Friday, 22 August 2014

अंधियारे बिल से झाँक रहे सर्पों की आँखें तेज़ हुईं : गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधियारे मैदान के इन सुनसानों में
बिल्ली की, बाघों की आँखों-सी चमक रहीं
ये राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, मत्सर की आँखें,
हरियातूता की ज़हरीली-नीली-नीली
ज्वाला, कुत्सा की आँखों में ।
ईर्ष्या-रूपी औरत की मूँछ निकल आयी ।
इस द्वेष-पुरुष के दो हाथों के
चार और पंजे निकले ।
मत्सर को ठस्सेदार तेज़ दो बौद्धिक सींग निकल आये ।
स्वार्थी भावों की लाल
विक्षुब्ध चींटियों को सहसा
अब उजले पर कितने निकले ।
अंधियारे बिल से झाँक रहे
सर्पों की आँखें तेज़ हुईं ।
अब अहंकार उद्विग्न हुआ,
मानव के सब कपड़े उतार
वह रीछ एकदम नग्न हुआ ।
ठूँठों पर बैठे घुग्घू-दल
के नेत्र-चक्र घूमने लगे
इस बियाबान के नभ में सब
नक्षत्र वक्र घूमने लगे ।
कुछ ऐसी चलने लगी हवा,
अपनी अपराधी कन्या की चिन्ता में माता-सी बेकल
उद्विग्न रात
के हाथों से
अंधियारे नभ की राहों पर
है गिरी छूटकर
गर्भपात की तेज़ दवा
बीमार समाजों की जो थी ।
दुर्घटना से ज्वाला काँपी कन्दीलों में
अंधियारे कमरों की मद्धिम पीली लौ में,
जब नाच रही भीतों पर भुतही छायाएँ
आशंका की--
गहरे कराहते गर्भों से
मृत बालक ये कितने जन्मे,
बीमार समाजों के घर में !
बीमार समाजों के घर में
जितने भी हल है प्रश्नों के
वे हल, जीने के पूर्व मरे । उनके प्रेतों के आस-पास
दार्शनिक दुखों की गिद्ध-सभा
आँखों में काले प्रश्न-भरे बैठी गुम-सुम ।
शोषण के वीर्य-बीज से अब जनमे दुर्दम
दो सिर के, चार पैर वाले राक्षस-बालक ।
विद्रूप सभ्यताओं के लोभी संचालक ।
मानव की आत्मा से सहसा कुछ दानव और निकल आये !

मानव मस्तक में से निकले
कुछ ब्रह्म-राक्षसों ने पहनी
गान्धीजी की टूटी चप्पल
हरहरा उठा यह पीपल तब
हँस पड़ा ठठाकर, गर्जन कर, गाँव का कुआँ ।
तब दूर, सुनाई दिया शब्द, 'हुआँ' 'हुआँ' !
त्यागे मन्दिर के अध-टूटे गुम्बद पर स्थित
वीरान प्रदेशों का घुग्घू
चुपचाप, तेज़, देखता रहा--
झरने के पथरीले तट पर
रात के अंधेरे में धीरे
चुपचाप, कौन वह आता है, या आती है,
उसके पीछे--
पीला-पीला मद्धिम कोई कन्दील
छिपाये धोती में (डर किरणों से)
चुपचाप कौन वह आता है या आती है--
मानो सपने के भीतर सपना आता हो,
सपने में कोई जैसे पीछे से टोंके,
फिर, कहे कि ऐसा कर डालो !
फिर, स्वयं देखता खड़ा रहे
औ' सुना करे वीराने की आहटें, स्वयं ही सन्नाकर
रह जाये अपने को खो के !

त्यागे मन्दिर के अध-टूटे गुम्बद पर स्थित
घुग्घू को आँखों को अब तक
कोई भी धोखा नहीं हुआ,
उसने देखा--
झरने के तट पर रोता है कोई बालक,
अंधियारे में काले सियार-से घूम रहे
मैदान सूँघते हुए हवाओं के झोंके ।
झरने के पथरीले तट पर
सो चुका, अरे, किन-किन करके, कुछ रो-रो के
चिथड़ों में सद्योजात एक बालक सुन्दर ।
आत्मा-रूपी माता ने जाने कब त्यागा
जीवन का आत्मज सत्य न जाने किसके डर ?
माँ की आँखों में भय का कितना बीहड़पन
जब वन्य तेंदुओं की आँखों से दमक उठे
गुरु शुक्र और तारे नभ में
जब लाल बबर फ़ौजी-जैसा
जो ख़ूनी चेहरा चमक उठा
वह चांद कि जिसकी नज़रों से
यों बचा-बचा,
यदि आत्मज सत्य यहाँ रक्खे झरने के तट,
अनुभव शिशु की रक्षा होगी ।
ले इसी तरह के भाव अनगिनत लोगों ने
अपने ज़िन्दा सत्यों का गला बचाने को
अपना सब अनुभव छिपा लिया,
हाँ में हाँ, नहीं नहीं में भर
अपने को जग में खपा लिया !

चुपचाप सो रहा था मैं अपने घर में जब,
सहसा जगकर, चट क़दम बढ़ा,
अंधियारे के सुनसान पथों पर निकल पड़ा,
बहते झरने के तट आया
देखा--बालक ! अनुभव-बालक !!
चट, उठा लिया अपनी गोदी में,
वापस ख़ुश-ख़ुश घर आया !
अपने अंधियारे कमरे में
आँखें फाड़े मैने देखा मन के मन में
जाने कितने कारावासी वसुदेव
स्वयं अपने कर में, शिशु-आत्मज ले,
बरसाती रातों में निकले,
धँस रहे अंधेरे जंगल में
विक्षुब्ध पूर में यमुना के
अति-दूर, अरे, उस नन्द-ग्राम की ओर चले ।
जाने किसके डर स्थानान्तरित कर रहे वे
जीवन के आत्मज सत्यों को,
किस महाकस से भय खाकर गहरा-गहरा :
भय से अभ्यस्त कि वे उतनी
लेकिन परवाह नहीं करते !!
इसलिए, कंस के घण्टाघर
में ठीक रात के बारह पर
बन्दूक़ थमा दानव-हाथों,
अब दुर्जन ने बदला पहरा !
पर इस नगरी के मरे हुए
जीवन के काले जल की तह
के नीचे सतहों में चुप
जो दबे पाँव चलती रहतीं
जल-धाराएँ ताज़ी-ताज़ी निर्भय, उद्धत
तल में झींरे वे अप्रतिहत !

