Saturday, 20 December 2014
Friday, 19 December 2014
रोशनी के सबसे सच्चे टुकड़े / अतौल बहरामुग्लू
बच्चों का कोई देश नहीं होता
जिस तरह वे संभालते हैं अपना सिर वह होता है एक जैसा
जिस तरह वे टकटकी लगाए देखते हैं, एक जैसी जिज्ञासा लगती है उनकी आँखों मे
जब वे रोते हैं एक जैसी होती है उनकी आवाज की लय।
बच्चे मानवता का प्रस्फुटन हैं
गुलाबों में सबसे प्यारे गुलाब, सबसे अच्छी गुलाब की कलियाँ
कुछ होते हैं रोशनी के सबसे सच्चे टुकड़े
कुछ होते हैं कल छौंहे काले द्राक्ष।
पिताओ, उन्हें अपने मस्तिष्क से निकल न जाने दो
माताओ, संभालो - सहेजो अपने बच्चों को
चुप करो उन्हें, चुप करो मत बात करने दो उनसे
जो बातें करते हैं युद्ध और बर्बादी की
आओ हम छोड़ दें ताकि वे बढ़ सकें भावावेश में
ताकि वे अंकुरित हों और उग सके पौधों की तरह
वे तुम्हारे नहीं, हमारे नहीं, किसी एक के भी नहीं
सबके हैं , पूरी दुनिया के
वे हैं मनुष्यता की आँख की पुतलियाँ।
(तुर्की के चर्चित कवि हैं अतौल बहरामुग्लू /अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)
जिस तरह वे संभालते हैं अपना सिर वह होता है एक जैसा
जिस तरह वे टकटकी लगाए देखते हैं, एक जैसी जिज्ञासा लगती है उनकी आँखों मे
जब वे रोते हैं एक जैसी होती है उनकी आवाज की लय।
बच्चे मानवता का प्रस्फुटन हैं
गुलाबों में सबसे प्यारे गुलाब, सबसे अच्छी गुलाब की कलियाँ
कुछ होते हैं रोशनी के सबसे सच्चे टुकड़े
कुछ होते हैं कल छौंहे काले द्राक्ष।
पिताओ, उन्हें अपने मस्तिष्क से निकल न जाने दो
माताओ, संभालो - सहेजो अपने बच्चों को
चुप करो उन्हें, चुप करो मत बात करने दो उनसे
जो बातें करते हैं युद्ध और बर्बादी की
आओ हम छोड़ दें ताकि वे बढ़ सकें भावावेश में
ताकि वे अंकुरित हों और उग सके पौधों की तरह
वे तुम्हारे नहीं, हमारे नहीं, किसी एक के भी नहीं
सबके हैं , पूरी दुनिया के
वे हैं मनुष्यता की आँख की पुतलियाँ।
(तुर्की के चर्चित कवि हैं अतौल बहरामुग्लू /अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)
चुगली / जयप्रकाश त्रिपाठी
बहुत देखा है हवाओं का दिशाएं बदलना
और पानी का समय पर तैरना,
आईने की चुगली, खुसर-फुसर,
चेहरे पर चेहरे रंगना-चढ़ना-उतरना...
और पानी का समय पर तैरना,
आईने की चुगली, खुसर-फुसर,
चेहरे पर चेहरे रंगना-चढ़ना-उतरना...
