Monday, 1 July 2013

बांग्ला साहित्य जगत



कांचनमाला
पुरातन बांग्ला की उपलब्ध रचनाओं में हरप्रसाद शास्त्री के 47 चर्यापद विशेष महत्व रखते हैं। ये प्राय: आठ पंक्तियों के रहस्यमय गीत हैं जिनका संबंध महायान बौद्धधर्म तथा नाथपंथ, दोनों से संबद्ध गुप्त संप्रदाय से है। हरप्रसाद शास्त्री उपन्यासकार और अच्छे निबंधलेखक भी थे। उनके दो उपन्यास हैं- "बेणेर मेये" तथा "कांचनमाला"। भारतीय साहित्य, धर्म तथा सभ्यता के संबंध में उनके लेख विशेष महत्वपूर्ण हैं। उनका लिखा "वाल्मीकिर जय" नामक गद्यकाव्य बड़ी सुन्दर और प्रभावोत्पादक बँगला में लिखा गया है।

गीतगोविंद
'गीतगोविंद' के रचयिता जयदेव बंगाल के हिंदू राजा लक्ष्मण सेन (लगभग 1180 ई.) के शासनकाल में विद्यमान थे। राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करनेवाले इस सुंदर काव्य में 24 गीत हैं जो अतुकांत न होकर, सबके सब तुकांत हैं। संस्कृत में प्राय: तुकांत नहीं मिलता। यह तो अपभ्रंश या नवोदित भारतीय-आर्य भाषाओं की विशेषता है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन पदों की रचना मूलत: पुरानी बांग्ला में या अपभ्रंश में की गई थी और फिर उनमें थोड़ा परिवर्तन कर संस्कृत के अनुरूप बना दिया गया। इस तरह जयदेव पुरातन बंगाल के प्रसिद्ध कवि माने जा सकते हैं जिन्होंने संस्कृत के अतिरिक्त संभवत: पुरानी बांग्ला में भी रचना की। बंगाल के कितने ही कवियों को उनसे प्रेरणा मिली।

कीर्तिलता
मिथिला (बिहार) के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ने प्रसिद्ध ऐतिहासिक काव्य 'कीर्तिलता' की रचना की थी। उन्होंने इसकी रचना अपनी मातृभाषा मैथिली में न कर अपभ्रंश में की थी। यद्यपि बीच-बीच में इसमें मैथिल शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। 15वीं शती तथा विशेष रूप से 16वीं शती से ही बड़े प्रबंध काव्यों एवं वर्णनात्मक रचनाओं का निर्माण प्रारंभ हुआ, उदाहरणार्य आदर्श नारी बिहुला और उसके पति लखीधर की कथा, कालकेतु और फुल्लरा का कथानक, इत्यादि।

बांग्ला रामायण
बांग्ला के प्रथम महाकवि कृत्तिवास ओझा बताए जाते हैं। संस्कृत रामायण को बांग्ला में प्रस्तुत करनेवाले वे पहले लोकप्रिय कवि थे जिन्होंने राम का चित्रण वाल्मीकि की तरह शुद्ध मानव और वीर पुरुष के रूप में न कर भगवान् के करुणामय अवतार के रूप में किया जिसकी ओर सीधी सादी भक्तिमय जनता का हृदय सहज भाव से आकर्षित हो सकता था। इसी तरह कृष्णागाथा का वर्णन उसी शताब्दी में (1475 ई.) मालाधर बसु ने किया। यह भागवत पुराण पर आधारित है।

बिहुला की कथा
बिहुला की कथा, जो विवाह की प्रथम रात्रि में ही मनसा देवी द्वारा प्रेषित सर्प के द्वारा पति के डसे जाने पर विधवा हो गई थी और जिसने बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ झेलकर देवताओं को तथा मनसा देवी को भी प्रसन्न कर पति को पुन: जीवित करा लेने में सफलता प्राप्त की थी, पतिव्रता नारी के प्रेम और साहस की वह अपूर्व परिकल्पना है जिसका आविर्भाव कभी किसी भारतीय मस्तिष्क में हुआ हो। यह कथा शायद मुसलमानों के आगमन के पहले से ही प्रचलित थी किंतु उसपर आधारित प्रथम कथाकाव्य बँगला में 15वीं शती में रचे गए। इनमें से एक के रचयिता विजयगुप्त और दूसरी के विप्रदास पिपलाई माने जाते हैं। कालांतर में बिहुला की कथा पर 18वीं शती में भी प्रबंध काव्य वंशीदास, केतकादासतथा क्षेमानंद इत्यादि द्वारा-रचे गए।

पांडवविजय
15वीं शताब्दी में बंगाल पर तुर्क तथा पठान सुलतानों का शासन था पर उनमें यथेष्ट बंगालीपन आ गया था और वे बँगला साहित्य के समर्थक बन गए थे। ऐसा एक शासक हुसेनशाह था (1493-1519)। उसने चटगाँव के अपने सूबेदारों और पुत्र नासिरुद्दीन नसरत के द्वारा महाभारत का अनुवाद बँगला में करवाया। यह रचना "पांडवविजय" के नाम से कवींद्र द्वारा प्रस्तुत की गई थी।

