Saturday, 22 June 2013

इंट्रोवर्ट हैं तो खुद को बिल्कुल न बदलें!


स्पीकर सुजेन केन

प्रोफाइल : लेखक बनने से पहले 7 साल जेपी मॉर्गन और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों की कंसल्टेंट थीं।
क्यों पढ़ें: इसे अब तक 35 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न वेबसाइट्स पर सुन चुके हैं।
मैं जब 9 साल की थी तब पहली बार समर कैंप में गई। मां ने मेरे लिए जो सूटकेस तैयार किया उसमें किताबें भरी थीं। आप लोगों को शायद ये थोड़ा अजीब लगे लेकिन मेरे परिवार में किताबें पढ़ना सबसे जरूरी गतिविधि रही है। मैने दिमाग में छवि बनाई थी कि कैंप में मुझे किताबें पढ़ती कुछ लड़कियां नजर आएंगी। लेकिन जब मैं वहां पहुंची वो किसी पार्टी की तरह लगा।
मैं इंतजार कर रही थी कब मुझे वापस कमरे में जाकर किताब पढ़ने का मौका मिले। पर जब भी मैं किताब पढ़ने जाती तो मुझसे पूछा जाता मैं क्यों उदास हूं। पूरे समर कैंप में मैंने किताबों को देखा तक नहीं। मैंने कैंप में 50 बातें महसूस की जिससे मुझे लगा कि मुझे एक्स्ट्रोवर्ट होना चाहिए। कहीं अंतर्मन में यह बात हमेशा थी कि इंट्रोवर्ट्स जैसे हैं उसी रूप में बेहतरीन हैं। पर शायद यह बात मानने में मुझे सालों लग गए इसलिए मै वॉल स्ट्रीट लॉयर बन गई। जबकि मैं हमेशा से लेखक ही बनना चाहती थी। मैनें वो सब किया जो औरों को तो सही लगा, मुझे नहीं। दुनिया के अधिकांश इंट्रोवर्ट्स ऐसा ही करते हैं।
इंट्रोवर्टस शर्मीले नहीं होते। उनकी अभिव्यक्ति का तरीका अलग होता है। मुझे लगता है हमारे स्कूल और दफ्तर एक्स्ट्रोवर्ट्स को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। गणित जैसे विषय, जहां हमें अकेले लड़ना होता है वहां भी ग्रुप असाइनमेंट दिए जाते हैं। मैं आपको बता दूं कि एलिनोर रूजवेल्ट, महात्मा गांधी ने स्वयं को शांत और शर्मीला बताया था। जिनके शरीर का हर अंग स्पॉटलाइट से दूर रहना चाहता था। लेकिन उन्होंने इतिहास रचा। स्टीव वोजनिएक ने पहला एपल कंप्यूटर हैवलेट पैकर्ड में अकेले बैठकर बनाया था।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम सारे डार्विन की तरह जंगलों में घूमें। बुद्ध की तरह खुद ही अपनी चीजें खोजिए। ये देखें कि आपके सूटकेस में किताबें हो या कुंछ और उन्हें बदलिए मत। इंट्रोवर्ट्स आप जैसे हैं उसी मैं आपकी ताकत है। दुनिया को आपकी जरुरत आपके नैसर्गिक रूप में है। (भास्कर / स्रोत: वर्डप्रेस)

(दूसरा दशक के पोस्टर से साभार/प्राइमरी का मास्टर)


किताबों के संग
अपने कलाम साहब की पुस्तकों के बारे में चंद  लाइने !
आधी सदी से अधिक का वक्त
मैंने बिताया किताबों के संग
किताब मेरी दोस्त,मेरी हमसफ़र,
किताबों के सहारे
मैंने देखे सपने
सपने बन गए मकसद
किताबों के सहारे बढ़ा हौंसला
मकसद पूरा करने का,
असफलता के वक्त
किताबों ने बढ़ायी मेरी हिम्मत
किताबें मेरी दोस्त, मेरी हमसफ़र,
अच्छी किताबें देवदूत बन मेरे लिए पैगाम
मेरे दिल को हौले से सहलाया,
इसलिए मैं अपने युवा साथियों से
कहता हूँ  - किताबों से दोस्ती करो
ये हैं तुम्हारी अच्छी दोस्त, हमसफर
किताब मेरी दोस्त, मेरी हमसफर !
डा० ए पी जे अब्दुल कलाम

अनामदास का पोथा उर्फ ऎसी किताबें क्या पढ़ना?


