शब्द

शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी

Saturday, 27 July 2013

चीलें / भीष्म साहनी

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चील ने फिर से झपट्टा मारा है। ऊपर, आकाश में मँडरा रही थी जब सहसा, अर्धवृत्त बनाती हुई तेजी से नीचे उतरी और एक ही झपट्टे में, मांस के लोथड...

किले में औरत / रघुवीर सहाय

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उस शहर में मुझे सिर्फ तीन दिन रहना था। होने को इन्‍हीं तीन में से किसी एक दिन मेरी हत्‍या हो जा सकती थी। पढ़ा था कि इस शहर में रोज हत्‍याएँ...

आर्द्रा / मोहन राकेश

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बचन को थोड़ी ऊँघ आ गयी थी, पर खटका सुनकर वह चौंक गयी। इरावती ड्योढ़ी का दरवाज़ा खोल रही थी। चपरासी गणेशन आ गया था। इसका मतलब था कि छ: बज...

करवा का व्रत/यशपाल

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 कन्हैयालाल अपने दफ्तर के हमजोलियों और मित्रों से दो तीन बरस बड़ा ही था, परन्तु ब्याह उसका उन लोगों के बाद हुआ। उसके बहुत अनुरोध करने पर...

इस कुत्ता समय में मन

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जयप्रकाश त्रिपाठी मन एक मन घिन से भर जाता है, आंखें आंसुओं से। कभी-कभी। किसी-किसी समय में अक्सर। गुस्से बगूलों में छा लेते हैं। हंसी ...
Friday, 26 July 2013

ताकि बचा रहे लोकतन्त्र / रवीन्द्र प्रभात

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छुआछूत पर आधारित एक दलित युवक की कहानी रवीन्द्र प्रभात के उपन्यास 'ताकि बचा रहे लोकतन्त्र' के कथानक के केंद्र में आधुनिक दलित...
Thursday, 25 July 2013

सपनों की बाइबिल

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 सिल्विया प्लाथ रोजाना सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक मैं अपनी सीट पर बैठी दूसरों के ख्‍वाब टाइप करती रहती रही हूँ। मुझे इसीलिए मुलाजि...
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