Friday, 31 October 2014

सफेद गुड़ / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

दुकान पर सफेद गुड़ रखा था। दुर्लभ था। उसे देखकर बार-बार उसके मुँह से पानी आ जाता था। आते-जाते वह ललचाई नजरों से गुड़ की ओर देखता, फिर मन मसोसकर रह जाता।
आखिरकार उसने हिम्मत की और घर जाकर माँ से कहा। माँ बैठी फटे कपड़े सिल रही थी। उसने आँख उठाकर कुछ देर दीन दृष्टि से उसकी ओर देखा, फिर ऊपर आसमान की ओर देखने लगी और बड़ी देर तक देखती रही। बोली कुछ नहीं। वह चुपचाप माँ के पास से चला गया। जब माँ के पास पैसे नहीं होते तो वह इसी तरह देखती थी। वह यह जानता था।
वह बहुत देर गुमसुम बैठा रहा, उसे अपने वे साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे। ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती। एकाध बार उसके मन में माँ के बटुए से पैसे चुराने का भी ख्याल आया। यह ख्याल आते ही वह अपने को धिक्कारने लगा और इस बुरे ख्याल के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने लगा।
उसकी उम्र ग्यारह साल की थी। घर में माँ के सिवा कोई नहीं था। हालाँकि माँ कहती थी कि वे अकेले नहीं हैं, उनके साथ ईश्वर है। वह चूँकि माँ का कहना मानता था इसलिए उसकी यह बात भी मान लेता था। लेकिन ईश्वर के होने का उसे पता नहीं चलता था। माँ उसे तरह-तरह से ईश्वर के होने का यकीन दिलाती। जब वह बीमार होती, तकलीफ में कराहती तो ईश्वर का नाम लेती और जब अच्छी हो जाती तो ईश्वर को धन्यवाद देती। दोनों घंटों आँख बंद कर बैठते। बिना पूजा किए हुए वे खाना नहीं खाते। वह रोज सुबह-शाम अपनी छोटी-सी घंटी लेकर, पालथी मारकर संध्या करता। उसे संध्या के सारे मंत्र याद थे, उस समय से ही जब उसकी जबान तोतली थी। अब तो यह साफ बोलने लगा था।
वे एक छोटे-से कस्बे में रहते थे। माँ एक स्कूल में अध्यापिका थी। बचपन से ही वह ऐसी कहानियाँ माँ के सुनता था। जिनमें यह बताया जाता था कि ईश्वर अपने भक्तों का कितना ख्याल रखते हैं। और हर बार ऐसी कहानी सुनकर वह ईश्वर का सच्चा भक्त बनने की इच्छा से भर जाता। दूसरे भी उसके पीठ ठोंकते, और कहते, 'बड़ा शरीफ लड़का है। ईश्वर उसकी मदद करेगा।' वह भी जानता कि ईश्वर उसकी मदद करेगा। लेकिन कभी इसका कोई सबूत उसे नहीं मिला था।
उस दिन जब वह सफेद गुड़ खाने के लिए बेचैन था तब उसे ईश्वर याद आया। उसने खुद को धिक्कारा, उसे माँ से पैसे माँगकर माँ को दुखी नहीं करना चाहिए था। ईश्वर किस दिन के लिए है? ईश्वर का ख्याल आते ही वह खुश हो गया। उसके अंदर एक विचित्र-सा उत्साह आ गया। क्योंकि वह जनता था कि ईश्वर सबसे अधिक ताकतवर है। वह सब जगह है और सब कुछ कर सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके। तो क्या वह थोड़ा-सा गुड़ नहीं दिला सकता? उसे जो कि बचपन से ही उसकी पूजा करता आ रहा है और जिसने कभी कोई बुरा काम नहीं किया। कभी चोरी नहीं की, किसी को सताया नहीं। उसने सोचा और इस भाव से भर उठा कि ईश्वर जरूर उसे गुड़ देगा।
वह तेजी से उठा और घर के अकेले कोने में पूजा करने बैठ गया। तभी माँ ने आवाज दी, 'बेटा, पूजा से उठने के बाद बाजार से नमक ले आना।'
उसे लगा जैसे ईश्वर ने उसकी पुकार सुन ली है। वरना पूजा पर बैठते ही माँ उसे बाजार जाने को क्यों कहती। उसने ध्यान लगाकर पूजा की, फिर पैसे और झोला लेकर बाजार की ओर चल दिया।
