Thursday, 10 March 2016

शब्द हैं वहां तक / जयप्रकाश

जहां तक पृथ्वी, आकाश, आग-पानी, हवा है,
अंधेरे को चीरते हुए जहां तक रोज सुबह होती है,
सूरज उगता है, दिन खिलखिला उठते हैं,
थिर-स्थिर होकर भी दिशाएं बतियाती-चहचहाती हैं,
पक्षी उड़ान भरते हैं, जीवन जोर-जोर से चल पड़ता है,
रंग-विरंगे सुर गूंजते हैं जहां तक विविध भाषा-बोलियों में, हंसते-विहसते थक जाती है शाम, रात थपकियाती है, सुनहरे सपने देखता है आदमी जहां तक, सब ओर-छोर तक शब्द हैं वहां, तृण-तृण, बूंद-बूंद में.....

Wednesday, 16 December 2015

जिसकी उंगली है रिमोट पर वो है सबसे ग्रेट

""...सुनो बाबू जी, ये जो दस-दस लाख के गेट वाली कोठियां देख रहे हो न, इन सबकी अपनी-अपनी कथा-कहानी है। पढ़े-लिखे लगते हो। फुर्सत लगे तो कभी-कभार उन कहानियों की दो-चार लाइन तुम भी पढ़ लिया करो न, तबीयत हरी हो जाएगी।... आंख चियार कर जीवन भर भक्कू ही बने रहोगे क्या?...और हां, फिर भी दिमाग काम न करे तो कैलाश गौतम की ये दो-चार लाइनें ही पढ़ डालो, शायद कुछ पल्ले पड़ जाए.......""
सौ में दस की भरी तिजोरी नब्बे खाली पेट, झुग्गीवाला देख रहा है साठ लाख का गेट ।
बहुत बुरा है आज देश में लोकतंत्र का हाल
कुत्ते खींच रहे हैं देखो कामधेनु की खाल, हत्या, रेप, डकैती, दंगा हर धंधे का रेट ।
बिकती है नौकरी यहाँ पर बिकता है सम्मान,
आँख मूँद कर उसी घाट पर भाग रहे यजमान, जाली वीज़ा पासपोर्ट है जाली सर्टिफ़िकेट ।
लोग देश में खेल रहे हैं कैसे कैसे खेल, एक हाथ में खुला लाइटर
एक हाथ में तेल चाहें तो मिनटों में कर दें सब कुछ मटियामेट ।
अंधी है सरकार-व्यवस्था, अंधा है कानून
कुर्सीवाला देश बेचता रिक्शेवाला ख़ून, जिसकी उंगली है रिमोट पर वो है सबसे ग्रेट ।

Tuesday, 3 November 2015

जयप्रकाश त्रिपाठी

प्यार की बातें करने वाले,
देह से बाहर आओ तो,
प्यार के भूखे इंसानों पर
भी कुछ शब्द लुटाओ तो......
रचो न मिथ्या, जन-गण-मन
के साथ चलो दो-चार कदम,
सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् का दुनिया को पाठ पढ़ाओ तो.....

Saturday, 31 October 2015

मीडिया पर केंद्रित एवं शीघ्र प्रकाश्य मेरी नयी पुस्तक.... खबर फरोश

Monday, 26 October 2015

मेरी पीड़ा के लोग / जयप्रकाश त्रिपाठी

मैंने जब-जब लिखना चाहा, कभी नहीं लिख पाया तुमको,
मैंने जब-जब पढ़ना चाहा, कभी नहीं पढ़ पाया तुमको, तुम इतने, क्यों ऐसे-ऐसे.....
लिखना-पढ़ना, कहना-सुनना, 
मिलना-जुलना रहा न संभव,
जन में तुम-सा, मन में तुम-सा, 
रचना के जीवन में तुम-सा,
सहज-सहज सा, सुंदर-सुंदर,
मुक्त-मुक्त सा, खुला-खुला सा,
ओर-छोर तक युगों-युगों से
आदिम बस्ती-बस्ती होकर,
शिशु की हंसी-हंसी में तिरते,
रण में भी क्षण-प्रतिक्षण घिरते,
मां के मुंह से लोरी-लोरी,
युद्ध समय में गगन-गूंज तक,
आर्तनाद से घिरे-घिरे वे
दस्यु न जाने अब तक तुमको
ठगने और लूटने वाले,
वे समस्त जाने-आनजाने,
संघर्षों का वह इतिहास अधूरा अब भी
रक्तबीज सा, धर्मराज सा
अथवा अब के राज-काज में
इस समाज में श्रम से, सीकर से, शोणित से सिंचित
जीवन के जंगल में
खिंची-खिंची प्रत्यंचाओं पर
उत्तर में भी, दक्षिण में भी, धरती से नभ तक अशेष
जग को रचते-रचते, ढोते-ढोते
थके न फिर भी, चले आ रहे,
चले आ रहे अंतहीन, अविरल,
अपराजित, ऐसे किसी समय की निर्णायक बेला को,
उन सब के गाढ़े-गाढ़े सब अंधेरों को ढंक देने को
उफन रहे आक्रोश लिये
अंतस में अपने रोष लिए
किलो, मठों के ढह जाने तक,
टूट-टूट कर, बिखर-बिखर कर उनका जीवन मिट जाने तक....
मैंने तुमको लिखना चाहा, पढ़ना चाहा,
कहना चाहा, सुनना चाहा,
क्योंकि तुम, बस तुम हो ऐसे
आओ-आओ, हम हैं इतने,
इतने हम हैं, इतने-इतने, हम हैं ऐसे,
आओ अभी अशेष समर है !