Saturday, 6 July 2013

कई आयामों में विभक्त अंग्रेजी साहित्य


अंग्रेजी साहित्य के प्राचीन एवं अर्वाचीन काल कई आयामों में विभक्त किए जा सकते हैं। यह विभाजन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए किया जाता है; इससे अंग्रेजी साहित्य प्रवाह को अक्षुण्णता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। प्राचीन युग के अंग्रेजी साहित्य के तीन स्पष्ट आयाम है: ऐंग्लो-सैक्सन; नार्मन विजय से चॉसर तक; चॉसर से पुनर्जागरण काल तक। इंग्लैंड में बसने के समय ऐंग्लो-सैक्सन कबीले बर्बरता और सभ्यता के बीच की स्थिति में थे। आखेट, समुद्र और युद्ध के अतिरिक्त उन्हे कृषि जीवन का भी अनुभव था। अपने साथ वे अपने वीरों की कथाएँ भी लेते आए। ट्यूटन जाति के सारे कबीलों में ये कथाएँ सामान्य रूप से प्रचलित थीं। वे देशों की सीमाओं में नहीं बँधी थीं। इन्हीं भाषाओं से सातवीं शताब्दी में कविता के रूप में अंग्रेजी साहित्य का प्रारंभ हुआ। इसलिए डब्ल्यू.पी. कर के शब्दों में ऐंग्लो-सैक्सन साहित्य पुरानी दुनिया का साहित्य है। लेकिन इस समय तक ऐंग्लो-सैक्सन लोग ईसाई बन चुके थे। इन भाषाओं के रचयिता भी आम तौर से पुरोहित हुआ करते थे। इसलिए इन भाषाओं में वर्णित शौर्य और पराक्रम पर धार्मिक रहस्य, विनय, करुणा, सेवा इत्यादि के भाव भी आरोपित हुए। ऐंग्लो-सैक्सन कविता का शुद्ध धर्मविषयक अंश भी इन गाथाओं के रूप से प्रभावित है
इन गाथाओं में शौर्य के साथ शैली का भी अतिरंजन है। ऐंग्लो-सैक्सन भाषा काफी अनगढ़ थी। गाथाओं में कवि उसे अत्यंत कृत्रिम बना देते थे। छंद के आनुप्रासिक आधार के कारण भरती के शब्दों का आ जाना अनिवार्य था। मुखर व्यंजनों की प्रचुरता से संगीत या लय में कठोरता है। विषयों और शैली को संकीर्णंता के बीच अंग्रेजी कविता का विकास असंभव था। नार्मन विजय के बाद इसका ऐसा कायाकल्प हुआ कि अनेक विद्वानों ने इसमें और बाद की कविता में वंशगत संबंध जोड़ना अनुचित कहा है।
दूसरी ओर अंग्रेजी गद्य में, जिसका उदय कविता के बाद हुआ, विकास की क्रमिक और अटूट परंपरा है। ईसाई संसार की भाषा लातीनी थी और इस काल का प्रसिद्ध गद्य लेखक बीड इसी भाषा में लिखता था। ऐंग्लो-सैक्सन में गद्य का प्रारंभ अलफ्रेड के जमाने में लातीनी के अनुवादों तथा उपदेशों और वार्ताओं की रचना से हुआ। गद्य की रचना शिक्षा और ज्ञान के लिए हुई थी। इसलिए इसमें ऐंग्लो-सैक्सन कविता की कृत्रिमता और अन्य शैलीगत दोष नहीं हैं। उनकी भाषा लोकभाषा के अधिक समीप थी। ऐंग्लो-सैक्सन कविता की तरह बाद वाले युगों में उसका संबंध विच्छेद करना असंभव है। लेकिन इस युग के पूरे साहित्य में लालित्य का अभाव है
चॉसर पूर्व मध्यदेशीय अंग्रेजी काल न केवल इंग्लैंड में ही बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी फ्रांस के साहित्यिक नेतृत्व का काल है। 12वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक फ्रांस ने इन देशों को विचार, संस्कृति, कल्पना, कथाएँ और कविता के रूप दिए। धर्मयुद्धों के इस युग में सारे ईसाई देशों को बौद्धिक एकता स्थापित हुई। यह सामंती व्यवस्था तता शौर्य और औदार्य की केंद्रीय मान्यताओं के विकास का युग है। नारी के प्रति प्रेम और पूजाभाव, साहस और पराक्रम, धर्म के लिए प्राणोत्सर्ग, असहायों के प्रति करुणा, विनय आदि ईसाई नाइटों (सूरमाओं) के जीवन के अभिन्न अंग माने गए। इसी समय फ्रांस के चारणों ने प्राचीनकालीन पराक्रम गाथाओं (chanson dageste) और प्रेम गीतों की रचना की, तथा लातीनी, ट्यूटनों, केल्टी, आयरी, कार्नी और फ्रेंच गाथाओं का व्यापक उपयोग हुआ। फ्रांस की गाथाओं में कर्म की, ब्रिटेन की गाथाओं में भावुकता और श्रृंगार की ओर लातीनी गाथाओं में इन सभी तत्वों की प्रधानता थी। साहित्य में कोमलता, माधुर्य और गीतों पर जोर दिया जाने लगा।
इस युग में अंग्रेजी भाषा ने अपना रूप संवारा। उसमें रोमांस भाषाओं, विशेषत; फ्रेंच के शब्द आए, उसने कविता में कर्णकटु आनुप्रासिक छंद रचना की जगह तुर्कों को अपनाया, उसके विषय व्यापक हुए-संक्षेप में, उसने चॉसर युग की पूर्वपीठिका तैयार की।
गद्य के लिए भाषा के मँजे-मँजाए और स्थिर रूप की आवश्यकता होती है। पुरानी अंग्रेजी के रूप में विघटन के कारण इस युग का गद्य पुराने गद्य जैसा संतुलित और स्वस्थ नहीं है। लेकिन रूपगत अस्थिरता के बावजूद इस युग के धार्मिक और रोमानी गद्य में विचारों की दृष्टि से ऐंग्लो-सैक्सन गद्य की परंपरा को विकसित किया।
चॉसर ने इस युग की काव्य परंपरा को आधुनिक युग से समन्वित किया। उसने फ्रेंच कविता से लालित्य और इटली की समकालीन कविता से ‘आधुनिक बोध’ लिया। कविता में यथार्थवाद को जन्म देकर उसने अंग्रेजी कविता को यूरोप की कविता से भी आगे कर दिया। इसलिए उसे समझने के लिए पुरानी ऐंग्लो-सैक्सन दुनिया और उसकी कविता की जगह मध्ययुगीन फ्रांस और आधुनिक इटली की साहित्यिक हलचल को जान लेना जरूरी है। उसके बाद और एलिजाबेथ युग से पहले कोई बड़ा कवि नहीं हुआ।
इस युग में लातीनी और फ्रेंच साहित्य के अनुवादों और मौलिक रचनाओं के माध्यम से गद्य का रूप निखर चला। लेखकों ने लातीनी और फ्रेंच गद्य की वाक्य रचना और लय को अंग्रेजी रूप में उतारा। 1350 में अंग्रेजी को राजभाषा का सम्मान मिला और धर्म के घेरे को तोड़कर गद्य का रूप आम लोगों की ओर हुआ। गद्य ने विज्ञान, दर्शन, धर्म, इतिहास, राजनीति, कथा और यात्रा वर्णन के द्वारा विविधता प्राप्त की। 15वीं शताब्दी के अंत तक आते-आते मैंडेविल, चॉसर, विकलिफ, फार्टेस्क्यू, कैक्स्टन और मैलोरी जैसे प्रसिद्ध गद्य निर्माताओं ने अंग्रेजी गद्य की नींव मजबूत बना दी।
15वीं शताब्दी अंग्रेजी नाटक का शैशव काल है। धर्मोपदेश और सदाचार शिक्षा की आवश्यकता, नगरों के विकास और शक्तिशाली श्रेणियों (शिल्ड) के उदय के साथ नाटक गिरजाघर के प्राचीरों से निकलकर जनपथ पर आ खड़ा हुआ। इन नाटकों का संबंध बाइबिल की कथाओं (मिस्ट्रीज़), कुमारी मेरी और संतों की जीवनियों (मिरैकिल्स), सदाचार (मोरैलिटीज़) और मनोरंजक प्रहसनों (इंटरल्यूड्स) से है। धर्म के संकुचित क्षेत्र में रहने वाले और रूप में अनगढ़ इन नाटकों को एलिज़ाबेथ युग के महान नाटकों का पूर्वज कहा जा सकता है।
विचारों और कल्पना के अविराम मंथन, विधाओं में प्रयोगों की विविधता और कृतित्व की प्रौढ़ता की दृष्टि से पुनर्जागरण काल अंग्रेजी साहित्य का स्वर्ण युग है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह युग आधि भौतिकता के विरुद्ध भौतिकता, मध्ययुगीन सामंती अंकुशों के विरुद्ध मननशील व्यक्तिवाद, अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान के संघर्ष का युग है। पुनर्जागरण ने इंग्लैंड को इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के काफी बाद आंदोलित किया। 1500 से 1580 तक का समय मानवतावाद के विकास और प्राचीन यूनान तथा इटली के साहित्यिक आदर्शों को आत्मसात करने का है। लेकिन 1580 और 1660 के बीच कविता, नाटक और गद्य में अद्भुत उत्कर्ष हुआ। 1580 के पूर्व महान व्यक्तित्व केवल चॉसर का है। 1580 के बाद स्पेंसर, शेक्सपियर, बेकन और मिल्टन की महान प्रतिभाओं से कुछ ही नीचे स्तर पर नाटक में मार्लो, बेन जॉन्सन और बेब्स्टर, गद्य में हूकर, बर्टेन और टॉमस ब्राउन, कविता में बेन जॉन्सन और डन हैं। शैली और वस्तु में चित्र-विचित्रता की दृष्टि से नाटकों में लिली, पील और ग्रीन की ‘दरबारी कामेडी’, शेक्सपियर की ‘रोमानी कामेडी’, बोमांट और फ्लेचर की ‘ट्रैजी कामेडी’ और बेन जॉन्सन की ‘यथार्थवादी कामेडी’, कविता में अनेक कवियों के प्रेम संबंधों कथाबद्ध सॉनेट, स्पेंसर की रोमानी कविता, डन और अन्य आध्यात्मिक (मेटाफिजिकल) कवियों की दुरूह कल्पनापूर्ण कविताएँ, बेन जॉन्सन और दरबारी कवियों के प्रांजल गीत तथा मिल्टन के भव्य और उदात्त महाकाव्य, गद्य में इटली और स्पेन से प्रभावित लिलो और सिडनी को अलंकृत शैली की रोमानी कथाएँ तथा नैश और डेलोनी के साहसिकतापूर्ण यथार्थवादी उपन्यास, बेकन के निबंध (एसे), बाइबिल का महान अनुवाद, बर्टन का मनोवैज्ञानिक, सूक्ष्म किंतु सुहृद सा अंतरंग गद्य, सिडनी और बेन जॉन्सन की गद्य आलोचनाएँ, मिल्टन का ओजपूर्ण और आक्रोशपूर्ण प्रलंबित वाक्यों का भव्य गद्य, टॉमस ब्राउन का चिंतनपूर्ण किंतु संगीत तरल गद्य इस युग की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मानव बुद्धि और कल्पना की तरह ही यह युग अभिव्यक्ति के महत्वाकांक्षी प्रसार का युग है।
1660 और 1700 ई. के अंत के बीच वाले वर्ष बुद्धिवाद के अंकुरण के हैं। परंतु पुनर्जागरण का प्रभाव शेष रहता है; उसके अंतिम और महान कवि मिल्टन के महाकाव्य 1660 के बाद ही लिखे गए; स्वयं ड्राइडन में मानवतावादी प्रवृत्तियाँ हैं। लेकिन एक नया मोड़ सामने है। बुद्धिवाद के अतिरिक्त यह चार्ल्स द्वितीय के पुनर्राज्यारोहण के बाद फ्रेंच रीतिवाद के उदय का युग है। फ्रेंच रीतिवाद तथा ‘प्रेम और सम्मान’ (लव ऐंड ऑनर) के दरबारी मूल्यों से प्रभावित इस युग का नाटक अनुभूति और अभिव्यक्ति में निर्जीव है। दूसरी ओर मध्यवर्गीय यथार्थवाद से प्रभावित विकर्ली और कांग्रोव के सामाजिक प्रहसन अपनी सजीवता, परिष्कृत किंतु पैनी भाषा और तीखे व्यंग्य में अद्वितीय है। ऊँचे मध्यवर्ग के यांत्रिक बुद्धिवाद और अनैतिकता के विरूद्ध निम्न मध्यवर्गीय नैतिकता और आदर्श का प्रतीक जॉन वन्यन का रूपक उपन्यास ‘दि पिल्ग्रिम्स प्रोसेस’ है। आलोचना में रीतिवाद का प्रभाव शेक्सपियर के रोमानी नाटकों के विरूद्ध राइमर की आलोचना से स्पष्ट है। उस युग की सबसे महत्वपूर्ण आलोचनाकृति मानवतावादी स्वतंत्रता और रीतिवाद के समन्वय पर आधारित ड्राइडन का नाटक-काव्य-संबंधी निबंध है। वर्णन में यथार्थवादी गद्य के विकास में सैमुएल पेपीज़ की डायरी की भूमिका भी स्मरणीय है। संक्षेप में, 17वीं शताब्दी के इन अंतिम वर्षों के गद्य और पद्य में स्वच्छता और संतुलन है, लेकिन कुल मिलाकर यह महत्ता-विरल-युग है।
