Friday, 1 May 2015

डराओ मत, उसे गुस्सा आ रहा है/जयप्रकाश त्रिपाठी

मजीठिया वेतनमान लागू करने के मसले पर कारपोरेट मीडिया ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक की अवमानना करते हुए जिस तरह पत्रकारों के पेट पर लात मारा है, उससे लावा अंदर ही अंदर खदक रहा है। मीडिया कर्मियों की खामोशी तूफान से पहले के सन्नाटे जैसी है। यह पढ़ा-लिखा वर्ग है। सब समझ रहा है। जान रहा है कि मजीठिया मामले की पैरोकारी कर रहे अपने उन मददगारों से उसकी भेंट-मुलाकात तो दूर, उनसे बातचीत भी उसके जुर्म में शुमार हो सकती है, जो उसके हितों की हिफाजत के लिए देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था की शरण में हैं। 
इन दिनो उसे यह डर बार-बार परेशान कर रहा है, उसे ही क्यों, उसके घर-परिवार तक को, कि आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय से भी इंसाफ नहीं मिला तो फिर क्या होगा? क्या इतनी आसानी से उसके आर्थिक भविष्य का शिकार हो जाएगा? वह मजीठिया वेतनमान का मामला लड़ रहे अपने कानूनविदों, जुझारू पत्रकारों से मिले-न-मिले, उनके प्रति इस समय उसके मन गहरी आस्था है। अट्ठाईस अप्रैल के बाद से अब वह बड़ी बेचैनी से उन तीन महीनो की बाट जोह रहा है। सहमा हुआ अपने आसपास को चुपचाप पढ़ रहा है। सच पूछिए तो इस समय उसका ध्यान खबरों में कम, अपने भविष्य के खतरों पर ज्यादा है। वह जान रहा है कि उसने कोई जुर्म नहीं किया है, ऐसे अस्थिर हालात में उसने अपने लिए कोई मामूली सी भी ईमानदार पहल की तो उसका जुर्म बांचने वाले तुरंत हरकत में आजाएंगे।  
मैं तो कहता हूं, उसकी भूख को गुदगुदाओ नहीं। उसके भविष्य से मत खेलो। उसे इतनी बेरहमी से मत छेड़ो। चंद चाटुकारों के बूते उसके साथ कोई नामाकूल हरकत मत करो। उसका हक उसे दे दो। वरना जिस दिन उसने ठान लिया कि अब माफ नहीं करना है, इंसाफ चाहिए, चाहे किसी भी कीमत पर, तब कोई बिगड़ी बनाने वाला नहीं होगा। यह पूंजीपतियों की कोख से नहीं, कलम की तलवार चलाते हुए आया है। उसके वंशज गोरी तोपों से मुकाबले के लिए अखबार निकालते थे। विज्ञापन बाजार लूटने के लिए नहीं। याद करो कि उसकी कलम ने इस देश से उन गोरे शासकों को खदेड़ दिया था, जिनका दुनिया में कभी सूरज नहीं डूबता था। उसके पुरखे स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मुखर आवाज थे। गांधी, सुभाष, भगत सिंह, नेहरू, अंबेडकर जैसे वीर स्वातंत्र्य सेनानी भी उसके शब्दों के कायल रहे हैं। उसे पूंजी की ताकत और कानून की उंगली से मत डराओ। उसके डर को अब और मत आजमाओ। उसके डर में एक अंतहीन गुस्से का इतिहास छिपा है। देखो, धीरे धीरे उसकी मुट्ठियां हरत में आ रही हैं। वह अब सुप्रीम कोर्ट तक आंखें तरेरने लगा है। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधान मंत्री की दर तक दस्तक देना सीख रहा है।
समय से खतरा भांपने का शऊर है तो सावधान हो जाओ, उसके पांव अब तुम्हारी चौखट से बाहर जा रहे हैं। वह बड़ी बेचैनी से चुपचाप अपनी दिशा खोज रहा है। उसे अपने इस तरह के चौथे खंभे पर शक हो रहा है, जो उसके हक का, उसके काम का न हो। वह खुद से पूछ रहा है कि जब वह देश-काल के आचरण में इस तरह घुला हुआ है तो उसकी अस्मिता का खंभा चौथा क्यों? वह चौथे खंभे का तिजारती नहीं, सिर्फ अपना घर-परिवार चलाने भर की मजदूरी चाहता है। वह मजदूरी, जो इस देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था को भी जायज लगती है। उस एक-एक की बेचैनी, उस एक-एक के घर-परिवारों