Saturday, 8 November 2014

'द हिंदू' के खिलाफ हिंदूवादियों ने खोला मोर्चा

'The Hindu' अंग्रेजी अखबार इन दिनो हिंदूवादियों के निशाने पर है। इसकी वजह बताई गई है चार नबंबर को द हिंदू में छपी एक स्पेशल रिपोर्ट। उस खबर में बताया गया है कि 13 बड़े राज्यों में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या केवल 16 परसेंट है और बीजेपी वाले राज्यों में तो हालत बहुत खराब है। बताया गया है कि कैसे महाराष्ट्र में अब 11 मुस्लिम विधायको में से 9 ही रह गए हैं। बीजेपी ने केवल एक मुस्लिम को टिकट दिया था, वो भी हार गया। पहले तीन मुस्लिम मंत्री थे, इस बार एक के होने के भी चांस नहीं हैं। हरियाणा में जहां पहले पांच मुस्लिम एमएलए और 1 मंत्री था, अब तीन ही मुस्लिम एमएलए हैं और मंत्री तो एक भी नहीं होगा क्योंकि बीजेपी ने दो मुस्लिमों को टिकट दिया था और दोनों ही हार गए। उसी तरह इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे छत्तीसगढ़,गोवा में कोई मुस्लिम एमएलए नहीं है, जबकि एमपी, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में केवल एक एक मुस्लिम एमएलए ही है। एक लाइन इस रिपोर्ट के ऊपर ही लिखी हुई है कि, ‘अगर ये ट्रेंड जारी रहता है, तो मुस्लिमों खास तौर पर यंगस्टर्स का भरोसा देश के इलेक्टोरल सिस्टम से उठ जाएगा’ ।
'The Hindu' की ये रिपोर्ट इस लिंक पर पढ़ी जा सकती हैं -
http://www.thehindu.com/news/national/muslims-fill-16-per-cent-of-ministerial-berths-in-13-big-states/article6564574.ece ।
एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त ने भी ट्वीट किया है कि बीजेपी शासित राज्यों में 151 विधायक हैं और केवल एक मुस्लिम मंत्री है। बरखा ने एनडीटीवी पर भी इस मुद्दे को उठाया।
अब जवाही हमला शुरू हो गया है। 'The Hindu' पर आरोप लगाया गया है कि इस अखबार के 136 सालों के इतिहास में एक भी मुस्लिम एडिटर क्यों नहीं हुआ? जी सुब्रह्ममण्यम से लेकर मालिनी पार्थसारथी तक, 1878 से 2014 तक आज तक‘द हिंदू’ ने कोई भी एडिटर मुस्लिम नहीं नियुक्त किया है। इतना ही नहीं द हिंदू के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी कोई मुस्लिम नहीं है। द हिंदू के पब्लिशर एन राम सीपीआई (एम) की स्टूडेट विंग एसएफआई के वाइस प्रेसिडेंट रह चुके हैं,इसलिए वो वामपंथी हैं और हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहे हैं, इसलिए ऐसी बातें फैला रहे हैं। विकीपीडिया से द हिंदू के अब तक के एडिटर्स की पूरी लिस्ट का प्रिट स्क्रीन निकालकर ट्वीट पर शेयर किया जा रहा है। (समाचार4मीडिया से साभार)

Friday, 7 November 2014

भिखारी/तुर्गनेव

मैं एक सड़क के किनारे जा रहा था। एक बूढ़े जर्जर भिखारी ने मुझे रोका। लाल सुर्ख और आँसुओं में तैरती–सी आँखें, नीले होंठ,गंदे और गले हुए चिथड़े सड़ते हुए घाव... ओह,गरीबी ने कितने भयानक रूप से इस जीव को खा डाला है। उसने अपना सड़ा हुआ, लाल, गंदा हाथ मेरे सामने फैला दिया और मदद के लिए गिड़गिड़ाया।
मैं एक–एक करके अपनी जेब टटोलने लगा। न बटुआ मिला, न घड़ी हाथ लगी, यहाँ तक कि रूमाल भी नदारद था... मैं अपने साथ कुछ भी नहीं लाया था और भिखारी अब भी इंतजार कर रहा था। उसका फैला हुआ हाथ बुरी तरह काँप रहा था, हिल रहा था।
घबराकर, लज्जित हो मैंने वह गंदा, काँपता हुआ हाथ उमगकर पकड़ लिया, ‘‘नाराज मत होना, मेरे दोस्त! मेरे पास भी कुछ नहीं हैं,भाई!’’
भिखारी अपनी सुर्ख आँखों से एकटक मेरी ओर देखता रह गया। उसके नीले होंठ मुस्करा उठे और बदले में उसने मेरी ठंडी उँगुलियाँ थाम लीं, ‘‘तो क्या हुआ, भाई!’’ वह धीरे से बोला, ‘‘इसके लिए भी शुक्रिया, यह भी तो मुझे कुछ मिला, मेरे भाई!’’ और मुझे ज्ञात हुआ कि मैंने भी अपने उस भाई से कुछ पा लिया था।

