Friday, 31 October 2014
संतोष भारतीय का दो टूक
इंडिया न्यूज के क्षेत्रीय चैनलों(यूपी, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश ) पर हर शनिवार को एक शो प्रसारित होता है जिसका नाम है 'दो टूक'। इस विशेष शो का संचालन वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय करते हैं। इस शो में पिछले शनिवार को राम मंदिर विवाद पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया गया और आने वाले शनिवार को भी राम मंदिर विवाद विषय पर ही शो प्रसारित होगा। इस प्रोग्राम के तहत राम मंदिर विवाद के तथ्यात्मक यथार्थ को उजागर करने का प्रयास किया गया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आतंकवाद / राम पुनियानी
आतंकवाद को एक भयावह घटना के साक्ष्य के रूप में देखा गया है। और खासकर आज के मौजूदा समय में। आतंकवाद क्या है, यह अपने आप में ही एक स्तर पर विवाद का विषय है और दूसरे स्तर पर आतंकवाद की परिभाषा व्यक्ति दर व्यक्ति, समूह दर समूह और देश दर देश बदलती रहती है।
कहा नहीं जा सकता कि आखिर अमेरिका स्थित आतंकवाद अनुसंधान केंद्र ने, जो कि इस विषय पर अमेरिकी थिंक टैंक (विचार-विश्लेषण समूह) है, इस मुद्दे को किस तरह से कसौटी पर कसा, लेकिन उसने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जो कि भाजपा, विहिप, बजरंग दल आदि हिंदू संगठनों का पिता है, पर आतंकवादी संगठन का ठप्पा लगा दिया है।
संघ को विश्व के अन्य हिस्सों में बदनाम संगठनों जैसे अल कायदा, लश्कर-ए-तय्यबा, हमास आदि की श्रेणी में रखा गया है संघ की आतंकवादियों के बारे में परिभाषा और समझ को ...... नरेंद्र मोदी ने इस प्रकार व्याख्यायित किया : ‘‘सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, किंतु सारे आतंकवादी मुसलमान है।’’ ऐसा कैसे हुआ कि मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले संगठन पर खुद ऐसा ठप्पा लग गया।
ऐसा लगता है कि आतंकवाद से संबंधित प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं में से उस एक को इस केंद्र ने आधार बनाया है, जो कि राजनीतिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए मासूम लोगों की जान लेता है। यह कहना जरूरी नहीं है कि इस परिभाषा में सामान्यतः सरकारें शामिल नहीं हैं। पिछले दिनों कुछ देशों को आतंकवादी कहा गया है और भारतीय जनता पार्टी अमेरिका से आग्रह करती रही है कि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जाए। कुछ देशों को अमेरिका ने खुद आतंकवादी देशों की सूची में डाला हुआ है। हम राज्य की हिंसा और उसके लक्ष्यों की यहां चर्चा नहीं करेंगे, जो कि काफी जटिल मामला है। हम आतंकवाद को परिभाषित करने वालों के पक्षपात पर भी बात नहीं करेंगे। सीमित रूप में हम ‘राजनीतिक लक्ष्यों के लिए मासूम लोगों की हत्या करने’ की परिभाषा पर बात करेंगे। हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका स्थित इस केंद्र का मूल्यांकन सही है या नहीं।
यहां यह समझना आवश्यक है कि आतंकवाद लक्ष्य-विशेष वाले समूहों की विचारधारा से पैदा होता है। यह समझना और भी अहम है कि वे सभी, जो उस विचारधारा और लक्ष्य को निर्मित करते हैं, जो कि हिंसा की ओर ले जाती है, आतंकवादी है या वे ही असली आतंकवादी हैं। और यदि दोष का बंटवारा किया जाए तो जो तलवार, गोलियां या ए-के-47 का इस्तेमाल करते हैं या जो डब्लू.टी.सी पर विमान जा टकराते हैं या इसी तरह की अन्य कार्यवाई करते हैं, उन्हें ज़्यादा ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए। निश्चय ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक कभी किसी को मारने के लिए व्यक्तिगत तौर पर हथियार नहीं उठायेंगे। यहां तक कि संघ की शाखाओं में प्रशिक्षण मात्र लाठी व डंडा चलाने के लिए दिया जाता है। हां, समय से ताल मिलाते हुए संघ की संतानों, बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी ने बंदूकों का प्रशिक्षण तथा विहिप ने त्रिशूल रूपी छुरों का हजारों की संख्या में वितरण करना शुरू कर दिया है, लेकिन संघ की शाखाओं में इस पर सख्त मनाही है। लाठी चलाने के अलावा प्रशिक्षण का दूसरा हिस्सा बौद्धिक है। यह प्रशिक्षण अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने, धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ नफरत फैलाने पर आधारित है। वह यहां तक कहता है कि हिंदुओं के इस देश में, अन्य यानी मुसलमान और ईसाई विदेशी हैं। इसके अलावा कम्युनिस्ट, मुसलमान और ईसाई हिंदू राष्ट्र के लिए आंतरिक खतरा हैं।
नफरत का जहर हर समुदाय के लिए बना-बनाया है। मुसलमानों की तुलना यवन सर्पों से की गयी है। प्रोफेसर बिपन चंद्रा, शाखा में प्रशिक्षण में क्या होता है, इसको सुनने का अपना अनुभव बताते हैं। रोज सुबह टहलते हुए उन्होंने शाखा में जाने वाले लड़कों को यह बतलाया जाते हुए सुना है कि मुसलमान सांप की तरह होते हैं। सपोले को मारना, सांप को मारने से आसान होता है। इस बौद्धिक अभ्यास का संदेश बिल्कुल साफ है। नफरत की यह प्रेरणा और पद्धति नाजी जर्मनी से लिए गए है।
संघ के सिद्धांतकार गोलवालकर ने इसको कुछ इस तरह से व्याख्यायित किया हैः ‘‘जर्मनों का नस्लीय गौरव आज जीवंत विषय बन गया है। देश की शुद्धता और संस्कृति को बचाए रखने के लिए जर्मनी ने सेमेटिक नस्लों-यहूदियों का, देश से सफाया कर दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। यह राष्ट्र गौरव का चरम है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया है कि आधारभूत तरीके से भिन्न नस्लों का समिश्रण होकर एक होना असंभव है। हम हिंदुस्तानियों के लिए यह एक अच्छा पाठ है, जिसे हमें सीखना चाहिए और उसका फायदा उठाना चाहिए।’’
(एम.एस.गोलवलकर, वी एंड अवर नेशनहुड डिफांइड, नागपुर 1938, पृष्ठ-27)
कभी आश्चर्य होता है कि क्या वास्तव में आर.एस.एस इस पर विश्वास करता होगा। पर स्तब्ध करने वाली बात यह है कि संघ के एक वरिष्ठ सिद्धांतकार ने एक बातचीत के दौरान कहा कि अगर गांधी जैसा कद्दावर व्यक्ति ‘मुस्लिम समस्या’ को हल नहीं कर पाया तो आज के छुटभैये छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों से क्या होने वाला है! उसके अनुसार (और प्रत्यक्षतः संघ के अनुसार) इस समस्या का एक ही हल है, जो ‘अंतिम समाधान’ के रूप में जाना जाता है। यह नफरत की विचारधारा है, जो बाल प्रशिक्षुओं के दिमाग में कूट-कूट कर डाल दी जाती है, और यही वह आधार है जिस पर सांप्रदायिक हिंसा की नींव पड़ती है। आर.एस.एस. की विचारधारा सबसे पहले जिस रूप में साकार हुई, वह थी गोडसे द्वारा गांधी की हत्या। जाहिर है कि संघ ने कभी भी इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि गोडसे आर.एस.एस प्रशिक्षित था और हिंदू महासभा में शामिल होने से पहले संघ का प्रचारक था। उसके भाई गोपाल गोडसे ने अपने अलग-अलग साक्षात्कारों में बार-बार कहा है कि उसने और नाथूराम ने संघ कभी नहीं छोड़ा था।
