शब्द

शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Friday, 7 March 2014

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा / निर्मला पुतुल

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'मैं चुप हूं तो मत समझो कि गूंगी हूं, या की रखा है मैंने, रखा है आजीवन मौन-व्रत, गहराती चुप्पी के अंधेरे में सुलग रही है भीतर, जो आक्रो...
Thursday, 6 March 2014

चुनाव...एक बार और पंचसाला ऐसीतैसी

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चुनाव आ रहा था। कुटुर-कुटुर। पटर-पटर। लो, आ गया। ..और अब होने जा रहा है। यानी हम सब की एक बार और होने जा रही है!..खूब ठीक से ऐसी-तैसी... उ...

होली हाइकु / पूर्णिमा वर्मन

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(राष्ट्रपति के साथ पूर्णिमा वर्मन ) अबकी साल वसंत के सपने तुम ही तुम कितनी बाट तके मन फागुन है गुमसुम नैनों तलक फहरती सरसों मन ...

मेरे गाँव में / पूर्णिमा वर्मन

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मेरे गाँव में कोई तो होगा कंप्यूटर पर बैठा मेरी राह देखता मेरी पाती पढ़ने वाला मेरी भाषा मेरा दर्द समझने वाला मेरी लिपि को मेरी तरहा र...

मेरा पता / पूर्णिमा वर्मन

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सुबह से शाम से पूछो नगर से गाम से पूछो तुम्हें मेरा पता देंगे कि इतना भी कहीं बेनाम अपना नाम तो नहीं अगर कोई ढूंढना चाहे तो मुश्कि...

पूर्णिमा वर्मन

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अमन चैन के भरम पल रहे - रामभरोसे! कैसे-कैसे शहर जल रहे - राम भरोसे! जैसा चाहा बोया-काटा,  दुनिया को मर्ज़ी से बाँटा उसकी थाली अपना काँट...
Monday, 3 March 2014

कई कई परतों में व्यथा यादवेंद्र अनूदित कमाल सुरेया की बहुपठित रचना

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एक दिन स्त्री चल देती है चुपचाप ...दबे पाँव  कोई स्त्री रिश्तों को निभाने में सहती है बहुत कुछ ..मुश्किलें उसका दिमाग,दिल और रूह तक किस...
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