कानाफूसी से व्याप्त बहुत हो जाती है,
इन धाराओं में बात बहुत हो जाती है ।
आते-जाते, पथ में, दो शब्द फुसफुसाते
इनको, घर आते, रात बहुत हो जाती है ।
एक ने कहा--
अम्बर के पलने से उतार रवि--राजपुत्र
ढाँककर साँवले कपड़ों में
रख दिशा-टोकरी में उसको
रजनी-रूपी पन्ना दाई
अपने से जन्मा पुत्र-चन्द्र फिर सुला गगन के पलने में
चुपचाप टोकरी सिर पर रख
रवि-राजपुत्र ले खिसक गयी
पुर के बाहर पन्ना दाई ।
यह रात-मात्र उसकी छाया ।
घबराहट जो कि हवा में है
इसलिए कि अब
शशि की हत्या का क्षण आया ।

अन्य ने कहा--
घन तम में लाल अलावों की
नाचती हुई ज्वालाओं में
मृद चमक रहे जन-जन मुख पर
आलोकित ये विचार है अब,
ऐसे कुछ समाचार है अब
यह घटना बार-बार होगी,
शोषण के बन्दी-गृह-जन में
जीवन की तीव्र धार होगी !
और ने कहा--
कारा के चौकीदार कुशल
चुपचाप फलों के बक्से में
युगवीर शिवाजी को भरते
जो वेश बदल, जाता दक्षिण को ओर निकल !
एक ने कहा--
बन्दूक़ों के कुन्दों पर स्याह अंगूठों ने
लोहे के घोड़े खड़े किये,
पिस्तौलों ने अपने-अपने मुँह बड़े किये,
अस्त्रों को पकड़े कलाइयों
की मोटी नस हाँफने लगी
एकाग्र निशाना बने ध्यान के माथे पर
फिर मोटी नसें कसी, उभरीं
पर पैरों में काँपने लगी ।
लोहे की नालों की टापें गूँजने लगी ।
अम्बर के हाथ-पैर फूले,
काल की जड़ें सूजने लगीं ।
झाड़ों की दाढ़ी में फन्दे झूलने लगे,
डालों से मानव-देह बंधे झूलने लगे ।
गलियों-गलियों हो गयी मौत की गस्त शुरु,
पागल-आँखों, सपने सियाह बदमस्त शुरु !
अपने ही कृत्यों-डरी
रीढ़ हड्डी
पिचपिची हुई,
वह मरे साँप के तन-सी ही लुचलुची हुई ।
अन्य ने कहा--
दुर्दान्त ऐतिहासिक स्पन्दन
के लाल रक्त से लिखते तुलसीदास आज
अपनी पीड़ा की रामायण,
उस रामायण की पीड़ा के आलोक-वलय
में मुख-मण्डल माँ का झुर्रियों-भरा
उभरा-निखरा,
उर-कष्ट-भरी स्मित-हँसी
कि ज्यों आहत पक्षी
रक्तांकित पंख फड़फड़ाती
मेरे उर की शाखाओं पर आ बैठी है
कराह दाबे गहरी
(जिससे कि न मैं जाऊँ घबरा)
माँ की जीवन-भर की ठिठुरन,
मेरे भीतर
गहरी आँखोंवाला सचेत
बन गयी दर्द ।
उसकी जर्जर बदरंग साड़ी का रंग
मेरे जीवन में पूरा फैल गया ।
मुझको, तुमको
उसकी आस्था का विक्षोभी
गहरी धक्का
विक्षुब्ध ज़िन्दगी की सड़कों पर ठेल गया ।
भोली पुकारती आँखें वे
मुझको निहारती बैठी हैं ।

और ने कहा--
वह चादर ओढ़, दबा ठिठुरन, मेरे साथी !
वह दूर-दूर बीहड़ में भी,
बीहड़ के अन्धकार में भी,
जब नहीं सूझ कुछ पड़ता है,
जब अंधियारा समेट बरगद
तम की पहाड़ियों-से दिखते,
जब भाव-विचार स्वयं के भी
तम-भरी झाड़ियों-से दिखते ।
जब तारे सिर्फ़ साथ देते
पर नहीं हाथ देते पल-भर
तब, कण्ठ मुक्त कर, मित्र-स्वजन
नित नभ-चुम्बी गीतों द्वारा
अपना सक्रिय अस्तित्व जताते एक-दूसरे को
वे भूल और फिर से सुधार के रास्ते से
अपना व्यक्तित्व बनाते हैं।
तब हम भी अपने अनुभव के सारांशों को
उन तक पहुँचाते हैं, जिसमें
जिस पहुँचाने के द्वारा, हम सब साथी मिल
दण्डक वन में से लंका का
पथ खोज निकाल सकें प्रतिपल
धीरे-धीरे ही सही, बढ़ उत्थानों में अभियानों में

अंधियारे मैदानों के इन सुनसानों में
रात की शून्यताओं का गहरापन ओढ़े
ज़्यादा मोटे, ज़्यादा ऊँचे, ज़्यादा ऐंठे
भारी-भरकम लगने वाले
इन क़िले-कंगूरों-छज्जों-गुम्बद-मीनारों
पर, क्षितिज-गुहा-मांद में से निकल
तिरछा झपटा,
जो गंजी साफ़-सफ़ेद खोपड़ीवाला चांद
कुतर्की वह
सिर-फिरे किसी ज्यामिति-शाली-सा है।
नीले-पीले में घुले सफ़ेद उजाले की
आड़ी-तिरछी लम्बी-चौड़ी
रेखाओं से
इन अन्धकार-नगरी की बढ़ी हुई
आकृति के खींच खड़े नक्षे
वह नये नमूने बना रहा
उस वक़्त हवाओं में अजीब थर्राहट-सी
मैं उसको सुनता हुआ,
बढ़ रहा हूँ आगे
चौराहे पर
प्राचीन किसी योद्धा की ऊँची स्फटिक मूर्ति,
जिस पर असंग चमचमा रही है
राख चांदनी की अजीब
उस हिमीभूत सौन्दर्य-दीप्ती
में पुण्य कीर्ति
की वह पाषाणी अभिव्यक्ति
कुछ हिली।
उस स्फटिक मूर्ति के पास
देखता हूँ कि चल रही साँस
मेरी उसकी।
वे होंठ हिले
वे होंठ हँसे
फिर देखा बहुत ध्यान से तब
भभके अक्षर!!
वे लाल-लाल नीले-से स्वर
बाँके टेढ़े जो लटक रहे
उसके चबूतरे पर, धधके!!

मेरी आँखों में धूमकेतु नाचे,
उल्काओं की पंक्तियाँ काव्य बन गयीं
घोषणा बनी!!
चांदनी निखर हो उठी
उस स्फटिक मूर्ति पर, उल्काओं पर
मेरे चेहरे पर!!
पाषाण मूर्ति के स्फटिक अधर
पर वक्र-स्मित
कि रेखाएँ उसकी निहारती हैं
उन रेखाओं में सहसा मैं बंध जाता हूँ
मेरे चेहरे पर नभोगन्धमय एक भव्यता-सी।
धीरे-धीरे मैं क़दम बढ़ा
गलियों की ओर मुड़ा
जाता हूँ ज्वलत् शब्द-रेखा
दीवारों पर, चांदनी-धुंधलके में भभकी
वह कल होनेवाली घटनाओं की कविता
जी में उमगी!!
तब अन्धकार-गलियों की
गहरी मुस्कराहट
के लम्बे-लम्बे गर्त-टीले
मेरे पीले चेहरे पर सहसा उभर उठे!!
यों हर्षोत्फुल्ल ताज़गी ले
मैं घर में घुसता हूँ कि तभी
सामने खड़ी स्त्री कहती है--
"अपनी छायाएँ सभी तरफ़
हिल-डोल-रहीं,
ममता मायाएँ सभी तरफ़
मिल बोल रहीं,
हम कहाँ नहीं, हम जगह-जगह
हम यहाँ-वहाँ,
माना कि हवा में थर्राता गाना भुतहा,
हम सक्रिय हैं।"

मेरे मुख पर
मुसकानों के आन्दोलन में
बोलती नहीं, पर डोल रही
शब्दों की तीखी तड़ित्
नाच उठती, केवल प्रकाश-रेखा बनकर!
अपनी खिड़की से देख रहे हैं हम दोनों
डूबता चांद, कब डूबेगा!!