फिल्ममेकर को जिंदा निगलेगा एनाकॉन्‍डा

अमेरिका के न्‍यूजर्सी शहर के रहने वाले 26 वर्षीय फिल्‍ममेकर पॉल रासोलियो टीवी पर एक ऐसा हैरतअंगेज कारनामा करने वाले हैं जिसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। दरअसल रासोलियो दुनिया के सबसे बड़े सांप एनाकॉन्‍डा के पेट में जाएंगे। बता दें कि दिल दहला देने वाले इस नजारे को फिल्माया तक जा चुका है।
रासोलियो फिल्म मेकर होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी भी हैं। उन्होंने डिस्‍कवरी चैनल के स्‍पेशल शो के लिए डॉक्‍यूमेंट्री तैयार की है, जिसका प्रसारण सात दिसंबर को किया जाएगा। इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया जाएगा कि यदि कोई सांप किसी इंसान को निगले तो कैसा लगता है। इसके लिए पॉल ने खुद एक स्‍नेक प्रूफ सूट बनाया है। ऐसा सूट, जिसे पहनने के बाद जब सांप उन्‍हें निगलेगा, तो उन्‍हें कोई नुकसान नहीं होगा।
 ‘ईटेन अलाइव’ नाम के इस शो में फिल्‍म निर्माता पॉल अमाजॉन के विशाल 30 फीट लंबे एनाकॉन्‍डा के सामने खुद को भोजन के रूप में पेश करेंगे।
हालांकि, इस कार्यक्रम को लेकर पशु प्रेमियों ने नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि यह जानवरों के साथ किए जाने वाले दुर्व्‍यवहार की चरम सीमा है। हालांकि, 26 वर्षीय पॉल इस बात से इनकार करते हैं।
उन्‍होंने ट्वीट कर कहा कि यदि आप मुझे जानते हैं, तो मैं कभी किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। रासोलियो को अमाजॉन का इंडियाना जोन्‍स भी कहा जाता है। वह अमाजॉन के विशेषज्ञ हैं और उनकी वेबसाइट बायो में बताया गया है कि उन्‍होंने भारत, इंडो‍नेशिया, ब्राजील और पेरू में कई जगहों पर काम किया है।
प्रदर्शनकारियों ने डिस्कवरी चैनल से इस एपिसोड को प्रदर्शित नहीं करने की भी मांग की है। इसी मकसद से वेबसाइट चेंज डॉट ओआरजी ने इस एपिसोड के खिलाफ एक ऑनलाइन अभियान चला रखा है जिसे अब तक 500 सिग्नेचर सपोर्ट मिल चुका है। इस अभियान के जरिए बताया जा रहा है कि यह जानवरों के साथ किए जाने वाले दुर्व्‍यवहार की चरम सीमा है और बेहद बकवास है। इसमें कहा गया है कि इससे सांप की जान भी जा सकती है। एक वयस्‍क एनाकॉन्‍डा वयस्‍क पुरुष के कंधों को नहीं निगल सकता है। वह आमतौर पर वन्‍य सुअर, हिरन आदि को खाता है। एनाकॉन्‍डा या अजगर जैसे जीव अपने भोजन को निगलने से पहले उन्‍हें दबाकर मार डालते हैं।
न्‍यूजर्सी के रहने वाले पॉल ने 18 वर्ष की आयु में पहली बार पेरू के अमाजॉन जंगल में काम किया था।
(समाचार4मीडिया से साभार)

राम की एक बहन थी शान्‍ता / बोधिसत्‍व

दशरथ की एक बेटी थी शान्‍ता
लोग बताते हैं, जब वह पैदा हुई
अयोध्‍या में अकाल पड़ा बारह वर्षों तक...
धरती धूल हो गयी...!
चिन्तित राजा को सलाह दी गयी कि
उनकी पुत्री शान्‍ता ही अकाल का कारण है!
राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए शृंगी ऋषि को पुत्री दान दे दी...
उसके बाद शान्‍ता कभी नहीं आयी अयोध्‍या...
लोग बताते हैं दशरथ उसे बुलाने से डरते थे...
बहुत दिनों तक सूना रहा अवध का आंगन
फिर उसी शान्‍ता के पति शृंगी ऋषि ने दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया...
दशरथ चार पुत्रों के पिता बन गये, सं‍तति का अकाल मिट गया
शान्‍ता राह देखती रही अपने भाइयों की...
पर कोई नहीं गया उसे आनने हाल जानने कभी
मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं,
शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे
जबकि वन जाते समय राम शान्‍ता के आश्रम से होकर गुज़रे थे...
पर मिलने नहीं गये...
शान्‍ता जब तक रही राह देखती रही भाइयों की
आएंगे राम-लखन, आएंगे भरत शत्रुघ्‍न
बिना बुलाये आने को राजी नहीं थी शान्‍ता...
सती की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से...!


हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे / संतोष भारतीय

पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं. उसने मुझसे कहा कि यह सवाल मैं इसलिए पूछ रहा हूं कि अकसर मैं देखता हूं कि अंग्रेजी पत्रकारिता में लोग लगभग एक ही ट्यून पर काम करते हैं. बहुत कम लोग हैं, जो शुरू किए हुए ढर्रे के खिला़फ स्टोरी करते हैं, जबकि हिंदी में इस तरह की एकता नहीं दिखाई देती. अंग्रेजी पत्रकारिता में स्टोरी को डेवलप करने में रूचि नज़र आती है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में रिपोर्ट को मारने की मारामारी दिखाई देती है. पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का सपना पाले हुए इस नौजवान ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया. विवश इसलिए कर दिया, क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य ऐसे ही लोग संभालने वाले हैं. इस विद्यार्थी का उत्साह मुझे इसलिए चिंतित कर गया, क्योंकि इसका सपना हिंदी पत्रकारिता में आने का है. हिंदी पत्रकार क्यों एक-दूसरे के खिला़फ खड़े हो जाते हैं, यह सवाल तो है. हिंदी पत्रकार क्यों एक-दूसरे की रिपोर्ट को डेवलप नहीं करते हैं, यह सवाल तो है. और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्यों हिंदी पत्रकार बढ़-चढ़कर ज़बरदस्ती के तर्कों को गढ़कर अपने साथी पत्रकार की रिपोर्ट को किल करने में अपनी सारी ताक़त लगा देते हैं. इन सवालों का जवाब तो हिंदी के पत्रकारों को ही तलाशना है. लेकिन मैंने इसकी तलाश में कुछ लोगों से बातचीत की. आउट लुक के संपादक नीलाभ मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश वाफना जैसे बहुत सारे लोगों से मेरी बातचीत हुई. इन सभी ने सहमति व्यक्त की कि हिंदी पत्रकारिता कुछ ज़्यादा ही लड़खड़ा रही है. उन्होंने छात्र की इस बात पर भी सहमति व्यक्त की कि हिंदी पत्रकारिता में एक-दूसरे को बिलो द बेल्ट हिट करने की प्रवृति कुछ ज़्यादा बढ़ गई है, जबकि सच्चाई का एक पहलू यह भी है कि हिंदी पत्रकारिता ही इस देश की ज़मीनी पत्रकारिता को परिभाषा देती है.
मैं एक उदाहरण दे सकता हूं, बीती 23, 24 और 25 मार्च को मैंने जनरल वीके सिंह का हिंदी में इंटरव्यू लिया और वह इंटरव्यू ईटीवी पर चला. उस इंटरव्यू का नोटिस देश में किसी ने नहीं लिया. लेकिन जब 26 तारीख़ की सुबह द हिंदू ने उन्हीं विषयों पर जनरल वीके सिंह की रिपोर्ट छापी, तो देश में तू़फान आ गया और तब अचानक कुछ लोगों को याद आया कि ये सारी बातें जनरल वीके सिंह तीन दिन पहले कह चुके हैं, मेरे ही इंटरव्यू में. और टाइम्स नाऊ ने जैसे ही उस इंटरव्यू को चलाना शुरू किया, अचानक सारे अंग्रेज़ी और हिंदी चैनल मेरे उस इंटरव्यू को अपने-अपने यहां दिखाने लगे या कौन पूरा पहले दिखाता है, उसकी होड़ में लग गए. हमने हिंदी में सबसे पहले इंटरव्यू किया, लेकिन उस इंटरव्यू का कोई नोटिस किसी हिंदी अख़बार ने नहीं लिया, जबकि अंग्रेज़ी चैनल टाइम्स नाऊ ने उसका नोटिस लिया तो सारे हिंदी चैनल और अख़बार उस इंटरव्यू का नोटिस लेने लगे.
जब मैं हिंदी पत्रकारिता की बात कहता हूं तो उसमें सारी भाषाई पत्रकारिता शामिल हो जाती है. जिस तरह की रिपोर्ट, जिस तरह के विषय हिंदी सहित दूसरी भाषाओं के लोग छापते हैं, वैसे विषय अंग्रेजी पत्रकारिता में नज़र नहीं आते. इसके बावजूद हिंदी पत्रकार और भाषाई पत्रकार एक गंभीर हीनभावना से ग्रसित रहते हैं. अंग्रेजी ने बड़े-बड़े पत्रकार दिए हैं. जब हम बड़े पत्रकारों की सूची बनाते हैं तो उसमें अंग्रेजी से जुड़े पत्रकारों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है. जब पत्रकारिता का विद्यार्थी जाने माने और बड़े पत्रकारों के बारे में बोलता है, तो उसमें वह नब्बे प्रतिशत नाम अंग्रेजी पत्रकारों के लेता है. वह शायद इसलिए इनका नाम लेता है, क्योंकि हम अपने काम, अपने काम का महत्व और अपने काम का असर न तो खुद देखते हैं और न ही दूसरे को दिखाना चाहते हैं. हिंदी के वे पत्रकार जो न किसी से प्रभावित होते हैं, न किसी के दबाव में आते हैं और जिनका दिमाग़ बिलकुल सा़फ है, उनके साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे अपने जैसे दूसरे पत्रकारों से बात करना अपनी हेठी मानते हैं. ये शायद कहीं व्यक्तित्व में शामिल ईगो या अहंकार का तत्व है, जो पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित कर जाता है. हिंदी के पत्रकार और खासकर वैसे पत्रकार जिनका मैंने ज़िक्र किया, सभा-समारोहों में तो मिल लेते हैं, लेकिन आपस में बैठकर व़क्त नहीं बिताते, ताकि उनके