Sunday, 1 December 2013

भाषा हमारे अस्तित्व का मूल

नोम चोम्‍स्‍की

वि‍श्‍व वि‍ख्‍यात भाषावैज्ञानि‍क, दार्शनि‍क, वामपंथी लेखक नोम चोम्‍स्‍की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के वि‍कास को लेकर उनका यह साक्षात्‍कार वि‍ज्ञान पत्रि‍का ‘डि‍स्‍कवर’ में 29 नवम्‍बर, 2011 को प्रकाशि‍त हुआ था। उनसे यह बातचीत ‘डिस्कवर’ के संवाददाता वेलरी रॉस ने की थी। इसका अनुवाद वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है-

सदियों से विशेषज्ञ यह मानते रहे कि हर भाषा अनूठी होती है। फिर एक दिन 1956 में भाषाविज्ञान के एक युवा प्रोफेसर ने शीर्ष अमेरिकी शिक्षा संस्थान एमआईटी में सूचना सिद्धांत पर आयोजित एक गोष्ठी में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक अर्थपूर्ण वाक्य न सिर्फ अपनी भाषा के नियमों का, बल्कि सभी भाषाओं पर लागू होने वाले वैश्‍वि‍क व्याकरण का भी पालन करता है। यही नहीं, बच्चे बड़ों की बातचीत की नकलकर या अपने बाहरी परिवेश से भाषा सीखने के बजाय भाषा में महारत प्राप्त करने की अंदरूनी क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। यह एक ऐसी शक्ति है जो जैविक विकास ने सिर्फ हम मनुष्यों को सौंपी है। युवा प्रोफेसर के इस क्रान्‍ति‍कारी विचार ने रातोंरात भाषाविदों की सोच को बदलने की शुरुआत कर दी।

एवराम नोम चोम्स्की का जन्म 7 दिसंबर, 1928 को अमेरिकी नगर फिलाडेल्फिया में हुआ था। उनके पिता विलियम चोम्स्की हिब्रू भाषा के विद्वान थे और माँ एल्सी सिमोनोफ्स्की भी विदुषी व बाल पुस्तकों की लेखिका थीं। नोम ने बचपन में ही मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर अपने पिता द्वारा लिखी पांडुलिपि पढ़ डाली, जिसने उनके भविष्य के काम की जमीन तैयार की। सन् 1955 तक वह एमआईटी में भाषाविज्ञान पढ़ाने लगे। यहाँ रहकर उन्होंने अपने भाषाविज्ञान संबंधी क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। चोम्स्की उस नजरिए को चुनौती देते हैं, जिससे हम आज भी खुद को देखते हैं। वह कहते हैं, ‘भाषा हमारे अस्तित्व का मूल है। हम हर वक्त भाषा में लीन रहते हैं। जब हम सड़क पर चल रहे होते हैं तो खुद से अपनी बातचीत को रोकने के लिए जबर्दस्त इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ती है। क्योंकि खुद के साथ हमारी बातचीत निरंतर चलती रहती है।’

चोम्स्की ने राजनीति से दूरी बनाए रखने की वैज्ञानिकों की परम्‍परा के विपरीत सक्रिय राजनीति में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। वह वियतनाम में अमेरिकी आक्रमण के मुखर विरोधी थे और उन्होंने 1967 के प्रसिद्ध पेंटागन विरोधी मार्च के आयोजन में भी मदद दी। जब इस आंदोलन के नेता गिरफ्तार कर लिये गये तो उन्हें जेल में नॉर्मन मेलर के साथ रखा गया। मेलर ने अपनी पुस्तक ‘आर्मीज ऑफ द नाइट’ में चोम्स्की को, ‘दुबला-पतला, तीखे नाक-नक्श और खास लहजे वाला ऐसा शख्स बताया, जिसकी सोहबत में भलमनसाहत व दृढ़ नैतिक बल की महक आती है।’

चोम्स्की के साथ यहाँ पेश की जा रही बातचीत कनेक्टीकट की पत्रकार मैरिऑन लांग के साथ कई तयशुदा बैठकों के निरस्त होने के बाद की गई। लॉग बताती हैं, ‘वह चोम्स्की के लिये बहुत मुश्किल समय था। पत्नी गम्‍भीर रूप से बीमार थीं और वह उनकी सेवा में जुटे थे। इस बातचीत के महज 10 दिन पहले वह गुजर गईं। इस हादसे के बाद चोम्स्की का यह पहला साक्षात्कार होना था लेकिन वह इसके लिये राजी हो गए।’ बाद में उन्होंने ‘डिस्कवर’ संवाददाता वेलरी रॉस को कई सवालों के जवाब दिये।

आप इंसानी भाषा को अनोखा गुण बताते हैं। कौन सी बात इसे खास बनाती है?

मनुष्य दूसरे प्राणियों से फर्क हैं और इस लिहाज से हर मनुष्य मूलत: एक जैसे होते हैं। अगर अमेजन के शिकार-संग्राहक आदिवासी समुदाय के किसी बच्चे को बोस्टन में पाला-पोसा जाये तो वह भाषाई क्षमता के मामले में यहाँ पल-बढ़ रहे मेरे बच्चों से जरा भी फर्क नहीं होगा। इससे उलटी परिस्थिति में भी यही होगा। यानी बोस्टन का कोई बच्चा अमेजन आदिवासियों के बीच पले-बढ़े तो उनकी भाषा-बोली सजह ढंग से बोलने लगेगा। यह अनोखा इंसानी खजाना, जो हम सब के पास है, हमारी संस्कृति व हमारे कल्पनाशील बौद्धिक जीवन के बड़े हिस्से का बुनियादी तत्व है। इसी वजह से हम योजनाएँ बना पाते हैं, सृजनात्मक कलाकर्म करते हैं और जटिल समाजों का निर्माण कर लेते हैं।

भाषा की इस ताकत का जन्म कब और कैसे हुआ?

अगर आप पुरातात्विक अभिलेखों को देखें तो करीब डेढ़ लाख से 75 हजार वर्ष पूर्व समय की एक छोटी सी खिड़की में रचनात्मक विस्फोट होता दिखाई पड़ता है। इस काल में अचानक जटिल हस्तशिल्प, प्रतीकात्मक निरूपण, आकाशीय घटनाओं का मापन तथा जटिल सामाजिक संरचनाओं जैसी सृजनात्मक गतिविधियों का विस्फोट देखने को मिलता है। प्रागैतिहासिक काल का लगभग हर विशेषज्ञ इस घटना को भाषा से औचक उद्भव के साथ जोड़ता है। ऐसा नहीं लगता कि इस घटना का मानव के शारीरिक बदलावों से कोई संबंध है; आज के इंसान के बोलने व सुनने के तंत्र बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे छह लाख साल पहले के मनुष्य के थे। मगर मनुष्य में अभूतपूर्व संज्ञानात्मक बदलाव आया है। कोई नहीं जानता क्यों?

इंसानी भाषा में आपकी दिलचस्पी कब शुरू हुई?

बहुत छोटी उम्र में मुझे अपने पिता से आधुनिक हिब्रू साहित्य व दूसरी पाठ्य सामग्री पढ़ने को मिली। 1940 के आसपास उन्हें फिलाडेल्फिया की एक हिब्रू संस्था ड्रॉप्सी कॉलेज से पीएच.डी. की डिग्री मिली। वह सीमेटिक थे और मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर काम करते थे। मुझे याद नहीं कि मैंने अपने पिता की किताब के आधिकारिक तौर पर प्रूफ पढ़े थे या नहीं, लेकिन मैंने उसे पढ़ा जरूर था। कुछ हद तक व्याकरण संबंधी आम समझ मुझे इसी किताब से मिली। लेकिन इससे पीछे जाएँ तो व्याकरण के अध्ययन का मतलब था, ध्वनियों को व्यवस्थित करना, कालों को देखना,  इन चीजों को सूचीबद्ध करना और यह देखना कि ये एक-दूसरे के साथ कैसे जुड़ती हैं।

भाषाविद् ऐतिहासिक व्याकरण और विवरणात्मक व्याकरण में फर्क करते हैं। इन दोनों में क्या अंतर है?

ऐतिहासिक व्याकरण कुछ इस तरह का अध्ययन है- जैसे, किस तरह आधुनिक अंग्रेजी का मध्यकालीन अंग्रेजी से विकास हुआ। किस तरह मध्यकालीन, प्रारम्‍भि‍क व पुरानी अंग्रेजी से निकली और किस तरह वह जर्मेनिक से और जर्मेनिक उस भाषा स्रोत से विकसित हुई जिसे हम प्रोटो-इंडो-यूरोपियन कहते हैं और जिसे कोई नहीं बोलता इसलिए इसे फिर से गढ़ना पड़ता है। भाषाएं समय के साथ कैसे विकसित होती हैं, यह इस बात को पुनर्निर्मित करने का एक प्रयास है। आप इसे जैविक उद्वि‍कास (बायोलॉजिकल इवोल्यूशन) के अध्ययन के समकक्ष मान सकते हैं। विवरणात्मक व्यापकरण किसी समाज या व्यक्ति विशेष के लिये मौजूदा भाषाई व्यवस्था को जानने का प्रयास है। आप इस अंतर को जैविक विकास और मनोविज्ञान के बीच फर्क की तरह देख सकते हैं।

और आपके पिता के जमाने के भाषाविद्, वे क्या करते थे?

वे वास्तविक धरातल पर इस्तेमाल की जा रही भाषाई विधियों पर काम करते थे। उदाहरण के लिये अगर आप चेरोकी के व्याकरण पर काम करना चाहते हैं तो आप उस समुदाय के बीच जायेंगे। और स्थानीय बोलने वालों से सूचनाएं इकट्ठा करेंगे।

ये भाषाविद् किस तरह के सवाल पूछते थे?