पदकल्पतरु
वैष्णव गीतकारों तथा जीवनी लेखकों की परंपरा 17वीं शती में चलती रही। जीवनीलेखकों में ईशान नागर (1564) और नित्यानंद (1600 ई.) के बाद यदुनंदनदास (कर्णानंद के लेखक, 1607), राजवल्लभ (कृति मुरलीविलास), मनोहरदास (1652, कृति "अनुरागवल्ली") तथा घनश्याम चक्रवर्ती (कृति, भक्तिरत्नाकर तथा नरोत्तमविलास) का नाम लिया जा सकता है। गीतलेखकों की संख्या 200 से अधिक है। वैष्णव विद्वानों तथा कवियों ने इनके कई संग्रह तैयार किए थे जिनमें से वैष्णवदास (1770 ई.) का "पदकल्पतरु" विशेष प्रसिद्ध है। इसमें 170 कवियों द्वारा रचित 3101 पद आए हैं। रूपराम कृत धर्ममंगल विशेष प्रसिद्ध है जिसमें लाऊसैन के साहसिक कार्यों का वर्णन है। इस कथा के ढंग पर मानिक गांगुलि तथा घनराम चक्रवर्ती ने भी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। एक और कथानक जिसके आधार पर 17वीं, 18वीं शती में रचनाएँ प्रस्तुत की गईं, राजा गोपीचंद का है। वे राजा मानिकचंद्र के पुत्र थे। जब वे गद्दी पर बैठे तो उनकी माता मयनामती को पता चला कि उनके पुत्र को राजपाट तथा स्त्री का परित्याग कर योगी बन जाना चाहिए, नहीं तो उनकी अकालमृत्यु की संभावना है। अत: माता के आदेश से उन्हें ऐसा ही करना पड़ा। भवानीदासकृत "मयनामतिर गान" तथा दुर्लभ मलिक की रचना "गोविंदचंद्र गीत" इसी कथानक पर आधारित हैं।

सती मैना
सिलहट के मुसलमान कवि बहुत दिनों तक सिलेट नागरी" लिपि में बँगला लिखते रहे। उस समय के कुछ मुसलमान कवि ये हैं-दौलत काज़ी, जिसने "लोरचंदा" या "सती मैना" शीर्षक प्रेमकाव्य लिखा, कुरेशी मागन ठाकुर जिसने "चंद्रावती" की रचना की, मुहम्मद खाँ, जिसकी दो रचनाएँ मौतुलहुसेन तथा केयामतनामा प्रसिद्ध हैं; तथा अब्दुल नबी जिसने बड़ी सुंदर शैली में "आमीर हामज़ा" का प्रणयन किया। इनके सिवा 17वीं शती के एक और प्रसिद्ध मुसलिम कवि आला ओल हैं जिनकी कृति "पद्मावती" लोकप्रिय रही। यह हिंदी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की इसी नाम की रचना का रूपांतर है।

अन्नदामंगल
18वीं शती के कुछ प्रसिद्ध कवि ये हैं - रामप्रसाद सेन (मृत्यु 1775) जिनके दुर्गा संबंधी गीत आज भी लोकप्रिय हैं; भारतचंद्र, जिनका "अन्नदामंगल" (या कालिकामंगल) काव्य बँगला की एक परिष्कृत रचना है; राजा जयनारायण, जिन्होंने पद्मपुराण के काशीखंड का बँगला में अनुवाद किया और उस समय के बनारस का बहुत ही मनोरंजक विवरण उसमें समाविष्ट कर दिया। इस काल में हलके फुलके गीतों तथा समस्यापूर्ति के रूप में लिखे गए सद्य:प्रस्तुत पद्यों का काफी जोर रहा। कुछ मुसलमान कवियों ने मुहर्रम तथा कर्बला के संबंध में रचनाएँ प्रस्तुत कीं। लैला मजनू पर दौलत वज़ीर बहराम ने लिखा और मुहम्मद साहब के जीवन पर भी ग्रंथ प्रस्तुत किए गए।

समाचार दर्पण
19वीं सदी में अंग्रेजी भाषा के प्रसार और संस्कृत के नवीन अध्ययन से बँगला के लेखकों में नए जागरण और उत्साह की लहर सी दौड़ गई। एक ओर जहाँ कंपनी सरकार के अधिकारी बँगला सीखने के इच्छुक अंग्रेज कर्मचारियों के लिए बँगला की पाठ्यपुस्तकें तैयार करा रहे थे और बेपतिस्त मिशन के पादरी कृत्तिवासीय रामायण का प्रकाशन तथा बाइबिल आदि का बँगला अनुवाद प्रस्तुत कराने का प्रयत्न कर रहे थे, वहाँ दूसरी ओर बंगाली लेखक भी गद्य-ग्रंथलेखन की ओर ध्यान देने लगे थे। रामराम बसु ने राजा प्रतापादित्य की जीवनी लिखी और मृत्युजंय विद्यालंकार ने बँगला में "पुरुष परीक्षा" लिखी। 1818 में "समाचारदर्पण" नामक साप्ताहिक के प्रकाशन से बँगला पत्रकारिता की भी नींव पड़ी।

शब्द कल्पद्रुम
राजा राममोहन राय ने भारतीयों के "आधुनिक" बनने पर बल दिया। उन्होंने ब्रह्मसमाज की स्थापना की। उन्होंने कतिपय उपनिषदों का बँगला अनुवाद तैयार किया। अंग्रेजी में बँगला व्याकरण (1826) लिखा और अपने धार्मिक तथा सामाजिक विचारों के प्रचारार्थ बँगला और अंग्रेजी, दोनों में छोटी छोटी पुस्तिकाएँ लिखीं। इसी समय राजा राधाकांत देव ने "शब्दकल्पद्रुम" नामक संस्कृत कोष तैयार किया और भवानीचरण बनर्जी ने कलकतिया समाज पर व्यंग्यात्मक रचनाएँ प्रस्तुत कीं।

स्वर्णलता
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अंग्रेजी तथा संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद बँगला में किया और गद्य की सुंदर, सरल शैली का विकास किया। प्यारीचंद मित्र ने "आलालेर घरेर दुलाल" नामक सामाजिक उपन्यास लिखा। अक्षयकुमार दत्त ने विविध विषयों पर कई निबंध लिखे। अन्य गद्यलेखक थे - राजनारायण बसु, ताराशंकर तर्करत्न जिन्होंने "कादंबरी" का संक्षिप्त रूपांतर बँगला में प्रस्तुत किया तथा तारकनाथ गांगुलि ने प्रथम यथार्थवादी सामाजिक उपन्यास "स्वर्णलता" प्रकाशित किया।

