Thursday, 7 November 2013

'सुई-नश्तर' के पाठकों की तलाश


जयप्रकाश त्रिपाठी

डमरू ने किताब लिख तो ली, छपवा भी ली, अब लोग उसे पढ़ेंगे कैसे, और उसके महान विचारों का पूरे दिग-दिगंत में हाहाकार कैसे मचेगा, इसी फेर में दुबला होते-होते सूख कर कांटा हुआ जा रहा है।
डमरू प्रसिद्ध होना चाहता है। प्रसिद्धि की भूख ने उसके रोजमर्रा की इतनी ऐसी तैसी कर रखी है कि चिंता से चश्मे का नंबर भी दुबरा गया। जेब में पैसा नहीं कि दूसरा नंबर ले ले।
पिछले कई वर्षों से वह फरवरी की सूखी सर्दियों में दिल्ली के पुस्तक मेले जरूर हो आता है। पिता रेलवे में अधिकारी थे। तुकबंदी करते थे। बचपन में उसे कविता का शोौक लगा गए।
धूमिल के मोचीराम को पढ़ने के बाद डमरू ने पहली कविता लिखी- सुई। दूसरी कविता का शीर्षक रखा- पत्ती (ब्लेड)। नश्तर लिख ही रहा था कि रात भर के जगे-अलसाये पिता की नजर पड़ गई उस पर। अच्छा, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कविताई हो रही है!
उसके कुछ माह बाद डमरू गांव-जवार के ठेठे मुहावरे जुटाने लगा। अच्छा-खासा संग्रह हो गया तैयार। आखिरी के पन्नों पर सुई-नश्तर वाली कविताएं भी। एक कवि-कुल-गुरू का शरणागत हुआ। आशीर्वाद के साथ आज्ञा मिली कि बस चटपट इसे छपा ही डालो।
अब छपाई के पैसे कहां से आएंगे! मम्मी का शरणागत हुआ। वात्सल्य प्रलाप के बाद वह भी जुगाड़ हो गया। टीटी पापा सप्ताह भर में एक सैकड़ा यात्रियों को मूस लाए। छप गई किताब।
इन दिनो डमरू को 'मुहावरेदार सुई-नश्तर' के पाठकों की बड़ी बेसब्री से तलाश है!

Wednesday, 6 November 2013

उस फोटो को देखा तो ऐसा लगा


मधुमेह का मारा मैं आज सुबह मॉर्निंग वॉक की कठदौड़ से लौटा तो घर में अखबार की एक फोटो पर आंख ठहर गई। ठहर क्या चिपक-सी गई। टकटकी लगाए रहा देर तक। खामख्वाह। बात क्या थी कि यहां कुछ लिखा नहीं जा रहा लेकिन इस हवाई दोस्त मंडली में उस सच को साझा कर लेने को जी बहुत जोर मार रहा है। जैसे गले में कुछ अटक गया हो या कलेजे का पत्थर हल्का कर लेने की बेताबी...

फोटो के पीछे क्या है। जितना फूहड़ और विद्रूप, उससे हजारगुना ज्यादा डरावना स्मृतियों का एक गंदा झोका। फोटो मंत्री का। ये मंत्री केंद्र में है या किसी प्रदेश में, भेद खोलना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना जान लीजिए कि उसके चेहरे और वस्त्र की शालीनता-सुघरता देख कर रोंगटे खड़े हो गए। फोटो को बड़े गौर से घूरा। बार-बार चित्र के नीचे लिखा परिचय पढ़ा। उसी झटके में वह पूरी खबर पढ़ गया।

स्कूल के दिनो में हमारे घर गांव क्या, पूरे जिले में तीन बड़े डाकुओं का आतंक हुआ करता था। उनमें एक डाकू मेरी मौसी के गांव शिवरामपुर का निवासी था। दीना नाम था उसका। पूरे गांव की महिलाएं सोने-चांदी से लदी-फदी उसकी बीवी के पांव छुआ करती थीं। मौसी ने बताया था कि ये दीना डाकू की मेहरारू (बीवी) है। दीना डाकू के प्रशंसकों में मेरी मौसी का परिवार भी शामिल था। प्रशंसा इसलिए कि दीना शिवरामपुर समेत आसपास के गांवों में चोरी-डकैती नहीं पड़ने देता था। पुलिस भी किसी परेशान नहीं करती थी। बस, अपने गांव-जवार पर यही दीना की बहुत बड़ी नियामत थी।

दीना शरीर से जितना हट्टा-कट्टा, लंब-तड़ंग, उतना खूबसूरत। बोलचाल में मिठबोलवा। किसी से अकड़ के, ऊल-जुलूल नहीं बोलता था। गांव के हर बड़े बुजुर्ग के पांव छूता था। आज के राजनेताओं की तरह यह सब करना दीना की रणनीति का एक हिस्सा था क्योंकि लोगों का विश्वास जीत कर वह बड़े आराम से अपने घर-गांव में छिपा रहता था। पुलिस लाख कोशिश कर भी बगल के घर में छिपे दीना के बारे में भनक नहीं ले पाती थी।

उन्हीं तीन खूंख्वार डकैतों में से एक के वंशज की ये फोटो। लंबे समय तक जेल में गुजारे इसने भी। मैंने इसे कभी देखा नहीं था। फोटो ने चिंतित कर दिया। क्या दिन आ गये इस देश की राजनीति के। फोटो में अफसर उसके पीछे-पीछे फाइलें लिए दौड़े जा रहे थे। वह राहुल सांस्कृत्यायन की तरह गंभीर मुद्रा में अपनी वैसी ही सौम्यता से अफसरों को कृतकृत्य कर रहा था, जैसे मौसी के गांव को दीना.......