मान लीजिये आप चीन से आये मानवशास्त्रीय भाषाविद् हैं और मेरी भाषा का अध्ययन करना चाहते हैं। पहली बात आप यह जानना चाहेंगे कि मैं किस तरह की ध्वनियों का इस्तेमाल करता हूँ। और फिर आप पूछेंगे कि ये ध्वनियाँ एक साथ कैसे जुड़ती हैं। उदाहरण के लिये मैं ‘ब्निक’ न बोल कर ‘ब्लिक’ क्यों बोलता हूँ और इन ध्वनियों को कैसे व्यवस्थित किया जाता है? उन्हें किस तरह जोड़ा जाता है? अगर आप उस ढंग को देखें, जिसके मुताबिक शब्द के ढाँचे को व्यवस्थित किया जाता है,  तो क्या किसी क्रिया में भूतकाल भी होता है? अगर होता है तो क्या यह क्रिया के बाद होता है या इसके पहले? या यह किसी और तरह की चीज है? और आप इसी तरह के कई और सवाल पूछते चले जाते हैं?

लेकिन आप तो इस नजरिए से सहमत नहीं थे. क्यों?

मैं उस वक्‍त पेन यूनिवर्सिटी में था और मेरी ग्रेजुएट थीसिस का शीर्षक था- बोलचाल की हिब्रू का आधुनिक व्याकरण। इस भाषा की मेरी समझ खासी अच्छी थी। मैंने भी इस पर ठीक उसी तरह काम करना शुरू किया, जैसा हमें उस वक्‍त पढ़ाया जाता था। मुझे एक हिब्रूभाषी सूचनादाता मिला,  जिससे मैंने सवाल पूछने शुरू किए और मुझे

आँकड़े मिलने लगे। एक मौका ऐसा आया कि अचानक मुझे लगा: क्या बेहूदगी है! मैं ऐसे सवाल पूछ रहा हूँ, जिनके जवाब मैं पहले से ही जानता हूँ।

जल्द ही आपने भाषाविज्ञान में अपने शोध की निहायत नई विधि विकसित कर ली। ये विचार कैसे जन्मे?

इससे पहले 1950 में, जब मैं हारवर्ड में स्नातक छात्र था, यह आम धारणा थी कि अन्य मानवीय गतिविधियों की तरह भाषा भी सीखी जाने वाली आदतों का एक संग्रह है। यह उसी तरह सीखी जाती है जैसे पालतू जानवर प्रशिक्षित किये जाते हैं। यानी प्रबलीकरण के जरिये। उन दिनों यह धारणा एक तरह से अंधविश्‍वास की तरह व्याप्त थी। लेकिन हम दो या तीन लोग ऐसे थे, जो इस बात से सहमत नहीं थे और हमने चीजों को बिल्कुल अलग तरह से देखना शुरू किया।

खासतौर पर, हमने कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर किया: प्रत्येक भाषा अनगिनत सुव्यवस्थित अभिव्यक्तियों को गढ़ने और प्रकट करने का एक माध्यम है, जिसमें हर अभिव्यक्ति की एक अर्थगत व्याख्या और ध्वन्यात्मक रूप है। इसलिए यहाँ ऐसी चीज है जिसे हम जेनरेटिव प्रोसीजर कहते हैं, अनगिनत वाक्यों या अभिव्यक्तियों को पैदा करने और उन्हें अपने विचार व स्नायुतंत्र से जोड़ने की क्षमता। हमें हर बार इस केन्‍द्रीय गुण को ध्यान में रखकर शुरुआत करनी होती है। व्यवस्थित अभिव्यक्तियों और उनके अर्थ के बेरोकटोक उत्पादन का गुण। हमारे ये विचार बाद में उस सिद्धांत के रूप में घनीभूत हुये जिसे आज हम बायोलिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क कहते हैं। यह सिद्धांत भाषा को मानव जीवविज्ञान के एक तत्व के रूप में देखता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा दृष्टि तंत्र है।

आपका सिद्धांत है कि सभी मनुष्यों का एक ‘वैश्‍वि‍क व्याकरण’ होता है। इस बात का क्या अर्थ है?

इसका मतलब इंसानी भाषा संकाय की आनुवांशिक जड़ों से है। उदाहरण के लिये आप अपने अंतिम वाक्य पर गौर करें। यह ध्वनियों का बेतरतीब क्रम नहीं है। आपने शब्दों का अत्यंत सुनिश्‍चि‍त ढाँचा खड़ा किया है और इसका अत्यंत विशिष्ट भाषाई अर्थ है। इसका एक खास मतलब है,  कोई दूसरा मतलब नहीं और इसकी एक खास ध्वनि है, दूसरी नहीं। बताइए, आपने यह किया कैसे? यहाँ दो संभावनाएँ हो सकती हैं। एक,  इसे एक चमत्कार मान लिया जाय। या दूसरी,  आपके पास नियमों की एक आंतरिक व्यवस्था है जो शब्दों के ढाँचे और उसके अर्थ को निर्धारित करती है। मैं नहीं समझता यह एक चमत्कार की देन है।

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आपके भाषावैज्ञानिक विचारों पर शुरुआत में कैसी प्रतिक्रियाएं हुईं?

शुरू-शुरू में ज्यादातर लोगों ने हमारे विचारों को खारिज किया या इनकी उपेक्षा की। यह बिहेवियरल साइंस का दौर था, मानव क्रियाओं और व्यवहार का अध्ययन,  जिसमें व्यवहार का नियंत्रण तथा रूपांतरण भी शामिल किया जाता है। बिहेवियरिज्म कहता है कि आप किसी व्यक्ति को मनचाहे रूप में बदल सकते हैं,  बशर्ते आप उसके परिवेश व प्रशिक्षण पद्धति को ठीक से व्यवस्थित कर सकें। मनुष्य के रूपांतरण में आनुवांशिक घटक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इस विचार को अजनबी बताकर हल्के में लिया गया।

बाद में मेरे इस विधर्मी विचार को ‘इन्नेटनेस हाइपोथीसिस’ का नाम दे दिया गया और इसकी भर्त्‍सना में रचे गये साहित्य का ढेर लग गया। आज भी आप प्रमुख शोध पत्रिकाओं में ऐसे सूत्रवाक्य पढ़ सकते हैं कि भाषा सिर्फ संस्कृति, परिवेश तथा प्रशिक्षण का परिणाम है। एक तरह से यह धारण हमारे सहजबोध का हिस्सा बना दी गई है। हम सब भाषा सीखते हैं, चाहे वह कितनी भी मुश्किल क्यों न हो। हम पाते हैं कि परिवेश भी अपना असर छोड़ता है।

इंग्लैंड में पलने-बढ़ने वाले लोग अंग्रेजी बोलते हैं, स्वाहिली नहीं। और वास्तविक सिद्धांत- वे हमारी चेतना तक नहीं पहुँच पाते। हम अपने भीतर झाँककर उन छुपे हुए सिद्धांतों को नहीं देख सकते जो हमारे भाषाई व्यवहार को निर्धारित करते हैं। और हम उन सिद्धांतों को भी नहीं देख सकते जो हमें अपने शरीर को हिलाने की इजाजत देते हैं। यह भीतर ही भीतर होता रहता है।

भाषा वैज्ञानिक इन छुपे हुए सिद्धांतों की खोज कैसे कर लेते हैं?

आप आँकड़ों को संग्रहकर किसी भाषा के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। मसलन- मेरी भाषा का अध्ययन कर रहा चीनी भाषाविद् इस बारे में मुझे से सवाल पूछकर जवाब इकट्ठा कर सकता है। यह एक तरह का संग्रह होगा। दूसरे तरह का संग्रह यह हो सकता है कि लगातार तीन दिन तक जो कुछ मैं बोलूँ उसे वह टेप करता रहे। और किसी भाषा को सीखते और इस्तेमाल करते वक्‍त लोगों के दिमाग में जो कुछ चल रहा है, उसका अध्ययन कर आप भाषा के बारे में जाँच-पड़ताल कर सकते हैं। आज के भाषाविदों को चाहिए कि वे उन नियमों व सिद्धांतों पर ध्यान देने का प्रयास करें जिन्हें,  उदाहरण के लिए, आप ठीक इस वक्त मेरे द्वारा गढ़े जा रहे वाक्यों का अर्थ निकालने और उन्हें समझने या फिर अपने वाक्यों को बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या यह व्याकरण की उस पुरानी व्यवस्था जैसा नहीं, जिसे आप पहले ही खारिज कर चुके हैं?

नहीं। व्याकरण के परम्‍परागत अध्ययन में आप ध्वनियों व शब्द रचना पर ध्यान देते हैं और शायद थोड़ा बहुत वाक्य विन्यास पर। पिछले 50 वर्षों के उत्पादक भाषाविज्ञान (जेनरेटिव लिंग्विस्टिक्स) में आप, मसलन, यह पूछ रहे हैं कि प्रत्येक भाषा के लिए नियमों व सिद्धांतों का वह कौन सा तंत्र है जो व्यवस्थित अभिव्यक्तियों की अनगिनत शृंखलाओं को तय करता है?  इसके बाद आप उन्हें एक निश्‍चि‍त व्याख्या से जोड़ते हैं।

हमारी भाषाई समझ के साथ क्या मस्तिष्क छवियाँ जुड़ी हुई हैं?

