भारत की साहित्य अकादमी भारतीय साहित्य के विकास के लिये सक्रिय कार्य करने वाली राष्ट्रीय संस्था है। इसका गठन १२ मार्च १९५४ को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य उच्च साहित्यिक मानदंड स्थापित करना, भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। सन् 1954 में अपनी स्थापना के समय से ही साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष भारत की अपने द्वारा मान्यता प्रदत्त प्रमुख भाषाओं में से प्रत्येक में प्रकाशित सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक कृति को पुरस्कार प्रदान करती है। पहली बार यह पुरस्कार 1955 में माखनलाल चतुर्वेदी को हिम तरंगिणी (काव्य) पर दिया गया था। उसके बाद वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, रामधारी सिंह 'दिनकर', सुमित्रानंदन पंत, भगवतीचरण वर्मा, अमृत राय, अज्ञेय, डॉ. नगेन्द्र, जैनेन्द्र कुमार, अमृतलाल नागर, हरिवंशराय बच्चन, श्रीलाल शुक्ल, राम विलास शर्मा, नामवर सिंह, भवानीप्रसाद मिश्र, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन, भीष्म साहनी, यशपाल, शमशेर बहादुर सिंह, भारतभूषण अग्रवाल, धूमिल, कृष्णा सोबती, त्रिलोचन, हरिशंकर परसाईं, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, श्रीकांत वर्मा, नरेश मेहता, केदारनाथ सिंह, शिव प्रसाद सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, गिरिराज किशोर, विष्णु प्रभाकर, अशोक वाजपेयी, कुंवर नारायण, सुरेन्द्र वर्मा, लीलाधर जगूड़ी, अरुण कमल, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, अलका सरावगी, राजेश जोशी, कमलेश्वर, वीरेन डंगवाल, मनोहर श्याम जोशी, ज्ञानेन्द्रपति, अमरकांत, गोविन्द मिश्र आदि को दिया जा चुका है।
Monday, 1 July 2013
भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार
भारत की साहित्य अकादमी भारतीय साहित्य के विकास के लिये सक्रिय कार्य करने वाली राष्ट्रीय संस्था है। इसका गठन १२ मार्च १९५४ को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य उच्च साहित्यिक मानदंड स्थापित करना, भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। सन् 1954 में अपनी स्थापना के समय से ही साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष भारत की अपने द्वारा मान्यता प्रदत्त प्रमुख भाषाओं में से प्रत्येक में प्रकाशित सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक कृति को पुरस्कार प्रदान करती है। पहली बार यह पुरस्कार 1955 में माखनलाल चतुर्वेदी को हिम तरंगिणी (काव्य) पर दिया गया था। उसके बाद वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, रामधारी सिंह 'दिनकर', सुमित्रानंदन पंत, भगवतीचरण वर्मा, अमृत राय, अज्ञेय, डॉ. नगेन्द्र, जैनेन्द्र कुमार, अमृतलाल नागर, हरिवंशराय बच्चन, श्रीलाल शुक्ल, राम विलास शर्मा, नामवर सिंह, भवानीप्रसाद मिश्र, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन, भीष्म साहनी, यशपाल, शमशेर बहादुर सिंह, भारतभूषण अग्रवाल, धूमिल, कृष्णा सोबती, त्रिलोचन, हरिशंकर परसाईं, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, श्रीकांत वर्मा, नरेश मेहता, केदारनाथ सिंह, शिव प्रसाद सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, गिरिराज किशोर, विष्णु प्रभाकर, अशोक वाजपेयी, कुंवर नारायण, सुरेन्द्र वर्मा, लीलाधर जगूड़ी, अरुण कमल, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, अलका सरावगी, राजेश जोशी, कमलेश्वर, वीरेन डंगवाल, मनोहर श्याम जोशी, ज्ञानेन्द्रपति, अमरकांत, गोविन्द मिश्र आदि को दिया जा चुका है।
किताबों पर ज्ञानपीठ पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है। भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई २२ भाषाओं में से किसी भाषा में लिखता हो इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में पांच लाख रुपये की धनराशि, प्रशस्तिपत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा दी जाती है। १९६५ में १ लाख रुपये की पुरस्कार राशि से प्रारंभ हुए इस पुरस्कार को २००५ में ७ लाख रुपए कर दिया गया। २००५ के लिए चुने गए हिन्दी साहित्यकार कुंवर नारायण पहले व्यक्ति थे न्हें ७ लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार १९६५ में मलयालम लेखक जी शंकर कुरुप को प्रदान किया गया था। उस समय पुरस्कार की धनराशि १ लाख रुपए थी। १९८२ तक यह पुरस्कार लेखक की एकल कृति के लिये दिया जाता था। लेकिन इसके बाद से यह लेखक के भारतीय साहित्य में संपूर्ण योगदान के लिये दिया जाने लगा। अब तक हिन्दी तथा कन्नड़ भाषा के लेखक सबसे अधिक सात बार यह पुरस्कार पा चुके हैं। यह पुरस्कार बांग्ला को ५ बार, मलयालम को ४ बार, उड़िया, उर्दू और गुजराती को तीन-तीन बार, असमिया, मराठी, तेलुगू, पंजाबी और तमिल को दो-दो बार मिल चुका है। काका कालेलकर, डॉ.