षीय तोल्स्तोय ने अपनी पत्नी के नाम पत्र छोड़ा: “यह मत सोचना कि मैं इसलिए जा रहा हूं कि तुमसे प्यार नहीं करता| मैं तुमसे प्रेम करता हूं और रोम-रोम से तुमसे सहानुभूति रखता हूं, किंतु जो मैं कर रहा हूं उसके अलावा और कुछ नहीं कर सकता|” निकटतम स्टेशन तक पहुंचकर तोल्स्तोय वहाँ से गुज़र रही पहली पैसंजर ट्रेन में बैठ गए| रास्ते में ठंड लग गई जो निमोनिये में बदल गई| अस्तापोवो नाम के एक छोटे से स्टेशन पर वह ट्रेन से उतरे| बस इसी के प्रतीक्षा कक्ष में महान लेखक ने अपने आखिरी दिन काटे| बच्चों से वह मिलना नहीं चाहते थे, पत्नी की तो बात ही दूर रही| अस्तापोवो स्टेशन से महान तोल्स्तोय के स्वास्थ्य के बारे में बुलेटिन के तार सारे रूस को जाने लगे| यास्नया पोल्याना में पत्नी सोफिया दुख के मारे बुत बनकर रह गईं – उनके पति उन्हें त्याग कर चले गए, उनका प्रेम, उनकी देख-रेख ठुकरा डाली, उनके सारे जीवन को रौंद डाला...

7 नवंबर 1910 को तोल्स्तोय इस संसार में नहीं रहे| सारा रूस उन्हें दफनाने उमड़ पड़ा था| उनकी मृत्यु के बाद सोफिया को जगत-भर्त्सना का शिकार होना पड़ा| तोल्स्तोय घर छोड़कर चले गए, ऐसे बुरे हालात में उन्होंने अंतिम दिन बिताए – इस सब के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाने लगा| आज भी ऐसा करने वाले कम नहीं हैं| किंतु वे यह नहीं समझते कि कितना भारी बोझ था उनके कंधों पर – एक महात्मा की अर्द्धांगिनी होने का बोझ, तेरह बच्चों की मां का बोझ, जागीर की मालकिन का बोझ| और इस नारी ने कभी स्वयं अपनी सफाई में एक शब्द नहीं कहा|

अपने दिवंगत पति के कागज़ात समेटते हुए उन्हें एक बंद लिफाफा मिला| यह उन्हीं के नाम पति का पत्र था जो उन्होंने 1897 की गर्मियों में लिखा था| तब तोल्स्तोय ने पहली बार घर छोड़ने की बात सोची थी| उस समय उन्होंने अपना यह इरादा पूरा नहीं किया, किंतु पत्र भी नहीं फाड़ा| अब मानो परलोक से उनकी आवाज़ आ रही थी: “...हमारे जीवन के इन लंबे 35 वर्षों को मैं बड़े प्रेम से और साभार याद करता हूं, खास तौर पर पहले के दस-बीस वर्षों को, जब तुमने इतने उत्साह से और इतनी दृढता से वह सब किया जिसे तुम अपना कर्तव्य मानती थीं और वह सब करते हुए मां का परम-त्यागी स्वभाव दर्शाया| तुमने मुझे और संसार को वह सब दिया है जो तुम दे सकती थीं – अपार ममता दी है और परम आत्मत्याग किया है| इसके लिए तुम्हारी कद्र किए बिना नहीं रहा जा सकता| जो कुछ तुमने मुझे दिया है – उस सब के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं, सदा गदगद होकर वह सब याद करता हूं और करता रहूँगा”|

तोल्स्तोय के प्रस्थान के नौ वर्ष बाद उनकी पत्नी सोफिया भी चली गईं| उनकी बेटी तात्याना ने अपने संस्मरणों में लिखा: “अपने अंतिम क्षणों में मां बच्चों से, नाती-पोतों से घिरी थीं| उन्हें इस बात का पूरा अहसास था कि उनका अंतिम समय आ गया है| शांत मन से और दीन भाव से उन्होंने इस अंत को स्वीकार किया”|
(योगेन्द्र नागपाल)

