शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Tuesday, 3 February 2015
मेरी पाठशाला (नौ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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बहुत चुपचाप पांवों से चला आता है कोई दुख पलकें छूने के लिए, सीने के भीतर आने वाले कुछ अकेले दिनों तक पैठ जाने के लिए, मैं अकेला थका-हार...
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मेरी पाठशाला (आठ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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''वैसे तो यह संसार ही एक बहुत बड़ी चूहेदानी है। इसमें मनुष्य रूपी चूहा यदि एक बार फँस जाए तो परमपिता परमात्मा की इच्छा के बिना इ...
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मेरी पाठशाला-सात : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल की ये पंक्तियां बार बार पढ़ने का मन करता है - '' मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते...
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Monday, 2 February 2015
मेरी पाठशाला-छह : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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बोधिसत्व को पढ़ना, जैसे पंक्ति-पंक्ति पर जीवन-जगत की वास्तविक्ताओं और अपने-जैसे अनुभवों से बार-बार गुजरना। उनकी विधा है कविता। उनकी प्रम...
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Sunday, 1 February 2015
मेरी पाठशाला पांच : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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हिंदी अकादमी, दिल्ली और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सम्मानित, स्वभाव से अत्यंत सहज रूपसिंह चंदेल मेरे जनपद के गांव नौगवाँ से हैं। दिल्ल...
मेरी पाठशाला चार : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं
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आज-दिन जबकि रात-रात भर नींद नहीं आती, आंखें खुली-खुली, जाने अंधे कमरे के आरपार क्या ढूंढती रहती हैं, तब.....''अच्छे बच्चे, आधा चा...
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मेरी पाठशाला तीन : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं
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''रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे दूध बिलोने से पहले, मां चक्की पीसती, और मैं घुमेड़े में आराम से सोता...'' रमेश शर्मा उर्फ दिवि...
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