सांप्रदायिक हिंसा पर जांच आयोगों की अधिकतर रिपोर्टों (जस्टिस रेड्डी, वितयातिल, वेणुगोपाल, मदान आदि) में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आयी है कि हर हिंसक वारदात में किसी ऐसे संगठन की भूमिका रही है जो या तो संघ से संबंधित था या फिर किसी प्रचारक द्वारा चलाया जा रहा था। रणनीति एकदम साफ है। संघ स्वयं सेवकों को प्रशिक्षित करता है जो उसके काम को किसी अन्य संगठन से जुड़कर या कोई अलग संगठन बनाकर आगे बढ़ाते रहते हैं। इस रणनीति का फायदा यह है कि दंगों का दोष सीधा संघ पर नहीं लग सकता।
यह बात याद करने लायक है कि 1937 के चुनाव में धर्म का वास्ता देकर भी चुनाव न जीत पाने के बाद मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने, दूसरे-से-नफरत-करो की अपनी मुहिम तेज कर दी थी। नफरत के ये जहरीले बीज इस दौरान सक्रिय रहे और इनमें 1980 के बाद फल लगने लगे। यह दूसरे-से-नफरत-करो की विचारधारा अलग-अलग कनवेयर बैल्टों से गुजरती है और इसका आखिरी पड़ाव वहां पड़ता है जहां भोले-भाले गरीब समुदाय नफरत की विचारधारा के नशे में धुत, जो कि इच्छित परिणाम के लिए धर्म की भाषा में लपेट कर पिलाई जाती है, हथियार उठा लेते हैं।
हर आतंकवादी संगठन का अपना ही एक एजेंडा होता है अल कायदा को सी.आई.ए. द्वारा वाया पाकिस्तान प्रशिक्षित किया गया ताकि वह अफगानिस्तान पर समाजवादी रूस के कब्जे को उखाड़ सके। तमिलों पर सिंहलियों के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया लिट्टे के रूप में हमारे सामने है। खालिस्तान सिख समुदाय की आर्थिक और सांस्कृतिक आधार पर गहरी असंतुष्टि की प्रतिक्रिया था। उल्फा भी जातीय समस्या को असंवेदनशील तरीके से हल करने की अभिव्यक्ति है। संघ और लीग, विभाजन के पहले, सामंतवादी तत्वों के भय की अभिव्यक्ति थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि आधुनिक शिक्षा, औद्योगिकरण, आजादी, समानता तथा भाईचारे के मूल्य, संघर्षरत जनता की मुख्य विचारधारा बनते जा रहे हैं, उनके मूल्य और मान्यताओं के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। दूसरे, मध्यवर्ग का यही डर, अस्तित्व को लेकर चिंता, संघ की राजनीति में एक निश्चित रूप ले चुकी है। और दलितों और महिलाओं का सामने आना स्वयं के लिए सामाजिक और लैंगिक न्याय की मांग करना है। गूढ़ सामाजिक एजेंडा कुछ भी हो, संघ के काम के तौर तरीके और प्रणाली, विहिप, बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी जैसों को बढ़ावा देते हैं। संभवतः संघ की कार्यप्रणाली के गतिविज्ञान की इसी गहरी समझ के चलते इस अनुसंधान केंद्र ने उसे आतंकवादी संगठन बतलाया हो।
आर.एस.एस का प्रशिक्षण दुतरफा होता है। एक है शारीरिक, खेल वगैरह। दूसरा है बौद्धिक। यह जो दूसरा प्रशिक्षण है वह अपनी संतानों को प्रेरित करता है कि वे लोगों को हथियार उठाने को भड़काएं और ‘दूसरों’ यानी ‘दुश्मन’ को बेदर्दी से कत्ल करें। किसी भी हिंसा या दंगे की चीरफाड़ बहुत ही दिलचस्प और जटिल होती है। कैसे एक आम दलित, आदिवासी, खाली पेट और अनिश्चित भविष्य वाला मजदूर आर.एस.एस के एजेंडे के सिपाही के रूप में परिवर्तित हो जाता है, यह ऐसा पेच है जिसे समाज-विज्ञानियों को समझना होगा। हो सकता है कि आर.एस.एस प्रचारक जब बैठकर धैर्यपूवर्क ‘हिंदू मूल्यों’, ‘हिंदू राष्ट’ª पर चर्चा कर रहा हो, तो आर.एस.एस विचारधारा जनसंख्या के एक हिस्से को मासूमों को मारने के लिए और हिंसा का तांडव मचाने के लिए अपनी गिरफ्त में ले रही हो। इससे संघ हिंदुओं के एक हिस्से को आर.एस.एस के साथ करने का राजनीतिक लक्ष्य तो प्राप्त होता ही है। यह उनकी सत्ता में वापसी या उसकी अपनी ताकत को और मजबूत करता है। जिस परिभाषा से हमने शुरू किया था वह थी सत्ता या राजनीतिक एजेंडा के लिए मासूमों की हत्या करना आतंकवाद है और आर.एस.एस का काम ठीक यही है।
कभी-कभार ऊपरी तौर पर उलझन पैदा कर सकता है कि जैसे ओसामा या विश्व के विभिन्न हिस्सों में एके-47 चलाने वाले आतंकवादियों के विपरीत आर.एस.एस के स्वयं सेवक चुप्पी की मूर्ति नजर आते हैं। और आर.एस.एस के अभियान का यह सबसे ज्यादा चातुर्य से भरा तथा धूर्ततापूर्ण हिस्सा है। स्वयं बिना हथियार उठाए अल्पसंख्यकों को पिटवाना तथा मरवाना और अपने लक्ष्य को पाना। हिंसा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चालबाजी के जरिए दूसरे लोगों के जिम्मे छोड़ दी जाती है। यूं समझिए कि एके-47 निशाना चूक सकता है किंतु आर.एस.एस द्वारा प्रचारित नफरत की विचारधारा द्वारा सक्रिय और जहर भरे गए दिमाग कभी न कभी, कहीं न कहीं, हिंसक बनकर निकलेंगे ही, सवाल मात्रा समय का है। इस संगठन ने आतंकवादी लक्ष्यों के लिए बड़ी चालाकी से संस्कृति का एक झूठा लबादा धारण कर रखा है। यह आतंकवादी संगठन एक पत्थर से कई शिकार करता है, ये चिड़ियाएं हैं समाज के कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय। यह ज़ाहिर है कि इस अनुसंधान केंद्र की सूची से आर.एस.एस के नाम को हटाए जाने के लिए काफी हो-हल्ला मचाया जाएगा पर भारत के अल्पसंख्यकों के बड़े हिस्से और समाज के कमजोर वर्गों के लिए आर.एस.एस की संस्कृति आतंकवाद ही है।
(‘समयांतर’से साभार)
कहा नहीं जा सकता कि आखिर अमेरिका स्थित आतंकवाद अनुसंधान केंद्र ने, जो कि इस विषय पर अमेरिकी थिंक टैंक (विचार-विश्लेषण समूह) है, इस मुद्दे को किस तरह से कसौटी पर कसा, लेकिन उसने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जो कि भाजपा, विहिप, बजरंग दल आदि हिंदू संगठनों का पिता है, पर आतंकवादी संगठन का ठप्पा लगा दिया है।
संघ को विश्व के अन्य हिस्सों में बदनाम संगठनों जैसे अल कायदा, लश्कर-ए-तय्यबा, हमास आदि की श्रेणी में रखा गया है संघ की आतंकवादियों के बारे में परिभाषा और समझ को ...... नरेंद्र मोदी ने इस प्रकार व्याख्यायित किया : ‘‘सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, किंतु सारे आतंकवादी मुसलमान है।’’ ऐसा कैसे हुआ कि मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले संगठन पर खुद ऐसा ठप्पा लग गया।
