Tuesday, 28 October 2014

राजेंद्र यादव का वो बोल्ड इंटरव्यू जिसे जयंती रंगनाथन ने लिखा था...

(जयंती पर विशेष)

पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले। उस समय की दूसरी किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’। ‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया था। सुधा और चंदर खासकर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा। बीच में चंदर और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा। लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से मैं अपने को जोड़ पाई। भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल। इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो। कभी लेखक से मिलने की इच्छा मत करना। यादव जी भारती जी नहीं हैं।”
भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे। हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985 में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे। हंसते भी थे और अपने स्टाफ को ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे। लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं। दूरियां थीं, काफी थीं। (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व)।
सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ। राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं। अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए।”

हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे, हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी। कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की।

इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं। उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ। धीरेंद्र जी ने परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”

उस दिन एक दीवार टूट गई। मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था। सहज और सरल। मेरी कल्पना से परे। लगा कि एक्ट कर रहे हैं। लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे।

फिर भी एक संकोच था। जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे। राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे। हमें वे कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी। अपनी असुरक्षाओं का जिक्र करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते। लेकिन अधिकतर वे खुश रहते, ठहाके लगाते।

इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते थे, जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था।

क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब।

हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है। लेकिन एंजाय सभी करते हैं। एसएमएस सभी शेअर करते हैं। हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है।

मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को। वाकई यह व्यक्ति औरों से अलग है। अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता। कभी यह अहसास नहीं होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है। हां, इसका नुकसान भी है। जब कोई नया व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो उसे निराश होना पड़ता है।

उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई। गंभीर और अगंभीर बातें। फिजूल की बहसें भी हुईं। उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं। लेकिन मित्रवत बातचीत के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर ही बात करेंगे। ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है।

आप कितने अ-साहित्यक व्यक्ति हैं?
जब मैं पढ़ता या लिखता हूं तो पूरी तरह एक साहित्यिक आदमी होता हूं, लेकिन इसके बाद मैं कोशिश करता हूं कि एक आम आदमी की तरह हंसू, बर्ताव करूं। आइ वांट टू बी लाइक ए कॉमन मैन। इसके लिए मुझे किसी तरह की कोशिश नहीं करनी पड़ती। मुझे यह नेचुरल लगता है। शाम को घर लौटने के बाद या तो दोस्तों से मिलना-जुलना होता है, अकेला होता हूं तो कोई फिल्म देख लेता हूं।

आपका मन नहीं होता कि अलग क्षेत्र के लोगों से मिले-जुलें?
मिलना चाहता हूं.. . दिक्कत क्या है कि हमारे सर्किल में ऐसे लोग नहीं हैं, सारे पढ़ने-लिखने वाले हैं। कभी-कभी इच्छा होती है कि ऐसे लोगों से मिला जाए जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है।

अगर सफर में ऐसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो आपको नहीं जानता, तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
मैं अपनी तरफ से कभी नहीं बताता। अगर पूछे तो सिर्फ इतना बताता हूं कि लिखने-पढ़ने का काम करता हूं। ज्यादा पूछे तो कहता हूं कि मैगजीन निकालता हूं। मैं उनके और अपने बीच डिस्टंस पैदा नहीं करना चाहता। मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि कोई मेरे पैर छुए या मुझसे दूरी बना कर चले। हमेशा से यही लगता रहा कि मैं लोगों के करीब रहूं। पैर छुआना, ओरा बना कर चलना--यह सब ड्रामा लगता है। अच्छा लगता है जहां बेतकल्लुफ-सी बातचीत हो, दुराव-छिपाव ना हो, खुल कर हो, गंदी बातें भी कर सकें और अच्छी बातें भी।

एक आम आदमी का जीवन कितना मिस करते हैं आप? उम्र के इस मोड़ पर पहुंच कर आप एक एक्टिव जिंदगी जी रहे हैं, कभी लगता है कि कहीं प्रोफेसर होते या कोई और काम किया होता?
कभी नहीं..

लेकिन यादव जी पैसा तो नहीं है ना इस फील्ड में .. ..
हां, लेकिन ना मुझे इसका अफसोस है ना कभी इच्छा रही। मेरी इच्छाएं, खासकर अपने लिए बहुत कम हैं, शुरू से।

हाल ही में गीताश्री की पुस्तक के विमोचन समारोह में आप पर खूब फब्तियां कसी गईं, आपने दो लाइन क्या लिखा करीना कपूर के बारे में कंट्रोवर्सी बन गई.. कहा गया कि बुढ़ापे में जवां लड़कियों का ‘ शौक ’ हो जाता है, मनीषा ने भी यह बात कही और मैत्रेयी ने भी।
अच्छा यह बताओ, क्या मुझे एक सुंदर लड़की देख कर एप्रीशिएट कहने का हक नहीं? इस तरह के विवादों का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं समझता हूं कि जो कह रहा है, वो बेवकूफ है। अगर इनमें से किसी को मैं इस निगाह से देखता तो शायद उनको खुशी होती।

 अब तो आपकी हर बात कंट्रोवर्सी बन जाती है। पहली कंट्रोवर्सी कौन सी बनी?
ठीक से याद नहीं। पर मेरे उपन्यास ‘सारा आकाश’ में एक शिरीष नाम का किरदार था, जो धर्म-कर्म किसी पर यकीं नहीं करता था, इसको ले कर विवाद छिड़ा। बाद में होता ही रहा। उस समय मुझे लगा कि जो मैं कह रहा हूं, सही है और मन से कह रहा हूं और इसे ऐसा ही होना चाहिए। मुझे याद है, बहुत पहले पैंसठ-सत्तर की बात है, मैंने एक लीड लिखा कुछ शास्त्रीय निषेधों के बारे में-प्राध्यापकों के खिलाफ, जो जड़ होते हैं, जो अपनी दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहते और यह समझते हैं कि साहित्य सिर्फ उतना ही है जितना हम जानते हैं, आधुनिक साहित्य को आने ही नहीं देंगे। मैंने एक लंबा लेख लिखा था, डॉ नरेंद्र और उन जैसे लोगों के खिलाफ बाकायदा खुल कर लिखा था। उसे ले कर बहुत कंट्रोवर्सी हुई। उस समय वह अजंता में छपा था।

आपकी कितनी उम्र रही होगी उस समय ?
मैं तीस के ऊपर का था। शुरू से ही मैं जो एस्टाब्लिश- स्थापित और स्वीकृत है, उनको विकर्षक्रित करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि चीजों को जैसे का तैसा स्वीकार करना गलत है।

स्त्री को जान पाने की पहल सबसे पहले कब हुई?
बड़ा मुश्किल है कहना। जाइंट परिवार था। 18 बहनें थीं, कुछ बड़ी कुछ छोटी। किसी के प्रति ज्यादा अटैचमैंट था। कहना चाहिए कि इमोशनल टाइज वहीं से शुरू हुए। धीरे-धीरे लगा कि हम जिस स्त्री को जानना चाहते हैं वह कम से कम मेरी बहन नहीं है, बेटी नहीं है, मां नहीं है।
बेटी, मां,बहन आपका चॉइस नहीं, आपको दे दी गई हैं। हमारी चाइस वो स्त्री है जिसे हमने चुना, हम उस स्त्री की बात कर रहे हैं। मां, बहन, बेटी के बारे में बात करनी भी नहीं चाहिए। ये महिलाएं किसी और के लिए औरत होंगी, हमारे लिए नहीं हैं।
मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा। घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए, बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए, मैंने दी है। बेटी को जिंदगी में एक बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है। बाद में जिंदगी के सारे निर्णय उसने खुद ही लिए। यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी।

‘ अपनी दुनिया की स्त्री’ से आपका साबका कब हुआ?
मेरे फादर डॉक्टर थे। छोटे कस्बों में उनका ट्रांसफर होता था। जहां कंपाउंडर, नौकर, कुक, चौकीदार और उनका परिवार होता था। कंपाउंडर की बेटियों से हमारी दोस्ती थी। उनसे छेड़छाड़ चलता रहता था। स्त्री को वहीं से जानना शुरू किया, उनके शरीर को भी। समझते थे कि हम प्यार कर रहे हैं। वह लस्ट था, आकर्षण था। उस समय बहुत आगे जाने के बारे में मालूम नहीं था।
सच में जिसके साथ अटैचमेंट हुआ वो उन्नीस-बीस साल में हुआ, जो आज तक चला आ रहा है। सेक्स बहुत बाद में आया। शुरू में यह मानना भी मुश्किल था कि वी लव इच अदर। हमारे बीच प्लेटोनिक लव था। चिट्टियां लिख रहे हैं। दक्षिण भारत गए घूमने, रामविलास शर्मा, मैं अमृतलाल नागर वगैरह, वहां से चिट्ठियां लिख रहे है कि तुम भी होती तो कितना अच्छा था, वगैरह वगैरह। तब तक हमने आपस में आइ लव यू नहीं कहा था। यह बात हम लोगों ने पांच साल बाद मानी। जब शादी की बात आई, तो वह कलकत्ते आई, बाकायदा मेरे पास तीन-चार दिन रही। शादी की बात पर उसने कहा- मैं प्यार कर सकती हूं, शादी की योजना मेरे दिमाग में नहीं है।

