Tuesday, 16 December 2014

ओ मेरे बच्चों / जयप्रकाश त्रिपाठी

किसी ने अंधेरे से कह दिया है
कि उजाले में घुल-मिल जाओ
इस तरह और नजर न आओ

Monday, 15 December 2014

हमेशा देर कर देता हूँ मैं / मुनीर नियाज़ी


ज़रूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो, उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
मदद करनी हो उसकी, यार का धाढ़स बंधाना हो
बहुत देरीना रास्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ।

किसी को मौत से पहले, किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ, उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं .....

तुमने ऐसा क्यों किया राधा / जयप्रकाश त्रिपाठी

अब तो एक थी राधा;
गुजरे चार वर्षों से अनायास मेरी पत्नी के साये की तरह।
सुबह आना, शाम आना, मदद में जितना हो सके, घरेलू कामों में हाथ बंटाना,
घंटों साथ-साथ चाय-पानी, हंसी-ठट्ठा,
अपने घर के ढेर सारे दुख-अभाव साझा करना.....

कि 'नौ भाई-बहनों में मैं मझली। बड़ी बहन को टीबी। मुझसे छोटकी की बाबू ने शादी कर दी। मेरी क्यों नहीं!

  'सुबह निकलती हूं घर से गर्मी-जाड़ा-बरसात बारहो महीने। घर-घर झाड़ू-पोछा-बरतन-कपड़ा, साफ-सफाई। देर शाम तक लौट पाती हूं तिरपाल के घर में।

 'ये सब करते हुए दो साल पहले हाईस्कूल कर ली, अब इंटर करने ही वाली हूं, क्या करूंगी पढ़-लिखकर, बाबू पता नहीं कब तक, किसी के हाथ सौंपेंगे भी या नहीं!

 'मां कहती है तेरे इत्ते पैसे से घर नहीं चल रहा, दो-एक घर और पकड़ लेती, चाहे तो उधर ही कहीं रह लिया कर, हफ्ते में एक दिन आकर मिल जाया कर, चाहे तो अगले दिना जाया कर।

 'एक भाई पागल है, पता नहीं कहां कहां महीनो घूम-भटक कर आ जाता है बाबू के पास। बाकी तीन भाई निठल्ले, सभी मुझसे बड़े। गांव मे सोलह बीघे खेत है। बाबू चाहे तो उसी में से एक-दो बीघे निकाल कर मुझे विदा कर सकता है पर मेरे बारे में न वो कुछ सोचता है, न मां।

 'मैं कब तक उनके पेट पालूं। बाबू रोजाना कच्ची शराब पीकर घर में ऊधम करता है। मेरे मोहल्ले के लड़के भी बड़े ऊधमी हैं, सब हरामी, सब। पड़ोस की अधपगली को नोचते रहते हैं। उनके चंगुल से छूटकर वह सबको आपबीती बता देती है, तब भी मुओ को शर्म-हया नहीं। ऐसा कहीं न होगा।

 'मां-बाबू ने क्या इसी लिए जन्माया मुझे। बड़ा गुस्सा आता है खुद पर भी। एक दिन तो घर से बड़े गुस्से में आप के घर आयी थी, ये सोचकर कि आपकी बाहर वाली खिड़की का शीशा तोड़कर कहीं भाग जाऊंगी.... हाहाहाहाहाहा..'

 'ऐसा क्यों?'

 'बस ऐसे ही'

 'अरे, ये क्या बात हुई, ऐसा करना मत कभी, पिट जायेगी'

 'अच्छा, कौन पीटेगा मुझे, आप!'

 'हां, शीशे तोड़ूगी तो मैं भी पीट सकती हूं'

 'अच्छा, इतनी हिम्मत'

 'अरे, पागल हो गयी है क्या?'

.... और परसो दोपहर बारिश के दौरान राधा सचमुच बाहर वाली खिड़की पर बड़ा-सा पत्थर मार कर भाग गयी। ज्यादा नहीं, 370 रुपये की चपत। उसने ऐसा क्यों किया, समझ नहीं पा रहा...डेढ़ हजार रुपये भी मांग ले गयी थी पिछले महीने...
राधा तुम तो ऐसी नहीं थी। क्यों की तुमने ऐसी हरकत!
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Saturday, 13 December 2014

'हिंदुस्तान' से साभार


कोई एक घर टूटने के बहाने/जयप्रकाश त्रिपाठी

एक दिन यशस्वी शायर बशीर बद्र से बमुश्किल परिजनों ने फोन वार्ता करायी। वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं। बात करते समय मुंह से अस्पष्ट, टूटे-फूटे शब्द निकल रहे थे।.....

