Saturday, 15 February 2014

जय प्रकाश त्रिपाठी

ठसाठस,
इतनी भीड़भाड़,
बाहर मेला लगा था,
लुटता रहा मैं
और कितना अजनबी हो गया
मेरे अंदर का चेहरा।
तेजाब-सी लबालब दर्द की शीशी
जैसे न कभी रही हो
इससे मेरी कभी कोई
जान-पहचान,
बोल-चाल, भेट-मुलाकात।

नोम चॉम्स्की

जहाँ तक मानव स्वतन्त्रता का प्रश्न है, यदि आप यह कल्पना कर बैठते हैं कि इसकी कोई आशा नही है तो इसका अर्थ हुआ कि आप यह आशवासन दे रहे हैं कि भविष्य में भी इसकी कोई उम्मीद नही है। किन्तु यदि आप यह मानते हैं कि स्वतन्त्रता हमारी मूल प्रवृति है, कि चीज़ों को बदलने की सम्भावना है, कि आशा करना सम्भव है... तो हो सकता है कि आपकी आशा सही निकले, तथा हो सकता है कि एक बेहतर संसार की रचना की जा सके! फैसला आपका है!         

असहमति और प्रतिरोध

केवल सरकार के समर्थकों के लिए आज़ादी, केवल एक पार्टी के सदस्यों के लिए आज़ादी - चाहे वो संख्या में कितने ही क्यों न हों - आज़ादी कतई नहीं है। आज़ादी हमेशा असहमत व्यक्ति की आज़ादी है। 'न्याय' की कट्टरता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वो सब कुछ जो राजनैतिक आज़ादी में हमें कुछ सिखाने वाला है, हितकारी है, और निर्मलता लाने वाला है, इसी सारतत्व पर निर्भर करता है, और इसका सारा असर खत्म हो जाता है जैसे ही आज़ादी एक विशेषाधिकार बन जाती है।
रोज़ा लक्सेम्बर्ग

गुरूद्वारे की बेटी ..... / इमरोज़

मेरे बापू गुरूद्वारे के पाठी हैं
जब मैं पूछने योग्य हुई
बापू से पूछा , बापू लोग मुझे
गुरूद्वारे की बेटी क्यों कहते हैं ....?
पुत्तर मैंने तुझे पाला है
तुझे जन्म देने वाली माँ
तुझे कपड़े में लपेट कर मुँह -अँधेरे
गुरूद्वारे के हवाले कर
खुद पता नहीं कहाँ चली गई है
तेरे रोने की आवाज़ ने मुझे जगा दिया, बुला लिया
गुरूद्वारे में माथा टेक कर मैं
तुझे गले से लगाकर अपने कमरे में ले आया
मैंने जब भी पाठ किया कभी तुझे पास लिटाकर
कभी पास बिठाकर , कभी सुलाकर तो कभी जगाकर
पाठ करता आया हूँ ....

तुम बकरी के दूध से तो कभी गाँव की रोटियों से
तो कभी गुरूद्वारे का पाठ सुन-सुन बड़ी हुई हो ....
पर पता नहीं तुझे पाठ सुनकर कभी याद क्यों नहीं होता
हाँ ; बापू मुझे पता है पर समझ नहीं आता क्यों ...?
एक लड़का है जो दसवीं में पढता है
गुरूद्वारे में माथा टेक सिर्फ मुझे देख चला जाता है
कभी दो घड़ी बैठ जाता है तो कभी मुझे
एक फूल दे चुपचाप चला जाता है ....
अब मैं भी जवान हो गई हूँ और समझ भी जवान हो गई है
जब भी मैं पाठ सुनती हूँ जो कभी नहीं हुआ
वह होने लगता है ...
पाठ के शब्द नहीं सुनते सिर्फ अर्थ ही सुनाई देते हैं
कल से सोच रही हूँ
मुझे अर्थ सुनाई देते हैं ये कोई हैरानी वाली बात नहीं
मुझे शब्द नहीं सुनाई देते यह भी कोई हैरानी वाली बात नहीं
शब्दों ने अर्थ पहुंचा दिए बात पूरी हो गई
पहुँचने वाले के पास अर्थ पहुँच गए बात पूरी हो गई ...

आज गाँव की रोटी खा रही थी कि
वह लड़का दसवीं में पढता स्कूल जाता याद आ गया
अपने परांठे में से आधा परांठा रुमाल में लपेट कर
जाते-जाते रोज़ दे जाता ...
कोई है जिसके लिए मैं गुरूद्वारे की बेटी से ज्यादा
कुछ और भी थी ...

इक दिन गुरूद्वारे में माथा टेक वह मेरे पास आ बैठा
यह बताने के लिए कि उसने दसवीं पास कर ली है
बातें करते वक़्त उसने किसी बात में गाली दे दी
मैंने कहा , यह क्या बोले तुम ...?
वह समझ गया ...
मेरे इस 'क्या बोले' ने उसकी जुबान साफ-सुथरी कर दी
कालेज जाने से पहले मुझे खास तौर पर मिलने आया -
'तुम्हारे जैसा कोई टीचर नहीं देखा ..'
स्कूलों में थप्पड़ों से , धमकियों से , बुरी नियत .से पढाई हो रही है
निरादर से आदर नहीं पढ़ाया जा सकता
तुम जैसे टीचरों का युग कब आएगा
तुम उस युग की पहली टीचर बन जाना
युग हमेशा अकेले ही कोई बदलता है ....

वह कालेज से पढ़कर भी आ गया
सयाना भी हो गया और सुंदर भी
इक दिन मुझे मिलने आया
कुछ कहना चाहता था
मैं समझ गई वह क्या चाहता है ...

देखो मैं गुरूद्वारे में जन्मी -पली हूँ
अन्दर-बाहर से गुरुग्वारे की बेटी हूँ
और गुरूद्वारे की हूँ भी
यह तुम समझ सकते हो
मुझे अच्छा लगता है
 बड़ा अच्छा लगता है ...

किसी अच्छे घर की
खुबसूरत लड़की से विवाह कर लो
आजकल जो मुझे आता है
मैं गाँव कि औरतों को गुरूद्वारे में बुलाकर
पाठ में से सिर्फ अर्थ सुनने सीखा रही हूँ
तुम भी अपनी बीवी को गुरूद्वारे
मेरे पास भेज दिया करना
मैं उसे भी पाठ में से
सिर्फ अर्थ सुनना सीखा दूंगी ......
हाँ सिर्फ अर्थ ......!!