अशोक कुमार पांडेय

पुरानी किताबें पुराने दोस्तों की तरह होती हैं. अगर दिल के करीब हों तो हाथ मिलाते ही दुनिया-जहान की बातें निकल आती हैं वरना यह सवाल खड़ा हो उठता है कि मिले ही क्यूँ? हर पाठक का पुस्तकालय ऐसी तमाम किताबों से भरा होता है जिन्हें अरसे पहले पढ लिए जाने के बाद भी उनसे बार-बार मिलने-बतियाने का जी करता है. इस अंक से ‘कल के लिए’ से पाठकीय जुड़ाव के सम्पादकीय जुड़ाव में तबदील हो जाने के बाद पहली जिम्मेदारी के रूप में मिले इस कालम के बहाने मैं हर बार ऎसी ही कुछ किताबों से अपने मिलने-बतियाने के पाठकीय अनुभव साझा करूँगा. शुरुआत हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘अनामदास का पोथा’ से.
अनामदास का पोथा से पहली मुलाक़ात शायद १९९३ या ९४ में गोरखपुर में अपने मित्र स्वदेश की किताबों की दुकान ‘अक्षरा’ पर हुई थी. उन दिनों किताबें पढ़ने और खरीदने का नया-नया शौक जागा था और इसे खरीदने के पीछे शायद एक बड़ी वज़ह राजकमल पेपरबैक्स की सस्ती कीमत भी रही हो. मुझे अच्छी तरह याद है कि जिस वक़्त इसे खरीद रहा था हमारे एक साथी वहाँ मौजूद थे और उन्होंने लगभग हिकारत के साथ कहा था कि ‘इस पंडिताऊ पोथे को क्यों खरीद रहे हो?’ मैंने पूछा- आपने पढ़ी है? वे बोले – ऎसी किताबें क्या पढ़ना? खैर, किताब खरीदी गयी...पढ़ी गयी और इसके बाद ऎसी तमाम ‘ब्लैक लिस्टेड’ किताबें भी खरीदी गयीं और तब से अब तक यह विश्वास दृढ हुआ कि बिना पढ़े किताब तथा बिना देखे फ़िल्म के बारे में बोलने की छूट बस हिन्दी के विद्वान आलोचकों और क्रांतिकारियों को है, एक पाठक/दर्शक को खुद पढ/देख के ही फैसले लेने चाहिए.
इस किताब को द्विवेदी जी ने एक बिल्कुल नई शैली में लिखा है जिसमें उन्होंने ‘अनामदास’ का एक चरित्र गढा है जिसके हाथों यह उपन्यास लिखवाया गया है. यह अनामदास उस हजारी प्रसाद द्विवेदी से वाकई अलग है जिसे हम आमतौर पर जानते हैं. बिल्कुल आरंभ में जैसे वह अनामदास का व्यक्तित्व गढते हैं और जितना मजा लेकर उसके बारे में बताते हैं, वह उनके आलोचक के भीतर छुपे एक मनोविनोदी कथाकार और कवि का पता देता है. एक जगह वह खुद ही लिखते हैं – ‘अनामदास के पोथे से लगता है कि उसके लेखक के भीतर का कवि सुप्त है, आलोचक अशक्त. फिर भी कोई बात है जो आकृष्ट करती है.’ लेकिन सच यह है कि इस पोथे को पढते हुए लगातार लगता है कि इसके लेखक का कथाकार मस्ती के मूड में है, कवि अपने रंग में और आलोचक उन दोनों को नियंत्रित करने की कोशिश करते-करते खुद मुस्करा रहा है.
इस उपन्यास में एक ऋषि रैक्व के एक उपनिषदीय चरित्र के सहारे द्विवेदी जी ने एक ऎसी अद्भुत कथा कही है जिसके मानी न केवल उनके समय में महत्वपूर्ण थे बल्कि साहित्य और समाज के आपसी रिश्तों के बरअक्स एक सार्वभौमिक और सर्वकालिक महत्व की स्थापना करते हैं. समाज से दूर एकांत साधना करने वाला रैक्व अपने स्वानुभूत ज्ञान से परम संतुष्ट है और यह संतुष्टि अहंकार तथा उसकी स्वाभाविक परिणिति धृष्टता तक पहुंची हुई है कि एक दिन एक स्त्री का स्पर्श उसके भीतर एक अजीब सी उथल-पुथल मचा देता है. वास्तविक दुनिया से उसका पहला संपर्क उसके आत्मगत ज्ञान को बौना साबित कर देता है. उसके भीतर ज्ञान की एक अपरिमित प्यास और कामनाओं का एक अपरिभाषित संसार जग उठाता है जिसे द्विवेदी जी ने पीठ की उस खुजली के माध्यम से बखूबी दिखाया है जिसके लिए वह बैलगाडी से अपनी पीठ खुजाता रहता है. यह प्यास उसे भटकाती है...यह भटकन उन्हें समाज तक ले जाती है एक और स्त्री के माध्यम से जो एक चेतस माँ है. माँ (ऋतुम्भरा) उसे बताती है कि ‘अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक तरह का स्वार्थ ही है’. इस आत्मगत और समाज से दूर रहकर अर्जित ज्ञान और उसके अहंकार ने ही मुक्तिबोध के ‘ब्रह्मराक्षस’ को भी रचा था. ब्रह्मराक्षस जिसका विराट ज्ञान बस अंधी बावडियों से सिर टकराने के लिए था. समाज से इसी साक्षात्कार ने सुविधाजीवी सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध बना दिया. और जब रैक्व का समाज से साक्षात्कार होता है तो फिर ‘सब हवा है’ मानने वाले रैक्व के लिए एकांत में समाधि लगाना मुश्किल हो गया. सिर्फ किताबी ज्ञान से भी उनका काम नहीं चला. जनता का दुःख और उसे दूर करने की तड़प सबसे महत्वपूर्ण हो गयी और इससे संचालित रैक्व एक ऐसे विचारक के रूप में सामने आता है जिसके लिए समस्त विचारों के केन्द्र में मनुष्य है. मनुष्यता की यही पक्षधरता इस उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाती है.
इस उपन्यास में एक और चीज़ जो बेहद आकर्षित करती है वह है इसके स्त्री चरित्र. जहाँ जाबाला से पहली मुलाक़ात रैक्व के लिए समाज और वास्तविक संसार को जानने के पहले वातायन खोलती है, वहीं ऋतुम्भरा का मातृरूप उसे उंगलियाँ पकड़ा कर उस संसार तक ले जाता है और ऋजुका दुःख से उसका पहला साक्षात्कार कराती है. स्त्रियों के ये सभी चरित्र चेतना संपन्न और मानवीय हैं जो एक पत्थर को काट-छांट कर एक ख़ूबसूरत मूर्ति में तबदील कर देते हैं. उपन्यास में आया एक और चरित्र जटिल मुनि का है जो एक अब्राह्मण साधक हैं, श्रम की महत्ता को स्वीकार करने वाले. वह रैक्व को न केवल अनुभव जन्य ज्ञान का महत्व बताते हैं बल्कि प्रेम और स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबरी और पारस्परिक सम्मान का पाठ भी पढ़ाते हैं. वह उसे एक धर्म सम्मत विवाह की जगह उद्वाह की सलाह देते हैं. उद्वाह, जिसमें ‘पति पत्नी को और पत्नी पति को ऊपर की और वहन करती है, अर्थात परस्पर की आध्यात्मिक चेतना को परिष्कृत करती है.’
इस तरह से ये उपनिषदीय कथा एक ऐसा आदर्श रचती है जो हमारे समय के कला कला के लिए बनाम कला समाज के लिए की महत्वपूर्ण बहस में जनपक्षधर धारा के पक्ष में एक गंभीर हस्तक्षेप करता है. यह आदर्श समाज विमुख आत्मगत ज्ञान पर समाज चेतस वस्तुगत ज्ञान को वरीयता देता है और मनुष्यता की पक्षधरता वाले वैचारिक विमर्श के पक्ष में मजबूती से खड़ा होता है.
ये स्त्रियाँ हिन्दी में किसी उत्तर आधुनिक विमर्श के पहले की स्त्रियाँ हैं. ये आदर्श किसी वैचारिक उद्घोष के हेतु से मुक्त हैं. तो इसमें उनकी अपनी आभा है – अपनी सीमाएँ. द्विवेदी जी की योजना इसका दूसरा भाग लिखने की भी थी तो ज़ाहिर है कि बहुत कुछ कहना अभी बाक़ी रह गया था. लेकिन उस ‘बहुत-कुछ’ का अनुमान बस एक बौद्धिक उठापठक ही हो सकता है. हमारे सामने जो है वह बस यही कही हुई कथा है. अब यह हम पर है कि हम इसे पढकर देश-काल के परिप्रेक्ष्य में इससे सकारात्मक नतीजे निकालते हैं या फिर किसी मार्खेज, किसी मुराकामी, किसी सरामागो के मिथकों से लहालोट होने के बाद इसके ‘उपनिषदीय’ चरित्रों से नाक-भैंह सिकोड़ते हुए इसे बिना पढ़े खारिज कर देते हैं. (जनपक्ष)

किताबें इधर-उधर की

पशुपति: राजश्री - राजश्री
इस उपन्यास की पृष्ठभूमि सांस्कृतिक है। वक्त वैदिक काल का और संघर्ष महाअसुर वरुण और महारूद शिव के बीच। दो ध्रुवों के बीच चलने वाली ऐसी कथाओं में अच्छे-बुरे का भेद महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण है विचार और हालात की जटिलता, जिससे एक पक्ष सही और दूसरा गलत रास्ते पर बढ़ता चला जाता है। इस जटिल संघर्ष में मानवीय सभ्यता की समझ उभरती है। 'पशुपति' उस समझ की एक अहम औपन्यासिक कड़ी है।

निरागसाधना - मनोज कुमार चतुर्वेदी
भागदौड़ की जिंदगी में सेहत का ख्याल हमें तब ही आता है, जब हम किसी बीमारी के शिकार होते हैं। लेकिन थोड़े-से जतन से हम खुद को अस्पतालों के चक्कर और महंगी दवाओं से बचा सकते हैं। योग सेहतमंद बने रहेने का एक बड़ा कारगर तरीका है। इस किताब में योग के जरिए कैसे मानसिक और शारीरिक रूप से सेहतमंद रहा जाए, इसकी जानकारी विस्तारपूर्वक दी गई है। योग में यकीन रखने वालों के लिए यह उपयोगी हो सकती है।