Monday, 29 July 2013

विदेशिया फिल्म और मूत्रालय में खर्राटे


जयप्रकाश त्रिपाठी

मुद्दत बात आज मैंने पहली बार इस तरह आईना देखा। आईने में खुद को इतना अजनबी देखा। इतना अजनबी कि मन खुद को पहचानने से इनकार करने लगा। चेहरे पर टंगे सवालों के कैलेंडर तारीख-दर-तारीख उघड़ने लगे। एक-एक तारीख जाने-पहचाने चेहरों की भीड़ में कई-कई इतिहासों की डुबकियां लगाती हुई।
रिश्ते-नाते, सगे-संबंधी, मित्र-अमित्र, बड़े-छोटे और अनेकश समवयस्क.....। और उनमें अनहद एक अदद मित्रता निभाती हुई कदम-कदम चल कर जो यहां तक साथ आती जा रही हैं, मेरी प्रिय पुस्तकें। जो तब भी साथ थीं, जब कोई साथ नहीं था, जब ढेर सारे साथ आ गये थे और आज जबकि गिने-चुने साथ हैं। कई मंगन टाइप कुशल पाठक इनमें से मेरी किताबें खिसका ले गये, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। जाने कहां होंगी, किस हाल में।
कैलेंडर की एक तारीख पर अचानक कोई चेहरा फड़फड़ाया, जैसे अंधेरे से भटक आये चमगादड़। मित्र था। छोटे से कद का। हमेशा दोहरी मुस्कान से सामने वाले को थकाते हुए। ऐसो को अनजाने लोग नटवरलाल भी कहते हैं। वह घर में बिना बताये घुस आता था। एक थाली दाल-भात और आलू का भुर्ता भकोसने के लिए। पेट भर जाने के बाद लंबी डकार लेता था और इत्मीनान से बातें बनाता हुआ खिसक जाता था। उस जमाने में एक माफिया से उसकी खूब पटती थी। माफिया का भाई कई कत्ल कर चुका था। मेरा मित्र उसकी खूनी करतूतों पर धूल डालता फिरता था। वह मेरा मित्र आज भी शराफत की रुमाल चेहरे पर टांगे हुए मीडिया के कोने-अंतरे में दिन काट रहा है। पल भर में किसी का भी सगा बन जाने में माहिर और मिट्ठू......
एक और तारीख फड़की कैलेंडर के दूसरे कोने पर। जैसे रतौंधी के पार से झांकता हुआ। उसे नेता बनने का शौक था। बचपन से ही लंबा कुर्ता, झोलदार पायजामा और सिल्क का गमछा गले में लटकाये अपनो के बीच लंबी-लंबी तानने लगा था। एक बार उसने मुझे भी ढंग से तान लिया। उन दिनो मऊनाथ भंजन में मैं अन्य साथियों के साथ बुनकरों के लिए एक आंदोलन के मोरचे पर था। कुर्ता-गमछा वाले दोस्त ने उसमें भी अपनी जगह तान ली। चटपट जाने कैसे उसने संगठन का रजिस्ट्रेशन करा लिया। और स्वयंभू अध्यक्ष हो लेने के बाद अपनी मौसी के लड़के को भी अपनी राह लपेट लिया। मौसी का लड़का उसके पीछे-पीछे आलतू-फालतू कागजों की फाइल लेकर चलता रहता था, जैसे एसडीएम का अर्दली। आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। दलाली पर आमादा एक बड़ा नेता बीच में कूद पड़ा। मेरे मित्र को जाने क्या सूझी, मुझे साथ लेकर दस कोस दूर स्थित अपने गांव ले गया। उसका खेत में ट्यूबवैल था। बोला- चल रात में वही दलाल के बारे में कोई जुगाड़ बनाते हैं। रात के आठ बजते ही वह कहीं से झोले में सुतली, शीशे का चूरा और बारूद उठा ले आया।
ये क्या है?
बम बनाएंगे।
क्यों
दलाल को निपटाने के लिए।
अब मुझे किसी तरह निकल भागने की पड़ी। मैंने कहा- अभी रख दे। सुबह देखेंगे। वह जब सो गया, मैं वहां से पैदल सात किलो मीटर दूर रात में भागते-पराते मुहम्मदाबाद पहुंचा। उस कस्बे मऊनाथ भंजन जाने के लिए बसें रात भर मिलती थीँ। एक बस पर सवार हुआ और मऊ पहुंच गया। उस दलाल को निपटाने के खयालों के पीछे उस मित्र की बचपने भरी राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा थी। वह चाहता था कि उसे रास्ते से हटाने के बाद वह इलाके का बहुत बड़ा नेता बन जाएगा। आज मुझे कैलेंडर पर उस रतौंधी के पीछे से झांकते अब कथित हो चुके मित्र का चेहरा देख कर खूब हंसी आ रही है......
कैलेंडर पर उससे पीछे की एक अन्य तारीख चमक उठती है। तब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था। गांव के दो ऐसे विकट होनहार और सयाने किशोर भी उसी स्कूल में पढ़ते थे, जो मेरे सहपाठी नहीं थे। बारहवीं में पढ़ते थे। दोनो की मित्रता की एक बड़ी दयनीय और अजीब-सी वजह थी। दोनों को अपने घर में भरपेट खाने को नहीं मिलता था। कई बहनें और भाई थे दोनो के। दोनो के परिवार बहुत गरीब थे। दोनो ने पेट भरने की तरकीब निकाली। धारदार छोटा-सा एक चाकू कहीं से जुगाह लिया। उन दोनो में से किसी न किसी की जेब में वह चाकू हरदम पड़ा रहता था। स्कूल से वे बहुत पहले भाग आते थे और गांव के बाहर मेवा दुबे के गन्ने के खेत में घुस जाते थे। सांझ का घना अंधेरा घिर आने के बाद बाहर निकलते थे रसदार डकार लेते हुए। उसके बाद की बस एक घटना याद आ रही है। गन्ने की पेराई शुरू होने वाली थी। मेवा दुबे शाम को अचानक अपने खेत पर यह देखने पहुंच गये कि सुबह गन्ने की कटाई किधर से शुरू करानी होगी। खेत पर पहुंचते ही उन्हें लगा कि गन्ने की फसल के बीच कहीं कोई हलचल सी हो रही है। उन्होंने मिट्टी का ढेला फेंका तो उस तरफ से सियार बोलने लगे। वे सियार नहीं, वही दोनो थे। सियार की बोली बोलना भी उन्होंने सीख लिया था। सुबह जब गन्ना काटा जाने लगा तो फसल के मध्य हिस्से में लगभग तीन बिसवा गन्ना सफाचट मिला। वहां गन्ने के छिलके के बड़े-बड़े ढेर पड़े थे। सोच कर हंसी आ रही है। स्कूल छोड़ने के बाद दोनो मिलिट्री में भरती हो गये थे भर पेट भोजन के लिए.....
अभी और कई चेहरे उभर रहे हैं....चीखुर वाले बाबा, मौनी चाचा, अडंगा के महंत की कुटी और सगड़ा के सरपत, जिनमें वनमुर्गियां नाचती रहती थीं। और दुक्खन मियां की करताल, अवधू का हनुमान चालीसा, मथुरा यादव की चिकारी, बंसी दुबे का दही-बड़ा कांड......चंतारा की भैंस, लंघू का चिलम.... विदेशिया फिल्म देखने की रात मूत्रालय में खर्राटे भर रहे मरकहवा मास्टर की लुकाछिपी......


  