रीतिवादी युग–यह शताब्दी तर्क और रीति का उत्कर्षकाल है। लायबनीज़, दकार्त और न्यूटन ने कार्य कारण की पद्धति द्वारा तर्कवाद और यांत्रिक भौतिकवाद का विकास किया था। उनके अनुसार सृष्टि और मनुष्य नियमानुशासित थे। इस दृष्टिकोण में व्यक्तिगत रुचि के प्रदर्शन के लिए कम जगह थी। इस युग पर हावी फ्रैंच रीतिकारों ने भी साहित्यिक प्रक्रिया को रीतिबद्ध कर दिया था।
इस युग ने धर्म की जगह रखा और मनुष्य के साधारण सामाजिक जीवन, राजनीति, व्यावहारिक नैतिकता इत्यादि पर जोर दिया। इसलिए इसका साहित्य काम की बात का साहित्य है। इस युग ने बात को साफ-सुथरे, सीधे, नपे-तुले, पैने शब्दों में कहना अधिक पसंद किया। कविता में यह पोप और प्रायर के व्यंग्य का युग है।
तर्क की प्रधानता के कारण 18वीं शताब्दी को गद्ययुग कहा जाता है। सचमुच यह आधुनिक गद्य के विकास का युग है। दलगत संघर्षों, कॉफीहाउसों और क्लबों में अपनी शक्ति के प्रति जागरूक मध्यवर्ग की नैतिकता ने इस युग में पत्रकारिता को जन्म दिया। साहित्य और पत्रकारिता के समन्वय में एडिसन, स्टील, डिफो, स्विफ्ट, फील्डिंग, स्मालेट, जॉनसन और गोल्डस्मिथ की शैली का निर्माण किया। इससे कविता के व्यामोह से मुक्त, रचना के नियमों में दृढ़, बातचीत की आत्मीयता लिए हुए छोटे-छोटे वाक्यों के प्रवाहमय गद्य का जन्म हुआ। जहर में बुझे तीर की तरह स्विफ्ट के गद्य को छोड़कर अधिकांश लेखकों में व्यंग्य की उदार शैली है।
आलोचना में पहली बार चॉसर, स्पेंसर, शेक्सपियर, मिल्टन इत्यादि को विवेक की कसौटी पर कसा गया। रीति और तर्क की पद्धति रोमैंटिक साहित्यकारों के प्रति अनुदार हो जाया करती थी, लेकिन आज भी एडिसन, पोप और जॉन्सन की आलोचनाओं का महत्व है। गद्य में शैली की अनेकरूपता की दृष्टि से इस युग ने ललित पत्रलेखन में चेस्टरफील्ड और वालपोल, संस्मरणों में गिबन, फैनी बर्नी और बॉज़वेल, इतिहास में गिबन, दर्शन में बर्कले और ह्यूम, राजनीति में बर्क और धर्म में बटलर जैसे शैलीकार पैदा हुए
यथार्थवादी दृष्टिकोण के विकास ने आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासों की चार प्रसिद्ध धुरियाँ दीं डिफो, रिचर्ड्सन, फोल्डिंग और स्मॉलेट। उपन्यास में यही युग स्विफ्ट, स्टर्न और गोल्डस्मिथ का भी है। अंग्रेजी कथा साहित्य को यथार्थवाद ने ही, गोल्डस्मिथ और शेरिडन के माध्यम से, कृत्रिम भावुकता के दलदल से उबारा। किंतु यह युग मध्यवर्गीय भावुक नैतिकता से भी अछूता न था। इसके स्पष्ट लक्षण भावुक कामेडी और स्टर्न, रिचर्ड्सन इत्यादि के उपन्यासों में मौजूद है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में रोमैंटिक कविता की जमीन तैयार थी। ब्लेक और बर्न्स इस युग की स्थिरता में आँधी की तरह आए।
रोमैंटिक युग–पुनर्जागरण के बाद रोमैंटिक युग में फिर व्यक्ति की आत्मा का उन्मेषपूर्ण और उल्लसित स्वर सुन पड़ता है। प्राय: रोमैंटिक साहित्य को रीतियुग (क्लासिसिज़्म) की प्रतिक्रिया कहा जाता है और उसकी विशेषताओं का इस प्रकार उल्लेख किया जाता है- तर्क की जगह सहज गीतिमय अनुभूति और कल्पना; अभिव्यक्ति में साधारणीकरण की जगह व्यक्ति निष्ठता; नगरों के कृत्रिम जीवन से प्रकृति और एकांत की ओर मुड़ना; स्थूलता की जगह सूक्ष्म आदर्श और स्वप्न; मध्ययुग और प्राचीन इतिहास का आकर्षण; मनुष्य में आस्था; ललित भाषा की जगह साधारण भाषा का प्रयोग; इत्यादि। निश्चय ही इनमें से अनेक तत्व रोमानी कवियों में मिलते हैं, लेकिन उनकी महान् सांस्कृतिक भूमिका को समझने के लिए आवश्यक है कि 19वीं शताब्दी में जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली, इंग्लैंड, रूस और पोलैंड में जनवादी विचारों के उभार को ध्यान में रखा जाए। इस उभार ने सामाजिक और साहित्यिक रूढ़ियों के विरुद्ध व्यक्ति स्वातंत्र्य का नारा लगाया। रूसी और फ्रांसीसी क्रांति उसकी केंद्रीय प्रेरणा थे। इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के कवि-- वर्ड्स्वर्थ, कोलरिज, शेली, कीट्स, और बायरन—इसी नए उन्मेष के कवि हैं। लैंब, हंट और हैज़लिट के निबंधों, कीट्स के प्रेमपत्रों, स्कॉट के उपन्यासों, डी क्विंसी के ‘कन्फेशंस ऑव ऐन ओपियम’ ईटर में गद्य की भी अनुभूति, कल्पना और अभिव्यक्ति का वही उल्लास प्राप्त हुआ। आलोचना में कोलरिज, लैंब, हैज़लिट और डी क्विंसी ने रीति से मुक्त होकर शेक्सपियर और उसके चरित्रों की आत्मा का उद्घाटन किया। लेकिन व्यक्तित्व आरोपित करने के स्वभाव ने नाटक के विकास में बाधा पहुँचाई।
विक्टोरिया के युग में जहाँ एक ओर जनवादी विचारों और विज्ञान का अटूट विकास हो रहा था, वहाँ अभिजात वर्ग क्रांतिभीरु भी हो उठा। इसलिए इस युग में कुछ साहित्यकारों में यदि स्वस्थ सामाजिक चेतना है तो कुछ में निराशा, संशय, अनास्था, समन्वय, कलावाद, वायवी आशावाद की प्रवृत्तियाँ भी हैं। व्यक्तिवाद शताब्दी के अंतिम दशक तक पहुँचते-पहुँचते कैथालिक धर्म, रहस्यवाद, आत्मरति या आत्मपीड़न में इस तरह लिप्त हो गया कि इस दशक को खल दशक भी कहते हैं। जनवादी, यथार्थवादी और वैज्ञानिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व मॉरिस ने कविता में, रस्किन ने गद्य में और ब्रांटे बहनों, थैकरे, डिकेन्स, किंग्सली, रीड, जॉर्ज इलियट, टॉमस हार्डी, बटलर आदि ने उपन्यास में किया। निराशा और पीड़ा के बीच में इनमें मानव के प्रति गहरी सहानुभूति और विश्वास है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में विक्टोरिया युग के रिक्त आदर्शों के विरुद्ध अनेक स्वर उठने लगे थे।
19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के उभरते हुए अंतर्विरोध 20वीं शताब्दी में संकट की स्थिति में पहुँच गए। यह इस शताब्दी के साहित्य का केंद्रीय तथ्य है। इस शताब्दी के साहित्य को समझने के लिए उसके विचारों, भावों और रूपों को प्रभावित करने वाली शक्तियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। वे शक्तियाँ हैं नीत्शे, शॉपेनआवर, स्पिनोज़ा, कर्कगार्ड, फ्रायड और मार्क्स; इब्सन, चेखव, फ्रेंच अभिव्यंजनावादी और प्रतीकवादी, गोर्की, सार्त्र और इलियट; दो हो चुके युद्ध और तीसरे की आशंका, फासिज्म, रूस की समाजवादी क्रांति, गए देशों में समाजवाद की स्थापना और पराधीन देशों के स्वातंत्र्य संग्राम; प्रकृति पर विज्ञान की विजय से सामाजिक विकास की अमित संभावनाएँ और उनके साथ व्यक्ति की संगति की समस्या।
20वीं शताब्दी में व्यक्तिवादी आदर्श का विघटन तेजी से हुआ है। शा, वेल्स और गार्ल्सवर्दी ने शताब्दी के प्रारंभ में विक्टोरिया युग के व्यक्तिवादी आदर्शों के प्रति संदेह प्रकट किया और सामाजिक समाधानों पर जोर दिया। हार्डी की कविता में भी उसके विघटन का चित्र है। लेकिन किसी तरह पहले युद्ध के पहले कविता ने विक्टोरिया युग के पैस्टरल आदर्शों को जीवित रखा। जो युद्धों में व्यक्तिवाद समाज से बिल्कुल टूटकर अ्लग हो गया। अपनी ही सीमाओं में संकुचित साहित्यिक ने प्रयोगों का सहारा लिया। टी.एस. इलियट के ‘वेस्टलैंड’में व्यक्ति की कुंठा और दीक्षागम्य कविता का जन्म हुआ और आज भी व्यक्तिवाद से प्रभावित अंग्रेजी कवि उसका नेतृत्व स्वीकार करते हैं। 1930 के बाद मार्क्सवादी विचारधारा और स्पेन के गृहयुद्ध ने अंग्रेजी कविता की नई स्फूर्ति दी। लेकिन दूसरे युद्ध के बाद तीव्र सामाजिक संघर्षों के बीच इस काल के अनेक कवि फिर व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के उपासक हो गए। साथ ही, ऐसे कवियों का भी उदय हुआ जो अपनी व्यक्तिगत मानसिक उलझनों के बावजूद युग की मानव आस्था को व्यक्त करते रहे।
आदर्शवाद के टूटने के साथ ही उपन्यासों में व्यक्ति की मानसिक गुत्थियों, विशेषत: यौन कुंठाओं के विरुद्ध भी आवाज उठी। लॉरेंस, जेम्स, ज्वॉयस और वर्जीनिया वुल्फ इसी धारा की प्रतिनिधि हैं। नाटकों के क्षेत्र में भी यथार्थवादी प्रवृत्तियों का विकास हुआ है। नाटकों में काव्य और रोमानी क्रांतिकारी विचारों को व्यक्त करने में सबसे अधिक सफलता अंग्रेजी में लिखने वाले आयरलैंड के नाटककारों को मिली है। आलोचना में शोध से लेकर व्याख्या तक का बहुत बड़ा कार्य हुआ। प्रयोगवादी साहित्यकारों के प्रधान शिक्षक टी.एस. इलियट, रिचर्डर््स, एम्पसन और लिविस है। इन्होंने जीवन के मूल्यों से अधिक महत्व कविता की रचना प्रक्रिया को दिया है। साधारणत: कहा जा सकता है कि 20वीं शताब्दी के साहित्य में विचारों की दृष्टि से चिंता, भय और दिशाहीनता की और रूप की दृष्टि से विघटन की प्रधानता है। उसमें स्वस्थ तत्व भी है और उन्हीं पर उसका आगे का विकास निर्भर है। (विकीपीडिया से साभार)