घर से निकलते ही उसे खेत पार करने पड़ते थे, फिर गाँव की गली जो ईंटों की बनी हुई हुई थी, फिर बाजार की ओर चल दिया।
उस समय शाम हो गई थी। सूरज डूब रहा था। वह खेतों में चला जा रहा था, आँखें आधी बंद किए, ईश्वर पर ध्यान लगाए और संध्या के मंत्रो को बार-बार दोहराते हुए। उसे याद नहीं उसने कितनी देर में खेत पार किए, लेकिन जब वह गाँव की ईंटों की गली में आया तब सूरज डूब चुका था और अंधेरा छाने लगा था। लोग अपने-अपने घरों में थे। धुआँ उठ रहा था। चौपाए खामोश खड़े थे। नीम सर्दी के दिन थे।
उसने पूरी आँख खोलकर बाहर का कुछ भी देखने की कोशिश नहीं की। वह अपने भीतर देख रहा था जहाँ अँधेरे में एक झिलमिलाता प्रकाश था। ईश्वर का प्रकाश और उस प्रकाश के आगे वह आँखें बंद किए मंत्रपाठ कर रहा था।
अचानक उसे अजान की आवाज सुनाई दी। गाँव के सिरे पर एक छोटी-सी मस्जिद थी। उसने थोड़ी-सी आँखें खोलकर देखा। अँधेरा काफी गाढ़ा हो गया था। मस्जिद के एक कमरे बराबर दालान में लोग नमाज के लिए इकट्ठे होने लगे थे। उसके भीतर एक लहर-सी आई। उसके पैर ठिठक गए। आँखें पूरी बंद हो गईं। वह मन-ही-मन कह उठा, 'ईश्वर यदि तुम हो और सच्चे मन से तुम्हारी पूजा की है तो मुझे पैसे दो, यहीं इसी वक्त।'
वह वहीं गली में बैठ गया। उसने जमीन पर हाथ रखा। जमीन ठंडी थी। हाथों के नीचे कुछ चिकना-सा महसूस हुआ। उल्लास की बिजली-सी उसके शरीर में दौड़ गई। उसने आँखें खोलकर देखा। अँधेरे में उसकी हथेली में अठन्नी दमक रही थी। वह मन-ही-मन ईश्वर के चरणों में लोट गया। खुशी के समुद्र में झूलने लगा। उसने उस अठन्नी को बार-बार निहारा, चूमा, माथे से लगाया। क्योंकि वह एक अठन्नी ही नहीं था। उस गरीब पर ईश्वर की कृपा थी। उसकी सारी पूजा और सच्चाई का ईश्वर की ओर से इनाम था। ईश्वर जरूर है, उसका मन चिल्लाने लगा। भगवान मैं तुम्हारा बहुत छोटा-सा सेवक हूँ। मैं सारा जीवन तुम्हारी भक्ति करूँगा। मुझे कभी मत बिसराना। उलटे-सीधे शब्दों में उसने मन-ही-मन कहा और बाजार की तरफ दौड़ पड़ा। अठन्नी उसने जोर से हथेली में दबा रखी थी।
जब वह दुकान पर पहुँचा तो लालटेन जल चुकी थी। पंसारी उसके सामने हाथ जोड़े बैठा था। थोड़ी देर में उसने आँख खोली और पूछा, 'क्या चाहिए?'
उसने हथेली में चमकती अठन्नी देखी और बोला, 'आठ आने का सफेद गुड़।'
यह कहकर उसने गर्व से अठन्नी पंसारी की तरफ गद्दी पर फेंकी। पर यह गद्दी पर न गिर उसके सामने रखे धनिए के डिब्बे में गिर गई। पंसारी ने उसे डिब्बे में टटोला पर उसमें अठन्नी नहीं मिली। एक छोटा-सा खपड़ा (चिकना पत्थर) जरूर था जिसे पंसारी ने निकाल कर फेंक दिया।
उसका चेहरा एकदम से काला पड़ गया। सिर घूम गया। जैसे शरीर का खून निकाल गया हो। आँखें छलछला आईं।
'कहाँ गई अठन्नी!' पंसारी ने भी हैरत से कहा।
उसे लगा जैसे वह रो पड़ेगा। देखते-देखते सबसे ताकतवर ईश्वर की उसके सामने मौत हो गई थी। उसने मरे हाथों से जेब से पैसे निकाले, नमक लिया और जाने लगा।
दुकानदार ने उसे उदास देखकर कहा, 'गुड़ ले लो, पैसे फिर आ जाएँगे।'
'नहीं।' उसने कहा और रो पड़ा।
'अच्छा पैसे मत देना। मेरी ओर से थोड़ा-सा गुड़ ले लो।' दुकानदार ने प्यार से कहा और एक टुकड़ा तोड़कर उसे देने लगा। उसने मुँह फिरा लिया और चल दिया। उसने ईश्वर से माँगा था, दुकानदार से नहीं। दूसरों की दया उसे नहीं चाहिए।
लेकिन अब वह ईश्वर से कुछ नहीं माँगता।

वॉशिंगटन : कैपिटल हिल इन दिनों उजाड़ और भुतहा / ब्रजेश उपाध्याय

कैपिटल हिल इन दिनों उजाड़ और भुतहा नज़र आता है. एक तो चारों तरफ़ सूखे पत्तों की भरमार है, दूसरे इमारत की गुंबद में आई दरारों की मरम्मत के लिए जो उसके इर्द-गिर्द काली-काली लोहे की जालियां लिपटी हुई हैं उनसे एक अलग ही स्पेशल इफ़ेक्ट पैदा हो रहा है.
सांसद और सेनेटर भागे हुए हैं अपने-अपने इलाक़ों में जनता को डराने. आप सोचेंगे कि हैलोवीन का त्योहार है, डरने-डराने का मौसम है. इसमें बच्चे, बूढ़े और जवान तरह-तरह के मुखौटे लगाकर एक-दूसरे को डराते हैं तो सियासतदान क्यों पीछे रहें. लेकिन डराने से मेरा मतलब चुनाव प्रचार से था, यहां दोनों में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है. हैलोवीन में लोगों को डराने के लिए तरह-तरह के मुखौटों का इस्तेमाल होता है. डेमोक्रैट को वोट दोगे तो बंदूक रखने का हक़ छीन लेगा, रिपब्लिकन को जिताओगे तो अर्थव्यवस्था का कचूमर निकाल देगा.
ओबामा के हाथ मज़बूत करोगे तो मुसलमानों का राज हो जाएगा, मुझे वोट नहीं दोगे तो तुम्हारे घर में इस्लामिक स्टेट वाले घुस आएंगे, मेरे दोस्त का साथ नहीं दोगे तो तुम्हारी सारी नौकरियां भारत और चीन चली जाएंगी, वगैरह-वगैरह. सियासतदानों की ख़ासियत ये है कि उन्हें लोगों को डराने के लिए मुखौटे की ज़रूरत नहीं पड़ती या फिर जो चेहरा दिखता है हमें और आपको वो नैचुरल मुखौटा होता है. बेचारी मासूम अमरीकी जनता को तो डरने का बहाना चाहिए होता है. जिसने अच्छे से डराया, उससे चिपक लेती है. लेकिन अब सबसे बड़ा डर उनके लिए पैदा हो गया है ऐप्पल के सीईओ टिम कुक की वजह से. कुक साहब ने सरेआम ऐलान कर दिया है कि वो समलैंगिक हैं और ये भी कह दिया कि उनके लिए भगवान के हाथों से मिला हुआ ये सबसे बड़ा तोहफ़ा है.
इतने बड़े मुकाम पर पहुंचकर, 53 की उम्र में उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी और रुझान दुनिया के सामने क्यों खोल दिया, उस पर अभी अख़बारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं और रंगे जाएंगे. लेकिन मैं तो सोच रहा हूं कि उन लाखों, करोड़ों अमरीकियों का क्या होगा जिनकी जान आईफ़ोन, आईपैड, मैक और आईपॉड में बसती है. हर नया मॉडल लॉन्च होते ही दुकानों के बाहर कतारें लग जाती हैं, डेटिंग, चैटिंग, नौकरी, बैंक, गाड़ी, घर सबकी चाभी तो आईफ़ोन में होती है यहां. कैसे काम चलेगा उनका आईफ़ोन के बगैर? आईफ़ोन में ही रहती है उनकी पर्सनल खिदमतगार सीरी. सीरी रास्ता बताओ, सीरी गाना लगाओ, सीरी मुझसे बातें करो, सीरी मुझे हंसाओ. अब क्या होगा?
अमरीका के 29 राज्यों में किसी भी महिला या पुरुष को फ़ौरन नौकरी से निकाला जा सकता है अगर ये पता चल जाए कि वो समलैंगिक हैं, कुछ साल पहले तक फ़ौज में भी यही हालत थी. ज़्यादातर चर्चों में पादरी उनकी शादी करवाने से इनकार कर देते हैं, बिज़नेस मीटिंग्स में कई बार उन्हें सामने नहीं भेजा जाता कि कहीं दूसरी पार्टी उनसे हाथ मिलाना नहीं पसंद करे. ऐसे में जब ये पता चला है टिम कुक समलैंगिक हैं तो उनके बनाए आईफ़ोन, आईपैड को कंज़रवेटिव अमरीका कैसे हाथ लगाएगा? धर्म भ्रष्ट होने का डर, अगली पीढ़ी के गुमराह होने का डर, चर्च का डर, समाज का डर -- कैसे उबरेगा अमरीका इससे.
अमरीका के अलावा मुझे चिंता सता रही है बाबा रामदेव की भी. उनके योगा क्लासेज़, उनकी अमृतवाणी आई-ट्यूंस पर भी हैं. बाबाजी तो समलैंगिकता को बीमारी मानते हैं. मुझे पूरा यकीन है वो आई-ट्यूंस से रिश्ता तोड़ लेंगे. आख़िर पूरी दुनिया की सेहत ठीक करने का उन्होंने बीड़ा उठाया है. हैलोवीन का डर तो एक-दो दिनों में खत्म हो जाएगा. लेकिन देखिए आईफ़ोन के डर से अमरीका कैसे उबरता है.
(बीबीसी हिंदी से साभार)