पेंटिंग के बीच की लड़की / इमरोज़ / हरकीरत हकीर

इक दिन
पेंटिंग के बीच की लड़की
रंगों से बाहर आकर
एक नज़्म के ख्यालों को
देखने लगी
देख देख उसे
अच्छा लगा ख्यालों को रंग देना भी
और ख्यालों से रंग लेना भी
ख्यालों ने देखती हुई लड़की से पूछा
तू बता पेंटिंग के रंगों में
क्या - क्या बनकर देखा
मैंने मुस्कराहट बनकर देखा
पर हँस कर नहीं
मैंने खड़े होकर देखा है रंगों में
पर चलकर नहीं...

जो दिल करे / इमरोज़ / हरकीरत हकीर

कोई भी मजहब
जो भी दिल करे करने की छूट नहीं देता
पर लोग जो भी दिल करे
करना चाहते हैं कर रहे हैं
और मजहब जो भी करे करने वालों को
रोक नहीं पा रहे रोक भी नहीं रहे
लोग जब भी दिल करता है
झूठ बोल लेते हैं
किसी को लूटने का दिल करे
लूट लेते हैं
किसी को रेप करने का दिल करे
गैंग रेप कर लेते हैं
और मिलकर क़त्ल भी कर लेते हैं
आसमान से रब्ब क्या देख सकता है
मजहब तो जमीन से भी न देख रहा है
न रोक रहा है
अपने लोगों को अपना निरादर
कर रहे लोगों को
कुछ समझ नहीं आ रहा किसी को
क्या लोग अभी मजहब
के काबिल नहीं या मजहब अभी लोगों के
काबिल नहीं...

ख़ाली जगह / अमृता प्रीतम

सिर्फ़ दो रजवाड़े थे –
एक ने मुझे और उसे
बेदखल किया था
और दूसरे को
हम दोनों ने त्याग दिया था।

नग्न आकाश के नीचे –
मैं कितनी ही देर –
तन के मेंह में भीगती रही,
वह कितनी ही देर
तन के मेंह में गलता रहा।

फिर बरसों के मोह को
एक ज़हर की तरह पीकर
उसने काँपते हाथों से
मेरा हाथ पकड़ा!
चल! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख! परे – सामने उधर
सच और झूठ के बीच –
कुछ ख़ाली जगह है...



जब मैं तेरा गीत लिखने लगी /अमृता प्रीतम

मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं

दिल के घाट पर मेला जुड़ा,
ज्यूँ रातें रेशम की परियां
पाँत बाँध कर आई......

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आईं
केसर की लकीरें

सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गई,
हमारी दोनों की तकदीरें।



मेरा पता / अमृता प्रीतम

आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, यह एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
— समझना वह मेरा घर है।




ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी! / अमृता प्रीतम

ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी!
एक बार अचानक – तू आया
वक़्त बिल्कुल हैरान
मेरे कमरे में खड़ा रह गया।
साँझ का सूरज अस्त होने को था,
पर न हो सका
और डूबने की क़िस्मत वो भूल-सा गया...

फिर आदि के नियम ने एक दुहाई दी,
और वक़्त ने उन खड़े क्षणों को देखा
और खिड़की के रास्ते बाहर को भागा...

वह बीते और ठहरे क्षणों की घटना –
अब तुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
और मुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
और शायद वक़्त को भी
फिर वह ग़लती गवारा नहीं

अब सूरज रोज वक़्त पर डूब जाता है
और अँधेरा रोज़ मेरी छाती में उतर आता है...

पर बीते और ठहरे क्षणों का एक सच है –
अब तू और मैं मानना चाहें या नहीं
यह और बात है।
पर उस दिन वक़्त
जब खिड़की के रास्ते बाहर को भागा
और उस दिन जो खून
उसके घुटनों से रिसा
वह खून मेरी खिड़की के नीचे
अभी तक जमा हुआ है...









लड़ने के लिए

मैं सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं,
हूं-
लड़ने के लिए भी।

बिकते हुए
अपनो के हाथोहाथ
अपने अस्तित्व की आंखों में
आंखें डाल कर।

लड़ना है मुझे उनके लिए
जिनको बिना लड़े
न हुआ है
कभी कुछ भी हासिल।

उजले दांत की हंसी नहीं,
शब्दों का लहू हूं मैं
शब्दों का लहू
खौलता हुआ अपने समय के आरपार।

लड़ना मुझे उनके खिलाफ
जो बड़े आराम से
भगोस रहे हैं बाकी सबके
हिस्से का,
सपनो के लुटेरे,
सूचनाओं के तिजारती,
जंगल के बादशाह,
मनुष्यता के बहेलिये....

समय लड़ता आ रहा है
उनके खिलाफ,
मैं भी हो ली उनके साथ

मुर्दा नहीं हूं मैं
जिंदा होने के लिए
पढ़ना होगा मुझे बार-बार
उन्हें, आदमखोरों ने
मार कर फेक दिया जिन्हें
शब्दों के हाशिये पर,

आओ, मेरे कारवां के लोगों,
आओ, मेरे साथ,
आओ, अपने समय के सिपाहियों
अपनी कलम, अपने सपनों के साथ
मेरे साथ।

डरो नहीं, जागो, उठो
और आ जाओ मेरे साथ
चल पड़ने के लिए
लड़ने के लिए।

पीछे छोड़ आया हूं मैं भी
अपने सपने,
अपने लोग,
अपनी यादें,
अपना सुख,
आप के सपने / आपके सुख के लिए




सपने / पाश



हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोई आग के सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई
हथेली को पसीने नहीं आते
शेल्फ़ों में पड़े
इतिहास के ग्रंथो को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
झेलनेवाले दिलों का होना
नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते


23 मार्च / पाश

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिडकी में
लोगों की आवाज़ें जम गयीं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था
---------
भगत सिंह ने पहली बार पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फाँसी दी गई
उनकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मुड़ा हुआ था
पंजाब की जवानी को
उसके आख़िरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे,
चलना है आगे।


उनके शब्द लहू के होते हैं / पाश

जिन्होंने उम्र भर तलवार का गीत गाया है
उनके शब्द लहू के होते हैं
लहू लोहे का होता है
जो मौत के किनारे जीते हैं
उनकी मौत से ज़िन्दगी का सफ़र शुरू होता है
जिनका लहू और पसीना मिटटी में गिर जाता है
वे मिट्टी में दब कर उग आते हैं


मेहनत की लूट / पाश

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए



संविधान / पाश

संविधान
यह पुस्‍तक मर चुकी है
इसे मत पढ़ो
इसके लफ़्ज़ों में मौत की ठण्‍डक है
और एक-एक पन्‍ना
ज़िन्दगी के अन्तिम पल जैसा भयानक
यह पुस्‍तक जब बनी थी
तो मैं एक पशु था
सोया हुआ पशु
और जब मैं जागा
तो मेरे इन्सान बनने तक
ये पुस्‍तक मर चुकी थी
अब अगर इस पुस्‍तक को पढ़ोगे
तो पशु बन जाओगे
सोए हुए पशु।