वंशावली खोलो तो कइयों की ऐसी ही पता चलेगी। कौन खोले बिल्ली के गले की घंटी। कविता-सविता लिख कर काम चल जा रहा है अपुन का। खामख्वाह आफत गले कौन लगाए....जयसियाराम! जयरामजीकी!

Monday, 4 November 2013

उन्हे नहीं सुहाते 'पछताते, पथ पर आते लोग'

जयप्रकाश त्रिपाठी


ये जो है न फेसबुक....जो रोज यहां आते हैं प्रायः, टिके रह जाते हैं घंटों। दिन-दिन भर। अपने आसपास से मुक्त। विचरते हुए-से। कई एक रचते हैं। खेलने वाले भी। अनेकशः सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए पल-दो-पल की। अथवा उनमें से कई-एक किसी-न-किसी व्यावसायिक मकसद से भी। कई एक उपस्थितियां छिपे एजेंडे वाली। कई छिछोरेबाजी के लिए। शोहदे भी।

लेकिन वे सबसे ज्यादा, जो अपने दर्द साझा करते हैं यहां। अपने आसपास, अपने रोजमर्रा के चित्र खींचते हुए। कविताएं, कहानियां, वक्तव्य, अनुभवों की सौगात उलीचते हुए। यहां आने का उद्देश्य उलझा हुआ नहीं होता है उनका। कुछ-एक पंक्तियों पर नजर पड़ते ही वे खींच लेते हैं हमे अपने निकट। बहुत पास तक।

जैसे सुबह कभी शहर की सड़कों से गुजरते हुए खाली ठेले लिए सब्जी मंडी की ओर तेज रफ्तार से जाते हुए लोग दिख जाते हैं। कई-एक दूध के लिए हाथ में खाली डिब्बे लटकाए। बच्चे को स्कूल ले जाने वाली बस का इंतजार करते। दुकान खोलते हुए। और बगल की सड़क पर झाड़ुओं से धूल के बवंडर बरसाते हुए भी।

और वे भी तो! सुन्नर-मुन्नर कुत्तों की चेन थामे आम आदमियों पर हिकारत से नजर डाल कर स्वयं की महानता से खामख्वाह अभिभूत-आह्लादित होते हुए। उनके जैसों के पास महानता की सीढ़ियां, कई-कई तरह के पायदान ऊपर तक जाने के लिए। उनके घरों से अक्सर हार्ट अटैक की खबरें आती हैं। मौत भी उन्हें ज्यादा परेशान नहीं करती है।

नाली-कचरे की गुड़-मुड़र में अधजगी कुतिया की तरह पसरी हुईं सुबह की सड़कों से कई एक जन अपनी बोल-भाषा में बतियाते हुए दिख जाते हैं। जैसे कि क्यों आ गये हों वे यहां। क्योकि इधर के कचरे के ढेरों में भी मामूली हाथ-पैर चलाकर ज्यादा-कुछ मिल जाता होगा। उनमें कई एक के पास अपनी लकड़ी की गड़ारियों वाली ठेल होती हैं। एक ठेल पर उसकी अपाहिज स्त्री भी उठंगी हुई, कचरे के ढेर पर पॉलीथिन की एक-एक थैली खंगालते सिर्फ अपने पति को बड़े गौर से देखती हुई। एकटक, टुकर-टुकर।

जिनके हाथ में झबरीले कुत्ते की चेन हो। लगता है, उनके मन में शायद इस तरह के प्रश्न भी सुबह-सुबह जरूर कौंधते होंगे कि ऐसे कचरे वाले लोग इस सुंदर दुनिया में क्यों रहना चाहते हैं। इनके नहीं होने पर दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी।इन्हें नहीं होना चाहिए। हों-न-हों, क्या फर्क पड़ता है। जीयें या मरें। छीईईईई...

ऐसा सोचने वालों के बारे में शायद उनके ऊपरी पायदान पर बैठे लोग भी इसी तरह के प्रश्न टीपते-टकटोरते रहते होंगे। वे लोग, जिनके नौकर कुत्ते की चेन थामे दिख जाते हैं । वे खुद नहीं।

वे बेचारे से।

नहीं पता कि हर किसी की चेन किसी-न-किसी की अंगुलियों में भिंची हुई। किसी न किसी की अक्ल तक फंसी-घुसी हुई रहती है।

जिन्हें कि ' दो टूक कलेजे को करते, पछताते, पथ पर आते' लोग रत्ती भर नहीं सुहाते हैं।

सचमुच दुनिया को जानवरों के बाड़े में तब्दील कर देने के लिए उनकी भी बेहूदा मशक्कत उनसे ऊपर के लोगों के लिए कितने काम की रहती होगी!

