Friday, 29 August 2014

NDA सरकार के साथ डिफेंस डील कराने के लिए कौन सा पत्रकार कर रहा है कंपनियों से वादा...

http://www.samachar4media.com/which-journalist-is-making-promises-to-eurofighter-to-make-deal.html
अब केंद्र की बीजेपी सरकार पर भी पत्रकारों के सहारे विदेशी कंपनियों से डील करने के आरोप लगने लगे हैं। अभी तो इसका संकेत भर किया गया है। देखते हैं आगे होता है क्या। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का राजनीतिक सचिव रहे पवन खेड़ा ने कुछ ट्वीट कर बताया है कि एक अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार ने एक विदेशी कंपनी यूरोफाइटर से वादा किया है कि वे कई मिलियन के एमएमआरसीए(Medium Multi-Role Combat Aircraft ) सौदा उसके पक्ष में करवा देगा। खेड़ा ने अपने अगले ट्वीट में बताया है कि यह कथित पत्रकार बीजेपी के एक नेता के काफी करीबी है और वह उनके साथ कई बार यात्राएं भी कर चुका है। पवन खेड़ा ने संदेह जताते हुए कहा है कि हो सकता है कि इस कथित पत्रकार की हैसियत केंद्र सरकार के फैसले को प्रभावित करने वाली नहीं हो लेकिन हां बीजेपी में वह अपनी पहुंच के चलते तमाम सूचनाएं पाने की हैसियत जरूर रखता है। खेड़ा ने अपने ट्वीट में कहा है कि यह पत्रकार कई दूसरी कंपनियों के संपर्क में है और सबसे उसके पक्ष में सौदा कराने का वादा कर रहा है। उन्होंने ट्वीट कर बीजेपी पर एक और वार किया है।उन्होंने सवाल पूछते कहा है कि अगर पवन बंसल के भतीजे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है तो पवन बंसल को इस्तीफा देना पड़ जाता है। लेकिन अगर रेलमंत्री सदानंद गौड़ा के बेटे पर रेप जैसा आरोप लगता है तो फिर वह व्यक्तिगत मामला कैसे हो सकता है? खेड़ा का कहना है कि बीजेपी सरकार में इस प्रकार की घटना होने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंक जिस पार्टी का अध्यक्ष अमित शाह जैसे व्यक्ति हों उस पार्टी के लिए तो इस प्रकार की हरकत एक अनिवार्य योग्यता के रूप में आंकी जाएगी।

पत्रकारिता के शून्य से शिखर तक का सफर बताती है 'मीडिया हूं मैं'

http://www.haribhoomi.com/news/12874-book-review-of-jai-prakash-tripathi-media-hoon-main.html#ad-image-0
वरिष्ठ पत्रकार-कवि जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ पत्रकारिता के शून्य से शुरु होकर उसके शिखर तक का सफर तय करती है। इसमें पत्रकारिता के हर पहलू को बड़ी ही बेबाकी से परखा गया है। करीब साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब आप एक बार शुरू करते हैं तो जानकारियों को समेटे, और दिलचस्प लेखन शैली की वजह से यह आपको आखिर तक बांधे रखती है। किताब की शुरुआत भारतीय पत्रकारिता को मिथकीय घटनाओं से जोड़ने की कोशिश से होती है जैसे- नारद पहले पत्रकार थे या महाभारत की घटनाओं में पत्रकारिता तलाशना आदि। यह कहावतें भारतीय पत्रकारिता में लंबे समय से प्रचलित हैं लेकिन इनसे बचा भी जा सकता था।
लेखक दर्ज करते हैं, महाभारत को हिंदू धर्म का बड़ा ग्रंथ माना जाता है। किसी विद्वान ने सुभाष चन्द्र बोस को कर्ण, महात्मा गांधी को कृष्ण, जवाहर लाल नेहरु को अर्जुन और भगत सिंह को एकलव्य का दर्जा दिया था। जयप्रकाश नारायण ने महाभारत पढ़कर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी के स्वीकार का आह्वान किया था। पत्रकारिता के लिए भी विद्वानों ने कहा कि काश पत्रकारिता भी ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ से प्रेरणा लेकर पूंजी के साम्राज्य की कामना न कर रही होती तो आज इसे कोई कॉरपोरेट मीडिया नहीं बल्कि इम्पोर्टेंट मीडिया के रुप में जानती।
यह पुस्तक यही बतलाती है कि मीडिया ने जिस संघर्ष से खुद को स्थापित किया था वह खुद को बरकरार नहीं रख सका और धन और सत्तालोलुपता के चंगुल में फंसकर एक अलग ही रास्ता अख्तियार कर लिया जो इसका कभी था ही नहीं। ‘मीडिया हूं मैं’ पुस्तक में कुल 13 अध्याय है। सभी अध्याय मीडिया को गंभीरता से परिभाषित करते हैं। पहला अध्याय पत्रकारिता के श्वेतपत्र से शुरु होता है। आज के संदर्भ में मीडिया की वास्तविकता क्या है, इसको लेखक ने उधेड़ कर रख दिया है। इस श्वेतपत्र में स्त्रियों का चीरहरण करनेवाले मीडिया के खलनायकों की घिनौनी करतूतें दर्ज हैं। इसमें अस्सी प्रतिशत देशवासियों की दुर्दशा पर चुप चौथे स्तंभ दुश्मनों का ब्यौरा है। यह अध्याय पूरे मीडिया की सच्चाई और अच्छाई का काला चिट्ठा खोलने का काम करती है।
'मीडिया और इतिहास' अध्याय में पत्रकारिता के इतिहास को बारीकियों से बतलाया गया है। किस प्रकार से मिशन पत्रकारिता के रुप में शुरु हुआ यह आंदोलन आज पतन के कगार पर खड़ा है। कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने इसको देश और समाज के उत्थान और भलाई के लिए इस्तेमाल किया लेकिन आज यह निजी और स्वंयभू हो चुका है। समाज और लोक से रिश्ता तोड़ चुका है, पथभ्रष्ट हो चुका है। मीडिया की इस यात्रा को बड़ी ही खूबसूरती से इस पुस्तक में पिरोया गया है।
'मीडिया और अर्थशास्त्र' अध्याय में लेखक बताते हैं कि आज भारत में मनोरंजन चैनल कलर्स अपने प्रमुख रियलिटी शो 'बिग बॉस' की मार्केटिंग पर 10 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करता है। तो सोनी इंटरटेनमेंट टेलीविजन 'इंडियन आयडल' की मार्केटिंग पर 8 करोड़ रुपए। पूरी दुनिया में सूचना संसाधनों पर एकाधिकार जमाए एक वर्ग अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ाता जा रहा है जबकि इसका इस्तेमाल वर्गीय संस्कृतियों की भिन्नता मिटाने में होना चाहिए था। किस प्रकार से पूंजीपतियों ने मीडिया पर अपना वर्चस्व स्थापित किया है। इसमें यह जानने और समझने को मिलता है। मीडिया समाज के प्रति भी दायित्व खोता जा रहा है। खासकर दलितों के प्रति मीडिया पूर्वाग्रह का शिकार है।
राष्ट्रीय कहे जानेवाले मीडिया को दूर-दराज और दलित-आदिवासियों के दुख-दर्द की चिंता ही नहीं है। दलितों के प्रति जो व्यवहार हो रहे हैं, उसके खिलाफ स्वर उठने चाहिए। मुसलमानों के प्रति, अल्पसंख्यकों के प्रति, जो भी कुछ हो रहा है, इसके खिलाफ लामबंद होना चाहिए था। कहने को तो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, प्रहरी और न जाने क्या-क्या उपमाएं दी गई है लेकिन इसकी बनावट जातिवादी तथा दलितविरोधी है। किस प्रकार से उदारीकरण के दौर में सबसे ज्यादा हमला गांवों की अर्थव्यवस्था पर हुआ है, किसान पर हुआ है। किसान आंदोलन भी किसी हिंसक घटना हो जाने के बाद ही खबर बनते हैं। कर्ज से आजिज लाखों किसान आत्महत्याएं कर लेते हैं। कुछ दिन खबरें छापने के बाद मीडिया चुप हो जाता है। किसान अपने हाल पर छोड़ दिये जाते हैं। किसानों के संकट को राष्ट्रीय संकट की तरह लेने के बजाय मीडिया उसे कानून व्यवस्था के अंदाज में रेखांकित करता है। इसके साथ ही गांवों में मीडिया का प्रसार किस रुप में हुआ है। इस पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। बिहार का ‘अप्पन समाचार’, मध्यप्रदेश का ‘डापना गांव’ और झारखंड ‘बाल पत्रकार’ जैसे प्रयास काबिलेतारीफ हैं। इस तरह से मीडिया का समाज और गांव के प्रति दोहरा चरित्र सामने लाने का प्रयास लेखक ने किया है।
वहीं ‘मीडिया और स्त्री’ में भी उन्होंने बताया है कि मीडिया आज भी स्त्री को लेकर वही सोच रखता है जो सौ साल पहले थी। हर संस्थानों से महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न की खबरें आती हैं। कई तो दबा दी जाती हैं। इन सब के बावजूद महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है। निर्भया कांड में इसकी बानगी देखने को मिलती है। साथ ही कई संस्थानों में स्त्री को काफी तरजीह दी जाती है। इन सब के बावजूद स्त्री की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। यह सब मीडिया के दोहरे चरित्र के फलस्वरुप ही है। इस पुस्तक से गुजरने के दौरान के दौरान आपको मीडिया के रुप और चरित्र से दो-चार होने का मौका मिलेगा।
लेखक के मुताबिक, इस पुस्तक में तीन अहम् बिंदुओं पर विशेष फोकस किया गया है। पहला यह कि पत्रकारिता का इतिहास कैसा था और उसे किस प्रकार समृद्ध किया गया। वहीं दूसरा यह है कि वर्तमान में मीडिया का क्या स्वरुप है? इसे दो भागों में विभक्त किया गया है। पहला इसके नकारात्मक पहलू किस रुप में समाज और व्यक्ति के लिए घातक है तो इसके सकारात्मक पहलू बताते हैं कि ये किस तरह रुढ़ि और परंपरा को तोड़ने में सहायक साबित हुए है। वहीं इस पुस्तक का तीसरा बिंदु यह है कि मीडिया का विस्तार और प्रासंगिकता किस रुप में बरकरार रहे। इस ओर लेखक ने ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि न्यू मीडिया पर अधिक जोर दिया जा रहा है। क्योंकि समय बदलने के साथ-साथ मीडिया के प्रारुप में भी बदलाव आना संभव है। इसके अलावा लेखक ने उन सभी मीडिया महारथियों के बारे में विस्तार से बताने का प्रयास किया है जिन्होंने इस क्षेत्र में अपना अतुलनीय योगदान दिया था और जो अभी भी इसमें प्रयत्नरत हैं।
इस प्रकार से जयप्रकाश त्रिपाठी की यह पुस्तक हरेक दृष्टिकोण से खरी उतरती है। यह पुस्तक न सिर्फ मीडिया के छात्रों, शोधार्थियो, मीडियाकर्मी या प्राध्यापकों के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि मीडिया के बाहर की दुनिया के लोगों के लिए भी इसे समझने में सहायक साबित होगी । इससे मीडिया के हर चरित्र और उसके स्वरुप के बारे में जाना जा सकता है। जयप्रकाश त्रिपाठी लंबे समय से इस क्षेत्र में कार्यरत हैं तभी मीडिया के हरेक पहलुओं से वाकिफ हैं। यह पुस्तक उनके पूर्ण कार्य जीवन का निचोड़ है जिससे सुधी पाठक न सिर्फ ज्ञान हासिल कर पाएंगे बल्कि उन्हें मीडिया के तहखानों के राजों की भी जानकारी मिलेगी।
पुस्तक के आखिरी अध्यायों में लेखक ने पत्रकारों के महत्वपूर्ण लेखों को दिया है जो पाठकों के साथ ही नए पत्रकारों की विषयों पर समझ बनाने में मदद करते हैं। उन्होंने मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय पत्रकारों, लेखकों, समीक्षकों के संपर्क सूत्र दिए हैं जो इस क्षेत्र में आने वाले नए लोगों के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। यही नहीं, इन पत्रकारों की वेबसाइट्स और ब्लॉग्स का पता भी दिया गया है, जिसमें इस क्षेत्र की हर अपडेट्स आती रहती हैं। इसके अलावा लेखक के पत्रकारीय सफर की जानकारी, 'मेरे होने का हलफनामा' के नाम से दिया गया है जो थोड़ा सा अखरता है। भारतीय पत्रकारिता ने इतिहास और वर्तमान को समेटते हुए किताब काफी भारी बन पड़ी है और इसकी कीमत भी काफी ज्यादा (पेपरबैक संस्करण- करीब- साढ़े पांच सौ रुपए) है। हालांकि लेखक का कहना है कि वह पत्रकारिता के छात्रों को इसे आधे दाम में मुहैया कराएंगे, और यही इस किताब की सार्थकता भी है। इस किताब के विस्तृत फलक को देखते हुए मीडिया संस्थानों और लाइब्रेरियों में इसे जगह मिलनी चाहिए।