ऐसा लगता है कि आतंकवाद से संबंधित प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं में से उस एक को इस केंद्र ने आधार बनाया है, जो कि राजनीतिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए मासूम लोगों की जान लेता है। यह कहना जरूरी नहीं है कि इस परिभाषा में सामान्यतः सरकारें शामिल नहीं हैं। पिछले दिनों कुछ देशों को आतंकवादी कहा गया है और भारतीय जनता पार्टी अमेरिका से आग्रह करती रही है कि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जाए। कुछ देशों को अमेरिका ने खुद आतंकवादी देशों की सूची में डाला हुआ है। हम राज्य की हिंसा और उसके लक्ष्यों की यहां चर्चा नहीं करेंगे, जो कि काफी जटिल मामला है। हम आतंकवाद को परिभाषित करने वालों के पक्षपात पर भी बात नहीं करेंगे। सीमित रूप में हम ‘राजनीतिक लक्ष्यों के लिए मासूम लोगों की हत्या करने’ की परिभाषा पर बात करेंगे। हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका स्थित इस केंद्र का मूल्यांकन सही है या नहीं।
यहां यह समझना आवश्यक है कि आतंकवाद लक्ष्य-विशेष वाले समूहों की विचारधारा से पैदा होता है। यह समझना और भी अहम है कि वे सभी, जो उस विचारधारा और लक्ष्य को निर्मित करते हैं, जो कि हिंसा की ओर ले जाती है, आतंकवादी है या वे ही असली आतंकवादी हैं। और यदि दोष का बंटवारा किया जाए तो जो तलवार, गोलियां या ए-के-47 का इस्तेमाल करते हैं या जो डब्लू.टी.सी पर विमान जा टकराते हैं या इसी तरह की अन्य कार्यवाई करते हैं, उन्हें ज़्यादा ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए। निश्चय ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक कभी किसी को मारने के लिए व्यक्तिगत तौर पर हथियार नहीं उठायेंगे। यहां तक कि संघ की शाखाओं में प्रशिक्षण मात्र लाठी व डंडा चलाने के लिए दिया जाता है। हां, समय से ताल मिलाते हुए संघ की संतानों, बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी ने बंदूकों का प्रशिक्षण तथा विहिप ने त्रिशूल रूपी छुरों का हजारों की संख्या में वितरण करना शुरू कर दिया है, लेकिन संघ की शाखाओं में इस पर सख्त मनाही है। लाठी चलाने के अलावा प्रशिक्षण का दूसरा हिस्सा बौद्धिक है। यह प्रशिक्षण अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने, धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ नफरत फैलाने पर आधारित है। वह यहां तक कहता है कि हिंदुओं के इस देश में, अन्य यानी मुसलमान और ईसाई विदेशी हैं। इसके अलावा कम्युनिस्ट, मुसलमान और ईसाई हिंदू राष्ट्र के लिए आंतरिक खतरा हैं।
नफरत का जहर हर समुदाय के लिए बना-बनाया है। मुसलमानों की तुलना यवन सर्पों से की गयी है। प्रोफेसर बिपन चंद्रा, शाखा में प्रशिक्षण में क्या होता है, इसको सुनने का अपना अनुभव बताते हैं। रोज सुबह टहलते हुए उन्होंने शाखा में जाने वाले लड़कों को यह बतलाया जाते हुए सुना है कि मुसलमान सांप की तरह होते हैं। सपोले को मारना, सांप को मारने से आसान होता है। इस बौद्धिक अभ्यास का संदेश बिल्कुल साफ है। नफरत की यह प्रेरणा और पद्धति नाजी जर्मनी से लिए गए है।
संघ के सिद्धांतकार गोलवालकर ने इसको कुछ इस तरह से व्याख्यायित किया हैः ‘‘जर्मनों का नस्लीय गौरव आज जीवंत विषय बन गया है। देश की शुद्धता और संस्कृति को बचाए रखने के लिए जर्मनी ने सेमेटिक नस्लों-यहूदियों का, देश से सफाया कर दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। यह राष्ट्र गौरव का चरम है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया है कि आधारभूत तरीके से भिन्न नस्लों का समिश्रण होकर एक होना असंभव है। हम हिंदुस्तानियों के लिए यह एक अच्छा पाठ है, जिसे हमें सीखना चाहिए और उसका फायदा उठाना चाहिए।’’
(एम.एस.गोलवलकर, वी एंड अवर नेशनहुड डिफांइड, नागपुर 1938, पृष्ठ-27)
कभी आश्चर्य होता है कि क्या वास्तव में आर.एस.एस इस पर विश्वास करता होगा। पर स्तब्ध करने वाली बात यह है कि संघ के एक वरिष्ठ सिद्धांतकार ने एक बातचीत के दौरान कहा कि अगर गांधी जैसा कद्दावर व्यक्ति ‘मुस्लिम समस्या’ को हल नहीं कर पाया तो आज के छुटभैये छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों से क्या होने वाला है! उसके अनुसार (और प्रत्यक्षतः संघ के अनुसार) इस समस्या का एक ही हल है, जो ‘अंतिम समाधान’ के रूप में जाना जाता है। यह नफरत की विचारधारा है, जो बाल प्रशिक्षुओं के दिमाग में कूट-कूट कर डाल दी जाती है, और यही वह आधार है जिस पर सांप्रदायिक हिंसा की नींव पड़ती है। आर.एस.एस. की विचारधारा सबसे पहले जिस रूप में साकार हुई, वह थी गोडसे द्वारा गांधी की हत्या। जाहिर है कि संघ ने कभी भी इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि गोडसे आर.एस.एस प्रशिक्षित था और हिंदू महासभा में शामिल होने से पहले संघ का प्रचारक था। उसके भाई गोपाल गोडसे ने अपने अलग-अलग साक्षात्कारों में बार-बार कहा है कि उसने और नाथूराम ने संघ कभी नहीं छोड़ा था।
सांप्रदायिक हिंसा पर जांच आयोगों की अधिकतर रिपोर्टों (जस्टिस रेड्डी, वितयातिल, वेणुगोपाल, मदान आदि) में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आयी है कि हर हिंसक वारदात में किसी ऐसे संगठन की भूमिका रही है जो या तो संघ से संबंधित था या फिर किसी प्रचारक द्वारा चलाया जा रहा था। रणनीति एकदम साफ है। संघ स्वयं सेवकों को प्रशिक्षित करता है जो उसके काम को किसी अन्य संगठन से जुड़कर या कोई अलग संगठन बनाकर आगे बढ़ाते रहते हैं। इस रणनीति का फायदा यह है कि दंगों का दोष सीधा संघ पर नहीं लग सकता।
यह बात याद करने लायक है कि 1937 के चुनाव में धर्म का वास्ता देकर भी चुनाव न जीत पाने के बाद मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने, दूसरे-से-नफरत-करो की अपनी मुहिम तेज कर दी थी। नफरत के ये जहरीले बीज इस दौरान सक्रिय रहे और इनमें 1980 के बाद फल लगने लगे। यह दूसरे-से-नफरत-करो की विचारधारा अलग-अलग कनवेयर बैल्टों से गुजरती है और इसका आखिरी पड़ाव वहां पड़ता है जहां भोले-भाले गरीब समुदाय नफरत की विचारधारा के नशे में धुत, जो कि इच्छित परिणाम के लिए धर्म की भाषा में लपेट कर पिलाई जाती है, हथियार उठा लेते हैं।
हर आतंकवादी संगठन का अपना ही एक एजेंडा होता है अल कायदा को सी.आई.ए. द्वारा वाया पाकिस्तान प्रशिक्षित किया गया ताकि वह अफगानिस्तान पर समाजवादी रूस के कब्जे को उखाड़ सके। तमिलों पर सिंहलियों के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया लिट्टे के रूप में हमारे सामने है। खालिस्तान सिख समुदाय की आर्थिक और सांस्कृतिक आधार पर गहरी असंतुष्टि की प्रतिक्रिया था। उल्फा भी जातीय समस्या को असंवेदनशील तरीके से हल करने की अभिव्यक्ति है। संघ और लीग, विभाजन के पहले, सामंतवादी तत्वों के भय की अभिव्यक्ति थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि आधुनिक शिक्षा, औद्योगिकरण, आजादी, समानता तथा भाईचारे के मूल्य, संघर्षरत जनता की मुख्य विचारधारा बनते जा रहे हैं, उनके मूल्य और मान्यताओं के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। दूसरे, मध्यवर्ग का यही डर, अस्तित्व को लेकर चिंता, संघ की राजनीति में एक निश्चित रूप ले चुकी है। और दलितों और महिलाओं का सामने आना स्वयं के लिए सामाजिक और लैंगिक न्याय की मांग करना है। गूढ़ सामाजिक एजेंडा कुछ भी हो, संघ के काम के तौर तरीके और प्रणाली, विहिप, बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी जैसों को बढ़ावा देते हैं। संभवतः संघ की कार्यप्रणाली के गतिविज्ञान की इसी गहरी समझ के चलते इस अनुसंधान केंद्र ने उसे आतंकवादी संगठन बतलाया हो।