नहीं?

नबीला एक दो दिनों में गांव लौट जाएगी


ब्रजेश उपाध्याय

इस हफ़्ते अमरीका ने दो नए चेहरे देखे. एक वो चेहरा जो अपने दफ़्तर में बैठ कर हज़ारों मील दूर छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाता है और दूसरा वो चेहरा जो अनजाने में उसका शिकार बनता है. एक था मानसिक रूप से टूट चुके ब्रैंडन ब्रायंट का चेहरा जो ड्रोन ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे, दूसरा ज़िंदगी और उम्मीद से भरपूर नबीला का चेहरा. नौ साल की नबीला. मासूम, ख़ूबसूरत, नीली आंखें, सर पर रखे दुपट्टे के छोर को उंगलियों में लपेटती, कभी मुस्कराती, कभी बोर होकर उबासी लेती, कभी टेबल पर रखे कागज़ पर लकीरें खींचतीं नबीला. उत्तरी वज़ीरिस्तान से आई इस बच्ची ने एक साल पहले ड्रोन हमलों में अपनी दादी को खो दिया, ख़ुद भी घायल हुई लेकिन ज़िंदा बच गई. जब अमरीकी कांग्रेस के कुल पांच मेंबर और दुनियाभर की मीडिया के सामने नबीला अपनी कहानी पश्तो भाषा में सुना रही थी तो अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद कर रही महिला का गला भर आया, आंखें नम हो गईं. वहां बैठी कुछ और महिलाओं की भी आंखें नम थीं. एक ने कहा, "मैं भगवान से मनाती हूं कि तुम्हें फिर कभी ड्रोन की आवाज़ न सुनाई दे." वहां बैठा मैं एकटक नबीला को देख रहा था. अचानक से उनकी नज़र मुझ पर गई और जिस तरह से छोटे बच्चे कभी-कभी किसी अनजाने चेहरे को देखकर मुस्करा देते हैं, वैसे ही मुस्करा दीं. कांग्रेस में काम करने वाली एक महिला ने उसके सामने आईसक्रीम के दो कप लाकर रखे. पहले वो झिझकी, फिर एक चम्मच से चखा और फिर से वही मुस्कान. मैं तबतक उसके बिल्कुल पास खड़ा था, पूछा... "अच्छी हैं आईसक्रीम? उसने कुछ नहीं कहा. सर झुकाकर खाती रही." ये पहली बार था जब वो अपने गांव से निकली थी और सीधा वाशिंगटन पहुंची. मैने उसके भाई ज़ुबैर से पूछा, "नबीला को यहां कैसा लगा? जवाब था, 'ये बेहद खुश है. कहती है सड़कें कितनी चौड़ी हैं, लोग कितने प्यार से मिलते हैं." यही सड़कें उन दफ़्तरों तक भी जाती हैं जहां बैठकर कुछ लोग नबीला की दुनिया मे छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाते हैं. ब्रैंडन ब्रायंट ड्रोन ऑपरेटर का काम करते थे. ख़तरनाक चरमपंथी हों या बेगुनाह लोग, अपने कंप्यूटर पर दिख रही जीती-जागती तस्वीरों को मांस के लोथड़ों में बदलता देखना उन्हें अंदर से कहीं तोड़ चुका है. वो मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मैं जब अफ़गानिस्तान में एक मकान पर निशाना लगा रहा था तो कोई भागता हुआ नज़र आया. मुझे लगा कि कोई छोटा बच्चा है. एक और विशेषज्ञ की सलाह ली तो उसने कहा कि बच्चा नहीं कुत्ता है. हमला हुआ... मलबे की रिपोर्ट में न तो बच्चे का ज़िक्र था, न कुत्ते का." ब्रायंट ने नौकरी छोड़ दी है. उनके साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया. दूर से ही सही, किसी की जान लेना आसान काम नहीं होता. बल्कि कांग्रेस के एक सदस्य के शब्दों में "कौन जिएगा, कौन मरेगा, इसका फ़ैसला हम कर रहे होते हैं... जबकि ये फ़ैसला भगवान का होना चाहिए." इन दोनों चेहरों ने अमरीका की उलझन बढ़ा दी है. अबतक यहां एक ही सोच हावी रही है कि ये वो इलाका है जहां से तालिबान और अल क़ायदा दुनिया पर हमला करने की तैयारी करते हैं और ड्रोन से बेहतर कोई हथियार नहीं है इन्हें काबू में लाने के लिए. नबीला और ब्रैंडन ब्रायंट के चेहरों ने उस सोच पर सवाल उठाए हैं. अब यहां ये बहस भी हो रही है कि जो ख़तरनाक चरमपंथी कहे जाते हैं उन्हें बिना किसी सुनवाई के मौत की सज़ा देना क्या सही है? दूसरी तरफ़ ये सवाल ये भी उठते हैं कि अगर चरमपंथी बेगुनाहों को मारने में नहीं हिचकते तो उन्हें सभ्य समाज की सहूलियतें क्यों मिलें? नबीला एक दो दिनों में वापस अपने गांव पहुंच जाएगी. ब्रैंडन ब्रायंट अभी कुछ दिन डॉक्टरों के चक्कर लगाएंगे. इसी हफ़्ते फिर से एक ड्रोन हमला हुआ है. पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां कह रही है कि कुछ बड़े चरमपंथी मारे गए हैं. पाकिस्तान ने अपनी सीमा के अंदर हुए हमले के लिए अमरीका की एक बार फिर से आलोचना की है. (बीबीसी से साभार)