Thursday, 21 August 2014


हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्‍ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां, एक स्‍वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्‍थान लेने के लिए तैयार हैं।
प्यासे-प्यासे ओस चाटते रहे फलाने,
बिना सजा के जेल काटते रहे फलाने,
समय कटे कैसे अब एक-एक दिन भारी,
जीवन भर आदर्श बांटते रहे फलाने ।

Wednesday, 20 August 2014

मीडिया हूं मैं / जयप्रकाश त्रिपाठी

मीडिया में अपना भविष्य देख रहे जर्नलिज्म के छात्रों के लिए अपरिहार्य-सी मेरी सद्यःप्रकाशित पुस्तक 'मीडिया हूं मैं' 'पत्रकारिता का श्वेतपत्र' शीर्षक से इस आत्मकथ्य के साथ प्रारंभ होती है -  मुझे पत्रकारिता, प्रोपेगंडा, चुप्पी और उस चुप्पी को तोड़ने के बारे में बात करनी चाहिए : जॉन पिल्जर
'' चौथा स्तंभ । मीडिया हूं मैं । सदियों के आर-पार । संजय ने देखी थी महाभारत । सुना था धृतराष्ट्र ने । सुनना होगा उन्हें भी, जो कौरव हैं मेरे समय के । पांडु मेरा पक्ष है । प्रत्यक्षदर्शी हूं मैं सूचना-समग्र का, ... 'चौथा खंभा' कहा जाता है मुझे आज । आखेटक हांफ रहे हैं, हंस रहे हैं मुझ पर, 'चौथा धंधा' हो गया हूं मैं।' उजले दांत की हंसी नहीं हूं मैं अपने समय के आरपार । पढ़ना होगा मुझे बार-बार , अपनी कलम, अपने सपनों के साथ, मेरे साथ । श्रमजीवी पत्रकार हैं, सोशल मीडिया, जन-मीडिया, ग्रामीण पत्रकारिता आप का पक्ष है, गांव, खेत-खलिहान के हैं, अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर साहित्यकार हैं अथवा महिला पत्रकार; तो पढ़ लीजिए, पहचान लीजिए, ...मुझ में गूंज रहे हैं शहीद भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, डॉ. भीमराव अंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद के स्वर ।''
विश्व-मीडिया की दुर्लभ सूचनाओं एवं आद्योपांत सुपठनीयता से परिपूर्ण अपने कुल 608 पृष्ठों, तेरह अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक का मुखपृष्ठ रघुवीर सहाय की इन पंक्तियों से उद्धृत होता है- 'कुछ तो होगा, कुछ तो होगा, अगर मैं बोलूंगा, न टूटे, न टूटे तिलिस्म सत्ता का,  मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा ।' मीडिया का इतिहास, न्यू मीडिया, मीडिया का अर्थशास्त्र, मीडिया-राज्य-कानून और समाज, मीडिया में गांव और स्री, मीडिया में भाषा-साहित्य और मनोरंजन आदि विषय-केंद्रित विविध पक्षों को सविस्तार रेखांकित करने के साथ ही, पुस्तक में सुपरिचित पत्रकार ओम थानवी, साहित्यकार अशोक वाजपेयी, प्रसिद्ध टिप्पणीकार आनंदस्वरूप वर्मा आदि बारह मीडिया चिंतकों के बहुचर्चित लेख और एक महिला पत्रकार का त्रासद सफरनामा संकलनीय है । पुस्तक के ऐतिहासिक प्रेरणास्रोत हैं - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर, इंद्रविद्या वाचस्पति, बनारसी दास चतुर्वेदी, बारींद्रनाथ घोष, लोकमान्य तिलक, सखाराम गणेश देउस्कर, मदनमोहन मालवीय, रामरख सिंह सहगल, दुलारे लाल भार्गव, पं.लक्ष्मण नारायण गर्दे आदि। मीडिया और स्त्री समस्या पर सीमोन द बोउवार, हेमंतकुमारी चौधरी, रामेश्वरी नेहरू, हुम्मा देवी, गुलाब देवी चतुर्वेदी, उषा प्रियंवदा आदि, मीडिया और मुसलमान विषय पर एडवर्ड सईद,  इकबाल अहमद, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, अबुल कलाम आज़ाद, डॉ.असगर अली इंजीनियर, डॉ. खुर्शीद अनवर, अख्तर हुसैन आदि पलाश विश्वास आदि के विचार रेखांकित हैं। पश्चिमी विचारकों, मीडिया चिंतकों और उद्यमियों में मुख्यतः जोजेफ पुलित्ज़र, नोम चोमस्की, सार्त्र, एडवर्ड हरमन, बौद्रिलार्द, हर्बर्ट शिलर, लिओ बोगर्ट, जान बर्ट, सीजी मूलर, विखेम स्टीड, जेम्स मैकडोनल्ड, लिप मैन, जॉन पिल्जर, मैकलुहान, चीफ जुलियन असान्जे आदि को उद्धृत किया गया हैं। (अमेजॉन, ई-बे, ऑलक्स आदि पर पुस्तक ऑनलाइन भी उपलब्ध है।)

जयप्रकाश त्रिपाठी

'मीडिया हूं मैं' : पृष्ठ- 612, मूल्य- 550 रुपये / संपर्क:120/41,LajpatNagar, Kanpur (UP)-208005/E-mail : jan.media.manch@gmail.com, Phone : 08009831375


Saturday, 16 August 2014

लेखकों और कवियों के काम की एक अदभुत बहस / सच और झूठ एक-दूसरे के साथ-साथ / साहस यह नहीं पूछता कि चट्टान कितनी ऊँची है...