आर.एस.एस का प्रशिक्षण दुतरफा होता है। एक है शारीरिक, खेल वगैरह। दूसरा है बौद्धिक। यह जो दूसरा प्रशिक्षण है वह अपनी संतानों को प्रेरित करता है कि वे लोगों को हथियार उठाने को भड़काएं और ‘दूसरों’ यानी ‘दुश्मन’ को बेदर्दी से कत्ल करें। किसी भी हिंसा या दंगे की चीरफाड़ बहुत ही दिलचस्प और जटिल होती है। कैसे एक आम दलित, आदिवासी, खाली पेट और अनिश्चित भविष्य वाला मजदूर आर.एस.एस के एजेंडे के सिपाही के रूप में परिवर्तित हो जाता है, यह ऐसा पेच है जिसे समाज-विज्ञानियों को समझना होगा। हो सकता है कि आर.एस.एस प्रचारक जब बैठकर धैर्यपूवर्क ‘हिंदू मूल्यों’, ‘हिंदू राष्ट’ª पर चर्चा कर रहा हो, तो आर.एस.एस विचारधारा जनसंख्या के एक हिस्से को मासूमों को मारने के लिए और हिंसा का तांडव मचाने के लिए अपनी गिरफ्त में ले रही हो। इससे संघ हिंदुओं के एक हिस्से को आर.एस.एस के साथ करने का राजनीतिक लक्ष्य तो प्राप्त होता ही है। यह उनकी सत्ता में वापसी या उसकी अपनी ताकत को और मजबूत करता है। जिस परिभाषा से हमने शुरू किया था वह थी सत्ता या राजनीतिक एजेंडा के लिए मासूमों की हत्या करना आतंकवाद है और आर.एस.एस का काम ठीक यही है।
कभी-कभार ऊपरी तौर पर उलझन पैदा कर सकता है कि जैसे ओसामा या विश्व के विभिन्न हिस्सों में एके-47 चलाने वाले आतंकवादियों के विपरीत आर.एस.एस के स्वयं सेवक चुप्पी की मूर्ति नजर आते हैं। और आर.एस.एस के अभियान का यह सबसे ज्यादा चातुर्य से भरा तथा धूर्ततापूर्ण हिस्सा है। स्वयं बिना हथियार उठाए अल्पसंख्यकों को पिटवाना तथा मरवाना और अपने लक्ष्य को पाना। हिंसा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चालबाजी के जरिए दूसरे लोगों के जिम्मे छोड़ दी जाती है। यूं समझिए कि एके-47 निशाना चूक सकता है किंतु आर.एस.एस द्वारा प्रचारित नफरत की विचारधारा द्वारा सक्रिय और जहर भरे गए दिमाग कभी न कभी, कहीं न कहीं, हिंसक बनकर निकलेंगे ही, सवाल मात्रा समय का है। इस संगठन ने आतंकवादी लक्ष्यों के लिए बड़ी चालाकी से संस्कृति का एक झूठा लबादा धारण कर रखा है। यह आतंकवादी संगठन एक पत्थर से कई शिकार करता है, ये चिड़ियाएं हैं समाज के कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय। यह ज़ाहिर है कि इस अनुसंधान केंद्र की सूची से आर.एस.एस के नाम को हटाए जाने के लिए काफी हो-हल्ला मचाया जाएगा पर भारत के अल्पसंख्यकों के बड़े हिस्से और समाज के कमजोर वर्गों के लिए आर.एस.एस की संस्कृति आतंकवाद ही है।
(‘समयांतर’से साभार)
रामकुमार कृषक

कपड़ा-लत्ता जूता-शूता जी-भर पास नहीं
भीतर आम नहीं हो पाता, बाहर ख़ास नहीं
जिए ज़माने भर की ख़ातिर, घर को भूल गए
उर-पुर की सीता पर रीझे, खीजे झूल गए
राजतिलक ठुकराया, भाया पर वनवास नहीं
भाड़ फोड़ने निकले इकले, हुए पजलने को
मिले कमेरे हाथ/ मिले पर खाली मलने को
धँसने को धरती है उड़ने को आकाश नहीं
औरों को दुख दिया नहीं, सुख पाते भी कैसे
कल परसों क्या यों जाएंगे, आए थे जैसे
गुज़रे बरसों-बरस, गुज़रते बारह मास नहीं ।
चूहा और मैं / हरिशंकर परसाई
चाहता तो लेख का शीर्षक ''मैं और चूहा'' रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।
इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है।
लगभग पैंतालिस दिन घर बन्द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला, तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाश में भड़भड़ाता होगा। क्रॉकरी और डिब्बों में खाना तलाशता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा। उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था।
जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी।
दिन-भर वह आनन्द से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा।
पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्बा भेज देती। खाकर मैं डब्बा बन्द करके रख देता। चूहाराम निराश हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोशनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।
मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता।
वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता। एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया।
मैं बड़ा परेशान। क्या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया, तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा।
चूहा दिन-भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती, मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।
आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता है - ''क्यों, बे, तू आ गया है। भर-पेट खा रहा है, मगर मैं भूखा मर रहा हूँ मैं इस घर का सदस्य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब निकाली।''
रात को मैंने भोजन का डब्बा खोला, तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा दिए। सुबह देखा कि वह सब खा गया है।
एक दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्श पर डाल दिए। चूहा आया, सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्द नहीं। मैं चूहे की पसन्द से चमत्कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।
अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्बा खोला, तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख शान्त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्श पर डाल देता। वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता।
इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता।
फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा, ''चल रे, मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके, डरा के, खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।''
अब दोनों चूहाराम मजें में खा रहे हैं।
मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्या चूहे से भी बद्तर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?