अमरीकी जासूसों के निशाने पर पूरी दुनिया


रूसी संसद के निचले सदन, राजकीय दूमा की अंतर्राष्ट्रीय संबंध समिती के अध्यक्ष अलेक्सेय पुश्कोव ने अपने ट्विटर माइक्रोब्लॉग में लिखा है कि अमरीका ने पूरी दुनिया में जासूसी करने के लिए एक अभूतपूर्व संजाल स्थापित किया हुआ है। पुश्कोव के शब्दों में, अमरीकी खुफिया सेवा के उप-प्रमुख जेम्स क्लेप्पर ने खुद माना है कि अमरीकी ख़ुफिया संजाल पूरी दुनिया में जासूसी का सबसे बड़ा संजाल है। अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी में 35 हज़ार लोग काम करते हैं और इसका वार्षिक बजट 11 अरब डॉलर है। इस बीच जर्मन गृह मंत्रालय की राय में, जासूसी कांड के सिलसिले में एक गवाह के रूप में एडवर्ड स्नोडेन से मास्को में पूछताछ की जा सकती है। यह बात जर्मन गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार इस पूर्व अमरीकी जासूस को जर्मनी में शरण देने के पक्ष में नहीं है। जर्मन नेताओं के बीच इस मुद्दे पर ज़ोरदार बहस जारी है। उदाहरण के लिए, जर्मनी की वामपंथी पार्टी के एक नेता बर्न्ड रिक्सिंगर ने कहा है कि जर्मन सरकार को चाहिए कि वह एडवर्ड स्नोडेन को अपने वहाँ बुलाकर उससे पूछताछ करे। एक अन्य जानकारी के मुताबिक गूगल कम्पनी के प्रबन्धकों ने अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी की हरकतों की शिकायत की है। कम्पनी की प्रबन्ध परिषद के अध्यक्ष एरिक श्मिट ने समाचार-पत्र वॉल स्ट्रीट जरनल को यह जानकारी दी।  विगत अक्तूबर के अन्त में अमरीकी गुप्तचर संगठनों के पूर्व एजेन्ट एडवर्ड स्नोडेन द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों से यह जानकारी मिली थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी 'मसकुलर' के कोडनाम से एक प्रोग्राम चला रही है और इण्टरनेट कम्पनियों गूगल और याहू के सर्वरों से सूचनाओं को रिकार्ड कर रही है। 'मसकुलर' नामक यह प्रोग्राम राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी को लाखों-करोड़ों ई०मेल सन्देशों को रिकार्ड करने की सम्भावना देता है। गूगल और याहू ने कहा है कि उन्होंने अमरीकी गुप्तचर कम्पनियों को ई०मेल सन्देश रिकार्ड करने की इजाज़त नहीं दी थी। एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन को अमेरिका ने माफ करने से इनकार किया है. व्हाइट हाउस के सलाहकार डैन फीफर ने कहा स्नोडेन ने कानून का उल्लंघन किया है और उनके प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. पिछले हफ्ते जर्मनी की ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले की स्नोडेन से मुलाकात के बाद अमेरिकी संसद के प्रमुख सदस्यों, खुफिया मामलों की समिति के सदस्यों और व्हाइट हाउस सलाहकार डैन फीफर ने इस बारे में बातचीत की. अमेरिकी न्यूज चैनल से बात करते हुए फीफर ने कहा, "स्नोडेन को अमेरिका वापस आना होगा और कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा." अमेरिकी सांसद डायेन फींस्टीन ने भी कहा है कि स्नोडेन ने नरमी का वह मौका गंवा दिया. उन्होंने कहा, "अगर वह फोन उठाकर व्हाइट हाउस की खुफिया मामलों की समिति से कहते कि मेरे पास कुछ ऐसी जानकारी है जो आपके लिए महत्वपूर्ण है, तो उनके पास मौका हो सकता था." फींस्टीन ने आगे कहा, "ऐसे में हम उनसे मिलते और इस जानकारी पर गौर करते. लेकिन वैसा हुआ नहीं और उन्होंने राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचाया है." वह मानती हैं कि स्नोडेन पर मुकदमा चलना ही चाहिए. अमेरिका में सरकार के खिलाफ जासूसी के आरोप झेल रहे एडवर्ड स्नोडेन को अगस्त में रूस में शरण मिली. अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के नेता माइक रॉजर्स ने भी कहा कि स्नोडेन को आरोपों से मुक्ति देने की कोई वजह नहीं दिखती. रॉजर ने कहा, "अगर वह वापस आकर इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार हों कि उन्होंने सरकारी जानकारी की चोरी की और उसका दुरुपयोग किया, तो मैं उनसे बातचीत के लिए तैयार हूं." साथ ही उन्होंने कहा स्नोडेन ने जो किया है उसकी उन्हें जिम्मेदारी लेनी होगी. इस बातचीत में वह बता सकते हैं कि उन्होंने जो किया वह क्यों किया.  एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के फोन पर एनएसए की जासूसी की खबरों के बाद से यूरोप में अमेरिका के खिलाफ नाराजगी और बढ़ गई. एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की और बर्लिन आकर एनएसए के खिलाफ गवाही देने का न्यौता दिया था. फींस्टीन ने उनकी इस मुलाकात पर भी सवाल उठाए और कहा कि जहां तक सहयोगी राष्ट्रों की आपसी बात है, उनके निजी फोन की जासूसी करना, खासकर नेताओं की, यह एक जासूसी हरकत से ज्यादा राजनीतिक जिम्मेदारी है. उन्होंने यह भी कहा, "हमें इस मामले को ध्यान से देखने की जरूरत है, और कुछ अपवाद को छोड़ राष्ट्रपति वह कर रहे हैं." एक दूसरे इंटरव्यू में अमेरिकी केंद्रीय खुफिया समिति और एनएसए के पूर्व प्रमुख माइकल हेडेन ने कहा कि जासूसी के पूरे मामले में जर्मनी के लिए ज्यादा खराब स्थिति है. उन्होंने कहा, "मैं चांसलर के लिए शर्मिंदगी का अनुमान लगा सकता हूं. इस मामले ने उनके लिए खराब राजनीतिक स्थिति पैदा की है." जर्मन ग्रीन पार्टी के श्ट्रोएबेले ने स्नोडेन से मिलकर उन्हें आश्वासन दिया कि उनके हकों का सम्मान किया जाएगा. मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि अगर स्नोडेन बर्लिन ना भी आ सके तो उस हाल में जर्मनी से वकीलों को बयान दर्ज करने के लिए रूस भेजा जा सकता है. अमेरिका पहले ही स्नोडेन के पासपोर्ट को अमान्य कर चुका है और जर्मनी समेत कई अन्य देशों से स्नोडेन को अमेरिका वापस भेजने के लिए भी कहा गया है. स्नोडेन ने कहा था कि वह जर्मन संसद में अमेरिकी जासूसी के बारे में गवाही देने के लिए भी तैयार है, बशर्ते उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए. अमेरिका को लिखे अपने खत में स्नोडेन ने उन पर लगे आरोपों से उन्हें मुक्त करने की मांग की थी. साथ ही स्नोडेन ने यह भी लिखा था, "जो लोग सच बोल रहे हैं वह अपराध नहीं कर रहे."