( मेरा दागिस्तान / रसूल हमजातोव)

युग-युगों से सच और झूठ एक-दूसरे के साथ-साथ चल रहे हैं। युग-युगों से उनके बीच यह बहस चल रही है कि उनमें से किसकी अधिक जरूरत है, कौन अधिक उपयोगी और शक्तिशाली है। झूठ कहता है कि मैं और सच कहता है कि मैं। इस बहस का कभी अंत नहीं होता।
एक दिन उन्‍होंने दुनिया में जाकर लोगों से पूछने का फैसला किया। झूठ तंग और टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर आगे-आगे भाग चला, वह हर सेंध में झाँकता, हर सूराख में सूँघा-साँघी करता और हर गली में मुड़ता। मगर सच गर्व से गर्दन ऊँची उठाए सिर्फ सीधे, चौड़े रास्‍तों पर ही जाता। झूठ लगातार हँसता था, पर सच सोच में डूबा हुआ और उदास-उदास था।
उन दोनों ने बहुत-से रास्‍ते, नगर और गाँव तय किए, वे बादशाहों, कवियों, खानों, न्‍यायाधीशों, व्‍यापारियों, ज्‍योतिषियों और साधारण लोगों के पास भी गए। जहाँ झूठ पहुँचता, वहाँ लोग इतमीनान और आजादी महसूस करते। वे हँसते हुए एक-दूसरे की आँखों में देखते, यद्यपि इसी वक्‍त एक-दूसरे को धोखा देते होते और उन्‍हें यह भी मालूम होता कि वे ऐसा कर रहे हैं। मगर फिर भी वे बेफिक्र और मस्‍त थे तथा उन्‍हें एक-दूसरे को धोखा देते और झूठ बोलते हुए जरा भी शर्म नहीं आती थी।
जब सच सामने आया, तो लोग उदास हो गए, उन्‍हें एक-दूसरे से नजरें मिलाते हुए झेंप होने लगी, उनकी नजरें झुक गईं। लोगों ने (सच के नाम पर) खंजर निकाल लिए, पीड़ित पीड़कों के विरुद्ध उठ खड़े हुए, गाहक व्‍यापारियों पर, साधारण लोग खानों पर और शाहों पर झपटे, पति ने पत्‍नी और उसके प्रेमी की हत्‍या कर डाली। खून बहने लगा। इसलिए अधिकतर लोगों ने झूठ से कहा -
'तुम हमें छोड़कर न जाओ। तुम हमारे सबसे अच्‍छे दोस्‍त हो। तुम्‍हारे साथ जीना बड़ा सीधा-सादा और आसान मामला है। और सच, तुम तो हमारे लिए सिर्फ परेशानी ही लाते हो। तुम्‍हारे आने पर हमें सोचना पड़ता है, हर चीज को दिल से महसूस करना, घुलना और संघर्ष करना होता है। तुम्‍हारी वजह से क्‍या कम जवान योद्धा, कवि और सूरमा मर चुके हैं?'
'अब बोलो,' झूठ ने सच से कहा, 'देख लिया न कि मेरी अधिक आवश्‍यकता है और मैं ही अधिक उपयोगी हूँ। कितने घरों का हमने चक्‍कर लगाया है और सभी जगह तुम्‍हारा नहीं, मेरा स्‍वागत हुआ है।'
'हाँ, हम बहुत-सी आबाद जगहों पर तो हो आए। आओ, अब चोटियों पर चलें। चलकर निर्मल जल के ठंडे चश्‍मों, ऊँची चरागाहों में खिलनेवाले फूलों, सदा चमकनेवाली बेदाग सफेद बर्फों से पूछें।
'शिखरों पर हजारों बरसों का जीवन है। वहाँ नायकों, वीरों, कवियों, बुद्धिमानों और संत-साधुओं के अमर और न्‍यायपूर्ण कृत्‍य, उनके विचार, गीत और अनुदेश जीवित रहते हैं। चोटियों पर वह रहता है, जो अमर है और पृथ्‍वी की तुच्‍छ चिंताओं से मुक्‍त है।'
'नहीं, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा,' झूठ ने जवाब दिया।
'तो तुम क्‍या ऊँचाई से डरते हो। सिर्फ कौवे ही निचाई पर घोंसले बनाते हैं और उकाब तो सबसे ऊँचे पहाड़ों के ऊपर उड़ान भरते हैं। क्‍या तुम उकाब के बजाय कौवा होना ज्‍यादा बेहतर समझते हो? हाँ, मुझे मालूम है कि तुम डरते हो। तुम तो हो ही बुजदिल। तुम तो शादी की मेज पर, जहाँ शराब की नदी बहती होती है, बहसना पसंद करते हो, मगर बाहर अहाते में जाते हुए डरते हो, जहाँ जामों की नहीं, खंजरों की खनक होती है।'
'नहीं, मैं तुम्‍हारी ऊँचाइयों से नहीं डरता। मगर मैं वहाँ करूँगा ही क्‍या, क्‍योंकि वहाँ लोग नहीं हैं। मेरा तो वहीं बोल-बाला है, जहाँ लोग रहते हैं। मैं तो उन्‍हीं पर राज करता हूँ। वे सब मेरी प्रजा हैं। केवल कुछ साहसी ही मेरा विरोध करने की हिम्‍मत करते हैं और तुम्‍हारे पथ पर, सचाई के पथ पर चलते हैं, मगर ऐसे लोग तो इने-गिने हैं।'
'हाँ, इने-गिने हैं। मगर इसीलिए इन लोगों को युग-नायक माना जाता है और कवि अपने सर्वश्रेष्‍ठ गीतों में उनका स्‍तुति-गान करते हैं।'
अकेले कवि का किस्‍सा। यह किस्‍सा मुझे अबूतालिब ने सुनाया। किसी खान की रियासत में बहुत-से कवि रहते थे। वे गाँव घूमते और अपने गीत गाते। उनमें से कोई वायलिन बजाता, कोई खंजड़ी, कोई चोंगूर और कोई जुरना। खान को जब अपने काम-काजों और बीवियों से फुरसत मिलती, तो वह शौक से उनके गीत सुनता।
एक दिन उसने एक ऐसा गीत सुना, जिसमें खान की क्रूरता, अन्‍याय और लालच का बखान किया गया था। खान आग-बबूला हो उठा। उसने हुक्‍म दिया कि ऐसा विद्रोह भरा गीत रचनेवाले कवि को पकड़कर उसके महल में लाया जाए।
गीतकार का पता नहीं लग सका। तब वजीरों और नौकरों-चाकरों को सभी कवि पकड़ लाने का आदेश दिया गया। खान के टुकड़खोर शिकारी कुत्‍तों की तरह सभी गाँवों, रास्‍तों, पहाड़ी, पगडंडियों और सुनसान दर्रों में जा पहुँचे। उन्‍होंने सभी गीत रचने और गानेवालों को पकड़ लिया और महल की काल-कोठरियों में लाकर बंद कर दिया। सुबह को खान सभी बंदी कवियों के पास जाकर बोला -
'अब तुममें से हरेक मुझे एक गीत गाकर सुनाए।'
सभी कवि बारी-बारी से खान की समझदारी, उसके उदार दिल, उसकी सुंदर बीवियों, उसकी ताकत, उसकी बड़ाई और ख्‍याति के गीत गाने लगे। उन्‍होंने यह गाया कि पृथ्‍वी पर ऐसा महान और न्‍यायपूर्ण खान कभी पैदा ही नहीं हुआ था।