वे मीठी हवाओं के झोके और आंसुओं के सैलाब


जयप्रकाश त्रिपाठी

पहले की पीढ़ियां भी कई तरह से जीवन जीती रही हैं। जीवन जीने के तरीके बदलती रही हैं। तरह-तरह का जीवन जीने के नये-नये रास्ते और उपाय ढूंढती  रही हैं। हम भी आज वही सब किये जा रहे हैं।
अंतर है तो इतना भर कि हमारे तरीके, रास्ते और उपाय उनकी तुलना में ज्यादा क्षणभंगुर और सतही किस्म के लगते हैं।
कई पीढ़ियों का अनुभव न मेरे पास है, न किसी के पास कभी रहा है। अपने जीवन के दो सचेत चरणों पर नजर डालता हूं, स्वयं के और आसपास के यानी अंदर बाहर के कल के और आज के अनुभव खोलता-खंगालता हूं तो लगता है कि कल के कहां से आज के कहां तक आ पहुंचा हूं।
अपने नामचीन बुजुर्गों को मैंने बहुत करीब से पल-छिन देखते हुए पाया था कि उनमें आत्मप्रशंसा और आत्मप्रचार की आज जैसी बेचैनी नहीं होती थी। वे बिना कुछ किये-धरे 'बड़ा' होने के सपने नहीं देखते थे।
वे अपने बुजुर्गों से संस्कार में नैतिकता की इतनी नमी सोखे हुए होते थे कि उनका व्यक्तित्व हमे चौबीसो घड़ी संगत में रहने के लिए ललचाता रहता था। वे बात-बात पर झूठ का सहारा नहीं लेते थे। अपने आत्मीय जनो को वह मन से आत्मीय लगते थे। आत्मीय होने का न तो प्रवचन देते थे, न अभिनय करते थे।
उनमें विचारों की आज जैसी उच्छृंखलता भी नहीं होती थी। वे सतही और क्षणभंगुर सपनों से बहुत ज्यादा परहेज करते थे।
उनमें से एक थे मेरे पड़ोस के गांव के बुजुर्ग। मऊनाथ भंजन से चिरैयाकोट जाते समय बस अदभुत संयोग से उसी बस में सवार मिले, जिससे मैं अपने घर लौट रहा था। संयोग इसलिए कि वह अपने बेटी-दामाद के साथ अमेरिका में बस चुके थे और मन का उचाटपन खाली करने के लिए कुछ दिन रहने अपने गांव आये थे। उनके बारे में पिताजी ने इतनी तरह की प्रेरणादायक बातें बतायी थीं कि उन्हें देख लेने को मन ललचाता रहता था।.....और वे आज मेरी बगल की सीट पर बैठे मिले।
टिकट लेने, बैठने-खिसने से बातें शुरू हुईं और पिता की बतायी बातों तक पहुंच गयीं। मेरा परिचय जानकर उन्हें भी सुख मिला। मुझसे नहीं, मेरे पिता की यादों से। वह और मेरे पिता बचपन में साथ-साथ खेला-कूदा करते थे। और मेरे दो चाचा भी।
वह बताने लगे कि किस तरह वे लोग गांव से चौदह किलो मीटर दूर के मिडिल स्कूल में पैदल पढ़ने जाते थे। आते समय दोपहर को धूप से थक कर रास्ते में एक बूढ़े बरगद के बड़े से कोटरे में ठहर जाते थे। बरगद के नीचे कुआं था। झोले से सत्तू निकाल कर बरगद के पत्ते पर 'तुरंता' भोजन तैयार करने के बाद गमछे में पत्ते का दोना बनाकर कुएं से पानी निकालते थे। सत्तू-पानी के बाद आधा घंटा विश्राम करते थे और आंखें खुलने के बाद किताबें खोल लेते थे और जम कर तीन घंटे पढ़ाई करते थे। वह, पिता, दोनो चाचा एक-दूसरे का पूरा ध्यान रखते थे। वह आगरा में नौकरी का लंबा समय काटने के बाद अमेरिका चले गये। उनमें सबसे प्रतिभाशाली एक चाचा जो अच्छे गायक थे, विक्षिप्तावस्था में बाढ़ के समय नदी में डूब कर मर गये। दूसरे चाचा रामनारायण त्रिपाठी राजनीति में चले गये। उत्तर प्रदेश सरकार में लंबे समय तक डिप्ट स्पीकर रहे और फैजाबाद से लखनऊ जाकर वहीं बस गये।
पिताजी बताते थे कि डिप्टी स्पीकर हो जाने के बाद एक बार रामनारायण त्रिपाठी गांव आये। गांव के बाहर पोखरा पर वह पूरे सरकारी अमले के साथ पहुंचे। बड़ी संख्या में उन्हें देखने के लिए गांव वाले भी उमड़ आये थे। रामनारायण त्रिपाठी अचानक फूट-फूट कर रोने लगे। बाद में उन्होंने पिताजी को बताया कि उतना जोरजोर से क्यों रोने लगे थे। और उनके साथ वह उपस्थित सभी अधिकारियों, नेताओं, ग्रामीणों की आंखें भर आयी थीं।
रामनारायण त्रिपाठी की पढ़ाई बड़ी गरीबी में हुई थी। वह मेरे गांव के सबसे गरीब परिवार के छात्र रहे थे। उनकी मां बड़ी स्वाभिमानी थीं। हमारे सगे बाबा के चचेरे भाई ने उनके पिता की सारी जमीन-जायदाद हड़प ली थी। उनकी मां उसी पोखरा पर झोपड़ी डाल कर अपने दोनो पुत्रों रामनारायण और श्याम नारायण के साथ पड़ी रहती थीं। गांव में वह केवल मेरे घर से वास्ता रखती थीं। बारहो महीने कंधे पर लोटा-डोर लटका कर गांव-गांव भीख मांगती थीं रामनारायण की पढ़ाई की फीस जुटाने के लिए। रामनारायण पढ़ने में काफी प्रतिभाशाली थे। मिडिल क्लास में वह पूरे जिले में प्रथम आये थे।
उस दिन जब वह पोखरा पर पहुंचे तो यह कह कर फफक पड़े थे कि जब मैं कुछ लायक नहीं था तो मां ने मेरे लिये कितने कष्ट उठाये थे। आज जब मैं मां के लिये कुछ करने लायक हुआ हूं तो वह मेरे साथ नहीं हैं। मुझे लेकर उन्होंने यहां मेरे लिये जाने कैसे-कैसे दिन काटे थे.......
जीवन के लिए ऐसे अनेक प्रेरक प्रसंग सुनने के मिलते थे। बस से उतरते समय वह अपने गांव चले गये। मैंने पिताजी को मऊनाथ भंजन यात्रा की बात बतायी तो तुरंत उठ कर वह बगल के गांव उनसे मिलने चले गये। तब मोबाइल फोन नहीं था कि सारी फर्जी खैरियत हवाहवाई में सपन्न कर लेते।
ऐसे प्रसंगों की आज भी भूख लगी रहती है। साझा किससे किया जाये। सबके रास्ते समय ने छीन लिये हैं। वे चौराहे कहीं नजर नहीं आते। फेस बुक पर भी अक्सर लगता है, हम खामख्वाह छींकते-तापते रहते हैं। संचार संसाधनों पर कब्जा जमाते हुए बाजार के बहेलियों ने सचमुच कितने तरीके से हमे अपने चंगुल में फांस लिया है। अब यही माध्यम रह गया है तो यही सही, यहीं कुछ सुख-दुख बांट लेते हैं..... बांटते रहेंगे।

गदल : रांगेय राघव



बाहर शोरगुल मचा। डोडी ने पुकारा - ''कौन है?''
कोई उत्तर नहीं मिला। आवाज आई - ''हत्यारिन! तुझे कतल कर दँूगा!''
स्त्री का स्वर आया - ''करके तो देख! तेरे कुनबे को डायन बनके न खा गई, निपूते!''
डोडी बैठा न रह सका। बाहर आया।
''क्या करता है, क्या करता है, निहाल?'' - डोडी बढक़र चिल्लाया - ''आखिर तेरी मैया है।''
''मैया है!'' - कहकर निहाल हट गया।
''और तू हाथ उठाके तो देख!'' स्त्री ने फुफकारा - ''कढीख़ाए! तेरी सींक पर बिल्लियाँ चलवा दँू! समझ रखियो! मत जान रखियो! हाँ! तेरी आसरतू नहीं हँू।''
''भाभी!'' - डोडी ने कहा - ''क्या बकती है? होश में आ!''
वह आगे बढा। उसने मुडक़र कहा - ''जाओ सब। तुम सब लोग जाओ!''
निहाल हट गया। उसके साथ ही सब लोग इधर-उधर हो गए।
डोडी निस्तब्ध, छप्पर के नीचे लगा बरैंडा पकडे ख़डा रहा। स्त्री वहीं बिफरी हुई-सी बैठी रही। उसकी आँखों में आग-सी जल रही थी।
उसने कहा - ''मैं जानती हँू, निहाल में इतनी हिम्मत नहीं। यह सब तैने किया है, देवर!''
''हाँ गदल!'' - डोडी ने धीरे से कहा - ''मैंने ही किया है।''
गदल सिमट गई। कहा - ''क्यों, तुझे क्या जरूरत थी?''

डोडी क़ह नहीं सका। वह ऊपर से नीचे तक झनझना उठा। पचास साल का वह लंबा खारी गूजर, जिसकी मँूछें खिचडी हो चुकी थीं, छप्पर तक पहँुचा-सा लगता था। ़

उसके कंधे की चौडी हड्डियों पर अब दिए का हल्का प्रकाश पड रहा था, उसके शरीर पर मोटी फतुही थी और उसकी धोती घुटनों के नीचे उतरने के पहले ही झूल देकर चुस्त-सी ऊपर की ओर लौट जाती थी। उसका हाथ कर्रा था और वह इस समय निस्तब्ध खडा रहा।

स्त्री उठी। वह लगभग 45 वर्षीया थी, और उसका रंग गोरा होने पर भी आयु के धँुधलके में अब मैला-सा दिखने लगा था। उसको देखकर लगता था कि वह
फुर्तीली थी। जीवन-भर कठोर मेहनत करने से, उसकी गठन के ढीले पडने पर भी उसकी फूर्ती अभी तक मौजूद थी।
''तुझे शरम नहीं आती, गदल?'' - डोडी ने पूछा।
''क्यों, शरम क्यों आएगी?'' - गदल ने पूछा।
डोडी क्षणभर सकते में पड ग़या। भीतर के चौबारे से आवाज आई - ''शरम क्यों आएगी इसे? शरम तो उसे आए, जिसकी आँखों में हया बची हो।''
''निहाल!'' - डोडी चिल्लाया - ''तू चुप रह!''
फिर आवाज बंद हो गई।
गदल ने कहा - ''मुझे क्यों बुलाया है तूने?''
डोडी ने इस बात का उत्तर नहीं दिया। पूछा - ''रोटी खाई है?''
''नहीं, '' गदल ने कहा - ''खाती भी कब? कमबखत रास्ते में मिले। खेत होकर लौट रही थी। रास्ते में अरने-कंडे बीनकर संझा के लिए ले जा रही थी।''