का एक-एक व्यक्ति इन दिनो साझा कर रहा है। उसका हक उसे न देने की जिद उन सबमें एक साथ नफरत के बीज बो रही है। ऐसे विशाल, सशक्त और अतिजागरूक बौद्धिक समुदाय में सुलगती इतनी अधिक नफरत को हवा देकर भला कोई कैसे और कब तक सकुशल-सलामत रह सकता है। कानूनी दांव-पेंच से उसे जितना हांकने की कोशिश की जाएगी, अपनी सही सही दिशा खोज लेने के बाद वह उतना ज्यादा भड़क सकता है। गुस्से से लाल हो सकता है। वह सिर्फ अपने शब्दों और अपनी मेहनत पर भरोसा करना जानता है। सबके हित में होगा कि उसे उसके उसी ज्ञान और श्रम के भरोसे तक रहने दिया जाए। उसे और कुछ करने के लिए विवश करना समझदारी नहीं होगी।
मजीठिया वेतनमान पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद कानूनी दांव-पेंच को माध्यम बनाकर उसे उलझाने और पछाड़ने की कोशिश की जा रही है। उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है। उसे केवल खबरें बटोरने-बनाने में सुख मिलता है। वह रोजाना खबरें बटोर-बना कर चुपचाप अपने घर लौट जाना चाहता है। वह लड़ना नहीं चाहता है। उसे लड़ने के लिए उकसाया जा रहा है। वह तो केवल शब्दों के पेंच लड़ाता है। सूचनाओं के बहाने विचार, सरोकार और चेहरे गढ़ता है। ये सब करके वह बड़ा खुश नजर आता है। चाय की चुस्कियां, मसाले की जुगाली करते हुए उसे शब्दों, सूचनाओं, खबरों, शीर्षकों पर बतकही करने में ज्यादा मजा आता है। वो लड़ना-भिड़ना क्या जाने। उसका हक मारकर, उसके पेट पर लात मार कर उसे लड़ाकू बनाने की जिद भला कहां की समझदारी हो सकती है?
उसके बीच से कुछ गिनती भर उसकी ही बिरादरी के जिन लोगो से जो कुछ गलत-सही कराया जाता है, उनका भी दिल वह सब करना गंवारा नहीं करता है। उनमें से किसी एक को भी पूछ कर देख लीजिए। पत्रकारिता के ऐसे पतित तत्वों को भी थाना-पुलिस की दलाली करने के लिए मजबूर किया जाता है। खबर से पहले विज्ञापन बटोरने की विवशता उनके भी जमीर को तिलमिला देती है। वे किसी से जब अपना दुख साझा करते हैं, उन्हें अपने से ही घृणा होने लगती है क्योंकि पहले-पहले दिन वे भी जब इस पेशे में आए थे, पत्रकार होने के सपने देखते हुए आए थे। वे भी मीडिया हाउसों तक ऐसे कर्म करने का अनुमान लगाकर नहीं पहुंचे थे। अपने लंबे कार्यकाल में मैंने उनको अंदर-ही-अंदर कांपते-ठिठुरते हुए बहुत करीब से देखा है। उनको समझाया, संभाला है। मीडिया प्रबंधन के नाजायज आदेशों पर उनमें से कइयों को बार-बार रोते, गालियां देते हुए सुना है। जो सच्चे पत्रकार हैं, उनकी तो बात ही जाने दीजिए, पतित पत्रकारों से भी कभी अकेले में मिलिए तो वे भी अपने सिरहाने शानदार शीशे के चैंबर में बैठे समाचार के शीर्ष सौदागरों की कुंडली बांचने की बदपरहेजी कर जाते हैं। लेकिन तभी, जब सामने सुनने वाला उनके भरोसे का हो।  
मजीठिया मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना के बाद का यह दौर उन्हें खलनायक साबित कर रहा है, जो प्रबंधन के पक्ष में हैं। गुनहगार वे भी हैं, जो तटस्थ और चुप हैं। वह पत्रकार हों, साहित्यकार हों, राजनेता अथवा संगठनकर्ता। मीडिया के भीतर की यह लड़ाई सीधे सीधे शोषक और शोषित, शासक और शासित के बीच का संघर्ष है। इसमें एक तरफ मीडियाकर्मियों का पूरा समुदाय है, दूसरी तरफ मीडिया मालिक, संपादक- प्रबंधक वर्ग। तीसरा कोई पक्ष नहीं है। मालिक वेज बोर्ड से निर्धारित एवं सुप्रीम कोर्ट से आदेशित वेतनमान नहीं देना चाहता है। अपनी सुख-सुविधाओं, खेल-तमाशों, संपादक-प्रबंधक वर्ग पर करोड़ों रुपये फूंकने के लिए तो उनके पास अथाह धन है लेकिन मजीठिया वेतनमान के नाम पर फूटी कौड़ी नहीं देंगे।