बड़ों की बातें - शुकदेव प्रसाद
जिंदगी सीखने का नाम है। हम सब हर रोज कुछ-न-कुछ सीखते हैं। यह सीख जितना हमारे आसपास से निकल कर आती है, उतना ही उन लोगों के बारे में जानकर, जिन्हें हम महान विभूतियों के नाम से जानते हैं। इस किताब में राजनीतिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक आदि क्षेत्रों की महान विभूतियों के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों को पिरोया गया है। ये प्रसंग न सिर्फ पढ़ने में रोचक हैं, बल्कि इनमें गांठ बांध लेने लायक कई सीख भी हैं।

किताब: महिलाएं समझें अपने कानूनी अधिकार - जे. के. वर्मा
महिलाओं से संबंधित कानून के बारे में जागरूकता लाने की एक कोशिश है यह किताब। ज्यादातर महिलाएं खुद यह नहीं जानतीं कि उन्हें कौन-कौन से कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। इस वजह से उन्हें और उनके परिजनों को कई दफा गैरजरूरी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है। किताब में शादी, दहेज प्रताड़ना, लिव इन रिलेशनशिप, जायदाद संबंधी हक आदि के बारे में अहम जानकारियां दी गई हैं। इसके साथ-साथ महिला सशक्तिकरण को लेकर चल रही कोशिशों के बारे में भी बताया गया है।


Thursday, 20 June 2013

‘वह भी कोई देस है महाराज’


किताबों की बहुरंगी दुनिया में एक किताब है-वह भी कोई देस है महाराज। अनिल यादव की यह किताब पूर्वोत्तर राज्यों के जीवन, जंगल, वहां की पीड़ा एवं संस्कृति से रूबरू कराती है। असल में यह यात्रा वृतांत है जिसे लेखक ने बहुत शिद्दत के साथ लिखी है। साथ ही उन राज्यों की संवेदना को भावनात्मक एवं रागात्मक रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।