तुम्हारी बातों से / बर्णाली भराली


तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते
हमको मिला शब्दों का इक गाँव
आसमान की चिड़िया
खेत की गाय-बकरी
तलब के कछुए और मछली और
हमारे घर के पिछवाड़े में लगे पेड़
सबने मानने से इंकार किया था
ऋतुओं का शासन
तुम्हारी बातों के नशे में
उसको मिला ओस भरा एक चौराहा
वीणा के तार की तरह झंकृत हो चुकी थी
ग्रीष्म में भी चाँदनी सी शीतल उसकी देह
सूखे पेड़ पर लटक रहा था रसदार फल
शायद वही है पेड़ ले कोटर की आत्मा
जिसकी खुशबू में टूट गयी थी शीत की नींद
तुम्हारी बातों के विराम चिह्न में आया था हेमंत
वह भूल गयी थी संकरे रास्ते का अंधकार
और दुःख भरी शाम की बातें
एक पुराणी ख़ुशबू धोने
उस दिन बारिश भी चली आई थी
बदल को छोड़ कर
देखो, तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते-चढ़ते
किस तरह बन गया शब्दों का एक गाँव।

एक शाम / बर्णाली भराली

उस दिन एक शाम
नाम ने पुकारा हमें

न हीं हरी है न हीं पीली
उस बीच में से एक रंग होकर
लटक रही थी, दिघली तालाब के
काई भरे पेड़ में

तन्हाई के घेरे में डूबी शाम को
पहचानने के लिए, मेरे पास नहीं थी
अलग एक शाम
जो पाप के आँसुओं में
गुंजन से भीगी है, रात की एक लम्बी सीटी

याद है न तुम्हें
शाम, तुम्हारे साथ आना नहीं चाहती थी
जब तुम ह्रदय को साथ लेकर
शहर की गली-गली घूम रहे थे
तब शाम को छोड़कर
नहीं आया था क्या
होटल की जूठी प्लेट और नैपकिन के साथ
एक जली हुई सिगरेट की तरह
क्यों छोड़ दिया था उसे
बेनाम यातना के बीच

सिर्फ़ एक बेआवाज शाम
आएगी लौट कर हमारे पीछे-पीछे
और हम विश्राम लेंगे उसकी छाँव तले...

रीढ़ / कुसुमाग्रज

"सर, मुझे पहचाना क्या?"
बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए
पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर
"गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं!
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?
खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,
जो था, नहीं था, सब गया!
"’प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के!
मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!"
जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो...
’न न’, न पैसे नहीं सर,
यूँ ही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी...
हाथ रखिए पीठ पर और इतना कहिए कि लड़ो... बस!"

नदी में ज्वार / काजी नज़रुल इस्लाम

नदी में ज्वार आया
पर तुम आए कहाँ
खिड़की दरवाज़ा खुला है
पर तुम दिखे कहाँ
पेड़ों की डालियों पर
मुझे देख कोयल कूके
पर आज भी तुम दिखे नही
आख़िर तुम हो कहाँ

सजी-धजी मंदिर जाऊँ
पूजा करूँ सजदा करूँ
कभी तो पसीजोगे तुम
गर दिख जाओ मुझे यहाँ
लोग मुझे देख हँसे
दीवानी लोग मुझे कहे
अश्रु के सैलाब से
भर गया ये जहाँ





 बिरोधी / काज़ी नज़रुल इस्लाम की कविता

बोलो,वीर !
बोलो, चिर उन्नत मम शीश !

मेरा शीश निहार देखो
झुका पड़ा है
शिखर हिमाद्री ।

बोलो, वीर
बोलो, महा विश्व
महा आकाश चीर
चंद्र-सूर्य-ग्रहों से आगे
धरती-पाताल-स्वर्ग भेद
ईश्वर का सिंहासन छेद
उठा हूँ मैं
मैं-धरती का एकमात्र
शाश्वत विस्मय ।
देखो मेरे नेत्रों में
रूद्र भगवान जले
जय का दिव्य टीका
ललाट पर चिर: स्थिर !

बोलो, वीर !
बोलो, चिर उन्नत मम शीश !

मैं दायित्वहीन, क्रूर, नृशंस
महाप्रलय का नटराज
मैं साईक्लोन, विध्वंस
मैं महाभय
मैं पृथ्वी का अभिशाप
मैं निर्दयी
सब कुछ तोड़ फोड़
मैं नहीं करता विलाप
मैं अनियम
उच्छ्रुन्खल
मैं कुचल चलता
नियम-क़ानून-श्रंखल
मैं नहीं मानता कोई प्रभुता
मैं टार्पेडो
मैं बारूदी विस्फोट
शीश बनकर उठा
मैं धूरजती
मैं अकाल वैशाख का
परम अंधड़
विद्रोही -
मैं विश्व विधात्री का विद्रोही पुत्र
नंग धड़ंग लम्भड़ !

बोलो, वीर !
बोलो, चिर उन्नत मम शीश !

मैं बवंडर, मैं तूफ़ान
मैं उजाड़ चलता
पथ के विषय तमाम
मैं नृत्य-पागल-छंद
अपने ताल पर नाचता
मैं मुक़्त जीवन-आनंद !
मैं हमीर, मैं छायानट, हिन्डोल
मैं चिर चंचल
उछल कूद
मैं नृत्योन्माद, हिलकोल !
मैं अपने मन की करता
नहीं मुझे कोई लज्जा
मैं शत्रु से करूँ आलिंगन
चाहे मृत्यु से लड़ूं पंजा !
मैं उन्मात मैं झंझा
मैं महामारी
धरित्री की बेचैनी
शासन का खौफ़,संहार
मैंप्रचंड
चिर अधीर !

बोलो, वीर !
बोलो, चिर उन्नत मम शीश !

मैं चिर दुरंत, दुर्मति
मैं दुर्गम
भर प्राणों का प्याला
पीता भरपूर
मद हरदम
मैं होमशिखा
मैं जमदग्नि
मैं यक्ष
पुरोहित
अग्नि
मैं लोकालय, मैं शमशान
मैं अवसान निशावसान
मैं इद्राणी पुत्र
हाथ में चाँद
ललाट पर सूर्य युगल
एक हाथ में स्नेह बंशी
दूजे में रण बिगुल
मैं कृष्ण कंठ
मंथन विष पीकर
मैं व्योमकेश
गंगोत्री का पागल पीर !

बोलो, वीर !
बोलो, चिर उन्नत मम शीश !