मिलान के एक ग्रुप ने हाल ही में भाषा के साथ होने वाली मस्तिष्क की क्रियाशीलता संबंधी एक दिलचस्प अध्ययन किया है। उन्होंने अपने शोधपात्रों को निरर्थक भाषाओं वाली दो तरह की लिखित सामग्री दी। इनमें एक प्रतीकात्मक भाषा थी, जिसे इतावली भाषा के नियमों के आधार पर गढ़ा गया था, हालाँकि शोधपात्र इसे नहीं जानते थे। दूसरी को वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन कर तैयार किया गया था। एक खास मामले में, माना आप किसी वाक्य का निषेध करना चाहते हैं, ‘जॉन यहाँ था, जॉन वहाँ नहीं था।’ कुछ निश्‍चि‍त चीजें हैं जिन्हें करने की इजाजत भाषाओं में आपको दी जाती है। आप ‘नहीं’ शब्द को कुछ स्थानों में रख सकते हैं लेकिन कुछ अन्य स्थानों में नहीं रख सकते। इसलिए पहली मनगढ़ंत भाषा में आप निषेधकारी तत्व को किसी स्वीकार्य जगह पर रखते हैं, जबकि दूसरे में आप इसे अस्वीकार्य जगह पर रख देते हैं। मिलान ग्रुप ने पाया कि स्वीकार्य निरर्थक वाक्य के साथ मस्तिष्क के भाषाई क्षेत्र में सक्रियता दिखाई देती है लेकिन अस्वीकार्य वाक्य- वे जो वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन करते हैं- मस्तिष्क में कोई सक्रियता पैदा नहीं करते। इसका मतलब यह हुआ कि लोग अस्वीकार्य वाक्यों के साथ भाषा की तरह नहीं बल्कि पहेली की तरह खेल रहे थे। यह एक शुरुआती परिणाम है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि भाषाओं की पड़ताल से निकलने वाले भाषाई सिद्धांतों का दिमागी क्रियाशीलता के साथ गहरा रिश्ता है, जैसी कि किसी को उम्मीद और अपेक्षा हो सकती है।

हाल के आनुवांशिक अध्ययन भी भाषा के बारे में कुछ इसी तरह के संकेत देते हैं. क्या यह सही है?

हाल के वर्षों में एक जीन की खोज हुई है, जिसका नाम है- फॉक्सपी2। यह जीन खासतौर पर दिलचस्प है, क्योंकि इसमें किसी किस्म का उलटफेर (म्युटेशन) होने पर भाषाई इस्तेमाल संबंधी कमजोरियाँ सामने आने लगती हैं। इस जीन को उस क्रिया से जोड़ा जाता है जिसे हम ऑरोफेशियल एक्टीवेशन कहते हैं,  यानी बोलते वक्त हम अपने मुँह, अपने चेहरे और जीभ को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। इसलिये फॉक्सपी2 का संभवत: भाषा के इस्तेमाल के साथ कोई रिश्ता है। यह जीन सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्राणियों में भी पाई जाती है और अलग-अलग प्रजातियों में अलग-अलग ढंग से काम करती है। ये जीन कोई एक काम नहीं करतीं। लेकिन इस खोज को भाषा के कुछ पहलुओं के आनुवांशिक आधार की मौजूदगी की पुष्टि की दिशा में एक दिलचस्प शुरुआती कदम माना जा सकता है।

आप कहते हैं कि जन्मजात भाषाई क्षमता मनुष्यों की विशिष्टता है, मगर फॉक्सपी2 की सततता कई प्रजातियों में देखी गई है। क्या ये दोनों बातें परस्पर विरोधाभासी नहीं हैं?

यह बात लगभग अर्थहीन है कि इसमें प्रजातिगत सततता है। इसमें किसी को संदेह नहीं कि मनुष्य का भाषाई तंत्र जीन, तंत्रिका तंत्र आदि पर आधारित है। भाषा के प्रयोग, समझ, अधिग्रहण और निर्माण में शामिल पद्धतियाँ एक स्तर तक सम्‍पूर्ण जंतु जगत में दिखाई देती हैं। और सच कहें तो सम्पूर्ण जीव जगत में दिखाई देती हैं। कुछेक को तो आप जीवाणुओं में भी देख सकते हैं। लेकिन यह बात इसके उद्विकास या समान मूल से पैदा होने का शायद ही कोई संकेत देती हैं। भाषा उत्पन्न करने जैसे विशिष्ट मामले में कोई प्रजाति अगर मनुष्य के सबसे ज्यादा नजदीक कही जा सकती है, तो वह हैं पक्षी। लेकिन इसकी वजह समान उद्गम नहीं है। यह एक अलग परिघटना है, जिसे हम कनवर्जेंस कहते हैं- लगभग एक जैसी व्यवस्थाओं का अलग-अलग स्वतंत्र रूप से विकास। फॉक्सपी2 खासी दिलचस्प है मगर यह ज्यादातर भाषा के हाशिए पर रहने वाले हिस्सों का निर्धारण करती है, जैसे भाषा का (भौतिक) उत्पादन। इसके बारे में जो कुछ भी खोजा जा रहा है, उसका भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों पर प्रभाव पड़ने की सम्‍भावना बहुत कम है। पिछले 20 वर्षों से आप भाषा की ‘सरलतम’ (मिनिमलिस्ट) समझ पर काम कर रहे हैं। इसकी क्या जरूरतें हैं?

मान लीजिए भाषा बर्फ के एक फाहे की तरह है। यह प्रकृति के नियम के मुताबिक आकार ग्रहण करती,  इस शर्त के साथ कि यह बाहरी निर्धारकों को संतुष्ट करती है। भाषा की खोज के बारे में इस नजरिए को मिनिमलिस्ट प्रोग्राम कहा जाता है। मैं समझता हूँ,  इसने कुछ महत्वपूर्ण परिणाम दिये हैं। इसने दिखाया है कि भाषा यकीनन कुछ शब्दार्थ संबंधी अभिव्यक्तियों का आदर्श हल है लेकिन स्पष्ट अभिव्यक्त के लिहाज से बहुत खराब तरीके से डिजाइन है। एक विशिष्ट आवाज निकाल कर आप ‘बेसबॉल’ कहते हैं, इसके लिये ‘पेड़’ नहीं कहते।

भाषाविज्ञान में सामने बड़े सवाल कौन से हैं?

अब भी कई अनुत्तरित रिक्त स्थान हैं। कुछ सवाल ‘क्या’ से शुरू होने वाले हैं। जैसे- भाषा क्या है? इस वक्त आप और मैं जो कुछ कर रहे हैं, उसके नियम और सिद्धांत क्या हैं? कुछ और सवाल ‘कैसे’ से शुरू होते हैं: आपने और मैंने इस क्षमता को कैसे हासिल किया। हमारे आनुवांशिक भंडार व अनुभवों में और प्रकृति के नियमों में आखिर क्या छुपा हुआ है? और इसके बाद ‘क्यों’ से शुरू होने वाले सवाल हैं, जो सबसे कठिन हैं: भाषा के नियम ऐसे ही क्यों है, कुछ और तरह के क्यों नहीं? किस हद तक यह सही है कि भाषा का बुनियादी डिजाइन उन बाहरी शर्तों के अनुकूल हल पेश करता है, जिन्हें भाषा अपरिहार्य रूप से पूरा करती है? यह एक बड़ी समस्या है। भाषा की प्रकृति के बार में जो कुछ हम जानते हैं उसे हम किस हद तक मस्तिष्क में होने वाली क्रियाओं से जोड़कर देख सकते हैं? और अंतत: क्या भाषा के आनुवांशिक आधार के बारे में कोई गम्‍भीर पड़ताल हुई है? इस सभी बिंदुओं पर बेशक प्रगति दिखाई देती है लेकिन बड़े रिक्त स्थान अब भी बने हुए हैं।

हर माता-पिता इस बात पर हैरान होते हैं कि किस तरह बच्चे भाषा सीखते हैं। यह बात सहसा अविश्वसनीय लगती है कि इस प्रक्रिया के बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं।

आज हम जानते हैं कि जन्म के समय एक शिशु को अपनी माँ की भाषा के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी होती है। अगर कोई दो भाषाएँ जानने वाली कोई महिला उसके सामने बोले तो वह अपनी मातृभाषा और दूसरी भाषा के बीच फर्क समझ सकता है। उसके परिवेश में तमाम तरह की चीजें घट रही होती हैं, जिसे विलियम जेम्स ‘बढ़ता, उभरता विभ्रम’ कहते हैं। मगर शिशु किसी तरह इस जटिल परिवेश से खुद ब खुद उन आँकड़ों को छाँट लेता है, जो भाषा से संबंध रखते हैं। कोई भी दूसरा प्राणी ऐसा नहीं कर पाता। एक चिम्पांजी ऐसा नहीं कर पाता। और बहुत जल्दी व स्वत: ढंग से शिशु एक आंतरिक तंत्र हासिल करने की दिशा में बढ़ जाता है। यह तंत्र अंतत: उस क्षमता के रूप में प्रकट होता है, जिसका इस्तेमाल हम इस वक्त कर रहे हैं। शिशु के दिमाग में क्या चल रहा है? मानव जीनोम के कौन से तत्व इस प्रक्रिया में योगदान कर रहे हैं? ये चीजें कैसे विकसित होती हैं? इन बातों को ठीक से समझना अभी बाकी है।

उच्चतर स्तर पर अर्थ के बारे में क्या कहेंगे? जो महान गाथाएँ लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाते आए हैं, उनके विषय बार-बार दोहराए जाते हैं। क्या यह दोहराव मनुष्य की जन्मजात भाषा के बारे में कुछ संकेत देता है?