डोडी ने पुकारा - ''निहाल! बहू से कह, अपनी सास को रोटी दे जाय!''
भीतर से किसी स्त्री की ढीठ आवाज सुनाई दी - ''अरे, अब लौहरों की बैयर आई हैं; उन्हें क्यों गरीब खारियों की रोटी भाएगी?''
कुछ स्त्रियों ने ठहाका लगाया।
निहाल चिल्लाया - ''सुन ले, परमेसुरी, जगहँसाई हो रही है। खारियों की तो तूने नाक कटाकर छोडी।''

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गुन्ना मरा, तो पचपन बरस का था। गदल विधवा हो गई। गदल का बडा बेटा निहाल तीस वर्ष के पास पहँुच रहा था। उसकी बहू दुल्ला का बडा बेटा सात का, दूसरा चार का और तीसरी छोरी थी जो उसकी गोद में थी।

निहाल से छोटी तरा-ऊपर की दो बहिनों थी चम्पा और चमेली, जिसका क्रमशः झाज और विश्वारा गाँवों में ब्याह हुआ था। आज उनकी गोदियों से उनके लाल उतरकर धूल में घुटरूवन चलने लगे थे। अंतिम पुत्र नारायन अब बाईस का था, जिसकी बहू दूसरे बच्चे की माँ बननेवाली थी। ऐसी गदल, इतना बडा परिवार छोडक़र चली गई थी और बत्तीस साल के एक लौहरे गूजर के यहाँ जा बैठी थी।

डोडी ग़ुन्ना का सगा भाई था। बहू थी, बच्चे भी हुए। सब मर गए। अपनी जगह अकेला रह गया। गुन्ना ने बडी-बडी क़ही, पर वह फिर अकेला ही रहा, उसने ब्याह नहीं किया, गदल ही के चूल्हे पर खाता रहा। कमाकर लाता, वो उसी को दे देता, उसी के बच्चों को अपना मानता, कभी उसने अलगाव नहीं किया। निहाल अपने चाचा पर जान देता था। और फिर खारी गूजर अपने को लौहरों से ऊँच समझते थे।

गदल जिसके घर बैठी थी, उसका पूरा कुनबा था। उसने गदल की उम्र नहीं देखी, यह देखा कि खारी औरत है, पडी रहेगी। चूल्हे पर दम फँूकनेवाली की जरूरत भी थी।

आज ही गदल सवेरे गई थी और शाम को उसके बेटे उसे फिर बाँध लाए थे। उसके नए पति मौनी को अभी पता भी नहीं हुआ होगा। मौनी रँडुआ था। उसकी भाभी जो पाँव फैलाकर मटक-मटककर छाछ बिलोती थी - दुल्लो सुनेगी तो क्या कहेगी?
गदल का मन विक्षोभ से भर उठा।
आधी रात हो चली थी। गदल वहीं पडी थी। डोडी वहीं बैठा चिलम फँूक रहा था।
उस सन्नाटे में डोडी ने धीरे से कहा - ''गदल!''
''क्या है?'' - गदल ने हौले से कहा।
''तू चली गई न?''
गदल बोली नहीं। डोडी ने फिर कहा - ''सब चले जाते हैं। एक दिन तेरी देवरानी चली गई, फिर एक-एक करके तेरे भतीजे भी चले गए। भैया भी चला गया।पर तू जैसी गई; वैसे तो कोई भी नहीं गया। जग हँसता है, जानती है?''

गदल बुरबुराई - ''जग हँसाई से मैं नहीं डरती देवर! जब चौदह की थी, तब तेरा भैया मुझे गाँव में देख गया था। तू उसके साथ तेल पिया लट्ठ लेकर मुझे लेने आया था न, तब? मैं आई थी कि नहीं? तू सोचता होगा कि गदल की उमर गई, अब उसे खसम की क्या जरूरत है? पर जानता है, मैं क्यों गई?''
''नहीं।''
''तु तो बस यही सोच करता होगा कि गदल गई, अब पहले-सा रोटियों का आराम नहीं रहा। बहुएँ नहीं करेंगी तेरी चाकरी देवर! तूने भाई से और मुझसे निभाई, तो मैंने भी तुझे अपना ही समझा! बोल झूठ कहती हँू?''
''नहीं, गदल, मैंने कब कहा!''
''बस यही बात है देवर! अब मेरा यहाँ कौन है! मेरा मरद तो मर गया। जीते-जी मैंने उसकी चाकरी की, उसके नाते उसके सब अपनों की चाकरी बजाई। पर जब मालिक ही न रहा, तो काहे को हडक़ंप उठाऊँ? यह लडक़े, यह बहुएँ! मैं इनकी गुलामी नहीं करूँगी!''
''पर क्या यह सब तेरी औलाद नहीं बावरी। बिल्ली तक अपने जायों के लिए सात घर उलट-फेर करती है, फिर तू तो मानुष है। तेरी माया-ममता कहाँ चली गई?''
''देवर, तेरी कहाँ चली गई थी, तूने फिर ब्याह न किया।''
''मुझे तेरा सहारा था गदल!''
''कायर! भैया तेरा मरा, कारज किया बेटे ने और फिर जब सब हो गया तब तू मुझे रखकर घर नहीं बसा सकता था। तूने मुझे पेट के लिए पराई डयौढी लँघवाई।
चूल्हा मैं तब फँूकँू, जब मेरा कोई अपना हो। ऐसी बाँदी नहीं हँू कि मेरी कुहनी बजे, औरों के बिछिए छनके। मैं तो पेट तब भरूँगी, जब पेट का मोल कर लँूगी।
समझा देवर! तूने तो नहीं कहा तब। अब कुनबे की नाक पर चोट पडी, तब सोचा। तब न सोचा, जब तेरी गदल को बहुओं ने आँखें तरेरकर देखा। अरे, कौन किसकी परवा करता है!''
''गदल!'' - डोडी ने भर्राए स्वर में कहा - ''मैं डरता था।''
''भला क्यों तो?''
''गदल, मैं बुढ्ढा हँू। डरता था, जग हँसेगा। बेटे सोचेंगे, शायद चाचा का अम्माँ से पहले से नाता था, तभी चाचा ने दूसरा ब्याह नहीं किया। गदल,भैया की भी बदनामी होती न?''
''अरे चल रहने दे!'' गदल ने उत्तर दिया - ''भैया का बडा ख्याल रहा तुझे? तू नहीं था कारज में उनके क्या? मेरे सुसर मरे थे, तब तेरे भैया ने बिरादरी को जिमाकर होठों से पानी छुलाया था अपने। और तुम सबने कितने बुलाए? तू भैया दो बेटे। यही भैया हैं, यहीं बेटे हैं? पच्चीस आदमी बुलाए कुल। क्यों आखिर? कह दिया लडाई में कानून है। पुलिस पच्चीस से ज्यादा होते ही पकड ले जाएगी! डरपोक कहीं के! मैं नहीं रहती ऐसों के।''
हठात् डोडी क़ा स्वर बदला। कहा - ''मेरे रहते तू पराए मरद के जा बैठेगी?''
''हाँ।''
''अबके तो कह!'' - वह उठकर बढा।
''सौ बार कहँू लाला!'' गदल पडी-पडी बोली।
डोडी बढा।
''बढ!'' - गदल ने फुफकारा।