सुरेन्द्र प्रताप सिंह के प्रतिमान


बलराम

बांकेबिहारी भटनागर अथवा चंद्रगुप्त विद्यालंकार के बारे में तो दूर, सुरेंद्रप्रताप सिंह और उदयन शर्मा तक के बारे में पूछा जाए तो युवा पत्रकार बगलें झांकने लगते हैं, जबकि सुरेंद्रप्रताप सिंह द्वारा शुरू किया गया आधे घंटे का कार्यक्रम आज तक अब टीवी चैनल बन चुका है। सुरेंद्रप्रताप सिंह सुलझे हुए इंसान, विचारवान व्यक्ति और लोकप्रिय पत्रकार होने के साथ-साथ अनेक समाचार संस्थानों के बडे बैनरों का रुतबा भी रखते थे। इसके बावजूद उनके लिखे लेखों को पढना-जानना तो दूर, अब कोई उनकी बात तक नहीं करता। ऐसे में अनुराधा द्वारा संपादित पत्रकारिता का महानायक सुरेंद्रप्रताप सिंह के रूप में सुरेंद्रप्रताप सिंह की कलम से लिखी गई रचनाएं पुस्तक रूप में पहली बार पाठकों के सामने पहुंची हैं। साढे चार सौ पृष्ठों के संयोजन-संपादन की इस कोशिश के लिए अनुराधा की प्रशंसा होनी चाहिए।
अनुराधा ने लिखा है- ..तो ये थीं खबरें आज तक, इंतजार कीजिए कल तक। 90 के दशक के टीवी दर्शकों को यह जुमला अब तक याद होगा, लेकिन इसे बोलने वाले सुरेंद्रप्रताप सिंह का नाम हर किसी को शायद याद न हो। आज तक के अलावा युवाओं में सुरेंद्रप्रताप सिंह का कोई और परिचय कम ही है, लेकिन पत्रकारिता जगत के लोग जानते हैं कि एसपी के नाम से मशहूर सुरेंद्रप्रताप सिंह ने प्रिंट और टेलीविजन, दोनों ही माध्यमों में पत्रकारिता के नए प्रतिमान गढे और नई परंपराएं शुरू कीं। जन पक्षधरता और राजनीति की पैनी समझ उनकी अभिव्यक्ति को धारदार बनाती थी। खबर के पीछे की खबर को सूंघ लेने की उनकी काबिलियत ने उन्हें अपने समकालीनों से एकदम अलग खडा कर दिया था। अखबार के किसी कोने की सिंगल कॉलम खबर को कवर स्टोरी बना देने की उनकी जैसी हिम्मत और प्रतिभा हर किसी में नहीं होती।

एसपी के महत्वपूर्ण लेखन को इस पुस्तक में अनुराधा ने कालखंड में नहीं, विषयों में बांटा है। जब भी एसपी सिंह किसी अखबार या चैनल के प्रमुख रहे, तब उन्होंने या तो नहीं लिखा या फिर बहुत कम लिखा। जब एसपी सिंह रविवार के कर्ता-धर्ता रहे, तब उन्होंने सबसे कम लिखा। कहा जा सकता है कि एसपी रविवार में खुद नहीं लिखते थे, लेकिन वे जिस तरह से लोगों तक बात पहुंचाना चाहते थे, वह काम पूरी पत्रिका करती थी। नवभारत टाइम्स छोडने के बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में उन्होंने काफी लिखा और कुछ मुद्दों पर पक्ष लेकर सिलसिलेवार भी लिखा। इस संचयन में सभी मुद्दों पर एसपी बिना किसी लाग-लपेट के सत्य और न्याय के पक्ष में खडे दिखते हैं। एसपी की यह निरंतरता कभी टूटी नहीं। कांग्रेस विरोध उनके लेखन में निरंतर रहा। वे देश भर में चल रहे जनांदोलनों के पक्षधर के रूप में सामने आए थे। भ्रष्टाचार को लेकर हमेशा सख्त रहे। छद्म और अनावश्यक महिमामंडन से परहेज किया।

अनुराधा के अनुसार, सवाल पूछने और संदेह करने के पत्रकारीय धर्म के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कभी कमजोर नहीं पडी। माध्यम बदलकर टेलीविजन में काम करते हुए दूरदर्शन जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म पर सेंसर से बंधे होने के बावजूद आज तक की छवि कभी सरकारी नहीं बनी, तो इसका श्रेय एसपी को ही जाता है। दूरदर्शन पर बाहरी कार्यक्रमों की अनिवार्य स्क्रीनिंग और जरूरत पडने पर सेंसरिंग भी होती है, मगर एसपी आधे घंटे के आज तक कार्यक्रम के टेप प्रसारण से पहले स्वीकृति के लिए इतनी देर से दूरदर्शन को भेजते थे कि उसे सेंसर करना संभव नहीं हो पाता था। समय पर टेप न भेजने पर दूरदर्शन के अधिकारी कार्यक्रम प्रसारित न करने का निर्णय ले सकते थे, लेकिन जोखिम उठाने की वजह से ही तो एसपी, एसपी थे। एसपी के लेखों के इस संचयन को अनुराधा ने आठ हिस्सों में बांटा है।

पहला हिस्सा सामाजिक न्याय है। 1990 के मध्य में वीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने की घोषणा कर दी तो विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली। ऐसे समय में एसपी ने लिखा था कि इन तात्कालिक भावनात्मक मुद्दों से लोगों को बहलाने वाले राजनीतिज्ञ आम जन की बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता तथा आर्थिक पिछडेपन जैसे मुद्दों पर असंतोष की भाषा नहीं पढ पा रहे हैं। इसलिए दोनों ही विचारधाराओं के सहारे वे लंबे समय तक सत्ता में नहीं रह सकते। इस संदर्भ में एसपी का अनुमान एकदम सही निकला। पुस्तक का अगला खंड राजनीति है। महंगाई, अर्थनीति तथा अर्थव्यवस्था पर उनके उपलब्ध आलेख अर्थनीति खंड में हैं। देश और राज्यों में चल रहे कुशासन पर केंद्रित लेख राजकाज भ्रष्टाचार खंड में हैं, तो कश्मीर की उलझनों पर केंद्रित लेख कश्मीर खंड में। पत्रकारिता के व्यवसाय और विचार में अपने समय से आगे रहे एसपी के विचार अनुराधा ने पत्रकारिता खंड में संग्रहीत किए हैं।

एसपी ने अपने को हिंदी की पत्रकारिता के तथाकथित पतन के निरर्थक विलाप से हमेशा अलग रखा। पत्रकारिता की भाषा और तरीके में आ रहे बदलावों पर उनकी सोच सकारात्मक रही। हिंदी साहित्य की पढाई करने के बावजूद एसपी भाषा के मामले में उदार थे। भाषा को राष्ट्रीय अस्मिता से जोडने की महीन राजनीति करने वालों को उन्होंने अपने लेखन में लगातार आडे हाथों लिया। उन्होंने उस समय विकसित हो रही अखबारी और मीडिया भाषा को नई दिशा दी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों भाषाओं के जानकार एसपी ने अपनी ज्यादातर पत्रकारिता हिंदी में की और अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी पत्रकारिता को दोयम दर्जे की मानने के विचार को तथ्यों और तर्को के साथ हमेशा नकारा। वे अंग्रेजी के भी लोकप्रिय पत्रकार और कॉलम राइटर बने।

इकोनॉमिक टाइम्स तथा बिजनेस स्टैंडर्ड में उनके नियमित स्तंभ छपते थे तो बिजनेस स्टैंडर्ड और टेलीग्राफ में वे वरिष्ठ संपादकीय पदों पर रहे। हिंदी की तरह उनके अंग्रेजी लेखन का भी संचयन छपना चाहिए, ताकि एसपी का अंग्रेजी पत्रकार रूप भी सामने आ सके। पार जैसी कुछ फिल्मों की पटकथाएं भी एसपी ने लिखी थीं। अनुराधा लिखती हैं कि एसपी सिंह टेलीविजन पत्रकारिता के शुरुआती लोगों में तो थे ही, वे कई अर्थो में टीवी पत्रकारिता के पायनियर भी थे।

हिंदी में टीवी समाचार की भाषा, विषय, प्रस्तुतीकरण और स्टाइल को महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुंचाने में एसपी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। आज तक उनकी समग्र अभिव्यक्ति का मंच बना। वे खुद रिपोर्टिग भले ही न करते रहे हों, लेकिन आज तक की हर स्टोरी में आइडिया से लेकर ट्रीटमेंट, स्क्रिप्ट, भाषा और अंतत: प्रस्तुतीकरण तक सभी में उनकी छाप रहती थी। कुल मिलाकर अनुराधा ने नई पीढी को एसपी सिंह के जीवन, कामों, सरोकारों और लेखन से परिचित कराने का जो काम शुरू किया है, उसे अगले मुकाम तक भी पहुंचना चाहिए, ताकि अच्छी पत्रकारिता के जो प्रतिमान सुरेंद्रप्रताप सिंह ने कायम किए, वे हमारे सामने बने रह सकें और नई पीढी उनसे भी आगे के प्रतिमान कायम कर सके।

सर्गेय इवानोविच चुप्रीनिन


साहित्यविद, आलोचक, टीकाकार और उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के लेखकों की रचनाओं के संकलनकर्ता और संस्कृति के वाहक सेर्गेय चुप्रीनिन का जन्म १९४७ में अर्खान्गेल्स्क प्रदेश के वेल्स्क नगर में हुआ। १९७१ में रस्तोफ विश्वविद्यालय के भाषा संकाय से एम.ए. करने के बाद इन्होंने सोवियत विज्ञान अकादमी के विश्व साहित्य संस्थान से १९७६ में पीएच.डी. की और फिर १९९३ में भाषाशास्त्र में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। १९९९ से सेर्गेय चुप्रीनिन प्रोफेसर हैं।
दिसंबर १९९३ से चुप्रीनिन 'ज़्नामया' (परचम) नामक साहित्यिक पत्रिका के संपादक हैं। इसके साथ-साथ ने गोर्की साहित्य संस्थान में तत्याना बेक के साथ मिलकर सन २००५ तक नए कवियों के लिए कविता के सेमिनार आयोजित करते रहे। १९६९ से सर्गेय चुप्रीनिन के आलोचनात्मक लेख केंद्रीय पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। अलेक्सांदर कुप्रीन, निकालाय उस्पेन्स्की, प्योत्र बबरीकिन, व्लास दराशेविच और निकालाय गुमिल्योफ जैसे लेखकों की रचनावलियों के टीकाकार और संकलनकर्ता के रूप में भी सेर्गेय चुप्रीनिन ने काफी नाम कमाया है।
'सुनो साथियो, वारिसो!... रूसी सोवियत जनकविता' (१९८७), 'रूसी लेखकों की रचनाओं में बीसवीं शताब्दी के शुरू का मास्को' (१९८८), '१९५३ से १९५६ के बीच सोवियत रूसी साहित्य की रचनाएँ' (१९८९) भी इनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं। इनकी अन्य पुस्तकें हैं- 'आलोचना तो आलोचना है' (१९८८), 'नया रूस और साहित्य की दुनिया' (२००३) और 'आज का रूसी साहित्य- एक मार्गदर्शिका' (२००७)। सेर्गेय चुप्रीनिन की रचनाएँ अंग्रेज़ी, बल्गारी, डच, चीनी, जर्मन, पोलिश, फ्रांसिसी और चेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। सेर्गेय चुप्रीनिन रूसी पेन सेंटर के सदस्य हैं और बहुत से पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा वे स्वयं भी कई पुरस्कारों के संयोजक और उनके निर्णायक मंडलों में शामिल हैं।