उस लिबरेटेड वूमन को आप पचा पाए? सम्मान के साथ उसे जाने दिया कि मन में खलिश रह गई?
जिसे मैंने प्यार किया था वो घर में सबसे छोटी थी। उसकी जिम्मेदारियां थीं। फादर उसके बीमार रहते थे या संत हो गए थे। जैन लोग थे। सारे घर का इंतजाम, भाइयों के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का काम वही करती थी। बाद में फॉरच्युनेटली या अनफॉरच्युनेटली उसने डबल एम ए किया, पीएचडी किया और प्रोफेसर हो गई। अधिकार की जो चेतना शुरू में थी, वो बाद में बाकायदा एक ऑफिसर की या प्रिंसेस जैसी हो गई। मुझे हमेशा लगता था कि इसे मैं प्यार तो बहुत करता हूं, मैं जहां कहूं और अच्छी जगहों पर हम मिलें, हम मिलते भी थे, पर शादी के लिहाज से उसकी पर्सनालिटी बहुत स्ट्राँग थी।

क्या आप उसके साथ एक नार्मल जिंदगी जी पाते?
आज उसे शिकायत है कि तुमने मुझे एक बच्चा भी नहीं दिया।

उसकी शिकायत को जेनुइन मानते हैं आप?
नहीं, वह गजब की इगोइस्ट थी। जब पहली बार सेक्स संबंध बने, हम दोनों 10-12 दिन पहाड़ पर रहे थे, उसकी तबीयत खराब हो गयी। महीने भर तक। मुझे शक है कि उसने एबार्ट करवाया। हालांकि उसने बताया नहीं।

इतनी इगोइस्ट महिला से आपको प्यार कैसे हो गया?
हो गया, क्या करें? बल्कि आज भी लड़ती है मुझसे, सत्तर साल की हो गई है, बल्कि अबव सेवंटी, कहीं एक अख़बार में कुछ आ गया होगा उसके बारे में, कहती है कि मैं बिलकुल नहीं चाहती कि कहीं मेरा नाम आए। शी इज पर्सन ऑफ ए स्ट्रांग कैरेक्टर।

क्या वो आपको मिल जाती तो आप दोनों के बीच प्यार रहता? औरत का यह तेज रूप बर्दाश्त कर पाते आप?
मेरे ख्याल से नहीं कर पाता। नई कहानी का सारा दर्द यही है। खास कर मोहन राकेश का-अंधेरे बंद कमरे, आषाढ़ का एक दिन सबकी थीम यही है। हमने स्त्री को पर्सनालिटी दी, आत्मनिर्भरता दी, स्वतंत्रता दी, लेकिन हमारी मानसिकता उसे बर्दाश्त नहीं कर पायी। हमारे संस्कारों में है कि हम रात कहें तो वो रात कहे, दिन कहें तो दिन। ये स्त्रियां अलग थीं। शायद इसलिए हमारी जनरेशन के पुरुष स्ट्रांग स्त्री के साथ निबाह नहीं कर पाए।

आप आज भी अपने भूले बिसरे प्यार को इसीलिए तो याद नहीं कर रहे कि बहुत सारी बातें अनकही रह गईं?
शायद।

क्या आज भी आप अपने आपको रोमांटिक महसूस करते हैं?
आज से दस साल पहले करता था। अब तो खाली एक नोस्टालजिया है। पिछले दिनों मेरी मुलाकात हुई थी उससे, दो-तीन घंटे साथ थे-पर अब नया कुछ नहीं बन सकता।

आप सत्तर प्लस के जॉनर को बिलांग नहीं करते। क्या कहीं यह तो नहीं लगता है कि वो तो बुढ़ा गई है, लेकिन मैं अभी भी यंग हूं...
हां, लगता है। कम्युनिकेशन का लेवल बदल गया है। चूंकि उसे लगता है कि हमने उसे संरक्षण या साथ नहीं दिया, इसलिए उसे अपने परिवार में अपने भाभियों के साथ ही रहना है। कहती है कि जब मुझे सुविधा होगी, तो आऊंगी। नहीं आई तो बुरा मानने की जरूरत नहीं है।

आज जबकि आप दोनों अकेले हैं, वो आपके साथ रहने का निर्णय क्यों नहीं ले पातीं?
उस पर बुढ़ापा आ गया है, असुरक्षा महसूस करती है, कि मुझे वहीं रहना है, अपने भाई-भाभी के बच्चों के बीच। वो ही बुढ़ापे में मेरी देखरेख करेंगे।

वाज शी ब्यूटिफुल?
करीना कपूर नहीं थी, हां प्रंजेटेबल तो थी। कहीं कमरे में जाती थी, तो लोग मुड़ कर देखते थे, एक पर्सनालिटी थी। एक तो कॉन्फिडेंस और दूसरे आधिकारिक लेवल पर काम करने से जो बात आ जाती है, वो ये था कि मुझे उसे साथ ले जाने में शर्म नहीं आती थी।

जिन लोगों के साथ आपके नाम जुड़े, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा इनमें असाधारण क्या नजर आया ? क्या ये सब टिपिकल औरतें नहीं थीं?
इनकी जो मानसिक बनावट है, जो गुण हैं, उनसे मैं प्रभावित हुआ। प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही हैं।

मन्नू को आप प्रेमिका क्यों नहीं बना पाए?
बाद में हमने डिस्कवर किया कि जिंदगी सिर्फ लेखन नहीं है। मन्नू का पालन पोषण जिन लोगों के साथ हुआ, वे बहुत भले लोग थे। सुबह नौ बजे दफ्तर जाना, शाम समय पर घर लौट कर बच्चों के साथ समय बिताना। सब उतने ही आत्मीय थे। हमारी लाइफ स्टाइल बिलकुल अलग थी। वो पांच बजे घर आ जाएं और चार बजे हमारे निकलने का टाइम था। ऐसा नहीं है, कई बार वे मेरे साथ आईं, कोलकता में जब तक रहे उसने मेरा साथ दिया। काफी हाउस में देर तक रहना, दोस्तों से मिलना आदि। दिक्कत थी एक पति की जिम्मेदारियां-जो मैं नहीं निभा पाया।

साथ रहना और पति-पत्नी बन कर रहना दो अलग बातें हैं। बीस साल एक आदमी-औरत साथ रहे। एक दिन उनके मन में आया कि क्यों ना हम शादी कर लें। अगले दिन पुरुष ने कहा, सुबह उठ कर कि तुम चाय बनाओ। पत्नी ने जवाब दिया, मैं क्यों बनाऊं, तुम बनाओ जैसा पहले बनाते थे। बात यह है कि शादी दो चीजें मांगता है स्वतंत्रता, नैतिक और दैहिक आचरण। उससे बाहर जाते ही खटखट होनी शुरू हो गई।

बाहर आप खुदा होंगे, घर में आप औरत और आदमी हैं। मन्नू को ऐसा पति चाहिए था, जो उसकी शिकायतें सुनता। उसने अपनी शिकायतें एक्साजिरेट करना शुरू कर दिया। हमारे बाहर भी संबंध थे। शारीरिक नहीं, पर हां अच्छे संबंध तो थे ही। जैसे मृदुला गर्ग से। उसकी पहली कहानी ‘हंस’ में रीराइट करके छापा। उसकी पहली कहानी ‘केअर ऑफ’ अक्षर प्रकाशन छपी थी। उसके उपन्यास को भी रीराइट करना, ठीक करना-हमने ही करवाया। मृदुला के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। मन्नू को यह बात पसंद नहीं थी कि बाहर लड़कियों से संबंध रखूं, मिलूं, फोन पर बात करूं।

 पीछे मुड़ कर देखते हैं तो क्या अफसोस होता है कि आप टिपिकल हसबैंड नहीं बन पाए?
मुझे शिकायत नहीं। पर मन्नू की तरफ से सोचता हूं तो लगता है कि मैं असमर्थ था। मुझे अपनी इंडीपेंडेंस के लिए दो रास्तों में एक को चुनना था। या तो विवाह को चुनना था या अपनी आजादी को।

विवाहित जीवन में सुविधाएं भी तो थीं? फिर अलग होने की क्या सोची?
हां.. जब खटखट बढ़ी तो सोचा कि अलग रह कर देखा जाए। महीनों बाहर रहा। कई दिनों तक गाजियाबाद मित्र के घर रहा, कि दोनों एक दूसरे की कमी महसूस कर सकें। छह महीने मैं आईआईटी कानपुर में रहा, यूनिवर्सिटी का गेस्ट बन कर। मन्नू दो साल के लिए चली गई। हमने ये प्रयोग किये कि डे टू डे की क्लेश खत्म हो।

क्या आप विवाह संस्था में यकीन करते हैं?
मैं नहीं करता, लेकिन मन्नू करती है। शादी एक बंधन हो, वहां तक तो ठीक है। लेकिन उसके साथ एक आचरण की जो आचार संहिता है, उसमें मेरा दम घुटता है, मैं वहां एडजस्ट नहीं कर पाता।

मन्नू से अलग होने के बाद में कभी सेटल होने का मन नहीं आया?
नहीं। लेकिन मेरा परिचय कई खूबसूरत महिलाओं से रहा। एक थी शोभना भुटानी, एनएसडी से थी, एक्टर थी। मेरे बहुत क्लोज थी। एक संयुक्ता थी, बहुत खूबसूरत। उन दिनों ‘सारा आकाश’ पर फिल्म बन रही थी आगरा में। मेरे बुलाने पर वह मेरे साथ आगरा आई। स्टेशन पर जैसे ही वह उतरी, सबने कहा कि हीरोइन आ गई। बाद में उसके मन्नू से बहुत अच्छे संबंध बन गए। पता नहीं वो मन्नू को घुमाने कहां-कहां ले गई। लेह-लद्दाख। पहले तो बहुत ईष्या थी मन्नू को उससे लेकिन बाद में वह मन्नू की आलमोस्ट बेटी बन गई।

 क्या देख कर आप स्त्री की तरफ आकर्षित होते हैं?
पहले तो रंग रूप आता है। उसके बाद एक कॉमन कैमिस्ट्री बनती है। मुझे ऐसी महिलाएं पसंद आती हैं जिनसे संवाद बना सकूं, बाकायदा बात कर सकूं, किसी भी विषय पर। हमारे कुछ मित्र रहे हैं, स्त्री के नाम पर जो मिले झाडू लगाने वाली हो या चौका बरतन करने वाली हो, मौका मिला तो दबोच लिया। दिस, आई कांट डू। जिस स्त्री के साथ मैं मन से एक इंटीमेट संबंध ना बना सकूं, उनसे मेरा रिश्ता नहीं बन सकता।