तनाव कम हो सकें या उनके पत्रकारिता के तनाव में दूसरे लोग शामिल होकर उनके उस तनाव को कम करने में मददगार साबित हो सकें. शायद एक संस्कृति का भी फर्क़ है. दिमाग़ी तौर पर हम अंग्रेजी पत्रकारिता को या अंग्रेजी पत्रकारों को ज़्यादा चुस्त-दुरुस्त और असरकारक मानते हैं. शायद हैं भी, क्योंकि देश का शासन, देश का प्रशासन, देश के नेता चाहे वह सोनिया गांधी हों या आडवाणी हों, उन्हें अंग्रेजी अ़खबार प़ढकर विषय की विश्वसनीयता ज़्यादा समझ आती है, जबकि हिंदी अ़खबारों में छपी हुई जानदार और तथ्यपरक, प्रासंगिक रिपोर्ट समझ नहीं आती. पर क्या इससे भाषाई पत्रकारिता खासकर हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की हो जाती है या हम उन विषयों को चुनना बंद कर दें, जिनकी वजह से हमारा महत्व अकसर स्थापित होता है.
मुझे याद है, 70 के दशक में या 80 के दशक के पहले हिस्से में आनंद बाज़ार पत्रिका ने संडे और रविवार नाम की दो पत्रिकाएं निकाली थीं. हम लोग रविवार के संवाददाता थे. सुरेंद्र प्रताप सिंह संपादक थे और अकसर संडे और रविवार में खबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा होती रहती थी. मैं यह नहीं कहता कि हमेशा, लेकिन अकसर रविवार की रिपोर्ट संडे से पहले आ जाती थी और शायद दोनों पत्रिकाओं ने मिलकर उस समय की राजनीति पर और सरकार पर बहुत असर डाला था. एमजे अकबर संडे के संपादक थे और उन्होंने इसका एक तोड़ निकाल लिया. वह अगले हफ्ते रविवार में छपी रिपोर्ट को उसी रिपोर्टर के नाम से अंग्रेजी में छाप देते थे. और जो आज मानसिकता है, उस समय भी यही मानसिकता होती थी कि अंग्रेजी में छपी हुई बहुत सारी रिपोर्ट जो एक हफ्ते पहले हिंदी में छप चुकी होती थीं, देश में धूम मचा देती थीं. आज भी हालात कुछ उससे अलग नहीं हैं. मैं एक उदाहरण दे सकता हूं, बीती 23, 24 और 25 मार्च को मैंने जनरल वीके सिंह का हिंदी में इंटरव्यू लिया और वह इंटरव्यू ईटीवी पर चला. उस इंटरव्यू का नोटिस देश में किसी ने नहीं लिया. लेकिन जब 26 तारीख़ की सुबह द हिंदू ने उन्हीं विषयों पर जनरल वीके सिंह की रिपोर्ट छापी, तो देश में तू़फान आ गया और तब अचानक कुछ लोगों को याद आया कि ये सारी बातें जनरल वीके सिंह तीन दिन पहले कह चुके हैं, मेरे ही इंटरव्यू में. और टाइम्स नाऊ ने जैसे ही उस इंटरव्यू को चलाना शुरू किया, अचानक सारे अंग्रेज़ी और हिंदी चैनल मेरे उस इंटरव्यू को अपने-अपने यहां दिखाने लगे या कौन पूरा पहले दिखाता है, उसकी होड़ में लग गए. हमने हिंदी में सबसे पहले इंटरव्यू किया, लेकिन उस इंटरव्यू का कोई नोटिस किसी हिंदी अख़बार ने नहीं लिया, जबकि अंग्रेज़ी चैनल टाइम्स नाऊ ने उसका नोटिस लिया तो सारे हिंदी चैनल और अख़बार उस इंटरव्यू का नोटिस लेने लगे. इस स्थिति को जब हम देखते हैं, तब उस छात्र का दर्द जिसने मुझसे यह सवाल पूछा ज़्यादा समझ में आता है.
मैं अपने साथी पत्रकारों और संपादकों से अनुरोध करना चाहता हूं कि आप पर बहुत ज़िम्मेदारियां हैं. अगर आपस में संवाद शुरू हो सके और जिस स्टोरी में किसी एक संवाददाता को संभावना नज़र आए, वह इस स्टोरी का फॉलोअप करे तो शायद पत्रकारिता के उस सुनहरे दौर की वापसी संभव हो सकती है, जिस दौर को हम पत्रकारिता का सुनहरा काल कहते हैं. उन दिनों भी जलन थी, उन दिनों भी प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन नकारात्मक प्रतिस्पर्धा कम थी और सकारात्मक प्रतिस्पर्धा ज़्यादा थी. इसलिए मेरा यह अनुरोध, अगर मेरे साथियों की समझ में आ जाए, तो वे मुझ पर कम लेकिन हिंदी पत्रकारिता पर ज़्यादा उपकार करेंगे. हिंदी में शशि शेखर, अजय उपाध्याय, नीलाभ मिश्र जैसे संपादक हैं. इनमें कई और नाम जोड़े जा सकते हैं, चाहे वह श्रवण गर्ग हों, चाहे गुलाब कोठारी हों या फिर चाहे आलोक मेहता हों. अगर ये लोग सकारात्मक पहल नहीं करेंगे तो आने वाले पत्रकारों के विश्वास को अर्जन करना इनके लिए मुश्किल होगा. आख़िर में स़िर्फ इतना अनुरोध, ज़रूरी नहीं कि इसलिए मिलें कि फॉलोअप स्टोरी करनी है, या इसलिए मिलें कि मिलजुल कर कोई स्टोरी करनी है. लेकिन इसलिए मिलना चाहिए कि एक-दूसरे से विचार-विमर्श हो तो उस विचार-विमर्श में इस देश में किस तरह के ट्रेंड्‌स शुरू हो रहे हैं, किस तरह के ट्रेंड्‌स का साथ देना है और किस तरह के ट्रेंड्‌स का साथ नहीं देना है, कम से कम यह तो सा़फ हो सके. आशा करनी चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता, जो इस देश को समझने वाली पत्रकारिता है, अपनी ज़िम्मेदारी समझेगी और हिंदी पत्रकारिता के नेता भी अपनी ज़िम्मेदारी को समझेंगे.