गोविंदा से नाराज़ है मीडिया

फ़िल्मी कार्यक्रमों में बेहद विलंब से आने के लिए मशहूर गोविंदा की आदत अब भी नहीं सुधरी है. गोविंदा अपने करियर के चरम पर नहीं है लेकिन उनकी लेट लतीफ़ी की आदत बदस्तूर जारी है. फ़िल्म 'हैप्पी एंडिंग' के हर प्रमोशनल कार्यक्रम में गोविंदा बेहद विलंब से पधार रहे हैं. बीते दिनों इस फ़िल्म के म्यूज़िक लॉन्च में मीडिया को सात बजे बुलाया गया. सैफ़ अली ख़ान, इलियाना डी क्रूज़ जैसे फ़िल्म के दूसरे सितारे समय पर पहुंचे लेकिन गोविंदा नदारद थे. वो कार्यक्रम में रात 11 बजे पहुंचे यानी चार घंटे देर से. यही नहीं कार्यक्रम के लिए सभी सितारों को मीडिया के सामने परफॉर्म भी करना था जिसके लिए शाम साढ़े चार बजे से रिहर्सल थी. उसमें भी गोविंदा का नामो-निशां नहीं था.

गिरगिट का सपना / मोहन राकेश


एक गिरगिट था। अच्‍छा, मोटा-ताजा। काफी हरे जंगल में रहता था। रहने के लिए एक घने पेड़ के नीचे अच्‍छी-सी जगह बना रखी थी उसने। खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। आसपास जीव-जन्‍तु बहुत मिल जाते थे। फिर भी वह उदास रहता था। उसका ख्‍याल था कि उसे कुछ और होना चाहिए था। और हर चीज, हर जीव का अपना एक रंग था। पर उसका अपना कोई एक रंग था ही नहीं। थोड़ी देर पहले नीले थे, अब हरे हो गए। हरे से बैंगनी। बैंगनी से कत्‍थई। कत्‍थई से स्‍याह। यह भी कोई जिन्‍दगी थी! यह ठीक था कि इससे बचाव बहुत होता था। हर देखनेवाले को धोखा दिया जा सकता था। खतरे के वक्‍त जान बचाई जा सकती थी। शिकार की सुविधा भी इसी से थी। पर यह भी क्‍या कि अपनी कोई एक पहचान ही नहीं! सुबह उठे, तो कच्‍चे भुट्टे की तरह पीले और रात को सोए तो भुने शकरकन्‍द की तरह काले! हर दो घण्‍टे में खुद अपने ही लिए अजनबी!
उसे अपने सिवा हर एक से ईर्ष्‍या होती थी। पास के बिल में एक साँप था। ऐसा बढ़िया लहरिया था उसकी खाल पर कि देखकर मजा आ जाता था! आसपास के सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाते थे। वह खुद भी उसे देखते ही दुम दबाकर भागता था। या मिट्टी के रंग में मिट्टी होकर पड़ रहता था। उसका ज्‍यादातर मन यही करता था कि वह गिरगिट न होकर साँप होता, तो कितना अच्‍छा था! जब मन आया, पेट के बल रेंग लिए। जब मन आया, कुण्‍डली मारी और फन उठाकर सीधे हो गए।
एक रात जब वह सोया, तो उसे ठीक से नींद नहीं आई। दो-चार कीड़े ज्‍यादा निगल लेने से बदहजमी हो गई थी। नींद लाने के लिए वह कई तरह से सीधा-उलटा हुआ, पर नींद नहीं आई। आँखों को धोखा देने के लिए उसने रंग भी कई बदल लिए, पर कोई फायदा नहीं हुआ। हलकी-सी ऊँघ आती, पर फिर वही बेचैनी। आखिर वह पास की झाड़ी में जाकर नींद लाने की एक पत्‍ती निगल आया। उस पत्‍ती की सिफारिश उसके एक और गिरगिट दोस्‍त ने की थी। पत्‍ती खाने की देर थी कि उसका सिर भारी होने लगा। लगने लगा कि उसका शरीर जमीन के अन्‍दर धँसता जा रहा है। थोड़ी ही देर में उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे जिन्‍दा जमीन में गाड़ दिया हो। वह बहुत घबराया। यह उसने क्‍या किया कि दूसरे गिरगिट के कहने में आकर ख्‍याहमख्‍याह वह पत्‍ती खा ली। अब अगर वह जिन्‍दगी - भर जमीन के अन्‍दर ही दफन रहा तो?
वह अपने को झटककर बाहर निकलने के लिए जोर लगाने लगा। पहले तो उसे कामयाबी हासिल नहीं हुई। पर फिर लगा कि ऊपर जमीन पोली हो गई है और वह बाहर निकल आया है। ज्‍यों ही उसका सिर बाहर निकला और बाहर की हवा अन्‍दर गई, उसने एक और ही अजूबा देखा। उसका सिर गिरगिट के सिर जैसा ना होकर साँप के सिर जैसा था। वह पूरा जमीन से बाहर आ गया, पर साँप की तरह बल खाकर चलता हुआ। अपने शरीर पर नजर डाली, तो वही लहरिया नजर आया जो उसे पास वाले साँप के बदन पर था। उसने कुण्‍डली मारने की कोशिश की, तो कुण्‍डली लग गई। फन उठाना चाहा तो, फन उठ गया। वह हैरान भी हुआ और खुश भी। उसकी कामना पूरी हो गई थी। वह साँप बन गया था।
