शब्द
शब्द आओ मेरे पास,जो बुलायें, जाओ उनके पास भी
Saturday, 22 June 2013
क्यों नहीं चमक सकता हिंदी किताबों का बाजार
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उमेश चतुर्वेदी विलायत में भले ही अंग्रेजी किताबों का बाजार दो से तीन फीसदी की दर से बढ़ रहा हो, लेकिन उदारीकरण के दौर के भारत में यह विक...
एक पुस्तक मेले का आंखों देखा हाल
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विष्णु शर्मा दोस्तो, मैं एक बार फिर पुस्तक मेला गया। जैसा कि मैंने कहा था हाल में घूम आया। मैंने किताबें खरीदीं भी और बिखेरीं भी। कुल मि...
अजित कुमार रचना संचयन
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संपादनः गंगाप्रसाद विमल अजित कुमार का रचना संचयन उनके नए-पुराने पाठकों के लिए प्रीतिकर है. वे एक साथ साहित्य सर्जक, समाज चिंतक और यशस्वी...
अकथ कहानी प्रेम की
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प्रकाश के रे प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की बहुचर्चित किताब है अकथ कहानी प्रेम की। कबीर की कविता और उनका समय का दूसरा संस्करण आना सुखद आश्च...
ब्राउनिंग का नाटकीय एकालाप
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रॉबर्ट ब्राउनिंग (7 मई 1812- 1889 ) एक अंग्रेजी कवि एवं नाटककार थे. नाटकीय कविता, विशेषकर नाटकीय एकालापों में अतुल्य दक्षता के कारण उन्हें...
हम बच्चे ज्यादा, किताबें कम पैदा करते हैं- गुलजार
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हिंदी-उर्दू के जाने माने कवि-लेखक और मशहूर फिल्मकार गुलजार लगभग एक दशक पहले 'पटना पुस्तक मेला' में सबके आकर्षण का केंद्र बने हुए थे...
क्या हम सभ्य हो रहे हैं ?
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सतीश पेडणेकर स्टीवेन पिंकर जब जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे तो उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अ...
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