Monday, 20 October 2014

आध्यात्मिक पागलों का मिशन / हरिशंकर परसाई

भारत के सामने अब एक बड़ा सवाल है - अमेरिका को अब क्या भेजे? कामशास्त्र वे पढ़ चुके, योगी भी देख चुके। संत देख चुके। साधु देख चुके। गाँजा और चरस वहाँ के लड़के पी चुके। भारतीय कोबरा देख लिया। गिर का सिंह देख लिया। जनपथ पर 'प्राचीन' मूर्तियाँ भी खरीद लीं। अध्यात्म का आयात भी अमेरिका काफी कर चुका और बदले में गेहूँ भी दे रहा है। हरे कृष्ण, हरे राम भी बहुत हो गया।
महेश योगी, बाल योगेश्वर, बाल भोगेश्वर आदि के बाद अब क्या हो? मैं देश-भक्त आदमी हूँ। मगर मैं अमेरिकी पीढ़ी को भी जानता हूँ। मैं जानता हूँ, वह 'बोर' समाज का आदमी हैं - याने बड़ा बोर आदमी। शेयर अपने आप डॉलर दे जाते हैं। घर में टेलीविजन है, दारू की बोतलें हैं। शाम को वह दस-पंद्रह आदमियों से 'हाउ डु यू डू' कर लेता है। पर इससे बोरियत नहीं मिटती। हनोई पर कितनी भी बम-वर्षा अमेरिका करे, उत्तेजना नहीं होती। कुछ चाहिए उसे। उसे भारत से ही चाहिए।
मुझे चिंता जितनी बड़ी अमेरिका की है उतनी ही भारतीय भाइयों की। इन्हें भी कुछ चाहिए।
अब हम भारतीय भाई वहाँ डॉलर और यहाँ रुपयों के लिए क्या ले जाएँ? रविशंकर से वे बोर हो चुके। योगी, संत वगैरह भी काफी हो चुके। अब उन्हें कुछ नया चाहिए - बोरियत खत्म करने और उत्तेजना के लिए। डॉलर देने को वे तैयार हैं।
मेरा विनम्र सुझाव है कि इस बार हम भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' ले जाएँ। ऐसा मिशन आज तक नहीं गया। यह नायाब चीज होगी - भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' याने आध्यात्मिक पागलों का मिशन।
मैं जानता हूँ। आम अमेरिकी कहेगा - वी हेव सीन वन। हिज नेम इज कृष्ण मेनन। (हमने एक पागल देखा है। उसका नाम कृष्ण मेनन है।) तब हमारे एजेंट कहेंगे - वह 'डिवाइन' (आध्यात्मिक) नहीं था। और पागल भी नहीं था। इस वक्त सच्चे आध्यात्मिक पागल भारत से आ रहे हैं।
मैं जानता हूँ, आध्यात्मिक मिशनें 'स्मगलिंग' करती रहती हैं। पर भारत सरकार और आम भारतीयों को यह नहीं मालूम कि लोगों को 'स्वर्ग' में भी स्मगल किया जाता है।
यह अध्यात्म के डिपार्टमेंट से होता है। जिस महान देश भारत में गुजरात के एक गाँव में एक आदमी ने पवित्र जल बाँटकर गाँव उजाड़ दिया, वह क्या अमेरिकी को स्वर्ग में 'स्मगल' नहीं कर सकता?
तस्करी सामान की भी होती है - और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है। कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, ‘मेरी उम्र एक हजार साल है। मैं हजार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था। ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है।’ विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा - क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हजार साल है? तब चेला कहेगा, ‘मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्योंकि मैं तो इनके साथ सिर्फ पाँच सौ सालों से हूँ।’
याने चेले पाँच सौ साल के वैसे ही हो गए और अपनी अलग कंपनी खोल सकते हैं। तो मैं भी सोचता हूँ कि सब भारतीय माल तो अमेरिका जा चुका - कामशास्त्र, अध्यात्म, योगी, साधु वगैरह।
अब एक ही चीज हम अमेरिका भेज सकते हैं - वह है भारतीय आध्यात्मिक पागल - इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक। इसलिए मेरा सुझाव है कि 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' की स्थापना जल्दी ही होनी चाहिए। यों मेरे से बड़े-बड़े लोग इस देश में हैं। पर मैं भी भारत की सेवा के लिए और बड़े अमेरिकी भाई की बोरियत कम करने के लिए कुछ सेवा करना चाहता हूँ। यों मैं जानता हूँ कि हजारों सालों से 'हरे राम हरे कृष्ण' का जप करने के बाद भी शक्कर सहकारी दुकान से न मिलकर ब्लैक से मिलती है - तो कुछ दिन इन अमरीकियों को राम-कृष्ण का भजन करने से क्या मिल जाएगा? फिर भी संपन्न और पतनशील समाज के आदमी के अपने शांति और राहत के तरीके होते हैं - और अगर वे भारत से मिलते हैं, तो भारत का गौरव ही बढ़ता है। यों बरट्रेंड रसेल ने कहा है - अमेरिकी समाज वह समाज है जो बर्बरता से एकदम पतन पर पहुँच गया है - वह सभ्यता की स्टेज से गुजरा ही नहीं। एक स्टेप गोल कर गया। मुझे रसेल से भी क्या मतलब? मैं तो नया अंतरराष्ट्रीय धंधा चालू करना चाहता हूँ - 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन'। दुनिया के पगले शुद्ध पगले होते हैं - भारत के पगले आध्यात्मिक होते हैं।