Friday, 1 November 2013

काशीनाथ सिंह की तीन 'काल' कथाएं



अकाल


यह वाकया दुद्धी तहसील के एक परिवार का है। पिछले रोज चार दिनों से गायब मर्द पिनपिनाया हुआ घर आता है और दरवाजे से आवाज देता है। अन्दर से पैर घसीटती हुई उसकी औरत निकलती है। मर्द अपनी धोती की मुरींसे दस रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट निकालता है और औरत के हाथ पर रखकर बोलता है कि जब वह शाम को लौटे तो उसे खाना मिलना चाहिए। औरत चिन्तित होकर पूछती है, ‘अनाज कहां है?’ ‘जुहन्नुम में।’ मर्द डपटकर कहता है और बाहर निकल जाता है। औरत नोट को गौर से देखती है और जतन से ताख पर रख देती हैं। वह अपने चार साल के लड़के को-जो खेलते-खेलते सो गया है- जगाती है और कहती है, ‘तुम घर देखो, मैं अभी आ रही हूं।’ लड़का आंख मलता है और वह उसे लौटकर अपने साथ बाजार ले चलने का लालच देता है! लड़का चुपचाप अपनी मां को देखता रहता है। औरत कटकटाए बर्तनों को उठाती है और मलने के लिए बाहर चली आती है। वह चटपट बर्तन मलकर घर आती है और चैखट पर पहुंचकर दंग रह जाती है। नीचे जमीन पर नोट के टुकड़े पड़े हैं। वह बर्तन फेंककर ताख के पास जाती है - नोट नदारद। लड़का खटिया पर जसका तस लेटा है। वह गुस्से में है और मुंह फुलाये है। वह लड़के को खींचकर मारना शुरू करती है और थक जाती है और रोने लगती है। शाम को मर्द आता है और चैक में पीढ़े पर बैठ जाता है। वह औरत को आवाज देता है कि तुरन्त खाना दो। औरत आंगन में बैठे बैठे बताती है कि जब वह बर्तन मलने गयी थी, लड़के ने नोट को फाड़ दिया था। मर्द अपनी सूखी जांघ पर एक मुक्का मारता है और उठ खड़ा होता है। वह लपककर चूल्हे के पास से हंसुआ उठाता है और आंगन में खड़ा होकर चिल्लाता है, ‘अगर कोई मेरे पास आया तो उसे कच्चा खा जाऊंगा। उसका मुंह अपनी औरत की ओर है। औरत बिना उसे देखे-सुने बैठी रहती है। मर्द झपट्टा मारकर लड़के को उठाता है और उस पर चढ़ बैठता है। फिर हंसुआ को झण्डे की तरह तानकर औरत को ललकारता है, ‘कच्चा खा जाऊंगा।’ औरत उसकी ओर कतई नहीं देखती। मर्द लड़के के गले पर हंसुआ दबाता है और गुस्से में कांखता है, ‘साले, तुझे हलाल करके छोडूंगा।’ और अपने ओठ भींच लेता है। लड़का - जो बिना चीखे, चिल्लाये, रोय उसके घुटनों के बीच दबा है- किसी तरह सांस लेता है, ‘ओह, ऐसे नही, धीरे-धीरे...। और पुलिस दूसरी सुबह नियमानुसार मर्द के साथ अपना फर्ज पूरा करती है।