पुरानी दिल्ली के भयानक गंदगी, बदबू और भीड़ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ पर खड़ी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक जमाने से इसी तरह खड़ी है। अब कभी नहीं चलेगी। अंधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर उल्टियों से बनी धारियां झिलमिला रही थीं जो सूख कर पपड़ी हो गईं थीं। रेलवे ट्रैक पर नेवले और बिल्ली के बीच के आकार के चूहे बेखौफ घूम रहे थे। 29 नवंबर की उस रात भी शरीर के खुले हिस्से मच्छरों के डंक से चुनचुना रहे थे। इस ट्रेन को देखकर सहज निष्कर्ष चला आता था कि चूंकि वह देश के सबसे रहस्यमय और उपेक्षित हिस्से की ओर जा रही थी इसलिए अंधेरे में उदास खडी थी।
इसी पस्त ट्रेन को पकड़ने के लिए आधे घंटे पहले, हम दोनों यानि शाश्वत और मैं तीर की तरह पूर्वी दिल्ली की एक कोठरी से उठकर भागे थे। ट्रेन छूट न जाए, इसलिए मैं रास्ते भर टैक्सी ड्राइवर पर चिल्ला रहा था। हड़बड़ी में मेरे हैवरसैक का पट्टा टूट गया, अब गांठ लगाकर काम चलाना पड़ रहा था। यह हैवरसैक और एक सस्ता सा स्लीपिंग बैग उसी दिन सुबह मेरे दोस्त शाहिद रजा ने अपने किसी पत्रकार दोस्त लक्ष्मी पंत के साथ ढूंढकर, किसी फुटपाथ से खरीद कर मुझे दिया था। मैं पूर्वोत्तर के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता था। कभी मेरे पिता डिब्रूगढ़ के एयरबेस पर तैनात रहे थे। वहाँ व्यापार करने गए एक रिश्तेदार की मौत ब्रह्मपुत्र में डूबकर हो गई थी। उनका रूपयों से भरा बैग हाथ से छूटकर नदी में गिर पड़ा था और उसे उठाने की कोशिश में स्टीमर का ट्यूब उनके हाथ से छूट गया था। मेरे ननिहाल के गाँव के कुछ लोग असम के किसी जिले में खेती करते थे। इन लोगों से और बचपन में पढ़ी सामाजिक जीवन या भूगोल की किताब में छपे चित्रों से मुझे मालूम था कि वहाँ आदमी को केला कहते हैं। चाय के बगान हैं जिनमें औरतें पत्तियां तोड़ती हैं। पहले वहाँ की औरतें जादू से बाहरी लोगों को भेड़ा बनाकर, अपने घरों में पाल लेती थी, चेरापूंजी नाम की कोई जगह हैं जहाँ दुनिया में सबसे अधिक बारिश होती है।
इसके अलावा मुझे थोड़ा बहुत असम के छात्र आंदोलन के बारे में पता था। खास तौर पर यह कि अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में बनारस में तेज-तर्रार समझे जाने वाले एक-दो छात्रनेता फटे गले से माइक पर चीखते थे, गौहाटी के अलाने छात्रावास के कमरा नंबर फलाने में रहने वाला प्रफुल्ल कुमार मंहतो जब असम का मुख्यमंत्री बन सकता है तो यहाँ का छात्र अपने खून से अपनी तकदीर क्यों नहीं लिख सकता। इन सभाओं से पहले भीड़ जुटाने के लिए कुछ लड़के, लड़कियां भूपेन हजारिका के एक गीत का हिंदी तर्जुमा गंगा तुम बहती हो क्यों गाया करते थे।
हैवरसैक में कभी यह गीत गाने वाले दोस्त, पंकज श्रीवास्तव की दी हुई (जो उसे किसी प्रेस कांफ्रेस में मिली होगी) एक साल पुरानी सादी डायरी थी जिस पर मुझे संस्मरण लिखने थे। आधा किलो से थोड़ा ज्यादा अखबारी कतरनें थी, दो किताबें (वीजी वर्गीज की नार्थ ईस्ट रिसर्जेंट और संजय हजारिका की स्ट्रेंजर्स इन द मिस्ट) थीं जिन्हें तीन दिन की यात्रा में पढ़ा जाना था। किताबें एक दिन ही पहले कनाट प्लेस के एक चमाचम बुक मॉल से बिना कन्सेशन का आग्रह किए शाश्वत के क्रेडिट कार्ड पर खरीदी गई थीं। कुछ गरम कपड़े थे वहीं बगल में जनपथ के फुटपाथ से छांटे गए थे। वहीं से खरीद कर मैने शाश्वत को एक चटख लाल रंग की ओवरकोटनुमा जैकेट, ड्राई क्लीन कराने के बाद शानदार पैकेजिंग में भेंट कर दी थी। बड़ी जिद झेलने के बाद मैने जैकेट की कीमत नौ हजार कुछ रूपये बताई थी जबकि वह सिर्फ तीन सौ रूपये में ली गई थी। वही पहने, स्टेशन की बेंच पर बैठा वह बच्चों को दिया जाने वाला नेजल ड्राप ऑट्रिविन अपनी नाक में डाल रहा था। उसकी नाक सर्दी में अक्सर बंद हो जाया करती थी। बीच-बीच में वह जेब से निकाल कर गुड़ और मूंगफली की पट्टी खा रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि पूर्वोत्तर जाकर हम लोग जो रपटें और फोटो यहाँ के अखबारों, पत्रिकाओं को भेजेंगे, उससे हम दोनों धूमकेतु की तरह चमक उठेगे और तब चिरकुट संपादकों के यहाँ फेरा लगाकर नौकरी मांगने की जलालत से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा।
शाश्वत की अटैची में यमुना पार की कोठरी की सहृदय मालकिन के दिए पराठे, तली मछली और अचार था, तीन फुलस्केप साइज की सादी कापियां थीं।
अपनी-अपनी करनी से मैं पिछले एक साल से और वह पांच महीनों से बेरोजगार था। कई बार वह सुबह-सुबह नौकरी का चक्कर चलाने किसी अखबार मालिक या संपादक से मिलने हेतु जिस समय तैयार होकर दबे पाँव निकलने को होता, मैं रजाई फेंक कर सामने आ जाता। मैं साभिनय बताता था कि छोटी सी नौकरी के लिए डीटीसी की बस के पीछे लपकता हुआ वह कैसे किसी अनाथ कुत्ते की तरह लगता है। खोखली हंसी के साथ उसका एकांत में संजोया हौसला टूट जाता, नौकरी की तलाश स्थगित हो जाती और मैं वापस रजाई में दुबक जाता। मैं खुद भी अवसाद का शिकार था। उस साल मैने कई महीने एक पीली चादर फिर रजाई ओढ़कर अठारह-अठारह घंटे सोने का रिकार्ड बनाया था। इसी मनःस्थिति में हताशा से छूटने, खुद को फिर से समझने और अनिश्चय में एक धुंधली सी उम्मीद के साथ यह यात्रा शुरू हो रही थी।
उत्तर-पूर्व जाकर मैं करुंगा क्या, इसका मुझे बिल्कुल अंदाज नहीं था। इसलिए मैने खुशवंत सिंह, राजेंद्र यादव, प्रभाष जोशी, मंगलेश डबराल, आनंद स्वरूप वर्मा, राजेंद्र घोड़पकर, अभय कुमार दुबे, यशवंत व्यास, रामशरण जोशी, रामबहादुर राय, अरविंद जैनादि के पास जाकर एक काल्पनिक सवाल पूछा था और उनके जवाब एक कागज पर लिख लिए थे। सवाल था- “जनाब। फर्ज कीजिए कि आप इन दिनों उत्तर-पूर्व जाते तो क्या देखते और क्या लिखते?”
जैसा हवाई सवाल था, वैसे ही कागज के जहाजों जैसे लहराते जवाब भी मुझे मिले। इन्हीं जवाबों को गुनते-धुनते मैं अपना और शाश्वत का मनोबल ट्रेन में बैठने लायक बना पाया था। हंस के संपादक राजेंद्र यादव का कहना था कि इस यात्रा में कोई लड़की मेरे साथ होती तो ज्यादा अच्छा होता। इससे वहाँ के समाज को समझने में ज्यादा सहूलियत होती और मीडिया में हाईप भी बढिया मिलती। सबसे व्यावहारिक सुझाव, रियलिस्टक स्टाइल में खुशवंत सिंह ने दिया था। मिलने के लिए निर्धारित समय से बस आधे घंटे लेट उनके घर पहुंचा तो बताया गया कि मुलाकात संभव नहीं है। पड़ोस के एक पीसीओ से फोन किया तो व्हिस्की पी रहे बुड्ढे सरदार ने कहा,
“पुत्तर तुम नार्थ-ईस्ट जाओ या कहीं और, मुझसे क्या मतलब।”
अपने कागज पर मैने खुशवंत सिंह के नाम के आगे लिखा,
“जरूर जाओ बेटा। बहुत कम लोग ऐसा साहस करते हैं। मैं तुम लोगों का यात्रा-वृत्तांत अंग्रेजी में पेंग्विन या वाइकिंग जैसे किसी प्रकाशन में छपवाने में मदद करूंगा।”
यह शाश्वत को पढ़वाने के लिए था क्योंकि पैसा उसी का लग रहा था। खुशवंत सिंह के आशीर्वचन का पाठ करते हुए मुझे अपने छोटे भाई सुनील की याद आई। छुटपन में उसे साइकिल पर खींचते-खींचते जब मैं थक जाता था, इसे भांप कर वह कहता था कि बगल से गुजर रहे दो आदमी आपस में बातें कर रहे थे यह लड़का हवाई जहाज की तरह साइकिल चलाता है। मैं उसका चेहरा नहीं देख पाता था क्योंकि वह डंडे पर बैठा होता था।