संपूर्णानंद, डॉ.बी गोपाल रेड्डी, डॉ.कर्ण सिंह, डॉ.पी.वी.नरसिंह राव, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ.आर.के.दासगुप्ता, डॉ.विनायक कृष्ण गोकाक, डॉ. उमाशंकर जोशी, डॉ.मसूद हुसैन, प्रो.एम.वी.राज्याध्यक्ष, डॉ.आदित्यनाथ झा, श्री जगदीशचंद्र माथुर सदृश विद्वान और साहित्यकार इस परिषद के अध्यक्ष या सदस्य रह चुके हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार में प्रतीक स्वरूप दी जाने वाली वाग्देवी का कांस्य प्रतिमा मूलतः धार, मालवा के सरस्वती मंदिर में स्थित प्रतिमा की अनुकृति है। इस मंदिर की स्थापना विद्याव्यसनी राजा भोज ने १०३५ ईस्वी में की थी। अब यह प्रतिमा ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन में है। भारतीय ज्ञानपीठ ने साहित्य पुरस्कार के प्रतीक के रूप में इसको ग्रहण करते समय शिरोभाग के पार्श्व में प्रभामंडल सम्मिलित किया है। इस प्रभामंडल में तीन रश्मिपुंज हैं जो भारत के प्राचीनतम जैन तोरण द्वार (कंकाली टीला, मथुरा) के रत्नत्रय को निरूपित करते हैं। हाथ में कमंडलु, पुस्तक, कमल और अक्षमाला ज्ञान तथा आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के प्रतीक हैं।
२ मई १९६१ को भारतीय ज्ञानपीठ के संस्थापक श्री साहू शांति प्रसाद जैन के पचासवें जन्म दिवस के अवसर पर उनके परिवार के सदस्यों के मन में यह विचार आया कि साहित्यिक या सांस्कृतिक क्षेत्र में कोई ऐसा महत्वपूर्ण कार्य किया जाए जो राष्ट्रीय गौरव तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमान के अनुरूप हो। इसी विचार के अंतर्गत १६ सितंबर १९६१ को भारतीय ज्ञानपीठ की संस्थापक अध्यक्ष श्रीमती रमा जैन ने न्यास की एक गोष्ठी में इस पुरस्कार का प्रस्ताव रखा। २ अप्रैल १९६२ को दिल्ली में भारतीय ज्ञानपीठ और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संयुक्त तत्त्वावधान में देश की सभी भाषाओं के ३०० मूर्धन्य विद्वानों ने एक गोष्ठी में इस विषय पर विचार किया। इस गोष्ठी के दो सत्रों की अध्यक्षता डॉ वी राघवन और श्री भगवती चरण वर्मा ने की और इसका संचालन डॉ.धर्मवीर भारती ने किया। इस गोष्ठी में काका कालेलकर, हरेकृष्ण मेहताब, निसीम इजेकिल, डॉ. सुनीति कुमार चैटर्जी, डॉ. मुल्कराज आनंद, सुरेंद्र मोहंती, देवेश दास, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, उदयशंकर भट्ट, जगदीशचंद्र माथुर, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. बी.आर.बेंद्रे, जैनेंद्र कुमार, मन्मथनाथ गुप्त, लक्ष्मीचंद्र जैन आदि प्रख्यात विद्वानों ने भाग लिया। इस पुरस्कार के स्वरूप का निर्धारण करने के लिए गोष्ठियाँ होती रहीं और १९६५ में पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार का निर्णय लिया गया।
ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं की सूची पृष्ठ के दाहिनी ओर देखी जा सकती है। इस पुरस्कार के चयन प्रक्रिया जटिल है और कई महीनों तक चलती है। प्रक्रिया का आरंभ विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों, अध्यापकों, समालोचकों, प्रबुद्ध पाठकों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक तथा भाषायी संस्थाओं से प्रस्ताव भेजने के साथ होता है। जिस भाषा के साहित्यकार को एक बार पुरस्कार मिल जाता है उस पर अगले तीन वर्ष तक विचार नहीं किया जाता है। हर भाषा की एक ऐसी परामर्श समिति है जिसमें तीन विख्यात साहित्य-समालोचक और विद्वान सदस्य होते हैं। इन समितियों का गठन तीन-तीन वर्ष के लिए होता है। प्राप्त प्रस्ताव संबंधित 'भाषा परामर्श समिति' द्वारा जाँचे जाते हैं। भाषा समितियों पर यह प्रतिबंध नहीं है कि वे अपना विचार विमर्ष प्राप्त प्रस्तावों तक ही सीमित रखें। उन्हें किसी भी लेखक पर विचार करने की स्वतंत्रता है। भारतीय ज्ञानपीठ, परामर्श समिति से यह अपेक्षा रखती है कि संबद्ध भाषा का कोई भी पुरस्कार योग्य साहित्यकार विचार परिधि से बाहर न रह जाए। किसी साहित्यकार पर विचार करते समय भाषा-समिति को उसके संपूर्ण कृतित्व का मूल्यांकन तो करना ही होता है, साथ ही, समसामयिक भारतीय साहित्य की पृष्ठभूमि में भी उसको परखना होता है। अट्ठाइसवें पुरस्कार के नियम में किए गए संशोधन के अनुसार, पुरस्कार वर्ष को छोड़कर पिछले बीस वर्ष की अवधि में प्रकाशित कृतियों के आधार पर लेखक का मूल्यांकन किया जाता है।