मैं सन्यासी, मैं सैनिक
मैं युवराज, वैरागी
मैं बेदविन, मैं चंगेज़
मैं बाग़ी
सलाम ठोकता केवल ख़ुदको
मैं वज्र
मैं ब्रह्मा का हुँकार
मैं इस्राफिल की तुरही
मैं पिनकपाणी का
डमरू त्रिशूल ओमकार
मैं धर्मराज का दंड
मैं चक्र, महाशंख
प्रणव नाद प्रचंड ।
मैं आगबबूले दुर्वासा का शिष्य
जलाकर रख दूँगा विश्व
मैं प्राण भरा उल्लास
मैं सृष्टि का शत्रु
मैं महा त्रास
मैं महाप्रलय का अग्रदूत
राहू का ग्रास
मैं कभी प्रशांत कभी अशांत
बावला स्वेच्छाचारी
मैं सूर्य के रक़्त में सिंची
एक नई चिंगारी !

मैं महासागर का गरज
मैं अपगामी, मैं अचरज
मैं बंधन मुक़्त कन्या-कुमारी
नयनों की चिंगारी
मैं सोलह वर्ष का युवक
प्रेमी, अविचारी
मैं ह्रदय में अटका हुआ
प्रेम रोग का हूक
मैं हर्ष असीम अनंत
विधवा
मैं वंध्या का दुःख
मैं विधि का ग्रास
मैं अभागे का
दीर्घश्वास
मैं वंचित, व्यथित, पथवासी
मैं निराश्रय पथिकों का सन्ताप
अपमानितों का परिताप
अस्वीकृत प्रेमी की उत्तेजना
मैं विधवा की जटिल वेदना ।
मैं अभिमानी
मैं चित् चुम्बन
मैं चिर-कुमारी कन्या के
थर-थर हाथों का
प्रथम स्पर्श
मैं झुके नयनों का खेल
कसे आलिंगन का हर्ष
मैं यौवन
चंचल नारी का प्रेम
चूड़ियों की खन-खन
मैं सनातन शिशु
नित्य किशोर
मैं तनाव
मैं यौवन से सहमी बाला
के आँचल का खींचाव ।
मैं उत्तर वायू-अनिल-शमक
उदास पूर्वी हवा
मैं पथिक कवि की गभीर रागिनी
मैं गीत, मैं दवा
मैं आग में जलता निरंतर अमित प्यास
मैं रूद्र रौद्र रवी
मैं घृणा, अविश्वास
मैं रेगिस्तान में झर-झर
झरता एक झरना
मैं श्यामल शांत धुंधला
एक सपना, मैं सपना !

मैं तीव्र आनंद में दौड़ रहा
ये क्या उन्माद !
मैं उन्माद !
मैंने जान लिया है ख़ुदको
आज खुल गए है सब बाँध !
मैं उत्थान, मैं पतन
मैं अचेतन में भी चेतन
मैं विश्व द्वार पर वैजयंती
मानव विजय केतन !
विजयोल्लास में ताली पीट
मेरा अश्व बुर्राक़
स्वर्ग मर्त रौंधता
नशे में धुत्त
मैं उसे हाँक
मैं वसुधा पर
उभरा आग्नेयगिरि
जंगल में फैलता दावानल
मैं पाताल-पतित पागल
अग्नि का दूत
मैं करलव, मैं कोलाहल
मैं दामिनी के पंख पर चढ़ उड़ता
प्रकृति का दंभ
मैं धसकती धरती के ह्रदय में
सहसा भूमिकम्प
मैं वासुकी का फण
मैं दूत ज़िब्राइल का
जलता अंजन
मैं विष
मैं अमृत
मैं समुद्र मंथन ।
मैं देव शिशु
मैं चंचल
मैं दांत से नोच डालता
विश्व माँ का अंचल
ऑर्फियस की बाँसुरी बजाता
ज्वर ग्रस्त संसार को मैं
बड़ी ममता से सुलाता
मैं श्याम की बंशी
नदी से उछल
छू लेता महाकाश
मेरे भय से धुमिल
स्वर्ग का निखिल प्रकाश
मैं बग़ावत का अखिल दूत
मैं उबकाई नरक का
प्राचीन भूत !

मैं प्रबल जलप्रलय
वन्या
कभी धरती को सींच
कभी उजाड़
मैं छीन लूँगा विष्णु के
वक्ष से
युगल कन्या !
मैं अन्याय
मैं उल्का
मैं शनि
मैं धूमकेतू में जलता
विषधर कालफणी ।
मैं छिन्नमस्ता चंडी
मैं सर्वनाश का दस्ता
मैं जहन्नुम की आग मैं बैठ
बच्चे सा हँसता ।
मैं विन्मय
मैं चिन्मय
मैं अजर-अमर-अक्षय
मैं अव्यय
मैं मानव-दानव-देवताओं का भय
में विश्व का चिर दुर्जय
जगदीश्वर ईश्वर
मैं पुरुषोत्तम सत्य
मैं रौंधता फिरता
स्वर्ग पाताल मर्त्य
अश्वत्थामा कृत्य
मैं नटराज का नृत्य
मैं उन्माद !
मैं उन्माद !
मैंने जान लिया है ख़ुदको
आज खुल गए है सब बाँध !

मैं परशुराम की कठोर कुठार
निःक्षत्रिय करूँगा विश्व
लाऊँगा शांति शांत उदार
मैं बलराम का हल
यज्ञकुंड में
होगा दाहक दृश्य !
मैं महा विद्रोही ! अक्लांत !
उस दिन होऊँगा शांत -
जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक
आकाश वायू में नहीं गूँजेगा ।
जब अत्याचारी का खड्ग तुणीर
निरीह के रक़्त से नहीं रंजेगा ।
मैं विद्रोही-रण-क्लांत
मैं उस दिन होऊँगा शांत !

पर तबतक -
मैं विद्रोही भृगु बन
भगवान के वक्ष को भी
लातों से
देता रहूँगा दस्तक ।

तबतक -
मैं विद्रोही, वीर
पीकर जगत् का विष
बन विजय ध्वजा अभीक
विश्व रणभूमी के बीचोंबीच
खड़ा रहूँगा अकेला
चिर उन्नत शीश !!


रूपसिंह चंदेल का ब्लॉग    http://wwwrachanasamay.blogspot.in रचना समय

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सौरभ राय का जन्म झारखंड राज्य में 1989 को एक बंगाली परिवार में हुआ। बंगलौर से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सौरभ आजकल आजीविका के लिए 'ब्रोकेड' नामक कंपनी में कार्यरत हैं. अब तक इनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- 'अनभ्र रात्रि की अनुपमा', 'उत्तिष्ठ भारत' और 'यायावर'। सौरभ की कवितायेँ हिंदी की कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं - जिनमें हंस, वागर्थ, कृति ऒर, सृजन गाथा, पहली बार इत्यादि प्रमुख हैं। इसके अलावा हिन्दू, डीएनए सहित कई अंग्रेजी के पत्र पत्रिकाओं में इनके लेखन के बारे में छप चुका है।

 सौरभ राय की पांच कविताएं
भौतिकी
याद हैं वो दिन संदीपन
जब हम
रात भर जाग कर
हल करते थे
रेसनिक हेलिडे
एच सी वर्मा
इरोडोव ?