ब्रह्मपुत्र मेल की पहली सीटी और धकमपेल के बीच हम लोग भीतर घुसे तो कूपे में असम राइफल्स के मंगोल चेहरे वाले सैनिक अपना सामान जमा रहे थे। निर्लिप्त, तटस्थ, खामोश कुशलता से कूपे के खाली कोनों-अंतरों में वे अपने ट्रंक, होल्डाल, किटबैग, हैवरसैक रखे जा रहे थे। अंदाजा इतना सटीक कि जैसे वे खाली जगहें खासतौर पर उन्हीं सामानों के आकार-प्रकार के हिसाब से बनाई गईं थीं।
ऊपर की एक बर्थ पर लेटने की तैयारी कर चुके एक युवा सरदार जी, विदा करने आए एक परिजन को बता रहे थे कि उन्हें सीट तो बगल के डिब्बे में मिली थी लेकिन वहाँ सामने एक नगा बंदा था जो बहुत तेज बास मार रहा था। इसलिए कंडक्टर से कह कर डिब्बा बदलवा लिया। पता नहीं उन्हें, उस नगा बंदे से क्या परेशानी थी। शायद उसकी आधी ढकी, भीतर भेदती आँखों ने उनके मन के परदे पर हेड-हंटिंग, कुकुर भात और आतंकवाद की कोई हॉरर फिल्म चला दी होगी और दिल्ली से कमा कर देस लौटते निरीह और भुक्खड़ बिहारियों के सुरक्षित दलदल में आ धंसे। दिल्ली की बस में वे उन्हें अपने शरीर से छूने भी नहीं देते होंगे, क्योंकि बिहारी यहाँ एक गाली है।
ट्रेन थोड़ा-सा खिसक कर रूक गई। तभी गूंजे धरती आसमान-राम विलास पासवान का नारा लगाती, जवानी की धुंधली फोटो कापी, बिहारी नौजवानों की भीड़ डिब्बे में आ घुसी। वे सबसे किनारे की सीटों पर सस्ती अटैचियों, दिल्ली मॉडल के टू-इन-वन और फुटपाथों से खरीदे रंग-बिरंगे कपड़ो के ढेर के साथ काबिज होने लगे और रिजर्वेशन वाले यात्री अपने सामानों से अपनी बर्थों की किलेबंदी करते हुए पसरने लगे। वे अपनी देह भाषा में रैली से लौट रहे इन बेटिकट, दलित कार्यकर्ताओं का विरोध कर रहे थे।
डिब्बे में दो कंडक्टर घुसे। उन्होंने लुंगी पहने एक मरियल से लड़के से टिकट मांगा। लड़का सहमी, पीली आंखों से उन्हें ताकता ही रह गया। कुछ बोल पाता इससे पहले ही उनमें से एक ने उसे कसकर तमाचा जड़ दिया और सबको नीचे उतारने लगा। एक दढ़ियल युवक ने प्रतिवाद किया, पासवान जी की रैली में आए हैं जी टिकठ काहे लेंगे। जैसे आए थे, वैसे ही जाएंगे।
इनसे पूछिए कि इस डिब्बे में आने की इन सबों की हिम्मत कैसे पड़ी। पीछे किसी बर्थ से आवाज आई।
चलो हमारा घर भी खाली पड़ा है, वहाँ भी कब्जा कर लोगे। जाओ पासवान से पैसा लेकर आओ, रिजर्वेशन कराओ, तब यहाँ बैठो। दोनों कंडक्टर अब तक रैली वाले युवकों पर हावी हो चुके थे, पासवान जब रेल मंत्री था, तब था। अब वह हमारा कुछ नहीं कर सकता। बेटा, ट्रेड यूनियन के लीडर हैं, एक-एक को पटक के यहीं मारेंगे। पब्लिक भी अभी बताने लगेगी कि तुम्हारे पासवान की क्या औकात है। चलो चुपचाप उतरो।
दलित युवक चुपचाप उतर कर जनरल डिब्बों की ओर बढ़ गए। जैसे वे किसी शवयात्रा में जा रहे हों। जिस राजनीति और संगठन की शक्ति ने उन्हें ट्रेन में बिना टिकट सवार होने की हिम्मत दी थी, उसी संगठन का डर दिखाकर दो कंडक्टरों ने उन्हें नीचे उतार दिया। कंडक्टरों का हाथ भी दलित कार्यकर्ताओं पर ही छूटता है। महेंद्र सिंह टिकैत के साथ रैलियों में जाने वाले मुजफ्फर नगर, बागपत के जाट वातानुकूलित डिब्बों के परदे तक नोंच कर चिलम पर तमाखू के साथ पी जाते हैं तब ये टिकट बाबू किसी कोने में सिमटे हुए अपनी जान और नौकरी की खैर मनाते रहते हैं।
ट्रेन चली कि असम राइफल्स के सैनिकों ने बोतल खोल ली। वे अपने मगों और प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलासों में रम पीने लगे। थोड़ी ही देर में उनकी खामोशी टूटी। किसी अबूझ भाषा में एक दूसरे से उलझी, लंबी, उछलती रस्सियों की तरह उनकी बातें डिब्बे में फैलने लगीं। जिनके साथ परिवार थे चौकन्ने हो गए और जो करीब की बर्थों पर थे, कुछ इंच ही विपरीत दिशाओं में सरकने लगे। जीआरपी के एक अधेड़ सिपाही ने फौजियों की तरफ हाथ उठाकर कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उनकी तरह कोई प्रतिक्रिया न पाकर, बड़बड़ाता हुआ आगे बढ़ गया। यह मंगोल भारत था जिसका गंगा के मैदान वाले आर्य सिपाही से संवाद कठिन था।
पैंट्री कार से डिब्बे में बार-बार आते एक रेखियाउठान बेयरे का नाम बड़ा काव्यात्मक था। उसकी लाल रंग की सूती वर्दी पर काले रंग की नेम प्लेट लगी थी जिस पर सफेद अक्षरों में लिखा था, सजल बैशाख। उसकी मिचमिची आँखों और उजले दांतो को देखते हुए ख्याल आया कि बरसात तो आषाढ़ में शुरू होती है, बैसाख कैसे सजल हो सकता है। कहीं चकित करने के लिए ही तो उसका नाम नही रखा गया है। अगले दिन नाश्ते के समय मैने उससे पूछा कि बैशाख कैसे सजल हो गया है। वह इत्मीनान से देर तक हंसता रहा। पहले भी उससे यह सवाल कइयों ने पूछा होगा। प्रतिप्रश्न आया, आप पहली बार आसाम जा रहा है क्या। मेरे सिर हिलाने पर उसने कहा, जब थोड़ा दिन उधर बैठेगा तो अपने ही जान जाएगा कि वहाँ बैशाख मे मानसून ही नहीं आता, बाढ़ भी आ जाती है। य़ह पूर्वोत्तर की पहली झलक थी जो मुझे मुगलसराय से बिहार के बीच कहीं मिली।
दिन में जिस, पहले रोबीले मुच्छड़ ने मेरी बर्थ पर अतिक्रमण किया, मेरे जिले गाजीपुर के निकले, गहमर गांव के वीरेंद्र सिंह। पंद्रह दिन छुट्टी बिता कर निचले असम के बोंगाई गांव जा रहे थे जहाँ वे बीएसएफ की बटालियन में तैनात थे। गांव-जवार का होने के कारण या फिर अपने अतिक्रमण को वैधता देने के लिए मेरी तरफ खैनी बढ़ाते हुए उन्होंने सलाह दी कि जा रहे हैं तो वहाँ जरा मच्छड़ और छोकड़ी से बचिएगा, तब गाजीपुर लौट पाइएगा।
मारिए वह भी कोई देश है महाराज। यह उनका तकिया कलाम था।
वह बता रहे थे कि कुनैन की गोली, बीएसएफ में जवान को कतार में खड़ा कर, मुँह पर मुक्का मार कर खिलाता है और मच्छरदानी में सोने का सख्त आर्डर है। नहीं मानने पर फाइन होता है। जान हमेशा पत्ते पर टंगी रहती है कि न जाने किधर से आल्फा या बोडो वाला आकर टिपटिपाने लगेगा। उग्रवादी भीड़ में ऐसे घूमते हैं जैसे पानी में मछली। उनके होने का तभी पता चलता है जब दो-चार आदमी गिरा दिए जाते हैं।
जैसे पानी में मछली- मैं मोंछू की उपमा पर चकित था। यही तो शिलाँग के सेंट एडमंडस कालेज से अंग्रेजी और लंदन से पत्रकारिता पढ़े संजय हजारिका की किताब में भी लिखा था। यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) का कमांडर परेश बरूआ एक बार तिनसुकिया में कालेज के लड़कों की टीम में शामिल होकर असम पुलिस की टीम के साथ फुटबाल मैच खेल कर निकल गया। तीन दिन बाद पुलिस को पता चला तब तक करीब के जंगल से उल्फा के कैंप उखड़ चुके थे।
सामने की बर्थ पर बारह-पंद्रह एयरबैगों, बोरियों, पालीथिनों से घिरी सहुआईन बैठी थीं। उनके पति को दूसरे डिब्बे में सीट मिली है इसलिए हर दो घंटे बाद कहती हैं, भइया देखे रहिएगा साथ में दो लड़कियां हैं। उनकी मणिपुर और बर्मा के बीच भारत के आखिरी कस्बे मोरे में परचून की दुकान है। गोरखपुर से मोरे कैसे पहुंच गए। कहती हैं, किस्मत भइय़ा।
आठ और ग्यारह साल की उनकी दो लड़कियां एक सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं और निराली अंग्रेजी बोलती हैं। वे एक दूसरे को मैन कहती हैं। सहुआइन अपनी निःशब्द भाषा में उन्हें प्रोत्साहित करती हैं और फिर संतुष्ट भाव से डिब्बे में पड़े प्रभाव का मुआयना करती हैं।
“मम्मा गेभ मी ओनली तीन टाका टू टेक झालमूड़ी। भ्हाई शुड आई गिभ दैट टू यू। टेक फ्राम योर मनी मैन।”
सहुआइन मोंछी को बता रही हैं। बिना दाढ़ी-मोंछ वाला, छोटा-छोटा लड़का मलेटरी-पुलिस सबके सामने आता है। टैक्स मांगता है। देना पड़ता है। नहीं तो जान से मार देगा।