खान एक के बाद एक कवि को छोड़ने का आदेश देता गया। आखिर तीन कवि रह गए, जिन्‍होंने कुछ भी नहीं गाया। उन तीनों को फिर से कोठरियों में बंद कर दिया गया और सभी ने यह सोचा कि खान उनके बारे में भूल गया है।
मगर तीन महीने बाद खान फिर से इन बंदी कवियों के पास आया।
'तो अब तुममें से हरेक मुझे कोई गीत सुनाए।'
उन तीनों कवियों में से एक फौरन खान, उसकी समझदारी, उदार दिल, सुंदर बीवियों, उसकी बड़ाई और ख्‍याति के बारे में गाने लगा। उसने यह भी गाया कि पृथ्‍वी पर कभी कोई ऐसा महान खान नहीं हुआ।
इस कवि को भी छोड़ दिया गया। उन दो को जो कुछ भी गाने को तैयार नहीं हुए, मैदान में पहले से तैयार किए गए अलाव के पास ले जाया गया।
'अभी तुम्‍हें आग की नजर कर दिया जाएगा,' खान ने कहा। 'आखिरी बार तुमसे यह कहता हूँ कि अपना कोई गीत सुनाओ।'
उन दो में से एक की हिम्‍मत टूट गई और उसने खान, उसकी अक्‍लमंदी, उदार दिल, सुंदर बीवियों, उसकी ताकत, बड़ाई और ख्‍याति के बारे में गीत गाना शुरू कर दिया। उसने गाया कि दुनिया में ऐसा महान और न्‍यायपूर्ण खान कभी नहीं हुआ।
इस कवि को भी छोड़ दिया गया। बस, एक वही जिद्दी बाकी रह गया, जो कुछ भी गाना नहीं चाहता था।
'उसे खंभे के साथ बाँधकर आग जला दो।' खान ने हुक्‍म दिया।
खंभे के साथ बँधा हुआ कवि अचानक खान की क्रूरता, अन्‍याय और लालच के बारे में वही गीत गाने लगा, जिससे यह सारा मामला शुरू हुआ था।
'जल्‍दी से इसे खोलकर आग से नीचे उतारो।' खान चिल्‍ला उठा। 'मैं अपने मुल्‍क के अकेले असली शायर से हाथ नहीं धोना चाहता।'
'ऐसे समझदार और नेकदिल खान तो शायद ही कहीं होंगे,' अबूतालिब ने यह किस्‍सा खत्‍म करते हुए कहा, 'मगर ऐसे कवि भी बहुत नहीं होंगे।'
पिता जी ने यह बात सुनाई। एक बार महान शामिल से घनिष्‍ठता रखनेवालों ने पूछा -
'इमाम, यह बताइए कि आपने कविताएँ रचने और उन्‍हें गाने की क्‍यों मनाही कर दी?'
इमाम ने जवाब दिया -
'मैं चाहता हूँ कि केवल असली कवि ही कवि रह जाएँ। असली शायर तो फिर भी शायरी करेंगे ही। मगर ढोंगी, पाखंडी, तुकबंद और झूठमूठ अपने को कवि कहनेवाले मेरे हुक्‍म से डर जाएँगे, उनकी हिम्‍मत टूट जाएगी और वे खामोश हो जाएँगे। इस तरह वे लोगों को और खुद अपने को धोखा नहीं दे सकेंगे।'
कहते हैं कि जब महान कवि महमूद की मृत्‍यु हो गई, तो दुख-सागर में बुरी तरह डूबे हुए उनके पिता ने महमूद की पांडुलिपियों से भरा सूटकेस उठाकर आग में डाल दिया।
'लानत के मारे कागजो, जल जाओ। तुम्‍हारे कारण ही मेरे बेटे की वक्‍त से पहले मौत हो गई।'
सभी कागज जल गए, मगर महमूद की कविताएँ फिर भी जिंदा रह गईं। उनके रचे हुए गीतों की एक भी पंक्ति नहीं भुलाई गई। वे गीत लोगों के दिलों में जी रहे हैं। उन्‍हें न तो आग जला सकती है, न पानी गला सकता है, क्‍योंकि उनमें कवि की आत्‍मा की आवाज है।
मेरे पिता जी उन लोगों पर हँसा करते थे, जो इस डर से कि उन्‍हें किसी की बुरी नजर न लग जाए, रात को चोरी-छिपे सफर पर निकलते थे;
उन पर भी, जो खुरजी में इसलिए पत्‍थर भर लिया करते थे कि दूसरे यह समझें कि उसमें रोटी भरी है;
उन शिकारियों पर भी, जो तीतर की जगह कौवा लेकर घर लौटते थे।
अबूतालिब ने यह बात सुनाई। कहीं कोई गरीब आदमी रहता था, जिसे अपने को अमीर दिखाने का चाव चढ़ा। हर दिन वह बहुत खुश-खुश और मुस्‍कराता हुआ चौपाल में आता और उसकी मूँछें चिकनाई से चमकती होतीं मानो वह अभी-अभी जवान और बढ़िया भेंड़ खाकर आया हो। गरीब आदमी सबको सुनाकर डींग मारता -
'अहा, कैसा मोटा मेमना मैंने आज खाने के लिए काटा। कितना नर्म और मजेदार था उसका मांस।'
'हर दिन उसके पास मेमना कहाँ से आ जाता है?' गाँव के लोग हैरान होते। 'मामले की जाँच करनी चाहिए।'
'हर दिन उसके पास मेमना कहाँ से आ जाता है?' गाँव के लोग हैरान होते। 'मामले की जाँच करनी चाहिए।'
चुस्‍त नौजवान उसके घर की छत पर चढ़ गए और चौड़े धुआँदान में से उन्‍होंने नीचे नजर दौड़ाई। उन्‍होंने गरीब आदमी को पुरानी, फेंकी हुई हड्डी उबालते देखा। उसने ऊपर आ जानेवाली थोड़ी-सी चर्बी इकट्ठी की और उससे मूँछें चिकनी कर लीं। इसके बाद उसने थोड़ा-सा सफेद जीरा खा लिया। उसके घर में खाने के लिए बस यही था।
नौजवान झटपट छत पर से नीचे उतरे और गरीब आदमी के घर में गए।
'सलाम अलैकुम। हम लोग इधर से गुजर रहे थे। सोचा कि अमीर आदमी के यहाँ चलें।'
'जरा देर से आए, मैंने अभी-अभी मोटी भेंड़ खत्‍म की है। अब घर से बाहर जाने ही वाला था।'
'तो तुम यही बताओ कि ऐसा खुशबूदार और मजेदार जीरा कहाँ से लाते हो?'
गरीब समझ गया कि नौजवानों को सब कुछ मालूम है और उसका सिर झुक गया। इसके बाद उसकी मूँछों पर कभी चिकनाई नजर नहीं आई।
संस्‍मरण। बचपन में पिता जी ने एक बार मुझे बहुत ही कड़ी सजा दी थी। पिटाई तो मैं भूल गया, मगर पिटाई का कारण मुझे अभी तक बहुत अच्‍छी तरह याद है।