जानी-पहचानी परीकथाओं में से एक कहानी एक खूबसूरत राजकुमार की है, जिसे कोई दुष्ट जादूगरनी मेढक में बदल देती है। कहानी के अंत में एक सुन्‍दर राजकुमारी आकर मेढक को चूमती है और वह फिर से राजकुमार में बदल जाता है। हर बच्चा इस बात को जानता है कि वह मेढक दरअसल राजकुमार है, लेकिन उन्हें यह कैसे पता चलता है? वह अपने प्रत्येक शारीरिक गुण के हिसाब से मेढक है। कौन सी बात उसे राजकुमार बनाती है? यह पता चलता है कि यहाँ एक नियम काम करता है: लोगों व जन्तुओं तथा अन्य जीवित प्राणियों को हम उनके एक गुण से पहचानते हैं, जिसे मनोवैज्ञानिक सततता (साइकिक कंटीन्युइटी) कहा जाता है। बच्चे उसकी पहचान एक तरह के दिमाग या आत्मा या एक ऐसे अंदरूनी तत्व के रूप में करते हैं जो उनके भौतिक गुणों से स्वतंत्र है। वैज्ञानिक इस बात पर विश्‍वास नहीं करते लेकिन हर बच्चा करता है और हर मनुष्य जानता है कि इस तरह दुनिया की व्याख्या कैसे की जाती है।

आपकी बातों से ऐसा लगता है जैसे भाषाविज्ञान का विज्ञान बस शुरू ही हुआ है।

भाषा के बारे में कई ऐसे सरल विवरणात्मक तथ्य हैं, जिन्हें समझा नहीं गया है: वाक्य किस तरह अपना अर्थ हासिल करते हैं? उनकी आवाज कैसे बनती है? किस प्रकार दूसरे लोग उन्हें समझ लेते हैं? भाषा संगणना (कंप्यूटेशन) में एक-रेखीयता (लीनियर ऑडर) का पालन क्यों नहीं करती? उदाहरण के लिए एक सरल वाक्य लीजिए, जैसे ‘क्या उड़ रहे गिद्ध तैरते हैं?’ आप इसे समझते हैं, हर कोई इसे समझता है। एक बच्चा इसे इस प्रश्‍न के रूप में लेता है कि क्या गिद्ध तैर सकते हैं। सवाल में यह नहीं पूछा जा रहा है कि क्या वे उड़ सकते हैं। आप कह सकते हैं, ‘क्या जो गिद्ध उड़ रहे हैं तैरते हैं?’ मतलब क्या इसे यह माना जाए कि गिद्ध जो उड़ रहे हैं तैरते हैं? ये वे नियम हैं, जिन्हें हर कोई जानता है, बिना सोचे-समझे जान लेता है। लेकिन क्यों? यह अब भी एक रहस्य है। और इन नियमों के स्रोत मूतल: अनजान हैं।

हिंदी साहित्य को 'पिद्दी फाइटरों' का भरोसा नहीं

आलोक धन्वा
किताबों के मेले में बढ़ती युवाओं की भीड़ देखकर अच्छा लगता है. छोटे-बड़े शहरों में जैसे-जैसे किताबों से मोहब्बत की कहानी कम सुनाई देती है, मेले में लोगों और खासकर नौजवानों के उबलते झुंड को देखकर भरोसा होता है कि हिंदी साहित्य ज़िंदा रहेगा. इसे लिखने और पढ़ने वाले कम नहीं बल्कि बढ़ते जाएंगे. मैं ये मानता हूं कि आज का भारत, नए युवाओं का भारत है. ऐसा भारत जिसमें 65 फीसदी संख्या युवाओं की है. इस भारत को बहुत सकारात्मक तरीके से देखे जाने की कोशिश की जानी चाहिए.
कई लोग ये समझते हैं कि ये किताबें नहीं पढ़ते. कुछ समझते हैं कि ये दिनभर कम्प्यूटर के पास रहते हैं. कुछ ये भी समझते हैं कि इंटरनेट ही इनका घर है. इंटरनेट में ही बस गए हैं ये लोग. मैं इनको इस तरह नहीं देखता. मैं काले और सफेद में इनको नहीं देखता. मैं मानता हूं कि हमारा जो युवा वर्ग है और उनमें जो शिक्षित वर्ग है उसकी रुचि किताबों को पढ़ने की है. और तमाम पुस्तक मेलों की एक दिलचस्प बात ये है कि ये अलग-अलग तरह के विमर्श का मंच तैयार करते हैं. यहां लगातार बहसें होती हैं. ख़ास बात ये है कि आज की समस्याओं पर बहसें हो रही हैं.
बहसों के स्तर को लेकर विभेद हो सकता है. जो स्तर है वो हर जमाने में थोड़ा बढ़ता-घटता है. और स्तर केवल साहित्य और उससी जुड़ी बहसों का ही नहीं है. घटते-बढते स्तर की समस्या हर पहलु की है. चाहे वो साहित्य हो या राजनीति. स्तर के साथ-साथ मौलिकता का भी सवाल है. क्या हिंदी में मौलिक काम हो रहा है. सवाल जायज़ है. ये बात 20वीं सदी में भी उठी थी. क्या चीज है मौलिकता? आधुनिकता से उसका कितना संबंध है? जिसको बिल्कुल ही मौलिक कहा जाता है, उस तरह का तत्व नहीं है अब. पर क्या पाठक वर्ग छोटा होता जा रहा है...ये सवाल हिंदी के संदर्भ में जायज़ है. एक बड़ा महान कवि अपनी कविताओं के ज़रिए एक नया पाठक वर्ग तैयार करता है जैसे निराला ने तैयार किया, जो नागार्जुन ने तैयार किया. यशपाल ने किया, अमृल लाल नागर ने किया, फणीश्वरनाथ रेणू ने किया. लेकिन आज जो नए कवि हैं, आज के जो बड़े लेखक हैं, वे उनकी तरह बड़े लेखक नहीं हैं, वे उतने प्रतिभाशाली नहीं है.
ऐसे में पाठकों का जो स्तर है वो भी अलग तरह का हो गया है. जो नए लेखक आ रहे हैं वे ज्यादा नहीं पढ़ना चाहते. उनके अंदर बौद्धिक गहराई कम है, लेकिन बौद्धिक गहराई उतनी चिंता की बात नहीं है. वो तो उनकी जीवन यात्रा से बढ़ती जाएगी. सबसे बड़ी चिंता की बात है कि उनकी जिज्ञासा कम हो गई. उनमें और ज्यादा जानने की, समस्या के तह तक जाने की बेचैनी घट गई है.
बेचैनी का कम होना भूमंडलीय स्तर पर हुआ है. इसमें कोई शक नहीं कि अभी का जो युवा है उसमें एक तरह का उपभोक्तावाद आया है. जो बिल्कुल नए लेखक हैं, जो नए कवि हैं, उसमें सिर्फ कवियों की बात नहीं, जो नया वर्ग आया है, कहीं न कहीं उसमें एक उपभोक्तावाद की संस्कृति आई हैं. बाजारवाद हावी हुआ है. पर इन सब के बीच क्या हिंदी के लेखन में क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी लेखनी हो रही है. मुझे लगता है हो रही है. जब हमारे यहां अज्ञेय लिख रहे थे या जब हमारे यहां निराला लिख रहे थे. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिख रहे थे, हजारी प्रसाद जब कबीर को लेकर आए तो उन्होंने एक तरह की क्रांति लाई. कबीर के माध्यम से लोगों को एक नए चिंतन का परिचय मिला, लोगों को एक नई भूमि मिली.
मेरी चिंता और मेरी पीड़ा का विषय है कि आज विर्मश, साहित्य और दुनिया के सरोकार से हटकर निजी हो गया है. मेरी उम्र बढ़ रही है. मैं 60 पार कर गया हूं, जब मैं अपने से बहुत छोटी उम्र के लेखकों को देख रहा हूं तो देखता हूं वे आपाधापी कर रहे हैं, तो मुझे पीड़ा पहुंचती है. एक उथलापन आया है. कहना चाहिए कि एक पिद्दी फ़ाइट है, उसमें कुछ रखा नहीं है, वो कहीं न कहीं व्यक्तिवाद की लड़ाई है या कम जानने की लड़ाई है. अज्ञान की भी लड़ाई है वो. दो ज्ञानी जिस तरह से लड़ते हैं उसमें सीखने का मौका मिलता है, जब अज्ञेय और नामवर सिंह एक-दूसरे से असहमत होते थे तो उस असहमति से भी हम शिक्षित होते थे. राम विलास शर्मा और अज्ञेय या फिर राम विलास शर्मा और नामवर सिंह असहमत होते थे तो हमको सीखने का मौका मिलता था. आज के जो नए कवि असहमत होते हैं तो बहुत ही सतही कारणों से, किसका क्या छप गया. किसकी किताब कितनी ज्यादा बिक सकती है, कौन विदेश जाएगा, किसको कौन सा पुरस्कार मिलेगा, इसका मतलब यह है कि आज के जो नए कवि हैं उनमें सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक प्रतिबद्धता की बेहद कमी आई है. मैं उनपर ये आरोप नहीं लगा रहा हूं, मैं ये मानता हूं कि सामाजिक सरोकार की समझ कम होती जा रही है. फिर भी मुझे लगता है कि मुझे भरोसा है. उम्मीद है, भारत के युवा लेखकों से, यहां पनप रहे बाज़ारवाद से भी और किताबों के बढ़े मेले से भी. मैं भारत और इसकी संस्कृति को जानता हूं इसीलिए निराश नहीं हूं. (बीबीसी हिन्दी से साभार रूपा झा से बातचीत)

'हैरी पॉटर एंड द फ़िलासफ़र्स स्टोन सबसे लोकप्रिय'