हमारी दुकान के आगे एक मास्टर को मार दिया। बहुत शरीफ मास्टर था। सबसे प्रेम से बोलता था लेकिन तीन महीना से टैक्स नहीं दिया था। हम लोगों की भाषा बोलने पर रोक लगा दिया है। कहता है कोई भाषा बोलो हिंदी मत बोलो। भूल से जबान फिसल जाए तो टोकता है गाली देता है।
………तो यह निराली अंग्रेजी भारत और बर्मा की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर रह रहे बाहर के बच्चों की भाषा है जिसका आविष्कार उन्होंने जीवित रहने के लिए किया है।
तो छोड़ दीजिए, “आकर गोरखपुर में परचून की दुकान चलाइए।” शाश्वत स्लीपिंग बैग की भीतर से निंदियाई आवाज में सलाह देता है।
“नहीं भईया। जो मजा मोरे में है वह आल इंडिया में भी नहीं मिलेगा।”
“मारिए, वह भी कोई देस है महाराज।”
मोंछू का देस वह नहीं है जो बचपन में हम लोगों को भूगोल की किताब में राजनीतिक नक्शे के जरिए पहचनवाया गया था। वह भी नहीं है जिसे प्रधानमंत्री पंद्रह अगस्त को लालकिले से संबोधित करते हैं। दरअसल वह अपने देश से जाकर परदेस में नौकरी कर रहा है। हैवरसैक में रखे अखबारों की कतरनों के फोटोग्राफ्स मेरी आँखो के सामने घूम गए जिनमें कलात्मक लिखावट में नारे लिखे हुए थे- इंडियन डॉग्स गो बैक। ये कहाँ के कुत्ते हैं जो भारतीय कुत्तों को अपने इलाके से खदेड़ रहे हैं। डेल्ही इज स्टेप मदर टू सेवन सिस्टर्स। ये सात बहनें दूसरी किन लड़कियों को ताना दे रही हैं। एज क्रो फ्लाइज, इट इज क्लोजर टू हनोई दैन टू न्यू डेल्ही। यह क्यों बताया जा रहा है कि हम डेल्ही वालों के मुहल्ले में आकर गल्ती से बस गए हैं। अचानक लगा कि उस देस वाले, इधर के देस को लगातार गाली दे रहे हैं तो वहाँ जाती ट्रेन भी कुछ न कुछ जरूर कह रही होगी। मैं आँख बंद कर सारी आवाजों को सुनने को कोशिश करने लगा। सरसराती ठंडी हवा और अनवरत धचक-धक-धचक के बीच कल से व्यर्थ, रूटीन लगती बातों के टुकड़े डिब्बे में भटक रहे हैं। उन्हें बार-बार दोहराया जा रहा है। इतनी भावनाओं के साथ अलग-अलग ढंग से बोले जाने वाले इन वाक्यों के पीछे मंशा क्या है।
हालत बहुत खराब है।
वहाँ पोजीशन ठीक नहीं है।
माहौल ठीक नहीं है।
चारो तरफ गड़बड़ है।
आजकल फिर मामला गंडोगोल है।
जैसे लोग किसी विक्षिप्त और हिंसक मरीज की तबीयत के बारे में बात कर रहे हैं जिसके साथ, उन्हें उसी वार्ड में जैसे-तैसे गुजर करना है।
बिहार बीत चुका था। खिड़की के बाहर सत्यजीत रे की कोई फिल्म चल रही थी। मालदा के बंगाल के गांव गुजर रहे थे। सादे से घरो के आगे हरियाली से घिरा पुखुर और धान के कटे, अनकटे खेतों पर क्षितिज तक छाया नीलछौंहा विस्तार। ट्रेन में मिष्टीदोई, झालमुडी और हथकरघे पर बने कपड़े बिक रहे थे।
थोड़ी ही देर बाद न्यू जलपाईगुड़ी यानि एनजेपी आते ही हम लोग ग्राम बाँग्ला से उड़कर चीनी सामानों से भरी किसी विदेशी गली में आ गिरे। एक के पीछे एक सैकड़ो वेंडर जो चीनी कैमरे, टेलीविजन, कैलकुलेटर, मोबाइल, फोन, घड़ियां, टेपरिकार्डर, इलेक्ट्रानिक खिलौने, कंबल, बाम चीखते हुए बेच रहे थे। ऊपर से नीचे से तक सामानों से लदे वे चीन के व्यापारिक दूत लग रहे थे। प्लेटफार्म पर बिक रही सारी सिगरेटें विदेशी थी। यहाँ की सिगरेटों से लंबी और बेहद सस्ती। चीनी दूतों की तादात इतनी ज्यादा थी कि सारंगी और इकतारा लिए भिखारी ट्रेन में नहीं घुस पा रहे थे।
राजनीति की भाषा में एनजेपी को चिकेन्स नेक कॉरिडोर कहा जाता है। यह मुर्गे की गर्दन जितना दुबला यानि सिर्फ इक्कीस किलोमीटर चौड़ा गलियारा है जहाँ से पूर्वोत्तर से आती तेल और गैस की पाइपलाइनें गुजरती हैं। अक्सर पूर्वोत्तर के आंदोलनकारी इस मुर्गे की गरदन मरोड़ देने की धमकी देते रहते हैं। ऐसा हो जाए तो गैस और तेल की सप्लाई ही नहीं बंद होगी, पूर्वोत्तर का शेष देश से संपर्क भी कट जाएगा। तब कलकत्ता से गौहाटी के लिए हवाई जहाज पकड़ना होगा।
वेंडरों, अखबारों और जहाँ-तहां नेटवर्क पकड़ते मोबाइल फोनों के जरिए ट्रेन में खबरें आ रही थीं कि असम हिंदी भाषियों को मारा जा रहा है। बिहारियों के घर जलाए जा रहे हैं। तिनसुकिया और अरूणाचल के बीच कहीं सादिया कुकुरमारा में दो दिन पहले उल्फा ने तीस बिहारियों को भून डाला। उनकी लाशें अब भी वहीं सड़ रही हैं। इनमें से सभी मजदूर थे जो तेजू में लगने वाली साप्ताहिक हाट से राशन खरीद कर एक ट्रक में सवार होकर लौट रहे थे। उन्हें जंगल में ट्रक रोक कर उतारा गया, कतार में खड़ा कर नाम पूछे गए और फिर गोली से उड़ा दिया गया। लौटती ट्रेनों में जगह नहीं है क्योंकि बिहारी अपने घर, जमीनें छोड़ कर असम से भाग रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में पचपन से अधिक बिहारी मारे गए हैं।
संजय हजारिका की किताब में खून, बारूद, गुरिल्ला, मैमनसिंघिया मुसलमान, शरणार्थी और घुसपैठिये थे। वर्गीज की किताब में संधिया, समझौते, राजनीति के दांव-पेंच, प्रशासनिक सुधार और इतिहास थे। दोनों को पढ़ते और ऊंघते हुए मुझे लगा कि यह ट्रेन मजबूर लोगों से भरी हुई है। उन्हें वहाँ लिए जा रही है जहाँ वे जाना नहीं चाहते। रोजी, व्यापार, रिश्तों की हथकड़ियों से जकड़ कर वे बिठा दिए गए हैं। वे जानते हैं कि वहाँ मौत नाच रही है फिर भी जा रहे हैं। तभी अचानक लंबी यात्रा की के बेफिक्र आलस की जगह डिब्बों चौकन्नापन पंजो के बल चलता महसूस होने लगा। तीन को छोड़ कर बाकी भाषाएँ और बोलियां भयभीत, फुसफुसाने लगीं। ये तीन नई भाषाएँ थीं असमिया, अंग्रेजी और यदा-कदा बांग्ला। मैने स्लीपिंग के भीतर नाखून चबा रहे शाश्वत की ओर देखा। थोड़ी देर बाद उसने कहा, अबे जब दुर्भाग्य यहाँ तक ले ही आया है तो आगे जो होगा देखा जाएगा।
असम में प्रवेश करते ही हरियाली का जैसे विस्फोट होता है। सूरज की रोशनी में कौंधती, काले रंग को छूती हरियाली। खिड़कियों, मकानों की दरारों, पेड़ो के खोखलों से कचनार लताएं झूलती मिलती है जो हर खाली जगह को नाप चुकी होती हैं।
बाँस, नारियल, तामुल, केले के बीच काई ढके ललछौंहे पानी के डबरों और पोखरों से घिरे गांव। घरों और खेतों के चारों और बांस की खपच्चियों का घेरा। सीवान में हर तरफ नीली धुंध। छोटे-छोटे स्टेशन और हाल्ट गुजर रहे थे- न्यू बंगाई गांव, नलबाड़ी, बारपेटा, रंगिया….अखबारों में छपी रपटें, तस्वीरें बता रही थीं कि ये वही जगहें हैं जहाँ पिछले दिनों हिंदीभाषियों की हत्याएं की गईं हैं। एक वेंडर से लाल सा और कोई लोकल नमकीन लेते हुए मुझे धक से लगा कि मेरे बोलने में खासा बिहारी टोन है जो जरा सा असावधान होते ही उछल आता है।
हमारा नाम अनील यादव है।
मैं पता नहीं अपने सिवा किन और लोगों को अपने भीतर शामिल करते हुए अपने नाम को खींचता हूं। मैने पहली बार गजब आदमी देखा जो बांस की बडी अनगढ़ बांसुरी लिए था। यात्रियों से कहता था, गान सुनेगा गान। अच्छा लगे तब टका देगा। अपने संगीत पर ऐसा आत्मविश्वास। बहुत मन होते हुए भी उसे नहीं रोक पाया। शायद सोच रहा था कि क्या पता वे लोग इन तरीकों से हिंदी बोलने वाले लोगों की ट्रेनों में शिनाख्त कर रहे हों। मे आई सिट हियर ऑनली फॉर थ्री मिनिटस, छाता और बैग लिए एक अधेड़ ने मुझसे पूछा। मैं एक तरफ खिसक गया। उन्होंने बताया कि ब्रह्मपुत्र पार करने में ट्रेन को तीन मिनट लगते हैं, उसके बाद गौहाटी है। सारी खिड़कियाँ पीठों से ढंक गईं। लोग खासतौर पर महिलाएं जान-माल की सलामती की कामना बुदबुदाते हुए, नीली धुंध में पसरी दानवाकार नदी में सिक्के फेंक रहे थे।