साँप बने हुए उसने आसपास के माहौल को देखा। सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाए हुए थे। यहाँ तक कि सामने के पेड़ का गिरगिट भी डर के मारे जल्‍दी-जल्‍दी रंग बदल रहा था। वह रेंगता हुआ उस इलाके से दूसरे इलाके की तरफ बढ़ गया। नीचे से जो पत्‍थर-काँटे चुभे, उनकी उसने परवाह नहीं की। नया-नया साँप बना था, सो इन सब चीजों को नजर-अन्‍दाज किया जा सकता था। पर थोड़ी दूर जाते-जाते सामने से एक नेवला उसे दबोचने के लिए लपका, तो उसने सतर्क होकर फन उठा लिया।
उस नेवले की शायद पड़ोस के साँप से पुरानी लड़ाई थी। साँप बने गिरगिट का मन हुआ‍ कि वह जल्‍दी से रंग बदले ले, पर अब रंग कैसे बदल सकता था? अपनी लहरिया खाल की सारी खूबसूरती उस वक्‍त उसे एक शिकंजे की तरह लगी। नेवला फुदकता हुआ बहुत पास आ गया था। उसकी आँखें एक चुनौती के साथ चमक रही थीं। गिरगिट आखिर था तो गिरगिट ही। वह सामना करने की जगह एक पेड़ के पीछे जा छिपा। उसकी आँखों में नेवले का रंग और आकार बसा था। कितना अच्‍छा होता अगर वह साँप न बनकर नेवला बन गया होता!
तभी उसका सिर फिर भारी होने लगा। नींद की पत्‍ती अपना रंग दिखा रही थी। थोड़ी देर में उसने पाया कि जिस्‍म में हवा भर जाने सह वह काफी फूल गया है। ऊपर तो गरदन निकल आई है और पीछे को झबरैली पूँछ। जब वह अपने को झटककर आगे बढ़ा, तो लहरिया साँप एक नेवले में बदल चुका था।
उसने आसपास नजर दौड़ाना शुरू किया कि अब कोई साँप नजर आए, तो उसे वह लपक ले। पर साँप वहाँ कोई था ही नहीं। कोई साँप निकलकर आए, इसके लिए उसने ऐसे ही उछलना-कूदना शूरू किया। कभी झाड़ियों में जाता, कभी बाहर आता। कभी सिर से जमीन को खोदने की कोशिश करता। एक बार जो वह जोर-से उछला तो पेड़ की टहनी पर टँग गया। टहनी का काँटा जिस्‍म में ऐसे गड़ गया कि न अब उछलने बने, न नीचे आते। आखिर जब बहुत परेशान हो गया, तो वह मनाने लगा कि क्‍यों उसने नेवला बनना चाहा। इससे तो अच्‍छा था कि पेड़ की टहनी बन गया होता। तब न रेंगने की जरूरत पड़ती, न उछलने-कूदने की। बस अपनी जगह उगे हैं और आराम से हवा में हिल रहे हैं।
नींद का एक और झोंका आया और उसने पाया कि सचमुच अब वह नेवला नहीं रहा, पेड़ की टहनी बन गया है। उसका मन मस्‍ती से भर गया। नीचे की जमीन से अब उसे कोई वास्‍ता नहीं था। वह जिन्‍दगी भर ऊपर ही ऊपर झूलता रह सकता था। उसे यह भी लगा जैसे उसके अन्‍दर से कुछ पत्तियाँ फूटने वाली हों। उसने सोचा कि अगर उसमें फूल भी निकलेगा, तो उसका क्‍या रंग होता? और क्‍या वह अपनी मर्जी से फूल का रंग बदल सकेगा?
पर तभी दो-तीन कौवे उस पर आ बैठे। एक न उस पर बीट कर दी, दूसरे ने उसे चोंच से कुरेदना शुरू किया। उसे बहुत तकलीफ हुई। उसे फिर अपनी गलती के लिए पश्‍चाताप हुआ। अगर वह टहनी की जगह कौवा बना होता तो कितना अच्‍छा था! जब चाहो, जिस टहनी पर जा बैठो, और जब चाहो, हवा में उड़ान भरने लगो!
अभी वह सोच ही रहा था कि कौवे उड़ खड़े हुए। पर उसने हैरान होकर देखा कि कौवों के साथ वह भी उसी तरह उड़ खड़ा हुआ है। अब जमीन के साथ-साथ आसमान भी उसके नीचे था। और वह ऊपर-ऊपर उड़ा जा रहा था। उसके पंख बहुत चमकीले थे। जब चाहो उन्‍हें झपकाने लगो, जब चाहे सीधे कर लो। उसने आसमान में कई चक्‍कर लगाए और खूब काँय-काँय की। पर तभी नजर पड़ी, नीचे खड़े कुछ लड़कों पर जो गुलेल हाथ में लिए उसे निशाना बना रहे थे। पास उड़ता हुआ एक कौवा निशाना बनकर नीचे गिर चुका था। उसने डरकर आँखें मूँद लीं। मन ही मन सोचा कि कितना अच्‍छा होता अगर वह कौवा न बनकर गिरगिट ही बना रहता।
पर जब काफी देर बाद भी गुलेल का पत्‍थर उसे नहीं लगा, तो उसने आँखें खोल लीं। वह अपनी उसी जगह पर था जहाँ सोया था। पंख-वंख अब गायब हो गए थे और वह वही गिरगिट का गिरगिट था। वही चूहे-चमगादड़ आसपास मण्‍डरा रहे थे और साँप अपने बिल से बाहर आ रहा था। उसने जल्‍दी से रंग बदला और दौड़कर उस गिरगिट की तलाश में हो लिया जिसने उसे नींद की पत्‍ती खाने की सलाह दी थी। मन में शुक्र भी मनाया कि अच्‍छा है वह गिरगिट की जगह और कुछ नहीं हुआ, वरना कैसे उस गलत सलाह देने वाले गिरगिट को गिरगिटी भाषा में मजा चखा पाता!