आनंदमठ
बंकिमचंद्र चट्टोपध्याय रवींद्रनाथ ठाकुर के आगमन के पूर्व बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक माने जाते हैं। उनका साहित्यिक जीवन अंग्रेजी में लिखित "राजमोहन की स्त्री" नामक उपन्यास (1864) से आरंभ होता है। बँगला में पहला उपन्यास उन्होंने दुगेंशनंदिनी (1865) के नाम से लिखा। इसके बाद उन्होंने एक दर्जन से अधिक सामाजिक तथा ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। इनके कारण बँगला साहित्य में उन्हें स्थायी स्थान प्राप्त हो गया और आधुनिक भारत के विचारशील लेखकों तथा चिंतकों में उनकी गणना होने लगी। 1872 में उन्होंने "बंगदर्शन" नामक साहित्यिक पत्र निकाला जिसने बँगला साहित्य को नया मोड़ दिया। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में राजसिंह, सीताराम, तथा चंद्रशेखर मुख्य हैं। सामाजिक उपन्यासों में "विषवृक्ष" तथा "कृष्णकांतेर विल का स्थान ऊँचा है। उनका "कपालकुंडला" शुद्ध प्रेम और कल्पना का उत्कृष्ट नमूना माना जा सकता है। "आनंदमठ" प्रसिद्ध राजनीतिक उपन्यास है जिसका "वंदेमातरम्" गीत चिरकाल तक भारत का राष्ट्रीयगान माना जाता रहा और आज भी इस रूप में इसका समादर है।

पद्मिनी
एक और प्रसिद्ध व्यक्ति जिसे भारत के पुनर्जागरण में मुख्य स्थान प्राप्त हैं, स्वामी विवेकानंद हैं। भारत की गरीब जनता की सेवा ही उनका लक्ष्य था। उन्होंने अमरीका और यूरोप जाकर अपने प्रभावकारी भाषणों द्वारा हिंदू धर्म का ऐसा विशद विवेचन उपस्थित किया कि उसे पश्चिमी देशों में अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त हो गई। बँगला तथा अंग्रेजी, दोनों के वे प्रभावशील लेखक थे। रंगलाल बंद्योपाध्याय ने राजपूतों की वीरगाथाओं के आधार पर "पद्मिनी", कर्मदेवी तथा सूरसुंदरी  की रचना की। कालिदास के "कुमारसंभव" का बँगला अनुवाद भी उन्होंने प्रस्तुत किया।

यात्रा
बँगला नाटकों का उदय 1870 के आसपास माना जा सकता हैं, यद्यपि इसके पहले भी इस दिशा में कुछ प्रयास किया जा चुका था। बंगाल में पहले एक तरह के धार्मिक नाटक प्रचलित थे जिन्हें यात्रा नाटक कहते थे। इनमें दृश्य और परदे नहीं होते थे, गायन और वाद्य की प्रधानता होती थी। एक रूसी नागरिक जेरासिम लेबेडेव ने 1795 में कलकत्ता आकर बँगला की प्रथम नाट्यशाला स्थापित की, जो चली नहीं। संस्कृत नाटकों के सिवा अंग्रेजी नाटकों तथा कलकत्ते में स्थापित अंग्रेजी रंगमंच से बँगला लेखकों को प्रेरणा मिली। दीनबंधु मित्र ने कई सुखांत नाटक लिखे। उनके एक नाटक नीलदर्पण में निलहे गोरों के उत्पीड़न का मार्मिक चित्रण हुआ था जिससे इस प्रथा की बुराइयाँ दूर करने में सहायता मिली।

हुतोम पेंचार नक्शा
राजा राजेंद्रलाल मित्र इतिहासलेखक और प्रथम बंगाली पुरातत्वज्ञ थे। भूदेव मुखोपाध्याय शिक्षाशास्त्री, गद्यलेखक और पत्रकार थे। समाज और संस्कृति के संरक्षण तथा पुनरुद्धार संबंधी उनके लेखों का आज भी यथेष्ट महत्व है। कालीप्रसन्न सिंह कट्टर हिंदू समाज के एक और प्रगतिशील लेखक थे। उन्होंने महाभारत का बँगला गद्य में तथा संस्कृत के दो नाटकों का भी अनुवाद किया। उन्होंने कलकत्ते की बोलचाल की बँगला में "हुतोम पेंचार नक्शा" नामक रचना प्रस्तुत की जिसमें उस समय के कलकतिया समाज का अच्छा चित्रण किया गया था। बँगला के प्रतिष्ठित साहित्य में इसकी गणना है। हेमचंद बंदोपाध्याय ने शेक्सयिर के दो नाटकों 'रोमियों और जूलियट' तथा 'टेंपेस्ट' का बँगला में अनुवाद किया। मेघनादवध से प्रोत्साहित होकर उन्होंने "वृत्तसंहार" नामक महाकाव्य की रचना की। नवीनचंद्र सेन ने कुरुक्षेत्र, रैवतक तथा प्रभास नाटक बनाए तथा बुद्ध, ईसा और चैतन्य के जीवन पर अमिताभ, ख्रीष्ट तथा अमृताभ नामक लंबी कविताएँ लिखीं। पलासीर युद्ध तथा रंगमती और भानुमती के भी लेखक वही थे। पाँच खंडों में अपनी जीवनी ""आमार जीवन"" भी उन्होंने लिखी।

स्वप्नप्रयाण
रवींद्रानाथ ठाकुर के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ ठाकुर कवि, संगीतज्ञ तथा दर्शनशास्त्री थे। उनकी प्रसिद्ध रचना "स्वप्नप्रयाण" है। रवींद्रनाथ के एक और बड़े भाई ज्योतींद्रनाथ ठाकुर थे। उनके लिखे चार नाटक बड़े लोकप्रिय थे - पुरुविक्रम, सरोजिनी, आशुमती तथा स्वप्नमयी। उन्होंने फ्रेंच भाषा, अंग्रेजी तथा मराठी से भी कई ग्रंथों का अनुवाद किया।