यह बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। इस कानूनी वाकये ने उस समुदाय को हाशिये पर पड़े वंचितों, शोषितों की तरह शायद पहली बार इतनी शिद्दत से सोचने पर विवश किया है। उसका मोहभंग हो रहा है। वह खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। वह एक ऐसे पेशे के विपरीत स्वभाव से टकरा रहा है, जो चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह अब तक जिसका मान न्यायपालिका से कम नहीं मानता-जानता रहा है। यथार्थ के धरातल पर यह मोहभंग उसे वंचित-शोषित वर्ग के निकट ले जा रहा है। साफ कहें तो पेशे की गद्दारी, जनद्रोही चरित्र से टकराने के लिए वह तेजी से तैयार हो रहा है। वह ये भी देख रहा है कि जो साहित्यकार, लेखक, कवि उसके दर पर अपनी रचनाएं प्रकाशित कराने के लिए दिन-रात मिन्नतें करते रहते हैं, उनकी नैतिकता ढकोसला है क्या, वे सब भी शब्दफरोश हैं क्या। उनमें से एक भी उसके जीवन से जुड़े इतने गंभीर प्रश्न पर क्यों अपना पक्ष प्रकट नहीं कर रहा है। इस सबसे वह दीक्षित हो रहा है। वह यह भी देख रहा है कि जिन संगठनों, नेताओं, कार्यकर्ताओं की वह खबरों में रोज-रोज राजनीतिक छवियां गढ़ता है, अच्छे-अच्छे शीर्षक रचता है, वे सब भी चुप हैं। वह हैरान है कि यह सब क्या है? ये कौन लोग हैं? अनावश्यक आत्मीयता प्रकट करते रहने वाले ये लोग, और इनके आंदोलन सिर्फ हाथी दांत हैं? क्यों ??
ये कारपोरेट मीडिया घराने पत्रकारों का सम्मान तो करना चाहते हैं लेकिन उनका हक नहीं देना चाहते हैं। वह सोच रहा है कि अखबारों में अक्सर छपने वाली बाइलाइन स्टोरी, स्टिंग ऑपरेशन, खबरों की पड़ताल, एक्सक्लूसिव समाचार, लाइव रिपोर्ट, ह्यूमन एंगल स्टोरी, क्या यह सब फ्रॉड है? वह क्या जागती आंखों से अमंगल सपने देख रहा है? देश-समाज पर मनुष्यता की बातें करने वाले ये संपादक कौन हैं? उसके मसले पर इन्होंने रीढ़, जमीर जैसे शब्दों को अपनी डिक्शनरी से अचानक क्यों खदेड़ दिया है? मजीठिया वेतनाम मांगने पर ये प्रताड़ित क्यों कर रहे हैं? अचानक ये दुश्मन जैसा व्यवहार क्यों करने लगे हैं? इन सवालों के जवाब में उसके सामने संपादक का वर्ग चरित्र खुल रहा है। अपनी कार्यशालाओं में वह देख रहा है कि संपादक-प्रबंधक उसका मित्रवर्ग नहीं है। उनका पक्ष मालिक है। उनका उद्देश्य उसको कुचलते हुए केवल मालिक का हित साधना है। देश-दुनिया के सुख-दुख के बारे में ये अखबार के पन्ने से न्यूज चैनलों की टीवी स्क्रीन तक इसका सारा ज्ञान प्रदर्शन केवल धोखा है। मालिक का पक्ष, तो भी स्पष्ट और इकहरा है। ये सफेदपोश बिचौलिया तो उससे ज्यादा खतरनाक है। हमारे विरुद्ध हमे ही इस्तेमाल कर रहा है। हमारे बीच जहर बो रहा है। हमसे ही हमारी कानाफूसी, जासूसियां करा रहा है। हम से ही हमको लड़ा रहा है। यह हमे अलग-अलग हिस्सों में बांट कर हमे मारना चाहता है। यह एक साथ हमारे विवेक और शरीर (पेट-रोटी) दोनो पर हमला कर रहा है। हमले करने की योजनाएं बना रहा है। यह मालिक को बता रहा है कि वह किस तरह मारे तो हम मर जाएंगे, हार जाएंगे। यही है, जो मालिक को सिखा-पढ़ा रहा है कि वह न्यायपालिका की कमजोरियों का फायदा उठाए, राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के रिश्ते साधे, आवाज उठाने वालों के तबादले और निष्कासन करे। उसके घर का असली भेदी यही है। यही हमारे चेहरे पढ़ते हुए हमसे 'मजीठिया वेतनमान नहीं चाहिए', जैसे झूठे फॉर्मेट पर हस्ताक्षर करा रहा है।  