Thursday, 6 November 2014

शिकार को निकला शेर / सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

एक शेर एक रोज जंगल में शिकार के लिए निकला। उसके साथ एक गधा और कुछ दूसरे जानवर थे। सब-के-सब यह मत ठहरा कि शिकार का बराबर हिस्‍सा लिया जाएगा। आखिर एक हिरन पकड़ा और मारा गया। जब साथ के जानवर हिस्‍सा लगाने चले, शेर ने धक्‍के मारकर उन्‍हें अलग कर दिया और कुल हिस्‍से छाप बैठा।
उसने गुर्राकर कहा, ''बस, हाथ हटा लो। यह हिस्‍सा मेरा है, क्‍योंकि मैं जंगल का राजा हूँ और यह हिस्‍सा इसलिए मेरा है, क्‍योंकि मैं इसे लेना चाहता हूँ, और यह इसलिए कि मैंने बड़ी मेहनत की है। और एक चौथे हिस्‍से के लिए तुम्‍हें मुझसे लड़ना होगा, अगर तुम इसे लेना चाहोगे।'' खैर, उसके साथी न तो कुछ कह सकते थे, न कर सकते थे; जैसा अकसर होता है, शक्ति सत्‍य पर विजय पाती है, वैसा ही हुआ।

एक चोर की कहानी / श्रीलाल शुक्ल

माघ की रात। तालाब का किनारा। सूखता हुआ पानी। सड़ती हुई काई। कोहरे में सब कुछ ढँका हुआ। तालाब के किनारे बबूल, नीम, आम और जामुन के कई छोटे-बड़े पेड़ों का बाग। सब सर झुकाए खड़े हुए। पेड़ों के बीच की जमीन कुशकास के फैलाव में ढँकी हुई। उसके पार गन्‍ने का खेत। उसका आधा गन्‍ना कटा हुआ। उस पर गन्‍ने की सूखी पत्तियाँ फैली हुईं। उन पर जमती हुई ओस। कटे हुए गन्‍ने की ठूँठियाँ उन्‍हें पत्तियों में ढँकी हुईं। आधे खेत में उगा हुआ गन्‍ना, जिसकी फुनगी पर सफेद फूल आ गए थे। क्‍योंकि वह पुराना हो रहा था।
रात के दो बजे। पास की अमराइयों में चिडि़यों ने पंख फटकारे। कोई चमगादड़ ''कैं कैं'' करता रहा। एक लोमड़ी दूर की झाडि़यों में खाँसती रही। पर रात के सन्‍नाटे के अजगर ने अपनी बर्फीली साँस की एक फुफकार से इन सब ध्‍वनियों को अपने पेट में डाल लिया और रह-रहकर फुफकारता रहा।
तभी, जैसे गन्‍ने के सुनसान घने खेत से अकस्‍मात बनैले सुअरों का कोई झुण्‍ड बाहर निकल आए, बड़े जोर का शोर मचा, ''चोर! चोSSSर। चोSSSर!"
गाँव की ओर से लगभग पच्‍चीस आवाजें हवा में गूँज रही थीं :
''चोर! चोर! चोSSSर। चोSSSर!"
''चारों ओर से घेर लो। जाने न पाए।''
''ठाकुर बाबा के बाग की तरफ गया है…''
''भगंती के खेत की तरफ देखना।''
''हाँ, हाँ गन्‍ने वाला खेत....।''
''चोSSSर। चोSSSर!"
देखते-देखते गाँव वाले ठाकुर के बाग में पहुँच गए। चारों ओर से उन्‍होंने बाग को और उससे मिले हुए गन्‍ने के खेत को घेर लिया। लायटेनों की रोशनी में एक-एक झाड़ी की तलाशी ली जाने लगी। सब बोल रहे थे। कोई भी सुन नहीं रहा था।
तभी एक आदमी ने टॉर्च की रोशनी फेंकनी शुरू की। भगंती के खेत में उसने कुछ गन्‍नों को हिलते देखा। फिर वह धीरे-धीरे खेत के किनारे तक गया। दो-तीन कोमल गन्‍ने जमीन पर झुके पड़े थे। उसी की सीध में कुछ गन्‍ने ऐसे थे जिन पर से पाले की बूँदें नीचे ढुलक गई थीं। टॉर्च की रोशनी में और पौधों के सामने ये कुछ अधिक हरे दिख रहे थे।
टॉर्च की रोशनी को खेत की गहराइयों में फेंकते हुए उस आदमी ने चिल्‍लाकर कहा, ''होशियार भाइयो, होशियार! चोर इसी खेत में छिपा है। चारों ओर से इसे घेर लो। जाने न पाए!"
फिर शोर मचा और लोगों ने खेत को चारों ओर से घेर लिया। उस आदमी ने मुँह पर दोनों हाथ लगाकर जोर-से कहा, ''खेत में छिपे रहने से कुछ नहीं होगा। बाहर आ जाओ, नहीं तो गोली मार दी जाएगी।''
वह बार-बार इसी बात को कई प्रकार से आतंक-भरी आवाज में कहता रहा। भीड़ में खड़े एक अधबैसू किसान ने अपने पास वाले साथी से कहा, ''नरैना है बड़ा चाईं। कलकत्‍ता कमाकर जब से लौटा है, बड़ा हुसियार हो गया है।''
उसके साथी ने कहा, ''बड़े-बड़े साहबों से रफ्त-जब्‍त रखता है। कलकत्‍ते में इसके ठाठ हैं। मैं तो देख आया हूँ। लड़का समझदार है।''