Monday, 25 August 2014

टीवी मीडिया पर ट्राई का पैमाना / वनिता कोहली-खांडेकर

पिछले सप्ताह भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने 'समाचार माध्यमों या मीडिया के मालिकाना हक से जुड़े मसलों' पर कुछ सिफारिशें कीं। उसने जिन मुद्दों पर चर्चा की, उनमें निजी समझौते (प्राइवेट ट्रीटी), पेड न्यूज, निजता, मीडिया संगठनों पर निगमित और राजनीतिक इकाइयों का मालिकाना हक आदि शामिल हैं। नियामक ने इन बातों को बहुलवादी, विविधतापूर्ण, तथ्यात्मक और स्वतंत्र समाचार माध्यम की राह में रोड़ा बताया है। अब ट्राई की सिफारिशों और उन्हें जारी करने के उसके अधिकार पर बहस छिड़ गई है। ट्राई के पास प्रसारण नियमन का अधिकार है और इसने भी स्वीकार किया है कि कई सिफारिशें इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकती हैं।
मुझे लगता है कि न तो ट्राई महत्वपूर्ण है और न ही उसकी सिफारिशों का महत्व है। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक स्वतंत्र निकाय ने कुछ मुद्दे पहचाने हैं और उन्हें सबके सामने रखा है। जिस निकाय ने ऐसा किया है, उसने भारत में केबल के नियमन का काम काफी अच्छी तरह से किया है। हालांकि भारत में समाचार माध्यम उद्योग की दुखद स्थिति देखते हुए ट्राई के सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए। जब तक मीडिया की स्व-नियामक इकाइयां अनैतिक और खराब गतिविधियों में लिप्त समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर सख्ती नहीं करती हैं, तब तक सरकार के पास पहल करने और उनकी मुश्कें कसने का मौका है। सरकार को इसके लिए केवल लोगों के समर्थन की जरूरत है। किसी नरम गठबंधन सरकार के राज में स्व-नियमन की जबानी खानापूरी करना आसान है। लेकिन मीडिया पर नजर रखने वाली, बहुमत की सरकार के राज में इस रिपोर्ट को नजरअंदाज करना खुदकुशी से कम नहीं होगा।
चर्चा का विषय ऐसा ताकतवर उत्पाद है, जिसका कारोबार गैर मुनाफे वाला और दुखदायी होता है। यह मुक्त बाजार में बिना किसी संस्थागत समर्थन और वित्तीय ढांचे के चलता है। परिणामस्वरूप इसमें गलत लोग निवेश करते हैं और कारोबार को भ्रष्टाचार का हिस्सा बना देते हैं। 2003 में पहली बार टीवी मीडिया की बाढ़ आने तक भारत में समाचार माध्यम का बाजार ठहरा हुआ था। 2005 में प्रिंट मीडिया में निवेश नियमों में ढील दी गई। उसके साथ ही निजी निवेशकों की फौज इस पर टूट पड़ी, जो तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्था में खबरों की भूख और उसके साथ आने वाले विज्ञापनों को लेकर पूरे जोश में थी। हालांकि 2012 तक स्पष्टï हो गया कि कुछ न कुछ गलत हो रहा है।
135 न्यूज चैनलों में एक तिहाई की कमान राजनेताओं और रियल्टी कंपनियों के हाथ में है और खबरिया चैनलों का बाजार दु:स्वप्न से कम नहीं है। देश में 60 प्रतिशत से अधिक स्थानीय केबल तंत्र पर भी राजनेताओं का कब्जा है, जो मनमाने ढंग से किसी भी चैनल का प्रसारण बंद कर देते हैं। 2009 के आम चुनावों के बाद पता लगा कि कुछ बड़े अखबारों ने किसी उम्मीदवार के बारे में खबर छापने या नहीं छापने के एवज में मोटी रकम ली। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसमें लिप्त लोगों की सूची भी बना ली थी। चुनाव आयोग के मुताबिक 2014 के आम चुनावों के दौरान पेड न्यूज में खासा इजाफा दिखा।
2012 में मीडिया में कंपनियों ने बड़े निवेश किए। ए वी बिड़ला ने अरुण पुरी के इंडिया टुडे ग्रुप में 27.5 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली। मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाले ट्रस्ट ने नेटवर्क 18 के साथ इनाडु टीवी के विलय के लिए रकम मुहैया कराई। इस साल के आरंभ में अंबानी ने नेटवर्क 18 का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। मई 2012 में सरकार ने ट्राई को मीडिया में नियंत्रण पर नजर रखने को कहा। 2013 में जो पत्र सामने आया उनमें संबंधित पक्षों के विचार शामिल थे।
इस दो साल की प्रक्रिया से कई प्रमुख सिफरिशें सामने आई हैं। पहला है मालिकाना हक और नियंत्रण में स्पष्टï अंतर। ट्राई मानता है कि बिना बहुलांश हिस्सेदारी के भी मीडिया इकाइयों पर नियंत्रण हो सकता है। यह नियंत्रण को विस्तार से परिभाषित करता है और मीडिया की सघनता और सभी प्रकार के मीडिया पर बंदिशें लगाने के लिए वैश्विक स्तर पर मान्य हरफिंडाल हर्शमैन इंडेक्स के इस्तेमाल की सिफारिश करता है। हालांकि इनका क्रियान्वयन आसान नहीं होगा लेकिन तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे बाजार में ऐसा जरूरी है। दूसरी बात किसी न्यूज ब्रांड में शेयरधारिता के ढांचे और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हितों के खुलासे की अनिवार्यता।  तीसरी बात आंतरिक बहुलता से निपटने के लिए पत्र में 2008 का एक सुझाव दोहराया गया है कि राजनीतिक, सरकारी या धार्मिक इकाइयों या इनसे जुड़े लोगों को बाहर करना चाहिए।
चौथी बात यह कि पीसीआई संपादकीय मंडल में निजी समझौते या पेड न्यूज या विज्ञापन से जुड़े किसी हस्तक्षेप की मजम्मत की गई है। पांचवीं सिफारिश मीडिया को कंपनियों के नियंत्रण से मुक्त रखने की है। छठी बात, दूरदर्शन को स्वायत्त बनाया जाए ताकि यह मजबूत, स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से प्रसारण कर सके। सातवीं बात प्रिंट और टीवी के लिए मीडिया नियामक की स्थापना है। हालांकि इसमें कई खामियां हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे के आंकड़ों के आधार पर यह इंटरनेट को खारिज करता है। लेकिन ट्राई की वेबसाइट पर मार्च 2014 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 32.5 करोड़ भारतीय ऑनलाइन थे, जो प्रिंट की पाठक संख्या के लगभग बराबर है। इंटरनेट को इस रिपोर्ट के बाहर नहीं रखा जा सकता है।
एक दूसरी खामी यह है कि पेपर में किसी तरह की आर्थिक समझ नहीं दशाई गई है क्योंकि एक अच्छी गुणवत्ता वाला समाचार लाने लाने में काफी रकम लगती है। विज्ञापनदाता पूरी रकम मुहैया नहीं कर सकते और लोग भी अपनी जेब से भुगतान करने की स्थिति में नहीं होते। इस स्थिति में वैश्विक समाचार कंपनियां भी फंस जाती हैं और इनमें से कई ने भरपाई के लिए पेड न्यूज या निजी समझौते  का सहारा नहीं लिया है। नैतिक स्तर पर यह हमारे उद्योग के लिए हार की स्थिति है। पेपर मीडिया मालिकों, संपादकों और हर संबंधित व्यक्ति को सरकार या ट्राई से उलझने के बजाय समाधान खोजने के लिए कहता है। ऐसा न करना देश के लोगों के साथ छलावा और पेे्रस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होगा।
(साभार : बिजनेस स्टैंडर्ड)