तो यह भारतीय लोकतंत्र में पहली बार हो रहा है। मजीठिया वेजबोर्ड से पहले भी मणिसाना आदि के वेतनमान घोषित हुए थे लेकिन तब ऐसी मोरचेबंदी होते-होते रह गई थी। यह गुस्सा तात्कालिक नहीं। यह किसी को बख्शने वाली भी नहीं। उनको भी नहीं, जो न्यायपालिका तक उसके हितों की वकालत करने पहुंच चुके हैं। यदि उन्होंने उसके हितों के साथ कोई गलत समझौता किया तो। यह गुस्सा किसी ऐसे समुदाय का नहीं, जिसे शोषण की बारीकियां समझने में किताबों और रैलियों से दीक्षित होना पड़े। ये समुदाय उन सभी अनुभवों से पहले से लैस है। इसलिए इसका गुस्सा अधिक बेकाबू और ज्यादा खतरनाक हो सकता है। यह सब समझ रहा है। इसे कुछ भी समझाना नहीं है। ये जान रहा है कि इसकी ही समझदारी और मेहनत-मशक्कत के बूते बड़े-बड़े मीडिया घराने करोड़ो-अरबों में खेल रहे हैं और उनके चारण लाखों के पैकेज पर जिंदगी की मस्तियां लूट रहे हैं। इसे अच्छी तरह पता है कि मीडिया हाउस में मालिक का सिर्फ पैसा लगा है, विवेक और मेहनत तो उसकी है, जो मालिकों को मंत्रियों-प्रधानमंत्रियों, उच्चाधिकारियों के साथ उठने-बैठने का अवसर उपलब्ध कराती है। वे न हों, तो कोई मीडिया हाउस न हो। मालिक इसीलिए उसे आपस में लड़ाना चाहता है कि उसका रास्ता सुरक्षित रहे, उसके विज्ञापनों के बाजार और ऐशो-आराम, उसकी अथाह पूंजी के अभेद्य दुर्ग और सामाजिक प्रतिष्ठा को उसके घर के भीतर से  कोई चुनौती न दे सके।
इस सूचना-समय में उसे यह भी पता है कि आजकल के नेता-मंत्री अपने कर्मों के बूते नहीं, उसकी कलम की ताकत से राज भोग रहे हैं। यही है, जो मौके-दर-मौके उन सभी की छवियां बनाता-बिगाड़ता है। उनकी ही क्यों, बड़े बड़े लेखक-पत्राकारों, साहित्यकारों पर वह कलम न चलाए तो उनको भी सिर्फ उनकी रचनाओं और किताबों के बूते उन्हें कोई न जाने-पूछे। इसलिए उसे अपनी ताकत का अच्छी तरह अता-पता है। उसका भीतर से खौलना, नाराज होना, उबलना और संघर्ष की दिशा में दौड़ जाना, उन सबके लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। असली नायक मालिक और उसके पिट्ठू नहीं। वह है कलम का महानायक। वही है इमेज बिल्डर। वही बनाता है और बिगाड़ भी देता है। वह बिगड़ा तो सब कुछ बिगड़ जाएगा। चौथाखंभा ढह जाएगा।
सिर्फ वही है, जिसे सबकी जात-बिरादरी, नस्लीयत और नब्ज पता है। वह न मालिक है, न मीडिया मैनेजर। वह पत्रकार है। वह सूचनाओं का जादूगर है। वह अपनी कार्यशाला में दिन-रात जुटा हुआ शब्दों से नब्ज टटोलता है और समाज का मिजाज रचता है। उसे इतना हल्के में न लेना। उसके पूरे समुदाय के पेट पर लात मार रहे हो तो उसके उठे हाथ-लात झेल नहीं पाओगे। पलट कर उसका वार करना बहुत भारी पड़ जाएगा। वह मोरचा कानून का हो या आंदोलन का।
सिर्फ मालिकानों और उनके चाटुकारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे सूचनात्मक सिस्टम और सामाजिक ताने बाने के लिए वह आज हमारे सामने ऐसे ज्वलंत प्रश्न की तरह आ खड़ा हुआ है, जिसे अनसुना करना भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा। चुप्पियां टूटने से पहले का ये वही सन्नाटा है। अब भी वह अपने भीतर उमड़ते दर्द और गुस्से पर काबू पाना चाहता है। यह अन्याय वह शायद ही बर्दाश्त कर पाए। सोच लो, समय है। अभी तीन महीने के तीन दिन ही गुजरे हैं। सुनो, 28 अप्रैल 2015 के बाद से वह बिहार से मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल तक पहले से ज्यादा मुखर हो रहा है। वह पत्रकार है।   