मैं 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' बनाना चाहता हूँ। इसके सदस्य वही लोग हो सकते हैं, जो पागलखाने में न रहे हों। हमें पागलखाने के बाहर के पागल चाहिए याने वे जो सही पागल का अभिनय कर सकें। योगी का अभिनय करना आसान है। ईश्वर का अभिनय करना भी आसान है। मगर पागल का अभिनय करना बड़ा ही कठिन है। मैं योग्य लोगों की तलाश में हूँ। दो-एक प्रोफेसर मित्र मेरी नजर में हैं जिनसे मैं मिशन में शामिल होने की अपील कर रहा हूँ।
मिशन बनेगा और जरूर बनेगा। अमेरिका में हमारी एजेंसी प्रचार करेगी - सी रीयल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स (सच्चे भारतीय आध्यात्मिक पागलों को देखो।) हम लोगों के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर उतरने की खबर अखबारों में छपेगी। टेलीविजन तैयार रहेगा।
मिसेज राबर्ट, मिसेज सिंपसन से पूछेगी, ‘तुमने क्या सच्चा आध्यात्मिक भारतीय पागल देखा है?’ मिसेज सिंपसन कहेगी, ‘नो, इज देअर वन इन दिस कंट्री, 'अंडर गाड'?’ मिसेज राबर्ट कहेगी, ‘हाँ, कल ही भारतीय आध्यात्मिक पागलों का एक मिशन न्यूयार्क आ रहा है। चलो हम लोग देखेंगे : इट विल बी ए रीअल स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस। (वह एक विरल आध्यात्मिक अनुभव होगा।)’
न्यूयार्क हवाई अड्डे पर हमारे भारतीय पागल आध्यात्मिक मिशन के दर्शन के लिए हजारों स्त्री-पुरुष होंगे - उन्हें जीवन की रोज ही बोरियत से राहत मिलेगी। हमारा स्वागत होगा। मालाएँ पहनाई जाएँगी। हमारे ठहराने का बढ़िया इंतजाम होगा।
और तब हम लोग पागल अध्यात्म का प्रोग्राम देंगे। हर गैरपागल पहले से शिक्षित होगा कि वह सच्चे पागल की तरह कैसे नाटक करे। प्रवेश-फीस 50 डॉलर होगी और हजारों अमेरिकी हजारों डॉलर खर्च करके 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स' के दर्शन करने आएँगे।
हमारा धंधा खूब चलेगा। मैं मिशन का अध्यक्ष होने के नाते भाषण दूँगा, ‘वी आर रीअल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स। अवर ऋषीज एंड मुनीज थाउज़ेंड ईअर्स एगो सेड दैट दि वे टु रीअल इंटरनल पीस एंड साल्वेजन लाइज थ्रू ल्यूनेसी।’ (हम लोग भारतीय आध्यात्मिक पागल हैं। हमारे ऋषि–मुनियों ने हजारों साल पहले कहा था कि आंतरिक शांति और मुक्ति पागलपन से आती है।)
इसके बाद मेरे साथी तरह-तरह के पागलपन के करतब करेंगे और डॉलर बरसेंगे।
जिन लोगों को इस मिशन में शामिल होना है, वे मुझसे संपर्क करें। शर्त यह है कि वे वास्तविक पागल नहीं होने चाहिए। वास्तविक पागलों को इस मिशन में शामिल नहीं किया जाएगा - जैसे सच्चे साधुओं को साधुओं की जमात में शामिल नहीं किया जाता।
अमेरिका से लौटने पर, दिल्ली में रामलीला ग्राउंड या लाल किले के मैदान में हमारा शानदार स्वागत होगा। मैं कोशिश करूँगा कि प्रधानमंत्री इसका उद्‌घाटन करें।
वे समय न निकाल सकीं तो कई राजनैतिक वनवास में तपस्या करते नेता हमें मिल जाएँगे। दिल्ली के 'स्मगलर' हमारा पूरा साथ देंगे। कस्टम और एनफोर्स महकमे से भी हमारी बातचीत चल रही है। आशा है वे भी अध्यात्म में सहयोग देंगे।
स्वागत समारोह में कहा जाएगा, ‘यह भारतीय अध्यात्म की एक और विजय है, जब हमारे आध्यात्मिक पगले विश्व को शांति और मोक्ष का संदेश देकर आ रहे हैं। आशा है आध्यात्मिक पागलपन की यह परंपरा देश में हमेशा विकसित होती रहेगी।’
'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' को जरूर अमेरिका जाना चाहिए। जब हमारे और उनके राजनैतिक संबंध सुधर रहे हैं तो पागलों का मिशन जाना बहुत जरूरी है।