भाषा परामर्श समितियों की अनुशंसाएँ प्रवर परिषद के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं। प्रवर परिषद में कम से कम सात और अधिक से अधिक ग्यारह ऐसे सदस्य होते हैं, जिनकी ख्याति और विश्वसनीयता उच्चकोटि की होती है। पहली प्रवर परिषद का गठन भारतीय ज्ञानपीठ के न्यास-मंडल द्वारा किया गया था। इसके बाद इन सदस्यों की नियुक्ति परिषद की संस्तुति पर होती है। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 3 वर्ष को होता है पर उसको दो बार और बढ़ाया जा सकता है। प्रवर परिषद भाषा परामर्श समितियों की संस्तुतियों का तुलनात्मक मूल्यांकन करती है। प्रवर परिषद के गहन चिंतन और पर्यालोचन के बाद ही पुरस्कार के लिए किसी साहित्यकार का अंतिम चयन होता है। भारतीय ज्ञानपीठ के न्यास मंडल का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता।
किताबों पर नोबेल पुरस्कार
नोबेल फाउंडेशन द्वारा स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में वर्ष १९०१ मे शुरू किया गया यह शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है। इस पुरस्कार के रूप में प्रशस्ति-पत्र के साथ 14 लाख डालर की राशि प्रदान की जाती है। अल्फ्रेड नोबेल ने कुल ३५५ आविष्कार किए जिनमें १८६७ में किया गया डायनामाइट का आविष्कार भी था। नोबेल को डायनामाइट तथा इस तरह के विज्ञान के अनेक आविष्कारों की विध्वंसक शक्ति की बखूबी समझ थी। साथ ही विकास के लिए निरंतर नए अनुसंधान की जरूरत का भी भरपूर अहसास था। दिसंबर १८९६ में मृत्यु के पूर्व अपनी विपुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने एक ट्रस्ट के लिए सुरक्षित रख दिया। उनकी इच्छा थी कि इस पैसे के ब्याज से हर साल उन लोगों को सम्मानित किया जाए जिनका काम मानवजाति के लिए सबसे कल्याणकारी पाया जाए। स्वीडिश बैंक में जमा इसी राशि के ब्याज से नोबेल फाउँडेशन द्वारा हर वर्ष शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र में सर्वोत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है। नोबेल फ़ाउंडेशन की स्थापना २९ जून १९०० को हुई तथा 1901 से नोबेल पुरस्कार दिया जाने लगा। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 1968 से की गई। पहला नोबेल शांति पुरस्कार १९०१ में रेड क्रॉस के संस्थापक ज्यां हैरी दुनांत और फ़्रेंच पीस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष फ्रेडरिक पैसी को संयुक्त रूप से दिया गया। प्रत्येक पुरस्कार एक अलग समिति द्वारा प्रदान किया जाता है। प्रत्येक पुरस्कार विजेता को एक मेडल, एक डिप्लोमा, एक मोनेटरी एवार्ड प्रदान किया जाता है। वर्ष १९०१ में, पहले नोबेल पुरस्कार विजेता को पुरस्कार के रूप में १५०,७८२ स्वीडिश क्रोन दिए गए, जो 2007 के मुताबिक 7,731,004 स्वीडिश क्रोन के बराबर थे। वर्ष 2008 में, विजेताओं को पुरस्कार में १०,०००,००० स्वीडिश क्रोन की राशि दी गई. पुरस्कार स्टॉकहोम में 10 दिसंबर को आयोजित एक समारोह में प्रदान किया जाता है. 10 दिसंबर को ही अल्फ्रेड नोबेल का निधन हुआ था. साहित्य में नोबेल विजेता रहे हैं- सुली प्रुधोम, मॉमसन, बजोर्नसेटजर्न बजॉर्नसन, रुडॉल्फ क्रिस्तोफ़, गेर्हार्ड़जोहान हाफ्थमन पॉपहिजे, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रोमां रोलां, कार्ल फेडरिक जॉर्ज, इवान बूनिन, हरमन, विलियम फाकनर, अल्बेयर कामू, बरीस पास्तेरनाक, ज्याँ पॉल सार्त्र, अलेक्सान्दर सोलझेनित्सिन, पाब्लो नेरूदा, हाइनरिख बॉल, इसाक बेशविस, चेस्लाव मिलोश, एलियास कैनेती, गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेस, वोले शोयिंका, नादीन गोर्दीमेर, विस्साव शिम्बोर्स्का, डेरियो फो, गुंटर ग्रास, एलफ्रेड, हैरॉल्ड पिंटर, ओरहन पैमुक, डोरिस लेसिंग, ज़्याँ मेरी गुस्ताव लेक्लेज़ियो, हर्ता म्यूलर, मारियो वर्गास लियोसा, तोमास त्रांसत्रोमर, मो यान आदि। इसाक बेशविस सिंगर पोलैंड में जन्में एक अमेरिकी लेखक थे। नोबेल पुरस्कार प्राप्त इस महान यहूदी लेखक को यहूदी साहित्य आंदोलन में अंग्रणी स्थान प्राप्त है। सिंगर की शिक्षा वारसा के धार्मिक विद्यालय में हुई थी तथा इनकी रचनाओं में दार्शनिकता की गहराई है। इनका पहला उपन्यास सटान इन गोरे १९५३ में प्रकाशित हुआ। उपन्यासकार ओरहन पामुक का जन्म 1952 इस्तांबुल में हुआ ! उनके माता-पिता इंजनियरिंग में थे, इसलिए उनको भी इसी की सलाह दी गई ! इसके बावजूद वे बचपन में चित्रकार बनना चाहते थे, लेकिन अचानक उनकी रुचि साहित्य की तरफ झुकी और फिर उन्होंने 1974 से अपना लेखन प्रारंभ किया! टर्की में इसके लिए में कोई अनुकूल राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियाँ नहीं थी, वे जिस भाषा में लिखते थे, उस हिसाब भी से विश्व-साहित्य में स्थान बना पाना कठिन था ! घरेलु और बाहरी मुश्किलों को झेलते हुए हुए भी उन्होंने अपने लेखन को एक मजबूत दिशा प्रदान की!
Sunday, 30 June 2013
एक पाठक की आपबीती
एक पाठक को हिंदी और अंग्रेजी का एक बहुचर्चित उपन्यास खरीदना था, उन्होंने दोनों स्थितियां इस प्रकार बयान कीं ...