एक दिन सुबह को मैं स्‍कूल जाने के लिए घर से निकला, मगर स्‍कूल गया नहीं। एक गली से दूसरी गली में मुड़ गया और शाम तक आवारा लड़कों के साथ जुआ खेलता रहा। पिता जी ने किताबें खरीदने के लिए मुझे कुछ पैसे दिए थे और उन्‍हीं के साथ मैं दुनिया की सुध-बुध भूलकर दाँव लगाता रहा। पैसे जल्‍द ही खत्‍म हो गए। अब मुझे यह फिक्र हुई कि और पैसे कहाँ से हासिल किए जाएँ। हम जब जुआ खेलते हैं और आखिरी कौड़ी तक हार जाते हैं, तो हमें ऐसा लगता है कि अगर कहीं से पाँच कोपेक का एक सिक्‍का और हाथ लग जाए, तो न सिर्फ हारे हुए पैसे ही वापस आ जाएँगे, बल्कि कुछ और भी जीत लेंगे। मुझे भी ऐसा ही लगा कि अगर कहीं से कुछ पैसे और मिल जाएँ, तो हारे हुए पैसे वापस आ जाएँगे।
मैं जिन लड़कों के साथ खेल रहा था, उनसे उधार माँगने लगा। मगर कोई भी ऐसा करने को राजी नहीं हुआ। बात यह है कि जुआरियों में ऐसा माना जाता है कि जो कोई हारनेवाले को उधार देता है, वह खुद हार जाता है।
तब मैंने एक तरकीब निकाली। मैं गाँव में घर-घर जाने और यह कहने लगा कि कल यहाँ पहलवान आएँगे और मुझे उनके लिए पैसे जमा करने का काम सौंपा गया है।
दर-दर जानेवाले भूखे कुत्‍ते को क्‍या मिलता है? या तो हड्डी या डंडे की मार। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ - कुछ ने इनकार कर दिया, कुछ ने कुछ दे दिया। हाँ, जिन्‍होंने कुछ दिया, वह भी शायद मेरे पिता के नाम की इज्‍जत करते हुए।
गाँव का चक्‍कर लगाने के बाद मैंने पैसे गिने, तो इस नतीजे पर पहुँचा कि जुआ जारी रखा जा सकता है। मगर किस्‍मत के मारे ये पैसे भी जल्‍दी ही खत्‍म हो गए। यह खेल जमीन पर घुटनों के बल रेंगकर खेला जाता था। दिन भर में मेरा पतलून बिल्‍कुल फट गया और घुटनों पर खरोंचें आ गईं।
इसी बीच घर पर मेरी फिक्र हुई। बड़े भाई मुझे सारे गाँव में ढूँढ़ने लगे।
गाँववाले, जिन्‍हें मैंने पहलवानों के आने की मनगढ़ंत बात कही थी, उनके आगमन के बारे में विस्‍तारपूर्वक जानने के लिए हमारे घर पहुँचने लगे। मतलब यह कि जब कान से पकड़कर मुझे घर लाया गया, तो मेरी करतूतों का पूरा पता चल चुका था।
तो मैं पिता जी की अदालत में खड़ा था। उनकी इस अदालत से ही मैं दुनिया में सबसे ज्‍यादा डरता था। पिता जी ने सिर से पाँव तक मुझे बहुत गौर से देखा। मेरे नंगे, सूजे हुए लाल घुटने सूराखों में से ऐसे झाँक रहे थे जैसे पंखों से भरे हुए तकिए, जिन्‍हें पहाड़ी घरों की खिड़कियों में खोंस दिया जाता है, झाँकते दिखाई देते हैं।
'यह क्‍या है?' पिता जी ने मानो शांति से पूछा।
'घुटने हैं,' फटे पतलून के सूराखों को हाथों से छिपाने की कोशिश करते हुए मैंने जवाब दिया।
'घुटने हैं, यह मैं भी जानता हूँ, मगर वे उघाड़े क्‍यों हैं? यह बताओ कि पतलून कहाँ फाड़ा?'
मैं अपने पतलून को ऐसे देखने लगा मानो अभी मैंने उनमें सूराख देखे हों। अजीब मनोदशा होती है झूठे और कायर की। वह समझता है कि बड़ों को सब कुछ मालूम है और हकीकत से इनकार करना महज अपना मजाक उड़वाना है और इससे कोई फायदा नहीं होगा, मगर फिर भी वह साफ-साफ और सच्‍चे जवाब देने से कतराता है और अपने मन से तरह-तरह की बातें बनाता है।
पिता जी की आवाज में गुस्‍सा झलकने लगा। परिवार के लोग घर के मुखिया का मिजाज समझते थे और इसलिए मेरी रक्षा को मेरे आस-पास आ गए। मगर पिता जी ने उन सब को दूर हटने के लिए हाथ का इशारा किया और फिर मुझसे पूछा -
'तो तुमने पतलून कैसे फाड़ा?'
'स्‍कूल में फट गया... कील में उलझकर...'
'कैसे, कैसे, जरा दोहराओ तो...'
'कील में उलझकर।'
'किस जगह?'
'स्‍कूल में।'
'कब?'
'आज।'
पिताजी का तमाचा जोर से मेरे गाल पर पड़ा।
'अब बताओ कि पतलून कैसे फटा?'
मैं चुप रहा। पिता जी ने दूसरे गाल पर एक और तमाचा मारा।
'अब बताओ।'
मैं रो पड़ा।
'रोना बंद करो।' पिता जी ने आदेश दिया और कोड़ा उठा लिया।
मैंने रोना बंद कर दिया। पिता जी ने कोड़ा सटकारा।
'अगर अभी सब कुछ सच-सच नहीं बता दोगे, तो कोड़े से पिटाई करूँगा।'
मैं जाता था कि सिरे पर सख्‍त गाँठवाला यह कोड़ा क्‍या मुसीबत है। कोड़े के डर ने सच के डर पर बाजी मार ली और मैंने अपनी दिन भर की सारी हरकतें सिलसिलेवार कह सुनाईं।
मुकदमे की कार्रवाई खत्‍म हो गई। तीन दिन तक मैं बहुत परेशान रहा। घर और स्‍कूल का जीवन तो जैसे अपने आम ढंग से ही चलता रहा, मगर मेरे मन को चैन नहीं था। मैं जानता था कि अभी पिता जी से एक बार फिर बातचीत होगी। इतना ही नहीं, अब मैं खुद इस बातचीत के लिए बड़ा उत्‍सुक था, इसकी प्रतीक्षा में था। इन दिनों में मेरे लिए सबसे अधिक यातना की बात तो यह थी कि पिता जी मेरे साथ बातचीत नहीं करना चाहते।
तीसरे दिन मुझसे कहा गया कि पिता जी ने बुलाया है। उन्‍होंने मुझे अपने पास बैठाया, सिर पर हाथ फेरा, यह पूछा कि स्‍कूल में हम आजकल क्‍या पढ़ रहे हैं, मुझे कैसे अंक मिल रहे हैं। इसके बाद अचानक यह सवाल किया -
'जानते हो कि मैंने किसलिए तुम्‍हारी पिटाई की थी?'
'हाँ, जानता हूँ।'
'जरा सुनूँ तो कि तुम क्‍या समझते हो?'
'इसलिए कि मैंने जुआ खेला था।'
'नहीं, इसके लिए नहीं। बचपन में कौन जुआ नहीं खेलता? मैंने भी खेला और तुम्‍हारे बड़े भाइयों ने भी।'
इसलिए कि पतलून फाड़ डाला।'
'नहीं, इसके लिए भी नहीं, बचपन में हममें से किसने पतलून या कमीजें नहीं फाड़ी? इतनी ही गनीमत है कि सिर सलामत हैं। तुम कोई लड़की तो हो नहीं कि नाक की सीध में आओ-जाओ।'