माधवी कंकण
रमेशचंद्र दत्त ने ऋग्वेद का बँगला अनुवाद किया। भारतीय अर्थशास्त्र के भी वे लेखक थे और उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे- राजपूत जीवनसंध्या, महाराष्ट्र जीवनसंध्या; माधवी कंकण; संसार तथा समाज। इनके समसामयिक गिरीशचंद्र घोष बँगला के महान् नाटककार थे। उन्होंने 90 नाटक, प्रहसन आदि लिखे, जिनमें से कुछ ये हैं - बिल्वमंगल, प्रफुल्ल, पांडव गौरव, बुद्धदेवचरित, चैतन्य लीला, सिराजुद्दौला, अशोक, हारानिधि, शंकराचार्य, शास्ति की शांति। शेक्सपियर के मेकबेथ नाटक का बँगला अनुवाद भी उन्होंने किया। अमृतलाल बसु भी गिरीशचंद्र घोष की तरह अभिनेता नाटककार थे। हास्य रस से पूर्ण उनके नाटक तथा प्रहसन बँगला भाषियों में काफी लोकप्रिय हैं। वे बंगाल के मोलिए कहलाते थे, जिस तरह गिरीशचंद्र बंगाली शेक्सपियर माने जाते थे।

देवदास
आधुनिक बँगला के सर्वप्रसिद्ध उपन्यासकार शरच्चंद्र चटर्जी (1876-1938) माने जाते हैं। सरल और सुंदर भाषा में लिखे गए इनके कुछ उपन्यास ये हैं - श्रीकांत, गृहदाह, पल्ली समाज, देना पावना, देवदास, चंद्रनाथ, चरित्रहीन, शेष प्रश्न आदि।

विषाद सिंधु
उपन्यासलेखकों में मशरफ हुसेन का नाम लिया जा सकता है जिनके जंगनामा की तर्ज पर लिखित "विषाद सिंधु" के दर्जनों संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उपन्यासकार काज़ी अब्दुल वदूद ने रवींद्र साहित्य पर विवेचनात्मक पुस्तक लिखने के बाद गेटे पर भी एक ग्रंथ दो खंडों में प्रकाशित किया। केंद्रीय सरकार के पूर्वकालीन वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री हुमायूँ कबीर बँगला के प्रतिभावान् कवि तथा अच्छे गद्यलेखक हैं। कुछ अन्य मुसलिम लेखकों के नाम ये हैं - गुलाम मुस्तफा, अब्दुल कादिर, बंदे अली, फारुख अहमद, एहसान हवीब आदि; डा. मुहम्मद शहीदुल्ला, अवू सैयिद अयूव, मुताहर हुसेन चौधरी, शमसुन नहर आदि।
रवींद्रनाथ ठाकुर के विचारों और शैली ने बँगला साहित्य को नया मोड़ दिया। उनके निबंध स्वस्थ चिंतन एव सुस्पष्ट विवेचन के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके उपन्यास तथा लघुकथाएँ तथ्यात्मक, नाटकीयता पूर्ण एवं अंर्तदृष्टि प्रेरक हैं। वे अंतरराष्ट्रीयता एवं मानव एकता के बराबर समर्थक रहे हैं। उन्होंने अथक रूप से इस बात का प्रयत्न किया कि भारत अपनी गौरवपूर्ण प्राचीन बातों की रक्षा करते हुए भी विश्व के अन्य देशों से एकता स्थापित करने के लिए तत्पर रहे। रवींद्रनाथ के समसामयिक लेखकों में गोर्विदचंद्र दास, देवेंद्रनाथ सेन, अक्षयकुमार बड़ाल, कामिनी राय, सुवर्णकुमारी, अक्षयकुमार मैत्रेय, रामेद्रसुंदर त्रिवेदी, प्रभातकुमार मुखर्जी, द्विजेंद्रलाल राय, क्षीरोदचंद्र विद्याविनोद, राखालदास वंद्योपाध्याय, रामानंद चटर्जी, जलधर सेन, निरुपमा देवी, अनुरूपा देवी के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी तरह अवनींद्रनाथ ठाकुर ने कितनी ही पुस्तकें बालकों की दृष्टि से लिखीं और उनकी चित्रसज्जा स्वयं प्रस्तुत की। ये पुस्तकें कल्पनात्मक साहित्य के अन्य प्रेमियों के लिए भी अत्यंत रोचक हैं। उन्होंने कुछ छोटे-छोटे नाटक भी लिखे और कला पर कुछ गंभीर निबंध भी प्रकाशित किए। इसी तरह योगी अरविंद घोष का भी नाम यहाँ लिया जाना चाहिए जिनकी महत्वपूर्ण रचनाओं से बँगला साहित्य की श्रीवृद्धि में सहायता मिली। चालीस के दशक में बामपंन्थी कवियों का बोलबला रहा जिसमें प्रधान थे बीरेन्द्रनाथ चट्टोपध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, कृष्ण धर प्रमुख। पचास के दशक से पत्रिका-केन्द्रित कवियों का आबिर्भाव हुया, जैसे कि शतभिषा, कृत्तिबास इत्यादि। शतभिषा के आलोक सरकार्, अलोक्रंजन दाशगुप्ता प्रमुखों ने नाम कमाये, जबकि कृत्तिबास के सुनील गंगोपाध्याय, शरतकुमार मुखोपाध्याय, तारापदो राय, समरेन्द्र सेनगुप्ता नाम किये। (विकिपीडिया से साभार)