ऐसी कोई महिला आई है, जिसके साथ आपके अच्छे संबंध रहे हों, आपने उनसे संबंध बनाना चाहा हो, लेकिन उन्होंने मना कर दिया?
हां। एक्चुअली सेक्स के स्तर पर मेरा रिश्ता तीन ही महिलाओं के साथ रहा है। मन्नू, दूसरी जिस प्रेमिका का मैंने जिक्र किया और एक और के साथ। बाकि स्त्रियों के साथ सेक्स नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि मैं सेक्सुअली कमजोर हूं, पर उस स्टेज तक आई नहीं बात। आने भी नहीं दिया। हरेक से सेक्स नहीं कर सकता।

लेकिन आप जो ‘ऑरा’ बना कर चलते हैं, उससे तो यही बात सामने आती है कि आपके कई स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रहे हैं। पिछले दिनों अजय नावरिया आपके ही सामने जिक्र करे थे सोनी का, जिसे दीवाली की सुबह उसने आपके घर में नाइट सूट में देखा था। इससे बाहर यही संदेश जाता है कि वो रात को सोई हैं?
नहीं। मेरे उससे इंटीमेट संबंध हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे पास जो भी रहे, वो फ्रीली अपना घर समझ कर रहे। मैं यहां आदमी-औरत की बात नहीं करता। अगर वो यहां रहती है, तो उसे पूरी स्वतंत्रता के साथ रहना चाहिए। सोनी जब मुझसे पहली बार मिली थी, तो इक्कीस या बाईस साल की थी और दूसरे साल ही मेरी जान को लग गई कि मैं आपका इंटरव्यू करूंगी और आपसे सेक्स संबंधों के बारे में सवाल करूंगी। इक्कीस साल की लड़की मेरे सामने खुल कर पूछ रही है मेरे संबंधों के बारे में बिंदास। मुझे ऐसी लड़कियां पसंद हैं।

जितनी भी महिलाएं आती हैं, आपसे मिलने, उन सबके साथ आपका नाम जुड़ता है। माना जाता है कि आपके साथ सोती हैं ?
सोनी जब मुझसे आई तो काफी समय बात उसने मुझे बताया कि उसे कहा गया था यादव जी के यहां मत जाओ, खतरनाक आदमी हैं, उनके चंगुल से बच नहीं पाओगी। जो भी है.. .. साल भर हो गया, आपने तो ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने हंस कर पूछा कि क्या तुम चाहती हो कि मैं ऐसा कुछ करूं? छूना-छाना, लपक-झपक मौका मिले तो किस करना यह सब तो चलता है, इससे किसी को आपत्ति भी नहीं होती। मुझे कई स्त्रियों ने बताया है कि उन्हें यह बता कर भेजा जाता था कि यादव जी से मिलने जा रही हो तो पर्स में एक छुरा रखना मत भूलना।

सेक्स की जरूरत महसूस नहीं होती आपको?
होती है. . लेकिन मैं अपने को जब्त करता हूं. मैं नहीं चाहता कि जो स्त्रियां मुझसे मिलने आती हैं, जो मुझे ऊर्जा देती हैं, वो मुझसे मिलना छोड़ दें। अब तो तस्वीरों में करीना कपूर को देख कर संतुष्ट हो जाता हूं।

करीना का कौन सा रूप आकर्षित कर गया आपको? ‘टशन’ में स्विम सूट वाला या..?
‘जब वी मेट’ में मुझे वो अच्छी लगी, हम ब्यूटी के साथ एक इनोसेंस, एक डिविनिटी लगा कर देखते हैं। इसलिए ‘टशन’ देखने का मेरा मन नहीं है। एक जमाने में मुझे स्मिता पाटिल बहुत अच्छी लगती थी, बहुत सेक्सी रमोला भी।

कुछ समय पहले जब मैंने आपसे कहा था कि मैं मुंबई जा रही हूं लेस्बियंस पर एक स्टोरी करने तो आपने हँस कर यह कह कर बात उड़ा दी कि दो औरतें कैसे करती हैं सेक्स? आप गे रिश्तों के बारे में क्या सोचते हैं?
हालांकि सन साठ में मैंने ‘प्रतीक्षा’ नाम से कहानी लिखी थी गे सबंधों के बारे में। पता नहीं कितने ट्रांसलेशन हुए, एक अमरीकी आदमी ने अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया और इंप्रिंट मैगजीन में छपा। लेस्बियन महिलाओं की बात तो दूर, मुझे सोडोमी एस्थेटिकली नहीं जंचता। संस्कार कहिए या जो भी, मैं इन रिश्तों को समर्थ नहीं देता।vमुझे चालीस साल नॉन वेज खाते हो गए। पिछले पांच-छह सालों से शोरबा खा पाता हूं, पीस नहीं। अब इसे चाहे जो कहो, मुझे एस्थेटिकली ये संबंध गंदे लगते हैं।

लेकिन आंकड़े तो कहते हैं कि हर दस में से एक पुरुष गे संबंधों के प्रति आकृष्ट होता है...
अधिकांश लड़के बचपन में शिकार बनते हैं। इन बॉर्न का नहीं पता। जब हम स्कूल में थे, तो हमसे बड़ी उम्र का एक लड़का स्साला हमें बैठा देता था कि मास्टरबेशन करो। इस तरह के संबंध होते हैं। टीचर लोग पढ़ाने के लिए बच्चों को बुलाते हैं और फिर करवाते हैं। हां.. मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन मैंने देखा है।

औरतों की एक जमात जो आपको सठिया और बुढ़ऊ कहती है, आप कैसे रिएक्ट करते हैं?
मुझे सच में महसूस नहीं होता कि मैं बूढ़ा हूं। यह बात भीतर से ही नहीं आती कि मैं उम्र दराज हो गया हूं।

क्या आप सेवंटी में पहुंची महिला से इसी तरह बेतकल्लुफी से बात कर पाते हैं?
जहां बीच में संस्कार, सीमाएं वगैरह हों, वहां बराबरी की दोस्ती नहीं बन सकती। मैं चाहता हूं जिन स्त्रियों से मेरी दोस्ती हो एक पुरुष की तरह दोस्ती हो। उतनी ही बेतकल्लुफ, संकोचहीन।

ये जो महिलाएं आपके साथ चली आती हैं, दोस्ती करती हैं यह बात सिर्फ वहीं तक नहीं रहती। उन्हें अपने परिवार को जवाब देना पड़ता है?
मान लीजिए मैं किसी लड़की से प्यार करता हूं, उसका नाम ले कर लिख देता हूं। आज वो कहीं किसी की मां है, पत्नी है, वो क्या जवाब देगी? मेरे प्यार का तकाजा यह है कि मैं उसे ऐसी स्थिति में ना डालूं, जहां वो अपने आपको छोटा महसूस कर सके।

अगर कोई महिला ऑटोबायोग्राफी लिखे, आपका जिक्र करे तो आपको फर्क पड़ेगा कि नहीं?
नहीं.. .. मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा जाता है। औरतें लिखती रही हैं। एक आई थी, मुझे याद भी नहीं कि वह मुझसे मिली था या नहीं, लेकिन उसने जो मेरे बारे में लिखा वो कोरी बातें थीं, बिलकुल काल्पनिक कि उन्होंने ऐसे देखा जैसे मुझे खा जाएंगे.. वगैरह वगैरह।
मेरे और मेरे लेखन के ऊपर एक बहुत बड़ा सेंसर है वीना का। वीना मेरे क्लोज है, मुझसे बहुत फ्री है। लेकिन वह कहती रहती है कि ‘हंस’ में यह छपेगा और यह नहीं छपेगा। जब मैंने ‘हासिल’ नाम की कहानी लिखी, तो उसने कहा- नहीं छापेंगे, मैं अड़ गया। मोस्ट मशहूर लेख ‘होना सोना’ पर अड़ गई कि नहीं छापेंगे, ‘हंस’ के लायक नहीं, उससे लड़ कर मुझे अपना लेख छापना पड़ा।

जो स्त्रियां नारी मुक्ति का झंडा उठा कर चलती हैं, जो गाहे बगाहे आपके खिलाफ बोलती हैं, उनके बारे में कुछ सुनहरे शब्द हो जाएं?
वे महिलाएं मानसिकता से या उम्र से साठ के ऊपर की हैं, जो नारी मुक्ति को नहीं मानती। जो गोलमोल वक्तव्य में विश्वास रखती हैं कि मनुष्य तो सब एक ही है। अच्छा, जो पुरुष की मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है। दो अलग अप्रोच हैं। उस चीज को तो हमें मानना होगा। क्योंकि उनकी शिक्षा-दीक्षा जिन परंपराओं में हुई, वहां तो लेखक पुरुष ही थे, जो लिखते थे, एकाध थीं, महादेवी वगैरह, जो गोल-गोल बातें लिखती थीं मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, उसमें किसको आपत्ति हो सकती थी?