सफेद गुड़ / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
दुकान पर सफेद गुड़ रखा था। दुर्लभ था। उसे देखकर बार-बार उसके मुँह से पानी आ जाता था। आते-जाते वह ललचाई नजरों से गुड़ की ओर देखता, फिर मन मसोसकर रह जाता।
आखिरकार उसने हिम्मत की और घर जाकर माँ से कहा। माँ बैठी फटे कपड़े सिल रही थी। उसने आँख उठाकर कुछ देर दीन दृष्टि से उसकी ओर देखा, फिर ऊपर आसमान की ओर देखने लगी और बड़ी देर तक देखती रही। बोली कुछ नहीं। वह चुपचाप माँ के पास से चला गया। जब माँ के पास पैसे नहीं होते तो वह इसी तरह देखती थी। वह यह जानता था।
वह बहुत देर गुमसुम बैठा रहा, उसे अपने वे साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे। ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती। एकाध बार उसके मन में माँ के बटुए से पैसे चुराने का भी ख्याल आया। यह ख्याल आते ही वह अपने को धिक्कारने लगा और इस बुरे ख्याल के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने लगा।
उसकी उम्र ग्यारह साल की थी। घर में माँ के सिवा कोई नहीं था। हालाँकि माँ कहती थी कि वे अकेले नहीं हैं, उनके साथ ईश्वर है। वह चूँकि माँ का कहना मानता था इसलिए उसकी यह बात भी मान लेता था। लेकिन ईश्वर के होने का उसे पता नहीं चलता था। माँ उसे तरह-तरह से ईश्वर के होने का यकीन दिलाती। जब वह बीमार होती, तकलीफ में कराहती तो ईश्वर का नाम लेती और जब अच्छी हो जाती तो ईश्वर को धन्यवाद देती। दोनों घंटों आँख बंद कर बैठते। बिना पूजा किए हुए वे खाना नहीं खाते। वह रोज सुबह-शाम अपनी छोटी-सी घंटी लेकर, पालथी मारकर संध्या करता। उसे संध्या के सारे मंत्र याद थे, उस समय से ही जब उसकी जबान तोतली थी। अब तो यह साफ बोलने लगा था।
वे एक छोटे-से कस्बे में रहते थे। माँ एक स्कूल में अध्यापिका थी। बचपन से ही वह ऐसी कहानियाँ माँ के सुनता था। जिनमें यह बताया जाता था कि ईश्वर अपने भक्तों का कितना ख्याल रखते हैं। और हर बार ऐसी कहानी सुनकर वह ईश्वर का सच्चा भक्त बनने की इच्छा से भर जाता। दूसरे भी उसके पीठ ठोंकते, और कहते, 'बड़ा शरीफ लड़का है। ईश्वर उसकी मदद करेगा।' वह भी जानता कि ईश्वर उसकी मदद करेगा। लेकिन कभी इसका कोई सबूत उसे नहीं मिला था।
उस दिन जब वह सफेद गुड़ खाने के लिए बेचैन था तब उसे ईश्वर याद आया। उसने खुद को धिक्कारा, उसे माँ से पैसे माँगकर माँ को दुखी नहीं करना चाहिए था। ईश्वर किस दिन के लिए है? ईश्वर का ख्याल आते ही वह खुश हो गया। उसके अंदर एक विचित्र-सा उत्साह आ गया। क्योंकि वह जनता था कि ईश्वर सबसे अधिक ताकतवर है। वह सब जगह है और सब कुछ कर सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके। तो क्या वह थोड़ा-सा गुड़ नहीं दिला सकता? उसे जो कि बचपन से ही उसकी पूजा करता आ रहा है और जिसने कभी कोई बुरा काम नहीं किया। कभी चोरी नहीं की, किसी को सताया नहीं। उसने सोचा और इस भाव से भर उठा कि ईश्वर जरूर उसे गुड़ देगा।
वह तेजी से उठा और घर के अकेले कोने में पूजा करने बैठ गया। तभी माँ ने आवाज दी, 'बेटा, पूजा से उठने के बाद बाजार से नमक ले आना।'
उसे लगा जैसे ईश्वर ने उसकी पुकार सुन ली है। वरना पूजा पर बैठते ही माँ उसे बाजार जाने को क्यों कहती। उसने ध्यान लगाकर पूजा की, फिर पैसे और झोला लेकर बाजार की ओर चल दिया।
घर से निकलते ही उसे खेत पार करने पड़ते थे, फिर गाँव की गली जो ईंटों की बनी हुई हुई थी, फिर बाजार की ओर चल दिया।
उस समय शाम हो गई थी। सूरज डूब रहा था। वह खेतों में चला जा रहा था, आँखें आधी बंद किए, ईश्वर पर ध्यान लगाए और संध्या के मंत्रो को बार-बार दोहराते हुए। उसे याद नहीं उसने कितनी देर में खेत पार किए, लेकिन जब वह गाँव की ईंटों की गली में आया तब सूरज डूब चुका था और अंधेरा छाने लगा था। लोग अपने-अपने घरों में थे। धुआँ उठ रहा था। चौपाए खामोश खड़े थे। नीम सर्दी के दिन थे।
उसने पूरी आँख खोलकर बाहर का कुछ भी देखने की कोशिश नहीं की। वह अपने भीतर देख रहा था जहाँ अँधेरे में एक झिलमिलाता प्रकाश था। ईश्वर का प्रकाश और उस प्रकाश के आगे वह आँखें बंद किए मंत्रपाठ कर रहा था।
अचानक उसे अजान की आवाज सुनाई दी। गाँव के सिरे पर एक छोटी-सी मस्जिद थी। उसने थोड़ी-सी आँखें खोलकर देखा। अँधेरा काफी गाढ़ा हो गया था। मस्जिद के एक कमरे बराबर दालान में लोग नमाज के लिए इकट्ठे होने लगे थे। उसके भीतर एक लहर-सी आई। उसके पैर ठिठक गए। आँखें पूरी बंद हो गईं। वह मन-ही-मन कह उठा, 'ईश्वर यदि तुम हो और सच्चे मन से तुम्हारी पूजा की है तो मुझे पैसे दो, यहीं इसी वक्त।'
वह वहीं गली में बैठ गया। उसने जमीन पर हाथ रखा। जमीन ठंडी थी। हाथों के नीचे कुछ चिकना-सा महसूस हुआ। उल्लास की बिजली-सी उसके शरीर में दौड़ गई। उसने आँखें खोलकर देखा। अँधेरे में उसकी हथेली में अठन्नी दमक रही थी। वह मन-ही-मन ईश्वर के चरणों में लोट गया। खुशी के समुद्र में झूलने लगा। उसने उस अठन्नी को बार-बार निहारा, चूमा, माथे से लगाया। क्योंकि वह एक अठन्नी ही नहीं था। उस गरीब पर ईश्वर की कृपा थी। उसकी सारी पूजा और सच्चाई का ईश्वर की ओर से इनाम था। ईश्वर जरूर है, उसका मन चिल्लाने लगा। भगवान मैं तुम्हारा बहुत छोटा-सा सेवक हूँ। मैं सारा जीवन तुम्हारी भक्ति करूँगा। मुझे कभी मत बिसराना। उलटे-सीधे शब्दों में उसने मन-ही-मन कहा और बाजार की तरफ दौड़ पड़ा। अठन्नी उसने जोर से हथेली में दबा रखी थी।
जब वह दुकान पर पहुँचा तो लालटेन जल चुकी थी। पंसारी उसके सामने हाथ जोड़े बैठा था। थोड़ी देर में उसने आँख खोली और पूछा, 'क्या चाहिए?'
