शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Sunday, 16 August 2015
जयप्रकाश त्रिपाठी
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इस क्रूर-अबूझ कोलाहल में मन कैसे-कैसे रंग ओढ़ने लगता है..... ऊंची-ऊंची लहरों से ढंके गहरे-गहरे समुद्र, ऊपर-और-ऊर बिछा-बिछा सा अंतहीन आक...
Monday, 3 August 2015
मेरी पुस्तक 'मीडिया हूं मैं' को उ.प्र.हिंदी संस्थान का 'बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार'
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उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से आज वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तकों पर सम्मान एवं पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई। इसके अंतर्गत संस्थान न...
2 comments:
Friday, 10 July 2015
सफर
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आओ, कोई ऐसी चाल चलें कि चलते जाएं राहें थमें नहीं, उस ओर, जहां तक जाना हो....
सच्चाई
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जिसने भी सुना, दांतों तले उंगली दबा ली, वो कह रहे हैं, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा...
प्यार
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सच्चा है मेरा प्यार तो सच बोलता हूं मैं सच्चाइयां उनको बुरा लगें तो क्या करूं
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रोने के वक्त हंसी आ गई, खुद को जोकर बना लिया चेहरे से नूरानी, फूल-फूल, मन को पत्थर बना लिया
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अब तो सारे घाव पुराने हो गए, रिश्ते सब जाने-पहचाने खो गए, बेगाने-बेगाने से दिन बचे रहे जाने हम कैसे अनजाने हो गए।
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