फिर महिलाओं ने जो लिखना शुरू किया, इतनी वेरायटी के साथ आईं, निर्मला जैन, मृदुला, मृणाल- वे फेमिनिस्ट विरोधी हैं। झंडा बुलंद करके चलने वाली स्त्रियां हमें गालियां देती हैं कि हमने उन लेखिकाओं को बिगाड़ दिया। यहां मैं कोट करना चाहूंगा, पिछले साल किसी भी चैनल या न्यूज पेपर ने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मायावती के आने की घोषणा नहीं की। वे बस गोल-गोल घूमते रहे। लेकिन जब रिजल्ट आए तो सब चौंक गए। मायावती जीत गईं। कोई तो सचाई थी, जो उसके साथ थी, जिससे बिना शोर मचाए, बिना कहे लोग उसके साथ जुड़े हुए थे।

तो स्त्री विमर्श और दलित विमर्श में कोई तो बात, चीज थी कि आज कोई संवाद, कोई बहस इसके बिना पूरी नहीं होती। यूनिवरसिटी में दलितों का अलग सेक्शन है। यह जो उनके अनचाहे बढ़ रही है, यह बौखलाहट है उनके मन में (झंडा उठा कर चलने वालों के)। इनमें सिर्फ मैत्रेयी है, जो मानती है कि वो स्त्री वादी है। प्रभा तो बकायदा इतनी पढ़ी लिखी है कि अपने तर्कों से वह सबका मुंह बंद कर देती है। यह श्रेय तो हमें मिलना चाहिए कि पिछले बीस सालों में हमने इसे साहित्य का एक सेंटर और करेंट बना दिया।

आप पर जो अश्लीलता का आरोप लगता है, कितना जेनुइन है, कैसी प्रतिक्रिया करते हैं?
बहुत पहले हम शक्ति नगर में रहते थे, तो बस से आते-जाते थे। बस में एक औरत सफर किया करती थी, मेरा ख्याल है वही तीस-पैंतीस की होगी। जब कभी वो किसी पुरुष की बगल में बैठती, तो झगड़ा मोल लेती कि मुझे क्यों छेड़ रहा है? लड़ती हुई जाती थी। सब हंसते हुए जाते थे। यह एक किस्म की कुंठा है कि सब मुझे छेड़ते हैं।
तीस पैंतीस साल की स्त्री मैच्योर होती हैं। उनसे बात करने में यह भी होता है कि आप कोई नई चीज जान लें। वो उनके अंतरमन में झांकने का एक मौका देती हैं।

क्या आपको अफसोस होता है कि आपको तीन चार जनरेशन बाद पैदा होना था? इस जनरेशन के पास जो है पहले नहीं था, इतनी आजादी, विचारों में इतना खुलापन..
ठीक है, हां यह तो सही है कि आज के जनरेशन के पास आजादी है। पर जो है सो है। अब होता है कि बेकार में अपनी जिंदगी खराब की। रोंमाटिसिस्म में और इन सबमें कई खूबसूरत चीजें अनदेखी कर दी। अफसोस तो होता है।

 किसी चीज की शिकायत रह गई? पावर, पैसा या और कुछ?
उस मामले में जो मैंने चाहा मुझे मिला। इस तरह की कोई शिकायत नहीं है। हां, अकेलापन कभी-कभी खलता है।

 जो भी औरत आपके पास, आपसे मिलने आती है, आपसे क्या चाहती है?
शुरू में जो भी आती है एक दूरी बना कर आती है। जब इंटीमेट हो जाती है तो फिर आदमी-औरत वाली बात नहीं रहती। उससे ऐसा रिश्ता बन जाता है जिसमें वो लड़ भी सकती है गाली भी दे सकती है।

ऐसे संबंध आपको ज्यादा प्रिय हैं?
बिलकुल। इंटीमेट, बेतकल्लुफी भरे संबंध मुझे अच्छे लगते हैं।

आप अपनी फेंटेसीज किसके साथ शेअर करते हैं?
किसी से नहीं। कभी डायरी में लिख दिया, तो लिख दिया। हां मिस तो करता हूं कि किसी से कह नहीं पाता।यहां मैं चीनी कम फिल्म का जिक्र करूंगा। यह फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी। उसमें नायक-नायिका (अमिताभ बच्चन-तब्बू) के बीच जो एज डिफरेंस और अंडरस्टैडिंग है, बहुत सही है.
मैं मानता हूं अपने से यंग छोटी उम्र की स्त्रियों के साथ दोस्तियां बनी रहे, यह आपको युवा रखता है।

(samachar4media.com से साभार)

भास्कर चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल पर शादी का झांसा देकर देश-विदेश में रेप करने का आरोप


(यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया )


डीबी कार्प यानि भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ एक महिला ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है. इस बाबत उसने पहले पुलिस केस करने के लिए आवेदन दिया पर जब पुलिस वालों ने इतने बड़े व्यावसायिक शख्स रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ मुकदमा लिखने से मना कर दिया तो पीड़िता को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. कोर्ट में पीड़िता ने रमेश चंद्र अग्रवाल पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. पीड़िता का कहना है कि रमेश चंद्र अग्रवाल ने उसे पहले शादी का झांसा दिया. कई जगहों पर शादी रचाने का स्वांग किया. इसके बाद वह लगातार संभोग, सहवास, बलात्कार करता रहा.
बाद में रमेश चंद्र अग्रवाल ने पीड़िता का उसके पति से तलाक करवाया. आखिरकार जब रमेश चंद्र अग्रवाल का पीड़िता से मन उब गया तो उसने उसे किनारे कर दिया और कोई भी संपर्क रखने से बचने लगा. इससे मजबूर होकर पीड़िता को कोर्ट का रास्ता अपनाना पड़ा.

पीड़िता ने कोर्ट में लिखित शिकायत  में जो कुछ कहा है, वह न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि एक बड़े मीडिया हाउस के मालिक की महिलाओं के प्रति नजरिए को भी उजागर करता है. बेटियों, महिलाओं को बचाने, सम्मान देने, बराबरी देने के ढेर सारे नारे देने वाला भास्कर समूह का चेयरमैन खुद महिला उत्पीड़न के एक बड़े मामले में आरोपी बन गया है.
देश के बाकी सारे मीडिया हाउस, अखबार, न्यूज चैनल इस खबर पर कतई एक लाइन न तो लिखेंगे, न दिखाएंगे क्योंकि उनके बिरादरी, फ्रैटनर्टी का मामला है. अगर यही मसला किसी और का होता तो मीडिया हाउस न जाने कबका इतना शोर मचा चुके होते कि पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर जेल में डाल चुका होता. ये खबर उन पत्रकारों, संपादकों के लिए है जो दिन भर पत्रकारिता के पतन पर आंसू बहाते रहते हैं लेकिन मीडिया के मालिकों की घिनौनी करतूत पर चुप्पी साधे रहते हैं.

अब पूरा दारोमदार सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, वेब, ब्लाग, ह्वाट्सएप आदि पर है जहां इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर पूरे मामले को जनता के बीच ले जाया जा सकता है और बड़े लोगों की काली करतूत को उजागर किया जा सकता है. ये पूरा प्रकरण भड़ास के पास ह्वाट्सएप के जरिए पहुंचा है. सोचिए, अगर ये न्यू मीडिया माध्यम न होते तो बड़े लोगों से जुड़ी काली खबरें हमारे आप तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ जातीं क्योंकि बिकाऊ और बाजारू कार्पोरेट मीडिया का काम बड़े लोगों से जुड़ी भ्रष्टाचार और अत्याचार की खबरों को छापना नहीं बल्कि छुपाने का हो गया है.






Saturday, 25 October 2014

फ़ेसबुक पर महान स्टीफन हॉकिंग की पहली पोस्ट

ब्रिटेन के मशहूर भौतिक विज्ञानी प्रोफ़ेसर स्टीफन हॉकिंग ने फ़ेसबुक पर अपनी पहली पोस्ट में अपने प्रशंसकों को 'जिज्ञासु' बनने की नसीहत दी है.
वैसे तो हॉकिंग सात अक्टूबर को ही फ़ेसबुक पर आ गए थे लेकिन उन्होंने अब जाकर इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी पहली पोस्ट जारी की है.
इसमें प्रोफ़ेसर हॉकिंग ने कहा, "मैं हमेशा से ही सृष्टि की रचना पर हैरान रहा हूं. समय और अंतरिक्ष हमेशा के लिए रहस्य बने रह सकते हैं, लेकिन इससे मेरी कोशिशें नहीं रुकी हैं.
उन्होंने कहा, "एक-दूसरे से हमारे संबंध अनंत रूप से बढे हैं. अब मेरे पास मौका है और मैं इस यात्रा को आपके साथ बांटने के लिए उत्सुक हूं. जिज्ञासु बनें. मैं जानता हूं कि मैं हमेशा जिज्ञासु बना रहूंगा."
यूनिवर्सिटी ऑफ़ केम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफ़ेसर रहे हॉकिंग की गिनती अल्बर्ट आइंस्टीन के बाद दुनिया के सबसे अग्रणी भौतकशास्त्रियों में होती है. स्टीफन हॉकिंग व्हीलचेयर पर लगे कंप्यूटर और वॉयस सिंथेसाइजर की मदद से अपनी बात रखते हैं. ब्रह्माण्ड और भौतिकी के कई रहस्य सुलझाने वाले हॉकिंग 1988 में अपनी पुस्तक 'द ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' से पूरी दुनिया में चर्चा में आए. ब्लैक होल और बिग बैंग जैसी खगोलीय घटनाओं पर उनके शोध और विचारों ने कई खोजों में अहम भूमिका निभाई.
मोटर न्यूरॉन बीमारी से ग्रसित हॉकिंग ने यह सभी काम एक व्हील चेयर, कंप्यूटर और वॉयस जेनरेटर के ज़रिए किए.
(बीबीसी से साभार)

भाड़ में जाये त्योहार / जयप्रकाश त्रिपाठी


कई वर्षों में पहली बार परसो, कल और आज तीन दिन लगातार देखा कि अपने मोहल्ले के एक रहस्यमय मठ के फाटक पर रिक्शेवाले कतारबद्ध सवारियों के इंतजार में जमे हुए हैं। आज सुबह ब्लड शुगर का इंजेक्शन लगवाने के बाद उधर से पैदल गुजरते समय उन्ही में से एक रिक्शेवाले के साथ हो लिया। त्योहार से भी उनके बेखबर होने का सबब जानना चाहा। वह बोला - आप के पास कोई पुरानी शर्ट हो तो दे दीजिए। पहन कर अपने गांव जाना चाहता हूं। इस बार गांव लौटने भर को किराया नहीं जुटा पाया। मैंने कहा- नई शर्ट से काम चला लो, अभी ले आता हूं। एक्सिडेंट के बाद को मां को देखने आई छोटी बेटी खरीद कर दे गई थी। ....मुझे लगा कि ज्यादातर रिक्शेवालों की कमोबेश मजबूरियां एक जैसी। फुर्सत किसे है आज के जमाने में उनका दुख-दर्द जानने की... सबके सिर त्योहार की मस्ती। भाड़ में जाये ऐसी दुनिया।  

Amrita and Imrojh- A Love Story


एक कवयित्री और चित्रकार की प्रेम कहानी : अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था- मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं.