डोडी रूक़ गया। गदल देखती रही। डोडी ज़ाकर बैठ गया। गदल देखती रही। फिर हँसी। कहा - ''तू मुझे करेगा! तुझमें हिम्मत कहाँ है देवर! मेरा नया मरद है न? मरद है। इतनी सुन तो ले भला। मुझे लगता है तेरा भइया ही फिर मिल गया है मुझे। तू?'' - वह रूकी- ''मरद है! अरे कोई बैयर से घिघियाता है? बढक़र जो तू मुझे मारता, तो मैं समझती, तू अपनापा मानता हैं। मैं इस घर में रहँूगी?''
डोडी देखता ही रह गया। रात गहरी हो गई। गदल ने लहँगे की पर्त फैलाकर तन ढक लिया। डोडी ऊँघने लगा।

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ओसारे में दुल्ले ने अँगडाई लेकर कहा - ''आ गई देवरानी जी! रात कहाँ रही?''
सूका डूब गया था। आकाश में पौ फट रही थी। बैल अब उठकर खडे हो गए थे। हवा में एक ठंडक थी।
गदल ने तडाक से जवाब दिया - ''सो, जेठानी मेरी! हुकुम नहीं चला मुझ पर। तेरी जैसी बेटियाँ है मेरी। देवर के नाते देवरानी हँू, तेरी जूती नहीं।''
दुल्लो सकपका गई। मौनी उठा ही था। भन्नाया हुआ आया। बोला- ''कहाँ गई थी?''
गदल ने घँूघट खींच लिया, पर आवाज नहीं बदली। कहा - ''वही ले गए मुझे घेरकर! मौका पाके निकल आई।''

मौनी दब गया। मौनी का बाप बाहर से ही ढोर हाँक ले गया। मौनी बढा।
''कहाँ जाता है?'' - गदल ने पूछा।
''खेत-हार।''
''पहले मेरा फैसला कर जा।'' गदल ने कहा।

दुल्लो उस अधेड स्त्री क़े नक्शे देखकर अचरज में खडी रही।
''कैसा फैसला? - मौना ने पूछा। वह उस बडी स्त्री से दब गया।
''अब क्या तेरे घर का पीसना पीसँूगी मैं?'' - गदल ने कहा - ''हम तो दो जने हैं। अलग करेंगे खाएँगे।'' - उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही यह कहती रही - ''कमाई शामिल करो, मैं नहीं रोकती, पर भीतर तो अलग-अलग भले।''

मौनी क्षण-भर सन्नाटे में खडा रहा। दुल्लो तिनककर निकली। बोली - ''अब चुप क्यों हो गया, देवर? बोलता क्यों नहीं? देवरानी लाया है कि सास! तेरी बोलती क्यों नहीं कढती? ऐसी न समझियो तू मुझे! रोटी तवे पर पलटते मुझे भी आँच नहीं लगती, जो मैं इसकी खरी-खोटी सुन लँूगी,समझा? मेरी अम्माँ ने भी मुझे चूल्हे की मट्टी खाके ही जना था। हाँ!''

''अरी तो सौत!'' - गदल ने पुकारा - ''मट्टी न खा के आई, सारे कुनबे को चबा जाएगी डायन। ऐसी नहीं तेरी गुड क़ी भेली है, जो न खाएंगे हम, तो रोटी गले में फंदा मार जाएगी।''

मौनी उत्तर नहीं दे सका। वह बाहर चला गया। दुपहर हो गई। दुल्लो बैठी चरखा कात रही थी। नरायन ने आकर आवाज दी - ''कोई है?''
दुल्लो ने घँूघट काढ लिया। पूछ - ''कौन हो?''
नरायन ने खून का घँूट पीकर कहा - ''गदल का बेटा हँू।''
दुल्लो घँूघट में हँसी। पूछा - ''छोटे हो कि बडे?''
''छोटा।''
''और कितने है!''
''कित्ते भी हों। तुझे क्या?'' - गदल ने निकालकर कहा।
''अरे आ गई!'' कहकर दुल्लो भीतर भागी।
''आने दे आज उसे। तुझे बता दँूगी जिठानी!'' - गदल ने सिर हिलाकर कहा।
''अम्माँ!'' - नरायन ने कहा - ''यह तेरी जिठानी!''
''क्यों आया है तू? यह बता!'' - गदल झल्लाई।
''दंड धरवाने आया हँू, अम्माँ! - कहकर नरायन आगे बैठने को बढा।
''वहीं रह!'' - गदल ने कहा।

उसी समय लोटा-डोर लिए मौनी लौटा। उसने देखा कि गदल ने अपने कडे अौर हँसली उतारकर फेक दी और कहा - ''भर गया दंड तेरा! अब मरद का सब माल दबाकर बहुओं के कहने से बेटों ने मुझे निकाल दिया है।''
नरायन का मँुह स्याह पड ग़या। वह गहने उठाकर चला गया। मौनी मन-ही-मन शंकित-सा भीतर आया।

दुल्लो ने शिकायत की - ''सुना तूने देवर! देवरानी ने गहने दे दिए। घुटना आखिर पेट को ही मुडा। चार जगह बैठेगी, तो बेटों के खेत की डौर पर डंडा-धूआ तक लग जाएँगे, पक्का चबूतरा घर के आगे बन जाएगा, समझा देती हँू। तुम भोले-भाले ठहरे। तिरिया-चरित्तर तुम क्या जानो। धंधा है यह भी। अब कहेगी, फिर बनवा मुझे।''

गदल हँसी, कहा- ''वाह जिठानी, पुराने मरद का मोल नए मरद से तेरे घर की बैयर चुकवाती होंगी। गदल तो मालकिन बनकर रहती है, समझी! बाँदी बनकर नहीं। चाकरी करूँगी तो अपने मरद की, नहीं तो बिधना मेरे ठेंगे पर। समझी! तू बीच में बोलनेवाली कौन?''
दुल्लो ने रोष से देखा और पाँव पटकती चली गई।
मौनी ने देखा और कहा - ''बहुत बढ-बढक़र बातें मत हाँक, समझ ले घर में बहू बनकर रह!''
''अरे तू तो तब पैदा भी नहीं हुआ था, बालम!'' - गदल ने मुस्कराकर कहा - ''तब से मैं सब जानती हँू। मुझे क्या सिखाता है तू? ऐसा कोई मैंने काम नहीं किया है, जो बिरादरी के नेम के बाहर हो। जब तू देखे, मैंने ऐसी कोई बात की हो, तो हजार बार रोक, पर सौत की ठसक नहीं सहँूगी।''
''तो बताऊँ तुझे!'' - वह सिर हिलाकर बोला।
गदल हँसकर ओबरी में चली गई और काम में लग गई।

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ठंडी हवा तेज हो गई। डोडी चुपचाप बाहर छप्पर में बैठा हुक्का पी रहा था। पीते-पीते ऊब गया और उसने चिलम उलट दी और फिर बैठा रहा।

खेत से लौटकर निहाल ने बैल बाँधे, न्यार डाला और कहा - ''काका!'' डोडी क़ुछ सोच रहा था। उसने सुना नहीं।
''काका!'' - निहाल ने स्वर उठाकर कहा।
''हे!'' डोडी चौक उठा - ''क्या है? मुझसे कहा कुछ?''
''तुमसे न कहँूगा, तो कहँूगा किससे? दिन-भर तो तुम मिले नहीं। चिम्मन कढेरा कहता था, तुमने दिन-भर मनमौजी बाबा की धूनी के पास बिताया, यह सच है?''
''हाँ, बेटा, चला तो गया था।''
''क्यों गए थे भला?''
''ऐसे ही जी किया था, बेटा!''
''और कस्बे से घी कटऊ क्या कराया कि बनिए का आदमी आया था। मैंने कहा - ''नहीं है, वह बोला - लेके जाऊँगा। झगडा होते-होते बचा।''
''ऐसा नहीं करते, बेटा!'' - डोडी ने कहा - ''बौहरे से कोई झगडा मोल लेता है?''