Sunday, 19 October 2014

....और सारू को मिल गई मां

पांच साल का एक भारतीय लड़का 25 साल पहले अपनी मां से बिछड़ गया था। लेकिन उपग्रह से ली गई तस्वीरों के जरिए उसने अपनी मां को खोज लिया। तस्मानिया राज्य में रह रहे सारू की उम्र तब केवल पांच साल थी, जब वो भारत में खो गया था। ट्रेन में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले बड़े भाई के साथ सफर करने के दौरान ये हादसा हुआ था। सारू बताता है, ‘वो रात का वक्त था। हम ट्रेन से उतरे ही थे और मैं बहुत थका हुआ था। मैं स्टेशन पर एक जगह बैठ गया और मुझे नींद आ गई।’ दुर्भाग्य की उस झपकी ने सारू की आगे की जिंदगी का रुख तय कर दिया। वह कहता है, ‘जब मैं सोकर उठा तो मेरा भाई कहीं नहीं दिखा। मेरे सामने एक ट्रेन खड़ी थी और मैंने सोचा कि वह इसी ट्रेन में होगा। मैं उसकी खोज में ट्रेन में चढ़ गया।’
लेकिन इस सफर ने मुझे एक अनाथालय पहुंचा दिया जहां से मुझे तस्मानिया के एक दंपति ने गोद ले लिया। नए घर में सारू सहज हो गया लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, अपने असली परिवार से मिलने की उसकी ख्वाहिश जोर पकड़ने लगी। लेकिन दिक्कत यह थी कि पांच साल की उम्र में निरक्षर रहे सारू को अपने शहर का नाम तक याद नहीं था। फिर भी उसने‘गूगल अर्थ’ पर घर की तलाश शुरू कर दी। ‘गूगल अर्थ’ के बारे में सारू कहता है, ‘मुझे सुपरमैन की तरह लग रहा था। मैं जहां चाहे वहां जा सकता था। हर तस्वीर के बारे में खुद से पूछता कि क्या ये वही है और जैसे ही यह जवाब मिलता कि नहीं, तलाश आगे बढ़ जाती।’ ‘गूगल अर्थ’ में घर खोजने के लिए सारू ने एक प्रभावशाली तरकीब खोजी, ‘मैंने अंदाजा लगाया कि मेरा सफर कोई 14 घंटे का रहा होगा और इस दरमियान मैंने 1200 किलोमीटर का सफर तय किया होगा।’ उसने कोलकाता शहर को सेंटर में रखते हुए एक सर्किल खींचा और जल्द ही उसे एहसास हुआ कि वह खंडवा शहर की तलाश कर रहा है। वह बताता है, ‘जब मुझे ये मिल गया तो मैंने उस झरने के आस-पास की तमाम जगहों को खंगाला, जहां मैं खेला करता था।’ सारू जल्द ही खंडवा पहुंचा, वो शहर जिसे उसने ऑनलाइन खोजा था। बचपन की गलियों से उसे इस शहर का रास्ता मिला था, और आखिरकार उसे अपना घर मिल गया लेकिन वहां ताला लटका हुआ था। उसके पास अपने बचपन की एक तस्वीर थी और घरवालों के नाम याद थे। पूछने पर पड़ोसियों ने बताया कि वे लोग कहीं और चले गए हैं। तभी एक आदमी ने मां से उसकी बात कराई। सारू की कहानी में प्रकाशकों और फिल्मकारों की दिलचस्पी बढ़ी है। वह कहता है, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा था।’