बात मोदी, मीडिया और मक्खी की / विजय विद्रोही
मीडिया पर हर नेता बरसता है, आजाद मीडिया हर दल की आंख में खटकता है। अगर राजनीतिक दलों का बस चले तो स्वतंत्र मीडिया के काम में इतने अडंग़े लगा दें कि वह निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर सके। ये कुछ ऐसे बयान हैं जो हर मीडियाकर्मी देता है लेकिन इसके साथ ही एक सच्चाई यह भी है कि मीडिया निष्पक्ष नहीं रह गया है। बहुत आसानी से हम चैनलों और अखबारों की पहचान कर सकते हैं जो इस या उस दल की गोद में बैठे हैं या जो इस या उस नेता का साथ देते या विरोध करते हैं। कुल मिलाकर मीडिया के एक वर्ग में भी सत्ता के साथ खड़े रहने की ललक दिखाई देती है।
चलिए, अब बात की जाए मोदी मीडिया और मक्खी की। अब यह तो मोदी ही जानते हैं कि उन्होंने मीडिया पर तंज कसने के लिए मक्खी बनाम मधुमक्खी ही क्यों चुनी। यहां मोदी की राहुल गांधी से चुनने की सोच मिलती है। राहुल गांधी ने भारतीय जनमानस की तुलना मधुमक्खियों के एक ऐसे छत्ते से की थी जहां हर कोई अपना-अपना काम चुपचाप करता रहता है। तब इस तुलना की घोर आलोचना की गई थी। खैर, मोदी कहते हैं कि पत्रकारों को मक्खी नहीं होना चाहिए जो गंदगी पर बैठती है और गंदगी फैलाती है। पत्रकार को तो मधुमक्खी की तरह होना चाहिए जो शहद पर बैठती है और उसकी राह में आने वाले को डंक मारती है।
सवाल उठता है कि अगर हर कोई शहद पर ही बैठेगा तो गंदगी दूर कैसे होगी। पत्रकार का काम राजनीति, नेताओं और समाज में फैली गंदगी को दूर करना है। इसे उजागर करने के लिए पत्रकार को उन गंदे कोनों में झांकना पड़ता है, वहां पहुंच कर उसे खंगालना पड़ता है और फिर उस गंदे पक्ष को जनता के सामने रखना पड़ता है। कायदा तो यही है कि इतना भर करने के बाद पत्रकार की जिम्मेदारी खत्म हो जानी चाहिए और राजनीतिक व्यवस्था को या यूं कहा जाए कि शासन तंत्र को आगे आकर पत्रकार की तरफ से खोजी गई गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। उलटे समूची राजनीतिक व्यवस्था उस गंदगी से खुद को किनारा करते हुए पत्रकार को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती है।
मोदी कहते हैं कि मधुमक्खी डंक भी मारती है लेकिन मधुमक्खी डंक कब मारती है? तब मारती है जब कोई शहद तक पहुंचने की कोशिश करता है, जब कोई शहद चुराने की कोशिश करता है, जब कोई शहद के छत्ते को ही तोडऩे की कोशिश करता है। अब ऐसी मधुमक्खी कौन पत्रकार बनना चाहेगा? हां, अगर सत्ता शहद नहीं है, अगर शहद आम जनता के दुख-दर्द दूर करने की दवा है और अगर वह शहद जनता के बीच नहीं बंट रहा है तो फिर पत्रकार को मधुमक्खी बन कर उन पर डंक मारना चाहिए जो शहद अपने में ही समेटे हुए हैं।
मोदी यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने अंदाज में चुटकी भी ली। कहा कि जैसे शुद्ध घी बेचने का दावा करने वाले पर शक होता है उसी तरह हर मीडिया वाला खुद को सच्ची खबरें परोसने वाला कहता है तो फिर सवाल खड़े होते हैं। अब मार्केटिंग करने का इतना तो अधिकार हर मीडिया हाउस को होना ही चाहिए। क्या मोदी वोट हासिल करने के लिए खुद को अन्य नेताओं से सच्चा, ईमानदार, प्रधान सेवक, चौकीदार नहीं कहते? क्या मोदी अपनी भाजपा को अन्य दलों से साफ-सुथरा और आदर्शवादी नहीं बताते?मोदी पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं जिनके निशाने पर मीडिया आया हो।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल के समय अखबारों और संपादकों, पत्रकारों का क्या हाल किया था, इसे कोई भूला नहीं है। यहां तक कि सौम्य मनमोहन सिंह ने भी एक बार मीडिया को विच हंटिंग से बचने की अपील की थी। वैसे मोदी को पत्रकारों की उस भूमिका से खुश ही होना चाहिए क्योंकि अगर तब मीडिया मक्खी नहीं बनता तो शायद मोदी की भी ताजपोशी नहीं होती। सरकार की नीतियों की आलोचना करना मीडिया का धर्म है लेकिन मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करने वाले लेखकों, चिंतकों पर अगर मोदी तंज कसते हैं तो इस पर मीडिया को बुरा-सा मुंह नहीं बनाना चाहिए।