अमृता और इमरोज़ का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था. अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब 'आख़िरी ख़त' का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था. सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है.
सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया. उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे. इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया.
पढ़िए विस्तार से विवेचना
इमरोज़ याद करते हैं, ''उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी. उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया. हम दोनों पास ही रहते थे. मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर में."
"एक बार मैं यूँ ही उनसे मिलने चला गया. बातों-बातों में मैंने कह दिया कि मैं आज के दिन पैदा हुआ था. गांवों में लोग पैदा तो होते हैं लेकिन उनके जन्मदिन नहीं होते. वो एक मिनट के लिए उठीं, बाहर गईं और फिर आकर वापस बैठ गईं. थोड़ी देर में एक नौकर प्लेट में केक रखकर बाहर चला गया. उन्होंने केक काट कर एक टुकड़ा मुझे दिया और एक ख़ुद लिया. ना उन्होंने हैपी बर्थडे कहा ना ही मैंने केक खाकर शुक्रिया कहा. बस एक-दूसरे को देखते रहे. आँखों से ज़रूर लग रहा था कि हम दोनों खुश हैं.''
ये तो एक शुरुआत भर थी लेकिन इससे बरसों पहले अमृता के ज़हन में एक काल्पनिक प्रेमी मौजूद था और उसे उन्होंने राजन नाम भी दिया था. अमृता ने इसी नाम को अपनी ज़िंदगी की पहली नज़्म का विषय बनाया.
एक बार अमृता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि जब वो स्कूल में पढ़ती थीं तो उन्होंने एक नज़्म लिखी. उसे उन्होंने ये सोचकर अपनी जेब में डाल लिया कि स्कूल जाकर अपनी सहेली को दिखाऊँगी.
अमृता अपने पिता के पास कुछ पैसे मांगने गईं. उन्होंने वो पैसे उनके हाथ में न देकर उनकी जेब में डालने चाहे. उसी जेब में वो नज़्म रखी हुई थी. पिता का हाथ उस नज़्म पर पड़ा तो उन्होंने उसे निकालकर पढ़ लिया.
पूछा कि क्या इसे तुमने लिखा है. अमृता ने झूठ बोला कि ये नज़्म उनकी सहेली ने लिखी है. उन्होंने उस झूठ को पकड़ लिया और उसे दोबारा पढ़ा. पढ़ने के बाद पूछा कि ये राजन कौन है?
अमृता ने कहा, कोई नहीं. उन्हें ऐतबार नहीं हुआ. पिता ने उन्हें ज़ोर से चपत लगाई और वो काग़ज़ फाड़ दिया.
अमृता बताती हैं, ''ये हश्र था मेरी पहली नज़्म का. झूठ बोलकर अपनी नज़्म किसी और के नाम लगानी चाही थी लेकिन वो नज़्म एक चपत को साथ लिए फिर से मेरे नाम लग गई.''
दुनिया में हर आशिक़ की तमन्ना होती है कि वो अपने इश्क़ का इज़हार करें लेकिन अमृता और इमरोज़ इस मामले में अनूठे थे कि उन्होंने कभी भी एक दूसरे से नहीं कहा कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं.
इमरोज़ बताते हैं, ''जब प्यार है तो बोलने की क्या ज़रूरत है? फ़िल्मों में भी आप उठने-बैठने के तरीक़े से बता सकते हैं कि हीरो-हीरोइन एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन वो फिर भी बार-बार कहते हैं कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं और ये भी कहते हैं कि वो सच्चा प्यार करते हैं जैसे कि प्यार भी कभी झूठा होता है.''
परंपरा ये है कि आदमी-औरत एक ही कमरे में रहते हैं. हम पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहते रहे. वो रात के समय लिखती थीं. जब ना कोई आवाज़ होती हो ना टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और ना कोई आता-जाता हो.
उस समय मैं सो रहा होता था. उनको लिखते समय चाय चाहिए होती थी. वो ख़ुद तो उठकर चाय बनाने जा नहीं सकती थीं. इसलिए मैंने रात के एक बजे उठना शुरू कर दिया. मैं चाय बनाता और चुपचाप उनके आगे रख आता. वो लिखने में इतनी खोई हुई होती थीं कि मेरी तरफ़ देखती भी नहीं थीं. ये सिलसिला चालीस-पचास सालों तक चला.
उमा त्रिलोक इमरोज़ और अमृता दोनों की नज़दीकी दोस्त रही हैं और उन पर उन्होंने एक किताब भी लिखी है- 'अमृता एंड इमरोज़- ए लव स्टोरी.'
उमा कहती हैं कि अमृता और इमरोज़ की लव-रिलेशनशिप तो रही है लेकिन इसमें आज़ादी बहुत है. बहुत कम लोगों को पता है कि वो अलग-अलग कमरों में रहते थे एक ही घर में और जब इसका ज़िक्र होता था तो इमरोज़ कहा करते थे कि एक-दूसरे की ख़ुशबू तो आती है. ऐसा जोड़ा मैंने बहुत कम देखा है कि एक दूसरे पर इतनी निर्भरता है लेकिन कोई दावा नहीं है.
वर्ष 1958 में जब इमरोज़ को मुंबई में नौकरी मिली तो अमृता को दिल ही दिल अच्छा नहीं लगा. उन्हें लगा कि साहिर लुधियानवी की तरह इमरोज़ भी उनसे अलग हो जाएंगे.
इमरोज़ बताते हैं कि गुरु दत्त उन्हें अपने साथ रखना चाहते थे. वेतन पर बात तय नहीं हो पा रही थी. अचानक एक दिन अपॉएंटमेंट-लैटर आ गया और वो उतने पैसे देने के लिए राज़ी हो गए जितने मैं चाहता था.
मैं बहुत ख़ुश हुआ. दिल्ली में अमृता ही अकेले थीं जिनसे मैं अपनी ख़ुशी शेयर कर सकता था. मुझे ख़ुश देख कर वो ख़ुश तो हुईं लेकिन फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए.
उन्होंने थोड़ा घुमा-फिराकर जताया कि वो मुझे मिस करेंगी, लेकिन कहा कुछ नहीं. मेरे जाने में अभी तीन दिन बाक़ी थे. उन्होंने कहा कि ये तीन दिन जैसे मेरी ज़िंदगी के आख़िरी दिन हों.
तीन दिन हम दोनों जहाँ भी उनका जी चाहता, जाकर बैठते. फिर मैं मुंबई चला गया. मेरे जाते ही अमृता को बुख़ार आ गया. तय तो मैंने यहीं कर लिया था कि मैं वहाँ नौकरी नहीं करूँगा. दूसरे दिन ही मैंने फ़ोन किया कि मैं वापस आ रहा हूँ.
उन्होंने पूछा सब कुछ ठीक है ना. मैंने कहा कि सब कुछ ठीक है लेकिन मैं इस शहर में नहीं रह सकता. मैंने तब भी उन्हें नहीं बताया कि मैं उनके लिए वापस आ रहा हूँ. मैंने उन्हें अपनी ट्रेन और कोच नंबर बता दिया था. जब मैं दिल्ली पहुंचा वो मेरे कोच के बाहर खड़ी थीं और मुझे देखते ही उनका बुख़ार उतर गया.
अमृता को साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत थी. अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में वो लिखती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे. साहिर के जाने के बाद वो उनकी सिगरेट की बटों को दोबारा पिया करती थीं.
इस तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी. अमृता साहिर को ताउम्र नहीं भुला पाईं और इमरोज़ को भी इसका अंदाज़ा था. अमृता और इमरोज़ की दोस्त उमा त्रिलोक कहती हैं कि ये कोई अजीब बात नहीं थी. दोनों इस बारे में काफ़ी सहज थे.
उमा त्रिलोक बताती हैं, ''वो ये कहती थी कि साहिर एक तरह से आसमान हैं और इमरोज़ मेरे घर की छत! साहिर और अमृता का प्लैटोनिक इश्क था. इमरोज़ ने मुझे एक बात बताई कि जब उनके पास कार नहीं थी वो अक्सर उन्हें स्कूटर पर ले जाते थे."
"अमृता की उंगलियाँ हमेशा कुछ न कुछ लिखती रहती थीं... चाहे उनके हाथ में कलम हो या न हो. उन्होंने कई बार पीछे बैठे हुए मेरी पीठ पर साहिर का नाम लिख दिया. इससे उन्हें पता चला कि वो साहिर को कितना चाहती थीं! लेकिन इससे फ़र्क क्या पड़ता है. वो उन्हें चाहती हैं तो चाहती हैं. मैं भी उन्हें चाहता हूँ.''
अमृता जहाँ भी जाती थीं इमरोज़ को साथ लेकर जाती थीं. यहाँ तक कि जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तो इमरोज़ हर दिन उनके साथ संसद भवन जाते थे और बाहर बैठकर उन का इंतज़ार किया करते थे.
वो उनके साथी भी थे और उनके ड्राइवर भी. इमरोज़ कहते हैं, ''अमृता काफ़ी मशहूर थीं. उनको कई दूतावासों की ओर से अक्सर खाने पर बुलाया जाता था. मैं उनको लेकर जाता था और उन्हें वापस भी लाता था. मेरा नाम अगर कार्ड पर नहीं होता था तो मैं अंदर नहीं जाता था. मेरा डिनर मेरे साथ जाता था और मैं कार में बैठकर संगीत सुनते हुए अमृता का इंतज़ार करता था."
"धीरे-धीरे उनको पता चला गया कि इनका ब्वॉय-फ़्रेंड भी है. तब उन्होंने मेरा नाम भी कार्ड पर लिखना शुरू कर दिया. जब वो संसद भवन से बाहर निकलती थीं तो उद्घोषक को कहती थीं कि इमरोज़ को बुला दो. वो समझता था कि मैं उनका ड्राइवर हूँ. वो चिल्लाकर कहता था- इमरोज़ ड्राइवर और मैं गाड़ी लेकर पहुंच जाता था.''
अमृता प्रीतम का विवाह प्रीतम सिंह से हुआ था लेकिन कुछ वर्ष बाद उनका तलाक़ हो गया था.
अमृता का आख़िरी समय बहुत तकलीफ़ और दर्द में बीता. बाथरूम में गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई. उसके बाद मिले दर्द ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा.
उमा त्रिलोक कहती हैं, ''इमरोज़ ने अमृता की सेवा करने में अपने आपको पूरी तरह से झोंक दिया. उन दिनों को अमृता के लिए इमरोज़ ने ख़ूबसूरत बना दिया. उन्होंने उनकी बीमारी को उनके साथ-साथ सहा. बहुत ही प्यार से वो उनको खिलाते, उनको पिलाते, उनको नहलाते, उनको कपड़े पहनाते. वो क़रीब-क़रीब शाकाहारी हो गईं थीं बाद में, वो उनसे बातें करते, उन पर कविताएं लिखते, उनकी पसंद के फूल लेकर आते. जबकि वो इस काबिल भी नहीं थीं कि वो हूँ-हाँ करके उसका जवाब ही दे दें.''
31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आख़िरी सांस ली. लेकिन इमरोज़ के लिए अमृता अब भी उनके साथ हैं. उनके बिल्कुल क़रीब. इमरोज़ कहते हैं-
''उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं. वो अब भी मिलती है कभी तारों की छांव में कभी बादलों की छांव में कभी किरणों की रोशनी में कभी ख़्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं...''
(बीबीसी हिंदी से साभार संवाददाता रेहान फ़ज़ल की स्टोरी)