लेकिन मिलने पर उसकी मां उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाई। सारू कहता है, ‘आखिरी बार जब मैंने उन्हें देखा था तो वह 34 साल की थीं। लेकिन चेहरे की बनावट वैसी ही थी। मैंने उन्हें पहचान लिया और कहां, हां, तुम मेरी मां हो। सारू का वो भाई जो रेल के सफर में उनके साथ था, उसकी लाश रेल की पटिरयों पर पाई गई थी। सारू को इसका मलाल है। लेकिन मां से मिलने के बाद उसे अब अच्छी नींद आती है। (राष्ट्रीय सहारा से साभार)

Friday, 17 October 2014

शताब्दी का गीत - 'स्ट्रेंज फ्रूट' / अबेल मीरोपाल

बलात्कार और हत्या कर लड़कियों, स्त्रियों की लाशें सार्वजनिक तौर पर चुनौती देती जैसे पेड़ों पर लटकायी जा रही हैं और इनकी रोकथाम के महकमे संभाले राजनेताओं के बीच मृतकों के कपड़े-लत्ते और शील-आचरण को लेकर जैसे शब्दों का आदान-प्रदान हो रहा है, उसके लिए 'शर्मनाक' शब्द छोटा पड़ गया है।
इन्हीं संदर्भों को लेते हुए यहां स्मरण करना प्रासंगिक और उचित होगा। 'स्ट्रेंज फ्रूट' पिछली सदी के तीस के दशक में न्यूयार्क स्टेट के एक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले रूस से भागकर अमेरिका में बस गये गोरे यहूदी अबेल मीरोपाल का गीत है। वह यातना देकर मार डालने की संस्कृति के खिलाफ थे। अन्याय और उसको प्रश्रय देने वालों के प्रति अपनी घनघोर नफरत का इजहार करने के लिए ही उन्होंने यह गीत लिखा। शुरू में उन्होंने इस गीत शीर्षक 'कसैला फल' रखा था।
पहली बार यह गीत 1937 में अमेरिकी स्कूल शिक्षकों की पत्रिका में छपा था। सन 1939 में मशहूर अश्वेत गायिका बिली होलीडे ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाकर इस गीत को अमर कर दिया था। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में घायल अपने अश्वेत पिता को अस्पताल में (अश्वेत होने के कारण) इलाज न करने पर तिल तिल कर मरते देखा था। गीत गाने पर मां की नाराजगी के विरोध में उन्होंने कहा था- अपनी कब्र में भी मैं इस गीत को अपने साथ रखूंगी। उसके बाद लगभग चालीस अन्य गायकों ने भी इस गीत गाया।
आज अमेरिकी समाज में अश्वेत समुदाय पर होने वाले अत्याचारों के विरोध का यह दस्तावेजी गीत बन गया है। 1999 में टाइम मैग्जीन ने इसको 'शताब्दी का गीत' घोषित किया था। वर्ष 2010 में न्यू स्टेट्स मैन ने इसको दुनिया के बीस सर्वश्रेष्ठ गीतों में शुमार किया था -