हिंदी कहानी का 113 साल का सफर


राजेन्द्र राव

अगर यह मान लिया जाए कि माधव राव सप्रे की 'टोकरी भर मिट्टी' हिंदी में प्रकाशित पहली कहानी थी तो कुल 113 साल का सफर बनता है इस लोकप्रिय विधा का जिसे 'हिंदी की क्लासिक कहानियां' ग्रंथावली के छह खंडों में निरूपित किया है प्रख्यात आलोचक और शोधकर्ता डा. पुष्पपाल सिंह ने। प्रथम खंड 'धरोहर' में हिंदी कहानी के शैशव काल से लेकर 1920 तक प्रकाशित माधव राव सप्रे, रामचंद्र शुक्ल, बंग महिला, जयशंकर प्रसाद, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और प्रेमचंद जैसे इतिहास निर्माताओं की 25 कहानियां हैं। दूसरे भाग 'प्रेमचंद-प्रसाद समय' में 1921 से 1950 तक के कालखंड की 24 चुनी हुई और चर्चित रचनाएं हैं जिनमें अपने पूर्णोदय काल के प्रेमचंद और प्रसाद के साथ जैनेंद्र, यशपाल, अश्क, निराला, अज्ञेय, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव और उग्र जैसे आधुनिक कहानी के शिल्पी उपस्थित हैं। तीसरे खंड में 1951 से 1965 तक के 'नयी कहानी युग' को कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, अमरकांत, राजेन्द्र यादव, कृष्णा सोबती, रेणु, धर्मवीर भारती और शैलेश मटियानी आदि की प्रतिनिधि कथाओं के माध्यम से चित्रित किया गया है।
1965 से बीसवीं सदी के अवसान तक के भाग को 'समकालीन कहानी समय' शीर्षक से प्रस्तुत किया गया है जिसमें लगभग सभी समकालीन महत्वपूर्ण कथाकार शामिल हैं-ज्ञानरंजन और गिरिराज किशोर से लेकर उदय प्रकाश, संजीव और अखिलेश तक। कमलेश्वर, महीप सिंह हैं तो रमेशचंद्र शाह भी। एक खंड 'महिला कथाकार' (1965 से अद्यतन) पूरी तरह महिलाओं को समर्पित है जिसमें सुधा अरोड़ा-ममता कालिया-चित्रा मुद्गल से लेकर नीलाक्षी सिंह और प्रत्यक्षा तक 20 प्रमुख लेखिकाओं की रचनात्मकता की मनोहर झांकी है।
अंतिम छठे खंड 'नवागत पीढ़ी' में 19 ऐसे युवा कथाकारों की कहानियां हैं जिनका पदार्पण 21वीं शती में हुआ है और आजकल उत्सुकता से पढ़े जा रहे हैं। इनमें अजय नावरिया, कुणाल सिंह, मो. आरिफ, प्रियदर्शन, रणेंद्र, प्रभात रंजन और शशिभूषण द्विवेदी जैसे नाम संकलित हैं। एक संग्रहणीय और ऐतिहासिक महत्व का पठनीय ग्रंथ।
 

