Thursday, 20 November 2014

देवता, देवता, देवता....तुम लिखो

आदमी, आदमी, आदमी...मैं लिखूं।

अर्थ संचित करो, अर्थ जानो तुम

और शब्द मैं लिखूं, मैं लिखूं, मैं लिखूं।



Wednesday, 19 November 2014

परदे पर शब्द मुझे वैसे ही लगते हैं जैसे नीले आसमान में तारे / अरुण कमल

शुरू में कविता बोली जाती थी। सुनी जाती थी। मुँहा-मुँही फैलती थी। कंठस्थ होती थी। इस क्रम में कुछ हेर-फेर भी होता होगा। जितने मुँह और जितने कंठों से कोई शब्द कोई कवि - सृजन गुजरा होगा उतनी ही बार कुछ न कुछ अदला या बदला होगा। इसीलिए कोई भी मौखिक पाठ 'शुद्ध' या 'प्रामाणिक' नहीं है। हर पाठ में हर मुँह की भाप है। इसलिए एक तरह से यह सामूहिक प्रयास या वृंद-सृजन भी है। उपजहिं अनत अनत छवि लहहिं।
फिर लिखने की विद्या चली। चाहे भोजपत्र पर या ताड़ पर या कागज पर। लिखा होने से उसमें स्थायित्व और दुर्भेद्यता भी आई। छापखाने ने इसे घर-घर तक पहुँचाया। लेकिन केवल उन्हीं तक जो पढ़ सकते थे। एक सीमित समूह में संचरित कविता अब नजर के बाहर उड़ान भरने लगी।
मेरे जैसे लोग सिर्फ लिखित कविता के अनुभव और अभ्यास को जानते हैं। यह सबसे सस्ता माध्यम है। सामूहिक होते हुए भी एकल का साधन और साध्य। सामूहिक इसलिए कि भाषा तो सबकी है। मेरे पहले से है। और एकल इसलिए कि मुझे लिखते हुए और किसी की जरूरत नहीं है। कविता लिखना सबसे आजादी का काम है। पढ़ना भी उतनी ही आजादी, अकेलापन और कम खर्चे का काम है। इसके अलावा यह सुविधा और विकल्प तो हमेशा है ही कि कलम-कागज न हो तो भी मैं कविता कह सकूँ और किताब छिन भी जाए तो कंठस्थ कविता बोल सकूँ।
अब एक नया माध्यम और उपकरण आया है। ये कविताएँ अंतर्जाल या इंटरनेट के जरिए आप तक पहुँचेंगी। आप इन्हें कागज पर नहीं, किसी पर्दे पर पढ़ेंगे जिसमें शब्द उसके भीतर से उगेंगे। यह फिल्म से आगे की बात है। और आप एक एक पंक्ति को सरका कर पढ़ सकते हैं और चाहें तो पूरा मिटा भी सकते हैं। यहाँ भी कविता पढ़ी ही जा रही है जैसे पहले।
लेकिन फर्क ये है कि एक साथ बहुत से लोग अपने अपने उपकरण पर उसे दुनिया में कहीं भी पढ़ सकते है। इस तरह शब्दों को व्याप्ति मिलती हैं। हालाँकि केवल वही पढ़ सकते हैं जिनके पास ये उपकरण हैं। जो इसे चलाना जानते हैं। और इसे बचा कर रखना या न रखना उनकी इच्छा पर है।
एक डर मुझे है कि अगर इस पद्धति या अंतर्जाल (इंटरनेट) के मालिक चाहें तो किसी भी कविता का प्रसारण पलक झपकते रोक सकते हैं। किताब के साथ मुश्किल होगी। इसलिए कविता को, या हर पाठ को, केवल अंतर्जाल के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
एक डर और है। अगर आप चाहें तो किसी भी पाठ में कुछ भी हेर-फेर कर सकते हैं। इसलिए भी कागज पर सुरक्षा ज्यादा है।
एक निजी बात यह है कि कविता पढ़ने के पहले मैं किताब को, कागज और रोशनाई और जिल्द को सूँघता हूँ, जैसे भुट्टा खाने के बाद उसे तोड़कर सूँघता हूँ। वह गंध बहुत कुछ कहती है। इंटरनेट मुझे उसे गंध से मरहूम कर देता है। खैर!
तो मुझे खुशी है कि ये चालीस कविताएँ अब हवा में रोशनी की कीलों की तरह जागती रहेंगी। परदे पर शब्द मुझे वैसे ही लगते हैं जैसे नीले आसमान में तारे। शांतिः।