Friday, 24 October 2014

धन-मीडिया का जंगल में मंगल

(रायपुर में कंजरवेशन कोर फिल्म फेस्टिवल में सुदीप ठाकुर का व्याख्यान)

जंगलों को निवेश का जरिया बनाने में मीडिया की भी बड़ा भूमिका है. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मीडिया को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निवेश का फैसलिटेटर बना दिया गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है मीडिया समूहों में आने वाली पूंजी. पता ही नहीं चलता है कि यह कहां कहां से और कैसे आ रही है. न जाने कितने औद्योगिक समूहों के हित मीडिया से जुड़ गए हैं. नतीजतन मीडिया में जंगल की जमीन सिमटती जा रही है. 

देश का कोई सर्वाधिक उपेक्षित और वंचित तबका है, तो वह आदिवासी हैं. मैं न तो यह कोई नई बात कह रहा हूं और न ही कोई रहस्योद्घाटन कर रहा हूं. यह सवाल भी न जाने कितनी बार दोहराया जा चुका है कि आखिर ऐसा क्यों है कि जिस तबके ने प्राकृतिक संसाधनों के साथ साहचर्य स्थापित किया था, उसे उनके जंगलों से ही बेदखल किया जा रहा है?
जंगल में आदिवासी : विकास की हमारी अवधारणा में हम उसे बराबरी का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते? या फिर ऐसा क्यों हुआ है कि जितनी भी बड़ी परियोजनाएं हैं फिर वह बांध हो, बिजली संयंत्र, लोहे या कोयले की खदानें, उसका सर्वाधिक खामियाजा आदिवासियों, वनवासियों के साथ ही वन्यजीवों को भुगतना पड़ता है? ये सवाल न तो पहली बार पूछे जा रहे हैं और न आखिरी बार.
हर तीसरा छत्तीसगढ़िया : असल में यह मुद्दा इस बात से जुड़ा है कि आखिर जंगलों और आदिवासियों के साथ हमारा बर्ताव किस तरह का है. हम छत्तीसगढ़ के उदाहरणों से ही समझ सकते हैं. यहां 44 फीसदी वन क्षेत्र हैं, जिसमें से बड़ा हिस्सा रिजवर्ड और प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट के तहत आता है. यहां लोहा, बॉक्साइट जैसे महंगे खनिज दबे हुए हैं, हीरे तक की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. साल, सागौन, बीजा, महुआ, तेंदू जैसे पेड़ों के घने जंगल हैं. बाघ, तेंदुआ, चीतल, वनभैंसा जैसे जीव हैं और यहां की कुल आबादी का 30 फीसदी हिस्सा आदिवासी हैं. यानी हर तीन में से एक छत्तीसगढ़िया आदिवासी है!
मगर इस आदिवासी की छत्तीसगढ़ में क्या भूमिका है? नीतियां बनाने से लेकर निर्णय लेने में उसकी भूमिका कहीं दिखती नहीं है. हैरत की बात है कि जिस क्षेत्र को आदिवासी बहुल और उपेक्षित होने के कारण अलग राज्य बनाया गया, उसे अब दुनियाभर में खदानों, पावर प्लांट और इस्पात संयंत्रों और माओवादी हिंसा की वजह से जाना जाता है. माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र बढ़ गया. मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है कि यहां पिछले 14 वर्षों में राज्य बनने के बाद कितना निवेश हो चुका है, लेकिन मेरी जानकारी में अभी 31 अगस्त 2014 से 30 सितंबर 2014 के बीच छत्तीसगढ़ से छह खदानों में 1416.4 हेक्टेयर क्षेत्र के फारेस्ट क्लियरेंस से संबंधित प्रस्ताव केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय को दिए गए हैं. इनमें बैलाडीला की खदान नंबर 13 का प्रस्ताव भी है, जहां से महज 75 किमी दूर इंद्रावती टाइगर रिजर्व है.
सरकार ने खुद माना है कि उस क्षेत्र में तेंदुआ, वनभैंसा, सांभर,भालू जैसे वन्यजीव देखे जाते हैं. सर्वोच्च अदालत तक ने टाइगर रिजर्व के आसपास खनन पर रोक लगाई है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के मुताबिक हर राज्य के लिए अपने हर वन्यजीव क्षेत्र में कोर और बफर जोन को अधिसूचित करना अनिवार्य है. इस अधिनियम के मुताबिक 800 से 1000 वर्ग किमी के क्षेत्र को कोर एरिया के रूप में और बाकी के क्षेत्र को बफर क्षेत्र के रूप में नोटीफाई किया जाना चाहिए.
1990 के दशक में मैंने रिपोर्टिंग के दौरान देखा था कि किस तरह केंद्र और राज्य की सरकारें बैलाडीला की 11 बी खदान एक निजी कंपनी को देने को उतावली थीं. 11 बी एशिया की सबसे उम्दा लौह अयस्क खदान है. यहां 68 फीसदी तक आयरन ओर है. तत्कालीन प्रदेश सरकार ने सिर्फ 16 करोड़ रुपये में इसकी लीज के हस्तांतरण का फैसला कर लिया था.
इस दौड़ में जो कंपनियां लगी हुई थीं उनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बेटे की कंपनी तक शामिल थी. खैर बड़े आंदोलन और अदालती कार्रवाइयों के बाद उसका निजीकरण नहीं हो सका. बात सिर्फ निजी क्षेत्र की नहीं है, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों ने भी खदानों का दोहन तो खूब किया है, लेकिन जंगलों और आदिवासियों को होने वाले नुक्सान की भरपाई नहीं की है. बेशक, बैलाडीला और रावघाट में सबसे उम्दा लौह अयस्क मिलता है. मगर यह किस कीमत पर और किसकी कीमत पर चाहिए?
किसका कानून : ऐसा नहीं है कि आदिवासियों के हितों को संरक्षित करने के लिए कुछ नहीं किया गया. संविधान में दर्ज पांचवी और छठी अनुसचियां, 1996 का पेसा और 2006 का वन अधिकार अधिनियम जैसे कई उपाय हैं. इसके बावजूद हालात नहीं बदले हैं. मैं दो महत्वपूर्ण कानूनों का जिक्र करना चाहूंगा. एक है 1927 का वन अधिकार कानून और दूसरा है 1894 का जमीन अधिग्रहण कानून जिन्हें बदलने में अस्सी से सौ बरस तक लग गए. अब इन दोनों कानूनों को भी बदलने की बात होने लगी है, क्योंकि इन्हें निवेश और विकास की राह में रोड़ा माना जा रहा है!
आप कहीं भी देख लीजिए विकास संबंधी जितनी भी परियोजनाएं हैं, उसके लिए आदिवासियों को ही बेदखल किया जाता है.
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने 23 अक्टूबर, 2008 को लोकसभा में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विकास के नाम पर आदिवासियों को और भुगतना न पड़े. आदिवासी मामलों से संबंधित मंत्रालय को उन जगहों का संज्ञान लेना चाहिए जहां आदिवासी विस्थापन और अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया, 15 अक्टूबर, 2012 की एक रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश के सिंगरौली क्षेत्र में कोयला खदान के विस्तार के कारण 500 सौ आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा है, जिनकी पहुंच वनोपज से दूर होती जा रही है. ये लोग पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं. वहां जंगलों में बाउंड्री बना दी गई है जिससे आदिवासी वनोपज एकत्र करने नहीं जा सकते. ऐसा हर उस जगह हो रहा है, जहां नए संयंत्रों या खदानों के लिए जमीन अधिग्रहित की जा रही हैं. यानी उन जगहों पर जंगल कंपनी का हो गया है! यह नया कंपनी राज है! इस कंपनी राज के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है, क्योंकि लाइसेंस राज को तो खत्म कर दिया गया है. अब तो सिंगल विंडो का जमाना है. सरकारें कॉरपोरेट को खुद आमंत्रित कर रही हैं. उनके लिए लाल कालीनें बिछाई जा रही हैं.