किताबों की बात जो पढ़े उसका भी भला, जो न पढ़े उसका भी

सुधा अरोड़ा की प्रिय किताबें
प्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा कहती हैं कि मुझे सबसे अधिक संस्मरण और डायरी पसंद हैं. सीमोन द बोउवार की किताब सेकेंड सेक्स, विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा, धर्मवीर भारती की ठेले पर हिमालय और फिल्मकार एलिया कजां की आत्मकथा बहुत पसंद हैं. ममता कालिया का उपन्यास दुक्खम सुक्खम. डॉ रवींद्र कुमार पाठक की नई किताब आई है जनसंख्या समस्याः स्त्री पाठ के रास्ते. रवींद्र जी ने अच्छी किताब लिखी है. पसंद तो समय-समय पर बदलती रहती है. कभी कोई ज्यादा पसंद आता है तो कभी कोई. वैसे राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, प्रेमचंद, अज्ञेय, (धर्मवीर) भारती जी, मन्नू (भंडारी) जी, कृष्णा सोबती पसंद हैं. नए लेखकों में खास तौर से नीलाक्षी सिंह पसंद हैं. इनके अलावा चंदन पांडेय, अल्पना पांडेय और (प्रेमरंजन) अनिमेष अच्छा लिख रहे हैं. बहुत-से लेखक बहुत अच्छा लिखकर भी गुमनाम रह जाते हैं. चंद्रकिरण सोनरेक्सा की पिंजरे की मैना, कुसुम त्रिपाठी की किताब जब स्त्रियों ने इतिहास रचा और डॉ रवींद्र की ऊपर बताई किताब  ऐसी ही किताबों में हैं. मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुड़िया भीतर गुड़िया ऐसी किताबों में है.

गोविन्द मिश्र, मंजूर एहतेशाम, प्रेमपाल शर्मा, पंकज बिष्ट और कमला प्रसाद की प्रिय किताबें
गोविन्द मिश्र कहते हैं कि आज के लेखकों के लेखन में स्थूलता बढती ही जा रही है मगर मुझे लेखन में सूक्ष्म यथार्थ का प्रकटन ही पसंद है। शैलेश मटियानी का उपन्यास 'गोपली गफूरन' प्रिय किताब है। एक बडी क़िताब वह होती है जिसमें कईतरह के इंटरप्रिटेशन हों। इस मायने में यह एक बडी क़िताब है। मंजूर एहतेशाम कहते हैं कि मेरी कही गई बात इस फकीर की बात है, जो सुने उसका भी भला और जो न सुने उसका भी भला। सलमान रश्दी की 'मिडनाइट चिल्ड्रन' का यथार्थ स्वतन्त्रता के बाद यथार्थ है। और इस तरह से इस यथार्थ की बारीकियों को रेखांकित करना किसी चमत्कार से कम नहीं है। प्रेमपाल शर्मा कहते हैं कि मेरी प्रिय पुस्तक हर दो वर्ष बाद बदल जाती है। पंकज बिष्ट की 'लेकिन दरवाजा', सुरेन्द्र वर्मा कृत 'मुझे चांद चाहिए', श्रीलाल शुक्ल का 'राग दरबारी' व वर्गीज क़ुरियन की किताब 'सपना सच हो गया' मेरी प्रिय किताबें हैं। प्रसिध्द कथाकार व समयान्तर के संपादक पंकज बिष्ट कहते हैं कि मेरे लिए यथार्थ लेखन वह है, जो वृहत्तर समाज के हितों की बात करे। मेरी प्रिय पुस्तक 'राग दरबारी' में जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं जिस पर यह उपन्यास टिप्पणी न करता हो। आज जब नई आर्थिक नीतियों के कारण आमजन का जीवन बदहाल होता जा रहा है ऐसे में ग्रामीण जीवन पर केन्द्रित यह उपन्यास स्वत: ही महत्वपूर्ण हो जाता है। अपनी प्रिय पुस्तक के संदर्भ में 'वसुधा' पत्रिका के संपादक व सुप्रसिध्द आलोचक कमला प्रसाद मुक्तिबोध के उपन्यास 'विपात्र' व हरिशंकर परसांई की 'एक साहित्यिक की डायरी' के मुरीद रहे। (संगमन के समारोह से साभार)