'इसलिए कि स्‍कूल नहीं गया।'
'हाँ, यह तुम्‍हारी बहुत बड़ी गलती थी। इसी से उस दिन तुम्‍हारी सारी मुसीबतें शुरू हुईं। इसके लिए और इसी तरह पतलून फाड़ने तथा जुआ खेलने के लिए तुम्‍हारी डाँट-डपट होनी चाहिए थी। ज्‍यादा से ज्‍यादा मैंने तुम्‍हारे कान ऐंठे होते। मेरे बेटे, मैंने तुम्‍हारे झूठ के लिए ही तुम्‍हारी पिटाई की। झूठ - यह भूल नहीं, संयोग से होनेवाली बात नहीं, यह हमारे चरित्र का एक लक्षण है, जो जड़ जमा सकता है। यह तुम्‍हारी आत्‍मा के खेत में भयानक जंगली घास है। अगर उसे वक्‍त पर न उखाड़ फेंका जाए, तो वह सारे खेत में फैल जाएगी और अच्‍छे बीज के फूट निकलने की कहीं भी जगह नहीं बचेगी। झूठ से ज्‍यादा खतरनाक और कोई चीज इस दुनिया में नहीं है। इससे पिंड छुड़ाना मुमकिन नहीं होता। अगर तुम एक बार फिर मुझसे झूठ बोलोगे, तो मैं तुम्‍हें मार डालूँगा। इस घड़ी से तुम हमेशा सिर्फ सच ही बोलोगे। टेढ़े नाल को तुम टेढ़ा नाल, घड़े के टेढ़े हत्‍थे को टेढ़ा हत्‍था और टेढ़े वृक्ष को टेढ़ा वृक्ष ही कहोगे। समझ गए?'
'समझ गया।'
'तो जाओ।'
मैं वहाँ से चल दिया और मैंने मन ही मन कभी भी झूठ न बोलने की कसम खाई। इसके अलावा मैं यह भी तो जानता था कि अगर मैंने फिर से झूठ बोला, तो पिता जी अपने कहे हुए शब्‍दों को सच कर दिखाएँगे और चाहे मुझे कितना ही अधिक प्‍यार क्‍यों न करते हों, वे मुझे मार डालेंगे।
बहुत सालों बाद मैंने अपने एक दोस्‍त को यह घटना सुनाई।
'अरे?' मेरे दोस्‍त ने हैरान होकर कहा, 'तुम अभी तक अपने उस छोटे-से, उस तुच्‍छ झूठ को नहीं भूले?'
मैंने जवाब दिया -
'झूठ, झूठ है और सच, सच। वे छोटे-बड़े नहीं हो सकते। जीवन, जीवन है, मौत, मौत। जब मौत आती है, तो जिंदगी खत्‍म हो जाती है। इसके उलट, जब तक जिंदगी की गर्मी बनी रहती है, तब तक मौत नहीं आती। वे साथ-साथ नहीं रह सकतीं। एक दूसरी का अंत कर देती है। सच और झूठ के बारे में भी ऐसा ही है।'
झूठ - यह है शर्म की बात, यह है गंदगी और कूड़ा-करकट। सच - यह है सुंदरता, स्‍वच्‍छता और निर्मल आकश। झूठ-कायरता है, सच - साहस है। या तो सच है या झूठ और इन दोनों के बीच की कोई चीज नहीं हो सकती।
अब जिस वक्‍त मुझे झूठे लेखकों की झूठी रचनाएँ पढ़नी पड़ती हैं, तो मुझे पिता जी के कोड़े की बहुत याद आती है। कितनी सख्‍त जरूरत है उसकी। कितनी सख्‍त जरूरत है कठोर और न्‍यायपूर्ण पिता की, जो सही वक्‍त पर यह धमकी दे सके - 'अगर झूठ बोलेागे, तो मार डालूँगा।' मगर हे अल्‍लाह, कितना झूठ बोला जाता है आजकल और उसकी सजा भी कोई नहीं।
काश झूठ ही सजा पाए बिना रहता। क्‍या सच के लिए लोगों को दंड नहीं मिलता? क्‍या इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी है, जब लोगों को सच के लिए सजा दी गई, जब सच के लिए उन पर कोड़े बरसाए गए?
बचपन में मुझे सच से इनकार करने के लिए बहुत साहस की जरूरत महसूस होती थी। कारण कि उससे इनकार करने पर राहत मिलने के बजाय सबसे भयानक यातना यानी आत्‍मा की भर्त्‍सना का सामना करना पड़ता है।
साहसी लोग अपनी आस्‍थाओं को कभी नहीं बदलते। उन्‍हें मालूम है कि पृथ्‍वी घूमती है। उन्‍हें मालूम है कि सूरज पृथ्‍वी के गिर्द नहीं, बल्कि पृथ्‍वी सूर्य के गिर्द घूमती है। उन्‍हें मालूम है कि रात के बाद जरूर सुबह होती है, फिर दिन निकलता है और दिन के बाद रात आती है... जाड़े के बाद वसंत आता है और वसंत के बाद प्‍यारी गर्मी...
और कुछ ऐसा ही होता है कि आखिर आत्‍मा का कोड़ा, प्रतिष्‍ठा का कोड़ा, सच का कोड़ा झूठों और ढोंगियों को चित कर देता है और झूठ कभी भी सच पर विजयी नहीं हो पाता।
गाँव के चौपाल में हुई बातचीत से।
'सच और झूठ के बीच कितना फासला है?'
'दो इंच का।'
'वह क्‍यों?'
'क्‍योंकि कान से आँख तक भी दो इंच का ही फासला है। जो कुछ अपनी आँखों से देखा गया है, वह सच है, और जो कुछ कानों से सुना गया है, झूठ है।'
खैर, ऐसा ही सही। इसमें कोई संदेह नहीं कि सौ बार सुनने के बजाय एक बार देख लेना ज्‍यादा अच्‍छा होता है। मगर लेखक को तो हर चीज से सचाई ग्रहण करनी चाहिए - उससे भी जो देखे, उससे भी जो सुने, जो पढ़े और जो स्‍वयं जिये।
क्‍या लेखक के लिए सिर्फ आँखों पर भरोसा करना ही काफी होगा? जिंदगी को देखता है वह अपनी आँखों से, मगर संगीत सुनता है कानों से और अपने देश के इतिहास को पढ़ता है। कुछ लेखक तो न आँखों और न कानों को, बल्कि अपनी सूँघने की शक्ति को ही प्रथम स्‍थान प्रदान करते हैं।
लेखक को सभी तरह के काम करने लायक मजबूत हाथों, मजबूत टाँगों और मजबूत दाँतों की जरूरत होती है। इसलिए कि वह जो कुछ देखता है, सुनता और पढ़ता है, उस सब में हमेशा झूठ-सच, सोने और दूसरी चमकीली सस्‍ती धातुओं, अनाज और भूसे का अंतर कर सके, उसे अक्‍ल और ज्ञान की भी जरूरत होती है। अक्‍ल और ज्ञान के बिना आदमी अपनी आँखों पर भी भरोसा नहीं कर सकता।
किसी पहाड़ी गाँव के अबोध लोगों को, जिन्‍होंने सोने को कभी देखा नहीं था, मगर उसके बारे में सुना बहुत था, एक भारी संदूक कहीं पड़ा मिल गया। उन्‍होंने सोचा - 'चूँकि भारी है, इसलिए जरूर सोने का है।' हाथ आये इस माल के लिए वे आपस में भिड़ गए और उन्‍होंने एक-दूसरे की जान ले ली। मगर संदूक तो ताँबे का था।