इन्वेस्टर्स समिट की जाती हैं और उनके साथ हर वर्ष वर्ष विभिन्न राज्यों में लाखों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं. हैरत की बात है कि सरकारें अब खुद को इन कंपनियों का फैसलिटेटर बताने से गुरेज नहीं कर रही हैं.अब तो डिमांड, डेमोग्राफी, डिविडेंट और डेवलपमेंट की बात की जा रही है और उसे इन्वेस्टमेंट से जोड़ा जा रहा है, लेकिन कोई डिवाइड और गैप की बात नहीं कर रहा है. जंगल में यह डिवाइड बढ़ती जा रही है.
मीडिया भी फैसलिटेटर : जंगलों को निवेश का जरिया बनाने में मीडिया की भी बड़ा भूमिका है. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मीडिया को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निवेश का फैसलिटेटर बना दिया गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है मीडिया समूहों में आने वाली पूंजी. पता ही नहीं चलता है कि यह कहां कहां से और कैसे आ रही है. न जाने कितने औद्योगिक समूहों के हित मीडिया से जुड़ गए हैं. नतीजतन मीडिया में जंगल की जमीन सिमटती जा रही है.
सबसे ताजा उदाहरण के तौर पर हम कोयला घोटाले से संबंधित मामले को देख सकते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के 1993 के बाद से आवंटित किए गए 218 में से चार को छोड़कर बाकी सारे कोल ब्लाकों के आवंटन को अवैध करार देकर रद्द कर दिए जाने के फैसले से औद्योगिक जगत में हड़कंप मच गया. मीडिया ने इस खबर को इस तरह परोसा मानो कोयला ब्लाकों का आवंटन रद्द होने से अर्थव्यस्था रसातल में चली जाएगी.
विकास का पहिया थम जाएगा और न जाने क्या क्या..... कई प्रतिष्ठित पत्रों ने इसे अफसोसनाक फैसला तक करार दिया. मगर क्या वाकई मामला ऐसा ही है. हकीकत यह है कि इन 218 में से सिर्फ 42 पर ही काम शुरू हो सका है. सर्वोच्च न्यायालय ने जिन ब्लाकों को छोड़ा वे आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाएं हैं. यानी 172 कोल ब्लाकों में तो काम शुरू भी नहीं हुआ है!
इनमें कैप्टिव पॉवर प्लांट भी शामिल हैं. जाहिर है, कैप्टिव प्लांट में पैदा होने वाली बिजली इस्पात और सीमेंट जैसे संयंत्रों के लिए थी. इसका आम उपभोक्ता से कोई सीधा लेना देना नहीं है.
इस फैसले के बाद मीडिया के बड़े वर्ग की चिंता इन ब्लाकों में औद्योगिक घरानों और बैंकों के फंसे कोई छह लाख करोड़ रुपयों को लेकर दिखाई देती है. इनमें कहीं भी इन कोल ब्लाक को रद्द किए जाने से प्रभावित होने वाले कर्मचारियों और श्रमिकों की चिंता नहीं झलकती. कोई यह बताने वाला नहीं है कि आखिर कितने घरों में इन कोल ब्लाकों के रद्द होने से चूल्हे ठंडे हो गए या हो सकते हैं.
विकास और विस्थापन : विकास की यह कैसी समझ है? हम किसके विकास की और किस तरह के विकास की बात कर रहे हैं. उन लोगों की चिंता किसी को क्यों नहीं है कि इन कोल ब्लाकों के कारण कितनों का अस्तित्व ही दफन हो गया. कितने लोगों को इनके कारण विस्थापित होना पड़ रहा है.
हैरानी नहीं होनी चाहिए कि मध्य भारत के सिंगरौली के13 कोल क्षेत्रों में 11 लाख हेक्टेयर जंगल कोयला कंपनियों और सरकार के निशाने पर है. सिंगरौली को ही उदाहरण की तरह देखें तो 1952 में यहां के लोगों को रिंहद बांध से जुड़ी बिजली परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा था. तब उन्हें बांध के उत्तरी हिस्से में बसाया गया. इसके बाद 1965 में उन्हें तब दोबारा विस्थापित किया गया जब नादर्न कोलफील्ड लिमिटेड ने वहां खनन शुरू किया गया. उसके बाद 1980 में उन्हें तीसरी बार तब बेदखल कर दिया गया जब नेशनल थर्म पावर कॉरपोरेशन ने वहां बिजली परियोजना पर काम शुरू किया.
इस क्षेत्र में 1980 के वन संरक्षण अधिनिमय के लागू होने के बाद वर्ष 2011 तक इस क्षेत्र में 5872 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को आधिकारिक रूप से गैर वन संबंधी कामों की ओर मोड़ दिया गया. इसमें से 5760 हेक्टेयर तो संरक्षित वन क्षेत्र की जमीन थी.
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के एक अध्ययन के मुताबिक 2007 के बाद से 157 कोल ब्लाकों के लिए 45000 हेक्टेयर वनों का सफाया कर दिया गया.
जंगलों कटाई : सिर्फ खदानों के कारण ही जंगलों का नुक्सान नहीं हुआ है. हाल के दशकों में जंगलों की अवैध कटाई का सबसे बड़ा मामला मालिक मकबूजा प्रकरण के रूप में सामने आया था. आप सब वाकिफ होंगे कि किस तरह नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ ने बस्तर में 50,000 से अधिक पेड़ काट डाले. जंगलों के नष्ट होने का चौतरफा नुकसान होता है. इसका पारिस्थितिकी और कुल मिलाकर वन्यजनजीवन पर असर पड़ता है. जंगलों में हलचल बढ़ने से आदिवासियों के साथ ही वन्यजीवों के लिए भी परेशानी खड़ी होती है. आजादी के समय 40,000 से अधिक बाघ थे जो अब डेढ़ हजार के करीब रह गई है.
आदिवासियों के कारण जंगलों का नुक्सान नहीं होता. आदिवासी तो अपनी जरूरत के मुताबिक लकड़ी और वनोपज लेता है. उसके घर में तो आप साल और सागौन के फर्नीचर नहीं पाएंगे. उसके जीवन में तो कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. लोहा, कोयला के अलावा लघु वनोपज के आधार पर देखें तो इस देश में सर्वाधिक संपन्न तबका तो आदिवासियों को होना चाहिए, लेकिन उनके पास आज बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. छत्तीसगढ़ में तो हर साल तकरीबन 50,000 करोड़ रुपये का तो तेंदूपत्ता ही हो जाता है. लेकिन इसमें 45000 करोड़ के करीब निजी कंपनियों के हाथ चला जाता है.
जंगल को लेकर हमारी समझ : जंगल और वन्यजीवों को लेकर हमारी समझ किस तरह की है यह इस किस्से से पता चलता है. दुर्लभ किस्म की पहाड़ी मैना के संरक्षण का खयाल आने पर वन अधिकारियों ने कुछ पहाड़ी मैना को मेटिंग के लिए तैयार किया. कई साल हो गए कुछ नहीं हुआ. इस पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये. लेकिन आज तक अधिकारियों को यह पता ही नहीं है कि इनमें से नर कौन सी है और मादा कौन सी है.
यह बात सिर्फ सरकारी अमले तक सीमित नहीं है. तेंदुआ, सिंह और बाघ के मामले में हमारे पत्रकार साथी तक फर्क नहीं कर पाते हैं. खबरों में कभी इन्हें चीता तक बता दिया जाता है. जबकि देश में चीता को लुप्त हुए दशकों बीत चुके हैं. एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने उत्तराखंड में एक हथिनी के उग्र हो जाने और कुछ लोगों को कुचल देने पर उसे आदमखोर तक लिख दिया था.
माओवादी हिंसा : छत्तीसगढ़, झारखंड या ओडिशा जैसे राज्यों में आदिवासी माओवादियों और कॉरपोरेट के बीच पिसकर रह गए हैं. बीते दो ढाई दशकों में आर्थिक उदारीकरण और नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद से उनकी हालत और खराब हुई है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था. याद नहीं पड़ता कि कभी माओवादियों ने किसी वन्यजीव का शिकार रोकने के लिए कोई फरमान जारी किया हुआ.
जंगलों, वन्यजीवों और आदिवासियों के प्रति जिस संवेदना की जरूरत है वह दिखाई नहीं देती. चाहे सरकार की बात हो, मीडिया हो या फिर आम जन. फॉरेस्ट्री का कोर्स प्राथमिक स्कूलों से क्यों नहीं शुरू किया जा सकता ताकि बच्चे प्राकृतिक संसाधनों और जंगलों की कीमत समझ सकें और जब कोई पेड़ कटे तो उन्हें खुद को दर्द महसूस हो. यह कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं है.