Sunday, 24 August 2014

ये खून बेकार नहीं जायेगा/अन्तरा घोष

जुलाई से इज़रायल ने गाज़ा पट्टी के निहत्थे नागरिकों, बच्चों, औरतों पर फिर से हमला बोल दिया है। यह पिछले छह वर्षों में गाज़ा पर इज़रायल का तीसरा बड़ा हमला है। यह टिप्पणी लिखे जाने तक गाज़ा में लगभग साढ़े पाँच सौ लोग मारे जा चुके हैं। इनमें से अधिकांश महिलाएँ, बच्चे और बूढ़े हैं। इज़रायल ने अपने तीन किशोरों के अपहरण और हत्या को गाज़ा पर हमले का कारण बताया था, जो कि ट्रेकिंग पर गये थे और लापता हो गये थे। बाद में उनकी लाशें बरामद हुई थीं। लेकिन गाज़ा पट्टी पर शासन कर रहे फिलिस्तीनी संगठन हमास ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली और अभी तक इसका कोई स्पष्ट प्रमाण भी नहीं है कि ये हत्याएँ हमास द्वारा की गयी हैं। लेकिन इसके बावजूद प्रमाणों की अवहेलना करते हुए इज़रायल ने 8 जुलाई को गाज़ा पट्टी पर भयंकर गोलाबारी और हवाई बमवर्षा शुरू कर दी। इस हमले में इज़रायल सफेद फास्फोरस का और साथ ही Shrinking-Palestineतमाम नये प्रयोगात्मक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। ग़ौरतलब है कि 2004 में इज़रायल ने गाज़ा पट्टी से अपनी सेना और नागरिकों को हटा लिया था। बाद में, गाज़ा में फतह और हमास के बीच नियन्त्रण को लेकर संघर्ष हुआ जिसमें अन्ततः हमास ने विजय हासिल की। गाज़ा पट्टी के चुनावों में भी हमास को भारी समर्थन मिला और हमास ने जनवादी तरीके से चुनी हुई सरकार का गठन किया। इसके बाद से ही इज़रायल गाज़ा पट्टी पर हमले करता रहा है। 2006, 2008-09, 2012 और अब 2014। इज़रायल यह दलील देता रहा है कि गाज़ा पट्टी पर उसके हमलों का कारण हमास की आतंकवादी गतिविधियाँ हैं, जिसका निशाना इज़रायल है; इज़रायल के हुक्मरान गाज़ा पट्टी से किये जाने वाले रॉकेट हमलों और टनलों द्वारा की जाने वाली घुसपैठों को अपने बर्बर हमलों का कारण बताया है। लेकिन अगर यही कारण है तो फिलिस्तीनियों के दूसरे इलाके वेस्ट बैंक में इज़रायल के अत्याचारों का क्या कारण है? वहाँ से तो कोई रॉकेट नहीं दागे जाते? न ही वहाँ से कोई अन्य आक्रामक इज़रायल-विरोधी गतिविधियाँ चलती हैं? फिर वेस्ट बैंक के फिलिस्तीनी नागरिकों का अपहरण, हत्याएँ, उनका उत्पीड़न क्यों किया जाता है? उनकी ज़मीनें इज़रायल क्यों छीन रहा है? उन्हें विस्थापित करके इज़रायल अपनी यहूदी बस्तियाँ वहाँ क्यों बसा रहा है? वहाँ तो फिलिस्तीनी प्राधिकार और फतह का बोलबाला है? वहाँ तो हमास का शासन नहीं है?
वास्तव में, इज़रायल का असली मक़सद हमास का सफ़ाया करना नहीं है। इज़रायल भी जानता है कि ऐसे हमलों से न तो वह हमास को ख़त्म कर पाया है और न ही ख़त्म कर पायेगा। सच्चाई तो यह है कि 2004 से ऐसे हरेक हमले ने हमास को और अधिक ताक़तवर और लोकप्रिय बनाया है। इस हमले में भी इज़रायली हमास को कोई विशेष नुकसान नहीं पहुँचा पाये हैं और उनकी अन्धाधुन्ध गोलाबारी का निशाना गाज़ा के निर्दोष बच्चे, औरतें और अन्य नागरिक बने हैं। 18 जुलाई को इज़रायल ने जब ज़मीनी हमला शुरू किया तो उसके एक दिन बाद ही हमास ने इज़रायल के 13 सैनिकों को मार गिराया और एक को गिरफ्तार कर लिया। अब तक 19 इज़रायली भी मारे जा चुके हैं। इज़रायल की उस टुकड़ी के सैनिक ने बताया, “हमारे सामने कोई आदिम सेना नहीं थी। वे लोग बेहद उन्नत हथियारों से लैस थे, बहुत अच्छी तरह से प्रशिक्षित थे; वे भाग नहीं रहे थे। वे तो बस हमारा इन्तज़ार कर रहे थे।” इज़रायल और अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी कभी इतिहास से सबक नहीं लेते हैं। वे लेबनॉन द्वारा मारकर भगाया जाना भूल चुके हैं और उसके पहले 2004 और 2006 में फिलिस्तीनी प्रतिरोध द्वारा नाकों चने चबवाया जाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि हर ऐसे हमले फिलिस्तीनी जनता का भारी कत्लेआम होता है। लेकिन फिलिस्तीनी जनता का इज़रायली कब्ज़े के विरुद्ध प्रतिरोध युद्ध इससे ख़त्म नहीं हो रहा बल्कि और मज़बूत हो रहा है और बढ़ रहा है। इज़रायली हमले के बाद से ही गाज़ा की मस्जिदें रोज़ घोषणा कर रही थीं, “हिम्मत मत हारो! धैर्य रखो! विजय आयेगी!” 18 जुलाई को इज़रायली सेना के 13 सैनिकों को मारकर और 1 सैनिक को गिरफ्तार करके हमास ने बता दिया कि वह किस ओर इशारा कर रहा था।
इज़रायल बार-बार कहता है कि वह आत्मरक्षा में यह हमले कर रहा है और उसे अस्तित्वमान रहने का हक़ है। वास्तव में, 1947 से ही जिस कौम के अस्तित्वमान रहने के हक़ पर लगातार हमला किया गया है, वे फिलिस्तीनी हैं। संयुक्त राष्ट्र ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यहूदियों को “राज्य से वंचित राष्ट्र” बताते हुए उनकी प्राचीन ज़मीन पर उनके लिए एक राज्य निर्माण की योजना बनायी। इस योजना पर अमल करते हुए 1947-48 में यूरोप व दुनिया के अन्य हिस्सों में यहूदी-विरोध से प्रताड़ित भारी यहूदी आबादी को तत्कालीन फिलिस्तीन की ज़मीन पर बसाया गया। इज़रायल की जो योजना बनायी गयी थी, धीरे-धीरे उस योजना से परे ज़ि‍यनवादियों ने फिलिस्तीनी अरब नागरिकों से ज़मीनें छीननी शुरू कीं, ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवाद की मदद से लगातार फिलिस्तीनियों को विस्थापित किया और धीरे-धीरे फिलिस्तीनियों को गाज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक के इलाके में सीमित करते गये। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक पश्चिमी एशिया के अधिकांश तेल क्षेत्र और प्राकृतिक गैस क्षेत्र मिल चुके थे। पश्चिमी साम्राज्यवादियों को पश्चिमी एशिया में अपनी एक चेक पोस्ट और अपना एक लठैत चाहिए था। इस मंसूबे के साथ पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने फिलिस्तीनी ज़मीन पर बसाये गये यहूदियों के बीच पनप रहे धुर दक्षिणपंथी ज़ि‍यनवादी गुटों को हथियार, पैसे और प्रशिक्षण देना शुरू किया। इन ज़ि‍यनवादियों ने 1950-60 के दशकों से ही तमाम जगहों पर फिलिस्तीनी अरब लोगों के गाँवों के गाँवों का नरसंहार, उन्हें उजाड़ना और उनके साथ भेदभाव की नीति पर अमल करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही फिलिस्तीनी जनता का भी अपने राज्य के अधिकार के लिए संघर्ष भी शुरू हुआ। इस संघर्ष में पूरे अरब की जनता की भावना उजाड़े जा रहे फिलिस्तीनियों के साथ थी। दो बड़े और कुछ छोटे इज़रायल-अरब युद्ध भी हुए, जिसमें कि अमेरिकी और अन्य साम्राज्यवादी सहायता के बूते और अरब देशों के आपसी अन्तरविरोधों और कमज़ोर सैन्य तैयारी के कारण इज़रायल को ही विजय मिली। लेकिन इस बीच फिलिस्तीनियों के प्रतिरोध युद्ध की वजह से इज़रायलियों को भी कई बार अच्छा-ख़ासा नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन 1947 से लेकर 2014 के पूरे इतिहास पर निगाह दौड़ाएँ तो यह इज़रायली ज़ि‍यनवादियों द्वारा फिलिस्तीन देश को ख़त्म करने की प्रक्रिया को दिखलाता है। इसी प्रक्रिया के ख़िलाफ़ फिलिस्तीनी लगातार लड़ रहे हैं और इसे कामयाब नहीं होने दे रहे हैं।
इज़रायल आज फिलिस्तीनी जनता के साथ वही सुलूक कर रहा है जो एक समय में नात्सियों ने यहूदियों के ख़िलाफ़ किया था। वास्तव में, एक प्रसिद्ध ज़ि‍यनवादी सैन्य कमाण्डर ने एक बार कहा भी था, “हिटलर चाहे हमारे साथ कितना भी बुरा क्यों न रहा हो, उसने दिखलाया है कि नरसंहार, नस्ली सफ़ाये और विस्थापन के ज़रिये क्या-कुछ हासिल किया जा सकता है।” आज के दौर में इज़रायली संसद नेसेट की एक महिला सांसद कहती है कि सारी फिलिस्तीनी माँओं की हत्या कर दी जानी चाहिए जो कि सपोलों को जन्म देती हैं। एक दूसरा सैन्य अधिकारी कहता है कि गाज़ा और वेस्ट बैंक से सारे अरब लोगों को खदेड़ दिया जाना चाहिए या उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए और वहाँ यहूदियेां को बसा दिया जाना चाहिए। आज गाज़ा पट्टी के पास न तो कोई रक्षा तन्त्र है, न हवाई सेना है, न नौसेना है और न ही कोई स्थायी सेना है। उसे चारों ओर से घेरा हुआ है, मिस्र ने राफा क्रासिंग को सील कर रखा है, इज़रायल ने उसके हवाई क्षेत्र और समुद्री तट को बन्द कर रखा है और उस पर अपना कब्ज़ा जमाये हुए है। गाज़ा पट्टी को तमाम प्रेक्षकों ने दुनिया की सबसे बड़ी ‘ओपेन एयर’ जेल करार दिया है, जो कि बिल्कुल सही है। चारों तरफ़ से घिरे हुए गाज़ा पट्टी के नागरिकों, बच्चों और औरतों पर इज़रायल लगातार बम बरसाता है, उनका अपहरण करता है, उन्हें यातना देता है। हज़ारों निर्दोष फिलिस्तीनी इज़रायल की जेलों में बन्द हैं, बिना किसी मुकदमे या सुनवाई के। कुछ वर्ष पहले अपने एक गिरफ्तार सैनिक को छुड़ाने के लिए इज़रायल ने हज़ार फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा किया था। लेकिन उस समझौते का कुछ समय पहले उल्लंघन करते हुए तमाम फिलिस्तीनियों को फिर से गिरफ्तार कर लिया। साथ ही, गाज़ा पट्टी का ब्लॉकेड कर इज़रायल योजनाबद्ध तरीके से गाज़ा के नागरिकों को उनकी बुनियादी ज़रूरत से महरूम कर रहा है। गाज़ा पट्टी की बिजली और पानी तक इज़रायल बन्द या बाधित करता रहा है, बाहर से कोई मानवीय सहायता नहीं आने देता और बार-बार गाज़ा पट्टी में घुसकर अपहरण और कत्ल करता है। इसके बाद, जब गाज़ा पट्टी के फिलिस्तीनी अपने इंसानी जीवन के हक़ के लिए प्रतिरोध करते हैं और इज़रायल के अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा दिये गये अत्याधुनिक हथियारों के जवाब में रॉकेट हमले करते हैं, तो इज़रायल उसे अपने वजूद पर हमला करार देकर गाज़ा पट्टी में नरसंहार को अंजाम देता है। इज़रायल के पास जो तकनोलॉजी है उससे वह नागरिकों की मृत्यु को रोक सकता है। लेकिन इसके बावजूद वह ऐसा नहीं करता और निर्दोषों का कत्ले-आम करता है, क्योंकि उसका असली मक़सद है, गाज़ा पट्टी पर भी यहूदी बस्तियाँ बसाना, वहाँ के फिलिस्तीनियों को मार देना, विस्थापित कर देना या फिर उन्हें उसी तरह से दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर, गुलाम बनाकर रखना जैसे कि हिटलर ने यहूदियों को बना कर रखा था। वास्तव में, इज़रायल दो देशों वाले समाधान को अपनाना ही नहीं चाहता है। वह फिलिस्तीनी अरब लोगों को वहाँ से पूरी तरह विस्थापित करके प्राचीन दैवीय यहूदी राज्य इज़रायल के अपने कट्टरपंथी ज़ि‍यनवादी सपने को साकार करना चाहता है। ये फिलिस्तीनी लोग हैं जो कि आत्मरक्षा के लिए लड़ रहे हैं, इज़रायल नहीं! ये फिलिस्तीनी लोग हैं जिनसे उनकी ज़िन्दगियाँ, ज़मीनें और देश छीना जा रहा है, इज़रायल नहीं!
इज़रायल बार-बार होलोकॉस्ट का हवाला देता है और अपने पीड़ित होने की बात करता है। इज़रायल बार-बार अपनी आत्मरक्षा और अस्तित्वमान रहने के हक़ की बात करता है। लेकिन जैसा कि नोम चॉम्स्की ने कहा है, इज़रायल वही आत्मरक्षा कर रहा है जो किसी भी औपनिवेशिक कब्ज़ा करने वाली ताक़त को प्रतिरोध कर रही जनता के सामने करनी पड़ती है। फिलिस्तीनी जनता को अपने देश, अपनी ज़मीन, अपनी ज़िन्दगी का हक़ है और अगर यह हक़ उससे छीना जाता है, तो उसे प्रतिरोध करने और संघर्ष करने का पूरा हक़ है। इस पूरी लड़ाई में तमाम अरब देशों के शासक चुप हैं, या दोनों पक्षों से शान्ति की मानवतावादी अपीलें कर रहे हैं। मिस्र के शासकों ने स्पष्टतः इज़रायल का पक्ष लिया है और गाज़ा पट्टी की सीमा को खोलने से यह कहकर इंकार कर दिया है कि यह “आतंकवादी” हमास के लिए प्रोत्साहन होगा! सऊदी अरब, कतर से लेकर इराक़ के आईएसआईएस के विद्रोही तक फिलिस्तीन के मसले पर चुप हैं, इज़रायल के हमले पर चुप हैं या फिर रस्म-अदायगी के लिए कोई बयान दे रहे हैं। लेकिन इन देशों की जनता के भीतर अपने शासक वर्ग की नपुंसकता को लेकर ज़बर्दस्त विद्रोह की भावना है। पूरी अरब जनता फिलिस्तीनियों के साथ खड़ी और उनकी हमदर्द है। कुछ वर्ष पहले जब अरब जनउभार ने कई अरब देशों में सत्ता परिवर्तन किया था, तो उन देशों में बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी और महँगाई के अतिरिक्त एक बहुत बड़ा मसला इन देशों के शासकों द्वारा इज़रायली ज़ि‍यनवादियों और अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने घुटना टेकना और फिलिस्तीनी जनता को अकेला छोड़ देना व उनका साथ न देना भी था। इस हमले में इज़रायल गाज़ा पट्टी पर कब्जे़ के अपने मंसूबे में कामयाब नहीं होने वाला है, यह सभी जानते हैं। हम यह भी जानते हैं कि इज़रायल अपने तमाम हरबे-हथियारों के बावजूद हमास के हाथों पिटने वाला है और उसी तरीके से गाज़ा से भागने वाला है, जिस तरह से वह लेबनॉन में हिज़बुल्ला के हाथों पिटकर भागा था। लेकिन इज़रायल को अपने इस कायराना और बर्बर हमले और मानवता के विरुद्ध किये जा रहे अपराधों के लिए यह तात्कालिक कीमत ही नहीं चुकानी होगी। हर ऐसा इज़रायली हमला फिलिस्तीनियों को कई अन्य अरब देशों में विस्थापित कर देता है, जो कि इन सभी अरब देशों में बारूद की तरह इकट्ठा हो रहे हैं। इस विस्थापन के कारण तमाम अरब देशों की आम जनता और भी मज़बूती के साथ फिलिस्तीनी जनता के साथ जुड़ रही है और अपने शासक वर्ग के ख़िलाफ़ खड़ी हो रही है। समूचे अरब में अमेरिका और इज़रायल के ख़िलाफ़ जो नफ़रत भरी है, वह आने वाले समय में फूटेगी और इन देशों में सत्ता परिवर्तन की ओर ले जायेगी। लेकिन यह भी सच है कि जब तक सच्ची जनवादी और प्रगतिशील क्रान्तिकारी ताक़तें एक नये अरब जनउभार के नेतृत्व में नहीं होंगी, तब तक इस बात कोई गारण्टी नहीं होगी कि नयी अरब सत्ताएँ अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ि‍यनवाद के विरुद्ध खड़ी होंगी। फिर भी, दो बातें स्पष्ट हैं। एक यह कि ऐसी क्रान्तिकारी ताक़तों के खड़े होने की प्रक्रिया साम्राज्यवाद और ज़ि‍यनवाद के हर आक्रमण के साथ बढ़ेंगी, क्योंकि अरब जनता भी देख रही है कि इस्लामिक कट्टरपंथी ताक़तें palestineनिरन्तरतापूर्ण तरीके से अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ि‍यनवाद का विरोध नहीं कर रही हैं। तमाम वर्तमान उदाहरण मौजूद हैं जिसमें कि धार्मिक कट्टरपंथी ताक़तें साम्राज्यवादियों और ज़ि‍यनवादियों के साथ समझौते और सौदे कर रही हैं। ऐसे में, जनता के बीच नये क्रान्तिकारी विकल्पों के खड़े होने की सम्भावनाएँ पैदा हो सकती हैं, क्योंकि अरब जनता ने साम्राज्यवाद और ज़ि‍यनवाद के धार्मिक कट्टरपंथी विरोध की सीमा और असलियत देख ली है। दूसरी बात यह है कि पश्चिमी साम्राज्यवाद कोई नया अरब जनउभार नहीं चाहती हैं क्योंकि इससे अमेरिका और इज़रायल के सारे समीकरण पश्चिमी एशिया में गड़बड़ा सकते हैं। इसलिए मौजूदा हमले में भी अमेरिका की साँस हलक में अटकी हुई है और जिस दिन 13 इज़रायली सैनिक मारे गये उसी दिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जॉन केरी एक टीवी साक्षात्कार में ब्रेक के वक़्त ग़लती से माइक्रोफोन पर इज़रायली हमले के प्रति असन्तोष दिखाते हुए पाये गये। अमेरिकी साम्राज्यवादी समझ रहे हैं कि इज़रायल ने किस बारूद की ढेरी पर पाँव रख दिया है। पूरी दुनिया में इज़रायल के विरुद्ध हिंस्र प्रदर्शन हो रहे हैं। टर्की में इज़रायली दूतावास और कांसुलेट पर हमले किये गये और दूतावास पर कब्ज़ा करके फिलिस्तीनी झण्डा लहराया गया। टर्की के शासक एर्दोगान के लिए भी ऐसी मुश्किल खड़ी हो गयी कि उसने इज़रायल के विरुद्ध बयान दिया। विश्व भर में इज़रायली राजनयिक घबराये हुए हैं कि कब उन पर हमला होता है।
जो भी हो यह स्पष्ट है कि फिलिस्तीन का प्रश्न अरब विश्व के दिल के केन्द्र में है। फिलिस्तीनी जनता के विरुद्ध आज कायर इज़रायल जो अपराध कर रहा है, वह पूरे अरब विश्व में साम्राज्यवाद और ज़ि‍यनवाद के लिए आत्मघाती साबित होगा। इज़रायल के कायराना हमलों से गाज़ा के फिलिस्तीनी पहले भी डटकर लड़े हैं और अभी भी डटकर लड़ रहे हैं। मौत और दुख उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है और वे डरते नहीं हैं। जैसा कि एक फिलिस्तीनी कवि ने कहा है, “फिलिस्तीनी होने का मतलब है, एक कभी न ठीक हो सकने वाली बीमारी का मरीज़ होना और उस बीमारी का नाम है उम्मीद!” फिलिस्तीनी जनता के प्रतिरोध संघर्ष ने 18 जुलाई से इज़रायलियों को अपनी भयंकर भूल का अहसास कराना शुरू कर दिया है। 20 जुलाई को 13 इज़रायली सैनिकों को मारे जाने और एक के कैद किये जाने के साथ यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हवा से बम बरसाकर और मिसाइलें दागकर इज़रायल जो कर सकता था, उसने किया। लेकिन ज़मीन पर फिलिस्तीनियों का मुकाबला करना कायर ज़ि‍यनवादियों के बूते के बाहर है और आने वाले कुछ दिनों में यह साबित भी हो जायेगा। और कुछ दूर भविष्य में समूची इज़रायली जनता को अपने योजनाबद्ध फासीवादीकरण की ज़ि‍यनवादियों को इजाज़त देने की भी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। साथ ही, अरब शासकों को अपनी नपुंसकता और साम्राज्यवाद के समक्ष घुटने टेकने के लिए भी निकट भविष्य में ही भारी कीमत चुकानी होगी। फिलिस्तीन मरेगा नहीं! फिलिस्तीनी जनता मरेगी नहीं! अन्त होगा इज़रायली ज़ि‍यनवाद का और अमेरिकी साम्राज्यवाद का! अरब की धरती पर उनकी कब्र खुदने की तैयारी चल रही है।
('आह्वान' से साभार)