''जान कैसे लिया कि चोर खेत में है?"
तभी किसी ने कहा, ''यह चोट्टा खेत से नहीं निकलता तो आग लगा दो खेत में। तभी बाहर जाएगा।''
इस प्रस्‍ताव के समर्थन में कई लोग एक साथ बोलने लगे। किसी ने इसी बीच में दियासलाई भी निकाल ली।
भगंती ने आकर नरायन उर्फ नरैना से हाथ जोड़कर कहा, ''हे नरायन भैया, एक चोर के पीछे हमारा गन्‍ना न जलवाओ। सैकड़ों का नुकसान हो जाएगा। कोई और तरकीब निकालो।''
नरायन ने कहा, ''देखते जाओ भगंती काका, खेत का गन्‍ना जलेगा नहीं, पर कहा यही जाएगा।''
उसने तेजी से चारों ओर घूमकर कुछ लोगों से बातें कीं और खेत के आधे हिस्‍से में गन्‍ने की जो सूखी पत्तियाँ पड़ी थीं। उनके छोटे-छोटे ढरों में आग लगा दी। बहुत-से लोग आग तापने के लिए और भी नजदीक सिमट आए। सब तरह का शोर मचता रहा।
खेत के बीच में गन्‍ने के कुछ पेड़ हिल। नरायन ने उत्‍साह से कहा, ''शाबाश! इसी तरह चले आओ।''
पास खड़े हुए भगंती से उसने कहा, ''चोर आ रहा है। दस-पन्‍द्रह आदमियों को इधर बुला लो।''
चारों ओर से उठने वाली आवाजें शांत हो गईं। लोगों ने गर्दन उठा-उठाकर खेत के बीच में ताकना शुरू कर दिया।
चोर के निकलने का पता लोगों को तब चला जब वह नरायन के पास खड़ा हो गया।
सहसा चोर को अपने पैरों से लिपटा हुआ देख वह उछलकर पीछे खड़ा हो गया जैसे साँप छू लिया हो। एक बार फिर शोर मचा, ''चोर! चोSSSर!"
चोर घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ा।
न जाने आसपास खड़े लोगों को क्‍या हुआ कि तीन-चार आदमी उछलकर चोर के पास गए और उसे लातों-मुक्‍कों से मारना शुरू कर दिया। पर उसे ज्‍यादा मार नहीं खानी पड़ी। मारने वालों के साथ ही नरायन भी उसके पास पहुँच गया। उनको इधर-उधर ढकेलकर वह चोर के पास खड़ा हो गया और बोला, ''भाई लोगो, यह बात बेजा है। हमने वादा किया है कि मारपीट नहीं होगी, यह शरनागत है। इसे मारा न जाएगा।''
एक बुड्ढे ने दूर से कहा, ''चोट्टे को मारा न जाएगा तो क्‍या पूजा जाएगा।''
पर नरायन ने कहा, ''अब चाहे जो हो, इसे पुलिस के हाथों में देकर अपना काम पूरा हो जाएगा। मारपीट से कोई मतलब नहीं।''
लोग चारों ओर से चोर के पास सिमट आए थे। नरायन ने टॉर्च की रोशनी उस पर फेंकते हुए पूछा, ''क्‍यों जी, माल कहाँ है?"
पर उसकी निगाह चोर के शरीर पर अटकी रही। चोर लगभग पाँच फुट ऊँचा, दुबला-पतला आदमी था। नंगे पैर, कमर से घुटनों तक एक मैला-सा अँगोछा बाँधे हुए। जिस्‍म पर एक पुरानी खाकी कमीज थी। कानों पर एक मटमैले कपड़े का टुकड़ा बँधा था। उमर लगभग पचास साल होगी। दाढ़ी बढ़ रही थी। बाल सफेद हो चले थे। जाड़े के मारे वह काँप रहा था और दाँत बज रहे थे। उसका मुँह चौकोर-सा था। आँखों के पास झुर्रियाँ पड़ी थीं। दाँत मजबू थे। मुँह को वह कुछ इस प्रकार खोले हुए था कि लगता था कि मुस्‍कुरा रहा है।
उसे कुछ जवाब ने देते देख कुछ लोग उसे फिर मारने को बढ़े पर नरायन ने उन्‍हें रोक लिया। उसने अपना सवाल दोहराया, ''माल कहाँ है?"
लगा कि उसके चेहरे की मुस्‍कान बढ़ गई है। उसने हाथ जोड़कर खेत की ओर इशारा किया। इस बार नरायन को गुस्‍सा आ गया। अपनी टॉर्च उसकी पीठ पर पटककर उसने डाँटकर कहा, ''माल ले आओ।''
दो आदमी लालटेनें लिए हुए चोर के साथ खेत के अंदर घुसे। पाले और ईख की नुकीली पत्तियों की चोट पर बार-बार वे चोर को गाली देते रहे। थोड़ी देर बाद जब वे बाहर आए तो चोर के हाथ में एक मटमैली पोटली थी। पोटली लाकर उसने नरायन के पैरों के पास रख दी।
नरायन ने कहा, ''खोलो इसे। क्‍या-क्‍या चुरा रक्‍खा है?"