कला, युद्ध और फासीवाद / वाल्टर बेंजामिन

आधुनिक समाज में सर्वहारा वर्ग का बढ़ना और जनता का बढ़ना, दोनों एक ही प्रक्रिया के दो पहलू हैं। फासीवाद की कोशिश यही होती है कि जनता जिस संपत्ति ढाँचे को खत्‍म करने के लिए संघर्ष करती है, उसे बगैर कोई नुकसान पहुँचाते हुए उसी जनता में से नया श्रमजीवी वर्ग खड़ा किया जाए। फासीवाद को जनता के अधिकार दिलाने से नहीं, केवल उन्‍हें अपने विचार अभिव्‍यक्‍त करने का मौका देने से मतलब है। जनता को संपत्ति से नाता बदलने का अधिकार है; फासीवाद संपत्ति सँभालने के लिए उनके सामने सफाई पेश करना चाहता है। राजनीति में सौंदर्यबोधी तत्‍वों का आगमन इस फासीवाद का ही परिणाम है। एक तरफ जनता की उपेक्षा की जाती है उन्‍हें घुटने टेकने को विवश किया जाता है, तो दूसरी ओर कर्मकांडी मूल्‍यों को तय कर उनके उल्‍लंघन का मसला चलाया जाता है।
इस सौंदर्यबोध राजनीति का अंतिम लक्ष्‍य एक ही है - युद्ध... युद्ध और केवल युद्ध ही परंपरागत संपत्ति प्रणाली का सम्‍मान करते हुए एक बड़े स्‍तर पर जन आंदोलन का लक्ष्‍य निर्धारित कर सकता है। यह तकनीकी फार्मूला कुछ इस तरह है - केवल युद्ध के द्वारा ही यह संभव है कि वर्तमान सभी तकनीकी संसाधनों को जुटाया जाए और संपत्ति की वर्तमान व्‍यवस्‍था भी ज्‍यों की त्‍यों बनी रहे। यहाँ इथोपियन उपनिवेशीय युद्ध के घोषणा पत्र में मेरीनेती का विचार देना अप्रासंगिक न होगा -
''हम भविष्‍यवादी लोग सत्‍ताइस सालों से युद्ध को सौंदर्य विरोधी होने का खिताब देने का विरोध करते रहे हैं... हम तो कहते हैं.... युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह गैस मास्‍क, मेगाफोन, फ्लेम थ्रोवर और छोटे टेंकों जैसी मशीनों पर मानव का प्रभुत्‍व स्‍थापित करता है। युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह मानव शरीर के ठोस धातु में बदलने के स्वप्‍न की शुरुआत करता है। युद्ध सुंदर है, क्‍योंकि यह बंदूक की गोली, गोलाबारी, युद्धविराम, इज व सड़न का सम्मिलित स्‍वर संगीत है। युद्ध सुंदर है रेखागणित के कोणों से निर्मित उड़ानों की तरह क्‍योंकि यह नए वास्‍तुशिल्‍प रचता है - बड़े टेंकों की तरह जलते गाँवों से सर्पिलाकार ऊपर उठते धुएँ की तरह... और इसी तरह की तमाम चीजें यह रचता है। भविष्‍यवाद के कवि और कलाकार!... युद्ध सौंदर्यबोध के इन सिद्धांतों को याद रखना ताकि नए साहित्‍य और नई चित्रकला के प्रति तुम्‍हारे संघर्ष को उनके द्वारा रोशनी मिल सके।''
इस घोषणा-पत्र में साफगोई का गुण है। इस प्रतिपादन को द्वंद्ववाद में मानने वालों द्वारा मंजूर किए जाने की दरकार है। इनके लिए आज के युद्ध का सौंदर्यबोध इस प्रकार है : यदि उत्‍पादक शक्तियों के स्‍वाभाविक इस्‍तेमाल में संपत्ति प्रणाली से बाधा पहुँचती है, तो गति और ऊर्जा संसाधन बढ़ाने में तकनीकी साधनों की वृद्धि एक अस्‍वाभाविक इस्‍तेमाल पर जोर देगी और युद्ध में यही होता है। युद्ध से होने वाली तबाही इस बात का सबूत है कि समाज टेक्‍नॉलॉजी को एक साधन के रूप में स्‍वीकार करने लायक परिपक्‍व नहीं हुआ है और टेक्‍नॉलॉजी समाज की बुनियादी ताकतों के साथ चलने लायक विकसित भी नहीं हुई है। साम्राज्‍यवादी युद्ध की खौफनाक विशेषताएँ हमारे उत्‍पादन के विपुल साधनों और उनके अपर्याप्‍त प्रयोग के बीच की विसंगति को बयान करती है : - दूसरे शब्‍दों में बेरोजगारी और बाजार की कमी को दर्शाती है। साम्राज्‍यवादी युद्ध टेक्‍नॉलॉजी का एक विद्रोही रूप है जो ''मानवीय पदार्थ'' के रूप में अपनी खुराक जुटाता है क्‍योंकि टेक्‍नॉलॉजी को समाज ने उसका नैसर्गिक पदार्थ मुहैया नहीं कराया है। बाढ़ से भरी नदियों का पानी खाइयों में भेजने के बजाय समाज मनुष्‍यों की फौज को खाई में धकेल देता है, वह हवाई जहाजों से बीज गिराने की बजाए शहरों पर बम गिराता है और गैस युद्ध कौशल के जरिए एक नई तरह से युगांत होता है।
मेरिनेत्‍ती स्‍वीकार करते हैं कि हमारी ऐंद्रिक तुष्टि को टेक्‍नॉलॉजी ने बदल दिया है और युद्ध इस ऐंद्रिक परितोष के लिए जरूरी सौंदर्यबोध जुटाता है। यह कला का उपभोक्‍ताकरण है। होमेर के समय में मनुष्‍य ओलिंपियन देवताओं के चिंतन मनन का एक विषय था, आज वह स्‍वयं के लिए एक विषय है। इसका अपने आपसे बेगानापन इस हद तक पहुँच गया है कि वह अपने ही विनाश का अनुभव दूसरों की निगाहों से पाए गए कलात्‍मक आनंद की तरह ले रहा है। ये उस राजनीति की हालात है जिसे फासीवाद सौंदर्यबोध बता रहा है। साम्‍यवाद इसका प्रत्‍युत्‍तर कला के राजनीतिकरण द्वारा दे रहा है।
(अनुवाद - शशांक दुबे)