लेखिका जे के रोलिंग की हैरी पॉटर सीरीज की पहली क़िताब 'हैरी पॉटर एंड दी फ़िलासफ़र्स स्टोन' को बच्चों की पसंदीदा क़िताब चुना गया है. हैरी पॉटर सीरीज की जे के रोलिंग की इस पहली क़िताब ने सुजान कोलिंस की 'दी हंगर गेम्स' और रोल्ड ढाल की दी बीएफ़जी को पछाड़ कर यह खिताब हासिल किया. चौदह साल की आयु से पहले पढ़ने वाली सर्वश्रेष्ठ क़िताबों के चयन के लिए हर आयु वर्ग के क़रीब 24 हज़ार लोगों ने मतदान किया. इसका आयोजन किया था ब्रितानी संस्था बुकट्रस्ट ने. इस सूची में 'द वेरी हंग्री कैटरपिलर' और 'विनी द पू' शीर्ष पाँच क़िताबों की सूची में शामिल रहीं. वहीं जे आर आर टोलकिन की 'द फेलोशिप ऑफ़ द रिंग' सातवें नंबर पर रही.
इसके अलावा डॉक्टर ज़्यूस की 'द कैट इन द हैट', अमरीकी लेखक ई बी ह्वाइट की शारले वेब और सी एस लेविस की नार्निया काल्पनिक क्लासिक 'द लायन', ' द बिच' और 'द वार्डरोब' को शीर्ष 10 क़िताबों में जगह मिली. लोकप्रिय क़िताबों पर बनी फ़िल्मों का भी लोगों के मतदान पर असर पड़ा. शीर्ष दस क़िताबों में से नौ पर बहुत अधिक कामयाब फ़िल्में बनी हैं. इनमें हैरी पॉटर श्रृंखला की फ़िल्में भी शामिल हैं. बुकट्रस्ट के कला विभाग के प्रमुख क्लेयर शहाना ने कहा, ''अब तक के सबसे बड़े साहित्यिक मतदान में बच्चों और वयस्कों ने हैरी पॉटर के लिए उतना मतदान नहीं किया जितना कि होना चाहिए. यह एक वैश्विक परिघटना थी, जिसने पाठकों की पीढ़ियों को प्रभावित किया, जो कि हैरी या हरमायनी को प्यार करते हुए बड़े हुए.''
उन्होंने कहा, ''यहाँ तक की ढाल और टोलकिन जैसे बड़े लेखकों के सामने भी रोलिंग की यह क़िताब कई देशों में पसंदीदा बनी हुई है.'' चिल्ड्रन बुक सप्ताह मनाने के लिए पाठकों को अपने पसंदीदा कहानी की क़िताब के बारे में मतदान करने के लिए कहा गया था. बुकट्रस्ट के विशेषज्ञों ने पांच सौ क़िताबों के नाम के साथ शुरुआत की. लेकिन मतदान शुरू होने से पहले इसे काट-छांटकर सौ कर दिया गया.
इन क़िताबों को आयु के हिसाब से वर्गीकृत किया गया था. 'हैरी पॉटर एंड द फ़िलासफ़र्स स्टोन' को नौ से 12 साल आयु वर्ग का पुरस्कार मिला. जबकि 'द वेरी हंग्री कैटरपिलर' पाँच साल तक के बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ क़िताब चुनी गई. (बीबीसी से साभार)

Saturday, 30 November 2013

तरुण तेजपाल क्या, मीडिया में तो भरे पड़े हैं बाबाजी के टिल्लू!

आज कल बाबाजी का टिल्लू खूब चल रहा है। चला रहे हैं कलर्स पर कपिल शर्मा और उनकी मंडली के हंसोड़िए।

मीडिया में तरुण तेजपाल का इससे आशय नहीं हो सकता है।

प्रेस परिषद खामोश है। छाती पीट-पीट कर खूब लिखा जा रहा है। ऐसे-ऐसे कलमकार कि उन पर सौ-सौ गंगापुत्र निछावर जाएं।

पूरे मीडिया का ब्रह्मचर्य 'एकोहम, द्वितीयो नास्ति' वाचन कर रहा है। जबकि मीडिया हाउसों के अंदरखाने की हकीकतें जिन्हें मालूम हैं, बखूबी बच-बचाकर बगले झांकते हुए वे भी सद्चरित्रता के श्लोक पढ़ने से नहीं चूक रहे हैं।

चरित्र की बहती गंगा (फिल्मी) में उनके मुखौटे उतरते हुए यहां भी साक्षात देखा जा सकता है कि वे क्या लिख-पढ़ रहे हैं, क्या-क्या देख-दिखा रहे हैं...

ऐसे कइयों के बारे में पता है, जो चप्पलों से पिटे हैं। ऐसे महान चरित्रवानों में जो नहीं पिटे हैं, उनकी भी जाने-अनजाने भद्द पिटने की कहानियां आम रही हैं।

मीडिया समारोहो में इस तरह के दृश्य आम रहते हैं। बस गौर से देखने की जरूरत है कि कौन किधर टकटकी लगाए है, कौन किससे सुअर-संवाद (स्त्रैणता) में चिपटा हुआ है।

बड़े-बड़े चेहरे हैं, जिनसे नकाब खींच दी जाए तो तरुण तेजपाल के अपयश को हजारो मील पीछे छोड़ जाएंगे। बस उनकी ढंकी-तुपी है। महान हैं।

काश, उन तरुणवानो की भी गाहे-बगाहे कलई उतरती जाए तभी उम्मीद की जा सकेगी कि मीडिया में स्त्रियों का आगत अतीत सकुशल रह सकेगा।

मीडिया-मुखौटों में ऐसे-ऐसे बाबाजी के टिल्लू भरे पड़े हैं कि अपने लिखे के ठीक विपरीत आचरण करने के बावजूद उनके सदाचार की शेखियां सुन सीता-सावित्री भी दांतों तले अंगुली दबा लें। वे आचरण को अपने ढंग से पारिभाषित करते हैं, जीते हैं और पत्रकारिता का आए दिन जनाजा निकालते फिरते हैं।

मीडिया हाउसों के अंदर की अगर कोई ढंग से स्टिंग हो जाए तो बज जाएगा बड़़े-बड़ो का बाजा, यशस्वी टिल्लुओं की शामत आ जाए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा दिन जरूर आए और मीडिया को रौरव नर्क बनाने वाले शेखीबाजों के चेहरे से भी नकाब खिंचे......

Friday, 29 November 2013

अखबारों से ज्यादा लोग फेसबुक पर-कीर्थिगा

फेसबुक इंडिया की हेड कीर्थिगा रेड्डी  का कहना है कि अखबारों से ज्यादा लोग फेसबुक के प्लेटफार्म पर हैं।
आपने 2010 में पहली एंप्लॉयी के तौर पर फेसबुक इंडिया जॉइन किया। वो क्या चीज थी जिसके चलते आपने अमेरिका से भारत आने और इस पद पर काबिज होने का फैसला किया ?
 तीन बातों ने मुझे इस कंपनी की तरफ आकर्षित किया। पहली – लोगों को एक-दूसरे के साथ बातें साझा करने की ताकत देने का मिशन और  दुनिया को ज्यादा खुला और कनेक्टेड बनाना, जो काफी प्रेरणादायी और बोल्ड बात है। और यही वो बाते हैं जो मुझे और हर फेसबुकर को इस सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट की तरफ खींचती हैं और वे हर दिन यहां अपना बेस्ट काम करते हैं।
 दूसरी – भारत वो जगह है जहां यह सब कुछ हो रहा है। यहां फेसबुक की शुरुआत करना, उसका बिजनेस और ऑर्गनइजेशन खड़ा करना बड़ी बात है। तीसरी – इंटरव्यू के दौरान मेरी जिनसे मुलाकात हुई वे सभी अपने काम में माहिर हैं। वे प्ररेणादायक लोगों के आसपास रहना चाहते हैं। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मेरे पास ऐसे लोगों के साथ काम करने का मौका है। मेरे पास एक फेसबुक ऐल्बम है जो कहती है ‘हर हफ्ता अभी तक का सबसे अच्छा हफ्ता है’ और मैं इस पर यकीन करती हूं।
 फेसबुक जॉइन करने के बाद वो कौन-सी सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं जो आपने सीखी हैं ?
अगर मैं पिछले साढ़े तीन सालों को देखूं तो एक वक्त था जब लोग कहते थे कि ‘वाकई, फेसबुक पर विज्ञापन होते हैं ? कहां हैं वो ?’ आज मैं ईमानदारी से ये कह सकती हूं कि फेसबुक सोशल मीडिया नहीं है, असल में वो मास मीडिया है। उन लोगों का आंकड़ा देखिए जो हमारी वेबसाइट से जुड़ते हैं और फिर प्रमुख अंग्रेजी अखबारों से इसकी तुलना कीजिए। हर दिन लाखों लोग फेसबुक पर होते हैं। यही वे मूलभूत परिवर्तन है जो हम मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में लाने की प्रकिया में हैं। साथ ही अभी यह भाव है कि यह बस अभी शुरू ही हुआ है। हम फेसबुक पर बहुत समय जिन पांच बातों पर खर्च करते हैं, व हैं इससे पड़ने वाला प्रभाव, तीवत्रा लाना, बोल्ड बनाना, खुलापन लाना और सोशल वैल्यू का निर्माण करना। हम सही संस्कृति के निर्माण की अहमियत पर जोर देते हैं। हम ग्लोबल कल्चर के साथ तालमेल बैठा सकने वाली टीमों और ऑर्गनाइजेशंस के निर्माण पर समय खर्च करते हैं।
 भारी मात्रा में डेटा इकट्ठा करने के मामले में फेसबुक को मॉडल कहा जा सकता है। आप इसके बारे में क्या सोचती हैं और यह एडवरटाइजर्स के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है ?
 मैं इस बारे में इस तरह सोचती हूं, ‘इनोवेशन फ्रॉम इन्फर्मेशन।’ मैं आपको दो उदाहरण दे सकती हूं। 2003 में फेसबुक का प्रोफाइल पेज रिज्यूमे की तरह दिखता था। यूजर्स बर्थडे जैसे मौकों पर ही पर कभी कभार फोटो अपलोड करते थे। फिर हमने देखा कि वो कैसे एक ही दिन में कई बार फोटो बदलने लगे। हमें एहसास हुआ कि यूजर्स फेसबुक का इस्तेमाल फोटो शेयर करने के लिए करना चाहते हैं और यह उनके खुद को अभिव्यक्त करने का अहम हिस्सा है। इसके बाद ही हमने अपना फोटो इनेबल्ड प्रोडक्ट लॉन्च किया। दूसरा उदाहरणSocialBlood.org नाम का भारतीय संगठन है। ये फेसबुक की मदद से अलग-अलग ब्लड ग्रुप वाले लोगों के समूह बनाता है। कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे यह पता चलता है कि किस तरह ऐसे डेटा बेस का इस्तेमाल अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है।
 विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए क्या अतिरिक्त प्रयास किए जा रहे हैं?
हम देश में सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ मिलने-जुलने पर काफी समय खर्च करते हैं। वे अक्सर ये सवाल करते हैं कि फेसबुक का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने में हम उनकी कैसे मदद कर सकते हैं ? एजेंसियों के लिए हमारे पास बहुस सारे ऑनलाइन टूल्स हैं, जैसे - स्टूडियोएज सर्टिफिकेशन प्रोग्राम। जहां इस बारे में जाना जा सकता है कि वे कैसे इस प्लेटफॉर्म का बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं।
 ब्रैंड्स के लाइक्स खरीदने पर आपकी राय क्या है ? उन्हें अपनी सीमा कहां तय करनी चाहिए ?
हम फैंस के बारे में काफी बातचीत सुनते हैं। हम ब्रैंड्स से यही कहते हैं कि किसी और चीज के बजाय पहुंच के बारे में सोचना चाहिए। अक्सर ब्रैंड्स हमारे पास आते हैं और पूछते हैं, ‘हमारे प्रतिद्वंदी के पास 10 लाख फैंस हैं। मैं उनसे आगे कैसे निकल सकता हूं ?’ तब हम उनसे पूछते हैं कि आपका बिजनेस ऑब्जेक्टिव क्या है? इसके बाद हम उन्हें फेसबुक के सही इस्तेमाल के बारे में बताते हैं।
 फेसबुक की क्षमताओं के बारे में आपसे पूछा गया सबसे हास्यास्पद सवाल ?
कुछ लोग हमसे पूछते हैं कि क्या हम किसी खास दिन अपने पेज का रंग बदलकर उनके ब्रैंड का रंग लगा सकते हैं। हम ब्रैंड्स को बताते हैं कि ऐसा करना उनके हित में नहीं है क्योंकि हमें यूजर्स से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है। आखिरकार हम उन्हें खुद से दूर तो नहीं कर सकते।
 (कीर्थिगा रेड्डी  से स्नेह उलाल की बातचीत एक्स्चंज4मीडिया से साभार)