जागो मृतात्माओ! / कात्यायनी

जागो मृतात्माओ! बर्बर कभी भी तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दे सकते हैं।
कायरो! सावधान!! भागकर अपने घर पहुँचो और देखो
तुम्हारी बेटी कॉलेज से लौट तो आयी है सलामत, बीवी घर में महफूज़ तो है।
बहन के घर फ़ोन लगाकर उसकी भी खोज-ख़बर ले लो!
कहीं कोई औरत कम तो नहीं हो गयी है तुम्हारे घर और कुनबे की?
मोहनलालगंज, लखनऊ के निर्जन स्कूल में जिस युवती को
शिकारियों ने निर्वस्त्र दौड़ा-दौड़ाकर मारा 17 जुलाई को,
उसके जिस्म को तार-तार किया और वह जूझती रही, जूझती रही, जूझती रही—
—अकेले, अन्तिम साँस तक और मदद को आवाज़ भी देती रही
पर कोई नहीं आया मुर्दों की उस बस्ती से जो दो सौ मीटर की दूरी पर थी।
उस स्त्री के क्षत-विक्षत निर्वस्त्र शव की शिनाख़्त नहीं हो सकी है।
पर कायरो! निश्चिन्त होकर बैठो और पालथी मारकर चाय-पकौड़ी खाओ
क्योंकि तुम्हारे घरों की स्त्रियाँ सलामत हैं, कुछ किस्से गढ़ो, कुछ कल्पना करो, बेशर्मो !
कल दफ्तर में इस घटना को एकदम नये ढंग से पेश करने के लिए।
बर्बर हमेशा कायरों के बीच रहते हैं, हर कायर के भीतर अक्सर एक बर्बर छिपा बैठा होता है।
चुप्पी भी उतनी ही बेरहम होती है
जितनी गोद-गोदकर, जिस्म में तलवार या रॉड भोंककर की जाने वाली हत्या।
हत्या और बलात्कार के दर्शक, स्त्री आखेट के तमाशाई
दुनिया के सबसे रुग्ण मानस लोगों में से एक होते हैं।
16 दिसम्बर 2012 को चुप रहे
उन्हें 17 जुलाई 2014 का इन्तज़ार था और इसके बीच के काले अँधेरे दिनों में भी
ऐसा ही बहुत कुछ घटता रहा।
कह दो मुलायम सिंह कि ‘लड़कों से तो ग़लती हो ही जाती है, इस बार कुछ बड़ी ग़लती हो गयी।’
धर्मध्वजाधारी कूपमण्डूको, भाजपाई फासिस्टो, विहिप, श्रीराम सेने के गुण्डो, नागपुर के हाफ़पैण्टियो,
डाँटो-फटकारो औरतों को दौड़ाओ डण्डे लेकर कि क्यों वे इतनी आज़ादी दिखलाती हैं सड़कों पर
कि मर्द जात को मजबूर हो जाना पड़ता है जंगली कुत्ता और भेड़िया बन जाने के लिए।
मुल्लाओ! कुछ और फ़तवे जारी करो औरतों को बाड़े में बन्द करने के लिए,
शरिया क़ानून लागू कर दो, “नये ख़लीफ़ा” अल बगदादी का फ़रमान भी ले आओ,
जल्दी करो, नहीं तो हर औरत लल द्यद बन जायेगी या तस्लीमा नसरीन की मुरीद हो जायेगी।
बहुत सारी औरतें बिगड़ चुकी हैं इन्हें संगसार करना है, चमड़ी उधेड़ देनी है इनकी,
ज़िन्दा दफ़न कर देना है त्रिशूल, तलवार, नैजे, खंजर तेज़ कर लो,
कोड़े उठा लो, बागों में पेड़ों की डालियों से फाँसी के फँदे लटका दो,
तुम्हारी कामाग्नि और प्रतिशोध को एक साथ भड़काती
कितनी सारी, कितनी सारी, मगरूर, बेशर्म औरतें
सड़कों पर निकल आयी हैं बेपर्दा, बदनदिखाऊ कपड़े पहने,
हँसती-खिलखिलाती, नज़रें मिलाकर बात करती,
अपनी ख़्वाहिशें बयान करती!
तुम्हें इस सभ्यता को बचाना है
तमाम बेशर्म-बेग़ैरत-आज़ादख़्याल औरतों को सबक़ सिखाना है।
हर 16 दिसम्बर, हर 17 जुलाई
देवताओं का कोप है
ख़ुदा का कहर है
बर्बर बलात्कारी हत्यारे हैं देवदूत
जो आज़ाद होने का पाप कर रही औरतों को
सज़ाएँ दे रहे हैं इसी धरती पर
और नर्क से भी भयंकर यन्त्रणा के नये-नये तरीके आज़माकर
देवताओं को ख़ुश कर रहे हैं।

बहनो! साथियो!!
डरना और दुबकना नहीं है किसी भी बर्बरता के आगे।
बकने दो मुलायम सिंह, बाबूलाल गौर और तमाम ऐसे
मानवद्रोहियों को, जो उसी पूँजी की सत्ता के
राजनीतिक चाकर हैं, जिसकी रुग्ण-बीमार संस्कृति
के बजबजाते गटर में बसते हैं वे सूअर
जो स्त्री को मात्र एक शरीर के रूप में देखते हैं।
इसी पूँजी के सामाजिक भीटों बाँबियों-झाड़ियों में
वे भेड़िये और लकड़बग्घे पलते हैं
जो पहले रात को, लेकिन अब दिन-दहाड़े
हमें अपना शिकार बनाते हैं।
क़ानून-व्यवस्था को चाक-चौबन्द करने से भला क्या होगा
जब खाकी वर्दी में भी भेड़िये घूमते हों
और लकड़बग्घे तरह-तरह की टोपियाँ पहनकर
संसद में बैठे हों?
मोमबत्तियाँ जलाने और सोग मनाने से भी कुछ नहीं होगा।
अपने हृदय की गहराइयों में धधकती आग को
ज्वालामुखी के लावे की तरह सड़कों पर बहने देना होगा।
निर्बन्ध कर देना होगा विद्रोह के प्रबल वेगवाही ज्वार को।
मुट्ठियाँ ताने एक साथ, हथौड़े और मूसल लिए हाथों में निकलना होगा
16 दिसम्बर और 17 जुलाई के ख़ून जिन जबड़ों पर दीखें,
उन पर सड़क पर ही फैसला सुनाकर
सड़क पर ही उसे तामील कर देना होगा।

बहनो! साथियो!!
मुट्ठियाँ तानकर अपनी आज़ादी और अधिकारों का
घोषणापत्र एक बार फिर जारी करो,
धर्मध्वजाधारी प्रेतों और पूँजी के पाण्डुर पिशाचों के खि़लाफ़।
मृत परम्पराओं की सड़ी-गली बास मारती लाशों के
अन्तिम संस्कार की घोषणा कर दो।
चुनौती दो ताकि बौखलाये बर्बर बाहर आयें खुले में।
जो शिकार करते थे, उनका शिकार करना होगा।