हिंदी
१. किताब किसी भी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं
२. प्रकाशक के वेबसाइट पर गया, परन्तु इधर-उधर हेकड़ी मारता रहा और हाथ कुछ न आया
३ . अंत में फिर से खोजबीन करने पर एक वेबसाइट मिली जो सिर्फ हिंदी किताबों का क्रय-विक्रय करती है
४ . वेबसाइट देख कर लगा कि पता नहीं वास्तविक है या बस यूँ ही । उनके वेबसाइट और हिंदी कि वर्तमान स्तिथि में कोई फर्क न था
५. खैर, सोचा जोखिम ले ही लूं । आश्चर्य तो तब हुआ जब ३-४ ऐसी कृति जो कही और उपलब्ध न था, उनके स्टॉक में दिखाई दे रहा था । दुविधावश मैंने उन्हें फ़ोन लगाकर पुछा तो कहा आप हमे पुस्तकों के नाम ईमेल कर दीजिये, हम पुनः निश्चय करके आपको सूचित कर देंगे ।
६. दुसरे दिन उत्तर आया (मूल्य और भुगतान माध्यम के साथ )
७. मैंने भुगतान कर दिया और इंतज़ार शुरू (न कोई छूट या मुफ्त शिपिंग)
८. ३-४ दिन तक कोई खबर न आने के बाद मैंने उनके दोबारा फ़ोन लगाया तो पता चला कि वह अमुक कूरियर द्वारा प्रेषित किया जा चूका है । कूरियर भी वह जिसका नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना ।
९ . १-२ और प्रतीक्षा करने के बाद मैंने कूरियर वाले को फ़ोन लगाया तो जानकारी दी गयी की वो हमारे क्षेत्र में 'डिलीवर' नहीं करते , उपाय यह कि मुझे हि जाना होगा
१० . दुसरे दिन चिलचिलाती गर्मी में २१ km मोटरसाइकिल चलाकर गया और प्राप्त किया (भाग्य से)
११ . घर आकर खोला तो पुस्तके तो सही थी परन्तु मुझसे मूल्य गलत लिया गया। अंकित मूल्य कुछ और था और मुझसे लिया गया कुछ और
१२ . मैंने फिर से उन्हें ईमेल किया (दाम का जितना फर्क नहीं, उतना मोबाइल बिल आ जाता उन्हें समझाने में )
१३ . उत्तर अपेक्षित है
नौ की मुर्गी तो नहीं कहूँगा क्युकी वो किताबें मेरे लिए अमूल्य है, परन्तु नब्बे का मसाला अवश्य लग गया (पैसा हि नहीं, समय भी )
अंग्रेजी
१. flipkart से लेकर snapdeal पर उपलब्ध
२. २० - ४० प्रतिशत कि छूट और ख़ास दाम के बाद शिपिंग मुफ्त
३. परेशानी तब हुई जब एक हि पुस्तक के कई संस्करण मौजूद थे (वास्तव में चुनाव के लिए ढेर सारा विकल्प)
४. भुगतान के बाद पुस्तके ३-४ दिन में मेरे निजी पुस्तकालय में थीं !
माँ (हिंदी) से रूठा नहीं जाता, अन्यथा भाषा को छोड़ एक भी ऐसा कारण नहीं कि लोग हिंदी क्यों ख़रीदे और पढ़े ... ?
मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर
श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति इन्दौर, हिन्दी के प्रचार, प्रसार और विकास के लिये कार्यरत देश की प्राचीनतम सन्स्थाओ मे से एक है। समिति की स्थापना सन् १९१० में महात्मा गांधी की प्रेरणा से हुई थी। सन १९१८ मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने समिति के इन्दौर स्थित परिसर से ही सबसे पहले हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आव्हान किया था. यहा हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दौरान ही पूज्य बापु ने अहिन्दी भाषी प्रदेशो मे हिन्दी के प्रचार के लिये अपने पुत्र देवदत्त गांधी सहित पान्च लोगो को हिन्दी दूत बनाकर तत्कालीन मद्रास प्रान्त मे भेजा था. इसी अधिवेशन मे तत्कालीन मद्रास प्रान्त मे "हिन्दी प्रचार सभा" की स्थापना का संकल्प लेकर इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु धन संग्रह किया गया था. वर्धा स्थित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना में भी हिन्दी साहित्य समिति की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. इस तरह देश के अहिन्दी भाषी राज्यो मे हिन्दी के प्रचार के पहले प्रयास मे श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति की भूमिका अत्यन्त उल्लेखनीय और प्रभावशाली रही है।
सन १९३५ मे समिति मे पुनः हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया था. इस अधिवेशन की अध्यक्षता भी गांधीजी ने की. समिति द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका "वीणा" देश की एकमात्र पत्रिका है जो सन १९२७ से निरन्तर प्रकाशित हो रही है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारीलाल द्विवेदी, 'निराला','दिनकर' सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा,प्रेमचन्द,जयशन्कर प्रसाद, व्रन्दावन लाल वर्मा, अम्रतलाल नागर तथा माखनलाल चतुर्वेदी सहित देश के लगभग सभी शीर्षस्थ लेखक, कवि, निबन्धकार, कहानीकार और आलोचक नियमित रूप से "वीणा" मे लिखते रहे है. यही कारण है कि विख्यात कवियत्री महादेवी वर्मा अक्सर ये कहा करती थी कि "हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास समिति और वीणा के जिक्र के बिना सदैव अपूर्ण रहेगा".
समिति की स्थापना एक पुस्तकालय के रूप मे हुई थी. अभी भी समिति का पुस्तकालय मध्यप्रदेश के सबसे सम्रद्ध पुस्तकालयो मे से एक है. इसमे लग्भग २५ हजार किताबे सन्ग्रहित है. इस पुस्तकालय का कम्पुटरीकरण कर इसे ई लायब्रेरी के रूप मे विकसित करने के प्रयास किये जा रहे है. हिन्दी भाषा और साहित्य मे उच्च स्तरीय शोध कार्यो को बढावा देने के उद्देश्य से समिति द्वारा डा. पी.डी.शर्मा शोध केन्द्र की स्थापना की गई है. देवी अहिला वि.वि. से मान्यता प्राप्त इस केन्द्र से अप्रेल २०१० तक 55 शोधार्थी अपना शोध पूरा कर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर चुके है.