पानी


पुलिस को खबर दी जाती है कि सात दिनों से भूख निठोहर कुएं में कूद गया है और वह बाहर नहीं आ रहा है। ‘इसमें परेशानी क्या है?’ पुलिस पूछती है। ‘हुजूर, वह मरना चाहता है।’ ‘अगर वह यही चाहता है तो हम क्या कर सकते हैं?’ पुलिस फिर कहती है और समझाती है कि वे उसके लिए मर जाने के बाद ही कुछ कर सकते हैं, इसके पहले नहीं। उन्हें इसके लिए ‘फायर-ब्रिगेड’ दफ्तर को खबर करनी चाहिए। खबर करनेवाले चिन्तित होते हैं और खड़े रहते हैं। ‘साहेब, वह कुएं में मर गया तो हम पानी कहां पियेंगे?’ उनमें से एक आदमी हिम्मत के साथ कहता है। ‘क्यों?’ ‘एक ही कुआं है।’ वह संकोच के साथ धीरे-से कहता है। दूसरा आदमी बात और साफ करता है। ‘उस कुएं को छोड़े पानी के लिए हमें तीन कोस दूर दूसरे गांव जाना पड़ेगा।’ काफी सोच विचार के बाद दो सिपाही कुएं पर आते हैं। वे झांक कर देखते हैं-पानी बहुत नीचे चला गया है और वहां अंधेरा दिखायी पड़ रहा है। पानी की सतह के ऊपर एक किनारे बरोह पकड़े हुए निठोहर बैठा है-नंगा और काला। सिपाही होली का मजा किरकिरा करने के लिए उन्हें गालियां देते हैं और डोर लाने के लिए कहते हैं। डोर लायी जाती है और कुएं में ढील दी जाती है। सिपाही अलग-अलग और एक साथ चिल्लाकर निठोहर से रस्सी पकड़ने के लिए कहते हैं। रस्सी निठोहर के सामने हिलती रहती है और वह चुपचाप बैठा रहता है। सिपाही उसे डांटते हैं, ‘बाहर आना हो तो डोर पकड़ो।’ काफी हो-हल्ला के बाद निठोहर अपनी आंखे डोर के सहारे ऊपर करता है, फिर सिर झुका लेता है। ‘वह डोर क्यों नहीं पकड़ रहा है?’ एक सिपाही बस्ती वालों से पूछता है। बस्ती वाले बताते हैं कि वह डोर पकड़ने के नहीं, मरने के इरादे से अन्दर गया है। वह भूख से तंग आ चुका है। सिपाही मसखरी करते हैं कि क्या वे उनके निठोहर के लिए रोटी हो जायें। सिपाहियों में से एक फिर चिल्लाता है कि अगर वह मरने पर ही आ गया हो तो उसे कोई रोक नहीं सकता लेकिन वह कम-से-कम आज नहीं मर सकता। आज होली है और यह गलत है। ‘हां, वह किसी दूसरे दिन मर सकता है, जब हम न रहें।’ दूसरा सिपाही बोलता है। जवाब में निठोहर के होंठ हिलते हुए मालूम होते हैं, लेकिन आवाज नहीं सुन पड़ती। ‘क्या बोलता है?’ एक सिपाही पूछता है। ‘मुंह चिढ़ा रहा है।’ दूसरा कहता है। ‘नहीं, वह गालियां दे रहा होगा, बड़ा गुस्सैल है।’ दूसरी तरफ से अन्दर झांकता हुआ एक आदमी कहता है। ‘गालियां? खींच लो। तुम सब खींच लो डोरे और साले को मर जाने दो!’ बाहर डोर पकड़े हुए बस्तीवालों पर एक सिपाही चीखता है। बस्तीवालों पर उसकी चीख का कोई असर नहीं पड़ता। ‘जाने दो। गाली ही दे रहा है, गा तो नहीं रहा है।’ उसका साथी फिर मसखरी करता है और ही-ही करके हंसता है। ‘अच्छा, ठीक है, बाहर आने दो।’ सिपाही खुद को शान्त करता है। डोर ऊपर खींच ली जाती है और उसे बाहर निकालने के लिए तरह-तरह के सुझाव आने लगते हैं। तय पाया जाता है कि वह भूखा है और रोटियां देखकर ऊपर आ जायेगा। लेकिन सवाल पैदा होता है कि रोटियां कहां से आयें? अगर रोटियां होती तो वह कुएं में क्यों बैठता? फिर बात इस पर भी आती है कि उसे यहीं से चारा दिखाया जाये। मुलायम और नरम पत्तियां। ‘क्यों, तुम सब उसे पाड़ा समझते हो?’ नाराज सिपाही पूछता है और अपना थल-थल शरीर हंसी से दलकाने लगता है। अंत में तय होता है कि कोई आदमी निकट के बाजार में चला जाये और वहां से कुछ भी ले आये। घंटे बाद पावभर सत्तू आता है। सिपाही पूरी बुद्धि के साथ एक गगरे में सत्तू घोलकर निठोहर के आगे ढील देते हैं। वह गगरे को हाथों में लेकर हिलाता है, उसमें झांकता है, सूंघता है। फिर एक सांस में पी जाता है। खाली गगरा फिर झूलने लगता है और ऊपर हंसी होती है। ‘अच्छा बनाया उसने,’ एक सिपाही कहता है। ‘अब तो वह और भी बाहर नहीं आयेगा।’ बस्ती का एक आदमी उदास होकर कहता है। ‘हां-हां, रुको। घबड़ाओ नहीं।’ थलथल सिपाही अंदर झांकता हुआ हाथ उठाकर चिल्लाता है। दूसरे भी झांकते हैं। निठोहर ने गगरा छिटाकर पानी पर फेंक दिया है और फंदा अपने गले में डाल लिया है। ‘उसने फंदा पकड़ लिया है।’ पहला सिपाही चिल्लाता है। ‘खींचों, मैं कहता हूं, खींचो साले को।’ दूसरा चीखता है और निठोहर खींच लिया जाता है। उसकी उंगलियां फन्दे पर कस गयी हैं। जीभ और आंखे बाहर निकल आयी हैं और टांगे किसी मरे मेंढक-सी तन गयी हैं। सिपाहियों को करतब दिखाने का जरिया मिलता है और बस्ती वालों को पानी।