उसने धीरे-धीरे थके हाथों से पोटली खोली। उसमें एक पुरानी गीली धोती, लगभग दो सेर चने और एक पीतल का लोटा था। भीड़ में एक आदमी ने सामने आकर चोर की पीठ पर लात मारी। कुछ गालियाँ दीं और कहा, ''यह सब मेरा माल है।''
लोग चारों ओर से चोर के ऊपर झुक आए थे। वह नरायन के पैरों के पास चने, लोटे और धोती को लिए सर झुकाए बैठा था। सर्दी के मारे उसके दाँत किटकिटा रहे थे और हाथ हिल रहे थे। नरायन ने कहा, ''इसे इसी धोती में बाँध लो और शाने ले चलो।''
दो-तीन लोगों ने चोर की कमर धोती से बाँध ली और उसका दूसरा सिरा पकड़कर चलने को तैयार हो गए।
चोर के खड़े होते ही किसी ने उसके मुँह पर तमाचा मारा और गालियाँ देते हुए कहा, ''अपना पता बता वरना जान ले ली जाएगी।''
चोर जमीन पर सर लटकाकर बैठ गया। कुछ नहीं बोला। तब नरायन ने कहा, ''क्‍यों उसके पीछे पड़े हो भाइयो! चोर भी आदमी ही है। इसे थाने लिए चलते हैं। वहाँ सब कुछ बता देगा।''
किसी ने पीछे से कहा, ''चोर-चोर मौसेरे भाई।''
नरायन ने घूमकर कहा, ''क्‍यों जी, मैं भी चोर हूँ? यह किसकी शामत आई!"
दो-एक लोग हँसने लगे। बात आई-गई हो गई।
वे गाँव के पास आ गए। तब रात के चार बज रहे थे। चोर की कमर धोती से बाँधकर, उसका एक छोर पकड़कर दीना चौकीदार थाने चला। साथ में नरायन और गाँव के दो और आदमी भी चले।
चारों में पहले वाला बुड्ढा किसान रास्‍ता काटने के लिए कहानियाँ सुनाता जा रहा था, ''तो जुधिष्ठिर ने कहा कि बामन ने हमारे राज में सोने की थाली चुराई है। उसे क्‍या दंड दिया जाए? तो बिदुर बोले कि महाराज, बामन को दंड नहीं दिया जाता। तो राजा बोले कि इसने चोरी की है तो दंड तो देना ही पड़ेगा। तब बिदुर ने कहा कि महाराज, इसे राजा बलि के पास इंसाफ के लिए भेज दो। जब राजा बलि ने बामन को देखा तो उसे आसन पर बैठाला।...''
चौकीदार ने बात काटकर कहा, ''चोर को आसन पर बैठाला? यह कैसे?"
बुड्ढा बोला, ''क्‍या चोर, क्‍या साह! आदमी आदमी की बात! राजा ने उसे आसन दिया और पूरा हाल पूछा। पूछा कि आपने चोरी क्‍यों की तो बामन बोला कि चोरी पेट की खातिर की।''
चौकीदार ने पूछा, ''तब?"
''तब क्‍या?" बुड्ढा बोला, ''राजा बलि ने कहा कि राजा युधिष्ठिर को चाहिए कि वे खुद दंड लें। बामन को दंड नहीं होगा। जिस राजा के राज में पेट की खातिर चोरी करनी पड़े वह राजा दो कौड़ी का है। उसे दंड मिलना चाहिए। राजा बलि ने उठकर...।''
चौकीदार जी खोलकर हँसा। बोला, ''वाह रे बाबा, क्‍या इंसाफ बताया है राजा बलि का। राजा विकरमाजीत को मात कर दिया।''
वे हँसते हुए चलते रहे। चोर भी अपनी पोटली को दबाए पँजों के बल उचकता-सा आगे बढ़ता गया।
पूरब की ओर घने काले बादलों के बीच से रोशनी का कुछ-कुछ आभास फूटा। चौकीदार ने धोती का छोर नरायन को देते हुए कहा, ''तुम लोग यहीं महुवे के नीचे रूक जाओ। मैं दिशा मैदान से फारिग हो लूँ।''
साथ के दोनों आदमी भी बोल उठे। बुड्ढे ने कहा, ''ठीक तो है नरायन भैया, यहीं तुम इसे पकड़े बैठे रहो। हम लोग भी निबट आवें।''
वे चले गए। नरायन थोड़ी देर चोर के साथ महुवे के नीचे बैठा रहा। फिर अचानक बोला, ''क्‍यों जी, मुझे पहचानते हो?"
दया की भीख-सी माँगते हुए चोर ने उसकी ओर देखा। कुछ कहा नहीं। नरायन ने फिर धीरे-से कहा, ''हम सचमुच मौसेरे भाई हैं।''
इस बार चोर ने नरायन की ओर देखा। देखता रहा। पर इस सूचना पर नरायन जिस आश्‍चर्य-भरी निगाह की उम्‍मीद कर रहा था, वह उसे नहीं मिली। बढ़ी हुई दाढ़ी वाला एक दुबला-पतला चौकोर चेहरा उससे दया की भीख माँग रहा था। नरायन ने धीरे-से रूक-रूककर कहा, ''कलकत्‍ते के शाह मकसूद का नाम सुना है? उन्‍हीं के गोल का हूँ।''
जैसे किसी को किसी अनजाने जाल में फँसाया जा रहा हो, चोर ने उसी तरह बिंधी हुई निगाह से उसे फिर देखा। नरायन ने फिर कहा, ''कलकत्‍ते के बड़े-बड़े सेठ मेरे नाम से थर्राते हैं। मेरी शक्‍ल देखकर तिजोरियों के ताले खुल जाते हैं, रोशनदान टूट जाते हैं।''