Wednesday, 22 April 2015

राजधानी में एक किसान की मौत पर कई बड़े सवाल / जयप्रकाश त्रिपाठी


आज दिल्ली में जंतर मंतर पर केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान दौसा (राजस्थान) का किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर फांसी से झूल गया। अपने पीछे छोड़े एक सुसाइड नोट में वह लिख गया कि 'दोस्तों, मैं किसान का बेटा हूं। मेरे पिताजी ने मुझे घर से निकाल दिया क्योंकि मेरी फसल बर्बाद हो गई। मेरे पास तीन बच्चे हैं....जय जवान, जय किसान, जय राजस्थान।' घटना के समय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, आप के नेता संजय सिंह, कुमार विश्‍वास मौके पर मौजूद थे। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मुताबिक उसको मृत अवस्था में अस्पताल ले जाया गया था। 


मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आप के कार्यकर्ता दिल्ली पुलिस से किसान को बचाने के लिए अपील करते रहे लेकिन दिल्ली पुलिस के जवानों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। उसे पेड़ पर चढ़ने दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि किसान और मजदूर घबराएं नहीं, हम उनके साथ खड़े हैं।
देश की राजधानी में सरेआम एक रैली के दौरान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई बड़े सवाल छोड़ गई है। यह सवाल केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस, भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, इन सबको कठघरे में खड़ा करता है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से शुरू होकर यह सवाल हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था तक जाता है। यह सवाल उस पूरे सिस्टम से है, जो एक तरफ मौसम की मार से निढाल किसानों की लाशें गिन रहा है, दूसरी तरफ किसी भी कीमत पर वह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर आमादा है, जो किसान से उसकी जमीन भी छीन सके।
जंतर मंतर की मौत उस गहरे षड्यंत्र के दुष्परिणाम के रूप में देखी जानी चाहिए, जो देश आजाद होने के बाद से लगातार इस देश के करोड़ो-करोड़ किसान-मजदूरों के साथ खेत-खलिहानों से कल-कारखानों तक हो रहा है। उस षड्यंत्र में सबसे बड़ी साझीदार कांग्रेस है, जिसने आज देश को इस मोकाम तक पहुंचा दिया है। उस षड्यंत्र में दूसरी सबसे बड़ी भागीदार मजदूर-किसान विरोधी भाजपा है, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। इन दोनो की आर्थिक नीतियां एक हैं। देश का आम बजट हो या एफडीआई जैसे मुद्दे, दोनो एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनो की प्राथमिकताएं कारपोरेट पूंजी की हिफाजत है।
उस षड्यंत्र के लिए उन्हें भी गैरजिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए जो पिछले साठ साल से इस देश में किसानों-मजदूरों की सियासत के नाम पर खूब मुस्टंड और हरे-भरे हो रहे हैं। इस षड्यंत्र से उस मीडिया को भी असंपृक्त नहीं माना जा सकता, जो स्वयं को भारतीय लोकतंत्र का चौथा सबसे बड़ा खैरख्वाह मानता है लेकिन खबरें छापते-छापते, अब पूरी बेशर्मी से सिर्फ खबरें बेचने लगा है।