मोदी ने कुछ समय पहले दीवाली मिलन समारोह के बहाने मीडिया मिलन की कोशिश की थी। उसके बाद वह कुछ संपादकों से अलग से भी मिले थे। यह हाल तब है जब ज्यादातर मीडिया मोदी की शान में पलक-पांवड़े बिछाए बैठा रहता है। आपस में कुछ नोक-झोंक हो तो बुराई नहीं, कुछ फिकरे दोनों तरफ से कसे जाएं तो भी ठीक ही है। हां, डर इस बात का है कि सत्ता बहुत दिनों तक अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकती। सत्ता जब अपने पर उतरती है तो मक्खी पत्रकार और मधुमक्खी पत्रकार में फर्क करना शुरू कर देती है। शायद इसीलिए वरिष्ठ पत्रकार यही कहते हैं कि सत्ता से दो हाथ की दूरी बनी रहे तो बेहतर।
सच तो यह है कि सत्ता में जो भी हो वह यही चाहता है कि मीडिया एक ऐसी मधुमक्खी की तरह हो जिसे सत्ता का शहद बेहद पसंद हो और जिसका डंक नहीं हो। अब डंक कौन निकाल सकता है यह समझाने की जरूरत नहीं है। या फिर डंक तो हो लेकिन उसका असर शहदाना हो। वैसे सत्ताधारी की नजर में मीडिया की औकात मक्खी से ज्यादा नहीं होती है और उसकी दिली इच्छा तो यही रहती है कि वह मक्खी के भिनभिनाने (स्टोरी करके तंग करने) पर उसे एक रैपर मार कर हद से दूर कर दे या फिर काम तमाम कर दे।
चलिए, अब बात की जाए मोदी मीडिया और मक्खी की। अब यह तो मोदी ही जानते हैं कि उन्होंने मीडिया पर तंज कसने के लिए मक्खी बनाम मधुमक्खी ही क्यों चुनी। यहां मोदी की राहुल गांधी से चुनने की सोच मिलती है। राहुल गांधी ने भारतीय जनमानस की तुलना मधुमक्खियों के एक ऐसे छत्ते से की थी जहां हर कोई अपना-अपना काम चुपचाप करता रहता है। तब इस तुलना की घोर आलोचना की गई थी। खैर, मोदी कहते हैं कि पत्रकारों को मक्खी नहीं होना चाहिए जो गंदगी पर बैठती है और गंदगी फैलाती है। पत्रकार को तो मधुमक्खी की तरह होना चाहिए जो शहद पर बैठती है और उसकी राह में आने वाले को डंक मारती है।
सवाल उठता है कि अगर हर कोई शहद पर ही बैठेगा तो गंदगी दूर कैसे होगी। पत्रकार का काम राजनीति, नेताओं और समाज में फैली गंदगी को दूर करना है। इसे उजागर करने के लिए पत्रकार को उन गंदे कोनों में झांकना पड़ता है, वहां पहुंच कर उसे खंगालना पड़ता है और फिर उस गंदे पक्ष को जनता के सामने रखना पड़ता है। कायदा तो यही है कि इतना भर करने के बाद पत्रकार की जिम्मेदारी खत्म हो जानी चाहिए और राजनीतिक व्यवस्था को या यूं कहा जाए कि शासन तंत्र को आगे आकर पत्रकार की तरफ से खोजी गई गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। उलटे समूची राजनीतिक व्यवस्था उस गंदगी से खुद को किनारा करते हुए पत्रकार को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती है।
मोदी कहते हैं कि मधुमक्खी डंक भी मारती है लेकिन मधुमक्खी डंक कब मारती है? तब मारती है जब कोई शहद तक पहुंचने की कोशिश करता है, जब कोई शहद चुराने की कोशिश करता है, जब कोई शहद के छत्ते को ही तोडऩे की कोशिश करता है। अब ऐसी मधुमक्खी कौन पत्रकार बनना चाहेगा? हां, अगर सत्ता शहद नहीं है, अगर शहद आम जनता के दुख-दर्द दूर करने की दवा है और अगर वह शहद जनता के बीच नहीं बंट रहा है तो फिर पत्रकार को मधुमक्खी बन कर उन पर डंक मारना चाहिए जो शहद अपने में ही समेटे हुए हैं।
