शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Monday, 10 February 2014
जयप्रकाश त्रिपाठी
›
अपने घर में अपने को ही खो देती हैं बेटियां। मां के घर में हंसते-हंसते रो देती हैं बेटियां। रामायण की चौपाई-सी, गीता के अनुबंध-सी, आंगन-...
Saturday, 8 February 2014
जयप्रकाश त्रिपाठी
›
उड़ गई तीनो एक-एक कर पतंगें चली गई हों जैसे अपने अपने हिस्से के आकाशों की ओर। क्षितिज के इस पार रह गया था मैं, और कटी डोर जैसी मां...
दिविक रमेश
›
बेटी ब्याही गई है, गंगा नहा लिए हैं माता-पिता पिता आश्वस्त हैं स्वर्ग के लिये कमाया हॆ कन्यादान का पुण्य। और बेटी? पिता निहार रहे हैं,...
जयप्रकाश त्रिपाठी
›
अर्थ है या शब्द से प्रतिघात है, भावनाओं पर कुठाराघात है, क्या पता, किस हाल में जज्बात हैं, आपके भी मन में कोई बात है।
›
आपकी हर सांस मैंने पढ़ लिया, मंत्र-सा विश्वास मैंने पढ़ लिया, रह गया कोई न मौसम अनपढ़ा शब्दशः मधुमास मैंने पढ़ लिया।
Thursday, 6 February 2014
काकी की कहावतें........
›
अपना हाथ, जगन्नाथः सौ सुनार की, एक लोहार कीः नाच न जाने आंगन टेढ़ः छछनी छछन्न करे, टाटी-बेड़ा बन्न करेः आंख एक नहीं, कजरौटा बारहः मरे...
2 comments:
Wednesday, 5 February 2014
उदयप्रकाश
›
प्यार कहता है अपनी भर्राई हुई आवाज़ में भविष्य और मैं देखता हूं उसे सांत्वना की हंसी के साथ हंसी जिसकी आंख से रिसता है आंसू और शरीर के ...
‹
›
Home
View web version