शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Friday, 24 October 2014
धन-मीडिया का जंगल में मंगल
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(रायपुर में कंजरवेशन कोर फिल्म फेस्टिवल में सुदीप ठाकुर का व्याख्यान) जंगलों को निवेश का जरिया बनाने में मीडिया की भी बड़ा भूमिका है. क...
‘उल्लू’ बना रहे टीवी विज्ञापन / कुलदीप भावसार
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नीचे दिए गए चार उदाहरण बानगी हैं, टीवी पर दिखाए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों और उनसे होने वाले दुष्प्रभावों के। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने हाल...
Wednesday, 22 October 2014
दो शहीदों की याद
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(क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी और अशफाक उल्ला खान का जन्मदिन (22 और 26 अक्टूबर) गणेश शंकर विद्यार्थी : देश की स्वाधीनता ...
क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के जन्मदिवस (26 अक्टूबर) के अवसर पर
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देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में खि़लाफ़त, मु...
Tuesday, 21 October 2014
कटघरे में कैलाश सत्यार्थी / अजय प्रकाश
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वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे. उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्...
दिवाली का अंधेरा / जयप्रकाश त्रिपाठी
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प्रकाशपर्व से सजेधजे बाजार, विज्ञापनों से अघाये अखबार और चैनल, छोटे-बड़े पर्दे पर धारावाहिकों और फिल्मों के धूम-धड़ाके, महानगरों में सिता...
Monday, 20 October 2014
दीपावली और मेरी 'नानी मां' / जयप्रकाश त्रिपाठी
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दिवाली का दिन। जैसे आंखों के दो दीये तेल-घी नहीं, आंसुओं से डबडबाये हुए। हर साल, हर बार। जब भी आता है ये त्योहार। मेरे अभावग्रस्त बचपन के...
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