मोदी यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने अंदाज में चुटकी भी ली। कहा कि जैसे शुद्ध घी बेचने का दावा करने वाले पर शक होता है उसी तरह हर मीडिया वाला खुद को सच्ची खबरें परोसने वाला कहता है तो फिर सवाल खड़े होते हैं। अब मार्केटिंग करने का इतना तो अधिकार हर मीडिया हाउस को होना ही चाहिए। क्या मोदी वोट हासिल करने के लिए खुद को अन्य नेताओं से सच्चा, ईमानदार, प्रधान सेवक, चौकीदार नहीं कहते? क्या मोदी अपनी भाजपा को अन्य दलों से साफ-सुथरा और आदर्शवादी नहीं बताते?मोदी पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं जिनके निशाने पर मीडिया आया हो।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल के समय अखबारों और संपादकों, पत्रकारों का क्या हाल किया था, इसे कोई भूला नहीं है। यहां तक कि सौम्य मनमोहन सिंह ने भी एक बार मीडिया को विच हंटिंग से बचने की अपील की थी। वैसे मोदी को पत्रकारों की उस भूमिका से खुश ही होना चाहिए क्योंकि अगर तब मीडिया मक्खी नहीं बनता तो शायद मोदी की भी ताजपोशी नहीं होती। सरकार की नीतियों की आलोचना करना मीडिया का धर्म है लेकिन मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करने वाले लेखकों, चिंतकों पर अगर मोदी तंज कसते हैं तो इस पर मीडिया को बुरा-सा मुंह नहीं बनाना चाहिए।
मोदी ने कुछ समय पहले दीवाली मिलन समारोह के बहाने मीडिया मिलन की कोशिश की थी। उसके बाद वह कुछ संपादकों से अलग से भी मिले थे। यह हाल तब है जब ज्यादातर मीडिया मोदी की शान में पलक-पांवड़े बिछाए बैठा रहता है। आपस में कुछ नोक-झोंक हो तो बुराई नहीं, कुछ फिकरे दोनों तरफ से कसे जाएं तो भी ठीक ही है। हां, डर इस बात का है कि सत्ता बहुत दिनों तक अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकती। सत्ता जब अपने पर उतरती है तो मक्खी पत्रकार और मधुमक्खी पत्रकार में फर्क करना शुरू कर देती है। शायद इसीलिए वरिष्ठ पत्रकार यही कहते हैं कि सत्ता से दो हाथ की दूरी बनी रहे तो बेहतर।
सच तो यह है कि सत्ता में जो भी हो वह यही चाहता है कि मीडिया एक ऐसी मधुमक्खी की तरह हो जिसे सत्ता का शहद बेहद पसंद हो और जिसका डंक नहीं हो। अब डंक कौन निकाल सकता है यह समझाने की जरूरत नहीं है। या फिर डंक तो हो लेकिन उसका असर शहदाना हो। वैसे सत्ताधारी की नजर में मीडिया की औकात मक्खी से ज्यादा नहीं होती है और उसकी दिली इच्छा तो यही रहती है कि वह मक्खी के भिनभिनाने (स्टोरी करके तंग करने) पर उसे एक रैपर मार कर हद से दूर कर दे या फिर काम तमाम कर दे।
Tuesday, 16 December 2014
ओ मेरे बच्चों / जयप्रकाश त्रिपाठी
किसी ने अंधेरे से कह दिया है
कि उजाले में घुल-मिल जाओ
इस तरह और नजर न आओ
कि उजाले में घुल-मिल जाओ
इस तरह और नजर न आओ
Monday, 15 December 2014
हमेशा देर कर देता हूँ मैं / मुनीर नियाज़ी
ज़रूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो, उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
मदद करनी हो उसकी, यार का धाढ़स बंधाना हो
बहुत देरीना रास्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ।
किसी को मौत से पहले, किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ, उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं .....
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