हम ढूंढते थे वो एक सूत्र
जिसमे उपलब्ध जानकारी डाल
हम सुलझा देना चाहते थे
अपनी भूख
पिता का पसीना
माँ की मेहनत
रोटी का संघर्ष
देश की गरीबी !

हम कभी
घर्षणहीन फर्श पर फिसलते
दो न्यूटन का बल आगे से लगता
कभी स्प्रिंग डाल कर
घंटों ऑक्सिलेट करते रहते
और पुली में लिपट कर
उछाल दिए जाते
प्रोजेक्टाइल बनाकर !

श्रोडिंगर के समीकरण
और हेसेनबर्ग की अनिश्चित्ता का
सही अर्थ
समझा था हमने |
सारे कणों को जोड़ने के बाद
अहसास हुआ था -
“अरे ! एक रोशनी तो छूट गयी !”
हमें ज्ञात हुआ था
इतना संघर्ष
हो सकता है बेकार
हमारे मेहनत का फल फूटेगा
महज़ तीन घंटे की
एक परीक्षा में |

पर हम योगी थे
हमने फिज़िक्स में मिलाया था
रियलपॉलिटिक !
हमने टकराते देखा था
पृथ्वी से बृहस्पति को |
हमने सिद्ध किया था
कि सूरज को फ़र्क नहीं पड़ता
चाँद रहे न रहे |

राह चलती गाड़ी को देख
उसकी सुडोलता से अधिक
हम चर्चा करते
रोलिंग फ़्रीक्शन की |
eiπ को हमने देखा था
उसके श्रृंगार के परे
हमने बहती नदी में
बर्नोली का सिद्धांत मिलाया था
हमने किसानों के हल में
टॉर्क लगाकर जोते थे खेत |

हम दो समय यात्री थे
बिना काँटों वाली घड़ी पहन
प्रकाश वर्षों की यात्रा
तय की थी हमने
‘उत्तर = तीन सेकंड’
लिखते हुए |

आज
वर्षों बाद
मेरी घड़ी में कांटें हैं
जो बहुत तेज़ दौड़ते हैं
जेब में फ़ोन
फ़ोन में पैसा
तुम्हारा नंबर है
पर तुमसे संपर्क नहीं है |
पेट में भूख नहीं
बदहज़मी है |
देश में गरीबी है |

सच कहूँ संदीपन
सूत्र तो मिला
समाधान नहीं ||


सिनेमा
सूरज की आँखें
टकराती हैं
कुरोसावा की आँखों से
सिगार के धुंए से
धीरे धीरे
भर जाते हैं
गोडार्ड के
चौबीस फ्रेम ।

हड्डी से स्पेसशिप में
बदल जाती है
क्यूब्रिक की दुनिया
बस एक जम्प कट की बदौलत
और चाँद की आँखों में
धंसी मलती है
मेलिएस की रॉकेट ।

इटली के ऑरचिर्ड में
कॉपोला के पिस्टल से
चलती है गोली
वाइल्ड वेस्ट के काउबॉय
लियॉन का घोड़ा
फांद जाता है
चलती हुई ट्रेन ।

बनारस की गलियों में
दौड़ता हुआ
नन्हा सत्यजीत राय
पहुँचता है
गंगा तट तक
माँ बुलाती है
चेहरा धोता हुआ
पाता है
चेहरा खाली
चेहरा जुड़ा हुआ
इन्ग्मार बर्गमन के
कटे फ्रेम से ।

फेलीनी उड़ता हुआ
अचानक
बंधा पता है
आसमान से
गिरता है जूता
चुपचाप हँसता है
चैपलिन
फीते निकाल
नूडल्स बनता
जूते संग खाता है ।

बूढ़ा वेलेस
तलाशता है
स्कॉर्सीज़ की टैक्सी में
रोज़बड का रहस्य ।

आइनस्टाइन का बच्चा
तेज़ी से
सीढ़ियों पर
लुढ़कता है ।
सीढ़ियाँ अचानक
घूमने लगती हैं
अपनी धुरी पर
नीचे मिलती है
हिचकॉक की
लाश !

एक समुराई
धुंधले से सूरज की तरफ
चलता जाता है ।
हलकी सी धूल उड़ती है ।
स्क्रीन पर
लिखा हुआ सा
उभरने लगता है -
‘ला फ़िन’
‘दास इंड’
‘दी एन्ड’

रील
घूमती रहती है ।


संतुलन
मेरे नगर में
मर रहे हैं पूर्वज
ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ
अदृश्य सम्वाद !
किसी की नहीं याद -
हम ग़ुलाम अच्छे थे
या आज़ाद ?

बहुत ऊँचाई से गिरो
और लगातार गिरते रहो
तो उड़ने जैसा लगता है
एक अजीब सा
समन्वय है
डायनमिक इक्वीलिब्रियम !

अपने उत्त्थान की चमक में
ऊब रहे
या अपने अपने अंधकार को
इकट्ठी रोशनी बतलाकर
डूब रहे हैं हम ?

हमने खो दिये
वो शब्द
जिनमें अर्थ थे
ध्वनि, रस, गंध, रूप थे
शायद व्यर्थ थे ।
शब्द जिन्हें
कलम लिख न पाए
शब्द जो
सपने बुनते थे
हमने खोए चंद शब्द
और भरे अगिनत ग्रंथ
वो ग्रंथ
शायद सपनों से
डरते थे ।

थोड़े हम ऊंचे हुए
थोड़े पहाड़ उतर आए
पर पता नहीं
इस आरोहण में
हम चल रहे
या फिसल ?
हम दौड़ते रहे
और कहीं नहीं गए
बाँध टूटने
और घर डूबने के बीच
जैसे रुक सा गया हो
जीवन ।