प्रतिभा - आग है। मगर किसी मूर्ख के हाथ में आग सब कुछ जलाकर राख कर सकती है। अक्‍ल ही उसे रास्‍ता दिखाती है। अक्‍ल तो खूबसूरती को भी उसी तरह काबू में करती है जैसे अनुभवी घुड़सवार तेज घोड़े को।
दो पहाड़ी आदमियों से पूछा गया : तुम क्‍या चाहते हो - जवान आदमी का खूबसूरत चेहरा या बूढ़े की समझदारी?
बुद्धू ने खूबसूरत चेहरा चुना, मगर बेवकूफ ही बना रहा। खूबसूरत बेवकूफ को उसकी बीवी छोड़कर चली गई। अक्‍लमंद ने समझ चुनी और समझदारी की बदौलत उसकी बीवी उसके पास ही बनी रही। एक लोक-कथा में भी यही बताया गया है कि समुद्री घोड़े के जीन पर सुंदरी को वही सवार कर पाया था, जिसने अपने लिए अक्‍ल को चुना था। एक अन्‍य लोक-कथा में तीन भाइयों, तीन राहों और तीन बुद्धिमत्‍तापूर्ण नसीहतों का जिक्र आता है। जिसने इन नसीहतों पर कान दिया, वह तो अपनी घर लौट आया और जिसने इनकी परवाह नहीं की, वह पराई धरती पर ही ढेर होकर रह गया। ओ मेरी वरदायिनी सुनहरी मछली, मुझे प्रतिभा दो, लगन दो, जवान का सच्‍चा और उत्‍साही दिल दो और बुजुर्ग की सुलझी हुई अक्‍ल दो। सही रास्‍ता चुनने में मेरी मदद करो।
यह रास्‍ता बेशक कंकड़ों-पत्‍थरोंवाला हो, मुश्किल और खतरनाक हो। मगर मैं उस पर साँप की भाँति दाएँ-बाएँ बल नहीं खाना चाहता। 'साँप टेढ़े-मेढ़े क्‍यों होते हैं?' पहाड़ी लोग यह सवाल करते हैं और खुद ही जवाब देते हैं - 'क्‍योंकि वे सूराख और खड्ड टेढ़े-मेढ़े होते हैं, जिनमें से उन्‍हें रेंगना पड़ता है।' मगर मैं तो साँप नहीं, आदमी हूँ। मुझे ऊँचाई, स्‍वच्‍छ हवा और सीधे रास्‍ते पसंद हैं।
मुझे बीमारी और भय, बोझिल ख्‍याति और हल्‍के-सतही विचारों से बचाओ।
मुझे नशे से बचाओ, क्‍योंकि नशे में आदमी को हर अच्‍छी चीज सौ गुना बुरी लगती है।
मुझे सूफी होने से भी बचाओ, क्‍योंकि सूफी को हर बुरी चीज सौ गुना ज्‍यादा बुरी लगती है।
सचाई के लिए मुझमें ऐसी भावना पैदा करो कि मैं टेढ़े को टेढ़ा और सीधे को सीधा कह सकूँ।
'बड़ी बुरी है, बड़ी बेतुकी है यह दुनिया,'
इतना कहकर ऊबे कवि ने, छोड़ा जग, संसार,
'बड़ी सुहानी, बेहद सुंदर है यह दुनिया,'
कहा दूसरे कवि ने इतना, जग से गया सिधार।
मगर तीसरे कवि ने दुनिया ऐसे छोड़ी
मौत न जिस पर विजयी होती, समय न करता वार,
बुरा बुरे को, सुंदर को सुंदर कहता था
इसीलिए तो सदा अमर वह, यही अमरता-सार।
किसी पहाड़ी आदमी ने अपनी गाय के कानों में झुमके डाल दिए ताकि पराई गउओं से उसका भेद हो सके। किसी पहाड़ी आदमी ने अपने घोड़े की गर्दन में घंटियाँ डाल दीं ताकि पड़ोसी के घोड़ों के साथ अपने घोड़े को न गड़बड़ाए। मगर वह जीगित तो किसी भी काम का नहीं, जो रात के वक्‍त भी अपने प्‍यारे घोड़े को दूर से ही न पहचान ले।
मेरी किताब आपके सामने है। मैं इसे न तो झुमके पहनाना चाहता हूँ, न घंटियाँ और न कोई दूसरे गहने ही। अपनी या पराई अन्‍य किताबों के साथ मैं इसे नहीं गड़बड़ाऊँगा। ऐसे ही लोग भी न गड़बड़ाएँ। चाहे इस किताब का मुखावरण फटा हुआ हो, फिर भी जो कोई इसे पढ़े, फौरन यह कह दे कि इसे त्‍सादा गाँव के हमजात के बेटे रसूल ने लिखा है।
कहते हैं कि साहस यह नहीं पूछता कि चट्टान कितनी ऊँची है।



Friday, 8 August 2014

मैं नास्तिक क्यों हूँ? : भगतसिंह

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।
स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।
एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?
मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।
मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।
इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।
मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?
आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।
यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?
तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।
और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।
मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।
मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।
[ Date Written: 1931 Author: Bhagat Singh Title: Why I Am An Atheist (Main nastik kyon hoon)   First Published: Baba Randhir Singh, a freedom fighter, was in Lahore Central Jail in 1930-31. He was a God-fearing religious man. It pained him to learn that Bhagat Singh was a non-believer. He somehow managed to see Bhagat Singh in the condemned cell and tried to convince him about the existence of God, but failed. Baba lost his temper and said tauntingly: “You are giddy with fame and have developed and ago which is standing like a black curtain between you and the God.” It was in reply to that remark that Bhagat Singh wrote this article. First appeared in The People, Lahore on September 27, 1931. भगतसिंह ]