मराठी साहित्य


मराठी भाषा में लिखी कृतियों का भंडार उपलब्ध है। बांग्ला के साथ मराठी भारतीय-आर्य साहित्य में सबसे पुराना क्षेत्रीय साहित्य है, जिसका कालांकन क़्ररीब 1000 ई. से होता है। 13वीं सदी में दो ब्राह्मण संप्रदाय शुरू हुए, महानुभाव एवं वाराकरी पंथ, दोनों में व्यापक मात्रा में साहित्य लिखा गया। बाद के पंथ में शायद ज़्यादा साहित्य लिखा गया। भक्ति आंदोलन, जिसने 14वीं सदी के शुरू में महाराष्ट्र को अनुप्राणित किया और विशेष रूप से पंढरपुर में विठोबा संप्रदाय के साथ जुड़ने के कारण इसी परंपरा से प्रारंभिक मराठी साहित्य के महान नाम सामने आए। 13वीं सदी में ज्ञानेश्वर, उनके युवा समकालीन नामदेव, जिनके भक्ति गीतों में से कुछ सिक्खों की पवित्र पुस्तक आदि ग्रंथ में शामिल है और 16वीं सदी के लेखक एकनाथ, जिनका सबसे प्रसिद्ध कार्य 'भागवत-पुराण' की 11वीं पुस्तक का मराठी पाठांतर है। महाराष्ट्र के भक्त कवियों में सबसे प्रसिद्ध तुकाराम हैं। जिन्होंने 16वीं सदी में लेखन किया। मराठी का अनूठा योगदान पोवाडा परंपरा है, जो एक योद्धा जाति में लोकप्रिय वीर गाथाएं है। इनमे से प्रथम का कालांकन संभव नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र के महान शिवाजी, योद्धा नायक (ज.-1630), जिन्होंने मुग़ल शासक औरंगज़ेब की सत्ता के ख़िलाफ़ अपनी सेना का नेतृत्व किया था, के समय में यह साहित्यिक परंपरा विशेष रूप से बहुत मह्त्त्वपूर्ण थी।
    मराठी कविता में आधुनिक काल 'केशव सुत' से शुरू हुआ और 19वीं सदी के ब्रिटिश स्वच्छंदतावाद एवं उदारवाद, यूरोपीय राष्ट्रवाद तथा महाराष्ट्र के महान इतिहास से प्रभावित रहा। केशवसुत ने परंपरागत मराठी कविता के ख़िलाफ़ बग़ावत घोषित की और एक मत (1920 में समाप्त) शुरू किया, जिसने घर एवं प्रकृति, गौरवपूर्ण अतीत और शुद्ध गीतिमयता पर ज़ोर दिया। इसके बाद के काल में ‘रविकिरण मंडल’ के नाम से जाने गए कवियों के एक समूह का बोलबाला रहा, जिन्होंने घोषित किया कि कविता पंडितों एवं संवेदनशीलों के लिए नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन का एक अंग है। 1945 के बाद से समकालीन कविता मनुष्य और उसके जीवन को उसकी सभी विविधताओं में खोजती है। यह आत्मपरक एवं व्यक्तिगत है और बोलचाल की भाषा में लिखने की कोशिश करती है। आधुनिक नाटककारों में 'एस.के. कोल्हटकर' एवं 'आर.जी. गडकरी' उल्लेखनीय हैं, 'मामा वरेरकर' यथार्थवाद को पहली बार 20वीं सदी में रंगमंच पर लाए और उन्होंने अपने नाटकों में कई सामाजिक समस्याओं की व्याख्या करने की कोशिश की। हरि नारायण आप्टे की 'मधली स्थिति' (1855; मध्य स्थिति) से मराठी में उपन्यास परंपरा शुरू हुई, जिसमें सामाजिक सुधार का संदेश था। उपन्यास साहित्य में 'वी.एम. जोशी' का काफ़ी ऊंचा स्थान है, जिन्होंने एक महिला की शिक्षा एवं विकास ('सुशीलाचादिवा', 1930) और कला एवं नैतिकता के बीच संबंध (इंदु काले व सरला भोले, 1930) खोजने का प्रयास किया। 1925 के बाद महत्त्वपूर्ण हैं- 'एन.एस फाडके', जिन्होंने ‘कला के लिए कला’ की वकालत की और 'वी.एस. खांडेकर', जिन्होंने इस सिद्धांत का प्रत्युत्तर आदर्शवादी ‘जीवन के लिए कला’ से दिया। उल्लेखनीय समकालीन उपन्यासकार एस.एन. पेंड्से, वी.वी. शिरवाडकर, जी.एन. दांडेकर और रणजीत देसाई हैं।

अँधेरे बंद कमरे -मोहन राकेश


अँधेरे बंद कमरे प्रसिद्ध साहित्यकार, उपन्यासकार और नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1 जनवरी, 2003 को 'राजकमल प्रकाशन' द्वारा हुआ था। वर्तमान भारतीय समाज का अभिजातवर्गीय नागर मन दो हिस्सों में विभाजित है- एक में है पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरे में वंशानुगत संस्कारवाद। इससे इस वर्ग के भीतर जो द्वंद्व पैदा होता है, उससे पूर्वता के बीच रिक्तता, स्वच्छंदता के बीच अवरोध और प्रकाश के बीच अंधकार आ खड़ा होता है। परिणामत: व्यक्ति ऊबने लगता है, भीतर-ही-भीतर क्रोध, ईर्ष्या और संदेह उसे जकड़ लेते हैं, जैसे वह अपने ही लिए अजनबी हो। वह उठता है, और तब इसे हम हरबंस की शक्ल में पहचानते हैं। हरबंस इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है, जो दाम्पत्य संबंधों की तलाश में भटक रहा है। हरबंस और नीलिमा के माध्यम से पारस्परिक ईमानदारी, भावनात्मक लगाव और मानसिक समदृष्टि से रिक्त दांपत्य जीवन का इस उपन्यास में प्रभावशाली चित्रण हुआ है। अपनी पहचान के लिए पहचानहीन होते जा रहे भारतीय अभिजातवर्ग की भौतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक महत्त्वाकांक्षाओं के अँधेरे बंद कमरों को खोलने वाला यह उपन्यास हिन्दी की गिनी-चुनी कथाकृतियों में से एक है।