उन्ही बशीर बद्र को 34 वर्ष पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में सुन रहा था.... 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'।

बस, ये ही पांच-सात शब्द मन में अटक गए आज। आगे की 'घर जलाने' वाली पंक्ति भूल कर मन इसी पेंच में कस गया कि कोई कैसे घर बनाता है, घर क्या सिर्फ दो-चार चुनिंदा दीवारों का नाम होता है, जब हम शहर बदलते हैं, नये ठिकाने पर होते हैं, पुराना ठिकाना छोड़ चुके होते हैं, शहर के किस्सी भी हिस्से में घूम-फिर कर मन वहीं क्यों लौट-लौट जाता है, अपने घरौंदे के बाहर का सब कुछ अजनबी या पराया क्यों बना रह जाता है? जैसेकि हम पहले से इतने टूटे हुए, बिखरे हुए, अपने में सिमटे-दुबके हुए रहने के आदती हो चुके होते हैं कि चौखट के बाहर का कुछ भी चौखट के भीतर जैसा नहीं लग पाता है। हमारे एहसास में तब खलल पड़ता है, जब चौखट के भीतर कुछ टूटता है, जरा-सा भी। बाहर जितना भी ज्यादा टूट-फूट रहा हो, अंदर के तर्क ओढ़ कर हमारा मन उस कोलाहल से आगे भाग लेता है.......

इसलिए मुझे बशीर बद्र की पंक्ति  'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'...सिर्फ 'मकान' के सेंस में नहीं लगती, उसके ढेर सारे अर्थ खुलने लगते हैं मेरे अंदर। अतीत में कितना-कुछ टूटता-बिखरता गया, वे कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे तोड़ा-बिखेरा, बार-बार मैं खुद भी क्यों टूट जाया किया, क्या जाने-अनजाने मुझसे भी कहीं कुछ किसी के हिस्से का टूट-फूट गया.....

और आज भी अक्सर टूट लेता हूं अपने मन की दीवारों के अंदर, क्यों? कैसे-कैसे बिखर लेता हूं अनायास....कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वह मेरे बारे में वैसा क्यों सोचता है, मेरे मन की दीवारों के अंदर अब कहकहे क्यों नहीं गूंजते, टूट गईं क्या ये दीवारें, उन विचारों के बवंडर क्यों नहीं उमड़ते, जिनमें समाया हुआ कभी हवा के संग संग दूर-दूर तक उड़ता चला जाता था, किताबें होती थीं, अलग-अलग जिंदगियों की मेले होते थे, यात्राओं और शब्दों की जादूगरी में किसी के भी पीछे ये घर अपनी जड़ें पीछे छोड़ कर भागने लगता था !  ये घर अब इतने सन्नाटे में क्यों है, चौखट के बाहर का सब कुछ फिर से इतना अजनबी क्यों हो लिया, किसने तोड़ दिया है इन दीवारों को, इन जैसे ढेर सारे सवालों के सिरे से जब भी मैं 'घर' को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश करता हूं, बाहर का सब टूटा-फूटा नजर आता है, जो छतें सही-सलामत दिख-जान पड़ती है, घूर-खंगाल कर उससे में प्रायः उदास हो लेता हूं....

जब उधर से भी उन्मुक्त हंसी कीबरसातें नहीं हुआ करतीं, न गीतों में कोई निराला या आवारा मसीहा आश्वस्त कर रहा होता है.... शायद टूटने का अर्थ छूटना भी होता होगा.....

Thursday, 11 December 2014

मैं हारा हुआ सूफ़ी /शहंशाह आलम

सुना था पहले भी पखावज़, पखावज के भीतर पखावज सुना थाचखा था पहले भी फल, फल के भीतर फल चखा थामहसूसा था उतरती गर्मी को, चढ़ती बारिश को महसूसा थाचैत, वैशाख सबको महसूसा था मैंने, घूमा था अंधेरे में, कोहरे में घूमा थाकोहरे के कोहरे में भी घूमा था सुरक्षित, अकेला नितांत अकेलाअब न शिष्य थे, न शिष्यों के आग्रह, अब बर्बर हँसी थी, चीख़ थीसरसराहट थी भय की, मृत्यु की, पखावज की आवाज़ में, घने कोहरे मेंअब हत्यारे थे विजेता, मैं हारा हुआ सूफ़ी बेचाराअब उन्हीं के प्रार्थना घर, उन्हीं का मज़हब, उन्हीं के ईश्वरीय संगठनउन्हीं की लम्बाई-ऊँचाई, उन्हीं की गुनगुनाहट, स्वर उन्हीं केउन्हीं के हिज्जे, उन्ही के वाक्य, भाषा उन्हीं कीजून, जुलाई, आषाढ़, भादो, धरती, आकाश सब उन्हीं केमैं बस हारा हुआ सूफ़ी बेचारा, इस समकालीन समय में...