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शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Thursday, 5 February 2015

मेरी पाठशाला (12) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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'नसीब सिंह, नसीब सिंह कहाँ जा रिये हो, जरा दम तो ले लो, जहाँ जा रिये हो...' अजित वडनेरकर 'राग भोपाली' और ‘शब्दों का सफर’ ...
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मेरी पाठशाला (11) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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हिंदी के जाने-माने व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की ज्यादातर रचनाएं 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' के जमाने से पढ़ी-सराही जा...

आ रहा है दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला 2015

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Wednesday, 4 February 2015

मेरी पाठशाला (दस) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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कोई ऐसा कहे कि 'मैं इस दुनिया को चिड़िया की आँख से देखना चाहती हूँ...' या कुछ यूं कि - 'जाने क्यों महँगी चप्पलें गिरतीं नहीं ...
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Tuesday, 3 February 2015

मेरी पाठशाला (नौ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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बहुत चुपचाप पांवों से चला आता है कोई दुख पलकें छूने के लिए, सीने के भीतर आने वाले कुछ अकेले दिनों तक पैठ जाने के लिए, मैं अकेला थका-हार...
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मेरी पाठशाला (आठ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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''वैसे तो यह संसार ही एक बहुत बड़ी चूहेदानी है। इसमें मनुष्य रूपी चूहा यदि एक बार फँस जाए तो परमपिता परमात्मा की इच्छा के बिना इ...
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मेरी पाठशाला-सात : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

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कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल की ये पंक्तियां बार बार पढ़ने का मन करता है - '' मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते...
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