Friday, 22 November 2013

दलित साहित्य में स्त्री विमर्श


संजीव खुदशाह

स्त्री विमर्श आज अपनी ऊचाईयां छू रहा है और समाज को एक नारी के प्रति नये दृष्टि कोण से देखने के लिए प्रेरित कर रहा है, साथ ही समाज की जमीनी सच्चाईयों से भी इनकार नही किया जा सकता कि नारी आज भी प्रताड़ित है। दरअसल उसकी इस प्रताड़ना के पीछे की वास्तविक कारणों की पड़ताल की आवश्यकता है। वह किससे प्रताड़ीत है तथा किसकी प्रताड़ना के विरूध लामबंद हुए है यह भी गौर करने योग्य है। यदि कुछ भौतिक असामनताओं को नजर-अंदाज कर दे, तो वास्तव में प्रकृति ने नर-नारी को एक जैसा ही बनाया है। इन असमानताओं को आधुनिक युग के अविष्कारों ने बहुत हद तक कम कर दिया है। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि आदिम काल में पुरूष एवं स्त्री में कोई भेद(आश्य ऊंच-नीच से है) नहीं था। बल्कि शिकार के महत्व कम होने एवं कृषि की खोज के पहले तक मानव समाज में स्त्रियों का ही बोल-बाला था। इस बारे में श्री देवी प्रसाद चटोपाध्याय जी अपनी किताब लोकायत में लिखते है-''कृषि के प्रारंभिक चरण में देव स्तर पर स्त्री और पुरूष की प्रधानता उलटी हो गई। स्त्री आगे बढ़ गई और पुरूष को या तो पृष्ठभूमि में पीछे धकेल दिया गया या कम से कम इतना हुआ कि उसे स्त्री की नकल करने के लिए बाध्य होना पड़ा। ये सब बातें तर्क संगत थी। कृषि के प्रारंभिक चरण में स्त्री का सामाजिक महत्व बढ़ गया था क्योकि कृषि की खोज स्त्रियों ने ही की थी।`` वे आगे श्री जे.डी. बरनाला के हवाले से लिखते है -''चूकि खाद्य सामग्री इकट्ठा करना स्त्रियों का काम था इसलिए संभवत: उन्होने ही कृषि की खोज की। जो भी हो यह कृषि कार्य कम से कम तब तक स्त्रियां ही करती रही जब तक बैल व्दारा हल चलाने या जुताई करने की विधि का अविष्कार नही हुआ। जुताई एक प्रकार के हल से की जाती थी जो पाषाण-काल में खुदाई के काम में लाई जाने वाली लकड़ी के आधार पर बना था और जिसका प्रयो स्त्रियां जमीन से कंद-मूल निकालने के लिए करती थी। जहां जहां शिकार से अधिक महत्व खाद्य सामग्री जुटाने के लिए कृषि को मिला वहां स्त्रियों का स्तर उचा उठा और मातृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की बजाय पितृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति रूकी और इसे उलट दिया गया। पितृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति सबसे पहले शिकार वाले चरण में आरंभ हुई थी। केवल उन्ही स्थानों पर जहां पशुपालन ही प्रमुख व्यवसाय था, जैसे कृषि प्रधान बस्तियों के आस-पास के क्षेत्र में पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था पूर्ण रूप में स्थापित हुई, जैसा कि हम बाइबल में देखते है।(६०.६०-१)`` यदि हम इतिहास में परिवार की आर्थिक व्यवस्था पर गौर करें तो पाते है कि जब-जब आर्थिक व्यवस्था पूरूष के हाथों गई तब-तब पूरूष की सहचरी स्त्री हुई (आशय पितृसत्ता से है)। मातृ सत्ता के मामले में ठीक उल्टा हुआ। यह व्यवस्था भी अर्थशास्त्र के मांग और पूर्ति के नियम का उल्लंघन नहीं करती है। लेकिन इस सत्ता परिवर्तन में कुछ ऐसे भी कारक होते हैं जिन्हें हम अक्सर नजर-अंदाज कर देते है। वह है पहला- राजनैतिक अस्थिरता दूसरा- सामाजिक बंधन, तीसरा- धार्मिक कट्टरता तथा चौथा है- परिवार का स्तर। लगभग प्रत्येक धर्म / समाज ने स्त्री की लज्जा को समाज की लज्जा से जोड़ा है। इसके परिणाम-स्वरूप स्त्री की लज्जा व्यक्तिगत लज्जा न होकर सार्वजनिक लज्जा हो गई । संकुचित अर्थ में कहें तो उसकी लज्जा का तालीबानी-करण हो गया । ज्यादातर सक्रिय महिलाओं का भी ऐसा ही मानना है । बस यही से शुरू होता है स्त्री की स्वतंत्रता का हनन । यानि स्त्री का प्रत्येक कदम सार्वजनिक लज्जा को ठेस पहुचाता है। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इसके परिणाम भी स्त्री को ही भुगतने पड़े । हमारे शास्त्रों-पुराणों में ऐसे हजारों संदर्भ भरे पडे है जिनमें स्त्री को एक वस्तु या सम्पत्ति की तरह पुकारा गया है। धर्म के ठेकेदारों ने भी ईश्वर के पश्चात पूरा ध्यान स्त्री पर ही केन्द्रित किया तथा सारे नियम कायदों से स्त्रियों को लाद दिया गया । मेरा मानना है कि असंयमित वासना प्राप्ति संघर्ष से बचने के लिए पूरूष प्रधान समाज ने ही विवाह जैसी संस्था का निर्माण किया और उसके यौन मामलों को लज्जा की संज्ञा देकर एक बेहद कीमती और नाजुक कांच की दीवार बना दिया। इससे स्त्री जाति को एक बड़ी हानि हुई, वह है- विवाह पश्चात ही स्त्री का सामाजिक मूल्य खत्म हो गया । वह सिर्फ भोग्या बन गई । विवाह संबंध विच्छेद या विधवापन की सूरत में तो वह और भी कष्टप्रद था, क्योंकि टूटी कांच की दीवार को कोई घर में नही सजाता था । हांलाकि वैवाहिक संबंध प्राकृतिक नियमों के अनुरूप है लेकिन उसके पीछे की रूढ़ियॉ एवं कायदे इस नियम को अप्राकृतिक बनाते है । जो स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करते है- स्वयंवर विवाह, विधवा विवाह, पुर्नविवाह एवं प्रेम विवाह जैसे कोई अपराध हो । इस पर समाज में पाबंदी जेैसी स्थिति है । हम स्वयं अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए फूले नही समाते है किन्तु हमारी पाणिग्रहण की सारी पद्धतियां स्त्री को स्त्री नही बल्कि किसी समान का दर्जा देती है। जो किसी दान की वस्तु से कम नही है। हिन्दू धर्म में सर्व प्रचलित ब्राम्ह विवाह है जो इस प्रकार है:- ब्राम्ह विवाह- विद्या और आचारऱ्युक्त वर को बुला कर और उत्तम वस्त्रो और अलंकारों से कन्या तथा वर को भूषित कर वर को जो कन्यादान दिया जाता है उसे ब्रम्ह विवाह कहते है। इसी प्रकार इस्लाम में