संस्कृत के वैज्ञानिक आयामो पर शोध को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से समिति ने संस्कृत शोध संस्थान की स्थापना की है। इस शोध केन्द्र का शुभारम्भ भारत के महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिन्ह चौहान, राज्यपाल बलराम जाखड, और इन्दौर की सान्सद श्रीमती सुमित्रा महाजन की उपस्थिति मे किया था. .
समिति के एक विभाग "समसामयिक अध्ययन केन्द्र" द्वारा ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र मे आ रहे नये बदलावो की जानकारी लोगो तक हिन्दी मे पहुचाने का प्रयास किया जाता है. केन्द्र द्वारा आयोजित कार्यक्रमो मे अब तक देश के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. सन्दीप बसु और डा. माशेलकर, न्यायमूर्ति श्री, जे.एस.वर्मा, श्री वी. डी. ज्ञानी, और श्री वी.एस.कोगजे, वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जी, वेद प्रताप वेदिक, श्री बी.जी.वर्गीज और श्री राहुल देव सान्सद श्री नवीन जिन्दल, पूर्व प्रधानमन्त्री, श्री चन्द्रशेखर, पूर्व उपराष्ट्रपति श्री, क्रष्णकान्त, श्री भैरोसिन्ह शेखावत,पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी तथा पूर्व उपप्रधानमन्त्री श्री लालक्रष्ण आडवाणी सहित देश के कई गणमान्यजन समिति के कार्यक्रमो मे भाग ले चुके है.
वर्तमान सन्दर्भो मे समिति, हिन्दी के प्रसार के साथ साथ सभी भारतीय भाषाओ के बीच सम्वाद प्रक्रिया आरम्भ कर भाषायी समन्वयन तथा कम्पुटर एवम सूचना तकनीक के क्षेत्र मे हिन्दी के प्रयोग को बढावा देने की दिशा मे काम कर रही है. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु समिति ने हिन्दी ब्लागिन्ग के प्रशिक्षण हेतु कई कार्यशालाए आयोजित की है. जिनमे श्री रवि रतलामी और श्री प्रतीक श्रीवास्तव ने हिन्दी मे ब्लाग बनाने की विधा का प्रशिक्षण दिया है.
भारत की प्रमुख हिन्दी सेवी संस्थाएँ
नागरी प्रचारिणी सभा । हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग । श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर । अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन । भारतीय भाषा सम्मेलन । दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा । दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई । महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी । राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा । नागरी लिपि परिषद् । सराय । हिन्दी सेवा । महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय । जनभारती । हिंदी कम्प्यूटिंग फाउंडेशन । हिंदी विद्यापीठ, देवघर । महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे । हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद । बम्बई हिंदी विद्यापीठ, मुंबई । गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद । असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी । हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई । मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, बंगलुरु । केरल हिंदी प्रचार सभा, तिरुवनंतपुरम । मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल । कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, बंगलुरु । मैसूर रियासत हिंदी प्रचार समिति, बंगलुरु । सौराष्ट्र रचनात्मक समिति, राजकोट । केंद्रीय सचिवालय, हिंदी परिषद, नई दिल्ली । राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई । विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन, नागपुर । भारतीय भाषा प्रतिष्ठापन परिषद, वाशी, नवी मुंबई । हिंदी अकादमी, दिल्ली । हिंदी साहित्य परिषद, अंबावाड़ी, अहमदाबाद । सृजन सम्मान, छत्तीसगढ़ । अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन, गाजियाबाद । अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ, दिल्ली । हिंदी सेवी महासंघ, इंदौर । राष्ट्रभाषा प्रचार नवयुवक समिति, हैदराबाद । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ । भारतीय भाषा न्यास, मुंबई । आशीर्वाद, मुंबई । कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, बंगलुरु । हिंदी साहित्य सरिता मंच, नासिक । राजस्थानी जागृति समिति, हैदराबाद । हिंदी प्रेमी समिति, हैदराबाद । छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति । अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी समिति । भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता। हिन्दी भवन, नई दिल्ली । हिन्दी प्रचार सभा, मथुरा । साहित्य मण्डल, नाथद्वारा । विज्ञान परिषद् प्रयाग । राष्ट्रभाषा विचार मंच, अम्बाला । मातृभाषा विकास परिषद । अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन । श्री हिन्दी साहित्य समिति, भरतपुर
अमेरिकाः अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, सेलम । हिंदी यूएसए । अखिल विश्व हिन्दी समिति । विश्व हिंदी न्यास समिति ।
कनाडाः हिंदी साहित्य सभा, टोरंटो । अलबर्टा हिंदी परिषद ।
संयुक्त राजशाही
गीतांजलि मल्टीलिंग्वल लिटरेरी सर्किल, ट्रेंट । हिन्दी यूके । कथा यू.के.