बहनो! साथियो!!
बस्तियों-मोहल्लों में चौकसी दस्ते बनाओ!
धावा मारो नशे और अपराध के अड्डों पर!
घेर लो स्त्री-विरोधी बकवास करने वाले नेताओं-धर्मगुरुओं को सड़कों पर
अपराधियों को लोक पंचायत बुलाकर दण्डित करो!
अगर तुम्हे बर्बर मर्दवाद का शिकार होने से बचना है
और बचाना है अपनी बच्चियों को
तो यही एक राह है, और कुछ नहीं, कोई भी नहीं।

बहनो! साथियो!!
सभी मर्द नहीं हैं मर्दवादी।
जिनके पास वास्तव में सपना है समतामूलक समाज का
वे स्त्रियों को मानते हैं बराबर का साथी,
जीवन और युद्ध में।
वे हमारे साथ होंगे हमारी बग़ावत में, यकीन करो!
श्रम-आखेटक समाज ही स्त्री आखेट का खेल रचता है।
हमारी मुक्ति की लड़ाई है उस पूँजीवादी बर्बरता से
मुक्ति की लड़ाई की ही कड़ी,
जो निचुड़ी हुई हड्डियों की बुनियाद पर खड़ा है।
इसलिए बहनो! साथियो!!
कड़ी से कड़ी जोड़ो! मुट्ठियों से मुट्ठियाँ!
सपनों से सपने! संकल्पों से संकल्प!
दस्तों से दस्ते!
और आगे बढ़ो बर्बरों के अड्डों की ओर!

'बेरोजगार की आखिरी रात'

'बेरोजगार की आखिरी रात' पुस्तक का जुलाई माह में अमेरिका के प्रतिष्ठित आथर हाउस में प्रकाशन हुआ है। यह किताब ई-बुक के रूप में अमेजॉन.इन पर उपलब्ध है। इसके लेखक दविंद्र सिंह गुलेरिया लगभग आठ साल तक अमर उजाला में रहे हैं। उन्होंने दिसंबर 2013 में चंडीगढ़ से अमर उजाला से इस्तीफा दिया था। उस समय वह पंजाब संस्करण के प्रभारी थे। कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश के रहने वाले गुलेरिया सात साल से अधिक समय तक अमर उजाला हिमाचल डेस्क के प्रभारी रहे। करीब दो माह तक वह हिमाचल अमर उजाला के संपादकीय विभाग के प्रभारी भी रहे। चूंकि वह ईमानदार आदमी हैं, चापलूसी न तो करते हैं और न ही करवाते हैं, बस काम से मतलब रखते हैं। उदय कुमार ने उनको अमर उजाला में बहुत परेशान किया।
उदय कुमार द्वारा गलत तबादले करने के कारण शिमला डेस्क पर चार पद एक साल से अधिक समय तक खाली रहे थे। गुलेरिया शिमला में अमर उजाला हिमाचल डेस्क के प्रभारी थे तो उन्होंने कई बार खाली पदों को लेकर अवगत करवाया, पर पद नहीं भरे गए। हर दिन तीन या चार एडिशन बिना सब एडिटर के होते थे। गुलेरिया ने जैसे-तैसे एक साल से अधिक समय तक काम चलाया। उन्होंने साल में लगभग 25 साप्ताहिक अवकाश लगाए, जिसका उन्हें कुछ नहीं मिला। इसका इनाम उन्हें
अप्रैल 2013 में चंडीगढ़ ट्रांसफर के रूप में मिला था। गुलेरिया की जगह उदय कुमार ने शिमला में अपना आदमी बैठाया था। साथ में डेस्क पर खाली पड़े सारे पद एकदम से भर दिए थे ताकि उनका आदमी डेस्क पर फेल न हो जाए।
जो काम गुलेरिया अकेले देखते थे, उसको देखने के लिए दो आदमी लगा दिए थे। पर फिर भी वे काम ढंग से नहीं कर पाते थे। यहां तक कि डेस्क के लोग भी इससे बहुत दुखी थे। उदय कुमार की इस टुच्ची राजनीति के कारण गुलेरिया ने अमर उजाला छोड़कर हमीरपुर से प्रकाशित हो रहे डीएनएस ज्वाइन कर लिया था। दविंद्र सिंह गुलेरिया छात्र समय से ही लिखते रहे हैं। उन्होंने पहली किताब 17 साल की आयु में लिखी थी। इसे प्रकाशित करने के लिए हिमाचल भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी शिमला ने अप्रैल, 1995 में दो हजार रुपए स्वीकृत किए थे। गुलेरिया को आज भी इस बात की टीस है कि उनके साथ इस तरह से अन्याय किया गया। पर उन्हें खुशी है कि अमेरिका के प्रकाशन हाउस ने उनकी किताब छापकर विरोधियों को इसका करारा जवाब दिया है। (भड़ास4मीडिया से साभार)