कथित हरितक्रांतिवादी देश में ये सब-के-सब इसलिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि इन सभी को बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि भारत में विदर्भ, तेलंगाना से बुंदेलखंड तक क्यों हजारों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। उस प्रदेश में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, जिसके शासन की बागडोर धरतीपुत्र के पुत्र के हाथ में है। ये कैसा मजाक है कि 2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो जून महीने तक देगा। 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है हालांकि जानकार इस सरकारी आकंड़े को काफी कम बताते हैं। क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडी के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी। इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई। इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं लेकिन वह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई। असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है, जिससे सरकारें बेखबर रहना चाहती हैं।
यह सच है कि इस व्यवस्था की जनद्रोही क्रूरताओं के चलते इससे पहले हजारों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं लेकिन अपने हालात से विक्षुब्ध एक युवा किसान का देश की राजधानी में इस तरह हुई मौत कोई यूं ही भुला दिया जाने वाला मामूली हादसा नहीं। घटना के समय वहां उस पार्टी के हजारों कार्यकर्ता मौजूद थे, जिसकी दिल्ली में सरकार है। उस मीडिया के दर्जनों रिपोर्टर मौजद थे, जो चौथा खंभा कहा जाता है। घटना उस स्थान पर हुई, जिससे कुछ कदम दूर देश की संसद है, जिसमें देश भर के जनप्रतिनिधियों का जमघट लगता है और जिसमें इस समय भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर पूरी तरह से आमादा है। कैसी बेशर्मी है कि वही पार्टी आज इस मौत पर बयान देती है कि जंतर मंतर पर मानवता की हत्या हुई। भाजपा प्रवक्ता संबित कहते हैं कि रैली क्या किसी आदमी की जान से ज्यादा जरूरी थी? तो क्या यही सवाल केंद्र की भाजपा सरकार से नहीं बनता कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश फिर तो किसान की जान से ज्यादा जरूरी है!

Saturday, 18 April 2015

आर्थिक आत्‍मनिर्भरता के लिए दिल्‍ली में जुटे पत्रकार और कंटेंट जनरेटर

अंग्रेजी के सेंटीमेंटल कवि लार्ड टेनिसन की एक कविता है-
Wherefore bees of Ingland forge.
Many a weepans chain and scorge.-----
यह कविता उद्योगपतियों की ओर से की जा रही श्रमिकों की प्रताड़ना और मजदूरों की कर्मनिष्‍ठा पर आधारित है। कवि मजदूरों से कहता है-हे इंग्‍लैंड की मधुमक्खियों, उनके लिए शहद क्‍यों बनाती हो, जो तुम्‍हें कुचलने से गुरेज नहीं करते हैं। हे मजदूरों, आप उन कोड़ों और जंजीरों का निर्माण क्‍यों करते हो, जो कोड़े आप पर बरसाए जाते हैं और जिन जंजीरों में आपको जकड़ा जाता है।
इन्‍हीं कोड़ों और जंजीरों से छुटकारा पाने के लिए देश भर से पत्रकार और कंटेंट जनरेटर लोकप्रिय सोशल साइट भड़ास 4 मीडिया डॉट कॉम के मालिक यशवंत सिंह के बुलावे पर दिल्‍ली में जमा हुए और उर्दू घर में लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिला। इस आयोजन से लोग अभिभूत थे और कुछ लोग तो यह भी कह रहे थे कि हमने अभी तक केवल सुना भर था कि इंटरनेट के जरिये ईमानदारी और सुकून की कमाई की जा सकती है, लेकिन उसे व्‍यावहारिक तौर पर देख भी लिया, वह भी मात्र 1100 रुपये के खर्च पर।
आयोजन की खास बात यह रही कि दीन दुनिया की फिक्र में लगे पत्रकार कभी अपने भविष्‍य के बारे में जहां सोच नहीं पाते थे और वर्षों से संपर्क से कटे हुए थे, वहीं एक दूसरे से मिल कर सकारात्‍मक ऊर्जा से भर गए। संपूर्ण कार्यक्रम से यह संदेश जरूर निकल कर आया-कुछ भी नहीं है मुश्किल अगर ठान लीजिए।
श्रीकांत सिंह के वॉल से