निहाल ने चिलम उठाई, कंडों में से आँच बीनकर धरी और फँूक लगाता हुआ आया। कहा - ''मैं तो गया नहीं। सिर फूट जाते। नरायन को भेजा था।''
''कहाँ?'' डोडी चौंका।
''उसी कुलच्छनी कुलबोरनी के पास।''
''अपनी माँ के पास?''
''न जाने तुम्हें उससे क्या है, अब भी तुम्हें उस पर गुस्सा नहीं आता। उसे माँ कहँूगा मैं?''
''पर बेटा, तू न कह, जग तो उसे तेरी माँ ही कहेगा। जब तक मरद जीता है, लोग बैयर को मरद की बहू कहकर पुकारते हैं, जब मरद मर जाता है, तो लोग उसे
बेटे की अम्माँ कहकर पुकारते हैं। कोई नया नेम थोडी ही है।''
निहाल भुनभुनाया। कहा- ''ठिक है, काका ठीक है, पर तुमने अभी तक ये तो पूछा ही नहीं कि क्यों भेजा था उसे?''
''हाँ बेटा!'' - डोडी ने चौंककर कहा - ''यहा तो तूने बताया ही नहीं! बता न?''
''दंड भरवाने भेजा था। सो पंचायत जुडवाने के पहले ही उसने तो गहने उतार फेंके।''

डोडी मुस्कुराया। कहा - ''तो वह यह बता रही है कि घरवालों ने पंचायत भी नहीं जुडवाई? यानी हम उसे भगाना ही चाहते थे। नरायन ले आया?''
''हाँ।''
डोडी सोचने लगा।
''मैं फेर आऊँ?'' - निहाल ने पूछा।
''नहीं बेटा!'' डोडी ने कहा - ''वह सचमुच रूठकर ही गई है। और कोई बात नहीं है। तूने रोटी खा ली?''
''नहीं।''
''तो जा पहले खा ले।''
निहाल उठ गया, पर डोडी बैठा रहा। रात का अँधेरा साँझ के पीछे ऐसे आ गया, जैसे कोई पर्त उलट गई हो।
दूर ढोला गाने की आवाज आने लगी। डोडी उठा और चल पडा।
निहाल ने बहू से पूछा - ''काका ने खा ली?''
''नहीं तो।''
निहाल बाहर आया। काका नहीं थे।
''काका।'' उसने पुकारा।
राह पर चिरंजी पुजारी गढवाले हनुमानजी के पट बंद करके आ रहा था। उसने पुछा -''क्या है रे?''
''पाँय लागूँ, पंडितजी।'' निहाल ने कहा - ''काका अभी तो बैठे थे।''
चिरंजी ने कहा- ''अरे, वह वहाँ ढोल सुन रहा है। मैं अभी देखकर आया हँू।''
चिरंजी चला गया, निहाल ठिठक खडा रहा। बहू ने झाँककर पूछा- ''क्या हुआ?''
''काका ढोला सुनने गए हैं।'' - निहाल ने अविश्वास से कहा - ''वे तो नहीं जाते थे।''
''जाकर बुला ले आओ। रात बढ रही है।'' - बहू ने कहा और रोते बच्चे को दूध पिलाने लगी।
निहाल जब काका को लेकर लौटा, तो काका की देही तप रही थी।
''हवा लग गई है और कुछ नहीं।'' - डोडी ने छोटी खटिया पर अपनी निकाली टाँगे समेटकर लेटते हुए कहा - ''रोटी रहने दे, आज जी नहीं चाहता।''
निहाल खडा रहा। डोडी ने कहा - ''अरे, सोच तो, बेटा! मैंने ढोला कितने दिन बाद सुना है।

उस दिन भैया की सुहागरात को सुना था, या फिर आज ...।''
निहाल ने सुना और देखा, डोडी अाँख मीचकर कुछ गुनगुनाने लगा था ...़

शाम हो गई थी। मौनी बाहर बैठा था। गदल ने गरम-गरम रोटी और आम की चटनी ले जाकर खाने को धर दी।
''बहुत अच्छी बनी है।'' - मौनी ने खाते हुए कहा - ''बहुत अच्छी है।''
गदल बैठ गई। कहा - ''तुम एक ब्याह और क्यों नहीं कर लेते अपनी उमिर लायक?''
मौनी चौंका। कहा - ''एक की रोटी भी नहीं बनती?''
''नहीं'', गदल ने कहा - ''सोचते होंगे सौत बुलाती हँू , पर मरद का क्या? मेरी भी तो ढलती उमिर है। जीते जी देख जाऊँगी तो ठीक है। न हो ते हुकूमत करने को तो एक मिल जाएगी।''
मौना हँसा। बोला - ''यों कह। हौंस है तुझे, लडने को चाहिए।''
खाना खाकर उठा, तो गदल हुक्का भरकर दे गई और आप दीवार की ओट में बैठकर खाने लगी। इतने में सुनाई दिया - ''अरे, इस बखत कहाँ चला?''
''जरूरी काम है, मौनी!'' - उत्तर मिला - ''पेसकार साब ने बुलवाया है।''
गदल ने पहचाना। उसी के गाँव का तो था, घोटया मैना का चंदा गिर्राज ग्वारिया। जरूर पेसकार की गाय की चराने की बात होगी।
''अरे तो रात को जा रहा है?'' - मौनी ने कहा - ''ले चिलम तो पीता जा।''
आकर्षण ने रोका। गिर्राज बैठ गया। गदल ने दूसरी रोटी उठाई। कौर मँुह में रखा।
''तुमने सुना?'' गिर्राज ने कहा और दम खींचा।
''क्या?'' मौनी ने पूछा।
''गदल का देवर डोडी मर गया।''
गदल का मँुह रूक गया। जल्दी से लोटे के पानी के संग कौर निगला और सुनने लगी। कलेजा मँुह को आने लगा।
''कैसे मर गया?'' - मौनी ने कहा - ''वह तो भला-चंगा था!''
''ठंड लग गई, रात उघाडा रह गया।''
गदल द्वार पर दिखाई दी। कहा - ''गिर्राज!''
''काकी!'' - गिर्राज ने कहा - ''सच। मरते बखत उसके मँुह से तुम्हारा नाम कढा था, काकी। बिचारा बडा भला मानस था।''
गदल स्तब्ध खडी रही।
गिर्राज चला गया।
गदल ने कहा - ''सुनते हो!''
''क्या है री?''
''मैं जरा जाऊँगी।''
''कहाँ? - वह आतंकित हुआ।
''वहीं।''
''क्यों?''
''देवर मर गया है न?''
''देवर! अब तो वह तेरा देवर नहीं।''
गदल झनझनाती हुई हँसी हँसी - ''देवर तो मेरा अगले जनम में भी रहेगा। वही न मुझे रूखाई दिखाता, तो क्या यह पाँव कटे बिना उस देहरी से बाहर निकल सकते थे? उसने मुझसे मन फेरा, मैने उससे। मैंने ऐसा बदला लिया उससे!''
कहते कहते वह कठोर हो गई।
''तू नहीं जा सकती।'' - मौनी ने कहा।
''क्यों?'' - गदल ने कहा - ''तू रोकेगा? अरे, मेरे खास पेट के जाए मुझे रोक न पाए। अब क्या है? जिसे नीचा दिखाना चाहती थी, वही न रहा और तू मुझे रोकनेवाला है कौन? अपने मन से आई थी, रहँूगी, नहीं रहँूगी, कौन तूने मेरा मोल दिया है। इतना बोल तो भी लिया - तू जो होता मेरे उस घर में तो, तो जीभ कढवा लेती तेरी।''
''अरी चल-चल।''
मौनी ने हाथ पकडकर उसे भीतर धकेल दिया और द्वार पर खाट डालकर लेटकर हुक्का पीने लगा।
गदल भीतर रोने लगी, परंतु इतने धीरे कि उसकी सिसकी तक मौनी नहीं सुन सका। आज गदल का मन बहा जा रहा था। रात का तीसरा पहर बीत रहा था। मौनी की नाक बज रही थी। गदल ने पूरी शक्ति लगाकर छप्पर का कोना उठाया और साँपिन की तरह उसके नीचे से रेंगकर दूसरी ओर कूद गई।

