शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Monday, 3 March 2014
कई कई परतों में व्यथा यादवेंद्र अनूदित कमाल सुरेया की बहुपठित रचना
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एक दिन स्त्री चल देती है चुपचाप ...दबे पाँव कोई स्त्री रिश्तों को निभाने में सहती है बहुत कुछ ..मुश्किलें उसका दिमाग,दिल और रूह तक किस...
कात्यायनी
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सात भाइयों के बीच चम्पा सयानी हुई बाँस की टहनी-सी लचक वाली बाप की छाती पर साँप-सी लोटती सपनों में काली छाया-सी डोलती सात भाइयों के बीच...
वाजदा खान
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चिड़िया तुम अपने पंख उधार दे दो मुझे चाँद से मिलने जाना है हवा न जाने कहाँ उसे बुहार कर ले गई चिड़िया !मुझ पर विश्वास करो तुम्हारे पं...
शांति सुमन की वह लोकप्रिय रचना....
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कहो रामजी, कब आए हो, अपना घर दालान छोड़कर पोखर-पान-मखान छोड़कर, छानी पर लौकी की लतरें, कोशी-कूल कमान छोड़कर, नए-नए से टुसियाए हो। गा...
जयप्रकाश त्रिपाठी
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हार जैसी, जीत जैसी सिसकियां, वक्त के संगीत जैसी सिसकियां, जिंदगी भर गुनगुनाता रह गया, मुफलिसी के गीत जैसी सिसकियां।
जयप्रकाश त्रिपाठी
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कैसे-कैसे मंजर देखा, बहुमंजिले खंडहर देखा, सूखा हुआ समंदर मैंने बच्चों की कश्ती पर देखा, कभी निवाले, कभी खिलौने लुटते हुए दर-ब-दर देखा, ...
जयप्रकाश त्रिपाठी
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जागने, सोने न देती ये सियासी नंगई, खुद को भी खोने न देती ये सियासी नंगई। क्या हंसी, क्या नींद की बातें करे अब आदमी, खुल के भी रोने न द...
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