Monday, 13 April 2015

ओम थानवी को 'बिहारी पुरस्कार'

 ‘जनसत्ता’ के संपादक एवं लेखक ओम थानवी को वर्ष 2014 का 24वां बिहारी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। के.के. बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश ऋतुपर्ण ने थानवी को उनकी यात्रा वृत्तांतपरक चर्चित पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2011 में हुआ था। थानवी को पुरस्कार के रूप में 1 लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व उन्हें शमशेर सम्मान, सार्क सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वह निरंतर लेखनरत रहते हुए वर्तमान में साहित्य, समाज, राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता आदि विषयों पर त्वरित टिप्पणियों के लिए हिंदी क्षेत्र में सुप्रसिद्ध हैं।
केके बिरला फाउंडेशन द्वारा स्थापित बिहारी पुरस्कार राजस्थान के हिन्दी या राजस्थानी भाषा के लेखकों को प्रदान किया जाता है। पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित राजस्थानी लेखकों की कृतियों में से विजेता का चयन किया जाता है।  वर्ष 1991 में स्थापित पहला बिहारी पुरस्कार डॉ. जयसिंह नीरज को उनके काव्य संकलन ‘ढाणी का आदमी’ के लिए दिया गया था। ओम थानवी की एक अन्य चर्चित कृति है- 'अपने अपने अज्ञेय'।
ओम थानवी का जन्म 1 अगस्त 1957 को फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। वह नौ वर्षों (1980 से 1989) तक 'राजस्थान पत्रिका' में रहे। इसके बाद चंडीगढ़, फिर दिल्ली में संपादक बने। उन्होंने हिंदी की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक इतवारी पत्रिका का भी सम्पादन किया है। ओम थानवी की साहित्य, कला, सिनेमा, पर्यावरण, पुरातत्त्व, स्थापत्य और यात्राओं में गहन रुचि है।
वह मेक्सिको, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, रोमानिया, थाईलैंड, आर्मेनिया, बेलारूस, चीन, ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, गयाना, त्रिनिदाद एवं टोबेगो, सूरीनाम, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ग्रीस और क्यूबा आदि अनेक देशों की यात्राएं कर चुके हैं। 

एक 'आदर्श मां' की लाइव रिपोर्टिंग

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह एक नए तरह की चर्चा सरगर्म हुई है। चर्चा है मिस्र की टीवी पत्रकार लामिया हामदीन का अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करना। उनकी रिपोर्टिंग की तस्वीरें वायरल होने से ऑनलाइन सूचना माध्यमों पर इसे लेकर समर्थन और विरोध के रूप में तरह तरह की चर्चाएं बहस की शक्ल में सार्वजनिक रही हैं।
लामिया हामदीन के अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करने का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि ये तरीका ठीक नहीं है। वे उनको नौकरी से निकालने तक की मांग कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि लामिया आदर्श मां हैं। एक माँ का दर्द समझने के लिये दिल चाहिए, दिमाग नहीं। उन्होनें वही किया जो वक्त की जरूरत थी, "माँ तुझे सलाम"। उन्होंने उनकी तुलना इटली की नेता लीसिया रॉनज़्यूली से की है। लीसिया 2010 में अपनी बेटी को काम पर लेकर जाती थीं।
लामिया का कहना है कि एक कामकाजी मां होने के नाते उन्होंने वहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'मेरा बेटा बीमार था और मुझे कुछ ज्यादा देर काम करना था। ऐसे में वह उसे नर्सरी से अपने साथ लेकर आ गईं क्योंकि उसे और कहीं छोड़ना ठीक नहीं था।