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मौनी रह-रहकर तडपता था। हिम्मत नहीं होती थी कि जाकर सीधे गाँव में हल्ला करे और लट्ठ के बल पर गदल को उठा लाए। मन करता सुसरी की टाँगे तोड दे। दुल्लो ने व्यंग्य भी किया कि उसकी लुगाई भागकर नाक कटा गई है, खून का-सा घँूट पीकर रह गया। गूजरों ने जब सुना, तो कहा - ''अरे बुढिया के लिए खून-खराबा कराएगा! और अभी तेरा उसने खरच ही क्या कराया है? दो जून रोटी खा गई है, तुझे भी तो टिक्कड ख़िलाकर ही गई!''
मौनी का क्रोध भडक़ गया।
घोटया का गिर्राज सुना गया था।

जिस वक्त गदल पहँुची, पटेल बैठा था। निहाल ने कहा था - ''खबरदार! भीतर पाँव न धरियो!''
''क्यों लौट आई है, बहू?'' पटेल चौंका था। बोला- ''अब क्या लेने आई है?''
गदल बैठ गई। कहा - ''जब छोटी थी, तभी मेरा देवर लट्ठ बाँध मेरे खसम के साथ आया था। इसी के हाथ देखती रह गई थी मैं तो। सोचा था मरद है, इसकी छत्तर-छाया में जी लँूगी। बताओ, पटेल, वह ही जब मेरे आदमी के मरने के बाद मुझे न रख सका, तो क्या करती? अरे, मैं न रही, तो इनसे क्या हुआ? दो दिन में काका उठ गया न? इनके सहारे मैं रहती तो क्या होता?''
पटेल ने कहा- ''पर तूने बेटा-बेटी की उमर न देखी बहू।''
''ठीक है'', गदल ने कहा - ''उमर देखती कि इज्जत, यह कहो। मेरी देवर से रार थी, खतम हो गई। ये बेटा है, मैने कोई बिरादरी के नेम के बाहर की बात की हो तो रोककर मुझ पर दावा करो। पंचायत में जवाब दँूगी। लेकिन बेटों ने बिरादरी के मँुह पर थूका, तब तुम सब कहाँ थे?''
''सो कब?'' - पटेल ने आश्चर्य से पूछा।
''पटेल न कहेंगे तो कौन कहेगा? पच्चीस आदमी खिलाकर लुटा दिया मेरे मरद के कारज में!''
''पर पगली, यह तो सरकार का कानून था।''
''कानून था!'' - गदल हँसी - ''सारे जग में कानून चल रहा है, पटेल?

दिन दहाडे भैंस खोलकर लाई जाती हैं। मेरे ही मरद पर कानून था? यों न कहोगे, बेटों ने सोचा, दूसरा अब क्या धरा है, क्यों पैसा बिगाडते हो?कायर कहीं के?''
निहाल गरजा - ''कायर! हम कायर? तू सिंधनी?''
''हाँ मैं सिंधनी!'' ...ग़दल तडपी - ''बोल तुझमें है हिम्मत?''
''बोल!'' - ''वह भी चिल्लाया।
''जा, बिरादरी कारज में न्योता दे काका के।'' - गदल ने कहा।
निहाल सकपका गया। बोला - ''ेपुलस ...''
ग़दल ने सीना ठोंककर कहा - ''बस?''
''लुगाई बकती है!'' - पटेल ने कहा - ''गोली चलेगी, तो?''
गदल ने कहा - ''धरम-धुरंधरों ने तो डूबो ही दी। सारी गुजरात की डूब गई, माधो। अब किसी का आसरा नहीं। कायर-ही-कायर बसे हैं।''
फिर अचानक कहा - ''मैं करूँ परबंध?''
''तू?'' - निहाल ने कहा।
''हाँ, मैं!'' ...़ अौर उसकी आँखों में पानी भर आया। कहा - ''वह मरते बखत मेरा नाम लेता गया है न, तो उसका परबंध मैं ही करूँगी।''

मौनी आश्चर्य में था। गिर्राज ने बताया था कि कारज का जोरदार इंतजाम है। गदल ने दरोगा को रिश्वत दी है। वह इधर आएगा ही नहीं। गदल बडा इंतजाम कर रही है। लोग कहते है, उसे अपने मरद का इतना गम नहीं हुआ था, जितना अब लगता है।

गिरर््राज तो चला गया था, पर मौनी में विष भर गया था। उसने उठते हुए कहा - ''तो गदल! तेरी भी मन की होने दँू, सो गोला का मौनी नहीं। दरोगा का मँुह बंद कर दे, पर उससे भी ऊपर एक दरबार है। मैं कस्बे में बडे दरोगा से शिकायत करूँगा।''

ॅॅॅ

कारज हो रहा था। पाँते बैठतीं, जीमतीं, उठ जातीं और कढाव से पुए उतरते। बाहर मरद इंतजाम कर रहे थे, खिला रहे थे। निहाल और नरायन ने लडाई में महँगा नाज बेचकर जो घडाें में नोटों की चाँदी बनाकर डाली थी, वह निकली और बौहरे का कर्ज चढा। पर डाँग में लोगों ने कहा -''गदल का ही बूता था। बेटे तो हार बैठे थे। कानून क्या बिरादरी से ऊपर है?''