प्रदर्शनी


खबर फैली है कि इस इलाके में अकाल देखने प्रधानमंत्री आ रही हैं। सरगर्मी बढ़ती है। जंगल के बीच से नमूने के तौर पर 50 कंगाल जुटाये जाते हैं और पन्द्रह दिन तक कैंप में रखकर उन्हें इस मौके के लिए तैयार किया जाता है। स्वागत की तैयारियां शुरू होती हैं। फाटक बनाये जाते हैं। तोरण और बन्दनवार सजाये जाते हैं। ‘स्वागतम्’ और ‘शुभागमनम्’ लटकाये जाते हैं। ‘जयहिन्द’ के लिए दो नेताओं में मतभेद हो जाता है इसलिए यह नहीं लटकाया जाता। गाड़ियां इधर से उधर दौड़ती हैं और उधर से इधर। पुलिस आती है, पत्रकार आते हैं, नेता और अफसर आते हैं। सी.आई.डी की सतर्कता बढ़ती है। अपने क्षेत्रों के विजेता नेता लोगों को समझाते हैं कि यह उनकी आवाज है जो प्रधानमंत्री को यहां घसीट लायी है। इस तरह अगले चुनाव में उनके विजय की भूमिका बनती है। दूसरे क्षेत्रों से आये नेताओं को कोफ्त होती है कि उनका क्षेत्र अकाल से क्यों वंचित रह गया। इस बीच अकाल भी जोर पकड़ लेता है। पेड़ों से बेल, महुवे, करौंदे, कुनरू, के बौर साफ हो चुकते हैं। अब पेड़ नंगे होने लगे हैं। उनकी पत्तियां –भरसक नरम और मुलायम-उठाली जा रही हैं और खायी जा रही हैं। यह सब तब तक चल रहा है, जब तक आगे है। ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री आती हैं। वे दस रुपये की साड़ी में सौ वर्ग मील की यात्रा करती हैं। कुछ ही घंटों में इतनी लंबी यात्रा लोगों को सकते में डाल देती है। प्रधानमंत्री खुश रहती हैं क्योंकि लोग भूखे हैं फिर भी उन्हें देखने के लिए सड़कों पर धूप में खड़े हैं। जनता प्रधानमंत्री के प्रति अपने पूरे विश्वास और विनय के साथ अकाल में मर रही है। अंत में, प्रधानमंत्री का दस मिनट तक कार्यक्रम होता है। रामलीला मैदान में कहीं कोई तैयारी नहीं है। क्योंकि बाहर से लाये जाने वाले फल, गजरे, केले के गाछ कंगालों के बीच सुरक्षित नहीं रह सकते। और ऐसे भी यह कार्यक्रम जश्न मनाने के लिए नहीं है।कार्यक्रम से पहले प्रदर्शनी के लिए तैयार किये गये सैंतालीस कंगाल लाये जाते है। पचास में से तीन मर चुके हैं। कैम्प में आने के तरहवें दिन जब उन्हें खाने के लिए रोटियां दी गयीं तो वे पूरी की पूरी निगल गए। और हुआ यह कि रोटी सूखे गले में फंस गयी और वे दिवंगत हो गये। प्रधानमंत्री उनके और सारी भीड़ के आगे अपना कार्यक्रम पेश करती हैं। वे धूप में एक चबूतरे पर आ खड़ी होती हैं। बोलने की कोशिश में ओंठों को कंपाती हैं। आंखों को रूमाल से पोंछती हैं और सिर दूसरी ओर घुमा लेती हैं। रूमाल के एक कोने पर सुर्ख गुलाब कढ़ा है। भीड़ गदगद होती है। इस मौन कार्यक्रम के बाद प्रसन्न चेहरे के साथ प्रधानमंत्री विदा लेती है। नारे लगते हैं। जै-जैकार होता है। और दूसरे शहर के सबसे बड़े होटल में प्रधानमंत्री पत्रकारों के बीच वक्तव्य देती हैं कि ‘हम दृढ़ता, निश्चय और अपने बलबूते पर ही इसका मुकाबला कर सकते हैं। अफसर खुश होते हैं कि दौरा बिना किसी दुर्घटना के सम्पन्न हुआ है। भीड़ पहली बार अपने जीवन में प्रधानमंत्री का दर्शन पाकर छंट जाती है और वे सैंतालीस कंगाल घास और माथों की आंड़ी खाने के लिए जंगल की ओर हांक दिये जाते हैं।

