शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Monday, 2 February 2015
मेरी पाठशाला-छह : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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बोधिसत्व को पढ़ना, जैसे पंक्ति-पंक्ति पर जीवन-जगत की वास्तविक्ताओं और अपने-जैसे अनुभवों से बार-बार गुजरना। उनकी विधा है कविता। उनकी प्रम...
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Sunday, 1 February 2015
मेरी पाठशाला पांच : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं
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हिंदी अकादमी, दिल्ली और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सम्मानित, स्वभाव से अत्यंत सहज रूपसिंह चंदेल मेरे जनपद के गांव नौगवाँ से हैं। दिल्ल...
मेरी पाठशाला चार : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं
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आज-दिन जबकि रात-रात भर नींद नहीं आती, आंखें खुली-खुली, जाने अंधे कमरे के आरपार क्या ढूंढती रहती हैं, तब.....''अच्छे बच्चे, आधा चा...
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मेरी पाठशाला तीन : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं
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''रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे दूध बिलोने से पहले, मां चक्की पीसती, और मैं घुमेड़े में आराम से सोता...'' रमेश शर्मा उर्फ दिवि...
Saturday, 31 January 2015
मेरी पाठशाला दो : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं
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मँजी हुई शर्म का जनतंत्र, आलोचना : साहित्य, समाज और जनतंत्र, बाजारवाद और जनतंत्र, आजादी और राष्ट्रीयता का मतलब, छूटे हुए क्षण, बुधराम,...
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मेरी पाठशाला एक : जिनको पढ़ता रहता हूं
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एक है दुनिया रंग-विरंगी, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल की। जैसा लिखते हैं, बोल-चाल में भी उतने ही स्वादिष्ट। फेसबुक पर तो प्रतिदिन रहते ही है...
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Thursday, 29 January 2015
मित्रों के लिए कुछ ताजा पंक्तियां/जयप्रकाश त्रिपाठी
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कितना अपना, वो रोजी-रोटी का मारा, लगता है क्यों थका-थका सा, हारा-हारा फिर भी अपनी लोहे की मुट्ठी तक तना हुआ.......... रुका नहीं, मन दु...
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