उसने हथेली में चमकती अठन्नी देखी और बोला, 'आठ आने का सफेद गुड़।'
यह कहकर उसने गर्व से अठन्नी पंसारी की तरफ गद्दी पर फेंकी। पर यह गद्दी पर न गिर उसके सामने रखे धनिए के डिब्बे में गिर गई। पंसारी ने उसे डिब्बे में टटोला पर उसमें अठन्नी नहीं मिली। एक छोटा-सा खपड़ा (चिकना पत्थर) जरूर था जिसे पंसारी ने निकाल कर फेंक दिया।
उसका चेहरा एकदम से काला पड़ गया। सिर घूम गया। जैसे शरीर का खून निकाल गया हो। आँखें छलछला आईं।
'कहाँ गई अठन्नी!' पंसारी ने भी हैरत से कहा।
उसे लगा जैसे वह रो पड़ेगा। देखते-देखते सबसे ताकतवर ईश्वर की उसके सामने मौत हो गई थी। उसने मरे हाथों से जेब से पैसे निकाले, नमक लिया और जाने लगा।
दुकानदार ने उसे उदास देखकर कहा, 'गुड़ ले लो, पैसे फिर आ जाएँगे।'
'नहीं।' उसने कहा और रो पड़ा।
'अच्छा पैसे मत देना। मेरी ओर से थोड़ा-सा गुड़ ले लो।' दुकानदार ने प्यार से कहा और एक टुकड़ा तोड़कर उसे देने लगा। उसने मुँह फिरा लिया और चल दिया। उसने ईश्वर से माँगा था, दुकानदार से नहीं। दूसरों की दया उसे नहीं चाहिए।
लेकिन अब वह ईश्वर से कुछ नहीं माँगता।
आखिरकार उसने हिम्मत की और घर जाकर माँ से कहा। माँ बैठी फटे कपड़े सिल रही थी। उसने आँख उठाकर कुछ देर दीन दृष्टि से उसकी ओर देखा, फिर ऊपर आसमान की ओर देखने लगी और बड़ी देर तक देखती रही। बोली कुछ नहीं। वह चुपचाप माँ के पास से चला गया। जब माँ के पास पैसे नहीं होते तो वह इसी तरह देखती थी। वह यह जानता था।
वह बहुत देर गुमसुम बैठा रहा, उसे अपने वे साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे। ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती। एकाध बार उसके मन में माँ के बटुए से पैसे चुराने का भी ख्याल आया। यह ख्याल आते ही वह अपने को धिक्कारने लगा और इस बुरे ख्याल के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने लगा।
उसकी उम्र ग्यारह साल की थी। घर में माँ के सिवा कोई नहीं था। हालाँकि माँ कहती थी कि वे अकेले नहीं हैं, उनके साथ ईश्वर है। वह चूँकि माँ का कहना मानता था इसलिए उसकी यह बात भी मान लेता था। लेकिन ईश्वर के होने का उसे पता नहीं चलता था। माँ उसे तरह-तरह से ईश्वर के होने का यकीन दिलाती। जब वह बीमार होती, तकलीफ में कराहती तो ईश्वर का नाम लेती और जब अच्छी हो जाती तो ईश्वर को धन्यवाद देती। दोनों घंटों आँख बंद कर बैठते। बिना पूजा किए हुए वे खाना नहीं खाते। वह रोज सुबह-शाम अपनी छोटी-सी घंटी लेकर, पालथी मारकर संध्या करता। उसे संध्या के सारे मंत्र याद थे, उस समय से ही जब उसकी जबान तोतली थी। अब तो यह साफ बोलने लगा था।
वे एक छोटे-से कस्बे में रहते थे। माँ एक स्कूल में अध्यापिका थी। बचपन से ही वह ऐसी कहानियाँ माँ के सुनता था। जिनमें यह बताया जाता था कि ईश्वर अपने भक्तों का कितना ख्याल रखते हैं। और हर बार ऐसी कहानी सुनकर वह ईश्वर का सच्चा भक्त बनने की इच्छा से भर जाता। दूसरे भी उसके पीठ ठोंकते, और कहते, 'बड़ा शरीफ लड़का है। ईश्वर उसकी मदद करेगा।' वह भी जानता कि ईश्वर उसकी मदद करेगा। लेकिन कभी इसका कोई सबूत उसे नहीं मिला था।
उस दिन जब वह सफेद गुड़ खाने के लिए बेचैन था तब उसे ईश्वर याद आया। उसने खुद को धिक्कारा, उसे माँ से पैसे माँगकर माँ को दुखी नहीं करना चाहिए था। ईश्वर किस दिन के लिए है? ईश्वर का ख्याल आते ही वह खुश हो गया। उसके अंदर एक विचित्र-सा उत्साह आ गया। क्योंकि वह जनता था कि ईश्वर सबसे अधिक ताकतवर है। वह सब जगह है और सब कुछ कर सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके। तो क्या वह थोड़ा-सा गुड़ नहीं दिला सकता? उसे जो कि बचपन से ही उसकी पूजा करता आ रहा है और जिसने कभी कोई बुरा काम नहीं किया। कभी चोरी नहीं की, किसी को सताया नहीं। उसने सोचा और इस भाव से भर उठा कि ईश्वर जरूर उसे गुड़ देगा।
वह तेजी से उठा और घर के अकेले कोने में पूजा करने बैठ गया। तभी माँ ने आवाज दी, 'बेटा, पूजा से उठने के बाद बाजार से नमक ले आना।'
उसे लगा जैसे ईश्वर ने उसकी पुकार सुन ली है। वरना पूजा पर बैठते ही माँ उसे बाजार जाने को क्यों कहती। उसने ध्यान लगाकर पूजा की, फिर पैसे और झोला लेकर बाजार की ओर चल दिया।
घर से निकलते ही उसे खेत पार करने पड़ते थे, फिर गाँव की गली जो ईंटों की बनी हुई हुई थी, फिर बाजार की ओर चल दिया।
उस समय शाम हो गई थी। सूरज डूब रहा था। वह खेतों में चला जा रहा था, आँखें आधी बंद किए, ईश्वर पर ध्यान लगाए और संध्या के मंत्रो को बार-बार दोहराते हुए। उसे याद नहीं उसने कितनी देर में खेत पार किए, लेकिन जब वह गाँव की ईंटों की गली में आया तब सूरज डूब चुका था और अंधेरा छाने लगा था। लोग अपने-अपने घरों में थे। धुआँ उठ रहा था। चौपाए खामोश खड़े थे। नीम सर्दी के दिन थे।
उसने पूरी आँख खोलकर बाहर का कुछ भी देखने की कोशिश नहीं की। वह अपने भीतर देख रहा था जहाँ अँधेरे में एक झिलमिलाता प्रकाश था। ईश्वर का प्रकाश और उस प्रकाश के आगे वह आँखें बंद किए मंत्रपाठ कर रहा था।
अचानक उसे अजान की आवाज सुनाई दी। गाँव के सिरे पर एक छोटी-सी मस्जिद थी। उसने थोड़ी-सी आँखें खोलकर देखा। अँधेरा काफी गाढ़ा हो गया था। मस्जिद के एक कमरे बराबर दालान में लोग नमाज के लिए इकट्ठे होने लगे थे। उसके भीतर एक लहर-सी आई। उसके पैर ठिठक गए। आँखें पूरी बंद हो गईं। वह मन-ही-मन कह उठा, 'ईश्वर यदि तुम हो और सच्चे मन से तुम्हारी पूजा की है तो मुझे पैसे दो, यहीं इसी वक्त।'
वह वहीं गली में बैठ गया। उसने जमीन पर हाथ रखा। जमीन ठंडी थी। हाथों के नीचे कुछ चिकना-सा महसूस हुआ। उल्लास की बिजली-सी उसके शरीर में दौड़ गई। उसने आँखें खोलकर देखा। अँधेरे में उसकी हथेली में अठन्नी दमक रही थी। वह मन-ही-मन ईश्वर के चरणों में लोट गया। खुशी के समुद्र में झूलने लगा। उसने उस अठन्नी को बार-बार निहारा, चूमा, माथे से लगाया। क्योंकि वह एक अठन्नी ही नहीं था। उस गरीब पर ईश्वर की कृपा थी। उसकी सारी पूजा और सच्चाई का ईश्वर की ओर से इनाम था। ईश्वर जरूर है, उसका मन चिल्लाने लगा। भगवान मैं तुम्हारा बहुत छोटा-सा सेवक हूँ। मैं सारा जीवन तुम्हारी भक्ति करूँगा। मुझे कभी मत बिसराना। उलटे-सीधे शब्दों में उसने मन-ही-मन कहा और बाजार की तरफ दौड़ पड़ा। अठन्नी उसने जोर से हथेली में दबा रखी थी।
जब वह दुकान पर पहुँचा तो लालटेन जल चुकी थी। पंसारी उसके सामने हाथ जोड़े बैठा था। थोड़ी देर में उसने आँख खोली और पूछा, 'क्या चाहिए?'