नीदरलैंड
हिंदी परिषद, नीदरलैंड्स ।
नेपाल
नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद ।
मॉरीशस
हिन्दी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस । विश्व हिन्दी सचिवालय । हिन्दी संगठन । हिन्दी लेखक संघ
सिंगापुर
हिन्दी सोसायटी, सिंगापुर
आस्ट्रेलिया
हिन्दी समाज, सिडनी
दक्षिण अफ्रीका
दक्षिण अफ्रीका हिन्दी शिक्षा संघ
हिंदी शब्दसागर
हिंदी शब्दसागर हिन्दी भाषा के लिए बनाया गया एक वृहत शब्द-संग्रह है। प्रथम मानक कोश 'हिन्दी शब्दसागर' का निमार्ण नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने किया था। इसका प्रथम प्रकाशन १९२२ - १९२९ के बीच हुआ। यह वैज्ञानिक एवं विधिवत शब्दकोश मूल रूप में चार खण्डों में बना। इसके प्रधान सम्पादक श्यामसुन्दर दास थे तथा बालकृष्ण भट्ठ, लाला भगवानदीन, अमीर सिंह एवं जगन्मोहन थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं आचार्य रामचंद्र वर्मा ने भी इस महान कार्य में सर्वश्रेष्ठ योगदान किया। इसमें लगभग एक लाख शब्द थे। बाद में सन् १९६५ - १९७६ के बीच इसका का परिवर्धित संस्काण ११ खण्डों में प्रकाशित हुआ।
संक्षिप्त इतिहास
हिंदी में सर्वागपूर्ण और बृहत् कोश का अभाव नागरीप्रचारिणी सभा के संचालकों को १८९३ ई० में ही खटका था और उन्होंने एक उत्तम कोश बनाने के विचार से आर्थिक सहायता के लिये दरभंगानरेश महाराजा सर लक्ष्मीश्वर सिंह जी से प्रार्थना की थी । महाराजा ने भी शिशु सभा के उद्देश्य की सराहना करते हुए १२५ रूपये उसकी सहायता के लिये भेजे थे और उसके साथ सहानुभूति प्रकट की थी ।
२३ अगस्त, सन् १९०७ को सभा के परम हितैषी और उत्साही सदस्य श्रीयुक्त रेवरेंड ई० ग्रीव्स ने सभा की प्रबंधकारिणी समिति में यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि हिंदी के एक बृहत् और सर्वागपूर्ण कोश बनाने का भार सभा अपने ऊपर ले; और साथ ही यह भी बतलाया कि यह कार्य किस प्रणाली से किया जाय । सभा ने मि० ग्रीव्स के प्रस्ताव पर विचार करके इस विषय में उचित परामर्श देने के लिये निम्नलिखित सज्जनों की एक उपसमिति नियत कर दी - रेवरेंड ई० ग्रीव्स, महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, पंडित रामनारायण मिश्र बी० ए०, बाबू गोविंददास, बाबू इंद्रनारायण सिंह एम० ए०, छोटेलाला, मुंशी संकटाप्रसाद, पंडित माधवप्रसाद पाठक और श्यामसुन्दर दास ।
९ नवंबर, १९०७ को इस उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें सभा को परामर्श दिया गया कि सभा हिंदीभाषा के दो बड़े कोश बनवावे जिनमें से एक में तो हिंदी शब्दों के अर्थ हिंदी में ही रहें और दूसरे में हिंदी शब्दों के अर्थ अँगरेजी में हों ।
सभा ने इस कार्य के लिये अनेक राजा महाराजों से आर्थिक सहायता प्राप्त की।
सभा ने निश्चित किया कि शब्दसंग्रह का काम वेतन देक कुछ लोगो से कराया जाय । तदनुसार प्रायः १६—१७ आदमी शब्दसंग्रह के काम के लिये नियुक्त कर दिए गए और एक निश्चित प्रणाली पर शब्दसंग्रह का काम होने लगा ।
आरंभ में कोश के सहायक संपादक पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, लाला भागवानदीन और बाबू अमीर सिंह के अतिरिक्त बाबू जगन्मोहन वर्मा, बाबू रामचंद्र वर्मा, पंडित वासुदेव मिश्र, पंडित रामवचनेश मिश्र, पंडित ब्रजभूषण ओझा, श्रीयुत वेशी कवि आदि अनेक सज्जन भी इस शब्दसंग्रह के काम में संमिलित थे। आरंभ में सभा ने यह निश्चित नहीं किया था कि कोश का संपादक कौन बनाया जाय, पर दूसरे वर्ष सभा ने श्यामसुन्दर दास को कोश का प्रधान संपादक बनाना निश्चित किया ।
सन् १९१० के आरंभ में शब्दसंग्रह का कार्य समाप्त हो गया । जिन स्लिपों पर शब्द लिखे गए थे, उनकी संख्या अनुमानतः १० लाख थी, जिनमें से आशा की गई थी कि प्रायः १ लाख (बिना दुहराये) शब्द निकलेंगे, और प्रायः यही बात अंत में हुई भी ।
मई, १९१२ में छपाई का कार्य आरंभ हुआ और एक ही वर्ष के अंदर ९६-९६ पृष्ठों की चार संख्याएँ छपकर प्रकाशित हो गई, जिनमें ८६६६ शब्द थे । सर्वसाधारण में इन प्रकाशित संख्याओं का बहुत अच्छा आदर हुआ ।
इस प्रकार १९१७ तक बराबर काम चलता रहा और कोश की १५ संख्याएं छपकर प्रकाशित हो गई तथा ग्राहकसंख्या में बहुत कुछ वृद्धि हो गई ।
सन् १९२४ में कोश के संबंध मे एक हानिकारक दुर्घटना हो गई थी । आरंभ में शब्दसंग्रह की जो स्लिपें तैयार हुई थी, उनके २२ बंडल कोश कार्यालय से चोरी चले गए । उनमें 'विव्वोक' से 'शं' तक की और 'शय' से 'सही' तक की स्लिपें थी ।
जनवरी, १९२९ को यह कार्य समाप्त हुआ।
इस प्रकार यह बृहत् आयोजन २० वर्ष के निरंतर उद्योग, परिश्रम और अध्यवसाय के अनंतर समाप्त हुआ। इससें सब मिलाकर ९३,११५ शब्दों के अर्थ तथा विवरण दिए गए थे और आरंभ में हिंदी भाषा और साहित्य के विकास का इतिहास भी दे दिया गया था जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तैयार किया था। इस समस्त कार्य में सभा का तबतक १०,२७,३५ रूपये हुए, जिसमें छपाई आदि का भी व्यय संमिलित है।
हिन्दी विश्वकोश
हिन्दी विश्वकोश, नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा हिन्दी में निर्मित एक विश्वकोश है। यह बारह खण्डों में पुस्तक रूप में उपलन्ध है। इसके अलावा यह अन्तरजाल पर पठन के लिये भी नि:शुल्क उपलब्ध है। यह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं है बल्कि इसमें अनेकानेक विषयों का समावेश है।
इतिहास