1857 क्रांति कथा - राही मासूम रज़ा


उर्दू में एक महाकाव्य '1857' जो बाद में हिन्दी में 'क्रांति कथा' नाम से प्रकाशित हुआ। जब खुद को उर्दू का कर्ता-धर्ता मानने वाले कुछ लोगों से इस बात पर बहस हो गई कि यह हिन्दुस्तानी ज़बान सिर्फ फारसी रस्मुलखत में ही लिखी जा सकती है तो राही ने देवनागरी लिपि में लिखना शुरू किया और अंतिम समय तक वे इसी लिपि में ही लिखते रहे। क्रान्ति-कथा उर्फ 1957 में जब प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शताब्दी समारोह मनाया गया उस अवसर पर राही मासूम रज़ा का महाकाव्य ‘अठारह सौ सत्तावन’ प्रकाशित हुआ था। उस समय इतिहासकारों में 1857 के चरित्र को लेकर बहुत विवाद था। बहुत से इतिहासकार उसे सामन्ती व्यवस्था की पुनःस्थापना का आन्दोलन मान रहे थे। उनमें कुछ तो इस सीमा तक बात कर रहे थे कि भारतीय सामन्त अपने खोये हुए राज्यों को प्राप्त करने की लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने भारतीय सिपाहियों और किसानों को धार्मिक नारे देकर अपने साथ किया। 1857 के बारे में यह एक सतही और यांत्रिक समझ थी। वास्तव में वह अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय जनता का महासंग्राम था। इस आन्दोलन में किसान और कारीगर अपने हितों की लड़ाई लड़ रहे थे। इतिहासकार ऐरिक स्टोक ने लिखा है कि मूल किसान भावना कर वसूल करने वालों के विरुद्ध थी। उनसे मुक्ति पाने की थी। चाहे उनका कोई रूप, रंग या राष्ट्रीयता हो। जहाँ-जहाँ ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ था, वहाँ सत्ता विद्रोही जमींदारों और किसानों के हाथों में पहुँच गयी। किसान इस सत्ता में बराबर के शरीक थे। इसके साथ ही भारतीय कारीगरों की माँगें भी इस विद्रोह के घोषणा-पत्र में शामिल थीं। अगस्त 1857 के घोषणा-पत्र में विद्रोही राजकुमार फ़िरोजशाह ने स्पष्ट करते हुए कहा था - 'भारत में अंग्रेजी वस्तुओं को लाकर यूरोप के लोगों ने जुलाहों, दर्जियों, बढ़ई, लुहारों और जूता बनाने वालों को रोज़गार से बाहर कर दिया है और उनके पेशों को हड़प लिया है। इस प्रकार प्रत्येक देशी दस्तकार भिखारी की दशा में पहुँच गया है।'
विद्रोहियों में उद्देश्यों को लेकर अलग-अलग राय थी लेकिन इसका जनचरित्र भी रेखांकित किया जाना चाहिए। अवध में पुराने राजदरबार की भाषा फ़ारसी की जगह हिन्दुस्तानी का प्रयोग किया गया था जिसमें आमने-सामने उर्दू और हिन्दी दोनों पाठ दिये गये हैं। 6 जुलाई 57 को ‘बिरजिस कादर’ नाम से जारी किया गया इश्तहारनामा देश के आम जनता और जमींदारों को सम्बोधित किया गया था जिसमें बहुत सरल भाषा का प्रयोग था और एक सामान्य भाषा की खोज का यह पहला प्रयास है। शायद यह भाषा नीति चलती तो देश में उर्दू-हिन्दी का विवाद न होता। आज धुँधलका साफ़ है। 1857 के अन्तर्विरोधों से गुजरते हुए इतिहासकार इसे स्वतन्त्रता का पहला संग्राम मान रहे हैं। लेकिन राही के सामने उद्देश्य स्पष्ट थे - यह लड़ाई विदेशी शासकों के विरुद्ध थी। इसे हिन्दू-मुसलमान दोनों मिलकर लड़ रहे थे। इसमें सामन्तों के साथ किसान-मजदूर और कारीगर सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहे थे। वे देश में अपना राज्य क़ायम करना चाहते थे जिसमें वे सम्मान के साथ जी सकें। राही के लिए यह संग्राम भारतीय स्वाभिमान का संघर्ष था। देश की अस्मिता का सवाल था। फिर एक ऐसी सामान्य भाषा 1857 में पैदा हो रही थी जो देश की राजभाषा के रूप में विकसित हो सकती थी। वह जनभाषाओं से भी शब्द चयन कर रही थी। फ़ारसी, संस्कृत, अरबी, हिन्दी-उर्दू का भी इस भाषा के विकास में योगदान था। राही इससे चिन्तित नहीं है कि यदि विद्रोही जीत जाते तो शासन का स्वरूप क्या होता। वे आश्वस्त हैं कि निश्चित ही इसका चरित्र जनविरोधी नहीं होता। भारतीय सामन्तों का वह वर्चस्व नहीं होता जो 1857 से पहले था। राही को देश के भविष्य निर्माण में किसानों, मजदूरों और कारीगरों की भूमिका पर बहुत भरोसा है। राही अक्सर कहते थे कि हिन्दू-मुसलमान यदि देश की समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करें तो ये देश सर्वोशिखर पहुँच जाए। 1857 में इस जनएकता से राही बहुत प्रभावित थे। वे सबसे अधिक प्रभावित महिलाओं की भूमिका से थे। पहली बार भारत की स्त्रियों ने अपनी प्रतिभा, त्याग और बलिदान से एक नया इतिहास बनाया। 1857 में उन्होंने ख़ाली बेगम हजरत महल की भूमिका का ही चित्रण नहीं किया है, सबसे अधिक महत्त्व रानी लक्ष्मीबाई तथा उनकी सहयोगी साधारण स्त्रियों को दिया है। ये साधारण स्त्रियाँ अभूतपूर्व संघटन क्षमता, बहादुरी तथा बलिदान का प्रदर्शन करती हैं और उन लोगों पर चोट करती हैं जो स्त्री को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझते हैं। राही ने अपने महाकाव्य में साधारणजन के साथ इन स्त्रियों के शौर्य और पराक्रम का बहुत जीवन्त चित्रण किया है:
सोचता जा रहा है मुसाफ़िर
गिरती दीवारें फिर बन सकेंगी
थालियाँ खिल-खिलाकर हँसेंगी
पूरियाँ फिर घर में छन सकेंगी।
नाज आयेगा खेतों से घर में
खेत छूटेंगे बनिये के घर से
गीत गाऊँगा उस रह गुजर पर
शर्म आती है जिस रह गुजर से
रानी लक्ष्मीबाई पर राही ने अपने महाकाव्य में 40 पृष्ठ लिखे हैं। शायद इतनी लम्बी कविता हिन्दी के किसी कवि ने नहीं लिखी, सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी के ऊपर एक कविता लिखी जो अत्यन्त लोकप्रिय हुई। राही ने रानी के हर पक्ष का वर्णन किया है। राही ने यह महाकाव्य 1957 में उर्दू भाषा में लिखा था। उर्दू में तो कोई महाकाव्य है नहीं लेकिन हिन्दी में भी 1857 के महासमर पर कोई इस तरह का महाकाव्य नहीं है, नाटक और उपन्यास तो हैं। 1965 में ये हिन्दी में छपा जिसकी प्रस्तावना प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. सम्पूर्णानन्द ने लिखी थी। उन्होंने अप्रैल 1965 में लिखा था कि ‘इस पुस्तक का उद्देश्य है सुनो भाइयो-सुनो भाइयो, कथा सुनो-1857 की। सच तो यह है कि उस उद्देश्य को बहुत अच्छी तरह निभाया गया है। लखनऊ, झाँसी और जहाँ-जहाँ उत्तर प्रदेश के खेत रहे- सबका वर्णन बहुत ही मर्मस्पर्शी शब्दों में किया गया है। मुझे विश्वास है हिन्दी भाषी जगत इस पुस्तक का समादर करेगा?’ लेकिन डॉ. सम्पूर्णानन्द की यह आशा हिन्दी जगत ने निराशा में बदल दी। राही और उसके महाकाव्य की घोर उपेक्षा हुआ। मामूली कवियों को महाकवि सिद्ध किया गया और राही जैसे लोग उपेक्षा के शिकार हुए। राही के क्रान्ति-कथा उर्फ ‘अठारह सौ सत्तावन’ को भी याद करना आवश्यक है।
राही ने कहा कि 'इस बात को ताजा करने के लिए हिन्दुस्तानी तवारीख ने मुझे 1857 से बेहतर कोई मिसाल नहीं दी इसलिए मैंने 1857 का इन्तखाब किया। लेकिन 1857 की इस नजम का मौजूं नहीं है। इसका मौंजूं का कोई सन नहीं है इसका मौंजूं इन्सान है। सुकरात ज़हर पी सकता है, इब्ने मरियम को समलूब किया जा सकता है, ब्रोनो को ज़िन्दा जलाया जा सकता है, ऐवस्ट की तलाश में कई कारवाँ गुम हो सकते हैं लेकिन सुकरात हारता नहीं, ईसा की शिकस्त नहीं होती, ब्रोनो साबित क़दम रखता है और ऐवरेस्ट का गुरूर टूट जाता है। मैंने यह नजम चंद किताबों की मदद से अपने कमरे में बैठकर नहीं लिखी है। मैंने इस लड़ाई की शिरकत की है, मैंने जम लगाये हैं, मैं दरख्त पर लटकाया गया हूँ, मुझे मुर्दा समझकर गिद्धों ने नोचा है। मैंने उस बेबसी को महसूस किया है जब आदमी गिद्धों से और गीदड़ों से बचने के लिए अपना जिस्म नहीं हिला सकता है जब आँखों से बेपनाह खौफ़ बेपनाह बेबसी झलकने लगती है। मैंने उस खौफ को भी महसूस किया है जिसे तोपदम होने से पहले हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने किया होगा। मैंने उस दीवानगी के दिन गुजारे हैं जिसमें चन्द हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने किसी मकान में किलाबन्द होकर अँग्रेजों के लश्कर को रोकने का हौसला किया था।'