यहाँ इस क्षण
न चीख़
न शांति
जैसे ठोकर के बाद का
संतुलन ।


भारतवर्ष
वो किस राह का भटका पथिक है ?
मेगस्थिनिस बन बैठा है
चन्द्रगुप्त के दरबार में
लिखता चुटकुले
दैनिक अखबार में |
सिन्कदर नहीं रहा
नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब
चाणक्य का पैर
घांस में फंसता है
हंसता है महमूद गज़नी
घांस उखाड़कर घर उजाड़कर
घोड़ों को पछाड़कर
समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है
विक्रमादित्य फ़ा हाइन संग
बेताल पकड़ने जाता है |
वैदिक मंत्रो से गूँज उठा है आकाश
नींद नहीं आती है शूद्र को
नहीं जानता वो अग्नि को इंद्र को
उसे बारिश चाहिए
पेट की आग बुझाने को |
सच है-
कुछ भी तो नहीं बदला
पांच हज़ार वर्षों में !
वर्षा नहीं हुई इस साल
बिम्बिसार अस्सी हज़ार ग्रामिकों संग
सभा में बैठा है
पास बैठा है अजातशत्रु
पटना के गोलघर पर
कोसल की ओर नज़र गड़ाए |
कासी में मारे गए
कलिंग में मारे गए
एक लाख लोग
उतने ही तक्षशिला में
केवल अशोक लौटा है युद्ध से
केवल अशोक लड़ रहा था
सौ चूहे मार कर
बिल्ली लौटी है हज से
मेरा कुसूर क्या है ?-
चोर पूछता है जज से |
नालंदा में रोशनी है
ग़ौरी देख रहा है
मुह्हमद बिन बख्तियार खिलजी को
लूटते हुए नालंदा
क्लास बंक करके
ह्वेन सांग रो रहा है
सो रहा है महायान
जाग रहा है कुबलाई ख़ान |
पल्लव और चालुक्य लड़ रहें हैं
जीत रहा है चोल
मदुरै की संगम सभा में कवि
आंसू बहाता है
राजराज चोल लंका तट पर
वानर सेना संग नहाता है |
इब्न बतूता दौड़ा चला आ रहा है
पश्चिम से
मार्को पोलो दक्षिण से
उत्तर से नहीं आता कोई उत्तर
आता है जहाँगीर कश्मीर से
गुरु अर्जुन देव को
मौत के घात उतारकर |
नहीं रही
नहीं रही सभ्यता
सिन्धु – सताद्रू घाटी में
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से
चीखता है भिंडरावाले
गूँज रहा है इन्द्रप्रस्थ
सौराष्ट्र
इल्तुतमिश भाला लेकर आता है
मल्ल देश के आखिरी पड़ाव तक
चंगेज़ ख़ान की प्रतीक्षा में |
कोई नहीं रोकने आता
तैमूर लंग को |
बहुत लम्बी रात है
सोमनाथ के बरामदे में
कटा हुआ हाथ है |
लड़ रहें हैं राजपूत वीर
आपस में
रानियाँ सती होने को
चूल्हा जलाती हैं |
चमक रहा है ताजमहल
धुल रहा है मजदूरों का ख़ून
धुल रहा है
कन्नौज
मथुरा
कांगरा |
कृषि कर हटाकर
तुगलक रोता है-
“पानी की किल्लत है
झूठ है
झूठ है सब
केवल राम नाम सत् है”
वास्को डि गामा ढूंढ रहा है
कहाँ है ?
कहाँ है भारतवर्ष ?
इंजीनियर्स मैनिफेस्टो
हमने तो
खड़े किये हैं
लाखों मीनार,
बनाए हैं महल
शीशों के,
रोका है
नदियों का
विराट प्रवाह !
क्या नहीं रोक सकते
छोटुआ के छत का टपकना ?
ताकि वो
अपने घर के अँधेरे में।

- लीना टिब्बी

काश ऐसा होता कि ईश्वर मेरे बिस्तर के पास रखे पानी भरे गिलास के अन्दर से बैंगनी प्रकाश पुंज-सा अचानक प्रकट हो जाता।
काश ऐसा होता कि ईश्वर शाम की अजान बन कर हमारे ललाट से दिन भर की थकान पोंछ देता।
काश ऐसा होता कि ईश्वर आसूँ की एक बूंद बन जाता जिसके लुढ़कने का अफ़सोस हम मनाते रहते पूरे-पूरे दिन।
काश ऐसा होता कि ईश्वर रूप धर लेता एक ऐसे पाप का हम कभी न थकते जिसकी भूरी-भूरी प्रशंसा करते।
काश ऐसा होता कि ईश्वर शाम तक मुरझा जाने वाला गुलाब होता तो हर नई सुबह हम नया फूल ढूंढ कर ले आया करते।



'ज़फर' आदमी उसको ना जानिये,
हो वो कैसा भी साहिबे-फहमो-ज़का
जिसे ऐश में यादे-खुदा ना रही
जिसे तैश में खौफे-खुदा ना रहा
- बहादुर शाह ज़फर

'बुद्धिमान व्यक्ति बोलते हैं क्योंकि उनके पास बोलने के लिए कुछ होता है। मूर्ख व्यक्ति बोलते हैं क्योंकि उन्हें कुछ न कुछ बोलना होता है।' (यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है।)
-प्लैटो

आ कर पत्थर तो मेरे सहन में दो चार गिरे
जितने उस पेड़ पे फल थे, पसे-दीवार गिरे।
-शाकिब जलाली

अब जिसके जी में आये, वो ही पाए रोशनी
हमने तो दिल जला के सरे-आम रख दिया
क्या मसलहत-शनास था वो आदमी 'कतील'
मजबूरियों का जिसने वफ़ा नाम रख दिया
-कतील शिफाई

मैं अपनी तलाश में हूँ,
मेरा कोई रहनुमा नहीं है।
वो क्या दिखाएंगे राह मुझे
जिन्हें खुद अपना पता नहीं है।
अगर कभी मिल गए इत्तिफाक से
तो 'राज' उनसे मैं ये ही कहूँगा
तेरे सितम तो भुला चुका हूँ
तेरा करम भूलता नहीं है।
- राज इलाहाबादी

आज गुलाम रब्बानी तांबा की सौंवीं जयंती है.......
राहों के पेंचों-ख़म में, गुम हो गयी हैं सिम्तें
ये मरहला है नाज़ुक, 'तांबा' संभल संभल के
-गुलाम रब्बानी 'तांबा'

रिन्दाने बला-नोशों में गिनती है हमारी
हम खुम भी चढ़ा जाएँ तो नशा नहीं होता
आजारे-मुहब्बत नहीं जाता, नहीं जाता
बीमारे-मुहब्बत कभी अच्छा नहीं होता
-रियाज़ खैराबादी

उदास आँखों में आँसू नहीं निकलते हैं
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं
ये एक पेड़ है, आ इसके नीचे रो लें हम
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं
-बशीर बद्र

ओ बेरहम मुसाफिर, हँस कर साहिल की तौहीन न कर
हमने अपनी नाव डुबो कर, अभी तुझको पार उतारा है।
-कतील शिफाई

जब ज़िन्दा था, प्यार किया था
मर कर लेटा आज यहाँ।
कौन बगल में मेरी लेटी
मुझको कुछ भी नहीं पता।
-रसूल हमजातोव