भावी प्रधानमंत्रियों का पोंगा-विलाप

जयप्रकाश त्रिपाठी

प्रधानमंत्री पद के भाजपाई उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी अपनी-अपनी चुनाव सभाओं में मतदाताओं का मन भरमाने के लिए पोंगा विलाप करते डोल रहे हैं। एक जनाब कह रहे हैं, दादी-पिता की तरह उन्हें भी निशाने पर लिया जा सकता है। दूसरे सज्जन अलापते हैं, आशीर्वाद है कि मैं जिंदा हूं। प्रश्न उठता है कि भारतीय कानून व्यवस्था में जब देश के भावी प्रधानमंत्रियों के डर-भय का ये हाल है तो जनता का क्या होगा। लोकतांत्रिक देश है। कहने के लिए सबको समान अधिकार है। पूरी सुरक्षा व्यवस्था कुछ लोगों की रखवाली में है। उस पर अरबों रुपये सालाना खर्च हो रहा है जनता का। जनता के टैक्स पर अधिकारी और नेता मौज उड़ा रहे हैं।
प्रधानमंत्री के लिए ढोंग की भाषा बोलने की बजाय जनता की उन वास्तविक समस्याओं पर बोलने से ये नेता कतरा रहे हैं। इतनी चौकसी लपेटने के बावजूद उन्हें अपनी-अपनी जान का डर है। हैरत है। तो जनता क्या करे। वे क्यों बार-बार रैलियों में अपनी जान की दुहाई दे रहे हैं। जनता की जान क्या खैरियत में हैं। वे महंगाई पर महंगाई लादते हुए जनता की जान लेने पर आमादा हैं। अपराधियों को राजनेता बना कर जनता की बहू-बेटियों की इज्जत-आबरू खतरे में डाले हुए हैं। कानून व्यवस्था हर प्रदेश में हाशिये पर है। दिनदहाड़े लोग मारे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। श्रम कानूनों का अपहरण कर करोड़ों मेहनतकशों को मरने के लिए छोड़ दिया है। देश कर्जखोरी में डूबता जा रहा है और स्विस बैंक में वे देसी चोरी का माल तहियाते जा रहे हैं। क्या उन्हें देसी-विदेशी कंपनियों की चाटुकारिता करने के लिए प्यार किया जाए। महंगाई के कोड़े खाने के लिए चुना जाए!
वह किसके लोकतंत्र की हिफाजत के लिए राजधानियों में कुंडली मारना चाहते हैं। लोकपाल विधेयक पर क्यों बाएं-दाएं झांकते हैं! पटेल की गगन चुंबी प्रतिमा किसके पैसे से बनवा रहे हैं। किसके पैसे से दिनरात हवाई यात्राएं कर रहे हैं। आखिर कैसे उनके और अफसरों के लग्गू-भग्गू तक सियासी बाना ओढ़ते ही साल-छह महीने में लखपति-करोड़पति हो जा रहे हैं। दो रुपये में प्याज खरीद कर सौ रुपये में बेचने वाले जमाखोरों को संरक्षण कौन दे रहा है! जनता को सब पता है। हकीकत तो ये है, उसके सामने कोई तीसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
इसलिए वे अपनी रैलियों में चाहे जितने सयाने बन लें, जितने तरह के फर्जी विलाप कर लें, चैनल चाहे जितनी बेशर्मी से खलनायक को नायक बनाने का खेल खेल लें, जनता सब देख रही है। सब जान रही है। सच तो ये है कि अपनी अशिक्षा और नादानी के चलते वह इन खद्दरधारी दुरंगों, सरमायेदारों के चौकीदार-जोकरों, लुटेरों-मवालियों के सफेदपोश संरक्षकों, प्याज के जमाखोरों से चुनावी थैलियां खसोटने वाले जेबकतरों, किसी भी समय डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ा देने वाले वणिक-गायकों से तंग आ चुकी है। दीपावली ब्रांडेड हुंकार से नहीं, रोजी से मनेगी। चिथड़ा लपेट कर कैसे मनेगी, उन्हें भी अच्छी तरह पता है।