शब्द

शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Saturday, 27 July 2013

वापसी / उषा प्रियंवदा

›
गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई - दो बक्‍स, डोलची, बालटी - 'यह डिब्‍बा कैसा है, गनेशी?' उन्‍होंने पूछा। गनेशी बि...

ब्रह्मराक्षस का शिष्य / गजानन माधव मुक्तिबोध

›
उस महाभव्य भवन की आठवीं मंजिल के जीने से सातवीं मंजिल के जीने की सूनी-सूनी सीढियों पर उतरते हुए, उस विद्यार्थी का चेहरा भीतर से किसी प्रका...

राजा निरबंसिया / कमलेश्वर

›
''एक राजा निरबंसिया थे,'' मां कहानी सुनाया करती थीं। उनके आसपास ही चार-पांच बच्चे अपनी मुठ्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त...

किले में औरत / रघुवीर सहाय

›
उस शहर में मुझे सिर्फ तीन दिन रहना था। होने को इन्‍हीं तीन में से किसी एक दिन मेरी हत्‍या हो जा सकती थी। पढ़ा था कि इस शहर में रोज हत्‍याएँ...

नैना जोगिन / फणीश्वरनाथ रेणु

›
रतनी ने मुझे देखा तो घुटने से ऊपर खोंसी हुई साड़ी को 'कोंचा' की जल्दी से नीचे गिरा लिया। सदा साइरेन की तरह गूँजनेवाली उसकी आवाज कं...
‹
›
Home
View web version
Powered by Blogger.