हर गीत चुप्पी है प्रेम की, हर तारा चुप्पी है समय की,
समय की एक गठान, हर आह चुप्पी है चीख़ की!
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

जब चांद उगता है घंटियाँ मंद पड़कर ग़ायब हो जाती हैं
और दुर्गम रास्ते नज़र आते हैं।
जब चांद उगता है समन्दर पृथ्वी को ढक लेता है
और हृदय अनन्त में एक टापू की तरह लगता है।
पूरे चांद के नीचे कोई नारंगी नहीं खाता
वह वक़्त हरे और बर्फ़ीले फल खाने का होता है।
जब एक ही जैसे सौ चेहरों वाला चांद उगता है
तो जेब में पड़े चांदी के सिक्के सिसकते हैं!
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

गुलाब ने सुबह नहीं चाही
अपनी डाली पर चिरन्तन
उसने दूसरी चीज़ चाही,
गुलाब ने ज्ञान या छाया नहीं चाहे
साँप और स्वप्न की उस सीमा से
दूसरी चीज़ चाही।
गुलाब ने गुलाब नहीं चाहा
आकाश में अचल
उसने दूसरी चीज़ चाही !
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

लकड़हारे मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर!
मैं दर्पणों से घिरा हुआ क्यों पैदा हुआ?
दिन मेरी परिक्रमा करता है
और रात अपने हर सितारे में
मेरा अक्स फिर बनाती है।
मैं ख़ुद को देखे बग़ैर ज़िन्दा रहना चाहता हूँ।
और सपना देखूंगा
कि चींटियाँ और गिद्ध
मेरी पत्तियाँ और चिड़ियाँ हैं।
लकड़हारे मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर!
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

तालाब में नहा रही थी
सुनहरी लड़की
और तालान सोना हो गया,
कँपकँपी भर गए उसमें
छायादार शाख और शैवाल
और गाती थी कोयल
सफ़ेद पड़ गई लड़की के वास्ते।
आई उजली रात
बदलियाँ चांदी के गोटों वाली
खल्वाट पहाड़ियों और बदरंग हवा के बीच
लड़की थी भीगी हुई जल में सफ़ेद
और पानी था दहकता हुआ बेपनाह।
फिर आई ऊषा हज़ारों चेहरों में
सख़्त और लुके-छिपे
मुंजमिद गजरों के साथ
लड़की आँसू ही आँसू शोलों में नहाई
जबकि स्याह पंखों में रोती थी कोयल
सुनहरी लड़की थी सफ़ेद बगुली
और तालाब हो गया था सोना !
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

माँ, चांदी कर दो मुझे!
बेटे, बहुत सर्द हो जाओगे तुम!
माँ, पानी कर दो मुझे!
बेटे, जम जाओगे तुम बहुत!
माँ, काढ़ लो न मुझे तकिए पर
कशीदे की तरह! कशीदा?
हाँ, आओ!
-फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

जो दुनिया तुमने देखी रूमी,
वो असल थी, न कोई छाया वगैरह,
यह सीमाहीन है और अनंत,
इसका चितेरा नहीं है कोई अल्लाह वगैरह,
और सबसे अच्छी रूबाई जो
तुम्हारी धधकती देह ने हमारे लिए छोड़ी
वो तो हरगिज़ नहीं जो कहती है-
'सारी आकृतियाँ परछाई हैं' वगैरह..।
-नाज़िम हिक़मत

'मुझे महसूस हुआ
मैं मार डाला गया हूँ।
उन्होंने चायघरों, क़ब्रों और गिरजाघरों की
तलाशी ली,
उन्होंने पीपों और आलमारियों को
खोल डाला।
सोने के दाँत निकालने के लिए
उन्होंने तीनों कंकालों को
खसोट डाला।
वे मुझे नहीं पा सके।
क्या वे मुझे कभी नहीं पा सके?
नहीं।
वे मुझे कभी नहीं पा सके ।
-नाज़िम हिक़मत

'मैं सोना चाहता हूँ।
मैं सो जाना चाहता हूँ ज़रा देर के लिए,
पल भर, एक मिनट, शायद
एक पूरी शताब्दी... लेकिन
लोग यह जान लें
कि मैं मरा नहीं हूँ...
कि मेरे होठों पर चाँद की अमरता है,
कि मैं पछुआ हवाओं का अजीज दोस्त हूँ...
...कि,
कि... मैं अपने ही आँसुओं की
घनी छाँह हूँ...।'
-नाज़िम हिक़मत

न चूम सकूँ, न प्यार कर सकूँ,
तुम्हारी तस्वीर को
पर मेरे उस शहर में तुम रहती हो
रक्त-माँस समेत
और तुम्हारा सुर्ख़ मूँ,
वो जो मुझे निषिद्ध शहद,
तुम्हारी वो बड़ी बड़ी आँखें सचमुच हैं
और बेताब भँवर जैसा तुम्हारा समर्पण,
तुम्हारा गोरापन मैं छू तक नहीं सकता!
-नाज़िम हिक़मत

एक दिन माँ कुदरत कहेगी,
"अब चलो ...
अब और न हँसी, न आँसू,
मेरे बच्चे ..."
और अन्तहीन एक बार
और ये शुरू होगी
ज़िन्दगी जो न देखे, न बोले,
और न सोचा करे।
-नाज़िम हिक़मत

मुझे बीते दिनों की याद नहीं आती
-सिवा गर्मी की वो रात.
और आख़िरी कौंध भी मेरी आंखों की
तुम को बतलाएगी
आने वाले दिनों की बात।
-नाज़िम हिक़मत

हल्‍की हरी हैं मेरी महबूबा की आँखें
हरी, जैसे अभी-अभी सींचा हुआ
तारपीन का रेश्‍मी दरख़्त
हरी, जैसे सोने के पत्‍तर पर
हरी मीनाकारी।
ये कैसा माजरा, बिरादरान,
कि नौ सालों के दौरान
एक बार भी उसके हाथ
मेरे हाथों से नहीं छुए।
मैं यहाँ बूढ़ा हुआ, वह वहाँ।
मेरी दुख़्तार-बीवी
तुम्‍हारी गर्दन पर अब सलवटें उभर रहीं हैं।
सलवटों का उभरना
इस तरह नामुमकिन है हमारे लिए
बूढ़ा होना।
जिस्‍म की बोटियों के ढीले पड़ने को
कोई और नाम दिया जाना चाहिए,
उम्र का बढ़ना बूढ़ा होना
उन लोगों का मर्ज़ है
जो इश्‍क नहीं कर सकते।
-नाज़िम हिक़मत