Saturday, 23 August 2014

लूट इंडिया लूट / शशिकांत सिंह शशि

दोस्तों! 'लूट इंडिया लूट', रियलिटी शो के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। आज तक हम टीवी पर केवल मनोरंजन प्रधान कार्यक्रम ही देखते थे। ज्ञान प्रधान प्रोग्राम नहीं। प्रश्नोत्तरी पर आधारित एक दो टुच्चे प्रोग्रामों को ज्ञान प्रधान नहीं कहा जा सकता। ज्ञान वह जो व्यावहारिक जीवन में हमारी सहायता करे। 'लूट इंडिया लूट' में आपको जानकारी मिलेगी कि देश को कितने सुंदर तरीकों से लूटा जा सकता है? कितने प्रकार से लूटा जा सकता है? कौन-कौन मिलकर लूट सकते हैं? जनता को मूर्ख बनाने विभिन्न तरीकों पर भी हम प्रकाश डालेंगे। तो आइए शुरू करते है... लूट इंडिया लूट।
सबसे पहले हम स्वागत करते है, अपने जजों का। अपने दर्शकों को बता दें कि हमारे इस प्रोग्राम के तीन जज हैं। हमारे पहले जज हैं, श्रीमान घपलानंद गोस्वामी। आप बुद्धिजीवी वर्ग के प्रतिनिधि हैं। उनके पास देश को लूटने के इतने तरीके हैं कि श्रोता दंग रह जाएँगे। घपला-कला पर आपकी किताबें पूरी दुनिया में इज्जत प्राप्त कर चुकी हैं। बेस्ट सेलर रह चुके हैं। आजकल इन्होंने अपना विद्यालय खोल रखा है जिसमें घपले के विभिन्न तरीकों से अपने विद्यार्थियों को अवगत कराते हैं। दूसरे जज हैं श्रीमान घपलेश्वर 'नौनिहाल'। घपले के क्षेत्र में आपका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है। 'घपलेश्वर' की उपाधि मिलने के बाद भी आप इस क्षेत्र में अपने आपको नौनिहाल ही मानते हैं। राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ भी, किसी घोटाले के पहले इनका नाम लेना नहीं भूलतीं। जुए के क्षेत्र में जो प्रतिष्ठा युद्धिष्ठिर को हासिल है वही इज्जत नौनिहाल जी को घपले के क्षेत्र में है। तीसरे जज हैं श्रीमान घपलेंदु भूषण। इन्होंने प्रशासन के बड़े-बड़े पदों पर रहते हुए इतने घपले किए कि इनका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में आना चाहिए था। मगर बुक वालों के आलस्य के कारण देश इससे वंचित रह रहा है। बुद्धिजीवी, राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी तीन अलग-अलग क्षेत्रों के कोहेनूर हमारे पास हैं।
आइए, आपको 'लूट इंडिया लूट' के नियमों से परिचित करा दें। हमारे पास अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिभागी हैं। सब अपने-अपने अनुभव बताएँगे और हमारे जज इस बात का निर्णय लेंगे कि सबसे सुंदर तरीके से देश को कौन लूट रहा है। एक प्रतिभागी के लिए एक जज की टिप्पणी ली जाएगी। बाकी दो केवल अंक देंगे। अंतिम तीन प्रतिभागियों का निर्णय जनता के वोटों से होगा। तो आइए शुरू करते हैं। आज तक का सबसे बड़ा शो - 'लूट इंडिया लूट'। हम सबसे पहले मंच पर आमंत्रित करते हैं शिक्षा से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति को जो पेशे से शिक्षक हैं। हम देखते हैं कि उनके पास इंडिया को लूटने के कौन-कौन से तरीके हैं। आप अपना अनुभव बताएँ।
- 'मैं सबसे पहले इस बात का खंडन करना चाहता हूँ कि मैं शिक्षा से जुड़ा हुआ हूँ। नौकरी मिलने के बाद से आज तक मैने कोई किताब नहीं खोली और न ही किसी प्रकार से अपने मस्तिष्क को नई सोच से जोड़ने का प्रयत्न किया। हाँ, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं शिक्षक हूँ। यह नौकरी मैने अपनी मर्जी से नहीं की। बेरोजगारी में यही मिली तो मैं क्या कर सकता हूँ? मैं हर संभव कोशिश करता हूँ कि इंडिया की लूट में मेरा भी एक छोटा सा हिस्सा हो जिस प्रकार सागर सेतु बनाने में गिलहरी का था। मैं कभी समय पर कक्षा में नहीं जाता। चालीस मिनट की कक्षा में, मैं पाँच मिनट विलंब से जाता हूँ और पाँच मिनट पहले निकल आता हूँ। इस प्रकार प्रतिदिन दस मिनट का समय लूट कर मैं अपने मन को संतुष्ट करता हूँ। बालक मेरी कक्षा में ऐसे बैठता हैं मानो वह सोया हुआ हो। चाहे तो सो भी सकता है। हाँ मेरी अपनी संस्था है जो संकटापन्न बालकों की हर संभव सहायता करती है। नोट्स से लेकर गाइड तक हमारी संस्था मुहैया कराती है। इससे भी आगे बढ़कर हम बालकों को परीक्षा में चिट तक मुहैया कराते हैं ताकि उनकी नाव न डूबे। इसके बाद भी यदि कोई कुलनाशक बच्चा नौका डुबोने पर आतुर हो ही जाता है तो हम उसकी सिफारिश परीक्षक तक भी पहुँचाते हैं। सार संक्षेप यह कि हमारी संस्था में आया हुआ बालक किसी भी 'कीमत' पर सफल हो ही जाता है। कीमत तो ऊँची होती है मगर बालक देश की सेवा के लिए तैयार हो जाता है। बस एक मास्टर इससे ज्यादा क्या कर सकता है। हमारे पास कौन-सा देश का खजाना है कि हम लूटेंगे। एक टुच्ची सी कोशिश है।'
एक जोरदार तालियाँ हो जाए हमारे गुरु जी के लिए। सचमुच, आपकी कोशिश लाजवाब है। मानना पड़ेगा कि आप अपने अत्यल्प संसाधनों से ही देश को लूटने का हर संभव प्रयत्न करते हैं। कहते हैं 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' देखते हैं आप की हार होती है या जीत। हमारे जज क्या कहते हैं? मैं पूछना चाहता हूँ श्रीमान घपलानंद गोस्वामी जी से -
- 'माट साब की कोशिश को हम सलाम करते हैं। हम वाकिफ हैं इन तरीकों से आखिर हम पढ़-लिखकर ही यहाँ तक पहुँचे हैं। हम आज जो भी हैं अपने गुरुजनों के कारण ही हैं। हमारा उन सबको प्रणाम जो इन सभी तरीकों को आजमाते रहे हैं। विद्यालयों में आज भी ऐसे बोरिंग शिक्षक मौजूद हैं जो बालकों पर अनावश्यक रूप से पढ़ने-लिखने के लिए दबाव डालते हैं। शिक्षण को एक आंदोलन के रूप में लेते हैं। उनसे देश का नुकसान हो रहा है। बालक यदि सारी ऊर्जा महज दो चार क्लास पास करने में ही लगा देगा तो आगे चलकर देश के लिए क्या करेगा? उन्हें तो केवल परीक्षा में एपीयर होने के आधार पर ही पासिंग सर्टीफिकेट दे देना चाहिए। इस पर बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन हम बुलाने वाले हैं। मास्टरों की नाक में और नकेल लगनी चाहिए ताकि वे बच्चों को परेशान करना छोड़ें। इस मास्टर साहब के लिए मैं स्टैंड हो जाता हूँ। मेरी ओर से दस में दस।'
हमारे अगले प्रतिभागी हैं व्यापार जगत से जुड़े बड़े भाई बकरीवाला। आप हर चीज बेचते हैं। आटा-दाल से लेकर नकली ड्राइविंग लाइसेंस तक। हमारा मंच आपका जोरदार स्वागत करता है। आप अपने अनुभव बताएँ।
- 'मैं क्या बताऊँ। मेरी दुकान का नाम है 'सुविधा'। हर प्रकार की सुविधा हम अपने ग्राहकों को देते हैं और जीवन को असान बनाते हैं। हम 'जीओ और जीने दो' के सिद्धांत पर चलते हैं। चावल में कंकड़ और दाल में भूसी मिलाकर हम देख चुके हैं। इसमें अब पहले की तरह कमाई नहीं रही। रिटेलर के पास आढ़तिए ही मिलाकर भेजते हैं। मिलावट भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सकती। हमने दामों के ऊपर नकली दाम की पर्ची चिपका कर भी देखा है। ग्राहक इतने जाग गए हैं कि परेशानी होने लगी है। हमने कम तौलने के कई तरीके अपनाए। तराजू में ही इतनी वैज्ञानिक विधियाँ हम फिट कर देते हैं कि सामने वाला देख नहीं पाता। हम इनाम और लॉटरी का तरीका भी अपनाते हैं। भाँति-भाँति के ऑफर देते हैं। फटी और पुरानी साड़ियों को इन्हीं ऑफर में निकाल देते हैं। नाना प्रकार के विज्ञापनों के माध्यम से हम ग्राहकों के दिमाग का दरवाजा बंद करते हैं। यदि एक विज्ञापन में हमने एक लाख खर्च भी कर दिए तो क्या? उससे पाँच लाख लोग बेवकूफ बन जाते हैं। चार लाख का फायदा, यदि एक रुपये का ही लाभ लें। मेरा दावा है कि कोई बेवकूफ होता नहीं बनाया जाता है, यदि संचार माध्यमों का उचित उपयोग किया जाए तो। एक ही ब्रांड हम छह महीने बाद आउट डेटेड घोषित कर देते हैं। ताकि फिर से एक बार उसी आदमी को मूर्ख बनाया जा सके जिसे पिछली बार बनाया गया था। हम मूली से लेकर मोबाइल तक बेचते हैं। चाहें तो ताड़ी से लेकर ताजमहल तक बेच दें। इन सब बातों का यह अर्थ यह नहीं कि हमारी देश भक्ति किसी से कमजोर है। हम स्थानीय थाने से लेकर केंद्र के नेताओं तक को उचित लाभ देते हैं। पार्टियों को चंदा देते हैं। नेता से लेकर अभिनेता तक की सेवा करते हैं। बस इतना ही और क्या कर सकते हैं? हम गरीब आदमी हैं। सौ दो सौ करोड़ का घोटाला करने की हमारी हैसियत नहीं है। धन्यवाद।'
एक जोरदार तालियाँ हो जाएँ हमारे महान बड़े भाई बकरीवाला के लिए। अब हम मंच पर आमंत्रित करते हैं मीडिया से जुड़े प्रतिभागी को जो सदैव जनता के लिए लड़ते हैं लेकिन 'लूट इंडिया लूट' में उनका भी एक मजबूत हिस्सा है। आइए, सुनते हैं उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी। स्वागत है आइए। हमारे अगले प्रतिभागी मंच पर आएँ इसके पूर्व नियमों के मुताबिक हम अपने जज श्री घपलेंदु जी से कॉमेंट चाहेंगे।
- 'पूँजीपति वर्ग के तो हम सदा से ही कायल हैं। हम उनके हैं और वे हमारे हैं। हम चंदन हैं, वे पानी हैं। उनके द्वारा प्रदत्त राशि ही रिटायरमेंट के बाद हमारे काम आती है नहीं तो सरकार हमारे पास छोड़ती ही क्या है। आयकर के नाम पर जो आए रहते हैं उसे ले जाती है। उन्होंने अपने ज्ञान का जो एक छोटा सा हिस्सा जनहित में जारी किया है। वह सराहनीय है। अब हम अगले प्रतिभागी को सुनें।'