प्रचलित विवाह हिन्दुओं के धर्म ग्रथों में वर्णित असुर विवाह जैसा है:- असुर विवाह- कन्या के पिता आदि को अथवा कन्या को यथा-शक्ति धन देकर जो अपनी इच्छा से कन्या को लेता है, उसको असुर विवाह कहते है। दोनों प्रकार के प्रचलित विवाह में कन्या एक वस्तु के रूप में स्थित है । एक में वह दान की वस्तु है तो दूसरे में विक्रय की । हमारी संस्कृति ने एैसी ही रीतियों को अपना आदर्श बना डाला और हम इसे ही गर्व की अवस्था मान बैठे । यह तथ्य है कि दोनों ही स्थितियों में माता पिता कन्या का विवाह करके अपने बोझ की इतिश्री कर लेते है। हम अपनी संस्कृति पर गर्व करते है तथा विश्व की महान सभ्यता हाने का दावा करते है। ऐसा कहते समय हम भूल जाते है कि कन्या हत्या, सती प्रथा, भू्रण हत्या जैसी घीनौनी प्रथायों भी हमारी संस्कृति की देन है। जो पूरे मानव समाज को कलंकित करती है। ब्रिटीश शासन को इसका श्रेय जाता है कि पहले-पहल उन्होने इन कुप्रथाओं को कानून बन्द करने का आदेश दिया। लेकिन दुखदाई पहलू यह है कि आज भी ऐसी घटनाओ की कमी नही है। कन्या भ्रुण हत्या जैसे एक आम बात हो। उसी प्रकार दहेज समस्या भी अपने पैर पसारा हुआ। जिनके विरूध कडे कानून कनाये गये है तथा महिलाओं को कई कानूनी भरण-पोषण की सुविधाए उपलब्ध कराई गई है। कई बार इन सुविधाओ के लालच में भी परिवार टूटते बिखरते देखे जाते है। स्त्री लेखन ने समाज की आधी आबादी को सच से अवगत कराया। थेरीगाथा की स्त्रियों से लेकर अब तक की स्त्रियो का लेखन समाज को स्त्री चिंतन से सहज ही अवगत कराता है । अब पुरूषों को समाज में स्त्रियों के संग ताल से ताल मिलाते हुए चलने के लिए स्त्री चिंतन को समझना होगा। ज्यादातर लोग यह मानते है कि स्त्री विमर्श वास्तव में पुरूष विरोधी विमर्श है यह उनका पूर्वाग्रह है । इससे भी निजात मिलना जरूरी है वास्तव में स्त्री लेखन में निम्न पॉच बाते प्रमुखता से आती हैं:- १- स्त्रियों की पिड़ायें -२- स्त्रियों की महत्वकांक्षाएंें ३- परिवार तथा समाज का संघर्ष ४- भक्ति रचनायें ५- स्त्रीवादी रचनायें । दलित लेखन की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई, क्योंकि सामान्य लेखन ने दलित लेखन की पूरी उपेक्षा की । उसी प्रकार दलित स्त्री लेखन की भी उत्पत्ति होनी आवश्यक थी क्योंकि सामान्य स्त्री लेखन में दलित स्त्री का हित विलोपित था । सामान्य तौर पर ऐसा माना जाता है कि दलित स्त्री लेखन (विमर्श भी) चौतरफा संघर्ष करता है - सवर्ण समाज, परिवार , दलित पुरूष एवं सामान्य स्त्री विमर्श आदि । लेकिन सामान्य स्त्री विमर्श इस विमर्श को लेकर या तो चुप्पी साध ली या विमर्श मानने से ही इंकार कर दिया। इस कारण यह विमर्श और उग्र होता गया । हिन्दी भाषा में कई लेखिकाएं इस विमर्श हेतु अपनी लेखनी से समाज को अवगत करा रही हैं । लेखनी की उग्रता ने प्राकृतिक नियमों तक को चुनौती दे डाली , इसे कुठांये भी कहा जा सकता है । जहॉ एक ओर सामान्य स्त्री विमर्श में तस्लीमा नसरीन जैसी महिलाएं अपने समाज की कुरीति पाखंड से लोगो को अवगत करा रही हैं, वहीं दूसरी ओर दलित स्त्री लेखन भी अपना वजूद बनाने हेतुू प्रयासरत हैं । इस मामले में मैं दलित लेखिकाओं का जिक्र करना आवश्यक समझता हूॅ कि किस प्रकार उन्होनें सामान्य स्त्री विमर्श से अलग दलित स्त्री विमर्श की आवश्यकता के पक्ष में अकाट्य तर्क दिये । वे लिखती हैं कि ''ऊॅची जाति के लोगों द्वारा दलित महिलाओं पर अत्याचार, उनको नंगा घुमाना आदि नारी आदोंलन के व्यापक हिस्से कभी नही बने ।`` वे आगे यह भी लिखती हैं कि '' आज भी नारीवादी विचारको एवं कार्यकर्ताओं को लगता है कि जाति का सवाल उनके आदोंलन को तोड़ देगा जबकि दलित महिलाओं को मानना है कि दलित महिलाओं को जोड़ने से ही नारीवादी आदोंलन और सशक्त बनेगा। आज ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण के सवाल पर दलित स्त्रियों को चिंता हैं कि अगर उनको उनका हिस्सा नही मिला तो वे मुख्य धारा से पिछड जायेेगीं। इसलिए उनका उंची जाति की नेता और समूहों के तर्क पर उनका विश्वास नही है । महिला आदोंलनकारियों का कहना है कि पहले विधेयक तो पास होने दो फिर बटवारा बाद में हो जायेगा । पर हमारा क्या ऐसा होना संभव है ।`` यहॉ पर सामान्य स्त्री विमर्श के भीतर बहुत ही सफाई से दलित लेखिकाऐं अपने दलित स्त्री विमर्श के अस्तित्व को रेखांकित करती है । उनकी चिंता लाजमी है क्यों कि सदीयों से ऐसा ही होता आया है । एक सवर्ण स्त्री दलित स्त्री को वैसे ही प्रताडित करती है जैसे एक सवर्ण पूरूष दलित पूरूष को प्रताड़ित करता है । दलित साहित्य में आत्मकथा लेखन के साथ-साथ एक ऐसी कुरीति का जन्म हुआ, जिसमें साहित्यकार का मूल्याकंन उसकी कृति ना होकर उसकी निजी जिन्दगी हो गई इसके साथ- साथ अन्य साहित्यकारों के भी नीजि जिन्दगी की तांक-झाक खुसर-फुसर का सिलसिला चालू हो गया जो वाकयुद्ध के बाद लेखन पत्रिका तथा किताबों की शक्ल में सामने आने लगा । इस प्रक्रिया में ज्यादातर ऐसे लेखक एवं लेखिकायें शामिल थी जिन्होनें लेखन शीर्ष में पहुचने के लिए शार्टकट रास्ता चुना। इस मामले में सवर्ण मीडिया या साहित्यकारों पर सारा दोष मढ़कर दलित साहित्यकारों को निर्दोष कहना गैर वाजिब होगा। दुर्भाग्यवश दलित स्त्री विमर्श का लेखन भी इन्ही पचड़ों में फसता गया। जहॉ निष्पक्ष एवं तटस्थ लेखन की आवश्यकता थी वहीं पर इस लेखन का उपयोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के तौर पर किया गया । तमाशा देखकर मजा लेने वालों ने बकायदा इसे छापा भी। निश्चित तौर पर एसे लेखन को मौका मिलने पर दलित स्त्री विमर्श की जड़े कमजोर हुई है, जिसकी भरपाई आसान नही है।