भारतीय वाङमय में संदर्भग्रंथों - कोश, अनुक्रमणिका, निबंध, ज्ञानसंकलन आदि की परंपरा बहुत पुरानी है। भारतीय भाषाओं में सबसे पहला आधुनिक विश्वकोश श्री नगेंद्र नाथ बसु द्वारा सन् 1911 में संपादित बाँगला विश्वकोश था। बाद में 1916-32 के दौरान 25 भागों में उसका हिंदी रूपांतर प्रस्तुत किया गया। मराठी विश्वकोश की रचना 23 खंडों में श्रीधर व्यकंटेश केतकर द्वारा की गई।
स्वराज्य प्राप्ति के बाद भारतीय विद्वानों का घ्यान आधुनिक भाषाओं के साहित्यों के सभी अंगों को पूरा करने की ओर गया और आधुनिक भारतीय भाषाओं में विश्वकोश निर्माण का श्रीगणेश हुआ। इसी क्रम में नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने सन् 1954 में हिंदी में मौलिक तथा प्रामाणिक विश्वकोश के प्रकाशन का प्रस्ताव भारत सरकार के सम्मुख रखा। इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया और उसकी पहली बैठक 11 फरवरी 1956 में हुई और हिंदी विश्वकोश के निर्माण का कार्य जनवरी 1957 में प्रांरभ हुआ। सन् 1970 तक 12 खंडों में इस विश्वकोश का प्रकाशन कार्य पूरा किया गया। सन् 1970 में विश्वकोश के प्रथम तीन खंड अनुपलब्ध हो गए। इसके नवीन तथा परिवर्धित संस्करण का प्रकाशन किया गया।
राजभाषा हिंदी के स्वर्णजयंती वर्ष में राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय) तथा मानवसंसाधन विकास मंत्रालय ने केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को यह उत्तरदायित्व सौंपा कि हिंदी विश्वकोश इंटरनेट पर पर प्रस्तुत किया जाए। तदनुसार केन्द्रीय हिंदी संस्थान,आगरा तथा इलेक्ट्रॉनिक अनुसंधान एवं विकास केंद्र, नोएडा के संयुक्त तत्वावधान में तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त वित्तपोषण से हिंदी विश्वकोश को इंटरनेट पर प्रस्तुत करने का कार्य अप्रैल 2000 में प्रारम्भ हुआ। उपलब्ध प्रस्तुत योजना के अंतर्गत हिंदी विश्वकोश के मूलरूप को इंटरनेट पर प्रस्तुत करता है। अगले चरण में हिंदी विश्वकोश को अद्यतन बनाने का कार्य किया जाना प्रस्तावित है। इंटरनेट पर उपलन्ध हिन्दी विश्वकोश का यह अभी शून्य संस्करण है।
नागरी प्रचारिणी सभा का पुस्तक संसार
नागरीप्रचारिणी सभा, हिंदी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार और प्रसार करनेवाली भारत की अग्रणी संस्था है। भारतेन्दु युग के अनंतर हिंदी साहित्य की जो उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ रही हैं उन सबके नियमन, नियंत्रण और संचालन में इस सभा का महत्वपूर्ण योग रहा है।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना १६ जुलाई, १८९३ ई. को श्यामसुंदर दास जी द्वारा हुई थी। यह वह समय था जब अँगरेजी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना क्वीन्स कालेज, वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों - बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कालेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। बाद में १६ जुलाई, १८९३ को इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने निर्धारित की और आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थीं। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले ही साल जो लोग इसके सदस्य बने उनमें महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत ख्याति के विद्वान् थे।
तत्कालीन परिस्थितियों में सभा को अपनी उद्देश्यपूर्ति के लिए आरंभ से ही प्रतिकूलताओं के बीच अपना मार्ग निकालना पड़ा। किंतु तत्कालीन विद्वन्मंडल और जनसमाज की सहानुभूति तथा सक्रिय सहयोग सभा को आरंभ से ही मिलने लगा था, अतः अपनी स्थापना के अनंतर ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरंभ कर दिया। सभा का यह पुस्तकालय देश में हिंदी का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। स्व. ठा. गदाधरसिंह ने अपना पुस्तकालय सभा को प्रदान किया और उसी से इसकी स्थापना सभा में सन् १८९६ ई. में हुई। विशेषतः १९वीं शताब्दी के अंतिम तथा २०वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षो में हिंदी के जो महत्वपूर्ण ग्रंथ और पत्रपत्रिकाएँ छपी थीं उनके संग्रह में यह पुस्तकालय बेजोड़ है। इस समय तक लगभग १५,००० हस्तलिखित ग्रंथ भी इसके संग्रह में हो गए हैं। मुद्रित पुस्तकें डयूई की दशमलव पद्धति के अनुसार वर्गीकृत हैं। इसकी उपयोगिता एकमात्र इसी तथ्य से स्पष्ट है कि हिंदी में शोध करनेवाला कोई भी विद्यार्थी जब तक इस पुस्तकालय का आलोकन नहीं कर लेता तब तक उसका शोधकार्य पूरा नहीं होता। स्व. पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी, स्व. जगन्नाथदास 'रत्नाकर', स्व. पं. मयाशंकर याज्ञिक, स्व. डा. हीरानंद शास्त्री तथा स्व. पं. रामनारायण मिश्र ने अपने अपने संग्रह भी इस पुस्तकालय को दे दिए हैं जिससे इसकी उपादेयता और बढ़ गई हैं।
स्थापित होते ही सभा ने यह लक्ष्य किया कि प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में लोगों के बेठनों में बँधे बँधे नष्ट हो रहे हैं। अतः सन् १९०० से सभा ने अन्वेषकों को गाँव-गाँव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरंभ किया कि किनके यहाँ कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश में तो यह कार्य अब तक बहुत विस्तृत और व्यापक रूप से हो रहा है। इसके अतिरिक्त पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ है। इस खोज की त्रैवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। सन् १९५५ तक की खोज का संक्षिप्त विवरण भी दो भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। इस योजना के परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका है और अनेक अज्ञात लेखक तथा ज्ञात लेखकां की अनेक अज्ञात कृतियाँ प्रकाश में आई हैं।