अंगुत्तरनिकाय - भदंत आनंद कौसल्यायन


अंगुत्तरनिकाय महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथ है। इसके लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन हैं। महाबोधि सभा, कलकत्ता द्वारा इसको वर्तमान समय में प्रकाशित किया गया है। 11 निपातों से युक्त इस निकाय में महात्मा बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को उपदेश में की जाने वाली बातों का वर्णन है। इस निकाय में छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता हैं बौद्ध ग्रन्थ-बौद्धमतावल्बियों ने जिस साहित्य का सृजन किया, उसमें भारतीय इतिहास की जानकारी के लिए प्रचुर सामग्रियाँ उपलब्ध हैं। बौद्ध संघ, भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के लिये आचरणीय नियम विधान विनय पिटक में प्राप्त होते हैं। अंगुत्तरनिकाय की अपनी एक विशेषता है। इसमें सुत्तों का संग्रह एक व्यवस्था के अनुसार किया गया है। इस में ऐसे सुत्त हैं जिनमें बुद्ध भगवान के एक संख्यात्मक पदार्थों विषयक उपदेश संग्रह है, तत्पश्चात दो पदार्थों विषयक सुत्तों का और फिर तीन, चार आदि। इसी क्रम से इस निकाय के भीतर एकनिपात, दुकनिपात एवं तिक, चतुवक, पंचक, छक्क, सत्तक, अट्ठक, नवक, दशक और एकादशक इन नामों के ग्यारह निपातों का संकलन है। ये निपात पुन: वर्गों में विभाजित हैं, जिनकी संख्या निपात क्रम से 21, 16, 16, 26, 12, 9, 9, 9, 22 और 3 है । इस प्रकार 11 निपातों में कुल वर्गों की संख्या 169 है। प्रत्येक वर्ग के भीतर अनेक सुत्त हैं जिनकी संख्या एक वर्ग में कम से कम 7 और अधिक से अधिक 262 है। इस प्रकार अंगुत्तरनिकाय से सुत्तों की संख्या 2308 है।