'चीन के गोर्की' लु शुन


आधुनिक चीनी साहित्य का आरंभ प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुआ। युद्ध के कारण आथ्रिक ओर राजनीतिक क्षेत्रों में जो परिवर्तन हुए उनसे नैतिकता के मापदंड ही बदल गए, जीवन की गति तीव्र हो गई और जीवन में अधिक पेचीदगी और जटिलता आ गई। इसी समय से चीनी साहित्य में एक प्रगतिशील यथार्थवादी धारा का जन्म हुआ जिससे चीन के तरुण लेखकों को नया साहित्य सर्जन करने की प्रेरणा मिली।
'चीन के गोर्की' लु शुन आधुनिक चीनी साहित्य में मौलिक कहानियों के जन्मदाता कहे जाते हैं। अपनी लेखनी द्वारा उन्होंने सामंती समाज पर करारे प्रहार किए हैं। कला और जीवन का वे घनिष्ट संबंध स्वीकार करते हैं। लु शुन समाज के नग्न और वीभत्स चित्रण से ही संतोष नहीं कर लेते बल्कि समाजवादी यथार्थता के ऊपर आधारित जीवन के वास्तविक लेकिन आस्थापूर्ण चिद्ध भी उन्होंने प्रस्तुत किए हैं। "साबुन की टिकिया" कहानी में पितृभक्ति की परंपरागत भावना पर तीव्र प्रहार किया गया है। "आह क्यू की सच्ची कहानी" लु शुन की दूसरी श्रेष्ठ कृति है जिसमें अपनी "लाज" को बचाने की हीन मनोवृत्ति पर करारा व्यंग्य है। "मनुष्यद्वेषी" कहानी में बुद्धिजीवियों के स्वप्नों पर कठोर आघात है। "मेरा पुराना घर" और "नए वर्ष का बलिदान" कहानियों में ग्रामीण किसानों का हृदयद्रावक चित्रण है। अनेक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक निबंध भी लु शुन ने लिखे हैं।
आधुनिक चीनी साहित्यिक आंदोलन के नेता माओ तुन (जन्म 1896) अनेक यथार्थवादी उपन्यासों और कहानियों के सफल लेखक हैं। सन् 1926 से लेकर 1932 तक इन्होंने "इंद्रधनुष", "एक पंक्ति में तीन" और "सड़क" आदि उपन्यासों की रचना की है। इनका "मध्यरात्रि" उपन्यास चीनी साहित्य की श्रेष्ठतम कृति मानी जाती है। साम्राज्यवादी शोषण के कारण उद्योग धंधों की कमी से चीन किस संकटापन्न अवस्था से गुजर रहा था, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण है। "बसंत के रेशमी कीड़े" और "लिन् परिवार की दूकान" नामक कहानियों से माओ तुन को ख्याति मिली है। लाओ श (जन्म 1897) चीन के दूसरे सुप्रसिद्ध लेखक हैं। इनके "रिक्शावाला" उपन्यास ने अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है। "लाओ लि के प्रेम की खोज" और "खिलाड़ियों का देश" आदि इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। अभी हाल में लाओ श ने "नामरहित पहाड़ी जिसका नाकरण अब हुआ है" नामक उपन्यास लिखा है। तिङ् लिङ् चीन की क्रांतिकारी महिला हैं। सन् 1927 से ही इन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। कोमिंगतांग की पुलिस द्वारा अपने पति हू ये-फिंग की निर्मम हत्य कर दिए जाने पर ये कोमिंगतांग सरकार के विरुद्ध जोर से कमा करने लगीं। देशभक्ति के कारण तिङ् लिङ् को जल की यातनाएँ भी सहनी पड़ीं। इनकी "जल" नामक कहानी में प्रलयकारी बाढ़ को रोकने के लिये किसानों के संघर्ष का सशक्त शैली में चित्रण किया गया है। "जब मैं लाल आकाश गाँव में थी" नामक कहानी में जापानी सिपाहियों के बलात्कार का शिकार बनी एक नवयुवती का सहानुभूतिपूर्ण चित्र प्रस्तुत है। सन् 1950 में तिङ् लिङ् की उत्तर शान्सी पर "वायु और सूर्य" नाम की रचना प्रकाशित हुई। "सांगकान नदी पर सूर्य का प्रकाश" नामक उपन्यास पर इन्हें स्तालिन पुरस्कार दिया गया। इस उपन्यास का विषय भूमिसुधार है जो लेखिका के अनुभव के आधार पर लिखा गया है। पा छिन (जन्म 1904) ने "बसंत", "शरत्" और "दुर्दांत नदी" आदि सफल उपन्यासों की रचना की है। इन रचनाओं में नवयुवकों के विचारों में अंतविंरोधों के सुंदर चित्रण मिलते हैं। यहाँ जगह जगह सामंती व्यवस्था के प्रति घृणा और क्रांतिकारियों के प्रति आदर का भाव व्यक्त किया गया है। पा छिन की सर्वश्रेष्ठ रचना "परिवार" है। यह उनकी बाल्यवस्था अनुभवों पर आधारित है। चाओ शु लि (जन्म 1905) की रचनाओं में किसानों का संघर्ष तथा नए समाज में प्रेम का चित्रण प्रस्तुत है। लेखक ने गाँवों में किसानों की सहकारी संस्थाओं को संगठित करने का अनुभव प्राप्त किया है। चा ओ शु लि की "श्याओ अ हइ का विवाह" और लि यू त्साय् की "तुकांत कविताएँ" नाम की कहानियाँ काफी लोकप्रिय हुई हैं। "लि के गाँव में परिवर्तन" इनका सफल उपन्यास है। अभी हाल में चाओ शु लि का "सानलिवान गाँव" नाम का एक और सुंदर उपन्यास प्रकाशित हुआ है जिससे उन्हें साहित्यिक जगत् में विशेष ख्याति मिली है। चा ओ शु-लि भाषा के धनी हैं, इनकी भाषा सरल और प्रभावोत्पादक है।
अन्य अनेक उपन्यासकार और कहानी लेखक भी चीन में हुए हैं जिन्होंने जनवादी साहित्य का निर्माण कर मानवता के उत्थान में योग दिया है। चाओ मिंग सन् 1932 से ही वामपक्षीय लेखकसंघ की सदस्या रही हैं। लेखिका का "शक्ति का स्त्रोत" उपन्यास उनके कारखानों में काम करने के अनुभवों पर आधारित है। खुंग छ्वये और य्वान् छिंग पति पत्नी हैं, दोनों ने मिलकर "पुत्रियाँ और पुत्र" नामक एक सशक्त उपन्यास लिखा है जिसमें जापानी सेना के खिलाफ किसान गोरिल्लों के युद्ध का प्रभावशाली वर्णन है। चौ लि-पो (जन्म 1908) ने अपनी रचनाओं में भूमिसुधार के चित्र प्रस्तुत किए हैं। "तूफान" नामक उपन्यास पर इन्हें स्तालिन पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। पिघला हुआ इस्पात चौ लि-पो का एक और सुंदर उपन्यास है जो हाल में ही प्रकाशित हुआ है। का ओ यू-पाओ ने सेना में भर्ती होने के बाद अक्षरज्ञान प्राप्त किया था। उनकी आत्मकथा में उपन्यास जैसा आंनद मिलता है। यांग श्य्वो न "पर्वत और नदियों के तीन हजार लि" नामक उपन्यास लिखा है जिसमें रेल मजदूरों का चित्रण है। लेइ छ्या ने "यालू नदी पर वसंत" और आयु बू ने "पर्वत और खेत" नामक उपन्यासों की रचना की है।
उपन्यासों के साथ आधुनिक कहानी साहित्य की भी यथेष्ट श्रीवृद्धि हुई। अभी हाल में चीनी कहानियों के अंग्रेजी अनुवादों के कुछ संग्रह प्रकाशित हुए हैं। "घर की यात्रा तथा अन्य कहानियाँ" नामक संग्रह में आय बू, लि छुन्, छि श्यवे-पेइ, लि उ पाइ-यू, मा फंग, लिउ छेन, छुन् छिग, नान तिंग आदि लेखकों की रचनाएँ संमिलित हैं। "नदी पर उषाकाल तथा अन्य कहानियाँ" और "नवजीवन का निर्माण" नामक संग्रहों में भी चीन के तरुण लेखकों की रचनाएँ संग्रहीत हैं।
चीनी उपन्यासों का आरंभ मंगोल राजवंशों के काल से होता है। इस समय युद्ध, षड्यंत्र, प्रेम, अंधविश्वास और यात्रा आदि विषयों पर उपन्यासों की रचना हुई। ले क्वान् चिंग का लिख हुआ सान का चिह येन इ (तीन राजधानियों की प्रेमाख्यायिका) युद्ध प्रधान ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें युद्ध के दृश्य, चतुर सेनापतियों के षड्यंत्र ओर रणकौशल आदि का आकर्षक शैली में वर्णन किया गया है। इसी लेखक का दूसरा उपन्यास शुई हू (जल का तट) है। इसमें सुंगच्यांग और उसके साथियों के कृत्यों का वर्णन है। उस काल में प्रचलित कथा कहानियों के आधार पर लेखक ने बड़े परिश्रमपूर्वक यह रचना प्रस्तुत की है। "अनिष्ट की पराजय" इस लेखक की तीसरी रचना है जिसमें पेइचाउ के नागरिक वांग त्स के कृत्यों का वर्णन है। वांग त्स ने किसी जादू के बल से विद्रोह किया था लेकिन वह सफल न हो सका।
मिंग काल में अनेक नए उपन्यासों की रचना हुई। छिन फिंग मेइ (सुवर्ण कमल) मिंग काल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है जिसमें सुंगकालीन भ्रष्ट जीवन का प्रभावशाली चित्रण है। इसके लेखक वांग शिह-छेंग हैं जिनकी मृत्यु 1593 में हुई। लेखक की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष पश्चात् उपन्यास का प्रकाशन हुआ। मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक सामग्री का अध्ययन करने के लिये यह उपन्यास बहुत महत्व का है। सुप्रसिद्ध चीनी यात्री युवान् च्वांग की भारत यात्रा पर आधारित शी यू चि (पश्चिम की यात्रा) इस काल की दूसरी रचना है। इसके लेखक वू छेंग-येन माने जाते हैं; इन्होंने लोकप्रचलित कथाओं को बटोरकर 100 अध्यायों में यह सुंदर उपन्यास लिखा। सरल और लोकप्रिय शैली में लिखी गई इस रचना में सुन वू-कुंग नाम का बुद्धभक्त वानरराज, पश्चिम की ओर प्रयाण करते हुए चीनी यात्री की पद पद पर रक्षा करता है। यू छ्या ओ लि इस काल की एक दूसरी बृहत्काय रचना है; अनेक स्थलों पर इसमें पुनरावृत्ति भी हुई है। यह उपन्यास अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं। इसमें एक शिक्षित युवक की प्रेमकहानी है जो सुंदरियों से प्रेम करता है। पुनर्जन्म और कर्मफल को यहाँ मुख्य कहा गया है। लिएह को च्वान् उपन्यास के लेखक का नाम भी अज्ञात है। लेखक का दावा है कि उसकी इस असाधारण कृति की प्रत्येक घटना यथार्थता पर आधारित है, और इसे उपन्यास की अपेक्षा इतिहास कहना ही अधिक उपयुक्त है। इस काल का दूसरा प्रसिद्ध उपन्यास छिंग ह्वा य्वान् है। सम्राज्ञी वू के राज्य की घटनाओं का इसमें वर्णन है। यह सम्राज्ञी सन् 684 में राजसिंहासन पर बैठी और 20 वर्ष तक राज्य करती रही। फिंग शान लेंग येन उच्च कोटि की साहित्यिक शैली में लिखा हुआ उपन्यास है। इसमें फिंग और येन नामक दो तरुण विद्यार्थियों की प्रेम कहानी है जो शान और लेंग नाम की कवयित्रियों की साहित्यिक प्रतिभा से आकृश्ट होकर उनसे प्रेम करने लगते हैं। अर तोउ मेइ उपन्यास में पितृभक्ति, मित्रता ओर पड़ोसियों के प्रति कर्तव्य को मुख्य बताया है।
हुंग लौ मंग (लाल भवन का स्वप्न) चीन का अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास है जो मंचू काल में ईसवी सन् की 17वीं शताब्दी में लिखा गया था। इसके लेखक का नाम है त्साओ श्यवे छिन (ई. 1724-1764 ई.) इस उपन्यास का पुराना नाम "चट्टान की कहानी" था। लेखक ने अनेक पांडुलिपियों के आधार पर बड़े परिश्रम से इसे लिपिबद्ध किया। उपन्यास की प्रेमकथा बोलचाल की सरल और आकर्षक शैली में लिखी गई है। सामंती समाज का सूक्ष्म चित्रण करते हुए यहाँ शासक वर्ग की बुराइयों का पर्दाफाश किया गया है। बीच बीच में हास्य और करुण रस के आख्यान हें जो उच्च कोटि की कविताओं से गुंफित हैं। यह कृति 24 भागों में और 4000 पृष्ठों में प्रकाशित हुई है; इसमें 9 लाख शब्द हैं और 448 पात्र। मंचू राजाओं ने इसे उच्छृंखलतापूर्ण और अनैतिक बताकर इसे नष्ट कर देने की षोघणा की थी। इस युग का दूसरा सुप्रसिद्ध उपन्यास है "विद्वानों का जीवन"। इसके लेखक वू छिंग-त्स (ई. 1701-1754) हैं। ये दोनों ही उपन्यास पिछलें 200 वर्षो से चीन में बड़े चाव से पढ़े जाते रहे हैं और दोनों ही जनतांत्रिक विचारधारा की प्रतिष्ठा में सहायक हुए हैं। मंचू राजाओं के काल में शासकों का भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था और उनमें छोटे छोटे स्वार्थो के लिये युद्ध हुआ करते थे। विद्वान् प्राय: शासकों के नियंत्रण में रहते और सहायता से शासक प्रजा पर मनमाना अत्याचार करते थे। विद्वानों का नैतिक अध:पतन अपनी सीमा को लाँघ गया था। सरकारी परीक्षाएँ पास करके धन और मान प्राप्त करना, बस यही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य रह गया था। इन्हीं सब बातों का चित्रण कुशल लेखक ने व्यंग्यपूर्ण शैली में किया है।
चीनी साहित्य अपनी प्राचीनता, विविधता और ऐतिहासिक उललेखों के लिये प्रख्यात है। चीन का प्राचीन साहित्य "पाँच क्लासिकल" के रूप में उपलब्ध होता है जिसके प्राचीनतम भाग का ईसा के पूर्व लगभग 15वीं शताब्दी माना जाता है। इसमें इतिहास (शू चिंग), प्रशस्तिगीत (शिह छिंग), परिवर्तन (ई चिंग), विधि विधान (लि चि) तथा कनफ्यूशियस (552-479 ई.पू.) द्वारा संग्रहित वसंत और शरद्विवरण (छुन छिउ) नामक तत्कालीन इतिहास शामिल हैं जो छिन राजवंशों के पूर्व का एकमात्र ऐतिहासिक संग्रह है। पूर्वकाल में शासनव्यवस्था चलाने के लिये राज्य के पदाधिकारियों को कनफ्यूशिअस धर्म में पारंगत होना आवश्यक था, इससे सरकारी परीक्षाओं के लिये इन ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया था।
कनफ्यूशिअस के अतिरिक्त चीन में लाओत्स, चुआंगत्स और मेन्शियस आदि अनेक दार्शनिक हो गए हैं जिनके साहित्य ने चीनी जनजीवन को प्रभावित किया है। चू य्वान् चीन के सर्वप्रथम जनकवि माने जाते हैं। वे चू राज्य के निवासी देशभक्त मंत्री थे। राज्यकर्मचारियों के षड्यंत्र के कारण दुश्चरित्रता का दोषारोपण कर उन्हें राज्य से निर्वासित कर दिया गया। कवि का निर्वासित जीवन अत्यंत कष्ट में बीता। इस समय अपनी आंतरिक वेदना को व्यक्त करने के लिये उन्होंने उपमा और रूपकों से अलंकृत "शोक" (लि साव) नाम के गीतात्मक काव्य की रचना की। आखिर जब उनके कोमल हृदय को दुनिया की क्रूरता सहन न हुई तो एक बड़े पत्थर को छाती से बाँध वे मिली (हूनान प्रांत में) नदी में कूद पड़े। अपने इस महान् कवि की स्मृति में चीन में नागराज-नाव नाम का त्यौहार हर साल मनाया जाता है। इसका अर्थ है कि नावें आज भी कवि के शरीर की खोज में नदियों के चक्कर लगा रही हैं।