उसने हथेली में चमकती अठन्नी देखी और बोला, 'आठ आने का सफेद गुड़।'
यह कहकर उसने गर्व से अठन्नी पंसारी की तरफ गद्दी पर फेंकी। पर यह गद्दी पर न गिर उसके सामने रखे धनिए के डिब्बे में गिर गई। पंसारी ने उसे डिब्बे में टटोला पर उसमें अठन्नी नहीं मिली। एक छोटा-सा खपड़ा (चिकना पत्थर) जरूर था जिसे पंसारी ने निकाल कर फेंक दिया।
उसका चेहरा एकदम से काला पड़ गया। सिर घूम गया। जैसे शरीर का खून निकाल गया हो। आँखें छलछला आईं।
'कहाँ गई अठन्नी!' पंसारी ने भी हैरत से कहा।
उसे लगा जैसे वह रो पड़ेगा। देखते-देखते सबसे ताकतवर ईश्वर की उसके सामने मौत हो गई थी। उसने मरे हाथों से जेब से पैसे निकाले, नमक लिया और जाने लगा।
दुकानदार ने उसे उदास देखकर कहा, 'गुड़ ले लो, पैसे फिर आ जाएँगे।'
'नहीं।' उसने कहा और रो पड़ा।
'अच्छा पैसे मत देना। मेरी ओर से थोड़ा-सा गुड़ ले लो।' दुकानदार ने प्यार से कहा और एक टुकड़ा तोड़कर उसे देने लगा। उसने मुँह फिरा लिया और चल दिया। उसने ईश्वर से माँगा था, दुकानदार से नहीं। दूसरों की दया उसे नहीं चाहिए।
लेकिन अब वह ईश्वर से कुछ नहीं माँगता।
वॉशिंगटन : कैपिटल हिल इन दिनों उजाड़ और भुतहा / ब्रजेश उपाध्याय
कैपिटल हिल इन दिनों उजाड़ और भुतहा नज़र आता है. एक तो चारों तरफ़ सूखे पत्तों की भरमार है, दूसरे इमारत की गुंबद में आई दरारों की मरम्मत के लिए जो उसके इर्द-गिर्द काली-काली लोहे की जालियां लिपटी हुई हैं उनसे एक अलग ही स्पेशल इफ़ेक्ट पैदा हो रहा है.
सांसद और सेनेटर भागे हुए हैं अपने-अपने इलाक़ों में जनता को डराने. आप सोचेंगे कि हैलोवीन का त्योहार है, डरने-डराने का मौसम है. इसमें बच्चे, बूढ़े और जवान तरह-तरह के मुखौटे लगाकर एक-दूसरे को डराते हैं तो सियासतदान क्यों पीछे रहें. लेकिन डराने से मेरा मतलब चुनाव प्रचार से था, यहां दोनों में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है. हैलोवीन में लोगों को डराने के लिए तरह-तरह के मुखौटों का इस्तेमाल होता है. डेमोक्रैट को वोट दोगे तो बंदूक रखने का हक़ छीन लेगा, रिपब्लिकन को जिताओगे तो अर्थव्यवस्था का कचूमर निकाल देगा.
ओबामा के हाथ मज़बूत करोगे तो मुसलमानों का राज हो जाएगा, मुझे वोट नहीं दोगे तो तुम्हारे घर में इस्लामिक स्टेट वाले घुस आएंगे, मेरे दोस्त का साथ नहीं दोगे तो तुम्हारी सारी नौकरियां भारत और चीन चली जाएंगी, वगैरह-वगैरह. सियासतदानों की ख़ासियत ये है कि उन्हें लोगों को डराने के लिए मुखौटे की ज़रूरत नहीं पड़ती या फिर जो चेहरा दिखता है हमें और आपको वो नैचुरल मुखौटा होता है. बेचारी मासूम अमरीकी जनता को तो डरने का बहाना चाहिए होता है. जिसने अच्छे से डराया, उससे चिपक लेती है. लेकिन अब सबसे बड़ा डर उनके लिए पैदा हो गया है ऐप्पल के सीईओ टिम कुक की वजह से. कुक साहब ने सरेआम ऐलान कर दिया है कि वो समलैंगिक हैं और ये भी कह दिया कि उनके लिए भगवान के हाथों से मिला हुआ ये सबसे बड़ा तोहफ़ा है.
इतने बड़े मुकाम पर पहुंचकर, 53 की उम्र में उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी और रुझान दुनिया के सामने क्यों खोल दिया, उस पर अभी अख़बारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं और रंगे जाएंगे. लेकिन मैं तो सोच रहा हूं कि उन लाखों, करोड़ों अमरीकियों का क्या होगा जिनकी जान आईफ़ोन, आईपैड, मैक और आईपॉड में बसती है. हर नया मॉडल लॉन्च होते ही दुकानों के बाहर कतारें लग जाती हैं, डेटिंग, चैटिंग, नौकरी, बैंक, गाड़ी, घर सबकी चाभी तो आईफ़ोन में होती है यहां. कैसे काम चलेगा उनका आईफ़ोन के बगैर? आईफ़ोन में ही रहती है उनकी पर्सनल खिदमतगार सीरी. सीरी रास्ता बताओ, सीरी गाना लगाओ, सीरी मुझसे बातें करो, सीरी मुझे हंसाओ. अब क्या होगा?