- 'मैं 'सनसनी' चैनल का संवाददाता हूँ। हमारा काम है जनता को सदैव सनसनाए रखना और खुद को टीआरपी की खजूर पर चढ़ाना। जनता को सनसनाने के लिए कई बार तो हमें घटनाओं को जन्म तक देना पड़ता है। एक बार एक आदमी ने आत्मदाह की घोशणा की हम समय से पहले जाकर कैमरा वगैरह लगाकर लैस हो गए। सही समय पर वह आदमी आया। उसने हमारी आँखों के सामने अपने बदन पर घासलेट डाली। हाथ में माचिस ली और जलाई। हम एक-एक घटना को कैमरे में कैद कर रहे थे। उसने आग लगा ली और चिल्लाने लगा। हम लाइव टेलिकास्ट करने लगे। हम चाहते तो उसे आत्मदाह करने से रोक सकते थे। उसके हाथ से घासलेट लेकर उसे पुलिस के हवाले कर सकते थे लेकिन उससे न्यूज तो नहीं बनता न। हमारा भुगतान तो टीआरपी के आधार पर ही होता है। उस संवाददाता की बड़ी इज्जत होती है जो सबसे ज्यादा उत्तेजना पैदा करता है। यह तो परदे की बात हो गई। कई बार तो लक्ष्मी पर्दे के पीछे भी खूब मिलती है। कभी-कभी, किसी-किसी, भाग्यशाली संवाददाता को किसी नेता या उद्योगपति या दूसरे किसी बड़े आदमी का कोई राज मालूम हो जाता है। सबूत भी हाथ लग जाते हैं। हम आसानी से ब्लैकमेल करके माल बनाते हैं। ऐसा अक्सर नहीं होता। अक्सर हमें भूतनी, साँपनी, सूअरी, से लेकर बाबा भूतनाथ तक के समाचार प्रस्तुत करने होते हैं। जनता जब तक मुँह बाए हमारे समाचार को नहीं देखती तब तक हमें मजा ही नहीं आता। आपने सुना ही होगा कि सरेआम एक औरत के कपड़े उतारने का समाचार दिया गया था। बाद में पता नहीं कैसे यह बात सामने आ गई कि वह औरत और कपड़े उतारने वाले दोनों ही हमारे ही लोग थे। क्या करें करना पड़ता है। इतनी कड़ी प्रतियोगिता है कि आदमी को टीआरपी बढ़ाने के लिए सारे हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। चैनल को उसी के मुताबिक विज्ञापन मिलते हैं। अब इससे ज्यादा हम क्या योगदान दे सकते हैं? हम राष्ट्रीय स्तर का घोटाला तो कर नहीं सकते। आशा है जजेज हमारी मजबूरी समझेंगे। धन्यवाद, जयहिंद।'
दर्शकों, जोरदार तालियाँ हो जाएँ हमारे संवाददाता प्रतिभागी के लिए। आखिर जनता के लिए ही इतनी जोखिम उठाते हैं। अब एक कमेंट हो जाए श्री घपलेश्वर जी का आखिर मीडिया और राजनीति का चोली दामन का साथ है।
- 'हाँ चोली दामन वाली बात आपने ठीक कही। मीडिया हमारी ताकत है। जनता की आँख है। इनकी एक खासियत और है जो शायद संकोचवश इन्होंने नहीं कहा। ये लोग सरकार सापेक्ष होते हैं। जिस दल की सरकार होती है उसी के अनुरूप ढल जाते हैं। नहीं तो केवल सनसनी पैदा करने के लिए तिल को खींच कर ताड़ बना देंगे। रस्सी को साँप सिद्ध करने में जितनी महारत इन्हें हासिल है उतनी किसी भी वर्ग को नहीं। सोने में सुगंध यह कि इनकी दुनिया में सभी पढ़े-लिखे ही होते है मगर लूटने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। हम इन्हें सलाम करते हैं।'
आइए, हम जोरदार तालियों से स्वागत करें अपने अगले प्रतिभागी का जो एक 'बाबा' हैं। प्रवचन वगैरह करके समाज को उत्थान के मार्ग पर लिए जा रहे हैं। मैं तो समझता हूँ कि आजतक यदि प्रलय नहीं हुआ तो इन बाबाओं के कारण ही। कौन भगवान चाहेगा कि इतनी संपत्ति एक बार में बरबाद हो जाए। आइए, बाबा आपका स्वागत हैं। 'लूट इंडिया लूट' में अपने योगदान का बखान करें।
- 'बच्चो!'
बाबा, यहाँ बच्चा कोई नहीं है।
- 'हमारे लिए तो सभी बच्चे हैं। केवल हमीं सयाने हैं। तो बच्चो! यह संसार पाप का घर है। इसे स्वच्छ करने में हमारी भूमिका तो ईश्वर ने उसी दिन तय कर दी जिस दिन हमने संन्यास ग्रहण किया। क्यों किया? यह कहने का यह मंच नहीं है। नाना प्रकार के पापों और पपियों से समाज को बचाने के लिए हम प्रवचन करते हैं। उसे सुनकर लोग खूब लाभ उठाते हैं। थोड़ा सा लाभ हम भी उठा लेते हैं। आप देख ही रहे हैं, हमारे बदन पर यह रेशमी कुर्ता और हजार रुपये की धोती। यह अंगरखा हमने खास तौर पर दुबई से मंगाया है। मनुष्य के शरीर में आत्मा रूपी भगवान रहते हैं इसलिए इसे सजाना पड़ता है। हम छप्पन भोग जरूर खाते हैं लेकिन अपने लिए नहीं, उसी भगवान के लिए जो शरीर में निवास कर रहे हैं। हम मखमली गद्दे पर जरूर सोते हैं लेकिन उसी गॉड के लिए। आदरणीय न्यायधीश मंडली से आग्रह है कि हमारी तकनीक पर ध्यान दें। हम ऐश करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि आत्मा रूपी परमात्मा खुश रहें। हमारे दर्शनों के लिए पाँच हजार रुपये दानपेटी में डालने पड़ते हैं। मंदिर जो हमेशा निर्माणाधीन ही रहते हैं, के लिए दान स्वरूप एक दो हजार रुपये डालना तो आम बात है। हमारे प्रभु सोने के सिंहासन पर विराजते हैं। सोने के मुकुट पहनते हैं। चाँदी का चँवर डोलाना पड़ता है। यही कारण है कि हमारे भक्त हमें सोने, चाँदी की भेंट दिया करते हैं। हम अपने भक्तों को निराश नहीं करते। उन्हें हर वह खुशी देते हैं जो इस भौतिक शरीर को चाहिए। हम उन्हें परमशांति और आनंद देते हैं। हम दो भक्तों का संगम भी करा देते हैं ताकि वे परम आनंद को प्राप्त कर सकें। हमारा तो एक ही उद्येश्य है - सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। हरिओम तत्सत् हरिओम तत्सत्। जय हो समाज और संसार की।'
जय हो बाबा जय हो। आप महान ही नहीं अद्भुत भी हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ, अपने जज श्री घपलेश्वर नौनिहाल से कि बाबा के परफार्मेंस पर दो शब्द कहें -
- 'हम तो बाबा के चेले हैं। इसी बाबा के नहीं जितने भी बाबा और बापू हो रहे हैं, हम सबके चेले हैं। ज्ञान की जो गंगा इन लोगों ने बहाई है। उसमें पता नहीं कितने गाँव और शहर बह गए। इनकी तकनीक अनोखी है। एक हजार लोगों को एक ही टोटका बताते हैं। उसमें से दस पर भी यदि लग गया तो अगली बार उसे मीडिया के सामने कर देंगे। कभी-कभी तो इनके भक्त प्रायोजित भी होते हैं। वे मीडिया के सामने कहते हैं कि कैंसर ठीक हो गया। डायबिटिज ठीक हो गया। सुनने वाले अगली बार मिलने आ जाएँगे। यह जो मैनेजमेंट का कमाल है वह अनुकरणीय है। इनको आयकर नहीं देना पड़ता। जितने प्रकार के सुख भगवान ने बनाए हैं सब इन लोगों के लिए ही हैं। जनता भी जान देती है। मजे तो हम भी करते हैं लेकिन हमारी छवि खराब हो जाती है। इनकी सदा जय हो। अब तो बाबा लोग राजनीति में भी आ रहे हैं। खुद के पास करोड़ों की संपत्ति है लेकिन कालाधन के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। जय हो प्रभु। जय हो।'
हमारे आखिरी प्रतिभागी हैं एक एनजीओ के डायरेक्टर जो आज लाखों से खेल रहे हैं जबकि कल तक उनके पास मात्र एक साइकिल थी और वह भी पुरानी। आखिर उन्होंने समाज की सेवा करके कैसे इतना माल बना लिया। उन्हीं से सुनते हैं। 'लूट इंडिया लूट' के इस आखिरी प्रतिभागी के लिए जोरदार तालियाँ।
- 'मैं एनजीओ चलाता हूँ। दस साल पहले हमने एक एनजीओ बनाई - 'सेवक'। समाज सेवा के लिए नहीं दरअसल मेरा नाम ही सेवक है। सेवक राम। तो साहब, सेवा का भी एक भी मौका हम छोड़ते नहीं है। चाहे वह बाढ़ के समय हो या सूखे के समय। आग लगे या भूकंप आए। हम तत्पर रहते हैं सेवा के लिए। हमारे साँठ-गाँठ काफी ऊपर तक हैं। राहत बाँटने का ठेका हमें ही मिलता है। राहत हम बाँटते भी हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक सभी को राहत पहुँचाते हैं। लगे हाथ आम आदमी को भी राहत मिल जाती है। फटे-पुराने कंबल और रजाइयाँ हम नियमित रूप से राहत शिविरों में देते है। यह बात अलग है कि जितनी एंपोर्टेड सामग्री है वह बड़े लोगों की सेवा में जाती है। आखिर उन्हीं की कृपा से हमें चेक मिलते हैं। यह एक सिस्टम हैं, सबको सबका ख्याल रखना पड़ता है। तो जनाब भारत में न तो बाढ़ की कमी है न सूखे की। सरकार तो जनहित के लिए सदैव तत्पर रहती ही है। हमने इन हालातों में यदि दो पैसे जोड़ लिए तो कौन सी बड़ी कला हो गई? हम जितना दस साल में जोड़ पाए उतना तो जज साहब एक साल में जोड़ लेते हैं। उन्हें मौका अधिक मिलता है। वरना, कला और कौशल में हम उनसे कम नहीं है।'
खैर, आप जजों पर कॉमेंट नहीं कर सकते। यह नियमों के विपरीत है। हम जानते है कि हमारे माननीय जज आपके बारे में क्या राय रखते हैं। हम टिप्पणी लेते हैं श्रीमान घपलेश्वर जी से। आप राजनीति से जुड़े हैं। नाना प्रकार के घोटालों के जनक भी हैं और निर्णायक भी। तो घपलेश्वर जी...।
- 'यह गर्व की बात है कि आपके इस कार्यक्रम में समाज के सभी क्षेत्रों से जुड़े लोग आए सबने अपनी कला और कौशल का बखान किया। जहाँ तक बात है डायरेक्टर साहब का तो हम इनकी कला और समर्पण के कायल हैं। एनजीओ खोलते ही घपलों के चांस नहीं मिलने लगते। उसके लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है। अर्जुन की तरह केवल जो अपने लक्ष्य अर्थात धन पर ही निगाह लगाकर रखेगा उसे ही कालांतर में इस प्रकार के चांस मिलते हैं। हो सकता है कि एकलव्य की तरह कोई आपको गुरु न मिले और यदि मिले भी तो आपका ही अँगूठा काटने के लिए तैयार मिले। आपको अपने प्रयासों से ही घोटालों के स्वर्ग तक सदेह पहुँचना पड़ता है। हम डायरेक्टर साहब की इज्जत करते हैं और आग्रह करते हैं कि हमसे एकांत में मिलें।'
दर्शकों, शो का समय समाप्त हो रहा है। आपको हम अगले सप्ताह के एपीसोड में बताएँगे कि कौन है 'लूट इंडिया लूट' का विजेता। आखिर हमें भी तो ये रियल्टिी शो चलानी है जिनमें रियल्टिी नाम की चीज कुछ होती नहीं है। लिखे हुए स्क्रीप्ट पर सारे नाटक होते है। चाहे वह दो जजों के बीच की लड़ाई हो या अचानक किसी हस्ती का पहुँचना। किसी प्रतिभागी के माँ-बाप को लाना या उनके पसंदीदा कलाकार को सेट तक लाना। यह पहले से ही तय होता है ताकि अधिक से अधिक विज्ञापन मिल सकें। सारा खेल विज्ञापनों का ही है। सारा देश विज्ञापनों पर ही चल रहा है। सरकार अपने पक्ष में विज्ञापन दे रही है। विपक्ष उसके खिलाफ विज्ञापन दे रहा है। समाज सेवा का डंका पीटने वाले अपने पक्ष में विज्ञापन दे रहे हैं। जो जितना बड़ा प्रबंधक होगा, वह उतना अधिक चमकेगा। आप चाहें तो हमारे इस प्रोग्राम में हिस्सा ले सकते है। ले सकते क्या हैं? लेते ही हैं। हर आदमी इस प्रोग्राम का प्रतिभागी है। चाहे वह थोड़ा लूटता हो या ज्यादा। बेशक आपकी प्रसिद्धि नहीं हुई। खैर, आप चाहें तो हमारे प्रतिभागियों के लिए मैसेज कर सकते हैं। हमारी लाइन हमेशा खुली ही रहती है।