Thursday, 30 October 2014

हम औरतें / वीरेन डंगवाल

रक्त से भरा तसला है,
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में
हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई प्रेतात्माएँ
हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं
दरवाज़ा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं
हम हैं इच्छा-मृग,
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो चौकड़ियाँ
मार लेने दो हमें कमबख्तो !

एक पूर्णकालिक लेखक का अवसान

वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार रॉबिन शॉ पुष्प नहीं रहे। आजीवन स्वतंत्र लेखक रहे रॉबिन शॉ पुष्प की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें उपन्यास, कहानियां, कविताएं, लेख, नाटक और बाल साहित्य आदि शामिल है। अन्याय को क्षमा, दुल्हन बाजार जैसे उपन्यास, अग्निकुंड, घर कहां भाग गया कहानी संग्रह और फणीश्वर नाथ रेणु पर लिखी संस्मरण पुस्तक सोने की कलम वाला हिरामन उनकी चर्चित कृतियां हैं। उनकी पत्नी गीता पुष्प शॉ भी ख्यात लेखिका हैं। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को आज तीन बजे पटना के पीरमुहानी स्थित कब्रिस्तान में होगा।

'दैनिक हिंदुस्तान' में हृषिकेश सुलभ लिखते हैं -

' हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कथाकार और उपन्यासकार रॉबिन शॉ पुष्प का अवसान साहित्य की, एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वह उस पीढ़ी के लेखक थे, जिसने साहित्य को मनसा, वाचा कर्मणा जिया। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, बाल साहित्य, संस्मण से लेकर साहित्य की लगभग तमाम विधाओं में लिखा। वह पूर्णकालिक लेखक थे। उनकी पहली कहानी 1957 में धर्मयुग में छपी। तब से वह अनवरत लिखते रहे। लेकिन आज उनकी यात्रा सदा के लिए थम गई।

' पटना से बाहर हूं। मोतीहारी के पास एक गांव में। कुआं के जगत की मुंड़ेर पर बैठा एक युवा सेमल के कांटेदार तने को एकटक निहार रहा हूं। सामने कई तरह के वृक्षों का सघन विस्तार है। सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं। कल सांझ असंख्य लोगों ने विदा और आज सुबह ही स्वागत किया है जिनका, वे विदा हो रहे हैं। खिन्न, उदास मन जाते सूर्य को निहार रहा हूं। भीतर कुछ टूट रहा है। जलते बांस की तरह चटख रहा है कुछ मेरी आत्मा के अतल में! कि अचानक एक मित्र का फोन आता है। पुष्पजी नहीं रहे।