थांग राजाओं का काल चीन का स्वर्णयुग कहा जाता है। इस युग में काव्य, कथा, नाटक और चित्रकला आदि में उन्नति हुई। वास्तव में चीनी काव्यकला "प्रशस्ति गीत" से आरंभ हुई, चू युवान् की कविताओं से उसे बल मिला और थांगयुग में उसने पूर्णता प्राप्त की। इस युग की 48,900 कविताओं का संग्रह सन् 1907 में 30 भागों में प्रकाशित हुआ है। इस कविताओं में प्राकृतिक सौंदर्य, प्रेम, विरह, राजप्रंशसा तथा बौद्ध और ताओ धर्म के वर्णनों की मुख्यता है। संक्षिप्तता चीनी काव्य का गुण माना जाता है, इसलिये लंबे ऐतिहासिक काव्य चीन में प्राय: नहीं लिखे गए। चित्रकला की भाँति सांकेतिकता इस कविता का दूसरा गुण रहा है। चीनी वाक्यावली में विभक्ति, प्रत्यय, काल और वचनभेद, आदि के अभाव में पूर्वोपर प्रसंग आदि से ही काव्यगत भावों को समझना पड़ता है, इसलिये चीनी कविता को हृदयंगम करने में कुछ अभ्यास की आवश्यकता है।
लि पो इस काल के एक महान् कवि हो गए हैं। बहुत दिनों तक वे भ्रमण करते रहे, फिर कुछ कवियों के साथ हिमालय प्रस्थान कर गए। वहाँ से लौटकर राजदरबार में रहने लगे, लेकिन किसी षड्यंत्र के कारण उन्हें शीघ्र ही अपना पद छोड़ना पड़ा। अपनी आंतरिक व्यथा व्यक्त करते हुए कवि ने कहा है :
मेरे सफेद होते हुए वालों से एक लंबा, बहुत लंबा रस्सा बनेगा,
फिर भी उससे मेरे दु:ख की गहराई की थाह नहीं मापी जा सकती।
एक बार रात्रि के समय नौकाविहार करते हुए, खुमारी की हालत में, कवि ने जल में प्रतिबिंबित चंद्रमा को पकड़ना चाहा, लेकिन वे नदी में गिर पड़े ओर डूब कर मर गए।
तू फू दूसरे उल्लेखनीय महान् कवि हैं। अपनी कविता पर उन्हें बड़ा गर्व था। युद्ध, मारकाट, सैनिक शिक्षा आदि का चित्रण तू फू ने बड़ी सशक्त शैली में किया है। उनके समय में चीन पतन की ओर जा रहा था जिससे सामाजिक जीवन अस्तव्यस्त हो गया था। विदेशी आक्रमण के कारण राजकरों में वृद्धि हो गई थी और सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई थी। तत्कालीन शासकों की दशा का चित्रण करते हुए कवि ने लिखा है :
"मैं अपने सम्राट् को याआ" और शुन के समान महान् बनाना चाहता हूँ, और अपने देश के रीतिरिवाज पुन: स्थापित करना चाहता हूँ, अहपने अंतिम दिनों में भयंकर बाढ़ आने पर तू फू दस दिन तक वृक्षों की जड़ें खाकर निर्वाह करते रहे। उसके बाद मांस मदिरा का अत्यधिक सेवन करने के कारण उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।
पो छू यि इस युग के दूसरे श्रेष्ठ कवि हैं। स्वभाव से वे बहुत रसिक थे। लाओत्स के "ताओ ते चिंग" पर व्यंग्य करते हुए कवि ने कहा है : "जो जानता है वह कहता नहीं, और जो कहता है वह जानता नहीं।"
ये लाओ त्स के वाक्य हैं।
लेकिन इस हालत में स्वयं लाओत्स के
"पाँच हजार से अधिक शब्दों का" क्या होगा?
पो छू यि की माँ फूलों का सौंदर्य निरीक्षण करते करते कुएँ में गिर पड़ी थी, इसपर सहृदय कवि की लेखनी द्वारा फूलों की प्रशंसा में और "नया कूप" नाम की कविताएँ लिखी गईं। "चिरस्थायी दोष" नाम की कविता में कवि ने सम्राट् मिंग ह्वांग (685-762 ई.) के अध:पतन का मार्मिक चित्र उपस्थित किया है। "कोयला बेचनेवाला", "राजनीतिज्ञ", "टूटी बाँहवाला बूढ़ा" आदि व्यंग्यप्रधान कविताएँ भी कवि की लेखनी से उद्भूत हुई हैं। भाषा की सरलता के कारण उनकी कविताओं ने जनसाधारण में प्रसिद्ध पाई है।
विषय, भाव और आकार प्रकार की दृष्टि से प्राचीन कविता का क्षेत्र बहुत सीमित था। एक कविता में प्राय: 4 या 8 पंक्तियाँ रहती थी जो अलग अलग नहीं लिखी जाती थी, विरामचिह्न भी इसमें नहीं रहते थे जिससे कविता समझने में कठिनाई होती थी। प्रथम श्वियुद्ध के बाद भारत की भाँति चीन में भी आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए जिससे साहित्यिक क्षेत्र में जागृति दिखाई देने लगी। 4 मई, 1919 के क्रांतिकारी आंदोलन के उपरांत चीनी कविता में जनसाधारण के संघषों के चित्रण का सूत्रपात हुआ।
चीनी कविता को नवीन रूप देनेवालों में को मो-रो का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने प्रकृति, धरती, समुद्र, सूर्य आदि की प्रशंसा में एक से एक सुंदर कविताओं की रचना कर चीनी साहित्य को आगे बढ़ाया है। सन् 1921 में प्रकाशित "देवियाँ" नाम के इनके कवितासंग्रह में विद्रोह के साथ साथ आशावाद स्पष्ट दिखाई देता है। इसी समय च्यांग क्वांग-त्स ने रूस की अक्टूबर क्रांति पर प्रेरणादायक कविताओं की रचना की। इन कविताओं में हाथ में बंदूक लेकर शत्रु से लड़ने के लिये कवि ने अपने देश के नौनिहालों को ललकारा है।
सन् 1930 में चीनी में वामपक्षीय लेखकसंघ की स्थापना हुई। इस समय कोमिंगतांग सरकार ने अनेक तरुण साहित्यिकों को गिरफ्तार करके मौत के घाट उतार दिया। इनमें ह् ये-फिंग (सुप्रसिद्ध लेखिका तिङ् लिङ् के पति) और यिन् फू नामक कवियों के नाम उल्लेखनीय हैं। सन् 1931 में चीनी लेखकों का एक संघ बना जिससे प्रेरणा प्राप्त कर यू फेंग, त्सांग के- छिया, वांग या- फिंग और ट्येन छूयेन आदि कवियों ने अकाल, भुखमरी, किसानों और जमींदारों का संघर्ष, विद्रोह, हड़ताल आदि अनेक सामयिक विषयों पर रचनाएँ प्रस्तुत कीं।
आय छिंग वर्तमान युग के लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। उन्होंने "वह सोया है", "काली लड़की गाती है", "जहाँ काले आदमी रहते हैं" आदि भावपूर्ण कविताएँ लिखीं। "वह दूसरी बार प्राणों की तिलांजलि देता है" नामक कविता में कवि न ए घायल किसान सिपाही का मार्मिक चित्र उपस्थित किया है जो नगर की सड़क पर बड़े गर्व से कदम उठाकर चलता है। युद्धोत्तरकालीन कवियों में य्वान् शुइ-पो, लि चि, हो छि-फांग आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। य्वान् शुइ-पो, लि चि, हो छि-फांग आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। य्वान् शुई पो ने लोकगीत की शैली में "बिल्लियाँ" नामकी व्यंग्यात्मक कविता की रचना की। लिचि की "अंग क्वेइ और लि श्यांग श्यांग" नामक कविता चीन में अत्यंत प्रसिद्ध है, यह भी गीत शैली में लिखी गई है। सन् 1954 की भयंकर बाढ़ का सामना करने के लिये वू हान् की जनता को जोश दिलाते हुए हो छि-फांग ने एक भावपूर्ण कविता लिखी। इसी तरह आय छिंग, शिह फांग-यू और लि ट्येन-थिन् आदि प्रगतिशील कवियों ने शांतिरक्षा पर सुंदर रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।
सभ्यता के आदिम काल में ह्वांगहो नदी की उपत्यका में जीवनयापन करते हुए चीन के लोगों को प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध जोरदार संघर्ष करना पड़ा जिससे इस देश के निवासियों का यथार्थवादी विश्वासों की ओर झुकाव हुआ; भारतवर्ष की भाँति आध्यात्मिक तत्वों और पौराणिककथाकहानियों का विकास यहाँ नहीं हो सका। प्राकृतिक देवी देवताआं के प्रति भय अथवा आदर की भावना से प्रेरित होकर आदिम मानव के मुख से जो स्वाभाविक संगीत प्रस्फुटित हुआ वही आदिम कविता कहलाई। शनै: शनै: मनुष्य ने प्राकृतिक शक्तियों पर विजय पाई, उसका संघर्ष कम होता गया और अवकाश मिलने पर कथा कहानियों की आर उसकी रुचि बढ़ती गई।
प्राचीन चीन में क्लासिकल साहित्य का इतना अधिक महत्व था कि उपन्यासों और नाटकों को साहित्य का अंग ही नहीं माना जाता था। चीनी का "श्याओ श्वो" शब्द उपन्यास और कहानी दोनों अर्थो में प्रयुक्त होता है। इससे मालूम होता है कि आधुनिक कथा साहित्य का विकास बाद में हुआ।
थांगकालीन राजवंशों के पूर्व कहानी साहित्य केवल परियों और भूत प्रेत की कहानियों तक सीमित था उसके बाद "अद्भुत कहानियाँ" (चीनी में छ्वान छि) लिखी जाने लगीं, लेकिन तत्कालीन विद्वानों के निबंधों की तुलना में ये निम्न कोटि की ही समझी जाती थीं। क्रमश: कहानी साहित्य में प्रगति हुई और थांगकाल में चरित्रप्रधान कहानियों की रचना होने लगी। कुछ कहानियाँ क्लासिकल लिखी गई तथा कुछ व्यंग, प्रेम और शौर्यप्रधान। छेन श्वान्-यु ने "भटकती हुई आत्मा", लि छाओ-वेइ ने "नागराज की कन्या" और य्वान् छेंग ने "यिंग यिंग की कहानी" नामक भावपूर्ण प्रेम कहानियों की रचना की। इन दिनों पढ़े लिखे लोग सरकारी परीक्षाएँ पास करके उच्च पद पाने के स्वप्न देखा करते थे और अंत में असफल होने से जीवन से निराश हो बैठते थे- इसका मार्मिक चित्रण पाई शिंग-छ्येन की "वेश्या की कहानी", लि कुंग-त्सो की "दक्षिण के उपराज्य की राज्यपाल", शेंग या छिह की "छिन का स्वप्न" और शेंग छें-त्सि की "तकिए के नीचे" कहानियों में बड़ी कुशलतापूर्वक किया गया है। मिंग और मंचू काल में भी कहानी साहित्य लिखा गया। ल्याओ छाई छिह इ (अद्भुत कहानियाँ) मंचू काल की प्रसिद्ध कहानियाँ हैं, लेखक का नाम है फू सुंग-लिंग।
चीनी नाटकों का इतिहास काफी पुराना है। भारतवर्ष की भाँति देवी देवता या राजाओं महाराजाओं के समक्ष किए जानेवाले प्राचीन नृत्य ही इन नाटकों के मूलआधार है। थांग राजवंशों के काल में मिंग ह्वांग नामक सम्राट् ने राजदरबारियों के मनोरंजन के लिये लड़के लड़कियों की नाट्यसंस्था खोली। आगे चलकर विलासप्रिय सुंग राजाओं के काल (960-1278 ई.) में नाट्यकला की उन्नति हुई, लेकिन इस कला का पूर्ण विकास हुआ मंगोल राजाओं के समय (1200-1368 ई.)। इस युग में एक से एक सुंदर नाटकों की रचना हुई। छ्वान् छु श्यवान त्स छि के 8 भागों में 100 नाटकों का संग्रह छपा है। वांग शि-फू का लिखा हुआ शि श्यांग चि (पश्चिम भवन की कहानी) इस काल के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इसमें वायु, पुष्प, हिम और ज्योत्स्ना आदि संबंधी अनेक संवाद प्रस्तुत हैं जिनसे प्रेम और षड्यंत्र की सूचना मिलती है। नाटक की आख्यायिका अत्यंत साधारण होने पर भी बड़े कलात्मक ढंग से रंगमंच पर उपस्थित की जाती है। पात्रों की बोलचाल, उनका उठना बैठना और चलना फिरना आदि क्रियाएँ बड़ी मंद गति और कोमलता के साथ संपन्न होती हैं। छि छुन् श्यांग (चाओ परिवार का अनाथ) इस काल का दूसरा लोकप्रिय नाटक है जिसमें ईसा के पूर्व छठी शताब्दी के एक मंत्री की कहानी है जो अपने शत्रु की हत्या का षड्यंत्र रचता है।
मिंग काल (1368-1644 ई.) में शिल्प आदि की दृष्टि से नाट्य साहित्य में प्रगति हुई। इस युग की साहित्यिक भाषा में शब्द बहुल सैकड़ों नाटक प्रकाश में आए, कुछ में 48 अंकों तक का समावेश किया गया। का ओत्स छेंग का लिखा हुआ फी या ची (सितार कहानी) इस काल का श्रेष्ठ नाटक माना जाता है। सन् 1704 में यह पहली बार खेला गया था। इसके विभिन्न संस्करणों में 24 से लेकर 42 दृश्य तक प्रकाशित हुए हैं। इसमें राजभक्ति, पितृभक्ति और पतिसेवा का सुंदर चित्रण प्रस्तुत हुआ है।
मंचू राजवंशों के काल (1644-1900 ई.) में चीनी नाट्य साहित्य की लोकप्रियता में वृद्धि हुई। इस समय प्राय: युद्धसंबंधी नाटकों की रचना ही अधिक हुई। "शाश्वत युवावस्था का प्रासाद" इस काल की एक श्रेष्ठ कृति है जिसे हुंग शेंग ने सन् 1688 में प्रस्तुत किया। इस नाटक में सम्राट् मिंग ह्वांग और उसकी प्रेमिका यांग युह्वान् की करुण कहानी का सुंदर चित्रण है।
नए चीन में जननाट्यों की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई है। वहाँ सैकड़ों तरह के नाटक खेले जाते हैं और नाटकघरों में दर्शकों की भीड़ लगी रहती है। सान छा खौ (तीन सड़कों का बड़ा रास्ता) नामक नाट्य में सुंगकाल की घटना पर आधारित एक षड्यंत्र की कहानी है। सुंग वू कुंग (जादूगर वानर) एक दूसरा लोकप्रिय नाटक है। इसमें रंगमंच पर भीषण युद्ध के साहसपूर्ण दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। अभिनीत होने पर इस नाटक में प्रसिद्ध अभिनेता लिन् शाओ छुन् ने वानर का अभिनय किया था। पीकिंग, उत्तर चीन, शेचुआन, शांसी आदि भिन्न भिन्न प्रांतों के गीतिनाट्य (आपेरा) भी चीन में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। पीकिंग के गीतिनाट्य में चीन के सुप्रसिद्ध अभिनेता मे ला फांग ने स्त्रियों का अभिनय किया। इसमें "मछुओं का प्रतिशोध", "स्वर्ग में तूफान" "ग्वाला और गांव की लड़की" आदि नाट्य प्रसिद्ध हैं। चेकियांग गीतिनाट्य शांघाई में बहुत लोकप्रिय है। इसमें स्त्रियाँ ही पुरुष और स्त्री दोनां का अभिनय करती हैं। "ल्यांग शान पो और चू यिंग थाय" इसका सुप्रसिद्ध नाट्य है। कैंटन गीतिनाट्य कैंटन, हांगकांग, मलाया और इंडोनेशिया में लोकप्रिय हुए हैं।
जननाट्यों की माँग बढ़ जाने से आजकल चीन के तरुण लेखक नाटक लिखने में जुट गए हैं। को मो-रो ने महान् कवि चुयुवान् के चरित पर आधारित सुंदर नाटक की रचना की है। लाओ श ने "हमारा राष्ट्र सर्वप्रथम है" और माओ तुन ने "छिंगमिंग त्योहार के पूर्व और पश्चात्" नाटक लिखे हैं। त्साओ यू का "गर्जन, वर्षा और सूर्योदय" तथा छेन पो छेन का "लड़कों के लिये काम" नाटक सुप्रसिद्ध हैं। लि छि ह्वा ने "संघर्ष और प्रतिसंघर्ष", तू इन ने "नई वस्तुओं के आमने सामने", आन पो ने "नोमिन नदी में बसंत की बहार", हू ति ने "लाल खुफिया", शा क फू ने "हथियारों से", छेन छि-तुंग ने "दरिया और पहाड़ों के उस पार" तथा श्या येन ने "परीक्षा" नामक सुंदर नाटकों की रचना कर चीनी साहित्य की समृद्ध बनाया है।