अंधेर नगरी - भारतेन्दु हरिश्चंद्र


अंधेर नगरी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत व्यंग्यात्मक और रोचक प्रहसन है। इसका नायक 'अन्धेरनगरी' का राजा 'चौपट राजा' है। यह प्रहसन अत्यंत प्रसिद्ध और लोक-प्रचलित है। उसमें छ: अंक हैं।
पहला अंक
पहले अंक में एक महंत अपने दो शिष्यों, नारायणदास और गोबरधनदास में से दूसरे को भिक्षा माँगने के सम्बन्ध में अधिक लोभ न करने का उपदेश देता है।
दूसरा अंक
दूसरे अंक में बाज़ार के विभिन्न व्यापारियों के दृश्य हैं, जिनकी माल बेचने के लिए लगायी गयी आवाज़ों में व्यंग्य की तीव्रता है। शिष्य बाज़ार में हर एक चीज़ टके सेर पाता है और नगरी और राजा का नाम, अन्धेर नगरी - चौपट राजा, ज्ञातकर और मिठाई लेकर महंत के पास वापस आता है।
तीसरा अंक
गोबरधनदास से नगरी का हाल मालूम कर वह ऐसी नगरी में रहना उचित न समझ तीसरे अंक में वहाँ चलने के लिए अपने शिष्यों से कहता है। किंतु गोबरधनदास लोभ के वशीभूत हो वहीं रह जाता है और महंत तथा नारायणदास वहाँ से चले जाते हैं।
चौथा अंक
चौथे अंक में पीनक में बैठा राजा एक फरियादी की बकरी मर जाने पर कल्लू बनिया, कारीगर, चूनेवाले, भिश्ती, कसाई और गड़रिया को छोड़कर अंत में अपने कोतवाल को ही फाँसी का दण्ड देता है, क्योंकि अंततोगत्वा उसकी सवारी निकलने से ही बकरी दबकर मर गयी।
पाँचवा अंक
पाँचवें अंक में कोतवाल गर्दन पतली होने के कारण गोबरधनदास पकड़ा जाता है, ताकि उसकी मोटी गर्दन फाँसी के फन्दे में ठीक बैठे। अब उसे अपने गुरु की बात याद आती है।
छटा अंक
छठे अंक में जब वह फाँसी पर चढाया जाने को है, गुरु जी और नारायणदास आ जाते हैं। गुरु जी गोबरधनदास के कान में कुछ कहते हैं और उसके बाद दोनों में फाँसी पर चढ़ने के लिए होड़ लग जाती है। इसी समय राजा, मंत्री और कोतवाल आते हैं। गुरु जी के यह कहने पर कि इस साइत में जो मरेगा सीधा बैकुण्ठ को जाएगा, मंत्री और कोतवाल में फाँसी पर चढ़ने के लिए प्रतिद्वंतिता उत्पन्न हो जाती है, किंतु राजा के रहते बैकुण्ठ कौन जा सकता है, ऐसा कह राजा स्वयं फाँसी पर चढ़ जाता है।
प्रहसन का उद्देश्य
जिस राज्य में विवेक - अभिवेक का भेद न किया जाय वहाँ की प्रजा सुखी नहीं रह सकती, यह व्यक्त करना ही इस प्रहसन का उद्देश्य है।

अकबरनामा - अबुल फ़ज़ल


अकबरनामा मुग़ल बादशाह अकबर के दरबारी विद्वान अबुल फ़ज़ल द्वारा लिखा गया इतिहास प्रसिद्ध ग्रंथ है। 'अकबरनामा' का शाब्दिक अर्थ है- "अकबर की कहानी"। यह अकबर के शासन काल में लिखा गया प्रामाणिक इतिहास है, क्योंकि लेखक को इसकी बहुत-सी बातों की निजी जानकारी थी और सरकारी काग़ज़ों तक उसकी पहुँच थी। यद्यपि इसमें अकबर के साथ कुछ पक्षपात किया गया है, तथापि तिथियों और भौगोलिक जानकारी के लिए यह विश्वसनीय है। 'अकबरनामा' 'आईन अकबरी' का ही उत्तरार्ध है, जो अबुल फ़ज़ल की कृति है। अबुल फ़ज़ल महान गद्य लेखक थे। अबुल फ़ज़ल की इस कृति में दो हज़ार से अधिक पृष्ठ हैं। इसकी मूल भाषा फारसी जटिल और आडम्बर पूर्ण है। 'आईन अकबरी' और 'अकबरनामा' में तत्कालीन इतिहास और समाज की इतनी विशाल सामग्री इकट्ठा कर दी गई है, जिसे देखकर आश्चर्य होता है और मन नहीं करता कि इसे साढ़े तीन सौ वर्ष पहले का ग्रंथ समझा जाये।
'अकबरनामा' के दो भाग हैं, जो तत्कालीन इतिहास की विभिन्न परिस्थितियों का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करते हैं। अबुल फ़ज़ल की यह कृति ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बहुत ही मूल्यवान है। इसके दो भागों में विवरण सामग्री निम्न प्रकार से प्रस्तुत की गई है- पहले भाग में बाबर, हुमायूँ आदि के बारे में लिखते हुए इतिहास को अकबर के 17वें सनजलूस (1573 ई.) तक लाया गया है। दूसरे भाग में 18वें सनजलूस से 46वें सनजलूस (1601 ई.) तक की बातें हैं। भूमिका में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है- "मैं हिन्दी (भारतवासी) हूँ, फ़ारसी में लिखना मेरा काम नहीं है। बड़े भाई के भरोसे पर यह काम शुरू किया, अफसोस थोड़ा ही लिखा गया था कि उनका देहान्त हो गया, दस वर्ष का हाल उनकी नजर से गुजरा। विद्वान अंग्रेज़ी अनुवादक बिवरिज ने लिखा है कि- "यदि कोई लेखक परिश्रम करके इसके व्यर्थ स्थलों को निकाल कर ज्यों के त्यों रखकर संक्षेप कर दे तो इतिहास की बड़ी सेवा हो।" लेखक डॉ. मथुरा लाल शर्मा ने इसी लक्ष्य को दृष्टि में रखकर अबुल फ़ज़ल के 'अकबरनामा' की तीन जिल्दों की दो जिल्द बना दी हैं, जिसमें 707 पृष्ठ हैं। अकबर के समय की महत्त्वपूर्ण घटना कोई नहीं छोड़ी गई है और यथा-सम्भव अबुल फ़ज़ल के शब्दों में ही उनका वर्णन है, परन्तु भाषा की जटिलता निकालकर सरलता कर दी गई है। यत्र-तत्र लेखक के चाटुतापूर्ण उल्लेखों का भी समावेश कर दिया गया है, जिससे पाठकों को उसकी मनोवृत्ति का अनुमान हो सकेगा। अकबर के समय के इतिहास को जानने के लिये 'अकबरनामा' सर्वाधिक प्रमाणित ग्रन्थ है।