Thursday, 21 November 2013

अस्पृश्यता और हिंदी दलित लेखन


 डॉ. शेख अफरोज फातेमा

भारतीय संस्कृति दुनिया के महान संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। ऐसी महान संस्कृति में अस्पृश्यता एक कलंक के रूप में हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण को शूद्र कहा गया है। इस वर्ण पर सदियों से जुल्म ढाए जा रहे हैं। आधुनिक युग में अनेक नेताओं और समाज सेवियों ने इस अस्पृश्यता को मिटाने के लिए एड़ी-चोटी के प्रयत्न किये हैं।महात्मा गांधी अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे। उन्होंने भारतीय समाज पर लगे इस कलंक को मिटाने के लिए बहुत से प्रयास किए। म. गांधी के अनुसार, ‘‘हिंदू धर्म में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर लगा एक कलंक है। यदि यह अस्पृश्यता प्रथा न गई तो हिंदू समाज और हिंदू धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।’’भारत जैसे विशाल देश में जहाँ सदियों से प्रेम, शांति, अमन, मानवता, सद्भावना जैसे शब्द को ठोस गरिमा है। विश्व के महान शांति प्रसारक और महान पृष्ठभूमि वाले देश में दलितों को लेकर यह व्यवहार ? जब कि सभी मानव एक समान हैं। आदमी की पहचान उसके कर्म से, ज्ञान से विद्ववत्ता से होनी चाहिए न की उसकी जाति से। इसलिए कबीर ने कहा है -‘‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञानमोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।’’हम सभी हाड मांस से बने, एक समान हैं। हमें छुआछूत को पीछे छोड़ना चाहिए। अस्पृश्यता समाज में लगा कोढ़ है। छूत-अछूत के भेदभाव ने दलित वर्ग को प्रताड़ित किया है।आज वर्तमान में भी अस्पृश्यता अपना स्थान बरकरार रखी हुई है। आज हम भले ही ग्लोबल होने की बात करते हैं किंतु आज भी जाति व्यवस्था जन्ममूलक बनी हुई है कर्ममूलक नहीं। इस संदर्भ में दिनकर लिखते हैं -‘‘मगर मनुज क्या करें ? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं।चुनना जाति और कुल अपनी वश की तो है बात नहीं।’’जाति व्यवस्था भारतीय समाज की ऐसी चारित्रिकता है जो अन्यत्र नहीं मिलती है। अन्य धार्मिक समुदायों में विभेद पाये जाते हैं, मगर उतने रूढ़ नहीं है जितनी भारतीय समाज की जाति व्यवस्था। जाति व्यवस्था की पकड़ हमारे देश में दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कहा जाता रहा है कि आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था ढीली होगी और अअंतः मिट जाएगी, मगर असलियत कुछ और ही है। हिंदी भाषा क्षेत्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से आर्थिक रूप से काफी उन्नत है और वहाँ अधिकतर आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। वे राजधानी दिल्ली से कई प्रकार से जुड़े हुए हैं और उनके काफी सारे लोग विदेश में कार्यरत हैं। फिर भी जाति व्यवस्था का शिकंजा जितना उनके यहाँ मजबूत है उतना पिछड़े हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में नहीं है।आए दिन दलित और गैर दलित के बीच शादी संबंध के परिणामस्वरूप लड़का-लड़की को मारने की बात सामने आती है। हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसी-न-किसी बहाने दलितों को उत्पीड़ित किया जाता है। यह स्थिति लगभग समग्र भारत की है सोचने की बात है कि इसके पीछे क्या कारण हैं ?उत्तर वैदिक काल से ही शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया है जिसके कारण वह अज्ञान के गहरी अंधी खाई में लोटे गए हैं। म. फुले कहते हैं -‘‘शिक्षा के अभाव से बुद्धि का र्‍हास हुआ।बुद्धि के अभाव से नैतिकता की अवनती हुई।नैतिकता के अभाव से प्रगति अवरूद्ध हो गयी।प्रगति के अभाव से सम्पति लुप्त हो गयी।सम्पत्ति के अभाव से शूद्रों का पतन हो गया।इन सारी विपत्तियों का अभिभाव अकेले अज्ञान से हुआ।’’जीवन की मूलभूत इकाइयों से वंचित दलित वर्ग सदियों से जीवन जी रहा नहीं, बल्कि जीवन को मानो ढो रहा है। साक्षर न होने के कारण जमीनदारों, साहूकारों, बनियों ने धूर्तता से उनका बेजा लाभ उठाया है। उधार लिए पैसों का ब्याज चुकाते-चुकाते जीवन से वे हार मान बैठे थे। शिक्षा के अभाव में दलितों का बहुत शोषण हुआ है। शिक्षा से समझ बढ़ती है, ज्ञान बढ़ता है। परंतु उन्हें हमेशा शिक्षा से वंचित ही रखा गया है। फिर कैसे वह अपने आप को व्यक्त करेंगे। शिक्षा से वंचित रखना यह दलितों के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश थी।शिक्षित समाज में उपरी तौर पर दलितों के प्रति व्यवहार बदल रहा था पर सूक्ष्म रूप से अलगाव जारी था। जैसे खाने-पीने के अलग बर्तनों का प्रयोग आदि। ‘‘समय बदला है लेकिन फिर भी कही कुछ का वही ठहर गया है। आज भी जाति एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण घटक है। जब तक पता नहीं चलता लोग सामान्य रहते हैं। जाति का पता चलते ही सन्नाटा खींच लाता है। फुसफुसाहटे उठती हैं। दलित होने की पीड़ा चाकू की तरह नस-नस में उतरती जाती है। पढ़े-लिखे दलितों की अवस्था त्रिशंकू जैसे हो गयी है। उनकी पहचान उनकी अस्मिता का संकट आज पहले से अधिक बिकट है। वे समाज के मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं तो सवर्ण बाहें फैला कर नहीं अपनाते।’’४ जहाँ तक दलित जीवन का सवाल है वह भारतीय समाज में हमेशा तिरस्कृत ही रहा है और वर्तमान में भी तिरस्कृत ही है। इस तिरस्कार भरी जिंदगी से दलित वर्ग उब चुका है उससे वह मुक्ति चाहता है।आधुनिक समय में दलित वर्ग अपनी सदियों की दासता से मुक्ति चाहता है। वह अपनी स्थिति में परिवर्तन लाना चाहता है। उसके बदलते हुए कदम उसमें परिवर्तन की मांग करते हैं। वह भी आज सर उठाकर जीना चाहता है। सभ्य समाज, जो मुख्यधारा कहलाता है। उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है। उसे भी एक व्यक्ति के रूप में जाना जाय यही उसकी इच्छा है।वर्तमान समाज में दलितों के उद्धारक महामानव डॉ. आंबेडकर ने उन्हें शिक्षा, संघटन और संघर्ष का रास्ता दिखाकर उनके अंधेरे जीवन में नई रोशनी की किरण दिखलायी है। शिक्षा के कारण दलित युवक आज पढ़-लिखकर अपने हक के प्रति जागृत दिखाई देता है। शिक्षा ने तीसरे नेत्र का काम किया, जिससे सामाजिक प्रवाह में वह अपने अस्तित्व की माँग कर रहा है। शिक्षित दलित समाज ने साहित्य में आगमन कर अपनी वेदना को जो परिधि पर थी उसे केंद्र में लाने का स्वयं कार्य किया है। महात्मा फुले के शब्दों में कहे तो, ‘‘राख ही बता सकती है जलने की पीड़ा क्या है ?’’ यह पीड़ा लिए दलित समाज अपनी स्वानुभूति को समाज के सामने लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।दलित वर्ग को लेकर साहित्य में चर्चा करना वर्जित माना जाता था। इसी हाशिए के बाहर के समाज का साहित्य में पर्दापन करना इतना आसान काम नहीं था। समकालीन साहित्यकारों ने समय के साथ सरोकार निभाते हुए इन हाशिये के बाहर के समाज को हाशिए के अंदर लाने का कार्य किया है। समाज से सताये गए इस वर्ग को सामाजिक स्तर पर न्याय दिलाने का प्रयास साहित्यकारों ने सफलतापूर्वक किया है।‘दलित पँथर’ की स्थापना के उपरांत देश में अनेक संघटनाओं की स्थापना हुई जिसके द्वारा दलित साहित्य को बढ़ावा मिला या एक मंच प्राप्त हुआ। दलित साहित्य रूढ़िवाद, जातीयवाद और भाग्यवाद ही नहीं मानता, नारी उत्पीड़न और श्रमिक उत्पीड़न के विरूद्ध खुला विद्रोह उसके मूल स्वर में शामिल है।हिंदी दलित साहित्य की देन सिर्फ दो ही दशकों की है। जिसका मूल स्त्रोत महाराष्ट्र का दलित साहित्य है। दलित साहित्य की प्रेरणाओं में डॉ. आंबेडकर, म. फुले, शाहू महाराज आदि रहे हैं। हिंदी पर मराठी दलित साहित्य का प्रभाव दिखाई देता है।समकालीन साहित्यकारों ने दलित उत्पीड़न को लेकर कहानियाँ लिखी हैं। जिनमें प्रमुख रूप से - ‘सुरंग’ (सूरजपाल चौहान), ‘सलाम’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि), ‘दृष्टिकोण’ (अरविंद कुमार राही), ‘पुनर्वास’ (विपिन बिहारी), ‘चार इंच की कलम’ (कुसुम वियोगी) आदि कथासंग्रहों का समावेश है। हिंदी दलित सािहत्य का पहला उपन्यास जयप्रकाश कर्दम का ‘छप्पर’ सत्यप्रकाश का ‘जसतसभई सवेर’, मोहनदास नैमिशराय का ‘मुक्तिपर्व’ आदि उपन्यास महत्त्वपूर्ण हैं। उपन्यास साहित्य के साथ-साथ ही दलित आत्मकथा लेखन भी पूरी सशक्तता के साथ उभरकर आया जिसमें - मोहनदास नैमिशराय ‘अपने-अपने पिंजड़े’, ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘जूठन’, कौशल्या बैसंत्री ‘दोहरा अभिशाप’, डॉ. श्योराजसिंह बेचैन ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ आदि। जिसके द्वारा दलित विमर्श हमारे सामने आता है।दलित लेखकों के साथ गैरदलित लेखकों ने दलित साहित्य पर लेखनी चलायी है। रमणिका गुप्ता ने दलित कथाओं का संपादन किया है। यह सारी कथाएँ व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह करती हैं।दलित साहित्य को बढ़ावा देने में दलित साहित्य पत्रिकाओं ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमें ‘‘हिमायती’ (पाक्षिक), ‘नागमय संस्कृति’ (साप्ताहिक), ‘पूर्वदेवा’, ‘अनार्य भारत’ (साप्ताहिक) विशेष उल्लेखनीय हैं।’’समकालीन साहित्यकारों ने यह एहसास दिलाया कि दुनिया में महान संस्कृति के रूप में मानी जानेवाली भारतीय संस्कृति है पर इस महान संस्कृति को शर्म आये ऐसी समाज व्यवस्था दलितों को मानवीयता से वंचित रखती है। जो समाज विश्व को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की शिक्षा देता हो वही समाज अछूतों को समाज व्यवस्था के बाहर रखता है। समाज से बहिष्कृत कर उन्हें जानवरों से बदत्तर जीवन-यापन करने पर मजबूर करता है। ऐसे मानसिक रूप से विकलांग समाज का चित्रण दलित साहित्यकारों ने अपने साहित्य में किया है। साथ ही सवर्णों की सत्ता के विरूद्ध विद्रोह भी दिखलाया है। आज शिक्षा के कारण दलित जागृत हुआ है। वह भी इन्सान है, उसको भी मानवीय संवेदनाएँ हैं। वह भी आज अपने हक के लिए सजग दिखाई दे रहा है। (www.rachanakar.org से साभार)