शब्द

शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Tuesday, 21 October 2014

कटघरे में कैलाश सत्यार्थी / अजय प्रकाश

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वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे. उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्...

दिवाली का अंधेरा / जयप्रकाश त्रिपाठी

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प्रकाशपर्व से सजेधजे बाजार, विज्ञापनों से अघाये अखबार और चैनल, छोटे-बड़े पर्दे पर धारावाहिकों और फिल्मों के धूम-धड़ाके, महानगरों में सिता...
Monday, 20 October 2014

दीपावली और मेरी 'नानी मां' / जयप्रकाश त्रिपाठी

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दिवाली का दिन। जैसे आंखों के दो दीये तेल-घी नहीं, आंसुओं से डबडबाये हुए। हर साल, हर बार। जब भी आता है ये त्योहार। मेरे अभावग्रस्त बचपन के...

जी हाँ, मैं लिखता हूँ... दुख पर काबू पाने के लिए / प्रफुल्ल कोलख्यान

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बहुत ही संक्षेप और संकेत में कहना चाहता हूँ कि मैं दुख पर काबू पाने के लिए लिखता हूँ। दुख चारो तरफ पसरा है। मेरा जन्म न तो महानता की किसी...

आध्यात्मिक पागलों का मिशन / हरिशंकर परसाई

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भारत के सामने अब एक बड़ा सवाल है - अमेरिका को अब क्या भेजे? कामशास्त्र वे पढ़ चुके, योगी भी देख चुके। संत देख चुके। साधु देख चुके। गाँजा ...
Sunday, 19 October 2014

....और सारू को मिल गई मां

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पांच साल का एक भारतीय लड़का 25 साल पहले अपनी मां से बिछड़ गया था। लेकिन उपग्रह से ली गई तस्वीरों के जरिए उसने अपनी मां को खोज लिया। तस्मा...
Friday, 17 October 2014

शताब्दी का गीत - 'स्ट्रेंज फ्रूट' / अबेल मीरोपाल

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बलात्कार और हत्या कर लड़कियों, स्त्रियों की लाशें सार्वजनिक तौर पर चुनौती देती जैसे पेड़ों पर लटकायी जा रही हैं और इनकी रोकथाम के महकमे स...
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