Tuesday, 18 November 2014

वे बंधक रख रहे हैं देश, बच्चों ताली बचाओ

और रेलवे स्टेशनों पर विदेशियों के कप-प्लेट धोने के लिए तैयार हो जाओ
इसी तरह चुपके-चुपके आये थी ईस्ट इंडिया कंपनी .....
रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सीमा बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया है।
रेल क्षेत्र में एफडीआई की सीमा से संबंधित अधिसूचना जारी हो चुकी है।
डीआईपीपी ने अधिसूचना पर एक विस्तृत नोट जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि सरकार रेलवे अधोसंरचना के निर्माण, संचालन और प्रबंधन में 100 फीसदी विदेशी निवेश होने जा रहा है।

जियो पारसी

एक शोध के मुताबिक समाज में तेजी से पारसियों की संख्या घट रही है। 40 प्रतिशत की कमी आई है। ऐसे में केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग की अनुशंसा पर ‘जियो पारसी’ के नाम से एक योजना शुरू की है। पारसी दंपतियों को कई तरह की सुविधा का प्रावधान है।  योजना को प्रोत्साहित करने के लिए विज्ञापन बनाए गए हैं। विज्ञापनों में कंडोम का इस्तेमाल न करने की नसीहत दी गई है तो किसी विज्ञापन में आबादी नहीं बढ़ने पर पारसियों की कॉलोनी को ‘हिंदू कॉलोनी’ बन जाने की बात कही गई है। कुछ विज्ञापनों में तो उन महिलाओं पर व्यंग्य किया गया है जो शादी के लिए योग्य वर की तलाश करती रहती हैं, इसी को ध्यान में रखकर एक विज्ञापन में रतन टाटा की तलाश नहीं करने का कटाक्ष किया गया है। इन विज्ञापनों को लेकर पारसी समाज में ही विरोध शुरू हो गया है। साथ ही नतीजे अच्छे आने शुरू हो गए हैं। इस योजना के तहत हाल ही में पारसी समाज की पांच महिलाओं ने ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ (आईवीएफ) तकनीक से गर्भधारण किया है, जो इस योजना के लिए शुभ संकेत है। 

हलाहल / जयप्रकाश त्रिपाठी


सुंदर-सुंदर रंगों वाले रंगे-बड़े-दुरंगे
कहां कहां झूठे बसते हैं .....
मुंह से शहद, पीठ पीछे से
हंसी हलाहल की बरसाते
पल में मधुर प्रणाम और पल में डंसते हैं
कहां कहां झूठे बसते हैं .....