' बहुत दिनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। हां, फोन पर कभी-कभार बातें होती रहीं, पर यह सिलसिला भी इन दिनों बन्द ही था। अपने को कोस रहा हूं। स्वार्थी..कृतघ्न! आज का काम कल पर टालकर समय से मुंह चुरा कर जीने की अपनी आदत पर स्यापा कर रहा हूं! अचानक उनकी छवि कौंधती है। अंगुलियों में फंसी सिगरेट ,मुट्ठी बांध कर लम्बा कश और बेफिक्री के आलम में सिगरेट का धुआं। वे सन् 1976 के दिन थे। प्रेमचंद के बड़े सुपुत्र श्रीपत राय की पत्रिका ‘‘कहानी‘‘ में मेरी एक छोटी-सी कहानी छपी थी और उनसे आकाशवाणी पटना में मुलाकात हो गई। यह पता चलते कि उस कहानी का लेखक मैं हूं, उन्होंने मेरे कांधे पर अपना हाथ रखा था। उनकी हथेली का वो स्पर्श आज तक जिन्दा है, एक भरोसे की तरह। वे मुझसे मेरे बारे में पूछते रहे थे। मैं प्रतीक्षा में था कि शायद कहानी के बारे में कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं कहा उन्होंने। हमने साथ चाय पी। वे मुझे दुनिया की श्रेष्ठ कहानियों के बारे में बताते रहे। मैंने अब तक क्या-क्या पढ़ा है और अब मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए पूछते और बताते रहे। मैं उन्हें निहारता रहा़..उनकी लम्बी ज़ुल्फों को अपनी उत्सुक नजरों से टेरता रहा। उनकी सिगरेट पीने की अदा और आत्मीयता भरी बातों पर मुग्ध होता रहा। विदा के समय़..चलते हुए उन्होंने शायद मात्र एक छोटे से वाक्य में मेरी कहानी की प्रशंसा की और घर आने का निमंत्रण दिया। अगले ही दिन मैं सब्जीबाग स्थित उनके घर पर था। मैं एक लेखक के घर में था, जिसकी कई कहानियां पढ़ चुका था़...रेडियों पर जिसके नाटक सुन चुका था, धर्मयुग और सारिका जैसी ख्यात पत्रिकाओं में जिसकी तस्वीरें और कहानियां लगातार देखता-पढ़ता रहता था,....जिसकी आंखों पर चढ़े काले चश्में के भीतर छुपी अनन्त कथाओं की दुनिया मेरे लिए कौतूहल का विषय थी! ...चाय आई। बेहद सुघड़ ढंग से व्यवस्थित कमरे में बैठे थे हमदोनों। कहीं कोई अतिरेक नहीं,...प्रदर्शनप्रियता नहीं। मेरी हर उत्सुकता के प्रति सम्मान-भाव और मेरी हर जिज्ञासा के लिए आत्मीय लहजे में समाधान।

' वह जो थोड़ी देर पहले मेरी आत्मा के अतल में जो चटख रहा था, अब भी चटख रहा है।.... यादों की कौंध के साथ। ....अमली के प्रकाशित होते ही एक पोस्टकार्ड, जिसमें आशीष और शुभकामनाएँ और जल्दी मिलने का निमंत्रण था, मिला। ....मैं पहुँचा। मैंने कहा, मैं आपकी तरह आत्मीय कथाएँ लिखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, अपनी तरह लिखो। ज्यादा से ज्यादा पाठकों का भरोसा अर्जित करो।....वे जीवन भर अपनी तरह ही लिखते रहे। उन्होंने बदलते दौर के ट्रेंड की फिक्र किए बग़ैर अपनी भाषा की संवेदना, शिल्प के हुनर और कथ्य की बहुस्तरीयता को बरक़रार रखा। वे अपनी कथाओं को रचते हुए एक छोर पर कथ्य के अंतर्द्वंद्वों के लिए बेहद निर्मम होते थे तो दूसरे छोर पर इतने आत्मीय कि पाठक उनकी बाँह पकड़ चलता था।.... वे पाठकों के सहचर बने रहे। उन्होंने कभी आलोचना की दुरभिसंधियों की चिन्ता नहीं की और न ही उसका मुखापेक्षी बने।
 '....सूरज जा चुका है। क्षितिज की गोद में।.... मैं वसंत की उस दोपहर को याद कर रहा हूँ....सन् 1985 की दोपहर को, जब अपने द्वारा सम्पादित ‘बिहार के युवा हिन्दी कथाकार‘ पुस्तक की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘‘लेखक का काम केवल लिखना नहीं, अपने समय की युवा पगघ्वनियों की आहट को सुनना भी होता है!‘‘....मेरी यादें आत्मीयता के इस दुर्भिक्ष-काल में जीते हुए आदमी की यादें हैं। ....मैं जल्दी से जल्दी उन्हें एक बार फिर से पूरा का पूरा पढ़ना चाहता हूँ। नमन!'