किताबों के लिए पागल मन

राजी सेठ की प्रिय किताबें
मुझे उन किताबों से लगाव रहा है जिनमें लेखक का मन खुलता है और कुछ अनौपचारिक बातें सामने आती हैं। 'लेटर्स टू अ यंग पोएट' को जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के द्वारा कविता लिखने की इच्छा रखने वाले एक युवा को लिखे गए इन दस पत्रों की पुस्तक को मैं अपने जीवन में पढ़ी हुई बेहतरीन किताबों में से एक मानती हूं। रिल्के ने न सिर्फ कविता या लेखन के बारे में, बल्कि जीवन के बारे में भी ऐसी बुनियादी महत्व की बातें कही हैं, जो मुझे उम्र के इस पड़ाव में भी बहुत प्रासंगिक लगती हैं। हिंदी कवि 'अज्ञेय' की किताब 'भवन्ती' दरअसल उनकी नोटबुक है, लेकिन यह उस तरह का पारंपरिक नोटबुक नहीं है, जिसमें सूचनाओं और रोजमर्रा के ब्योरों का अंबार रहता है। इसके उलट यह उनकी कविता की ही तरह, बहुत सुचिंतित और गहरे अर्थों में अपने मन की टोह लेती हुई किताब है। इस किताब में अज्ञेय मन की जिन परतों को रोशन करते हैं, वे आंखें खोलने वाली हैं। कथाकार निर्मल वर्मा ने अपनी किताब 'धुंध से उठती धुंध' को डायरी, जर्नल्स, नोट्स आदि का संचयन कहा है, लेकिन यह शुरू से अंत तक आदमी और उसकी तकलीफ, उसका आसपास और अकेलापन, उसकी दुविधाएं और उसके सरोकारों को जाहिर करने वाली अद्भुत किताब है। पढ़ने वाले जिस 'निर्मलीय गद्य' से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं, उसकी कई रंगत भी यहां मौजूद है। डॉ. देवराज की लिखी किताब 'दर्शन, धर्म, अध्यात्म और संस्कृति' मुझे अपने विषय की वजह से खास तौर से पसंद आती है। एक नास्तिक होते हुए भी डॉ. देवराज ने इस किताब के जरिए धर्म, अध्यात्म आदि का जितना मानवीय विवेचन किया है, वह दुर्लभ है। इसके लिए उन्होंने 'सृजनात्मक मानववाद' की राह बनाई, जिसकी बुनियाद में यह आश्वासन था कि इसी लौकिक जीवन में सबकुछ प्राप्त करना मुमकिन है। 'विवक्षा' कवि-लेखक अशोक वाजपेयी की कविताओं का संचयन है। अशोक की कविता प्रेम, परिवार, पड़ोस और अपने ढंग से समाज में हिस्सेदारी करती हुई सयानी समझ की कविता है। उनकी कविता पढ़ने के बाद जब आप अपनी देखी-जानी हुई दुनिया में फिर से शामिल होते हैं, तो आपके अहसास पहले की तरह नहीं रह जाते हैं। यह बड़ी कविता की सबसे बड़ी खूबी है। (नवभारत टाइम्स / अनुराग वत्स)

हर्ष मंदर की प्रिय किताबें 
किताबें कई तरह की पसंद हैं मुझे, इसलिए मैं फर्क किस्म की किताबों के नाम लूंगा। हालांकि इतनी कम संख्या यानी केवल पांच में अपनी पसंद को पूरी तरह जाहिर कर पाना मुश्किल है। एलन पैटन का यह उपन्यास दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद को आधार बनाकर लिखा गया है। यह उपन्यास न सिर्फ रंगभेद सरीखे क्रूर इंसानी कारनामे की जांच-परख है, बल्कि उसके खिलाफ एक ताकतवर विरोध प्रस्ताव भी है। तमाम तरह के कानून बन जाने के बावजूद कई मुल्कों में आज भी किसी-न-किसी रूप में नस्ली भेदभाव की बात सामने आती है, इसलिए आज और आने वाले वक्त में भी ऐसे उपन्यासों की जरूरत बनी रहेगी। अपने देश में गरीब किसान के हालात और उसके साथ होने वाले अन्याय की दास्तान है, प्रेमचंद का उपन्यास गोदान। यह हिंदी में लिखे गए उन शुरुआती उपन्यासों में से एक है, जिसकी न तो कहानी बासी हुई है और न ही उसके कहने का अंदाज। 'गोदान' अपने मानवीय सरोकारों के लिए मुझे ताउम्र प्रिय लगती रहेगी। मैं इस उपन्यास के पास इसलिए भी लौटता रहूंगा क्योंकि मेरे देशवासी ज्यादातर किसानों के साथ अन्याय अब भी जारी है। 'पॉइजन्ड ब्रेड' मराठी दलित लेखकों के अनुभव से बनी किताब है। मराठी इस देश की उन भाषाओं में से एक है, जिसमें समाज के दबे और सताए हुए वर्ग की आवाज उभर कर आई। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है कि जिस मुश्किल हालात में इस वर्ग के लोग जीते हैं, उसे उसकी तमाम परतों को वे रचना में भी ला सके। ऐसा लेखन पढ़ने वालों को इस वर्ग के प्रति पहले से ज्यादा सजग और संवेदनशील बना है। ई. एफ. शूमाकर की किताब 'स्मॉल इज वंडरफुल' आर्थिक मुद्दों पर है। इसमें वह मौजूदा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बरक्स उस वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की बात करते हैं, जो आम आदमी की परवाह करती है। मेरा खयाल है यह सोच गांधीजी की उस सोच के बहुत निकट है, जिसमें उन्होंने लकीर पर खड़े आखिरी आदमी के हिसाब से चीजें सोचने की सलाह दी थी। इस सोच की जरूरत हमें अब भी है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की किताब 'आर्ग्युमेंटेटिव इंडियंस' आर्थिक मसलों पर न होकर समाज, साहित्य और संस्कृति से जुड़े बड़े मसलों पर है। अमर्त्य सेन की सोच देश की उस मूल्यवान सेक्युलर थाती से जुड़ती है, जो हमारे लिए बहुत अहम है। एक ऐसे वक्त में जब चरमपंथी सोच हावी होती जा रही है, अमर्त्य सेन का सुझाया रास्ता हमारा हो सकता है। (नवभारत टाइम्स / अनुराग वत्स)

अमृता प्रीतम की प्रिय किताब 
एक समय ऐसा था जब ऐन रेन्ड के उपन्यासों की धूम थी. पाठक पागल थे उसके पीछे. वह नौजवानों की मसीहा बनी हुई थी, लोग उससे प्रेरणा पाते थे. आर्किटेक्ट और मैनेजमेंट के छात्र आज भी उसे पूजते हैं. यही ऐन रैंड अमृता की पसन्दीदा लेखिका हैं. पढ़ने-लिखने वाले लोगों को जिन्हें पुस्तकों से प्यार होता है, उन्हें लगता है, वे चाहते हैं कि जब वे कोई अच्छी चीजें पढ़ते हैं यह औरों को भी पढ़ना चाहिए. इसका आनन्द उनके परिचितों को भी मिलना चाहिए. ऐन रैंड के 'एटलस श्रग्ड' और 'फाउन्टेन हेड' को अमृता इतना पसन्द करती थीं उनसे इतनी प्रभावित थीं कि बहुत बार इन्हें खरीदा और दोस्तों को बाँटा. जिन्दगी की कई मुश्किल घड़ियों में उन्हें ऐन रेन्ड से ताकत मिली. इंसान-इंसान में जो फर्क होता है, जो फर्क हो सकता है वह उन्होंने इस लेखिका से ही सीखा. वे तहे दिल से उसका शुक्रिया अदा करना चाहतीं हैं पर जिसे कभी देखा न हो, जिससे आप कभी मिले न हों, उसे भला आप कैसे शुक्रिया अदा करेंगे? लेकिन बिना मिले, बिना देखे भी यदि आप के मन आभार है तो आप कोई न कोई तरीका अख्तियार कर लेते हैं यही वे करतीं हैं और वे ऐन रेन्ड के एक किरदार को दूसरे किरदार के कहे हुए शब्दों को मन-ही-मन दोहरातीं हैं, 'आई थैंक यू फॉर ह्वाट यू आर' और अपने ढंग से अपनी प्रिय लेखिका को धन्यवाद देतीं हैं. (विजय शर्मा के लेख - अमृता प्रीतम: क्या दिया तुमने? का एक अंश)