शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Monday, 22 December 2014
मैंने मलाला को उड़ने दिया, पर नहीं काटे / जियाउद्दीन युसुफजई
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पितृसत्तात्मक समाजों और आदिवासी समाजों में आमतौर पर पिता को बेटों से जाना जाता है। लेकिन मैं उन कुछ पिताओं में से हूं, जो अपनी बेटी से जा...
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अमेरिकी कवि वाल्ट ह्विटमैन / अनुवाद लाल्टू
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मैं देह का कवि हूँ और मैं आत्मा का कवि हूँ, स्वर्ग के सुख मेरे पास हैं और नर्क की पीड़ाएँ मेरे साथ हैं, सुखों को मैं बुनता हूँ और उन्हें ...
बुत हमको कहें काफ़िर / प्रियंवद
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कुछ दिन पहले हलीम मुस्लिम कॉलेज से 'दास्तान' पर शम्सुर्रहमान फ़ारूकी साहब का व्याख्यान सुन कर निकला तो मन उदास था। इससे पहले की शा...
पी साईंनाथ ने बनाया गांवों का अजायबघर / रवीश कुमार
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एक सुखद बदलाव ने दस्तक दी है और हम आप हैं कि आहट से बेख़बर हैं। बहुत से पत्रकार पेशे से निराश होकर कंपनियों के प्रवक्ता बन गए, नेताओं के ...
बट, 'पीके' इज नाट भेस्ट ऑफ़ टाइम / उमेश पंत
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हाल ही में आई फिल्म ऐक्शन-जैक्शन या फिर सिंघम सरीखी फिल्मों से तुलना करेंगे तो फिल्म निसंदेह अलग दर्जे़ की है। फिल्म जो सन्देश देती है वो...
फिल्मकारों और मीडिया की सोच पर सवाल / विष्णुगुप्त
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‘हैदर’ फिल्म पर भारतीय सेना आगबबुला है। भारतीय सेना ने केन्द्रीय सरकार को एक प्रस्ताव भेज कर फिल्मों व मीडिया में सेना व कश्मीर को लेकर...
Saturday, 20 December 2014
सड़क छाप सुबह / जयप्रकाश त्रिपाठी
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रविवार तड़के पांच की सुबह, कोहरे के संग नंगनाच की सुबह, उधर अलाव, ऊनी रजाई, सूरज, कैसे सुलगे सड़क छाप की सुबह !
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