उत्तमोत्तम ग्रंथों और पत्रपत्रिकाओं का प्रकाशन सभा के मूलभूत उद्देश्यों में रहा है। अब तक सभा द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों के लगभग ५०० ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। त्रैमासिक 'नागरीप्रचारिणी पत्रिका' सभा का मुखपत्र तथा हिंदी की सुप्रसिद्ध शोधपत्रिका है। भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य विषयक शोधात्मक सामग्री इसमें छपती है और निर्व्यवधान प्रकाशित होती रहनेवाली पत्रिकाओं में यह सबसे पुरानी है। मासिक 'हिंदी', 'विधि पत्रिका' और 'हिंदी रिव्यू' (अंगरेजी) नामक पत्रिकाएँ भी सभा द्वारा निकाली गई थीं किंतु कालांतर में वे बंद हो गई। सभा के उल्लेखनीय प्रकाशनों में हिंदी शब्दसागर, हिंदी व्याकरण, वैज्ञानिक शब्दावली, सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, भिखारीदास, पद्माकर, जसवंसिंह, मतिराम आदि मुख्य मुख्य कवियों की ग्रंथावलियाँ, कचहरी-हिंदी-कोश, द्विवेदी अभिनंदनग्रंथ, संपूर्णानंद अभिनंदनग्रंथ, हिंदी साहित्य का इतिहास और हिंदी विश्वकोश आदि ग्रंथ मुख्य हैं।
अपनी समानधर्मा संस्थाओं से संबंधस्थापन, अहिंदीभाषी छात्रों को हिंदी पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति देना, हिंदी की आशुलिपि (शार्टहैंड) तथा टंकण (टाइप राइटिंग) की शिक्षा देना, लोकप्रिय विषयों पर समय-समय पर सुबोध व्याख्यानों का आयोजन करना, प्राचीन और सामयिक विद्वानों के तैलचित्र सभाभवन में स्थापित करना आदि सभा की अन्य प्रवृत्तियाँ हैं।
सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका सरस्वती का श्रीगणेश और उसके संपादनादि की संपूर्ण व्यवस्था आरंभ में इस सभा ने ही की थी। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संमेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। इसी प्रकार, संप्रति हिंदू विश्वविद्यालय में स्थित भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का एक युग तो संरक्षण, पोषण और संवर्धन यह सभा ही करती रही। अंततः जब उसका स्वतंत्र विकास यहाँ अवरुद्ध होने लगा और विश्वविद्यालय में उसकी भविष्योन्नति की संभावना हुई तो सभा ने उसे विश्वविद्यालय को हस्तांतरित कर दिया।
हिन्दी विश्वकोश तथा हिन्दी शब्दसागर
उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त हिन्दी विश्वकोश का प्रणयन सभा ने केंद्रीय सरकार की वित्तीय सहायता से किया है। इसके बारह भाग प्रकाशित हुए हैं। हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन केंद्रीय सरकार की सहायता से सभा ने किया है जो दस खंडों में प्रकाशित हुआ है। यह हिंदी का सर्वाधिक प्रामाणिक तथा विस्तृत कोश है। दो अन्य छोटे कोशों 'लघु शब्दसागर' तथा 'लघुतर शब्दसागर' का प्रणयन भी छात्रों की आवश्यकतापूर्ति के लिए सभा ने किया है। सभा देवनागरी लिपि में भारतीय भाषाओं के साहित्य का प्रकाशन और हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रकाशित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से सक्रिय हैं। प्रेमचंद जी के जन्मस्थान लमही (वाराणसी) में उनका एक स्मारक भी बनवाया है। (विकी पीडिया से साभार)
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये कार्यरत प्रमुख संस्था है। यह उत्तर प्रदेश शासन के भाषा विभाग के अधीन है। अन्य कार्यक्रमों के अलावा हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के लिये साहित्यकारों को यह कई पुरस्कार प्रदान करती है। साहित्यिक केन्द्रों की स्थापना, छात्रों/विदेशी छात्रों को शोध कार्यो हेतु सहायता, फेलोशिप योजना, साहित्यकार कल्याण कोष, स्मृति संरक्षण योजना, बाल साहित्य, संवर्धन योजना। चिकित्सा विज्ञान एवं तकनीकी पुस्तकों का लेखन, भारतीय भाषाओं की प्रमुख कृतियों का अनुवाद, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन। अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन, विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की सहभागिता। भारत भारती, हिन्दी गौरव, महात्मागांधी, अवन्तीबाई, साहित्य भूषण सम्मानों सहित कुल 83 पुरस्कार ( 52 लाख रू0 धनराशि से ) उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान साहित्य, कला, विज्ञान के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान करती है। यह विदेशों में हिंदी के प्रसार में योगदान के लिए भी पुरस्कार देती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार प्रदान करती है। इसके अलावा भारत-भारती सम्मान, लोहिया साहित्य सम्मान, महात्मा गांधी सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान, बालकृष्ण भट्ट पुरस्कार, पत्रकारिता भूषण पुरस्कार, प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण सम्मान, हिंदी विदेश प्रसार सम्मान आदि कई पुरस्कार दिये जाते हैं।
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