गदल थक गई थी। औरतों में बैठी थी। अचानक द्वार में से सिपाही-सा दीखा। बाहर आ गई। निहाल सिर झुकाए खडा था।
''क्या बात है, दीवानजी?'' - गदल ने बढक़र पूछा।
स्त्री का बढक़र पूछना देख दीवान सकपका गया।
निहाल ने कहा - ''कहते हैं कारज रोक दो।''
''सो, कैसे?'' - गदल चौंकी।
''दरोगाजी ने कहा है।'' दीवानजी ने नम्र उत्तर दिया।
''क्यों? उनसे पूछकर ही तो किया जा रहा है।'' उसका स्पष्ट संकेत था कि रिश्वत दी जा चुकी है।
दीवान ने कहा - ''जानता हँू, दरोगाजी तो मेल-मुलाकात मानते हैं, पर किसी ने बडे दरोगाजी के पास शिकायत पहँुचाई है, दरोगाजी को आना ही पडेग़ा। इसी से
उन्होंने कहला भेजा है कि भीड छाँट दो। वर्ना कानूनी कार्रवाई करनी पडेग़ी।''

क्षणभर गदल ने सोचा। कौन होगा वह? समझ नहीं सकी। बोली - ''दरोगाजी ने पहले नहीं सोचा यह सब? अब बिरादरी को उठा दें? दीवानजी, तुम भी बैठकर पत्तल परोसवा लो। होगी सो देखी जाएगी। हम खबर भेज देंगे, दरोगा आते ही क्यों हैं? वे तो राजा है।''
दीवानजी ने कहा -''सरकारी नौकरी है। चली जाएगी? आना ही होगा उन्हें।''
''तो आने दो!'' - गदल ने चुभते स्वर से कहा - ''सब गिरफ्तार कर लिए जाएँगे। समझी! राज से टक्कर लेने की कोशिश न करो।''
अरे तो क्या राज बिरादरी से ऊपर है?'' - गदल ने तमककर कहा - ''राज के पीसे तो आज तक पिसे हैं, पर राज के लिए धर्म नहीं छोड देंगे, तुम सुन लो! तुम धरम छीन लो, तो हमें जीना हराम है।''
गदल के पाँव के धमाके से धरती चल गई।
तीन पाँते और उठ गई, अंतिम पाँत थी। निहाल ने अँधेरे में देखकर कहा - ''नरायन, जल्दी कर। एक पाँत बची है न?''
गदल ने छप्पर की छाया में से कहा - ''निहाल!''
निहाल गया।
''डरता है?'' - गदल ने पूछा।
सूखे होठों पर जीभ फेरकर उसने कहा - ''नहीं!''
''मेरी कोख की लाज करनी होगी तुझे।'' - गदल ने कहा - ''तेरे काका ने तुझको बेटा समझकर अपना दूसरा ब्याह नामंजूर कर दिया था। याद रखना,उसके और कोई नहीं।''
निहाल ने सिर झुका लिया।
भागा हुआ एक लडक़ा आया।
''दादी!'' वह चिल्लाया।
''क्या है रे?'' - गदल ने सशंक होकर देखा।
''पुलिस हथियारबंद होकर आ रही है।''
निहाल ने गदल की ओर रहस्यभरी दृष्टि से देखा।
गदल ने कहा - ''पाँत उठने में ज्यादा देर नहीं है।''
''लेकिन वे कब मानेंगे?''
''उन्हें रोकना होगा।''
''उनके पास बंदूकें हैं।''
''बंदूकें हमारे पास भी हैं, निहाल!'' - गदल ने कहा - ''डाँग में बंदूकों की क्या कमी?''
''पर हम फिर खाएँगे क्या!''
''जो भगवान देगा।''
बाहर पुलिस की गाडी क़ा भोंपू बजा। निहाल आगे बढा। दरोगा ने उतरकर कहा - ''यहाँ दावत हो रही है?''
निहाल भौंचक रह गया। जिस आदमी ने रिश्वत ली थी, अब वह पहचान भी नहीं रहा था।
''हाँ। हो रही है?'' - उसने क्रुद्ध स्वर में कहा।
''पच्चीस आदमी से ऊपर है?''
''गिनकर हम नहीं खिलाते, दरोगाजी!''

''मगर तुम कानून तो नहीं तोड सकते।
''राज का कानून कल का है, मगर बिरादरी का कानून सदा का है, हमें राज नहीं लेना है, बिरादरी से काम है।''
''तो मैं गिरफ्तार करूँगा!''
गदल ने पुकारा - ''निहाल।''
निहाल भीतर गया।
गदल ने कहा - ''पंगत होने तक इन्हें रोकना ही होगा!''
''फिर!''
''फिर सबको पीछे से निकाल देंगे। अगर कोई पकडा गया, तो बिरादरी क्या कहेगी?''
''पर ये वैसे न रूकेंगे। गोली चलाएँगे।''
''तू न डर। छत पर नरायन चार आदमियों के साथ बंदूकें लिए बैठा है।''
निहाल काँप उठा। उसने घबराए हुए स्वर से समझने की कोशिश की - ''हमारी टोपीदार हैं, उनकी रैफल हैं।''
''कुछ भी हो, पंगत उतर जाएगी।''
''और फिर!''
''तुम सब भागना।''
हठात् लालटेन बुझ गई। धाँय-धाँय की आवाज आई।
गोलियाँ अंधकार में चलने लगीं।
गदल ने चिल्लाकर कहा - ''सौगंध है, खाकर उठना।''
पर सबको जल्दी की फिकर थी।
बाहर धाँय-धाँय हो रही थी। कोई चिल्लाकर गिरा।
पाँत पीछे से निकलने लगी।
जब सब चले गए, गदल ऊपर चढी। निहाल से कहा - ''बेटा!''
उसके स्वर की अखंड ममता सुनकर निहाल के रोंगटे उस हलचल में भी खडे हो गए। इससे पहले कि वह उत्तर दे, गदल ने कहा - ''तुझे मेरी कोख की सौगंध है। नरायन को और बहू-बच्चों को लेकर निकल जो पीछे से।''
''और तू?''
''मेरी फिकर छोड! मैं देख रही हँू, तेरा काका मुझे बुला रहा है।''
निहाल ने बहस नहीं की। गदल ने एक बंदूकवाले से भरी बंदूक लेकर कहा - ''चले जाओ सब, निकल जाओ।''
संतान के मोह से जकडे हुए युवकों को विपत्ति ने अंधकार में विलीन कर दिया।
गदल ने घोडा दबाया। क़ोई चिल्लाकर गिरा। वह हँसी। विकराल हास्य उस अंधकार में गँूज उठा।
दरोगा ने सुना तो चौंका ः औरत! मरद कहाँ गए! उसके कुछ सिपाहियों ने पीछे से घेराव डाला और ऊपर चढ ग़ए। गोली चलाई। गदल के पेट में लगी।

युद्ध समाप्त हो गया था। गदल रक्त से भीगी हुई पडी थी। पुलिस के जवान इकट्ठे हो गए।
दरोगा ने पूछा - ''यहाँ तो कोई नहीं?''
''हुजूर! - एक सिपाही ने कहा - ''यह औरत है।''
दरोगा आगे बढ अाया। उसने देखा और पूछा - ''तू कौन है?''
गदल मुस्कराई और धीरे से कहा - ''कारज हो गया, दरोगाजी! आतमा को सांति मिल गई।''
दरोगा ने झल्लाकर कहा - ''पर तू है कौन?
गदल ने और भी क्षीण स्वर से कहा - ''जो एक दिन अकेला न रह सका, उसी की ... ।''
अौर सिर लुढक़ गया। उसके होठों पर मुस्कराहट ऐसी दिखाई दे रही थी, जैसे अब पुराने अंधकार में जलाकर लाई हुई ...पहले की बुझी लालटेन।