अन्ना स्तेपानोवा और वाल्या पोगोदीना


रूसी साहित्य बहुत महान और विशाल है। जैसे रूस महान है वैसे ही साहित्य में यह महानता रूस की रहस्यपूर्ण रूप से दिखाई देती है। हमारे लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से पूरे विश्व में बहुत लोकप्रिय हैं। उनकी रचनाएँ इतनी सुन्दर, मार्मिक, उदात्त और यथार्थपूर्ण हैं कि वे हर दिल में अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं।
रूसी साहित्य का इतिहास सन 988 से शुरू होता है। पहले काल खंड का नाम प्राचीन रूसी साहित्य (988 से 1600 तक) है। इस काल का पूरा साहित्य धर्म-निष्ठ और बाइबिल से संबंधित था। लेखक ईसाई, धर्म, भगवान और आदमी के रिश्तों के बारे में लिखते थे। इस काल की मुख्य विद्या इतिवृत्त थी। सब साहित्य मठ में जमा था और सिर्फ मठवासी लिखते थे। इस प्रकार से रूसी साहित्य की शुरूआत में आध्यात्मिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इस काल की सबसे प्रसिद्ध कृति है- "ईगोर की रेजीमेंट के बारे में बात"
दूसरा काल (1600-1800) में धर्म-निष्ठ साहित्य और दुनियाई साहित्य अलग लिखा गया। इस काल के बाद रूसी साहित्य का स्वर्ण काल आता है (1900-1900)। इस काल के सबसे लोकप्रिय लेख हैं-
    अलेक्सांद्र पुश्किन
    मिख़ाइल लेर्मोन्तोव
    इवान तुर्गेनव
    लेव तोल्सतोय
    फेदर दोस्तोएवस्की
    अंतोन चेख़ोव
इस समय का रूस "साहित्य का देश" हो गया। साहित्य सामाजिक समस्या हल करता था और लेखक समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। अगर यह काल गद्य का समय था तो इसके अगले काल (1900-1917) में विश्व साहित्य की सबसे अच्छी कविताएँ लिखी गयीं। इस काल के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार हैं-
    बोरिस पस्तेर्नाक
    अन्ना अख़मातोवा
    अलेक्सांद्र बलोक
    मरीना त्सवेताएवा
इस काल को रूसी साहित्य का रजत काल कहते हैं। अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत काल था (1917-1991)। लेखक दो वर्ग में बंट गये। कुछ लोग साम्यवादी हो गये, जैसे मैक्सिम ग़ोर्की, ब्लादीमीर मथकोत्स्की, भिख़ाइल शोलोहोव आदि और कुछ लोगों ने उनका बहिष्कार किया, जैसे: इवान बूनीन, ब्लादीमीर नबोकोव आदि। सन 1919 से आधुनिक काल शुरू हुआ। अगर सोवियत काल में साहित्य राजनीतिक प्रभाव में आ रहा था तो अब भूले बिसरे नाम याद आ रहे हैं और साहित्यिक परंपरा पुनर्जीवित हो रही है।
पुराना और नया रूसी साहित्य हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।

हिंदी में क्यों नहीं होते बेस्टसेलर?


