शब्द

शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Sunday, 28 July 2013

मजनूँ का टीला / भैरव प्रसाद गुप्त

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शरद-पूर्णिमा की रात भीग चुकी थी। चाँद जोबन पर था। चाँदनी की उज्ज्वल मुस्कान की आभा में नयी दिल्ली रुपहली हो स्वप्न-नगरी की तरह मोहक हो उठ...
Saturday, 27 July 2013

वापसी / उषा प्रियंवदा

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गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई - दो बक्‍स, डोलची, बालटी - 'यह डिब्‍बा कैसा है, गनेशी?' उन्‍होंने पूछा। गनेशी बि...

ब्रह्मराक्षस का शिष्य / गजानन माधव मुक्तिबोध

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उस महाभव्य भवन की आठवीं मंजिल के जीने से सातवीं मंजिल के जीने की सूनी-सूनी सीढियों पर उतरते हुए, उस विद्यार्थी का चेहरा भीतर से किसी प्रका...

राजा निरबंसिया / कमलेश्वर

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''एक राजा निरबंसिया थे,'' मां कहानी सुनाया करती थीं। उनके आसपास ही चार-पांच बच्चे अपनी मुठ्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त...
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