वह कुछ और कहता। लगातार बात करने का लालच उसकी रग-रग में समा गया था। अपनी तारीफ में वह बहुत कुछ कहता। पर चोर की आँखों में न आनंद झलका, न स्‍नेह दिखाई दिया। न उसकी आँखों में प्रशंसा की किरण फूटी, न उनमें आतंक की छाया पड़ी। वह चुपचाप नरायन की ओर देखता रहा।
सहसा नरायन ने गुस्‍से में भरकर उसकी देह को बड़े जोर-से झकझोरा और जल्‍दी-जल्‍दी कहना शुरू किया, ''सुन बे, चोरों की बेइज्‍जती न करा। चोरी ही करनी है तो आदमियों जैसी चोरी कर। कुत्‍ते, बिल्‍ली, बंदरों की तरह रोटी का एक-एक टुकड़ा मत चुरा। सुन रहा है बे?"
मालूम पड़ा कि वह सुन रहा है। उसकी चेहरे पर हैरानी का चढ़ाव-उतार दीख पड़ने लगा था। नरायन ने कहा, ''यह सेर-आध सेर चने और यह लोटा चुराते हुए तुझे शर्म भी नहीं आई? यही करना है तो कलकत्‍ते क्‍यों नहीं आता?"
न जाने क्‍यों, चोर की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसके होंठ इतना फैल गए थे कि लग रहा था, वह हँस पड़ेगा। पर आँसू बहते ही जा रहे थे। वह अपने पेट पर दोनों हाथों से मुक्‍के मारने लगा। आँसुओं का वेग और बढ़ गया।
नरायन ने बात करनी बंद कर दी। कुछ देर रूककर कहा, ''भाग जो। कोई कुछ न कहेगा। जब तू दूर निकल जाएगा तभी मैं शोर मचाऊँगा।"
जब इस पर भी चोर ने कुछ जवाब न दिया तो उसे आश्‍चर्य हुआ। फिर कुछ रूककर उसने कहा, ''बहरा है क्‍या बे?"
फिर भी चोर ने कुछ नहीं कहा।
नरायन ने उसे बाँधने वाली धोती का छोर उसकी ओर फेंका, उसे ढकेलकर दूर किया और हाथ से उसे भाग जाने का इशारा किया। पर चोर भागा नहीं। थका-सा जमीन पर औंधे मुँह पड़ा रहा।
इतने में दूसरे लोग आते हुए दिखाई पड़े। नरायन ने गंभीरतापूर्वक उठकर चोर को जकउ़ने वाली धोती पकड़ ली। उसे हिला-डुलाकर खड़ा कर दिया। एक-एक करके वे सब लोग आ गए।
सवेरा होते-होते वे थाने पहुँच गए। थाना मुंशी ने देखते ही कहा, ''सबेरे-सबेरे किस का मुँह देखा!"
पर मुँह देखते ही वह फिर बोला, ''अजब जानवर है! चेहरा तो देखो, लगता है हँस पड़ेगा।''
दिन के उजाले में सबने देखा कि उसका चेहरा सचमुच ऐसा ही है। छोटी-छोटी सूजी हुई आँखों और बढ़ी हुई दाढ़ी के बावजूद चौकोर चेहरे मे फैल हुआ मुँह, लगता था, हँसने ही वाला है।
थाना मुंशी ने पूछा, ''क्‍या नाम है?"
चोर ने पहले की तरह हाथ जोड़ दिए। तब उसने उसके मुँह पर दो तमाचे मारकर अपना सवाल दोहराया। चोर का मुँह कुछ और फैल गया। उसने-दो-चार तमाचे फिर मारे।
इस बार उसकी चीख से सब चौंक पड़े। मुँह जितना फैल सकता था, उतना फैलाकर चोर बड़ी जोर-से रोया। लगा, कोई सियार अकेले में चाँद की ओर देखकर बड़ी जोर-से चीख उठा है।
मुंशी ने उदासीन भाव से पूछा, ''माल कहाँ है?"
नरायन ने चने, लोटे और धोती को दिखाकर कहा, ''यह है।''
न जाने क्‍यों सब थके-थके से, चुपचार खड़ रहे। चोर अब सिसक रहा था। सहसा एक सिपाही ने अपनी कोठरी से निकलकर कहा, ''मुंशी जी, यह तो पाँच बार का सजायाफ्ता है। इसके लिए न जेल में जगह है, न बाहर। घूम-फिरकर फिर यहीं आ जाता है।''
मुंशी ने कहा, ''कुछ अधपगला-सा है क्‍या?"
सिपाही ने मुंशी के सवाल का जवाब स्‍वीकार में सिर हिलाकर दिया। फिर पास आकर चोर की पीठ थपथपाते हुए कहा, ''क्‍यों गूँगे, फिर आगए। कितने दिन के लिए जाओगे छह महीने कि साल-भर?"
चोर सिसर रहा था, पर उसकी आँखों में भय, विस्‍मय और जड़ता के भाव समाप्‍त हो चले थे। सिपाही की ओर वह बार-बार हाथ जोड़कर झुकने लगा, जैसे पुराना परिचित हो।
चौकीदार ने साथ के बुड्ढे को कुहनी से हिलाकर कहा, ''साल-भर को जा रहा है। समझ गए बलि महाराज?"
पर कोई भी नहीं हँसा।