अभिषेक कश्यप

हिंदी शायद संसार की इकलौती ऐसी भाषा है जिसके परजीवी मलाई-रबड़ी पर पलते हैं और श्रमजीवी आर्थिक तंगी, अभाव, वंचना और अपमान का शिकार होते हैं। यह कड़वा सच है कि हिन्दी को जिन मनीषियों ने आधुनिक दृष्टि दी, नये मुहावरों, वाक्य-विन्यासों से लैस किया, अपने कृतित्व के जरिए जिन्होंने हिंदी को जनता की जुबान बना दी, उन्हें अपमानित, प्रताडि़त और विक्षिप्त होना पड़ा। उनमें से ज्यादातर मनीषियों को ताउम्र दो वक्त की रोटी की जद्दोजहज के बीच एक कठिन जिद के बूते अपनी रचनात्मक प्रतिभा को बचाए रखना पड़ा। एक ऐसी भाषा जिसमें साँस लेते हुए रघुवीर सहाय अपमानित हुए, मुक्तिबोध अभाव, वंचना और लंबी बीमारी से ग्रस्त होकर मरे, महाकवि निराला अर्द्ध-विक्षिप्त हुए और भुवनेश्वर ने मानसिक संतुलन खोकर भीख मांगते हुए दम तोड़ा। इसके उलट जो परजीवी हुए, प्रबंधन कुशल रहे वे हिन्दी की मलाई-रबड़ी खा-खाकर अघाते रहे।
हिंदी के परजीवी बनकर भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, चमचों और मसखरों ने ताकत और सत्ता हासिल की। विश्वविद्यालय, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग तो इन परजीवियों के सबसे सुरक्षित, सबसे आरामदेह शरणगाह रहे हैं। यहां मोटी तनख्वाह के साथ सेमिनारों, गोष्ठियों, कार्यशालाओं की मौज-मस्ती और विश्व हिंदी सम्मेलनों, विदेश यात्राओं का सुख भोगते हुए ये परजीवी हिंदी के उन श्रमजीवियों को हिकारत की नजर से देखते हैं जिनके लिए हिंदी और भाषा का संस्कार ही जीवन है। ये वे लोग हैं जो हिंदी भाषा और साहित्य के लिए घर फूँक तमाशा देखने में तनिक संकोच नहीं करते। जो अपनी मेहनत की कमाई से लघु पत्रिकाएँ निकालते हैं, कहानियाँ-कविताएँ लिखकर हिन्दी ही नहीं अहिंदी भाषी प्रदेशों के वाशिंदों को भी हिंदी भाषा और साहित्य से जुडऩे के लिए प्रेरित करते हैं। देशभर में ऐसी सैकड़ों प्रतिभाएं हैं जो छोटी-मोटी नौकरियां, धंधे यहां तक कि किसी बनिये के दुकान पर हजार-पन्द्रह सौ की बेगारी खटते हुए भी तमाम अभावों के बावजूद हिंदी के लिए वह कर रही हैं, विश्वविद्यालयों के मुफ्तखोर हिंदी प्राध्यापक, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग जिसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। खासकर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्राध्यापक कहे जाने वाले मसखरे तो प्रतिभाहीन नकलचियों को ‘फंटूशलाल जी की कविताओं में स्त्री-विमर्श’ सरीखे निरर्थक विषयों पर पीएचडी की डिग्री बाँटने में ही व्यस्त हैं। और सरकार ऐसे मसखरों और नकलची शोध छात्रों को तनख्वाह-वजीफे के साथ तरह-तरह की सुविधाएँ देकर धन्य होती है।
हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने अपनी भाषा-शृंखला की लंबी कविता ‘एक भाषा हुआ करती है’ में इस हौलनाक विडंबना को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है-
‘एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएँ और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं
बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती
गाती बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और
सबसे खूंखार सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और गरीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा
वह भाषा जिसे वक्त-जरूरत तस्कर, हत्यारे, नेता,
दलाल, अफसर, भंडुए, रंडियाँ और जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं
वह भाषा जिसमें
लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएँ
‘ईश्वर’ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध
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एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीनेवाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बाँटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिट्ठियाँ
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भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दंडनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबंधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां वर्जित हैं विचार
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भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे
चाकर टांगते हैं तमगे
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अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिनभर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी
राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि।’
मित्रो! इस कविता से गुजरने के बाद क्या आपको हिंदी के अज्ञात कुलशील मानस पुत्रों, हिंदी के श्रमजीवियों की असहनीय व्यथा पर दु:ख नहीं हो रहा? क्या आपको विश्वविद्यालयों, अकादमियों, सार्वजनिक उपक्रमों में मलाई काटते हिंदी के परजीवियों और अपने नितांत निजी स्वार्थों व अश्लील महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंदी का इस्तेमाल करने वाले तस्करों, नेताओं, दलालों, चमचों, मसखरों और भंडुओं पर गुस्सा नहीं आ रहा?
कमलेश्वर जी की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके अभिन्न मित्र, यशस्वी कथाकार और ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि मैं ‘हंस’ के लिए कमलेश्वर के बारे में उनकी बेटी मानू से एक साक्षात्कार लूँ। इसी इंटरव्यू के दौरान मानू ने वह किस्सा मुझे सुनाया जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया। यह उन दिनों की बात है जब कमलेश्वर मुंबई में थे और हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक हुआ करते थे। मानू तब मुंबई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बी. ए. की छात्रा थी। वहाँ नियम था कि दाखिले का फार्म खुद अभिभावक को कॉलेज आकर लेना है। कमलेश्वर कॉलेज पहुँचे और दाखिले के फार्मवाली खिडक़ी पर कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। तभी कॉलेज के हिंदी विभाग के एक प्राध्यापक की उन पर नजर पड़ी। वह कमलेश्वर जी को यह कहते हुए कतार से निकाल लाए कि फार्म हम मंगवा देते हैं।
कमलेश्वर कॉलेज से लौटे और मानू को इस बात के लिए राजी किया कि बी. ए. में वह समाजशास्त्र की बजाए हिंदी साहित्य की पढ़ाई करे। मानू ने बताया कि वहां हिंदी विभाग में तीन प्राध्यापक थे मगर शायद पिछले कई बरसों से हिंदी विभाग में दाखिला लेने कोई विद्यार्थी नहीं आया था। और संयोग देखिए, इस कमी को कोई और नहीं हिंदी के एक यशस्वी लेखक की बेटी ने पूरा किया।
मानू ने आगे बताया कि पूरे तीन साल वह कॉलेज की ‘वीवीआईपी छात्रा’ रही। पढऩेवाली वह अकेली पढ़ाने वाले तीन!
हम मोटे तौर पर आकलन करें, किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में नियमित रूप से कार्यरत तीन प्राध्यापकों के वेतन और अन्य भत्तों पर कितना खर्च आता होगा? डेढ़ लाख? दो लाख? या इससे अधिक? और यह सिर्फ उसी कॉलेज की त्रासदी नहीं। अगर जाँच की जाए तो देश भर में ऐसे सैकड़ों महाविद्यालय-विश्वविद्यालय हैं जहां हिंदी विभाग में या तो कोई विद्यार्थी नहीं या इक्का-दुक्का विद्यार्थी हैं। ये इक्का-दुक्का छात्र-छात्राएँ वे हैं जिन्हें हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य से कोई लेना-देना नहीं। कई उदाहरण मैंने ऐसे भी देखे हैं जहां किसी फिसड्डी विद्यार्थी को नंबर कम होने या दूसरी वजहों से किसी अन्य विषय में दाखिला नहीं मिल पाता और वे ‘मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी’ की तर्ज पर हिंदी विभाग की शरण में आते हैं। खैर, विद्यार्थी हो न हो, हिंदी भाषा और साहित्य का कुछ भला हों न हों, हिंदी विभाग को तो रहना ही है। सरकार को राष्ट्रभाषा हिंदी पर अरबों रुपये जो खर्च करने हैं। चौंकिए मत, यह सरकार के ‘अजब हिंदी प्रेम की गजब कहानी’ है।
विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के साथ-साथ सार्वजनिक उपक्रमों के राजभाषा विभागों का भी यही आलम है। सितबंर महीने में ‘हिंदी पखवारा’ के 15 दिन गुजर जाने के बाद बाकी साल भर वे क्या करते हैं, यह शोध का विषय है।
कई साल पहले एक परियोजना के तहत मुझे सार्वजनिक उपक्रम के राजभाषा विभाग के एक हिंदी अधिकारी के साथ उनके कार्यालय में पूरा हफ्ता गुजारना पड़ा। 50 हजार रुपये का मासिक वेतन पानेवाले उन अधिकारी महोदय ने हफ्ते भर में सिर्फ एक छोटा-सा अनुवाद कार्य किया।
उस अनुवाद कार्य की बानगी देखिए। एक चपरासी उनके पास आया। बोला-‘डायरेक्टर साहब ‘सेलरी पेड हॉलिडे’ की हिंदी पूछ रहे हैं। इस कागज पर लिख दीजिए।’ उन्होंने थोड़ी देर सोचने के बाद लिखा- ‘सवेतन छुट्टी।’
50 हजार मासिक वेतन के हफ्ते भर का हिसाब होगा- साढ़े बारह हजार रुपए। दो शब्दों के अनुवाद की कीमत! जबकि एक पेशेवर अनुवादक को दो शब्दों के अनुवाद के लिए 20 पैसे प्रति शब्द के हिसाब से 40 पैसे और अधिकतम 5 रुपये प्रति शब्द के हिसाब से 10 रुपये मिलते हैं। 40 पैसे बनाम साढ़े बारह हजार रुपये।
मित्रो! यह 40 पैसा हिंदी के श्रमजीवियों की कीमत है और परजीवियों की कीमत 12500 रुपये। श्रम और बेईमानी के बीच का यह लंबा-चौड़ा फर्क क्या कभी कम होगा?
खैर, जो भी हो, सरकार के इस हिंदी प्रेम की नजर उतारनी चाहिए ताकि हिंदी के परजीवी ताउम्र ‘सवेतन छुट्टी’ का आनंद लेते हुए दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें। आमीन!
हिंदी साहित्य के संवर्द्धन और विकास के लिए बनी संस्थाओं और अकादमियों के भाईचारा और संपर्क कौशल की मिशाल कहीं ढूंढ़े नहीं मिलेगी। इसमें भी अगर संस्था या अकादमी सरकारी हुई तो माशाअल्ला! सरकारी होने की वजह से इन संस्थाओं और अकादमियों के कुर्ताछाप रघुपतिये सचिवों-उपसचिवों की आस्था साहित्य, विचार और सृजनात्मक गतिविधियों में कम लोकतंत्र में ज्यादा होती है। और भइया, लोकतंत्र का तकाजा है कि आप भाईचारा को बढ़ावा दें और अपने संपर्क-कौशल को धार देते रहें। और इस पवित्र-पावन भाईचारावाद की वजह से अगर साहित्य जाता है तो जाए तेल लेने! अपने को क्या?
सचिव-उपसचिव के पद को सुशोभित करने वाले इन कुर्ताछाप रघुपतियों का लोकतांत्रिक भाईचारावाद मित्रों, लाभ पहुंचाने वाले परिचितों और सुंदर स्त्रियों (कंवारी हो तो क्या कहने!) से शुरू होता है। औरत हो, युवा और सुंदर हो तो इस भाईचारावाद में वह पहले नंबर पर आएगी। ‘वो कहते हैं ना, लेडिज फ्रस्ट! हो-हो-हो।’
‘अरे काहे का साहित्य और काहे की प्रतिभा! आप तो इतनी सुंदर हो कि कुछ भी लिख दो तो कविता हो जाएगी।....... फिर हम जनता के पैसों से चल रही अपनी अकादमी में आपको कविता-पाठ(?) के लिए आमंत्रित कर लेंगे। आप कवयित्री होने का गौरव भी पा जाएंगी और कविता-पाठ के बाद हम आपको मानदेय के तौर पर रुपयों वाला लिफाफा भी पकड़ाएंगे! हो-हो-हो!’
बीते ३० नवंबर को साहित्य अकादमी की वार्षिक पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान आयोजित साहित्य-उत्सव के दूसरी गोष्ठी इसी भाईचारावाद का नमूना थी। आमंत्रित रचनाकारों में एक नवोदित कवयित्री भी थी, जिसके साहित्य में अभी दूध के दांत भी नहीं टूट्रे। उसकी कविताएं अभी इक्का-दुक्का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और हिंदी कविता के परिदृश्य में अभी उसकी कोई उल्लेखनीय पहचान नहीं। मगर शायद यहां इसी लोकतांत्रिक भाईचारावाद का असर था कि उसे कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कर लिया गया। जबकि हिंदी पट्टी से रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आए प्रतिभाशाली नवोदित कवियों-कथाकारों की कोई कमी नहीं, जिन्हें कविता और कहानी-पाठ के लिए आमंत्रित कर साहित्य अकादमी भी धन्य होती। इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें आर्थिक सहयोग की भी दरकार है। मगर इन पर कुर्ताछाप रघुपतियों की नजर तब पड़ती है जब वे अपना भाईचारावाद निपटा चुक होते हैं।
ऐसे में अब समय आ गया है कि जनता के पैसे से चलने वाले इन संस्थाओं और अकादमियों को लेखकों, पाठकों और श्रोताओं के प्रति जवाबदेह बनाने की मुहिम शुरू की जाए। यह भी तय होना चाहिए कि इन अकादमियों का कामकाज, इनके आयोजन पारदर्शी हों और इनके फैसलों में युवा और नवोदित लेखकों-कवियों की भागीदारी सुनिश्चित हो। वरना हम इन अकादमियों और संस्थाओं के इसी तरह के भाईचारावाद को देखने और भोगने को अभिशप्त होंगे।
अनूदित कई बेस्टसेलर पढ़े। इनमें से ज्यादातर सेल्फ-हेल्प पुस्तकें थीं, जिन्हें भोपाल के मंजूल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। पहली बार साल २००३ में मैंने नेपोलियन हिल की ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ (हिंदी अनुवाद: सोचिए और अमीर बनिए) पढ़ी और तभी से मुझे ऐसी किताबों का चस्का लग गया। कुछ वैचारिक असहमतियों के बावजूद इनमें से ज्यादातर किताबों ने आइडिया, सहज भाषा-शैली और पाठकों को मुरीद बनाने के अपने कौशल की वजह से मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्र्षित किया। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में अपने विलक्षण योगदान के लिए जाने जानेवाले अरविंद कुमार ने भी कुछ साल पहले अपना प्रकाशन शुरू किया है-‘अरविंद कुमार पब्लिशर्स।’ इस प्रकाशन के जरिए वे नए-नए विषयों की बेहद सुंदर, उपयोगी और पठनीय पुस्तकें किफायती दाम पर पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। मगर अफसोस कि मंजूल, अरविंद कुमार पब्लिशर्स और ऐसे ऊंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद प्रकाशक पेशेगत विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए हिंदी में लीक से हटकर जो किताबें छाप रहे हैं, वह सब अंग्रेजी भाषा की बेस्टसेलर हैं। हिंदी में आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित इन किताबों के आवरण पर खासतौर से यह सूचना दर्ज होती है कि दुनिया भर में इस खास पुस्तक की कई लाख प्रतियां बिक चुकी हैं और यूरोप व अमेरिका के अखबारों ने इसकी प्रशंसा में ये शब्द कहे हैं। कवर पर दी गई ऐसी सूचनाएं किताब के प्रति पाठकों में उत्सूकता जगाती हैं और किताब की बिक्री का सकारात्मक माहौल तैयार करती हैं।
सवाल यह उठता है कि ऐसी किताबें हिंदी में क्यों नहीं लिखी जातीं जबकि इन किताबों का हिंदी में एक बड़ा पाठक वर्ग मौजूद है। यकीन न हो तो अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स के हिंदी संस्करण छापने वाले प्रकाशकों के आंकड़ों पर गौर करें। मंजूल पब्लिशिंग हाउस किसी भी पुस्तक के १० हजार से कम के संस्करण नहीं छापता। और इनमें से कई पुस्तकों के वह साल भर में कई संस्करण छाप कर बेच लेता है। कुछ साल पहले मंजूल ने जे.के. राउलिंग की हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तक ‘हैरी पॉटर : एन आर्डर ऑफ फीनिक्स’ की हिंदी में एक लाख प्रतियां छापी जो महीने भर में बिक गई। इसके बरक्स कहानियां-कविताएं छापनेवाले हिंदी के परंपरागत प्रकाशकों के प्रकाशन के आंकड़ों पर गौर करें तो मन खिन्न हो जाएगा। हिंदी साहित्य के परंपरागत प्रकाशकों का सरकारी खरीद और पुस्तकालयों के प्रति प्रेम जगजाहिर है। और हमारे लेखकों-बुद्धिजीवियों का तो कहना ही क्या! वे तो जैसे-तैसे किताब छप जाए उसी में खुद को धन्य मानते हैं। प्रकाशक पर पेशेगत विश्वसनीयता के लिए दबाव बनाना तो दूर, ज्यादातर लेखक तो अपनी रॉयल्टी मांगने में भी संकोच करते हैं। शायद इसलिए हिंदी साहित्य का बड़ा-से-बड़ा प्रकाशक पहला संस्करण 500 प्रतियों का छापता है और अधिकांश किताबों का तो पहला संस्करण ही नहीं बिक पाता कि दूसरे की नौबत आए। खैर, मैं फिर अपने बुनियादी सवाल पर आता हूँ- हिंदी में बेस्टसेलर की परंपरा क्यों नहीं है? इसकी कई वजहें खोजी जा सकती हैं मगर एक सीधी और साफ वजह यह समझ आती है कि हमारे लेखकों के पास नए विचारों का अभाव है या फिर सृजन से ऊपर वे प्रक्रिया के महत्व पर गौर नहीं करते। शायद इसलिए श्रमसाध्य लेखन की संस्कृति विकसित नहीं हो पायी, जहां नए विचार हों और जो पाठकों को लुभाए भी। (baithak.hindyugm.com से साभार)