तुम्‍हारे हाथ
पत्‍थरों जैसे मज़बूत
जेलख़ाने की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचने वाले जानवरों जैसे भारी-भरकम
तुम्‍हारे हाथ जैसे भूखे बच्‍चों के तमतमाए चेहरे
तुम्‍हारे हाथ
शहद की मक्खियों जैसे मेहनती और निपुण
दूध भरी छातियों जैसे भारी
कुदरत जैसे दिलेर तुम्‍हारे हाथ,
तुम्‍हारे हाथ खुरदरी चमड़ी के नीचे छिपाए अपनी
दोस्‍ताना कोमलता।
दुनिया गाय-बैलों के सींगों पर नहीं टिकी है
दुनिया को ढोते हैं तुम्‍हारे हाथ।
-नाज़िम हिक़मत

अगर मेरे दिल का आधा हिस्सा यहाँ है डाक्टर,
तो चीन में है बाक़ी का आधा
उस फौज के साथ
जो पीली नदी की तरफ बढ़ रही है..
और हर सुबह, डाक्टर
जब उगता है सूरज
यूनान में गोली मार दी जाती है मेरे दिल पर .
और हर रात को डाक्टर
जब नींद में होते हैं कैदी और सुनसान होता है अस्पताल,
रुक जाती है मेरे दिल की धड़कन
इस्ताम्बुल के एक उजड़े पुराने मकान में.
और फिर दस सालों के बाद
अपनी मुफलिस कौम को देने की खातिर
सिर्फ ये सेब बचा है मेरे हाथों में डाक्टर
एक सुर्ख़ सेब :
मेरा दिल.
और यही है वजह डाक्टर
दिल के इस नाकाबिलेबर्दाश्त दर्द की --
न तो निकोटीन, न तो कैद
और न ही नसों में कोई जमाव.
कैदखाने के सींखचों से देखता हूँ मैं रात को,
और छाती पर लदे इस बोझ के बावजूद
धड़कता है मेरा दिल सबसे दूर के सितारों के साथ.
-नाज़िम हिक़मत

चेरी की एक टहनी
एक ही तूफ़ान में दो बार नहीं हिलती
वृक्षों पर पक्षियों का मधुर कलरव है
टहनियाँ उड़ना चाहती हैं।
यह खिड़की बन्द है:
एक झटके में खोलनी होगी।
मैं बहुत चाहता हूँ तुम्हें
तुम्हारी तरह रमणीय हो यह जीवन
मेरे साथी, ठीक मेरी प्रियतमा की तरह ...
मैं जानता हूँ
दुःख की टहनी उजड़ी नहीं है आज भी --
एक दिन उजड़ेगी।
-नाज़िम हिक़मत

कल रात मैंने सपने में तुम्हें देखा
सिर ऊँचा किए
धूसर आँखों से तुम देख रही हो मुझे
तुम्हारे गीले होंठ काँप रहे हैं
लेकिन कहाँ! तुम्हारी आवाज़
तो मुझे सुनाई नहीं दी!
काली अँधेरी रात में
कहीं ख़ुशी की ख़बर-जैसी
घड़ी की टिकटिक आवाज़...
हवा में फुसफुसा रहा है महाकाल
मेरे कैनरी के लाल पिंजरे में
गीत की एक कली,
हल से जोती गई ज़मीन पर
मिट्टी का सीना फोड़कर निकलते अंकुर की
दूर से आती आवाज़,
और एक महिमान्वित जनता के
वज्रकंठ से उच्चरित
न्याय अधिकार।
तुम्हारी गीले होंठ काँप रहे हैं
लेकिन कहाँ! तुम्हारी आवाज़
तो मुझे सुनाई नहीं दी!
उम्मीदों के टूटने का अभिशाप लिए
मैं जाग उठा हूँ, सो गया था
किताब पर चेहरा रखकर।
इतनी सारी आवाज़ों के बीच
तुम्हारी आवाज़ भी क्या मुझे सुनाई नहीं दी?
-नाज़िम हिक़मत

दरवाज़े पर मैं आपके
दस्तक दे रही हूँ।
कितने ही द्वार खटखटाए हैं मैंने
किन्तु देख सकता है कौन मुझे
मरे हुओं को कोई कैसे देख सकता है।
मैं मरी हिरोशिमा में
दस वर्ष पहले
मैं थी सात बरस की
आज भी हूँ सात बरस की
मरे हुए बच्चों की आयु नहीं बढ़ती।
पहले मेरे बाल झुलसे
फिर मेरी आँखे भस्मीभूत हुईं
राख की ढेरी बन गई मैं
हवा जिसे फूँक मार उड़ा देती है।
अपने लिए मेरी कोई कामना नहीं
मैं जो राख हो चुकी हूँ
जो मीठा तक नहीं खा सकती।
मैं आपके दरवाज़ों पर
दस्तक दे रही हूँ
मुझे आपके हस्ताक्षर लेने हैं
ओ मेरे चाचा ! ताऊ!
ओ मेरी चाची ! ताई!
ताकि फिर बच्चे इस तरह न जलें
ताकि फिर वे कुछ मीठा खा सकें।
-नाज़िम हिक़मत

सबसे सुन्दर है जो समुद्र
हमने आज तक उसे नहीं देखा,
सबसे सुन्दर है जो शिशु
वह आज तक बड़ा नहीं हो सका है,
हमें आज तक नहीं मिल सके हैं
हमारे सबसे सुन्दर दिन,
मधुरतम जो बातें मैं कहना चाहता हूँ
आज तक नहीं कह सका हूँ।
-नाज़िम हिक़मत

मैं आसमान की तस्वीर बनाना चाहता हूँ। बनाओ, मेरे बच्चे।
मैनें बना लिया। और तुमने इस तरह रंगों को फैला क्यूं दिया?
क्यूंकि आसमान का कोई छोर ही नहीं है।
मैं पृथ्वी की तस्वीर बनाना चाहता हूँ। बनाओ, मेरे बच्चे।
मैनें बना लिया। -और यह कौन है? वह मेरी दोस्त है।
-और पृथ्वी कहाँ है? उसके हैण्डबैग में।
मैं चंद्रमा की तस्वीर बनाना चाहता हूँ। बनाओ, मेरे बच्चे।
नहीं बना पा रहा हूँ मैं। क्यों? लहरें चूर-चूर कर दे रही हैं इसे बार-बार।
मैं स्वर्ग की तस्वीर बनाना चाहता हूँ। बनाओ, मेरे बच्चे। मैनें बना लिया।
लेकिन इसमें तो कोई रंग ही नहीं दिख रहा मुझे। रंगहीन है यह।
मैं युद्ध की तस्वीर बनाना चाहता हूँ। बनाओ, मेरे बच्चे। मैनें बना लिया।
और यह गोल-गोल क्या है? अंदाजा लगाओ। खून की बूँद? नहीं। कोई गोली? नहीं।
फिर क्या? बटन, जिससे बत्ती बुझाई जाती है।
-दुन्या मिखाईल