‘उल्लू’ बना रहे टीवी विज्ञापन / कुलदीप भावसार

नीचे दिए गए चार उदाहरण बानगी हैं, टीवी पर दिखाए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों और उनसे होने वाले दुष्प्रभावों के। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में गोरे करने वाले क्रीम और पावडर के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन प्रतिबंध की जरूरत दूसरे विज्ञापनों पर भी है। कोई कंपनी धार्मिक आस्थाओं का गलत फायदा उठाकर हनुमान यंत्र बेच रही है तो कोई रातों-रात करोड़पति बनाने का झांसा देकर महालक्ष्मी यंत्र।
केस 1: कानपुर रोड निवासी राहुल पाठक चार साल से आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। टीवी पर पंचमुखी हनुमान कवच का विज्ञापन देखा तो उन्हें लगा कि उनकी परेशानियों का हल मिल गया। उन्होंने रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेकर हजारों रुपए कीमत का हनुमान कवच बुलवाया। कवच धारण किए हुए तीन माह बीच चुके हैं। आर्थिक स्थिति सुधरना तो दूर खाने के लाले हैं। कवच के साथ मिली गोल्ड प्लेटेड चेन की चमक कभी की उतर गई।
केस 2: 8वीं कक्षा में पढ़ने वाली सोनाली घर से स्कूल ट्रिप का बहाना बनाकर सहेलियों के साथ घुमने चली गई। शाम तक वह नहीं लौटी तो परिजन ने उसकी तलाश शुरू की। स्कूल प्रबंधन ने बताया कि कोई ट्रिप रखी ही नहीं गई थी। परेशान परिजन ने कोतवाली पुलिस से शिकायत करने जा रहे थे की शाम को सोनाली घर लौटी। पूछताछ में उसने बताया कि घर से बगैर बताए ट्रिप पर जाने का आइडिया उसे टीवी पर दिखाए जाने वाले एक विज्ञापन से मिला था, जिसमें युवती सिर पर एक विशेष कंपनी का तेल लगाकर मां को ये झूठ बोलकर घर से बाहर जाती है कि उसे आज कॉलेज की ओर से ऐतिहासिक जगहों पर घुमाने ले जाया जाएगा।
केस 3: इंदौर के बंगाली चौराहा निवासी राजेश जैन टीवी पर चेहरा पहचानो प्रतियोगिता में भाग लेकर हजारों का घाटा उठा चुके हैं। टीवी पर दिखाए जा रहे चेहरे को पहचानकर उन्होंने बताए गए नंबर पर फोन लगाया। मोबाइल किसी महिला ने उठाया, जिसने नाम-पता पूछने के बाद उन्हें होल्ड करने को कहा। लगभग 20 मिनट तक संगीत बजने के बाद कंपनी ने उन्हें बाद में कॉल करने को कहा। मोबाइल का बिल आने पर राजेश को पता चला कि कॉल इंटरनेशनल थी। चेहरा पहचानने के चक्कर में उन्हें हजारों की चपत लग चुकी थी।
केस 4: 13-14 साल की दो किशोरियां इंदौर के राजबाड़ा क्षेत्र स्थित एक साड़ी की दुकान पर चोरी का प्रयास करते रंगे हाथों धरी गईं। पुलिस ने उनका नाम-पता पूछकर परिजन को सूचना दी तो पता चला कि दोनों सभ्रांत परिवार से है। किशोरियों द्वारा चोरी के प्रयास पर परिजन भी हैरान थे।
किशोरियों ने उन्हें बताया कि दुकान में चोरी की प्रेरणा उन्हें टीवी पर दिखाए जा रहे एक विज्ञापन से मिली थी, जिसमें एक किशोरी चोरी की वस्तु में से कुछ हिस्सा भगवान को देकर अपने गुनाह का प्रायश्चित कर लेती है। उन्होंने सोचा था कि वे भी चोरी की रकम में से कुछ हिस्सा भगवान के मंदिर में चढ़ा देगी, तो उन्हें चोरी का पाप नहीं लगेगा।
हजारों लोग हो रहे ठगी का शिकार
सिर्फ धार्मिक भावना ही नहीं, लोगों की अमीर बनने की चाह को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस हीरो-हीरोइन को बच्चे भी आसानी से पहचान लें, उसे टीवी पर दिखाकर, पहचानने वाले को लाखों के इनाम का झांसा दिया जा रहा है। हजारों लोग इस तरह की ठगी का शिकार हो चुके हैं। इन दिनों टीवी विज्ञापन सिर्फ भ्रम नहीं फैला रहे, बल्कि लोगों को जमकर ‘उल्लू’बना रहे हैं।
इस तरह की ठगी के 99 प्रतिशत मामले सामने नहीं आ पाते। ठगी का शिकार ज्यादातर लोग कहीं शिकायत दर्ज नहीं कराते। पुलिस के मुताबिक 3 महीने में इस तरह की एक भी शिकायत दर्ज नहीं हुई। डॉक्टरों के मुताबिक आमतौर पर इस तरह की ठगी का शिकार होने के बाद जग-हंसाई का डर रहता है। लोगों को लगता है कि उन्होंने वारदात सार्वजनिक कर दी तो समाज के लोग उनकी हंसी उड़ाएंगे। यही वजह है कि ठगी की यह श्रृंखला निर्बाध रूप से चलती रहती है। ठगी करने वाली कंपनियां इसी मानसिकता का फायदा उठा रही हैं।
दो तरह के होते हैं ठगाने वाले
चिकित्सकों के मुताबिक ठगी का शिकार होने वालों में दो तरह के लोग शामिल होते हैं। एक वे जो आदतन जुआरी होते हैं। दूसरे वे जो दूसरों के मुकाबले खुद को ज्यादा समझदार समझते हैं। दोनों ही किस्म के लोगों को इलाज की जरूरत है। आदतन जुआरियों के लिए तो अब बाजार में मेडिसीन तक उपलब्ध है। इन लोगों में बीमारी होती है कि ये जरा-सा फायदा देखते ही दांव लगाने से नहीं चूकते। वहीं मूर्ख लोगों को उपभोक्ता शिक्षा की जरूरत है।
किशोर और युवाओं पर तुरंत असर
मनोरोग चिकित्सकों के मुताबिक भ्रामक विज्ञापनों के झांसे में आने वालों में किशोर और युवावर्ग की संख्या सबसे ज्यादा है। इस आयु वर्ग के लोगों में जल्दी से जल्दी सफलता पाने की इच्छा होती है। जिस स्कीम में कम प्रयास में ज्यादा फायदा दिखाई दे, ये लोग तुरंत उसमें शामिल हो जाते हैं।
कई बार अवसाद में आ जाते हैं
इस तरह की योजनाओं के तहत कोई कवच या यंत्र खरीदने वाले कई बार अवसाद का शिकार भी हो जाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार टीवी पर दिखाए जाने वाला यंत्र या कवच खरीदने के बाद भी जब परिस्थितियां नहीं सुधरती तो व्यक्ति को लगता है कि उसकी किस्मत में ही कोई खोट है। वह स्थिति सुधारने का प्रयास भी छोड़ देता है। परिस्थितियां ज्यादा बिगड़ने पर कई बार उसके दिमाग में आत्महत्या का विचार भी आ सकता है।
ठगाने वालों की ज्यादा, लौटाने वालों की संख्या नगण्य
ठगी के कारोबार में लगी कंपनियां कई बार यह झांसा भी देती हैं कि लाभ नहीं होने की स्थिति में आप सामान कंपनी को लौटाकर अपनी रकम वापस ले सकते हैं। यह लोगों को झांसे में लेने का ही एक तरीका है। इस तकनीक का इस्तेमाल कर कंपनी लोगों में विश्वास पैदा करने का प्रयास करती है। लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कंपनी फर्जी होती तो वह पैसा लौटाने का दावा नहीं करती। मगर वास्तविकता यह है कि फायदा नहीं होने के बावजूद 99 प्रतिशत लोग खरीदे गए साधन को कंपनी को नहीं लौटाते। कंपनी उनमें यह डर पैदा कर देती है कि उन्होंने कवच या यंत्र लौटाया तो उन्हें नुकसान हो सकता है।
ये कहता है ज्योतिष शास्त्र
टीवी पर विज्ञापन देखकर कोई यंत्र खरीदा है तो वह धारक के लिए काम ही नहीं करेगा। टीवी पर दिखाए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों से लोगों की धर्म के प्रति आस्थाएं कम होती हैं। यंत्र बेचने वाली कंपनियों का दृृष्टिकोण व्यवसायिक होता है। लोगों को जब लाभ नहीं होता है तो उनकी आस्थाएं प्रभावित होने लगती हैं। शास्त्रों के मुताबिक वास्तविक यंत्र भोजपत्रों पर अनार की कलम से लिखे जाते हैं। इसके बाद 21 दिन या 51 दिन साधना की जाती है। यज्ञ हवन आदि भी कराना होते हैं। इसके बाद संकल्प लेना होता है कि लोक कल्याण के लिए निष्काम भाव से यह कार्य किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि इस तरह की यंत्र साधना में कोई दक्षिणा नहीं ली जाती। अगर कोई व्यक्ति, कंपनी आपको पैसे के बदले कोई यंत्र दे रही है तो वह खरीदने वाले के लिए काम ही नहीं करेगा।
लोगों की मानसिकता का लाभ उठाते हैं
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग चिकित्सक डॉ. उज्जवल सरदेसाई कहते हैं कि इस तरह की ठगी करने वाली कंपनियां लोगों की मानसिकता का फायदा उठाती हैं। यह मानवीय स्वभाव है कि ज्यादातर लोग कम प्रयास में अधिक फायदा चाहते हैं। टीवी पर चेहरा पहचानो प्रतियोगिता हो या किसी भगवान का कवच खरीदने की बात, इसी मानसिकता की वजह से लोग ठगाते हैं। टीवी पर दिखाए जा रहे इस तरह के विज्ञापनों में उपभोक्ता को सही और पूरी जानकारी नहीं दी जाती। कंपनी यह तो बताती है कि 10 इनाम दिए जाएंगे, लेकिन यह नहीं बताती कि कितने लाख दर्शकों में से विजेता चुने जाएंगे। ज्यादातर लोग इस तरह के विज्ञापनों के झांसे में फंस जाते हैं।
(नई दुनिया से साभार)