अमरीका के 29 राज्यों में किसी भी महिला या पुरुष को फ़ौरन नौकरी से निकाला जा सकता है अगर ये पता चल जाए कि वो समलैंगिक हैं, कुछ साल पहले तक फ़ौज में भी यही हालत थी. ज़्यादातर चर्चों में पादरी उनकी शादी करवाने से इनकार कर देते हैं, बिज़नेस मीटिंग्स में कई बार उन्हें सामने नहीं भेजा जाता कि कहीं दूसरी पार्टी उनसे हाथ मिलाना नहीं पसंद करे. ऐसे में जब ये पता चला है टिम कुक समलैंगिक हैं तो उनके बनाए आईफ़ोन, आईपैड को कंज़रवेटिव अमरीका कैसे हाथ लगाएगा? धर्म भ्रष्ट होने का डर, अगली पीढ़ी के गुमराह होने का डर, चर्च का डर, समाज का डर -- कैसे उबरेगा अमरीका इससे.
अमरीका के अलावा मुझे चिंता सता रही है बाबा रामदेव की भी. उनके योगा क्लासेज़, उनकी अमृतवाणी आई-ट्यूंस पर भी हैं. बाबाजी तो समलैंगिकता को बीमारी मानते हैं. मुझे पूरा यकीन है वो आई-ट्यूंस से रिश्ता तोड़ लेंगे. आख़िर पूरी दुनिया की सेहत ठीक करने का उन्होंने बीड़ा उठाया है. हैलोवीन का डर तो एक-दो दिनों में खत्म हो जाएगा. लेकिन देखिए आईफ़ोन के डर से अमरीका कैसे उबरता है.
(बीबीसी हिंदी से साभार)
सांसद और सेनेटर भागे हुए हैं अपने-अपने इलाक़ों में जनता को डराने. आप सोचेंगे कि हैलोवीन का त्योहार है, डरने-डराने का मौसम है. इसमें बच्चे, बूढ़े और जवान तरह-तरह के मुखौटे लगाकर एक-दूसरे को डराते हैं तो सियासतदान क्यों पीछे रहें. लेकिन डराने से मेरा मतलब चुनाव प्रचार से था, यहां दोनों में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है. हैलोवीन में लोगों को डराने के लिए तरह-तरह के मुखौटों का इस्तेमाल होता है. डेमोक्रैट को वोट दोगे तो बंदूक रखने का हक़ छीन लेगा, रिपब्लिकन को जिताओगे तो अर्थव्यवस्था का कचूमर निकाल देगा.
ओबामा के हाथ मज़बूत करोगे तो मुसलमानों का राज हो जाएगा, मुझे वोट नहीं दोगे तो तुम्हारे घर में इस्लामिक स्टेट वाले घुस आएंगे, मेरे दोस्त का साथ नहीं दोगे तो तुम्हारी सारी नौकरियां भारत और चीन चली जाएंगी, वगैरह-वगैरह. सियासतदानों की ख़ासियत ये है कि उन्हें लोगों को डराने के लिए मुखौटे की ज़रूरत नहीं पड़ती या फिर जो चेहरा दिखता है हमें और आपको वो नैचुरल मुखौटा होता है. बेचारी मासूम अमरीकी जनता को तो डरने का बहाना चाहिए होता है. जिसने अच्छे से डराया, उससे चिपक लेती है. लेकिन अब सबसे बड़ा डर उनके लिए पैदा हो गया है ऐप्पल के सीईओ टिम कुक की वजह से. कुक साहब ने सरेआम ऐलान कर दिया है कि वो समलैंगिक हैं और ये भी कह दिया कि उनके लिए भगवान के हाथों से मिला हुआ ये सबसे बड़ा तोहफ़ा है.
इतने बड़े मुकाम पर पहुंचकर, 53 की उम्र में उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी और रुझान दुनिया के सामने क्यों खोल दिया, उस पर अभी अख़बारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं और रंगे जाएंगे. लेकिन मैं तो सोच रहा हूं कि उन लाखों, करोड़ों अमरीकियों का क्या होगा जिनकी जान आईफ़ोन, आईपैड, मैक और आईपॉड में बसती है. हर नया मॉडल लॉन्च होते ही दुकानों के बाहर कतारें लग जाती हैं, डेटिंग, चैटिंग, नौकरी, बैंक, गाड़ी, घर सबकी चाभी तो आईफ़ोन में होती है यहां. कैसे काम चलेगा उनका आईफ़ोन के बगैर? आईफ़ोन में ही रहती है उनकी पर्सनल खिदमतगार सीरी. सीरी रास्ता बताओ, सीरी गाना लगाओ, सीरी मुझसे बातें करो, सीरी मुझे हंसाओ. अब क्या होगा?
अमरीका के 29 राज्यों में किसी भी महिला या पुरुष को फ़ौरन नौकरी से निकाला जा सकता है अगर ये पता चल जाए कि वो समलैंगिक हैं, कुछ साल पहले तक फ़ौज में भी यही हालत थी. ज़्यादातर चर्चों में पादरी उनकी शादी करवाने से इनकार कर देते हैं, बिज़नेस मीटिंग्स में कई बार उन्हें सामने नहीं भेजा जाता कि कहीं दूसरी पार्टी उनसे हाथ मिलाना नहीं पसंद करे. ऐसे में जब ये पता चला है टिम कुक समलैंगिक हैं तो उनके बनाए आईफ़ोन, आईपैड को कंज़रवेटिव अमरीका कैसे हाथ लगाएगा? धर्म भ्रष्ट होने का डर, अगली पीढ़ी के गुमराह होने का डर, चर्च का डर, समाज का डर -- कैसे उबरेगा अमरीका इससे.
अमरीका के अलावा मुझे चिंता सता रही है बाबा रामदेव की भी. उनके योगा क्लासेज़, उनकी अमृतवाणी आई-ट्यूंस पर भी हैं. बाबाजी तो समलैंगिकता को बीमारी मानते हैं. मुझे पूरा यकीन है वो आई-ट्यूंस से रिश्ता तोड़ लेंगे. आख़िर पूरी दुनिया की सेहत ठीक करने का उन्होंने बीड़ा उठाया है. हैलोवीन का डर तो एक-दो दिनों में खत्म हो जाएगा. लेकिन देखिए आईफ़ोन के डर से अमरीका कैसे उबरता है.
(बीबीसी हिंदी से साभार)
गोविंदा से नाराज़ है मीडिया
फ़िल्मी कार्यक्रमों में बेहद विलंब से आने के लिए मशहूर गोविंदा की आदत अब भी नहीं सुधरी है. गोविंदा अपने करियर के चरम पर नहीं है लेकिन उनकी लेट लतीफ़ी की आदत बदस्तूर जारी है. फ़िल्म 'हैप्पी एंडिंग' के हर प्रमोशनल कार्यक्रम में गोविंदा बेहद विलंब से पधार रहे हैं. बीते दिनों इस फ़िल्म के म्यूज़िक लॉन्च में मीडिया को सात बजे बुलाया गया. सैफ़ अली ख़ान, इलियाना डी क्रूज़ जैसे फ़िल्म के दूसरे सितारे समय पर पहुंचे लेकिन गोविंदा नदारद थे. वो कार्यक्रम में रात 11 बजे पहुंचे यानी चार घंटे देर से. यही नहीं कार्यक्रम के लिए सभी सितारों को मीडिया के सामने परफॉर्म भी करना था जिसके लिए शाम साढ़े चार बजे से रिहर्सल थी. उसमें भी गोविंदा का नामो-निशां नहीं था.
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