एक इंजीनियर कैसे बना 'संत रामपाल' / अंकुर जैन

ख़ुद को संत कबीर का अवतार और भगवान घोषित करने वाले संत रामपाल की कहानी किसी हिंदी फिल्म के किरदार से काम नहीं. उनके समर्थकों के लिए वो नायक हैं और आलोचकों के लिए खलनायक. और क़ानून की नज़र में वो फिलहाल एक अभियुक्त हैं जिनके ख़िलाफ गैर ज़मानती वारंट जारी हुआ है.
उनसे 2006 के एक हत्या के मामले में पूछताछ होनी है और इसके लिए उन्हें 42 बार समन भेजा जा चुका है. लेकिन अब तक वो अदालत में पेश नहीं हुए हैं.
सोनीपत के धनाणा गांव में 1951 को जन्मे रामपाल हरियाणा सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर थे.
नौकरी के दौरान ही रामपाल दास सत्संग करने लगे और 'संत रामपाल' बन गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें 2000 में इस्तीफा देने को कहा. उसके बाद रामपाल ने करोंथा गांव में सतलोक आश्रम बनाया.
हरियाणा में हिसार के पास बरवाला में स्थित इस आश्रम की ज़मीन को लेकर रामपाल पर कई आरोप लगे है.
आश्रम के बाहर रामपाल को गिरफ़्तारी से बचाने के लिए जमा उनके हज़ारों समर्थकों में से एक मनोज दास कहते है, "बाबा एक चमत्कारी आत्मा है जो धरती पर भगवान का स्वरूप है. कुछ लोग इन्हें फंसा रहे है पर हम खड़े रहेंगे जितनी भी गोलिया क्यों न बरसें."
मनोज का कहना है कि रामपाल तो पशुओं से भी बात कर सकते है. रामपाल इस्लामी विद्वान डॉ ज़ाकिर नाइक और कई अन्य धर्म गुरुओं पर अपनी टिप्पणियों को लेकर भी चर्चा में रहे.
2006 में स्वामी दयानंद की लिखी एक किताब पर संत रामपाल ने एक बयान दिया, जिसके बाद रामपाल और आर्य समाज के समर्थकों के बीच सतलोक आश्रम के बाहर हिंसक झड़प हुई. इसमें एक महिला की मृत्यु हुई.
झड़प के बाद पुलिस ने रामपाल को हत्या के मामले में हिरासत में लिया. 22 महीने जेल में रहने के बाद वह 30 अप्रैल 2008 को रिहा हुए. रामपाल का आश्रम भी सरकार ने ज़ब्त कर लिया.
रोहतक से बीजेपी के पूर्व विधायक रहे नरेश मालिक कहते है, "मैंने रामपाल का मुद्दा हरियाणा विधानसभा में उठाया था. लेकिन सरकार ने उसे नज़र अंदाज़ किया. मेरी पार्टी में भी कई लोग बाबा की असलियत नहीं जानते है." वो कहते हैं, "लोग कहते थे कि चुनाव से पहले बाबा का आशीर्वाद ले लो पर मैंने मना किया क्योंकि वह अधर्मी है और सभी तरह के ग़लत काम करते हैं."
तारीख़ पर तारीख़
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल रामपाल की ज़ब्त की गई ज़मीन को उन्हें लौटने के लिए हरियाणा सरकार को निर्देश किया. इसके एक महीने बाद ही मई में आश्रम के बाहर फिर झड़प हुई जिसमें दो लोग मारे गए. पिछले साल जब 2006 के मामले में बाबा को कोर्ट बुलाया गया तो उनके समर्थकों ने कोर्ट के बाहर तोड़फोड़ की.
संत रामपाल अब तक कोर्ट की 42 सुनवाई में पेश नहीं हुए हैं. कोर्ट ने इस महीने प्रशासन को इस मामले में झाड़ लगाई. उनके ख़िलाफ़ गैर ज़मानती वारंट जारी करते हुए कोर्ट ने पुलिस से उन्हें 21 नवंबर से पहले कोर्ट में पेश करने के लिए कहा है. (बीबीसी हिंदी से साभार)

हरियाणा में बाबा रामपाल के आश्रम में घुसी पुलिस, खूनी टकराव, आपरेशन जारी

बाबा के समर्थकों से खूनी टकराव, अनेक पुलिसकर्मी घायल, पेट्रोल बमो से पुलिस पर हमला, बाबा के आश्रम से भाग निकलने की अफवाहे, पुलिस कार्रवाई के दौरान कई पत्रकार भी घायल, आश्रम के बाहर धरना दे रही महिलाओं को पुलिस वाहानों से लाद ले गयी, दोनो तरफ से टकराव जारी, जबर्दस्त तनाव। डीजीपी ने प्रेस कांफ्रेस में कहा- बाबा को गिरफ्तार करने तक ऑपरेशन जारी रहेगा...