Sunday, 12 April 2015

दूरदर्शन में महिला कर्मियों का यौन शोषण

अब तो दूरदर्शन भी महिला कर्मियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। दूरदर्शन में सेवारत कई महिला कर्मियों का यौन उत्पीड़न किया जा चुका है। हाल ही में दूरदर्शन की उत्पीड़ित महिला कर्मियों की लिखित शिकायतों के बावजूद उन पर न तो महिला आयोग गंभीर है, न अन्य कोई वह जांच एजेंसी, जहां वे अपनी शिकायतें कर रही हैं। महिला बाल विकास मंत्रालय का इस मामले पर खामोशी साध लेना तो और भी आश्चर्यजनक है। ये हाल तो तब है, जबकि उन पीड़ित महिलाओं में से एक उसी आरएसएस के दूरदर्शन में प्रसार भारती मजदूर संगठन बीएमस की नेता हैं, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। एक पीड़ित महिला कर्मी ने न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायती पत्र में लिखा है कि क्या बलात्कार हो जाने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी?
एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो अपने अधीनस्थ महिला कर्मी से कहा कि तुम मेट्रो में रहने वाली तीस वर्ष की जवान हो, तुम ये भी नहीं जानती कि वरिष्ठ अफसर से कैसे पेश आया जाता है। दिल्ली की लड़कियां तो सब कुछ जानती हैं। महिला कर्मी की शिकायत है कि सिर्फ उसके साथ ही ऐसा नहीं, दूरदर्शन की कई महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतें हो चुकी हैं।
दूरदर्शन में कार्यरत कई महिलाएं अपने अफसरों से डरी हुई हैं। एक पीड़िता महिला कर्मी ने साहस बटोर कर पुलिस में शिकायत भी कर दी है। एक अन्य महिला दूरदर्शन कर्मी को अपने विभागीय उच्चाधिकारियों से जब न्याय नहीं मिला तो उसने केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और महिला आयोग को लिखित में बताया है कि उसके अफसर अपर महानिदेशक ने ऐसी शर्मनाक हरकत उससे की है कि उसे कहने में भी शर्म महसूस हो रही है। इसके बाद उस पीड़िता पर दबाव डालने के साथ ही परिजनों को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया गया। बताया जाता है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है।
पता चला है कि इसी तरह आकाशवाणी भवन स्थित दूरदर्शन अभिलेखागार में कार्यरत एक अन्य महिला कर्मी ने प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव पर यौन हरकतों का आरोप लगाया है। उसने इसकी लिखित शिकायत अपने विभाग के उच्चाधिकारियों के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला बाल विकास मंत्री से की है। आरोप है कि संबंध न बनाने पर प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव ने उसे कई बार धमकियां भी दीं। उसकी फरियाद पर कोई कार्रवाई तो नहीं हुई। उल्टे उसे ही मंडी हाउस स्थित दूरदर्शन मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां भी उसे एक अफसर तंग करने लगा। इस दफ्तर में तैनात रहे एक अपर महानिदेशक पर भी एक महिला कर्मी ने पिछले वर्ष यौन शोषण का आरोप लगाया था। उस मामले में भी कोई कार्रवाई करने की बजाय अफसर को स्थानांतरित कर दिया गया था।
इन घटनाओं से पूर्व विशाखा गाइडलाइंस के आने के बाद भी दूरदर्शन की एक महिला पत्रकार द्वारा एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत सहकर्मी पर यौन शोषण का आरोप लगाया जाना और उस पर दूरदर्शन के सर्वोच्च पद (डीजी-डीडी) पर एक महिला के आसीन होते हुए भी उसके द्वारा पीड़ित के आरोपों पर कार्रवाई न किया जाना एक खतरनाक कदम की ओर संकेत करता है। इसी तरह की अक्टूबर 2013 की एक घटना भी दूरदर्शन से ही संबंधित है। उस समय तो प्रसार भारती प्रबंधन ने यौन उत्पीडऩ के आरोपी दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया था। अधिकारी की सहकर्मी ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसी तरह इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने अपने अधिकारियों द्वारा उत्पीड़ित किए जाने, दफ्तर की गुटबाजी और फिर बिना कारण बताए बर्खास्त कर दिए जाने पर दफ्तर के सामने ही जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी।
डा. रीना मुखर्जी, तनु शर्मा प्रकरणों ने भी मीडिया कुपात्रों का भेद खोला था : प्रिंट मीडिया में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। ‘द स्टेटसमैन’ की एक सीनियर रिपोर्टर रहीं डा. रीना मुखर्जी ने अखबार के ही तत्कालीन न्यूज कोआर्डिनेटर ईशान जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाद इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराए जाने के बजाय उन्हीं को नौकरी से निकाल दिया गया था।