दक्खिन के पेड़ों में लगा हुआ है एक अजीबोगरीब/अनोखा सा फल
पत्तियों पर लहू के धब्बे... जड़ें भी लहूलुहान
दक्खिनी हवाओं से हिल रहे हैं काले कलूटे शरीर
यह अजीबोगरीब / अनोखा फल लटक रहा है पोपलर के पेड़ पर...

लड़के दक्खिनी चरवाहों के इलाके का मंजर ऐसा
कि बाहर निकल आयीं आंखें और वीभत्स हो गए मुंह
घर फूलों की गमक उतनी ही मोहक और तरोताजा
पर बीच बीच में घुस आती हैं जलते हुए मांस की सड़ांध

यहां फूल खिला है जिसे नोच ले जायेंगे कौवे
जिन पर गिरेगा बरसात का पानी, जिसको सूंघेगी बहती हुई बया
जिसे सड़ा डालेगी धूप.... और एक दिन जमीन पर गिरा देगा पेड़
यहां उगी हुई है एक अजीबोगरीब / अनोखीकसैली फसल....
('पहल' से साभार)

Thursday, 16 October 2014

'यो पिकासो'

तस्वीर में बाईं तरफ पाब्लो पिकासो का सेल्फ़ पोट्रेट है तो दाईं तरफ़ फ्रांसिस बैकन ने ख़ुद को कैनवास पर उतारा हुआ है। इस हफ़्ते लंदन में पिकासो का सेल्फ-पोट्रेट एक प्रदर्शनी में पेश किया जा रहा है। उनके बनाए इस चित्र को अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है। पिकासो ने अपना ये पोर्टेट 1901 में बनाया था जिसका नाम है 'यो पिकासो'।
(बीबीसी हिंदी से साभार)

भूख ने फिर तड़प के एक नथ उतारी है...

जो भी है, बहुत आसान नहीं है, जीवन में, जगत में,
झूठ के दुलराये हुए, भ्रम से बौराये हुए, सिर के फिरे,
पत्तलों के जूठन से पंचतारा पनालों तक......
...और कुछ ऐसा ही सच निहाल सिंह के शब्दों में
'भूख ने फिर तड़प के एक नथ उतारी है...
और वो कह गये, संसद में बहस जारी है...
भूख आँखों से सरक कर पलक पे बैठी है...
सुना रही है माँ चंदा की फिर कहानी है...
भूख चूल्‍हे की सर्दियों में ठिठुरती है मगर
ये बस्तियों के आग सेंकने की बारी है...
भूख से बुझ चुकी आँखों पे रोटियाँ रख दी...
है लग रहा कि फिर चुनाव की तैयारी है...'

Wednesday, 15 October 2014

खुदकुशी

खादी चेहरे, खाकी चेहरे, इस चेहरे में कैसा चेहरा,
सूती चेहरे, ऊनी चेहरे, उस चेहरे में कैसा चेहरा,
खुद को बुनने की, चुनने, झुठलाने की कोशिश, 
उसके चेहरे की आहट से, इसके चेहरे की आहट से
डर लगता है, खुदकुशी...खुदकुशी...खुदकुशी !

वर्षों बाद मैं घर लौटा हूं, देख रहा हूं, ये आंगन कितना छोटा है - जावेद अख्तर के तरकस के तीर

https://www.youtube.com/watch?v=ikd51BsQKeI&list=PLBD412B9E164AD76E&index=6